Artificial Intelligence: कृषि सुधार में उपयोगी तकनीक

नई दिल्ली: सरकार ने किसानों के हित में कृषि क्षेत्र में विभिन्न चुनौतियों का समाधान करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) विधियों को नियोजित किया है.:

किसान ईमित्र

यह एक एआई संचालित चैटबौट है जो किसानों को पीएम किसान सम्मान निधि योजना के बारे में जानकारी प्राप्त करने में सहायता करता है. यह कई भाषाओं में समाधान उपलब्ध कराता है और अन्य सरकारी कार्यक्रमों में सहायता के लिए विकसित हो रहा है.

जलवायु परिवर्तन के कारण उपज के नुकसान से निपटने के लिए राष्ट्रीय कीट निगरानी प्रणाली

यह प्रणाली फसल की समस्याओं का पता लगाने के लिए एआई और मशीन लर्निंग का उपयोग करती है. इस से स्वस्थ फसलों के लिए समय पर उपाय करना संभव होता है.

चावल और गेहूं की फसल के लिए सैटेलाइट, मौसम और मिट्टी की नमी डेटासेट का उपयोग करके फसल स्वास्थ्य आंकलन और फसल स्वास्थ्य निगरानी के लिए फ़ील्ड फ़ोटो का उपयोग करके एआई आधारित विश्लेषण कर समाधान करती है.

इस के अलावा, सरकार देश में प्रति बूंद अधिक फसल (पीडीएमसी) की एक केंद्र प्रायोजित योजना लागू कर रही है. पीडीएमसी ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणालियों जैसे सूक्ष्म सिंचाई के माध्यम से खेत स्तर पर जल उपयोग दक्षता बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करती है. सूक्ष्म सिंचाई से पानी की बचत के साथ-साथ उर्वरक के उपयोग में कमी, श्रम व्यय, अन्य इनपुट लागत और किसानों की समग्र आय में वृद्धि में भी मदद मिलती है.

सरकार पीडीएमसी के तहत ड्रिप और स्प्रिंकलर सिस्टम लगाने के लिए छोटे और सीमांत किसानों को 55 फीसदी और अन्य किसानों को 45 फीसदी की दर से वित्तीय सहायता प्रदान करती है. इस के अलावा, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) ने भी आईओटी आधारित सिंचाई प्रणाली विकसित की है और चयनित फसलों के लिए खेत में इसका परीक्षण किया है.

Marketing and Branding: क्या है किसानों की आय बढ़ाने का तरीका

सबौर: बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर में सेंटर औफ़ एकसीलेन्स मिलेट्स वैल्यू चैन परियोजना के अंतर्गत बिहार राज्य में पोषक अनाज की मार्केटिंग और ब्राडंगि (Branding) रणनीतियों पर ब्रेनस्ट्रोमिंग सेशन का आयोजन 6 दिशम्बर 2024 को किया गया. इस कार्यक्रम के उद्घाटन समारोह में बि० ए० यु० के निदेशक अनुसंधान, डा. श्रीनिवास राय, प्राचार्य बिहार कृषि महाविद्यालय सबौर, प्रधान अन्वेषक डा.महेश कुमार सिंह, उप अन्वेषक डा. बीरेंद्र सिंह, एवं डा. धर्मेंदर वर्मा, मौजूद थे. डा. नेहा पाण्डेय सहायक प्रध्यापक सह कैनिय वैज्ञानिक प्रसार शिक्षा, बि० ए० सी० सबौर ने कार्यक्रम का संचालन किया.

इस कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे निदेशक अनुसंधान बि० ए० यु० सबौर डा.ए.के.सिंह का मानना है कि पोषक अनाज का उत्पादन कम उपजाऊ, असंचित क्षेत्र एवं बदलते जलवायु में असानी से किया जा रहा है, साथ ही विभिन्न बिमारीयों जैसे मोटापा, चीनी रोग, हृदय रोग, हड्डी रोग एवं बेहतर स्वास्थ के लिए इन को भोजन में शामिल करना आज की जरूरत हो गई है, जिस से श्री अन्न ब्रांडिग एवं मार्केटिंग से किसानों की आय और बढ़ेगी. डा. श्रीनिवास राय, प्राचार्य बिहार कृषि महाविद्यालय सबौर, ने किसानो को भरोसा दिलाया की पोषक अनाज उत्पादन विपणन एवं ब्रांडिंग में विश्वद्यिालय, किसान भाईयों एवं उद्धमियों को पूर्ण सहयोग प्रदान करेगी.

Marketing and Branding

इस एक दिवसीय कार्यक्रम के मुख्य वक्ता डा. रफी, वैज्ञानिक भारतीय श्री अन्न अनुसंधान संस्थान हैदराबाद ने पोषक अनाज के बाजार संर्पक स्थापित करने के बारे में विस्तार से चर्चा की. वहीँ दुसरे मुख्य वक्ता डा. रामदत्त सहायक प्रध्यापक, डा. राजेन्द्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय पूसा, समस्तीपुर ने पोषक अनाज को विकसित करने के बारे मे चर्चा की. कार्यक्रम के तीसरे मुख्य डा. सुधानन्द प्रसाद लाल ने पोषक अनाज के मुल्य श्रृंखला सुदृड करने के लिए विस्तार से चर्चा की एवं बिहार और भारत सरकार की मुख्य योजानओं के बारे में जानकारी दी. प्रधान अन्वेषक डा. महेश कुमार सिंह, ने पोषक अनाज का मानव स्वास्थ में महत्त्व एवं उत्पादन तकनीक पर प्रकाश डाला. कार्यक्रम के अंत में डा. नेहा पाण्डेय ने किसानों को पोषक अनाज से उद्यमी बनाने और उन की आय बढ़ाने के लिए व्यापार की योजना पर विस्तार से चर्चा करी.

जलकुंभी (Water Hyacinth) से करें जल का उपचार

“जलकुंभी एक जलीय पौधा है, जिस का उपयोग अपशिष्ट जल और भारी धातुओं को हटाने के लिए किया जा सकता है.” जी हां, जलकुंभी फ्री फ्लोटिंग यानी स्वतंत्र रूप से तैरने वाला जलीय पौधा है, जिस का उपयोग अपशिष्ट जल के उपचार और भारी धातुओं को हटाने के लिए किया जा सकता है.

यह तेजी से बढ़ने वाला पौधा है, जो पानी से भारी धातुओं को अपनी जड़ों से ग्रहण कर सकता है. भारी धातुएं जलकुंभी पौधों की पत्तियों और तनों में आसानी से जमा हो जाती हैं.

जलकुंभी से जल का उपचार करने के लिए अपशिष्ट जल को पहले एक टैंक या तालाब में पंप किया जाता है, जहां जलकुंभी बढ़ रही होती है. ऐसी जगहों में जलकुंभी पानी से भारी धातुओं को सोख लेगी. पानी से जब जलकुंभी भारी धातुओं को सोख लेती है, तब कुछ समय के बाद जलकुंभी को काटा जा सकता है और पौधे से भारी धातुओं को हटाया जा सकता है.

भारी धातुओं को हटाने में जलकुंभी की दक्षता कई कारकों पर निर्भर करती है, जिस में भारी धातु का प्रकार, पानी में भारी धातु की घुलनशीलता और जलकुंभी की वृद्धि दर शामिल है. सामान्य तौर पर जलकुंभी सीसा, जस्ता, तांबा और कैडमियम सहित विभिन्न प्रकार की भारी धातुओं को हटाने में प्रभावी हो सकती है.

जलकुंभी अपशिष्ट जल के उपचार और भारी धातुओं को हटाने के लिए कम लागत वाली और टिकाऊ विधि है. यह एक तकनीक है, जिस का उपयोग दुनिया के कई हिस्सों में पानी की गुणवत्ता में सुधार के लिए किया जा सकता है.

धातुओं को हटाने और पानी के उपचार का तरीका

सब से पहले प्रदूषित या अपशिष्ट जल एकत्र करें, फिर तालाब में जलकुंभी उगाएं. इस के उपरांत अपशिष्ट या प्रदूषित जल को टैंक या तालाब में पंप करें, जहां जलकुंभी बढ़ रही हो. जिस जगह प्रदूषित पानी को जलकुभी के साथ इकट्ठा किया गया है, वहां जलकुंभी को कुछ समय के लिए पानी से भारी धातुओं को अवशोषित करने दें. जब लगे कि पानी से जलकुंभी ने भारी धातुओं को सोख लिया है, तो जलकुंभी की कटाई करें.
जब भारी धातुओं को यह सोख चुकी होती है, तब जलकुंभी से भारी धातुओं को हटा दें. इस जलकुंभी से उपचारित किए गए पानी का उपयोग सिंचाई, औद्योगिक प्रक्रियाओं या अन्य उद्देश्यों के लिए किया जा सकता है.

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि जलकुंभी अपशिष्ट जल उपचार का पूरी तरह समाधान नहीं है. यह सुनिश्चित करने के लिए कि पानी मानव उपयोग के लिए सुरक्षित है, जलकुंभी उपचार को अन्य तरीकों जैसे निस्पंदन और क्लोरीनीकरण के साथ जोड़ना महत्वपूर्ण है.

– डा. ज्योत्सना मिश्रा, महात्मा गांधी उद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, दुर्ग,

कैंप कार्यालयः कृषक सभागार, इं.गां.कृ.वि.वि. परिसर, लाभांडी, रायपुर (छ.ग.) 492012)

स्पिरुलिना की व्यावसायिक खेती

हमारे देश के ज्यादातर किसान पारंपरिक खेती पर निर्भर हैं, जिस से उन्हें अपेक्षा के अनुरूप फायदा नहीं मिल पाता है. पारंपरिक खेती पर निर्भर रहने वाले किसानों के लिए मौसम की अनिश्चितता भी बड़ी समस्या है. खादबीज की समय से उपलब्धता न हो पाना भी किसानों के लिए खेती में नुकसान की एक बड़ी वजह बन जाता है. पारंपरिक फसलों का मूल्य भी व्यावसायिक की अपेक्षा बहुत कम होता है, जिस से किसान निराशा का शिकार हो कर खेती से धीरेधीरे दूर होते जा रहे हैं. ऐसे में किसानों को पारंपरिक फसलों के साथ ही कुछ ऐसी फसलों की खेती की तरफ कदम बढ़ाना होगा, जिस का बाजार मूल्य और मांग दोनों अच्छे हों.

ऐसी ही एक व्यावसायिक फसल की खेती कर किसान अच्छीखासी आमदनी हासिल कर सकते हैं, जिसे स्पिरुलिना के नाम से जाना जाता है. यह एक तरह का जीवाणु है, जिसे साइनोबैक्टीरियम के नाम से भी जाना जाता है.

आमतौर पर इसे हम ‘शैवाल’ भी कह सकते हैं. यह एक प्रकार की जलीय वनस्पति है, जो  झीलों,  झरनों और खारे पानी में आसानी से पैदा होती है. प्राकृतिक रूप से यह समुद्र में पाई जाती है. इस का रंग हरा व नीला होता है.

व्यावसायिक लेवल पर इस की खेती प्लास्टिक या सीमेंट के टैंक बना कर भी की जा सकती है. यह पोषण के सब से महत्त्वपूर्ण तत्त्वों में शामिल किया जा सकता है, क्योंकि इस में ऐसे कई महत्त्वपूर्ण तत्त्व मौजूद होते हैं, जो हमें बीमारियों से बचाते हैं. साथ ही, इस में कई तरह के विटामिंस, खनिज और पोषक तत्त्व के साथसाथ प्रोटीन की भरपूर मात्रा पाई जाती है. यह पोटैशियम, कैल्शियम सेलेनियम और जिंक का भी महत्त्वपूर्ण स्रोत है. कई देशों में इसे ‘सुपर फूड’ के नाम से भी जाना जाता है.

सेहत के लिए फायदेमंद : स्पिरुलिना की खेती किसानों के लिए इसलिए ज्यादा फायदेमंद मानी जा सकती है, क्योंकि यह सेहत और पोषण के लिए सब से मुफीद माना जाता है. इस का खाने में उपयोग करने से रोगों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है, साथ ही, शरीर में कोलेस्ट्रौल की मात्रा को संतुलित रखता है. इस का उपयोग दिल के लिए भी अच्छा होता है.

अगर स्पिरुलिना का सेवन नियमित रूप से किया जाए तो यह सांस संबंधी बीमारी और एलर्जी से भी बचाता है. इस का उपयोग कैंसर की संभावनाओं को भी कम करता है. यह पाचन तंत्र और दिमागको भी मजूबत बनाता है.

स्पिरुलिना का खाने में उपयोग शरीर में खून की कमी को दूर करता है. यह मांसपेशियों को मजबूती देने के साथ शरीर में शुगर की मात्रा को भी नियंत्रित करता है. इसीलिए ढेर सारे गुणों को समेटे स्पिरुलिना की मांग न केवल देश में, बल्कि विदेशों में भी खूब है. इस नजरिए से कोई भी किसान अगर इस की खेती करता है, तो उसे मार्केटिंग के लिए परेशान नहीं होना पड़ता है.

स्पिरुलिना को खाने के लिए पाउडर के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. इस में आयरन,  ओमेगा 6 , ओमेगा 3 फैटी एसिड, प्रोटीन, विटामिन बी 1, विटामिन बी 2, विटामिन बी 3, कौपर,  मैंगनीज, पोटैशियम और मैगनीशियम जैसे महत्त्वपूर्ण पोषक तत्त्वों की प्रचुर मात्रा उपलब्ध होती है.

खेती के लिए अनुकूल दशा : स्पिरुलिना की व्यावसायिक खेती के लिए गरम मौसम का होना जरूरी है. भारत में ठंड के मौसम में इस की खेती नहीं की जा सकती.

अगर किसान चाहते हैं कि स्पिरुलिना की फसल में ज्यादा प्रोटीन की मात्रा हासिल करें, तो उस के लिए सामान्य धूप होना जरूरी है यानी तापमान 30 से 35 डिगरी सैल्सियस के बीच हो.

आजकल तापमान का पता लगाने के लिए कई तरह के मोबाइल ऐप उपलब्ध हैं, जिन्हें हम अपने मोबाइल फोन में आसानी से इंस्टौल कर जानकारी ले सकते हैं. कम तापमान की दशा में स्पिरुलिना की क्वालिटी और उत्पादन दोनों प्रभावित हो सकते हैं.

Sprilunaखेती के लिए पानी का टैंक या तालाब तैयार करना : स्पिरुलिना शैवाल की खेती को खुले तालाबों में करना न केवल कठिन होता है, बल्कि इस से क्वालिटी और उत्पादन दोनों ही प्रभावित होते हैं. इस के लिए किसान कंकरीट या प्लास्टिक की पन्नियों से टैंक तैयार कर सकते हैं.

शुरुआती दौर में कम लागत से स्पिरुलिना शैवाल की खेती शुरू करने के लिए पौलीथिन का गड्ढा भी तैयार किया जा सकता है. कंकरीट या पौलीथिन से तैयार किए गए गड्ढे का उत्तम आकार लंबाईचौड़ाई 10×20 फुट का हो सकता है और गहराई 2-3 फुट तक हो सकती है. गड्ढों को प्रदूषण के प्रभाव से बचाने के लिए पौली पैक में भी बनाया जा सकता है.

खेती शुरू करना : कंकरीट या पौलीथिन से तैयार गड्ढे यानी टैंक में 20 से 30 सैंटीमीटर की ऊंचाई तक पानी भर दिया जाता है. गड्ढे में पानी भरते समय यह ध्यान रखें कि उस में भरा जाने वाला पानी गंदा न हो. चूंकि गरम तापमान में इस की खेती की जाती है. ऐसे में गड्ढा खुले होने के चलते पानी का वाष्पीकरण भी होता रहता है, जिस से गड्ढे में पानी की मात्रा कम हो सकती है, इसलिए गड्ढे में 20 से 30 सैंटीमीटर की ऊंचाई तक पानी की भराई करते रहना चाहिए.

पानी के गड्ढे में स्पिरुलिना के बीज व कल्चर डालने के पहले पानी में पीएच मान की संतुलित मात्रा का निर्धारण किया जाता है.

पीएच का मतलब होता है पानी में हाइड्रोजन की क्षमता या पोटैंशियल हाइड्रोजन. इस से पानी की गुणवत्ता का निर्धारण भी किया जाता है. पानी में स्पिरुलिना बीज डालने के पहले पानी में पीएच की आदर्श मात्रा 9 से 11 के बीच होना जरूरी है. इस की जांच के लिए बाजार में मामूली कीमत पर पीएच पेपर मुहैया होता है. इस के जरीए पानी में पीएच की मात्रा का निर्धारण किया जा सकता है.

इस के अलावा गड्ढे में उपलब्ध पानी की मात्रा के अनुसार प्रति लिटर पानी में 8 ग्राम सोडियम बाई कार्बोनेट यानी खाने वाले सोडे़ का घोल मिलाते हैं. पानी में सूक्ष्म पोषक तत्त्वों का घोल या कल्चर भी मिलाया जाता है. इस में एक किलोग्राम स्पिरुलिना के बीज के साथ 8 ग्राम सोडियम बाई कार्बोनेट, 5 ग्राम सोडियम, 0.2 ग्राम यूरिया, 0.5 ग्राम पोटैशियम सल्फेट, 0.16 मैगनीशियम सल्फेट, 0.052 मिलीलिटर फास्फोरिक एसिड और 0.05 मिलीलिटर फेरस सल्फेट पानी से भरे टैंक में मिलाए जाते हैं. इस पानी को डंडे की मदद से रोज हिलाया जाना चाहिए. इसे तैयार करने में एक हफ्ते का समय लगता है.

किसान उक्त रसायनों के घोल की मात्रा के निर्धारण में आने वाली परेशानियों से बचने के लिए औनलाइन भी संतुलित मात्रा का पैकेट खरीद सकते हैं. जब गड्ढे में स्पिरुलिना की खेती योग्य पानी तैयार हो जाए, तो इस में स्पिरुलिना कल्चर और 10 लिटर पानी के हिसाब से 30 ग्राम शुष्क स्पिरुलिना का बीज डाला जाता है.

स्पिरुलिना की  खेती के लिए व्यावसायिक लेवल पर इस के बीज को किसानों को खुद ही अलग गड्ढे में तैयार करते रहना चाहिए. इस से बीज के ऊपर आने वाली लागत को कम किया जा सकता है.

पानी को क्रियाशील बनाना : जिस गड्ढे में स्पिरुलिना की खेती की जाती है, उस का क्रियाशील होना जरूरी है, इसलिए पानी को क्रियाशील बनाए रखने के लिए उस में बिजली या सोलर से चलने वाले आटोमैटिक पैडल या डंडे द्वारा पानी को फेंटते रहना चाहिए. इस से स्पिरुलिना जीवाणु कल्चर के साथ क्रियाशील हो कर अच्छा उत्पादन देता है. पानी के फेंटने के चलते स्पिरुलिना की फसल को पर्याप्त मात्रा में धूप भी मिलती  है.

फसल को सुखाना : स्पिरुलिना के गीले कल्चर को प्रतिदिन साफ कपडे़ से छान लिया जाता है. इस के बाद इस में उच्च गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए इसे किसी छायादार बंद कमरे में फैला कर सुखाया जाता है. सूखा होने पर स्पिरुलिना कई महीनों तक चल जाएगी और इस में पोषक तत्त्व भी संरक्षित किया जा सकता है. इस की तैयार फसल को नैचुरल तरीके से सुखाने के लिए मशीनें भी उपलब्ध हैं. इस का उपयोग कर फसल को सुखाया जा सकता है.

जब स्पिरुलिना पर्याप्त मात्रा में सूख जाती है, तो इसे पीस कर चूर्ण या कैप्सूल के लिए तैयार कर लिया जाता है. इस तरह स्पिरुलिना के तैयार उत्पाद को वायुरोधी पैकिंग में पैक कर 3 से 4 साल तक पौष्टिक गुणों के साथ महफूज रखा जा सकता है.

Sprilunaलागत, उत्पादन व लाभ : स्पिरुलिना की खेती के लिए अगर कंकरीट का गड्ढा तैयार किया जाता है, तो 10×20 फुट आकार के गड्ढे पर तकरीबन 20,000 से 30,000 रुपए की लागत आती है. इस के अलावा प्लांट के लिए मशीनरी, कैमिकल वगैरह पर 20 गड्ढों कीलागत समेत एक बार में लगभग 7 से 8 लाख रुपए की लागत आती है.

एक बार पूंजी लगाने के बाद प्रत्येक गड्ढों से औसतन 2 किलोग्राम गीली कल्चर हर दिन पैदा होता है. इस तरह एक किलोग्राम गीले स्पिरुलिना के लगभग 100 ग्राम शुष्क पाउडर मिल जाता है. इस के आधार पर औसतन 20 टैंक स्पिरुलिना फार्मिंग से प्रतिदिन 4-5 किलोग्राम सूखा स्पिरुलिना पाउडर मिलता है.

इस तरह से एक महीने में स्पिरुलिना का उत्पादन 100 से 130 किलोग्राम तक हासिल होता है. इस तरह से अगर सूखे स्पिरुलिना की बिक्री थोक दर पर लगभग 600 रुपए प्रति किलोग्राम होती है, तो आसानी से एक किसान हर माह तकरीबन 40-45 हजार रुपए  की आमदनी हासिल कर सकता है.

पाले से कैसे करें फसलों की सुरक्षा

सर्दी का मौसम शुरू होते ही हर किसी के सामने ठंड एक समस्या बन कर खड़ी हो जाती है. जब सर्दी अपनी चरम सीमा पर होती है, उस समय किसानों को भी अपनी फसलों को बचाने की चिंता सताने लगती है, क्योंकि कड़क सर्दी के कारण फसलों पर पाला पड़ने की संभावना बढ़ जाती है. इस से रबी फसलों को काफी नुकसान पहुंचता है.

किसान चाहता है कि वह पाले से किसी भी तरह अपनी आलू, अरहर, चना, सरसों, तोरिया, उद्यान की फसलें गेहूं, जौ वगैरह को बचाने की कोशिश करता है. रबी फसलों को पाले से कैसे बचाएं, काफी गंभीर मुद्दा है.

हमारे देश की आबादी 106 करोड़ से ऊपर पहुंच गई है. बढ़ती आबादी के लिए उत्पादन बढ़ाना बेहद जरूरी है. साल 2003-04 में देश में खाद्यान्न उत्पादन 21.3 करोड़ टन हुआ था, जिस की तुलना में साल 2004-05 में फसल उत्पादन में कमी आई.

उत्पादन में आई इस कमी की मुख्य वजह है, सूखा और सर्दी में पाला. कृषि की सकल घरेलू उत्पाद में 22 फीसदी की हिस्सेदारी है. दुर्भाग्यवश कृषि में विकास दर 10वीं पंचवर्षीय योजना के पहले 3 सालों में महज 1.5 फीसदी रह गई है, जबकि हमें 4 फीसदी सालाना विकास दर हासिल करने का लक्ष्य बनाना होगा.

उत्पादन बढ़वार के लिए जरूरी है सिंचाई सुविधाओं का विस्तार और बेहतर फसल प्रबंधन में रबी फसलों के लिए पाले से होने वाले नुकसान को रोकने या कम करने के उपाय अपनाना है.

पाला पड़ने के लक्षण

अकसर पाला पड़ने की संभावना 1 जनवरी से 10 जनवरी तक ज्यादा रहती है. जब आसमान साफ हो, हवा न चल रही हो और तापमान कम हो जाए, तब पाला पड़ने की संभावना बढ़ जाती है. दिन के समय सूरज की गरमी से धरती गरम हो जाती है और जमीन से यह गरमी विकिरण द्वारा वातावरण में स्थानांतरित हो जाती है, इसलिए रात में जमीन का तापमान गिर जाता है, क्योंकि जमीन को गरमी तो मिलती है नहीं, और इस में मौजूद गरमी विकिरण द्वारा नष्ट हो जाती है और तापमान कई बार 0 डिगरी सैल्सियस या इस से भी कम हो जाता है. ऐसी अवस्था में ओस की बूंदें जम जाती हैं. इस अवस्था को हम पाला कहते हैं.

पाला 2 प्रकार का

  1. काला पाला : यह उस अवस्था को कहते हैं, जब जमीन के पास हवा का तापमान बिना पानी के जमे 0 डिगरी सैल्सियस से कम हो जाता है. वायुमंडल में नमी इतनी कम हो जाती है कि ओस का बनना रुक जाता है, जो पानी के जमने को रोकता है.
  2. सफेद पाला : जब वायुमंडल में तापमान 0 डिगरी सैल्सियस से कम हो जाता है. साथ ही, वायुमंडल में नमी ज्यादा होने की वजह से ओस बर्फ के रूप में बदल जाती है. पाले की यह अवस्था सब से ज्यादा नुकसान पहुंचाती है. अगर पाला ज्यादा देर तक रहे, तो पौधे मर भी सकते हैं.

पौधों को कैसे नुकसान पहुंचाता है पाला

पाले से प्रभावित पौधों की कोशिकाओं में मौजूद पानी सब से पहले अंतरकोशिकीय स्थान पर जमा हो जाता है. इस तरह कोशिकाओं में निजर्लीकरण की अवस्था बन जाती है, वहीं दूसरी ओर अंतरकोशिकीय स्थान में जमा पानी जम कर ठोस रूप में बदल जाता है, जिस से इस का आयतन बढ़ने से आसपास की कोशिकाओं पर दबाव पड़ता है. यह दबाव ज्यादा होने पर कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं. इस प्रकार कोमल टहनियां पाले से खराब हो जाती हैं.

पाले से पौधों की हिफाजत

जब वायुमंडल का तापमान 4 डिगरी सैल्सियस से कम और 0 डिगरी सैल्सियस तक पहुंच जाता है तो पाला पड़ता है, इसलिए पाले से बचाने के लिए किसी भी तरह से वायुमंडल के तापमान को 0 डिगरी सैल्सियस से ऊपर बनाए रखना जरूरी हो जाता है.

ऐसा करने के लिए कुछ उपाय सुझाए गए हैं, जिन्हें अपना कर किसान ज्यादा फायदा उठा सकेंगे :

खेतों की सिंचाई कर के जब भी पाला पड़ने की संभावना हो या मौसम विभाग द्वारा पाले की चेतावनी दी गई हो तो फसल में हलकी सिंचाई कर देनी चाहिए, जिस से तापमान 0 डिगरी सैल्सियस से नीचे नहीं गिरेगा और फसलों को पाले से होने वाले नुकसान से बचाया जा सकता है. यह सिंचाई फव्वारा विधि द्वारा की जाती है.

ध्यान देने वाली बात यह है कि सुबह 4 बजे तक अगर फव्वारे चला कर बंद कर देते हैं, तो सूरज निकलने से पहले फसल पर बूंदों के रूप में मौजूद पानी जम जाता है और फायदे की अपेक्षा नुकसान ज्यादाहो जाता है, इसलिए स्प्रिंकलर को सुबह सूरज निकलने तक लगातार चला कर पाले से होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है.

गंधक के तेजाब का छिड़काव कर के बारानी फसल में जब पाला पड़ने की संभावना हो तो पाले की संभावना वाले दिन फसल पर गंधक के तेजाब का 0.1 फीसदी का छिड़काव करें.

इस तरह तेजाब के स्प्रे से फसल के आसपास के वातावरण में तापमान बढ़ जाता है और तापमान जमाव बिंदु तक नहीं गिर पाता है, जिस से पाले से होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है.

पौधे को ढक कर

पाले से सब से ज्यादा नुकसान नर्सरी में होता है. नर्सरी में पौधों को रात में प्लास्टिक की पन्नी से ढकने की सलाह दी जाती है. ऐसा करने से प्लास्टिक के अंदर का तापमान 2-3 डिगरी सैल्सियस बढ़ जाता है, जिस से सतह का तापमान जमाव बिंदु तक नहीं पहुंच पाता और पौधे पाले से बच जाते हैं, लेकिन यह कुछ महंगी तकनीक है.

गांव में पुआल का इस्तेमाल पौधों को ढकने के लिए किया जा सकता है. पौधों को ढकते समय इस बात का ध्यान जरूर रखें कि पौधों का दक्षिणपूर्वी भाग खुला रहे, ताकि पौधों को सुबह व दोपहर को धूप मिलती रहे.

पुआल का प्रयोग दिसंबर से फरवरी माह तक करें. मार्च का महीना आते ही इसे हटा दें.

वहीं नर्सरी पर छप्पर डाल कर भी पौधों को फील्ड में ट्रांसप्लांट करने पर पौधों के थावलों के चारों ओर कड़बी या मूंज की टाटी बांध कर भी पाले से बचाया जा सकता है.

वायुरोधक द्वारा

पाले से बचाव के लिए खेत के चारों ओर मेंड़ पर पेड़ या झाड़ियों की बाढ़ लगा दी जाती है, जिस से शीतलहर द्वारा होने वाले नुकसान से बचा जा सकता है.

अगर खेत के चारों ओर मेंड़ के पेड़ों की कतार लगाना संभव न हो, तो कम से कम उत्तरपश्चिम दिशा में जरूर पेड़ की कतार लगानी चाहिए, जो अधिकतर इसी दिशा में आने वाली शीतलहर को रोकने का काम करेगी.

पेड़ों की कतार की ऊंचाई जितनी अधिक होगी, शीतलहर से सुरक्षा उसी के अनुपात में बढ़ती जाती है. पेड़ की ऊंचाई के चौगुनी दूरी तक जिधर से शीतलहर आ रही है और पेड़ की ऊंचाई के 25-30 गुना दूरी तक जिधर शीतलहर की हवा जा रही है, फसल सुरक्षित रहती है.

प्लास्टिक की क्लोच का प्रयोग कर

पपीता व आम के छोटे पेड़ को प्लास्टिक से बनी क्लोच से बचाया जा सकता है. इस तरह का प्रयोग हमारे देश में प्रचलित नहीं है, परंतु हम खुद ही प्लास्टिक की क्लोच बना कर इस का प्रयोग पौधों को पाले से बचाने के लिए कर सकते हैं. क्लोच से पौधों को ढकने पर अंदर का तापमान तो बढ़ता ही है, साथ में पौधे की बढ़वार में भी मदद करता है.

इस प्रकार हम फसल, नर्सरी और छोटे फल पेड़ों को पाले से होने वाले नुकसान से बहुत ही आसान और कम खर्चीले तरीकों द्वारा बचा सकते हैं. विदेशों में महंगे पौधों को बचाने के लिए हीटर का प्रयोग भी किया जाता है, लेकिन हमारे देश में अभी यह मुमकिन नहीं है.

हमें भरोसा है कि फसल की बढ़वार व पैदावार बढ़ाने के लिए अगर किसान ऊपर बताए गए इन तरीकों को अपनाते हैं, तो निश्चित ही रबी की फसलों में पाले के चलते होने वाले नुकसान को काफी हद तक बचाने में कामयाब हो सकते हैं.

उड़द की खेती और कीटरोग प्रबंधन

हमारे देश में उड़द का उपयोग मुख्य रूप से दाल के लिए किया जाता है. इस की दाल अत्यधिक पोषक होती है. विशेष तौर से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इसे लोग अधिक पसंद करते हैं. उड़द की दाल को भारत में भारतीय व्यंजनों को बनाने में भी इस्तेमाल किया जाता है और इस की हरी फलियों से सब्जी भी बनाई जाती है.

उड़द की जड़ों में गांठों के अंदर राइजोबियम जीवाणु पाया जाता है, जो वायुमंडल की नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर पौधे को नाइट्रोजन की आपूर्ति करता है, इसलिए उड़द की फसल से हरी खाद भी बनाई जाती है, जिस में तकरीबन 40-50 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन प्राप्त होती है.

देश की एक मुख्य दलहनी फसल है उड़द.  इस की खेती मुख्य रूप से खरीफ सीजन में की जाती है, लेकिन जायद सीजन में समय से बोआई सघन पद्धतियों को अपना कर भारत के मैदानी भाग, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार और राजस्थान में यह मुख्य रूप से इस की खेती की जाती है.

कार्य सांख्यिकी प्रभाग अर्थ एवं सांख्यिकी निदेशालय के अनुसार, वर्ष 2004-05 में भारत में कुल उड़द का उत्पादन 1.47 मिलियन टन था, जो वर्ष 2015-16 में बढ़ कर 2.15 मिलियन टन हो गया, वहीं वर्ष 2016-17 की शुरुआत में 2.93 मिलियन टन कुल उड़द का उत्पादन लक्ष्य रखा गया.

उड़द की फसल के लिए जलवायु

उड़द एक उष्ण कटिबंधीय पौधा है, इसलिए इसे आर्द्र एवं गरम जलवायु की आवश्यकता होती है. उड़द की खेती के लिए फसल पकाते समय शुष्क जलवायु की जरूरत पड़ती है. जहां तक भूमि का सवाल है, समुचित जल निकास वाली बुलई दोमट भूमि इस की खेती के लिए सब से उपयुक्त मानी जाती है, लेकिन जायद में उड़द की खेती में सिंचाई की जरूरत पड़ती है.

उड़द की उन्नत किस्में

टी-9, पंत यू-19, पंत यू-30, जेवाईपी, यूजी-218.

उड़द बोआई के लिए बीज की दर

उड़द अकेले बोने पर 15 से 20 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर और मिश्रित फसल के रूप में बोने पर 8-10 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर काम में लेना चाहिए. उड़द बोने की विधि और समय वसंत ऋतु की फसल फरवरीमार्च में और खरीफ ऋतु की फसल जून के अंतिम सप्ताह या जुलाई के अंतिम सप्ताह तक बोआई कर देते हैं.

चारे के लिए बोई गई फसल छिड़कवां विधि से की जाती है और बीज उत्पादन के लिए पंक्तियों में बोआई अधिक लाभदायक होती है. प्रमाणित बीज को कैप्टान या थायरम आदि फफूंदनाशक दवाओं से उपचारित करने के बाद राइजोबियम कल्चर द्वारा उपचारित कर के बोआई करने से 15 फीसदी उपज बढ़ जाती है.

उड़द बीज का राइजोबियम उपचार

उड़द दलहनी फसल होने के कारण अच्छे जमाव, पैदावार व जड़ों में जीवाणुधारी गांठों की सही बढ़ोतरी के लिए राइजोबियम कल्चर से बीजों को उपचारित करना जरूरी होता है. एक पैकेट (200 ग्राम) कल्चर 10 किलोग्राम बीज के लिए सही रहता है. उपचारित करने से पहले आधा लिटर पानी में 50 ग्राम गुड़ या चीनी के साथ घोल बना लें. उस के बाद कल्चर को मिला कर घोल तैयार कर लें. अब इस घोल को बीजों में अच्छी तरह से मिला कर सुखा देें. ऐसा बोआई से 7-8 घंटे पहले करना चाहिए.

उड़द की फसल में खाद एवं उर्वरक

भूमि की उर्वराशक्ति बनाए रखने के लिए हर 2 या 3 साल में एक बार अपने खेतों में सड़ी हुई गोबर की खाद (100-150 क्विंटल प्रति हेक्टेयर) का उपयोग करें. उड़द दलहनी फसल होने के कारण अधिक नाइट्रोजन की जरूरत नहीं होती है, क्योंकि उड़द की जड़ में उपस्थित राइजोबियम जीवाणु वायुमंडल की स्वतंत्र नाइट्रोजन को ग्रहण करते हैं और पौधों को प्रदान करते हैं.

पौधे की प्रारंभिक अवस्था में जब तक जड़ों में नाइट्रोजन इकट्ठा करने वाले जीवाणु क्रियाशील हों, तब तक के लिए 15-20 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40-50 किलोग्राम फास्फोरस और 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई के समय खेत में मिला देते हैं.

उड़द की फसल में सिंचाई

फूलफल बनने की अवस्था पर यदि खेत में नमी न हो, तो सिंचाई अवश्य करें.

उड़द में खरपतवार नियंत्रण

वर्षाकालीन उड़द की फसल में खरपतवार का प्रकोप अधिक होता है, जिस से उपज में 40-50 फीसदी नुकसान हो सकता है. रासायनिक विधि द्वारा खरपतवार नियंत्रण के लिए वासालिन 1 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 1,000 लिटर पानी के घोल का बोआई के पूर्व खेत में छिड़काव करें.

फसल की बोआई के बाद, परंतु बीजों के अंकुरण के पहले पेंडीमिथेलीन 1.25 किलोग्राम 1,000 लिटर पानी में घोल कर छिड़काव कर के खरपतवार पर नियंत्रण किया जा सकता है.

अगर खरपतवार फसल में उग जाते हैं, तो फसल बोआई 15-20 दिन की अवस्था पर पहली निराईगुड़ाई खुरपी की सहायता से कर देनी चाहिए. दोबारा खरपतवार उग जाने पर 15 दिन बाद निराई करनी चाहिए.

उड़द में फसल चक्र एवं मिश्रित खेती

वर्षा ऋतु में उड़द की फसल प्राय: मिश्रित रूप में मक्का, ज्वार, बाजरा, कपास व अरहर आदि के साथ उगाते हैं.

उड़द की फसल की कटाई और मड़ाई

उड़द 85-90 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है, इसलिए ग्रीष्म ऋतु की कटाई मईजून माह में और वर्षा ऋतु की कटाई सितंबरअक्तूबर माह में फलियों का रंग जब काला पड़ जाने पर हंसिया से कटाई कर के खलिहानों में फसल को सुखाते हैं. बाद में बैल या डंडों या थ्रैशर से फलियों से दानों को निकाल लिया जाता है.

उड़द की उपज

10-15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर शुद्ध फसल में और मिश्रित फसल में 6-8 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज हो जाती है.

भंडारण

दानों को धूप में सुखा कर 10-12 फीसदी नमी हो जाए, तब दानों को बोरियों में भर कर गोदाम में रख लिया जाता है.

कीट और उन की रोकथाम

सफेद मक्खी : यह उड़द का प्रमुख कीट है, जो पीला मोजेक वायरस का वाहक के रूप में काम करती है. ट्राईजोफास 40 ईसी की 1 लिटर मात्रा को 500 लिटर पानी में मिला कर छिड़काव करें.

इमिडाक्लोप्रिड की 100 मिलीलिटर या 51 इमेथोएट की 25 लिटर मात्रा को 500 लिटर पानी में घोल मिला कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.

अर्धकुंडलक (सैमी लूपर) :  यह मुख्यत: कोमल पत्तियों को खा कर उसे छलनी कर देती है. प्रोफेनोफास 50 ईसी की 1 लिटर मात्रा को 500 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करते हैं.

फली छेदक : इस कीट की सूंडि़यां फलियों में छेद कर दानों को खाती हैं, जिस से उपज में भारी नुकसान होता है. मोनोक्रोटोफास की 1 लिटर मात्रा को प्रति हेक्टेयर की दर से 500 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करें.

एफिड : यह मूलांकुर के रस को चूसता है, जिस से पौधे की वृद्धि रुक जाती है.

रोग और उन की रोकथाम

पीला मोजेक विषाणु : यह रोग वायरस द्वारा फैलता है. यह उड़द का सामान्य रोग है. इस का प्रभाव 4-5 सप्ताह बाद ही दिखाई देने लगता है. रोग के सब से पहले लक्षण पत्तियों पर गोलाकार पीले रंग के धब्बे दाने के आकार के दिखाई देते हैं. कुछ ही दिनों में पत्तियां पूरी पीली हो जाती हैं. अंत में ये पत्तियां सफेद सी हो कर सूख जाती हैं. सफेद मक्खी की रोकथाम से रोग नियंत्रण संभव है.

पीला मोजेक रोग प्रतिरोधी किस्म : पंत यू-19, पंत यू-30, यूजी-218, टी-9, पीयू-4, पंत उड़द-30, बरखा, केयू-96-3 की बोआई करनी चाहिए. पत्ती मोड़न रोग नई पत्तियों पर हरिमाहीनता के रूप में पत्ती की मध्य शिराओं पर दिखाई देते हैं. इस रोग में पत्तियां मध्य शिराओं से ऊपर की ओर मुड़ जाती हैं और नीचे की पत्तियां अंदर की ओर मुड़ जाती हैं. इस वजह से पत्तियों की वृद्धि रुक जाती है और पौधे मर जाते हैं.

यह विषाणुजनित रोग है, जिस का संचरण थ्रिप्स द्वारा होता है. थ्रिप्स के लिए ऐसीफेट 75 फीसदी एसपी या 2 मिलीलिटर डाईमेथोएट प्रति लिटर के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए और फसल की बोआई समय पर करें.

पत्ती धब्बा : यह रोग फफूंद द्वारा फैलता है. इस के लक्षण पत्तियों पर छोटेछोटे धब्बों के रूप में दिखाई देते हैं. कार्बंडाजिम 1 किलोग्राम 1,000 लिटर पानी के घोल में मिला कर स्प्रे कर दिया जाता है.

पुष्पीय वृक्ष लगाएं सुंदरता बढ़ाएं

आजकल बढ़ते प्रदूषण को रोकने में वृक्षों की बहुत ही असाधारण भूमिका रहती है, इसलिए विभिन्न स्थानों पर शहरों में वृक्षों के रोपण पर अधिक बल दिया जा रहा है. शहरों में वृक्षों का रोपण मुख्य रूप से सड़कों के किनारे, पार्कों में एवं खाली स्थानों पर किया जा रहा है, जिस से प्रदूषण नियंत्रण में कुछ मदद मिल सके.

किसी भी स्थान विशेष की सुंदरता बढ़ाने के लिए उस स्थान पर सुंदर फूल एवं पत्तियों वाले वृक्षों का लगाना आवश्यक होता है.

पुष्पीय वृक्षों में मुख्य रूप से अमलताश, गुलमोहर, नीली गुलमोहर, पीली गुलमोहर, जकरांडा, गुलाबी केसिया इत्यादि पौधों का रोपण किया जाता है.

वहीं दूसरी ओर पर्णीय पौधों में मुख्यतया अशोक, मौलश्री, पुतरंजिवा, पाकड़ नीम, गद, बालखीरा आदि वृक्ष लगाए जाते हैं. कुछ ऐसे वृक्ष होते हैं, जिन के फूल तो सुंदर होते ही हैं, साथ में पत्तियां भी अच्छी दिखती हैं. इन को भी पार्क आदि में लगाना अच्छा माना जाता है. इन में मुख्य हैं सीता अशोक, प्राइड औफ इंइिया, सिल्वर ओक, बोतल ब्रुस आदि.

उपरोक्त के अलावा वृक्षों को उन के आकार एवं उम्र के आधार पर 3 भागों में बांटा जाता है. बड़े आकार के वृक्ष जैसे बरगद, पाकड़, नीम, अर्जुन इत्यादि. दूसरे प्रकार के वे वृक्ष आते हैं, जिन का आकार मध्य होता है. जैसे पुतरंजिवा, अशोक, बालखीरा, मौलश्री, चीड़, अमलतास आदि. तीसरे प्रकार के वृक्ष वह हैं, जो आकार में छोटे होते हैं. इन में मुख्यतया सीता अशोक, बोतल ब्रुस, कचनार, प्राइड औफ इंडिया आदि आते हैं.

वृक्षों के पौधे तैयार करना

ज्यादातर शोभादार वृक्षों के पौधों का वर्धन बीज द्वारा किया जाता है. सभी पौधों के बीज का आकार अलगअलग होने के साथसाथ उन की ऊपरी सतह भी पतली एवं मोटी होती है. मुख्य रूप से पतले छिलके वाले बीजों को 6-8 घंटे पानी में भिगोने के बाद सीधे ही मिट्टी से भरी थैलियों अथवा क्यारियों में बो दिया जाता है, परंतु कुछ बीजों की ऊपरी सतह अत्यधिक कठोर होती है, उन को बोने से पहले उपचारित किया जाता है.

कम कठोर परत वाले बीजों को हलके गरम पानी में 10-12 घंटे भिगोए रखने के बाद बोआई की जाती है. बोआई का सब से उत्तम समय 15 अप्रैल से 15 मई का होता है. प्लास्टिक घरों में बीजों को वर्ष भर बोया जा सकता है. बोआई से पहले जमीन में उचित नमी का होना आवश्यक है.

बोआई के लगभग 20-25 दिन बाद पौधे अंकुरित हो जाते हैं. इस के पश्चात पौधों को एक स्थान से दूसरे स्थान पर लगाया जाता है. यदि पौधे प्लास्टिक की थैलियों में हैं, तो उन का भी स्थान परिवर्तन करना आवश्यक होता है.

वृक्षों की रोपाई

ज्यादातर शोभाकारी वृक्ष आसानी से रोपित हो सकते हैं, परंतु अच्छी वृद्धि एवं उचित आकार के वृक्ष प्राप्त करने के लिए उन की रोपाई पर पूरा ध्यान देना आवश्यक होता है.

रोपाई के लिए एक घनमीटर के आकार का गड्ढा खोदा जाता है. खोदी गई मिट्टी में 4 से 10 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद या पत्ती की खाद भूमि की उर्वरता के अनुसार मिला कर गड्ढे में भर दिया जाता हैं. इसी के साथसाथ गड्ढे में 50-100 ग्राम कीटनाशी धूल भी मिला दी जाती है.

कीटनाशी में मुख्य रूप से डीडीटी, बीएचसी या थिमेट का प्रयोग किया जाना उचित रहता है. रोपाई करते समय यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि जितनी गहराई पर पौधा नर्सरी में लगा था, उतनी ही गहराई पर उस की रोपाई की जाए. रोपाई के समय जड़ों के साथ लगी मिट्टी छूटनी नहीं चाहिए.

रोपाई का उचित समय

रोपाई का उचित समय स्थानस्थान पर निर्भर करता है. पूर्वी भारत के मैदानी क्षेत्रों में वृक्षों की रोपाई फरवरीमार्च माह में करना उत्तम रहता है. अगर सिंचाई के साधन उचित हैं, तो रोपाई अत्यधिक गरमी को छोड़ कर कभी भी की जा सकती है.

उत्तरी भारत के मैदानी क्षेत्रों में वृक्षों की रोपाई का सब से अच्छा समय जून से अगस्त माह है. जहां तक संभव हो, 2-3 वर्ष पुराने पौधों को ही रोपाई के लिए प्रयोग करना चाहिए, नए पौधों के मरने की अधिक संभावना रहती है. पुराने पौधों की रोपाई के बाद वृद्धि भी अधिक तेज होती है.

पहले गमले में लगाए गए पौधों को जमीन में नहीं लगाना चाहिए, क्योंकि गमले में 2-3 वर्ष लगे रहने के कारण उन की जड़ें मुड़ जाती हैं, जिस में जमीन में रोपण के बाद उन की वृद्धि सामान्य नहीं हो पाती है.

रोपण की दूरी वृक्ष के पूर्ण आकार के आधार पर रखी जाती है. बड़े आकार के वृक्षों को 10-12 मीटर की दूरी पर लगाया जाता है. मध्य आकार के वृक्ष 9-10 मीटर की दूरी पर और छोटे आकार के वृक्षों की रोपण दूरी 6-8 मीटर रखी जाती है.

Bottle Brush
Bottle Brush

बोतल ब्रुस : यह मध्यम ऊंचाई का फूलदार वृक्ष है. पेड़ 5-10 मीटर तक लंबा होता है. इस पर फरवरी से नवंबर माह में फूल आते हैं, परंतु सब से ज्यादा फूल मार्चअप्रैल और अगस्तसितंबर में होते है. यह वृक्ष सभी स्थानों पर लगाए जा सकते है. सड़कों के किनारे, तालाबों के पास और पार्कों में सभी जगह लगाए जा सकते है.

 

 

मौलश्री : पेड़ की अधिकतम ऊंचाई 15 मीटर तक होती है. पेड़ हमेशा हराभरा रहता है, परंतु पेड़ की वृद्धि काफी धीरेधीरे होती है.

फूल गुच्छों में अप्रैल से जुलाई माह तक एवं सितंबर से नवंबर माह तक आते हैं. इस का रोपण लौन या पार्कों में अथवा सड़कों के किनारे भी किया जाता है. इस की चित्तीदार पत्तियों वाली किस्में भी आ रही हैं, परंतु वह बहुत छोटी होती हैं.

अशोक : मुख्य रूप से यह हरी पत्तियों के लिए उगाया जाता है. पेड़ की अधितम ऊंचाई 20 मीटर तक जाती है. साधारण किस्म को सड़कों एवं पार्कों में और पेंडुला किस्म को पार्कों में रास्तों के साथसाथ या भवनों के सामने लगाया जाता है.

सीता अशोक : यह एक मध्य ऊंचाई का फूल एवं पत्तियों की सुंदरता के लिए लगाया जाने वाला वृक्ष है. इस पर स्कारलेट लाल रंग के फूल आते हैं.

Kachnar
Kachnar

 

कचनार : मध्यम आकार का सदा हराभरा रहने वाला वृक्ष है. इस पर नवंबर माह में बैंगनी रंग के फूल आते हैं. इस के अलावा भी कचनार की बहुत सी किस्में हैं, जो शोभाकार वृक्षों के रूप में लगाई जाती हैं.

 

Flower Amaltas
maltas

 

अमलतास : यह पीले रंग के फूलों वाला पेड़ मध्यम ऊंचाई का होता है. पेड़ की अधिकतम ऊंचाई 10 मीटर तक होती है. गहरे पीले रंग के फूल अप्रैल से जून माह तक आते हैं. उपयुक्त स्थान पर अमलतास का वृक्ष 5-10 वर्ष तक अच्छा फलता है.

पिंक अमलतास : इस पर गुलाबी रंग के फूल आते हैं. रंग हलके गुलाबी से गहरे गुलाबी तक पाए जाते हैं. मईजून के माह में पेड़ों पर केवल फूल ही दिखाई देते हैं. उस समय पत्तियां बहुत ही कम होती हैं.

पेड़ मुख्य रूप से सड़कों के किनारे, पार्कों एवं अन्य स्थानों के लिए बहुत ही उपयुक्त माना जाता है.

 

Gulmohar
Gulmohar

 

गुलमोहर : यह लाल रंग के फूल वाला बहुत ही सुंदर वृक्ष है. इस को अमलतास के साथसाथ मिला कर यदि सड़क के किनारे लगाया जाए, तो बहुत ही अच्छा दृश्य प्रकट करता है, क्योंकि अमलतास एवं गुलमोहर का पुष्पीय कार्यकाल लगभग एकसमान ही होता है.

 

नीली गुलमोहर : इसे नीले रंग के फूल वाली गुलमोहर के नाम से भी जाना जाता है. पौधा 8-10 मीटर ऊंचा होता है. फूल मार्च, अप्रैल एवं मई माह में आते हैं, परंतु बहुत ही थोड़े समय के लिए पेड़ पर ठहरते हैं. पौधों की उम्र लगभग 20 वर्ष मानी जाती है.

प्राइड औफ इंडिया : यह पेड़ सुंदर फूल एवं रंगीन पत्तियों दोनों के लिए ही लगाया जाता है. फूल बैगनी रंग के आते हैं. फूल समाप्त होने के बाद सुंदर घुंडियों के गुच्छे बन जाते हैं, जिस से सुंदर सजावट की जाती है. पतझड़ के बाद लाल रंग की नई कोमल पत्तियां आती हैं, जो पौधों की सुंदरता को और भी ज्यादा बढ़ाती हैं.

पैल्टो फोरस : इसे पीली गुलमोहर भी कहते हैं. इस के पौधे बड़े, पत्तियां गहरे हरे रंग की और फूल गहरे पीले रंग के होते हैं. फूल वर्ष में दो बार आते हैं. प्रथम, फरवरी एवं मई माह तक और दोबारा सितंबर से नवंबर माह तक खिलते हैं. इस के फूल काफी सुंदर एवं पेड़ पर काफी रुकते हैं.

अर्जुन : यह 20-25 मीटर ऊंचा बढ़ाने वाला सड़क के किनारे लगाया जाने वाला वृक्ष है. हमेशा हराभरा बना रहता है. हलका पीलापन लिए हुए सफेद रंग के फूल आते हैं, जो कि मार्च से जून माह तक खिलते हैं. उस समय इस पर मधुमक्खियां अधिक आकर्षित होती हैं.

गोबर के गमले और ईंटें

पशुपालन से देश में काफी लोग जुड़े हैं और यह आमदनी का अच्छा जरीया भी बन रहा है. पशुपालन से दूध का कारोबार करने के साथ ही गोबर से खाद बनाई जाती रही है, लेकिन अब गोबर से गमले, ईंटें व दूसरी चीजें भी बनाई जा रही हैं, जो पशुपालकों की आमदनी तो बढ़ाती हैं, साथ ही साथ पर्यावरण के लिए यह अच्छा है.

गायभैंस जैसे पशुओं का चारा मुख्यत: पेड़पौधे ही होते हैं. गोबर उस चारे के न पचने वाले अवशेष हैं, जिन में कार्बनिक पदार्थ शामिल होते हैं.

हरियाणा गौवंश अनुसंधान केंद्र में गोबर में चिकनी मिट्टी, चूना पाउडर व अन्य चीजों को मिला कर गमले व ईंटें तैयार करने का काम हो रहा है.

गोबर का गमला

गोबर से बना गमला प्राकृतिक रूप से काफी उपयोगी है, जिसे मशीन से बनाया जाता है. इस गमले की खासीयत यह है कि इस में मिट्टी भर कर पौधे को लगा कर कहीं भी रख सकते हैं. चाहे तो पूरे गमले को पौधे सहित जमीन में भी दबा कर लगा सकते हैं. इस से गमले में लगे पौधे की अच्छी बढ़वार भी होगी.

गोबर से बना गमला एक प्राकृतिक उत्पाद है, जिस से इस गमले में लगे पौधे को गोबर के खाद का भी फायदा मिलता है.

गोबर से बने गमलों के इस्तेमाल से पौलीथिन के इस्तेमाल में भी कमी आ सकती है. जरूरी है लोगों में प्रकृति के प्रति जागरूकता लाने की.

गोबर से ईंटें बनाना

हरियाणा गौवंश अनुसंधान केंद्र का कहना है कि ऐसी ईंटें वजन में हलकी होती हैं और घर के अंदर के तापमान को नियंत्रित करती हैं. इन ईंटों में आग भी नहीं लगती.

इस अनुसंधान केंद्र ने ईंटों को वैज्ञानिक जांच व प्रमाणिकता के लिए एनएबीएल प्रयोगशाला में भेजा है. अगर सबकुछ ठीक रहा, तो यह अपनेआप में बेहतर विकल्प होगा.

‘सुपरफूड’ मोरिंगा की खेती

लाभदायक मोरिंगा पेड़ को अर्धशुष्क, उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में उगाया जा सकता है. यह तेजी से बढ़ने वाला पेड़ है, जिस में न्यूनतम कीट और बीमारियां व न्यूनतम पानी और उर्वरक की आवश्यकता होती है. यह जमीन कटाव नियंत्रण, वनों की कटाई, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी, मरुस्थलीकरण को उलटने और जैव विविधता में वृद्धि के माध्यम से पर्यावरण स्थिरता में अहम भूमिका निभाता है.

यह विश्व स्तर पर ‘सुपरफूड’ के रूप में, फार्मास्युटिकल और कौस्मैटिक उद्योगों में उपयोग किया जाता है और इस की पत्तियों व फली की निरंतर मांग होती है.

मोरिंगा का एक पेड़ प्रतिवर्ष औसतन 50 किलोग्राम मोरिंगा फली देता है, जिस की औसत कीमत 50 रुपए प्रति किलोग्राम है. यह लगभग एक पेड़ से 2,500 रुपए की आय देता है

मोरिंगा (सहजन) की खेती के फायदों को देखते हुए ग्रामीण फाउंडेशन इंडिया ने उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में साथियों किसान उत्पादक संगठन के माध्यम से मोरिंगा की खेती को बढ़ावा दिया, जहां स्वयं सहायता समूह की महिलाएं एफपीओ की शेयरधारक पौधे तैयार करने, रोपण और पेड़ के पोषण में लगी हुई हैं. वे इस की पत्तियों और फलियों के संग्रह में भी शामिल हैं और संपूर्ण मूल्यवर्धन प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं.

सितारा देवी, मोरिंगा किसान, आजमगढ़, उ.प्र.

सितारा देवी स्वयं सहायता समूह सदस्य और साथियों किसान उत्पादक संगठन की शेयरधारक ने किसान उत्पादक संगठन की शेयरधारक बनने के बाद सहजन के 40 पेड़ उगाए. उन्होंने पेड़ों की खेती के लिए अनुपयोगी बंजर भूमि का उपयोग किया. उन्होंने पिछले साल अपने एफपीओ को मोरिंगा की फली और पत्तियां बेचीं और 20,000 रुपए कमाए.

सितारा देवी कहती हैं, ‘हमारे खेत में फसल को कोई नुकसान नहीं हुआ और हम ने अलग से हजार रुपए भी कमा लिए, यह बहुत अच्छा है. (मेरी खड़ी फसल प्रभावित नहीं हुई और मैं ने 20,000 रुपए अतिरिक्त कमाए).’

सितारा देवी की कहानी ने उन महिलाओं को प्रेरित किया, जिन के पास कृषि भूमि नहीं है और उपायुक्त उत्तर प्रदेश राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (यूपीएसआरएलएम), आजमगढ़ को भी प्रेरित किया, जिन्होंने यूपीएसआरएलएम के तहत एसएचजी महिलाओं को एफपीओ में शामिल होने और अतिरिक्त आजीविका सुरक्षित करने, पोषण सुनिश्चित करने और आय बढ़ाने के लिए मोरिंगा पेड़ की खेती अपनाने के लिए प्रेरित किया.

Moringaअब तक मोरिंगा की खेती के लिए कुल एफपीओ में शामिल होने के लिए 500 महिलाओं की कार्यवाही पूरी हुई और 130 महिलाएं एफपीओ में शेयरधारकों के रूप में शामिल हुईं.

एफपीओ ने मोरिंगा की पत्तियों में मूल्यवर्धन किया और मोरिंगा टी बैग्स, मोरिंगा जूस और अन्य उत्पादों का उत्पादन किया, जो कि परीक्षण के अधीन हैं.

मोरिंगा मल्टीन्यूट्रिशनल एनर्जी बार (चिक्की) का रिटेल लौंच भी किया, जो 15 रुपए प्रति पीस है और कुरकुरे व स्वादिष्ठ है. वह उच्च पोषण भी देता है. दीवाली के त्योहार के दौरान एफपीओ ने मोरिंगा एनर्जी बार बेचा और आय अर्जित की, जो एफपीओ के लिए एक स्थायी और लाभदायक व्यवसाय साबित हुई.

इस प्रकार मोरिंगा के पेड़ ने उन महिलाओं को आशा की किरण प्रदान की, जिन के पास भूमि नहीं है. उन्हें दृढ़ विश्वास भी दिया कि वे अनुपयोगी भूमि से कमा सकती हैं.

गेहूं फसल की सुरक्षा

गेहूं में कीटों, सूत्रकृमियों एवं रोग के कारण 5-10 फीसदी उपज की हानि होती है और दानों व बीजों की गुणवत्ता भी खराब होती है. इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखते हुए यहां रोगों की पहचान के लक्षण, उन का प्रबंधन एवं अंत में गेहूं में लगने वाले कीटों एवं रोगों के समेकित रोग प्रबंधन की जानकारी दी जा रही है.

रासायनिक दवाओं के अत्यधिक प्रयोग से उन का प्रभाव फसलों में पाए जाने वाले रोगाणुओं पर कम होने लगा है, पर्यावरण दूषित हो रहा है, मित्र कीटों को अपनी स्थापना बनाए रखने में परेशानी हो रही है. खाद्य पदार्थों में रोगाणुनाशियों के अवशेष रह जाने से मानव सेहत के लिए गंभीर संकट पैदा हो गया है. लिहाजा, सुनियोजित एवं विवेकपूर्ण फसल प्रबंधन योजनाएं ही फसलों पर आने वाले रोगों से सुरक्षित कर अधिक उपज प्राप्त करने में मुख्य भूमिका निभाती है.

वास्तव में यही समेकित रोग प्रबंधन है. आज के दिन हम बढ़ती जनसंख्या के लिए खाद्यान्न की मांग को पूरा नहीं कर पा रहे हैं. आज गेहूं की उपज बढ़ाने में भी बाधाएं आ रही हैं, इसलिए पौध रोग सुरक्षा का विशेष महत्त्व है. अत: इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए यदि गेहूं में लगने वाले कीटों को एक सीमा तक नियंत्रित कर दिया जाए, तो गेहूं की उत्पादकता को बढ़ाते हुए गेहूं के उत्पादन में काफी सुधार लाया जा सकता है.

गेहूं के प्रमुख कीटों का नियंत्रण

दीमक

दीमक असिंचित एवं हलकी भूमि का एक प्र्रमुख हानिकार कीट है. इस का प्रकोप फसल की सभी अवस्थाओं में पाया जाता है. दीमक जमीन में सुरंग बना कर रहती है और पौधों को जड़ों से खाती है.

यह हलके भूरे रंग की होती है और पौधों की जड़ों को काट कर नुकसान कर देती है. इस के प्रकोपित पौधे सूख जाते हैं और आसानी से निकल जाते हैं. इस का प्रकोप टुकड़ों में होता है, जिसे आसानी से पहचाना जाता है.

नियंत्रण

* 1 किलोग्राम बिवेरिया और 1 किलोग्राम मेटारिजियम को लगभग 25 किलोग्राम गोबर की सड़ी हुई खाद मे अच्छी तरह मिला कर छाया में 10 दिन के लिए छोड़ कर बिखेर दें.

* प्रकोप अधिक होने पर क्लेरोपाइरीफास 20 ईसी की 3-4 लिटर मात्रा को 50 किलोग्राम बीज को बालू रेत में मिला कर प्रति हेक्टेयर प्रयोग करें.

* बीज को बोआई से पूर्व इमिडाक्लोप्रिड 70 डब्ल्यूएस 0.1 फीसदी क्लेरोपाइरीफास 20 ईसी, 0.9 ग्राम प्रति किलोग्राम, थायोमेंक्जाम 70 डब्लूएस 0.7 ग्राम प्रति किलोग्राम, फिप्रोनिल 5 एफएस 3 ग्राम प्रति किलोग्राम से उपचारित कर लेना चाहिए.

माहू

गेहूं में 2 प्रकार के माहू लगते हैं. पहला, जड़ का माहू रोग कारक रोपालोसाइफम रूफीअवडांमिनौलिस नामक कीट है. दूसरा, पत्ती का माहू. यह सीटोबिनयन अनेनी, रोपालोसारफम पाड़ी और इस की विभिन्न जातियों से होता है. यह फसल की पत्तियों का रस चूस कर नुकसान करती है और इन के मल से पत्तियों पर काली रंग की फफूंदी पैदा हो जाती है, जिस से फसल का रंग खराब हो जाता है.

नियंत्रण

* माहू का प्रकोप होने पर पीले चिपचिपे ट्रैप का प्रयोग करें, जिस से माहू ट्रैप पर चिपक कर मर जाएं.

* परभक्षी काक्सीनेलिड्स अथवा सिरफिड अथवा क्राइसोपरला कार्निया का संरक्षण कर 50,000-1,00,000 अंडे या सूंड़ी प्रति हेक्टयर की दर से छोड़ें.

* इंडोपथोरा व वर्टिसिलयम लेकानाई इंटोमोपथोजनिक फंजाई (रोगकारक कवक) का माहू का प्रकोप होने पर छिड़काव करें.

* आवश्यकता होने पर इमिडाक्लोप्रिड़ 17 एसएल या डाइमेथोएट 30 ईसी या मेटास्सिटौक्स 25 ईसी 1.25-2.0 मिली. प्रति लिटर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

पीला तना छेदक

गेहूं में पीला तना छेदक उन खेतों में देखा गया है, जहां पर धान के बाद गेहूं टिलेज विधि से बोया जाता है. इस की सूंड़ी तने के निचले भाग में या पत्तियों के नीचे अंडे देती है. अंडे से सूंड़ी निकल कर तने में छेद कर के अंदर प्रवेश कर जाती है और अंदर से तने को खाती रहती है. तने के अंदर सुरंग बना कर मृत केंद्र डेडहार्ट का निर्माण करती है. फलस्वरूप, पौधा पीला पड़ जाता है और अंत में सूख जाता है.

नियंत्रण

* कीटनाशी रसायन इमिडाक्लोप्रिड 17 एसएल 1 मिलीलिटर प्रति लिटर या साइपरमेथ्रिन 25 फीसदी की 350 मिलीलिटर मात्रा प्रति हेक्टयर की दर से छिड़काव करें.

गेहूं का बाली

काकिल निमेटोड

यह रोग एंग्वीना ट्रीटसी नामक सूत्रकृमि के द्वारा होता है, जो कि बीज के साथ रह कर जीवित रहता है. रोग से संक्रमित पौधों की पत्तियां ऐंठी हुई और कुंचित हो जाती हैं. बालियों का आकार भी टेढ़ामेढ़ा होता है. रोगग्रस्त पौधों की बढ़वार स्वस्थ पौधों की तुलना में कम होती है एवं रोगी पौधों की बालियां ज्यादा समय तक हरी बनी रहती हैं, अत: देर से पकती हैं. बालियों में दानों की जगह भूरे व काले रंग के इलायची के दाने के बराबर कठोर संरचना बन जाती है.

नियंत्रण

* एक ही खेत में 3 सालों तक गेहूं न बोएं. इस के स्थान पर जौ या जई की बोआई करें.

* बीज को 10 फीसदी नमक के घोल में डुबो कर ऊपर तैरते बीज को छान कर जला दें और नीचे तल में बैठे बीज को 3-4 बार साफ पानी से धो कर उसे छाया में सुखा लें.

गेहूं के प्रमुख रोग एवं प्रबंधन

धारीदार रतुआ/पीला रतुआ

यह पक्सिनिया स्ट्रीफासिम नामक फफूंद के द्वारा फैलता है. यह रोग दिसंबरजनवरी माह में दिखाई देता है. इस रोग के लक्षण पत्तियों पर धारियों में चमकीले पीले रंग के धब्बे दिखाई देते हैं. रोग की अंतिम अवस्था में धब्बे काले पड़ जाते हैं.

यह रोग ठंडे व नम वातावरण में अधिक होता है. रोग का प्रकोप पौधों की बढ़वार अवस्था के समय या दाने पड़ने से पहले होता है, इसलिए नुकसान अधिक होता है.

रोग पौधों की बालियों के दाने हलके कमजोर या अधिक प्रभाव होने पर बाली में दाने नहीं बनते हैं, जिस के कारण उपज में भारी कमी आ जाती है.

पत्ती का रतुआ/ भूरा रतुआ

गेहूं का यह विनाशकारी रोग पक्सिनिया रिकानडिटा ट्रीटीसी नामक फफूंद के द्वारा फैलता है. इस रोग के लक्षण पत्तियों पर ही अधिक दिखाई देते हैं. शुरू में पत्तियों की ऊपरी सतह पर अनियमित रूप के बिखरे भूरे या नारंगी रंग के बहुत छोटेछोटे धब्बे बन जाते हैं, जो बाद में काले हो जाते हैं. उस के बाद ये धब्बे पत्तियों की निचली सतह पर भी हो जाते हैं. रोग के अधिक प्रकोप होने पर धब्बे पर्णच्छद और तने पर भी बन जाते हैं.

तना रतुआ/काला रतुआ

यह रोग पक्सिनिया ट्रीटीसी नामक फफूंद के कारण फैलता है. इस का प्रकोप तने पर होता है और तने के ऊपर लंबे लाल व भूरे उभरे हुए धब्बे बन जाते हैं, जो अधिक प्रकोप होने पर पौधे के अन्य भागों में फैल जाते हैं. पत्तियों के निचली सतह, डंठल एवं बालियों में भूरे रंग के धब्बे दिखाई देते हैं. शुरू में ये धब्बे बहुत छोटे होते हैं, बाद में धीरेधीरे बड़े हो कर एकदूसरे से मिल कर गहरे भूरे रंग के दिखाई देने लगते हैं.

रतुआ रोगों की रोकथाम

* कवनाशी प्रांपिकोनाजोल (टिल्ट 25 ईसी 0.1 फीसदी) या टेबुकोनाजोल 25 ईसी 0.1 फीसदी या ट्रिडेमेफोन (बेलेटोन 25 डब्ल्यूपी 0.1 फीसदी) धारीदार रतुआ के लिए 200 लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए.

* गेरुआ (भूरा कीट) रोग के नियंत्रण के लिए टिल्ट 25 ईसी (0.1 फीसदी) या मैंकोजेब (0.2 फीसदी) का छिड़काव करें.

अनावृत कंडुआ या लूज स्मट

इस का रोगजनक एक कवक एस्टीलेगो सेजेटम प्रजाति ट्रीटिसाई बीज के भ्रूण भाग में छिपा रहता है और संक्रमित बीज ऊपर से देखने में बिलकुल स्वस्थ बीजों की तरह दिखाई देता है. इस रोग के लक्षण बाली आने पर ही दिखाई देते हैं. रोगी पौधों की बालियों में दानों की जगह रोगजनक के रोगकंड काले पाउडर के रूप में पाए जाते हैं, जो हवा से उड़ कर अन्य स्वस्थ बालियों में बन रहे बीजों को भी संक्रमित कर देते हैं. इस प्रकार रोग आने वाली फसल में पहुंच जाता है.

रोकथाम

* बीज को बोआई से पूर्व वीटावैक्स या कार्बोक्सिन (75 डब्ल्यूपी 2-2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज) या कार्बंडाजिम (50 डब्ल्यूपी 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज) या टेबुकोनाजोल (2 डीएस/1.25 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज) ट्राईकोडर्मा विरडी 4 ग्राम प्रति किलोग्राम की दर से बीजोपचार अवश्य करें.

* गेहूं की रोगी बालियां खेतों में दिखाई देते ही उसे सावधानीपूर्वक पौलीथिन की थैली में एकत्रित कर के जला दें.

बीजोपचार से रोगों का नियंत्रण : भौतिक, जैविक व रासायनिक बीजोपचार से रोगों का नियंत्रण काफी हद तक संभव है.

चूर्णिल आसिता

यह रोग इरीसिफी ग्रैमेनिस ट्रीटिसाई नामक कवक से होता है. इस रोग से पत्तियों की ऊपरी सतह पर गेहूं के आटे के रंग के सफेद धब्बे पड़ जाते हैं, जो उपयुक्त परिस्थतियां होने पर बालियों तक पहुंच जाते हैं. तापमान बढ़ने पर इन सफेद भूरे धब्बों में आलपिन की नोक के आकार के गहरे भूरे क्लिस्टोथिसिया बन जाते हैं और इस रोग का फैलाव रुक जाता है. यह रोग मेंड़ पर उगने वाली और पेड़ों की छाया वाली फसल में अधिक लगता है. इस रोग के कारण दाना हलका बनता है.

रोकथाम

* फसल की कटाई के पश्चात खेत में पड़े पौध अवशेषों को एकत्र कर जला देना चाहिए.

* 1500 ग्राम मैंकोजेब या डाइथेन एम-45+525 ग्राम कैरेथेन के मिश्रण को 1,000 लिटर पानी में घोल कर 3 बार प्रति हेक्टेयर की दर से पहला व दूसरा छिड़काव 10 से 14 दिन के अंतर पर करना चाहिए.

* टेबुकोनाजोल (टिल्ट 25 ईसी 0.1 फीसदी) की दर से पत्तियों पर रोग दिखने पर बाली निकलते समय छिड़काव करना चाहिए.

पर्ण झुलसा या लीफ ब्लाइट

यह रोग मुख्यत: बाईपोलेरिस सोरोकिनिया नामक कवक से पैदा होता है. इस रोग के लक्षण पौधे के सभी भागों पर पाए जाते हैं और पत्तियों पर अधिक होते हैं. इस प्रकार हरी पत्तियां समय से पहले सूख जाती हैं और बनने वाले दाने भी बदरंग, हलके और आकार में सिकुड़ जाते हैं. इस प्रकार के बीजों की अंकुरण क्षमता कम हो जाती है.

रोकथाम

* बीजों को बोने से पहले 4 घंटे पानी में भिगो कर 10 मिनट तक 52श-54श सैंटीग्रेड के गरम पानी में रखने से बीजोढ़ कवक नष्ट हो जाता है.

* बोआई से पूर्व बीज को वीटावैक्स 200 का प्रयोग 4 ग्राम अथवा ट्राइकोडर्मा विरडी 4 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर लगाएं.

* खड़ी फसल में रोग दिखाई देते ही प्रोपिकोनाजोल (टिल्ट 25 ईसी) या टेबुकोनाजोल 0.5 लिटर 500-600 लिटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव कर रोग को नियंत्रित कर सकते हैं.

कटाई एवं मड़ाई

जब दाना पक जाए अथवा दांत से तोड़ने पर कट की आवाज आए, तो समझना चाहिए कि फसल कटाई के लिए तैयार हो गई है. फसल की कटाई उपलब्ध साधनों के आधार पर हंसिया, टै्रक्टर चालित रीपर या कंबाइन से की जा सकती है.

उपज

यदि किसान समय से उन्नत शस्य विधियों का प्रयोग करता है, तो वह उगाई गई प्रजाति की उत्पादन क्षमता को अधिकाधिक प्राप्त कर सकता है, जिस में लगभग 60 से 75 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती है.