Mangoes : दशहरी के मुकाबले बढ़ रहे दूसरे आम

Mangoes : दशहरी आम के साथ लखनऊ का बहुत पुराना रिश्ता है. लखनऊ में अनेक किस्म के ऐसे आम हैं, जिन का जोड़ पूरी दुनिया में नहीं है. आम की बागबानी में नए और युवा लोग सामने आ रहे हैं. ऐसे किसानों से लखनऊ के आमों को नई पहचान मिल रही है. ऐसे पढ़ेलिखे बागबान आम की नई मार्केटिंग कर रहे हैं, जिस से लोगों को यह पता चल सका है कि लखनऊ में केवल दशहरी आम ही नहीं होता. यहां हुस्नआरा, श्रेष्ठा, अरुणिमा, अंबिका, सेंसेशन, सफेदा, चौसा और टामी एडकिन जैसे आम भी होते हैं.

ऐसे ही प्रगतिशील किसानों में एक नाम है सुरेशचंद्र शुक्ला का. लखनऊ के माल ब्लाक में स्थित नरौना गांव के रहने वाले सुरेश चंद्र शुक्ला ने बीएससी वनस्पति विभाग से किया. इस के बाद वे अपने गांव की जमीन पर लगे आमों के बाग को संवारने में जुट गए और नए सिरे से आमों का बाग तैयार किया. उन्होंने आम के साथसाथ दूसरे फलों और जड़ीबूटियों पर भी काम करना शुरू किया. कुछ सालों के अंदर ही सुरेश चंद्र शुक्ला का नाम लखनऊ के सब से बड़े बागबानों में शुमार हो गया. आज वे आम को नई पहचान देने का काम कर रहे हैं. 42 एकड़ जमीन पर आम की 271 किस्में उन के यहां लगी हैं. उन के साथ 5-7 दूसरे परिवारों का पालनपोषण भी हो रहा है. उद्यान रत्न सहित दूसरे दर्जनों अवार्ड जीत चुके सुरेश चंद्र शुक्ला को देख कर तमाम किसान आम की बागबानी करने लगे हैं.

आम की बागबानी पर सुरेश चंद्र शुक्ला कहते हैं, ‘आम अपनेआप में अनोखी किस्म का पेड़ होता है. एक ही आम का पेड़ कई किस्म के आम दे सकता है. ऐसे दूसरे पेड़ कम दिखते हैं. लखनऊ की जमीन की मिट्टी की खासीयत के कारण यहां के आम का स्वाद अनोखा होता है. आम का फल छोटा हो या बड़ा, देशी हो या हाईब्रिड, सभी को इस्तेमाल किया जा सकता है. मगर बिजली और दूसरी परेशानियों के चलते लखनऊ में आम को सही तरह से रखा नहीं जा सकता, इसलिए बागबानों को ज्यादा मुनाफा नहीं मिलता है.’

आम पकने के बाद 1 हफ्ते से ज्यादा तक रोका नहीं जा सकता. हाल के कुछ सालों में आम की कई नई प्रजातियां आई हैं, जिन के आम जल्दी खराब नहीं होते. भारत में अल्फांसो आम सब से ज्यादा टिकाऊ होता है. इसी कारण अल्फांसो का विदेशों में सब से ज्यादा निर्यात होता है. आम की प्रजाति सुधारने का काम तेजी से होना चाहिए. तभी इस की मार्केटिंग बेहतर हो सकती है और बागबानों का मुनाफा बढ़ सकता है. आम की मार्केटिंग और उस की प्रजातियों के सुधार की दिशा में काम हो रहा है. लखनऊ में केवल दशहरी की ही मार्केटिंग पर जोर दिया जाता है. असल में यहां दूसरे किस्म के आम भी खूब पैदा होते हैं और उन को भी बाहर बेचा जाता है. हुस्नआरा आम दशहरी आम के मुकाबले कहीं ज्यादा समय तक चलता है.

सुरेश चंद्र शुक्ला कहते हैं, ‘मैं ने चीन यात्रा के समय वहां देखा था कि  वहां आम को 3-4 की पैकिंग में बेचा जाता था. वहां फाइबर प्लेट में आमों को रख कर ऊपर से सेलोफिन से पैक कर के बेचा जाता था. मैं ने उसी तरह की पैकिंग कर के हुस्नआरा के आमों को लखनऊ के मौल्स, मिठाईशौप और एयरपोर्ट पर बिक्री के लिए रखवाया. सभी जगहों से बहुत अच्छा नतीजा मिला.’

हर आम का अपना अलग स्वाद होता है. अपने रंगरूप और स्वाद से कुछ आम लोगों को बहुत आकर्षित करते हैं. जो आम ज्यादा दिनों तक चल सकें वे अच्छे माने जाते हैं. आम तरहतरह के वजन वाले होते हैं. 50 ग्राम वजन के देशी आमों से ले कर 4 किलोग्राम वजन वाले हाथीझूल आम भी मशहूर हैं. हुस्नआरा, श्रेष्ठा, अरुणिमा, अंबिका, सेंसेशन, टामी एडकिन, कृष्णभोग, नाजुक बदन, केसर चिकला खास, रामकेला, पपीतिया व अल्फांसो जैसे बहुत सारे आम ऐसे हैं, जो काफी दिनों तक चलते हैं. दशहरी आम का पेड़ हर साल एक जैसी फसल नहीं देता है. बाकी आम हर साल अच्छी फसल देते हैं.

अपनी बागबानी के बारे में सुरेश चंद्र शुक्ला कहते हैं, ‘मैं पेड़पौधों का बहुत शौकीन रहा हूं. मैं जहां भी घूमने जाता था, वहां से आम के साथसाथ दूसरे किस्म के पेड़ भी ला कर अपने बाग में लगाता था. आम के अलावा मेरे बाग में आंवला, कमरख, चंदन, लीची, रुद्राक्ष, इलायची, कपूर व हींग के पेड़ भी हैं. मेरे एक आम को उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल विष्णुकांत शास्त्री ने शुक्लापसंद नाम दिया था. मैं जल्द ही बिना बीज वाले जामुन का उत्पादन भी करने वाला हूं. इस के अलावा वैज्ञानिकों के साथ मिल कर शुगरफ्री आम की प्रजाति भी विकसित करने में लगा हूं.’

Mangoes

बागबानों के विचार अच्छा बिकता है लखनऊ का सफेदा आम

लखनऊ की बक्शी का तालाब तहसील के बिंदारा बीबीपुर गांव में आम की बागबानी करने वाले युवा किसान धीरज पांडेय कहते हैं, ‘दशहरी आम के साथ ही साथ देशी आम की खपत भी बढ़ रही है. यह आम पकने के बाद भी जल्द खराब नहीं होता है. इस का अचार अच्छा बनता है. वाराणसी, दिल्ली व कोलकाता की आम मंडी में देशी आम की खपत बढ़ रही है. दशहरी आम जहां जल्दी खराब हो जाता है, वहीं देशी आम काफी दिनों तक चलता है. लखनऊ का सफेदा सब से मशहूर आम है. यह रसदार होता है. जब दशहरी आम का सीजन खत्म हो जाता है, तब यह आम खाने के काम आता है.’

खूब पसंद आता है चौसा

मलिहाबाद के जलौली गांव के रहने वाले आम बागबान पंकज सिंह कहते हैं, ‘दशहरी तो आम के बाजार में पहली पसंद है. हर खरीदार दशहरी आम लेना पसंद करता है. मंडियों में सब से ज्यादा दशहरी आम भेजा जाता है. अब बागबान अपने बाग में तरहतरह के आम लगाना पसंद करता है, ताकि ज्यादा समय तक आम की बिक्री होती रहे. चौसा एक ऐसी किस्म का आम है, जो काफी समय तक चलता है. इसे लोग पसंद भी खूब करते हैं. चौसा आम की कई किस्में होती हैं. इस का फल काफी बड़ा और गूदेदार होता है.’

Mango : आम से अच्छी उपज के लिए उगाएं ये प्रजातियां

Mango | आम्रपाली व जनार्दन पसंद किस्मों के संकरण से विकसित इस किस्म को साल 2000 में संस्थान द्वारा पेश किया गया. इस का पेड़ कम फैलाव लिए हुए और कम शाखाओं वाला होता है. नियमित फलत वाली यह किस्म मौसम में देर से तैयार होती है. इस के फल का आकार तिरछा व अंडाकार होता है और औसत वजन 250-350 ग्राम होता है. तैयार होने पर इस के फल का रंग बैगनीहरा होता है. पकने पर यह चमकीला पीला व लाल हो जाता है. पके हुए फल का गूदा कम रेशे वाला व सख्त होता है. इस का गूदा नारंगीपीला होता है. 10 साल की अवस्था होने पर इस का औसत फल उत्पादन 80 किलोग्राम प्रति पेड़ तक होता है. विदेशी बाजार में इस के निर्यात की अच्छी संभावनाएं हैं.

अरुनिका : इस के पेड़ का आकार बौना होता है. यह नियमित फलत वाली किस्म है, जिस में ऐंथ्रेकनोज को सहने की कूवत होती है. इस के फल आकर्षक होते हैं और गूदा सख्त होता है. 10 साल की अवस्था होने पर इस का औसत फल उत्पादन 60 किलोग्राम प्रति पेड़ तक होता है. विदेशी बाजार में इस के निर्यात की अच्छी संभावनाएं हैं.

दशहरी : लखनऊ के पास दशहरी गांव में हुई उत्पत्ति के कारण इस किस्म को दशहरी नाम से जाना जाता है. दशहरी उत्तर भारत की खास व्यावसायिक किस्म है और देश के उम्दा आमों में इस का खास स्थान है. इस का फल आकार में मध्यम व लंबा होता है. इस का औसत वजन 200-250 ग्राम होता है. इस के पके फलों का रंग पीला होता है, जो मध्य मौसम में पकते हैं. इस के फलों की गुणवत्ता अच्छी व भंडारण कूवत मध्यम होती है.

लंगड़ा : उत्तर भारत के बनारस, गोरखपुर व बिहार क्षेत्र में उगाई जाने वाली आम की इस किस्म के फल मध्यम, अंडाकार व हलके हरेपीले रंग के होते हैं. इस के फल मध्यम मौसम में पकते हैं. फलों की गुणवत्ता उत्तम और भंडारण कूवत मध्यम होती है. इस के फलों में मिठास व खटास का अच्छा मिश्रण होता है, जिस से यह बेहद स्वादिष्ठ किस्म मानी जाती है. साथ ही फलों में गूदे की मात्रा ज्यादा व गुठली पतली होती है. बिहार में इसे मालदा नाम से भी जाना जाता है.

चौसा : आम की इस किस्म की उत्पत्ति उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के संडीला नामक स्थान में एक तालुकेदार के बाग में संयोगवश एक बीजू पेड़ के रूप में हुई. इस की खास महक व स्वाद के कारण इसे भारत के उत्तरी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर उगाया जाता है. इस के फल बड़े, चपटे व अंडाकार होते हैं. इस के फलों का रंग हलका पीला होता है और गुणवत्ता अच्छी होती है. इस के फल रसीले होते हैं. आम की यह किस्म देर में पक कर तैयार होती है.

आम्रपाली : आम की यह किस्म दशहरी व नीलम से विकसित की गई है. इस के पेड़ बौने होते हैं और फल देर में पकते हैं. इस के फल मध्यम आकार के और स्वादिष्ठ होते हैं. फलों की भंडारण कूवत अच्छी होती है. यह किस्म सघन बागबानी के लिए अच्छी है. 1 हेक्टेयर में इस किस्म के 1600 पौधे लगाए जा सकते हैं, जो 5 साल के बाद 16 टन प्रति हेक्टेयर फल देने की कूवत रखते हैं. ज्यादा विटामिन ‘ए’ व छोटे आकार के कारण गृह वाटिका में इस का खास महत्त्व है.

मल्लिका : आम की यह संकर किस्म नीलम और दशहरी के संकरण से विकसित की गई. इस के फल पीले और मध्यम बड़े आकार के होते हैं. इस के फल का औसत भार 300 ग्राम होता है. फलों में गूदे की मात्रा काफी होती है व गुठली पतली होती है. इस के फलों की गुणवत्ता व भंडारण कूवत अच्छी है. यह देर से तैयार होने वाली किस्म है. आंध्र प्रदेश व कर्नाटक आदि राज्यों में इस की व्यावसायिक खेती बढ़ रही है. यह किस्म प्रसंस्करण के लिए अच्छी है.

Mango : आम की तोड़ाई के बाद फलों की कैसे करे देखभाल

Mango| आम की बागबानी में फल तैयार होने के बाद उन की तोड़ाई भी सावधानी से करे. जिस से उन की क्वालिटी बनी रहे और बाजार में अच्छी कीमत मिल सके.

तोड़ाई के बाद की देखभाल

* उत्पादित आमों का करीब 25-30 फीसदी भाग बाग से ग्राहकों तक पहुंचने में नष्ट हो जाता है. यदि तोड़ाई, पेटी बंदी व भंडारण की सही तकनीक अपनाई जाए तो इस नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है.

* आम के फल 12-15 हफ्ते बाद प्रजाति के मुताबिक पूरी तरह तैयार होते हैं. दशहरी व लंगड़ा आम 12 हफ्ते और चौसा व मल्लिका आम 15 हफ्ते में तैयार होते हैं.

* तैयार फलों की तोड़ाई 8-10 मिलीमीटर लंबी डंठल के साथ करनी चाहिए, जिस से फलों पर चेप नहीं लगे व पकने पर फल दाग रहित हों. तोड़ाई के समय फलों को चोट व खरोच न लगने दें.

* तोड़ाई के लिए संस्थान द्वारा विकसित यंत्र हैं. इस से प्रति घंटे 600-800 फल तोड़े जा सकते हैं.

* तोड़ाई के बाद फलों को छायादार जगह में रखें और मिट्टी लगने से बचाएं.

* फलों की पैकिंग के लिए 0.5 फीसदी छेद वाले 4 किलोग्राम कूवत वाले गत्ते के बक्से संस्थान द्वारा तैयार किए गए हैं, जो भंडारण व परिवहन के लिए सही होते हैं.

* तोड़ाई के बाद ऐंथ्रेक्नोज, स्टेम एंड राट व ब्लैक राट रोगों से बचाने के लिए फलों को 0.05 फीसदी कार्बेंडाजिम के कुनकुने पानी में 10 मिनट तक डुबो कर रखने के बाद सुखा कर पेटीबंद करना चाहिए.

* शीत भंडारण विधि में आम की तमाम प्रजातियों जैसे दशहरी, मल्लिका व आम्रपाली को 2 डिगरी सेंटीग्रेड, लंगड़ा को 15 डिगरी सेटीग्रेड व चौसा को 10 डिगरी सेंटीग्रेड तापमान व 85-90 फीसदी आपेक्षित आर्द्रता पर 2-3 हफ्ते तक रखा जा सकता है.

* दशहरी किस्म के फलों को 2 फीसदी कैल्सियम क्लोराइड डाईहाइडे्रट के घोल में 500 मिलीमीटर वायुमंडलीय दाब पर 5 मिनट के लिए उपचारित कर के कम तापमान पर 27 दिनों तक भंडारित किया जा सकता है.

* पूरी तरह तैयार फलों को 250-750 पीपीएम ईथरल के कुनकुने पानी के घोल में 5 मिनट तक डुबाने के बाद पूरी तरह सुखा कर भंडारित करें, तो सभी फल आकर्षक पीले रंग में समान रूप से पकते हैं.

Mango Orchards : आम के बागों में कीड़ों व रोगों की रोकथाम जरूरी

Mango Orchards : आम की बागबानी में स्वस्थ्य और अच्छी उपज लेने के लिए कीटरोगों की रोकथाम समय रहते कर देनी चाहिए अन्यथा आम की मिठास कड़वाहट में बदलने में समय नहीं लगेगा.

कीड़ों की रोकथाम

भुनगा: इस कीट के बच्चे व वयस्क दोनों ही मुलायम टहनियों, पत्तियों व फूलों का रस चूसते हैं. इस की वजह से फूल सूख कर गिर जाते हैं. यह कीट एक प्रकार का मीठा पदार्थ निकालता है, जो पेड़ों की पत्तियों, टहनियों आदि पर लग जाता है. इस मीठे पदार्थ पर काली फफूंदी पनपती है, जो पत्तियों पर काली परत के रूप में फैल कर पेड़ों के प्रकाश संश्लेषण पर खराब असर डालती है.

इलाज : बाग से खरपतवार हटा कर उसे साफसुथरा रखें. घने बाग की कटाईछंटाई दिसंबर में करें. बौर फूटने के बाद बागों की बराबर देखभाल करें. पुष्पगुच्छ की लंबाई 8-10 सेंटीमीटर होने पर भुनगे का प्रकोप होता है. इस की रोकथाम के लिए 0.005 फीसदी इमिडा क्लोप्रिड का पहली बार छिड़काव करें. 0.005 फीसदी थायामेथोक्लाज या 0.05 फीसदी प्रोफेनोफास का दूसरा छिड़ाकाव फल लगने के बाद करें.

गुजिया: इस के बच्चे और वयस्क पत्तियों व फूलों का रस चूसते हैं. जब इन की तादाद ज्यादा हो जाती है, तो इन के द्वारा रस चूसे जाने के कारण पेड़ों की पत्तियां व बौर सूख जाते हैं और फल नहीं लगते हैं. इस कीट का हमला दिसंबर से मई महीने तक देखा जाता है.

इलाज : खरपतवारों और अन्य घासों को नवंबर में जुताई द्वारा बाग से निकालने से सुप्तावस्था में रहने वाले अंडे धूप, गरमी व चीटियों द्वारा नष्ट हो जाते हैं. दिसंबर के तीसरे हफ्ते में पेड़ के तने के आसपास 250 ग्राम क्लोरपाइरीफास चूर्ण 1.5 फीसदी प्रति पेड़ की दर से मिट्टी में मिला देने से अंडों से निकलने वाले निम्फ मर जाते हैं. पालीथीन की 30 सेंटीमीटर चौड़ी पट्टी पेड़ के तने के चारों ओर जमीन की सतह से 30 सेंटीमीटर ऊंचाई पर दिसंबर के दूसरेतीसरे हफ्ते में गुजिया के निकलने से पहले लपेटने से निम्फों का पेड़ों पर ऊपर चढ़ना रुक जाता है. पट्टी के दोनों सिरों को सुतली से बांधना चाहिए. इस के बाद थोड़ी ग्रीस पट्टी के निचले घेरे पर लगाने से गुजिया को पट्टी पर चढ़ने से रोका जा सकता है. यह पट्टी बाग में मौजूद सभी आम के पेड़ों व अन्य पेड़ों पर भी बांधनी चाहिए. अगर किसी वजह से यह विधि नहीं अपनाई गई और गुजिया पेड़ पर चढ़ गई, तो ऐसी हालत में 0.05 फीसदी कार्बोसल्फान 0.2 मिलीलीटर प्रति लीटर या 0.06 फीसदी डायमेथोएट 2.0 मिलीलीटर प्रति लीटर का छिड़काव करें.

Mango Orchards

पुष्प गुच्छ मिज : आम के पेड़ों पर मिज के प्रकोप से 3 चरणों में हानि होती है. इस का पहला प्रकोप कली के खिलने की अवस्था में होता है. नए विकसित बौर में अंडे दिए जाने व लार्वा द्वारा बौर के मुलायम डंठल में घुसने से बौर पूरी तरह से नष्ट हो जाते हैं. इस का दूसरा प्रकोप फलों के बनने की अवस्था में होता है. फलों में अंडे देने व लार्वा के घुसने की वजह से फल पीले हो कर गिर जाते हैं. तीसरा प्रकोप बौर को घेरती हुई पत्तियों पर होता है.

इलाज : अक्तूबर व नवंबर में बाग में की गई जुताई से मिज की सूंडि़यों के साथ सोए पड़े प्यूपे भी नष्ट हो जाते हैं. जिन बागों में इस कीट का हमला होता रहा है, वहां बौर फूटने पर 0.06 फीसदी डायमेथोएट का छिड़काव करना चाहिए. अप्रैलमई में 250 ग्राम क्लोरपाइरीफास चूर्ण प्रति पेड़ के हिसाब से छिड़काव करने पर पेड़ के नीचे सूंडि़यां नष्ट हो जाती हैं. फरवरी में भुनगे के लिए किए जाने वाले कीटनाशी के छिड़काव से इस कीट की भी अपनेआम रोकथाम हो जाती है.

डासी मक्खी : वयस्क मक्खियां अप्रैल में जमीन से निकल कर पके फलों पर अंडे देती हैं. 1 मक्खी 150 से 200 तक अंडे देती है. 2-3 दिनों के बाद सूंडि़यां अंडों से निकल कर गूदे को खाना शुरू कर देती हैं.

इलाज : इस कीट के असर को कम करने के लिए सभी गिरे हुए व मक्खी के प्रकोप से ग्रसित फलों को इकट्ठा कर के नष्ट कर देना चाहिए. पेड़ों के आसपास सर्दी के मौसम में जुताई करने से जमीन के अंदर के प्यूपों को नष्ट किया जा सकता है. काठ से बने यौनगंध ट्रैप को पेड़ पर लगाना इस की रोकथाम में बहुत कारगर है. इस ट्रैप के लिए प्लाईवुड के 5×5×1 सेंटीमीटर आकार के गुटके को 48 घंटे तक 6:4:1 के अनुपात में अल्कोहल, मिथाइल यूजिनाल, मैलाथियान के घोल में भिगो कर लगाना चाहिए. यौनगंध ट्रैप को 2 महीने के अंतर पर बदलना चाहिए. 10 ट्रैप प्रति हेक्टेयर लटकाने चाहिए.

रोगों की रोकथाम

पाउडरी मिल्ड्यू (खर्रा, दहिया) : इस रोग के लक्षण बौरों, पत्तियों व नए फलों पर देखे जा सकते हैं. इस रोग का खास लक्षण सफेद कवक या चूर्ण के रूप में जाहिर होता है. नई पत्तियों पर यह रोग आसानी से दिखता है, जब पत्तियों का रंग भूरे से हलके हरे रंग में बदलता है. नई पत्तियों पर ऊपरी और निचली सतह पर छोटे सलेटी रंग के धब्बे दिखाई देते हैं, जो निचली सतह पर ज्यादा होते हैं. बौरों पर यह रोग सफेद चूर्ण की तरह दिखाई पड़ता है और बौरों में लगे फूलों के झड़ने की वजह बनता है. इस रोग की वजह से फूल नहीं खिलते हैं और समय से पहले ही झड़ जाते हैं. नए फलों पर पूरी तरह सफेद चूर्ण फैल जाता है और मटर के दाने के बराबर हो जाने के बाद फल पेड़ से झड़ जाते हैं.

इलाज : पहला छिड़काव 0.2 फीसदी घुलनशील गंधक का घोल बना कर उस समय करना चाहिए, जब बौर 3-4 इंच का होता है. दूसरा छिड़काव 0.1 फीसदी डिनोकोप का होना चाहिए, जो पहले छिड़काव के 15-20 दिनों के बाद हो. दूसरे छिड़काव के 15-20 दिनों के बाद तीसरा छिड़काव 0.1 फीसदी ट्राईडीमार्फ का होना चाहिए.

एंथ्रेकनोज : यह रोग पत्तियों, टहनियों और फलों पर देखा जा सकता है. पत्तियों की सतह पर पहले गोल या अनियमित भूरे या गहरे भूरे रंग के धब्बे बनते हैं. प्रभावित टहनियों पर पहले काले धब्बे बनते हैं और फिर पूरी टहनी सलेटी रंग की हो जाती है. पत्तियां नीचे की ओर झुक कर सूखने लगती हैं और बाद में गिर जाती हैं. बौर पर सब से पहले पाए जाने वाले लक्षण हैं, गहरे भूरे रंग के धब्बे, जो कि फूलों पर जाहिर होते हैं. बौर व खिले फूलों पर छोटे काले धब्बे उभरते हैं, जो धीरेधीरे फैलते हैं और आपस में जुड़ कर फूलों को सुखा देते हैं. ज्यादा नमी होने पर यह रोग तेजी से फैलता है.

इलाज : सभी रोगग्रसित टहनियों की छंटाई कर देनी चाहिए और बाग में गिरी हुई पत्तियों, टहनियों और फलों को इकट्ठा कर के जला देना चाहिए. मंजरी संक्रमण को रोकने केलिए 0.1 फीसदी कार्बेंडाजिम का 15 दिनों के अंतराल पर 2 बार छिड़काव करना चाहिए. संक्रमण को रोकने के लिए 0.3 फीसदी कापर आक्सीक्लोराइड का छिड़काव भी लाभकारी है. 0.1 फीसदी थायोफनेट मिथाइल या 0.1 फीसदी कार्बेंडाजिम का बाग में फल तोड़ाई से पहले छिड़काव करने से गुप्त संक्रमण को कम किया जा सकता है.

उल्टा सूखा रोग : टहनियों का ऊपर से नीचे की ओर सूखना इस रोग का मुख्य लक्षण है. विशेष तौर पर पुराने पेड़ों में बाद के पत्ते सूख जाते हैं, जो आग से झुलसे हुए से मालूम पड़ते हैं. शुरू में नई हरी टहनियों पर गहरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं. जब ये धब्बे बढ़ते हैं, तब नई टहनियां सूख जाती हैं. ऊपर की पत्तियां अपना हरा रंग खो देती हैं और धीरेधीरे सूख जाती हैं. इस रोग का ज्यादा असर अक्तूबरनवंबर में दिखाई पड़ता है.

इलाज : छंटाई के बाद गाय का गोबर व चिकनी मिट्टी मिला कर कटे भाग पर लगाना फायदेमंद होता है. संक्रमित भाग में 3 इंच नीचे से छंटाई के बाद बोर्डो मिक्चर 5:5:50 या 0.2 फीसदी कापर आक्सीक्लोराइड का छिड़काव रोग की रोकथाम में बेहद कारगर होता है.