Mango : आम से अच्छी उपज के लिए उगाएं ये प्रजातियां

Mango | आम्रपाली व जनार्दन पसंद किस्मों के संकरण से विकसित इस किस्म को साल 2000 में संस्थान द्वारा पेश किया गया. इस का पेड़ कम फैलाव लिए हुए और कम शाखाओं वाला होता है. नियमित फलत वाली यह किस्म मौसम में देर से तैयार होती है. इस के फल का आकार तिरछा व अंडाकार होता है और औसत वजन 250-350 ग्राम होता है. तैयार होने पर इस के फल का रंग बैगनीहरा होता है. पकने पर यह चमकीला पीला व लाल हो जाता है. पके हुए फल का गूदा कम रेशे वाला व सख्त होता है. इस का गूदा नारंगीपीला होता है. 10 साल की अवस्था होने पर इस का औसत फल उत्पादन 80 किलोग्राम प्रति पेड़ तक होता है. विदेशी बाजार में इस के निर्यात की अच्छी संभावनाएं हैं.

अरुनिका : इस के पेड़ का आकार बौना होता है. यह नियमित फलत वाली किस्म है, जिस में ऐंथ्रेकनोज को सहने की कूवत होती है. इस के फल आकर्षक होते हैं और गूदा सख्त होता है. 10 साल की अवस्था होने पर इस का औसत फल उत्पादन 60 किलोग्राम प्रति पेड़ तक होता है. विदेशी बाजार में इस के निर्यात की अच्छी संभावनाएं हैं.

दशहरी : लखनऊ के पास दशहरी गांव में हुई उत्पत्ति के कारण इस किस्म को दशहरी नाम से जाना जाता है. दशहरी उत्तर भारत की खास व्यावसायिक किस्म है और देश के उम्दा आमों में इस का खास स्थान है. इस का फल आकार में मध्यम व लंबा होता है. इस का औसत वजन 200-250 ग्राम होता है. इस के पके फलों का रंग पीला होता है, जो मध्य मौसम में पकते हैं. इस के फलों की गुणवत्ता अच्छी व भंडारण कूवत मध्यम होती है.

लंगड़ा : उत्तर भारत के बनारस, गोरखपुर व बिहार क्षेत्र में उगाई जाने वाली आम की इस किस्म के फल मध्यम, अंडाकार व हलके हरेपीले रंग के होते हैं. इस के फल मध्यम मौसम में पकते हैं. फलों की गुणवत्ता उत्तम और भंडारण कूवत मध्यम होती है. इस के फलों में मिठास व खटास का अच्छा मिश्रण होता है, जिस से यह बेहद स्वादिष्ठ किस्म मानी जाती है. साथ ही फलों में गूदे की मात्रा ज्यादा व गुठली पतली होती है. बिहार में इसे मालदा नाम से भी जाना जाता है.

चौसा : आम की इस किस्म की उत्पत्ति उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के संडीला नामक स्थान में एक तालुकेदार के बाग में संयोगवश एक बीजू पेड़ के रूप में हुई. इस की खास महक व स्वाद के कारण इसे भारत के उत्तरी क्षेत्र में बड़े पैमाने पर उगाया जाता है. इस के फल बड़े, चपटे व अंडाकार होते हैं. इस के फलों का रंग हलका पीला होता है और गुणवत्ता अच्छी होती है. इस के फल रसीले होते हैं. आम की यह किस्म देर में पक कर तैयार होती है.

आम्रपाली : आम की यह किस्म दशहरी व नीलम से विकसित की गई है. इस के पेड़ बौने होते हैं और फल देर में पकते हैं. इस के फल मध्यम आकार के और स्वादिष्ठ होते हैं. फलों की भंडारण कूवत अच्छी होती है. यह किस्म सघन बागबानी के लिए अच्छी है. 1 हेक्टेयर में इस किस्म के 1600 पौधे लगाए जा सकते हैं, जो 5 साल के बाद 16 टन प्रति हेक्टेयर फल देने की कूवत रखते हैं. ज्यादा विटामिन ‘ए’ व छोटे आकार के कारण गृह वाटिका में इस का खास महत्त्व है.

मल्लिका : आम की यह संकर किस्म नीलम और दशहरी के संकरण से विकसित की गई. इस के फल पीले और मध्यम बड़े आकार के होते हैं. इस के फल का औसत भार 300 ग्राम होता है. फलों में गूदे की मात्रा काफी होती है व गुठली पतली होती है. इस के फलों की गुणवत्ता व भंडारण कूवत अच्छी है. यह देर से तैयार होने वाली किस्म है. आंध्र प्रदेश व कर्नाटक आदि राज्यों में इस की व्यावसायिक खेती बढ़ रही है. यह किस्म प्रसंस्करण के लिए अच्छी है.

Mango : आम की तोड़ाई के बाद फलों की कैसे करे देखभाल

Mango| आम की बागबानी में फल तैयार होने के बाद उन की तोड़ाई भी सावधानी से करे. जिस से उन की क्वालिटी बनी रहे और बाजार में अच्छी कीमत मिल सके.

तोड़ाई के बाद की देखभाल

* उत्पादित आमों का करीब 25-30 फीसदी भाग बाग से ग्राहकों तक पहुंचने में नष्ट हो जाता है. यदि तोड़ाई, पेटी बंदी व भंडारण की सही तकनीक अपनाई जाए तो इस नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है.

* आम के फल 12-15 हफ्ते बाद प्रजाति के मुताबिक पूरी तरह तैयार होते हैं. दशहरी व लंगड़ा आम 12 हफ्ते और चौसा व मल्लिका आम 15 हफ्ते में तैयार होते हैं.

* तैयार फलों की तोड़ाई 8-10 मिलीमीटर लंबी डंठल के साथ करनी चाहिए, जिस से फलों पर चेप नहीं लगे व पकने पर फल दाग रहित हों. तोड़ाई के समय फलों को चोट व खरोच न लगने दें.

* तोड़ाई के लिए संस्थान द्वारा विकसित यंत्र हैं. इस से प्रति घंटे 600-800 फल तोड़े जा सकते हैं.

* तोड़ाई के बाद फलों को छायादार जगह में रखें और मिट्टी लगने से बचाएं.

* फलों की पैकिंग के लिए 0.5 फीसदी छेद वाले 4 किलोग्राम कूवत वाले गत्ते के बक्से संस्थान द्वारा तैयार किए गए हैं, जो भंडारण व परिवहन के लिए सही होते हैं.

* तोड़ाई के बाद ऐंथ्रेक्नोज, स्टेम एंड राट व ब्लैक राट रोगों से बचाने के लिए फलों को 0.05 फीसदी कार्बेंडाजिम के कुनकुने पानी में 10 मिनट तक डुबो कर रखने के बाद सुखा कर पेटीबंद करना चाहिए.

* शीत भंडारण विधि में आम की तमाम प्रजातियों जैसे दशहरी, मल्लिका व आम्रपाली को 2 डिगरी सेंटीग्रेड, लंगड़ा को 15 डिगरी सेटीग्रेड व चौसा को 10 डिगरी सेंटीग्रेड तापमान व 85-90 फीसदी आपेक्षित आर्द्रता पर 2-3 हफ्ते तक रखा जा सकता है.

* दशहरी किस्म के फलों को 2 फीसदी कैल्सियम क्लोराइड डाईहाइडे्रट के घोल में 500 मिलीमीटर वायुमंडलीय दाब पर 5 मिनट के लिए उपचारित कर के कम तापमान पर 27 दिनों तक भंडारित किया जा सकता है.

* पूरी तरह तैयार फलों को 250-750 पीपीएम ईथरल के कुनकुने पानी के घोल में 5 मिनट तक डुबाने के बाद पूरी तरह सुखा कर भंडारित करें, तो सभी फल आकर्षक पीले रंग में समान रूप से पकते हैं.

Mango Orchards : आम के बागों में कीड़ों व रोगों की रोकथाम जरूरी

Mango Orchards : आम की बागबानी में स्वस्थ्य और अच्छी उपज लेने के लिए कीटरोगों की रोकथाम समय रहते कर देनी चाहिए अन्यथा आम की मिठास कड़वाहट में बदलने में समय नहीं लगेगा.

कीड़ों की रोकथाम

भुनगा: इस कीट के बच्चे व वयस्क दोनों ही मुलायम टहनियों, पत्तियों व फूलों का रस चूसते हैं. इस की वजह से फूल सूख कर गिर जाते हैं. यह कीट एक प्रकार का मीठा पदार्थ निकालता है, जो पेड़ों की पत्तियों, टहनियों आदि पर लग जाता है. इस मीठे पदार्थ पर काली फफूंदी पनपती है, जो पत्तियों पर काली परत के रूप में फैल कर पेड़ों के प्रकाश संश्लेषण पर खराब असर डालती है.

इलाज : बाग से खरपतवार हटा कर उसे साफसुथरा रखें. घने बाग की कटाईछंटाई दिसंबर में करें. बौर फूटने के बाद बागों की बराबर देखभाल करें. पुष्पगुच्छ की लंबाई 8-10 सेंटीमीटर होने पर भुनगे का प्रकोप होता है. इस की रोकथाम के लिए 0.005 फीसदी इमिडा क्लोप्रिड का पहली बार छिड़काव करें. 0.005 फीसदी थायामेथोक्लाज या 0.05 फीसदी प्रोफेनोफास का दूसरा छिड़ाकाव फल लगने के बाद करें.

गुजिया: इस के बच्चे और वयस्क पत्तियों व फूलों का रस चूसते हैं. जब इन की तादाद ज्यादा हो जाती है, तो इन के द्वारा रस चूसे जाने के कारण पेड़ों की पत्तियां व बौर सूख जाते हैं और फल नहीं लगते हैं. इस कीट का हमला दिसंबर से मई महीने तक देखा जाता है.

इलाज : खरपतवारों और अन्य घासों को नवंबर में जुताई द्वारा बाग से निकालने से सुप्तावस्था में रहने वाले अंडे धूप, गरमी व चीटियों द्वारा नष्ट हो जाते हैं. दिसंबर के तीसरे हफ्ते में पेड़ के तने के आसपास 250 ग्राम क्लोरपाइरीफास चूर्ण 1.5 फीसदी प्रति पेड़ की दर से मिट्टी में मिला देने से अंडों से निकलने वाले निम्फ मर जाते हैं. पालीथीन की 30 सेंटीमीटर चौड़ी पट्टी पेड़ के तने के चारों ओर जमीन की सतह से 30 सेंटीमीटर ऊंचाई पर दिसंबर के दूसरेतीसरे हफ्ते में गुजिया के निकलने से पहले लपेटने से निम्फों का पेड़ों पर ऊपर चढ़ना रुक जाता है. पट्टी के दोनों सिरों को सुतली से बांधना चाहिए. इस के बाद थोड़ी ग्रीस पट्टी के निचले घेरे पर लगाने से गुजिया को पट्टी पर चढ़ने से रोका जा सकता है. यह पट्टी बाग में मौजूद सभी आम के पेड़ों व अन्य पेड़ों पर भी बांधनी चाहिए. अगर किसी वजह से यह विधि नहीं अपनाई गई और गुजिया पेड़ पर चढ़ गई, तो ऐसी हालत में 0.05 फीसदी कार्बोसल्फान 0.2 मिलीलीटर प्रति लीटर या 0.06 फीसदी डायमेथोएट 2.0 मिलीलीटर प्रति लीटर का छिड़काव करें.

Mango Orchards

पुष्प गुच्छ मिज : आम के पेड़ों पर मिज के प्रकोप से 3 चरणों में हानि होती है. इस का पहला प्रकोप कली के खिलने की अवस्था में होता है. नए विकसित बौर में अंडे दिए जाने व लार्वा द्वारा बौर के मुलायम डंठल में घुसने से बौर पूरी तरह से नष्ट हो जाते हैं. इस का दूसरा प्रकोप फलों के बनने की अवस्था में होता है. फलों में अंडे देने व लार्वा के घुसने की वजह से फल पीले हो कर गिर जाते हैं. तीसरा प्रकोप बौर को घेरती हुई पत्तियों पर होता है.

इलाज : अक्तूबर व नवंबर में बाग में की गई जुताई से मिज की सूंडि़यों के साथ सोए पड़े प्यूपे भी नष्ट हो जाते हैं. जिन बागों में इस कीट का हमला होता रहा है, वहां बौर फूटने पर 0.06 फीसदी डायमेथोएट का छिड़काव करना चाहिए. अप्रैलमई में 250 ग्राम क्लोरपाइरीफास चूर्ण प्रति पेड़ के हिसाब से छिड़काव करने पर पेड़ के नीचे सूंडि़यां नष्ट हो जाती हैं. फरवरी में भुनगे के लिए किए जाने वाले कीटनाशी के छिड़काव से इस कीट की भी अपनेआम रोकथाम हो जाती है.

डासी मक्खी : वयस्क मक्खियां अप्रैल में जमीन से निकल कर पके फलों पर अंडे देती हैं. 1 मक्खी 150 से 200 तक अंडे देती है. 2-3 दिनों के बाद सूंडि़यां अंडों से निकल कर गूदे को खाना शुरू कर देती हैं.

इलाज : इस कीट के असर को कम करने के लिए सभी गिरे हुए व मक्खी के प्रकोप से ग्रसित फलों को इकट्ठा कर के नष्ट कर देना चाहिए. पेड़ों के आसपास सर्दी के मौसम में जुताई करने से जमीन के अंदर के प्यूपों को नष्ट किया जा सकता है. काठ से बने यौनगंध ट्रैप को पेड़ पर लगाना इस की रोकथाम में बहुत कारगर है. इस ट्रैप के लिए प्लाईवुड के 5×5×1 सेंटीमीटर आकार के गुटके को 48 घंटे तक 6:4:1 के अनुपात में अल्कोहल, मिथाइल यूजिनाल, मैलाथियान के घोल में भिगो कर लगाना चाहिए. यौनगंध ट्रैप को 2 महीने के अंतर पर बदलना चाहिए. 10 ट्रैप प्रति हेक्टेयर लटकाने चाहिए.

रोगों की रोकथाम

पाउडरी मिल्ड्यू (खर्रा, दहिया) : इस रोग के लक्षण बौरों, पत्तियों व नए फलों पर देखे जा सकते हैं. इस रोग का खास लक्षण सफेद कवक या चूर्ण के रूप में जाहिर होता है. नई पत्तियों पर यह रोग आसानी से दिखता है, जब पत्तियों का रंग भूरे से हलके हरे रंग में बदलता है. नई पत्तियों पर ऊपरी और निचली सतह पर छोटे सलेटी रंग के धब्बे दिखाई देते हैं, जो निचली सतह पर ज्यादा होते हैं. बौरों पर यह रोग सफेद चूर्ण की तरह दिखाई पड़ता है और बौरों में लगे फूलों के झड़ने की वजह बनता है. इस रोग की वजह से फूल नहीं खिलते हैं और समय से पहले ही झड़ जाते हैं. नए फलों पर पूरी तरह सफेद चूर्ण फैल जाता है और मटर के दाने के बराबर हो जाने के बाद फल पेड़ से झड़ जाते हैं.

इलाज : पहला छिड़काव 0.2 फीसदी घुलनशील गंधक का घोल बना कर उस समय करना चाहिए, जब बौर 3-4 इंच का होता है. दूसरा छिड़काव 0.1 फीसदी डिनोकोप का होना चाहिए, जो पहले छिड़काव के 15-20 दिनों के बाद हो. दूसरे छिड़काव के 15-20 दिनों के बाद तीसरा छिड़काव 0.1 फीसदी ट्राईडीमार्फ का होना चाहिए.

एंथ्रेकनोज : यह रोग पत्तियों, टहनियों और फलों पर देखा जा सकता है. पत्तियों की सतह पर पहले गोल या अनियमित भूरे या गहरे भूरे रंग के धब्बे बनते हैं. प्रभावित टहनियों पर पहले काले धब्बे बनते हैं और फिर पूरी टहनी सलेटी रंग की हो जाती है. पत्तियां नीचे की ओर झुक कर सूखने लगती हैं और बाद में गिर जाती हैं. बौर पर सब से पहले पाए जाने वाले लक्षण हैं, गहरे भूरे रंग के धब्बे, जो कि फूलों पर जाहिर होते हैं. बौर व खिले फूलों पर छोटे काले धब्बे उभरते हैं, जो धीरेधीरे फैलते हैं और आपस में जुड़ कर फूलों को सुखा देते हैं. ज्यादा नमी होने पर यह रोग तेजी से फैलता है.

इलाज : सभी रोगग्रसित टहनियों की छंटाई कर देनी चाहिए और बाग में गिरी हुई पत्तियों, टहनियों और फलों को इकट्ठा कर के जला देना चाहिए. मंजरी संक्रमण को रोकने केलिए 0.1 फीसदी कार्बेंडाजिम का 15 दिनों के अंतराल पर 2 बार छिड़काव करना चाहिए. संक्रमण को रोकने के लिए 0.3 फीसदी कापर आक्सीक्लोराइड का छिड़काव भी लाभकारी है. 0.1 फीसदी थायोफनेट मिथाइल या 0.1 फीसदी कार्बेंडाजिम का बाग में फल तोड़ाई से पहले छिड़काव करने से गुप्त संक्रमण को कम किया जा सकता है.

उल्टा सूखा रोग : टहनियों का ऊपर से नीचे की ओर सूखना इस रोग का मुख्य लक्षण है. विशेष तौर पर पुराने पेड़ों में बाद के पत्ते सूख जाते हैं, जो आग से झुलसे हुए से मालूम पड़ते हैं. शुरू में नई हरी टहनियों पर गहरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं. जब ये धब्बे बढ़ते हैं, तब नई टहनियां सूख जाती हैं. ऊपर की पत्तियां अपना हरा रंग खो देती हैं और धीरेधीरे सूख जाती हैं. इस रोग का ज्यादा असर अक्तूबरनवंबर में दिखाई पड़ता है.

इलाज : छंटाई के बाद गाय का गोबर व चिकनी मिट्टी मिला कर कटे भाग पर लगाना फायदेमंद होता है. संक्रमित भाग में 3 इंच नीचे से छंटाई के बाद बोर्डो मिक्चर 5:5:50 या 0.2 फीसदी कापर आक्सीक्लोराइड का छिड़काव रोग की रोकथाम में बेहद कारगर होता है.

आम पौध की रोपाई तकनीक और कीटरोगों की रोकथाम

आम की खेती के लिए पौध रोपाई आमतौर पर 10-12 मीटर पर की जा रही है. इस में केवल 70-100 पेड़ एक हेक्टेयर क्षेत्र में लगाए जा सकते हैं. इस प्रणाली के तहत उपलब्ध क्षेत्र या जमीन का बहुत अधिक कुशलता से उपयोग नहीं किया जा सकता है. इस वजह से कम पैदावार मिलती है, वहीं पासपास पौध की रोपाई से बाग को 375-450 से अधिक पेड़ों को रोपा जा सकता है.

पासपास तय दूरी पर बाग लगाने के लिए जमीन के मुहैया होने में लगातार गिरावट, बागबानी ऊर्जा की बढ़ती मांग, ऊर्जा व जमीन की लागत में लगातार गिरावट के नतीजे हैं. पेड़ों की बढ़ी हुई तादाद प्रति हेक्टेयर के अलावा एक उच्च घनत्व वाला बाग, रोपने के बाद 2-3 सालों के भीतर असर में आना चाहिए.

जैसेजैसे पेड़ का घनत्व बढ़ेगा, पैदावार तकरीबन 2,500 टन प्रति हेक्टेयर तक बढ़ जाएगी.

उच्च घनत्व वाले बागों में न केवल शुरुआती सालों में प्रति यूनिट क्षेत्र में अच्छी पैदावार मिलती है, वहीं खालिस मुनाफा भी होता है. अच्छे उर्वरक, खादपानी, पौधों की सुरक्षा के उपायों को अपना कर खरपतवार नियंत्रण पर काबू पाना आसान होता है. इसलिए यह तकनीक  ‘आम्रपाली’ आम के लिए विकसित की गई थी जो आनुवंशिक रूप से बौनी किस्म है. पेड़ों को त्रिकोणीय प्रणाली के साथ (2.5 मीटर × 2.5 मीटर) लगाने की सिफारिश की गई है. इस में प्रति हेक्टेयर 1,600 पेड़ हैं.

यदि मुमकिन हो, तो बाग को साफसुथरी जगह पर लगाया जाना चाहिए. इस प्रणाली में रूटस्टौक्स को सीधे बाग में लगाया जाना चाहिए, जो बाद में खेत में ही तैयार हो जाता है.

पेड़ को झाड़ी का रूप देने के लिए टर्मिनल की शाखाओं से 2 साल के लिए पौधों की छंटाई की जानी चाहिए. 3 साल बाद पौधे फल देना शुरू कर देते हैं.

‘आम्रपाली’ में मुनाफाखोरी है. यह फल के आकार को कम करती है इसलिए फलों के आकार को बढ़ावा देने के लिए पतला होना जरूरी है. 7-8 साल की उम्र के पेड़ से अच्छे फल की उम्मीद की जाती है.

12 साल बाद पेड़ घना हो जाता है जो बदले में फल की पैदावार को कम कर देता है. इसलिए पेड़ों को अच्छी धूप में रखने के लिए सालाना नियमित छंटाई की जरूरत होती है.

ज्यादा आमदनी हासिल करने के लिए पैदावार को बेहतर बनाए रखने के लिए बाग में पोषण प्रबंधन जरूरी है, इसलिए पौधे के विकास के 10 साल बाद पेड़ के प्रत्येक बेसिन में 20-25 किलोग्राम गोबर की सड़ी हुई खाद, 2.17 किलोग्राम यूरिया, 3.12 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट और 2.10 किलोग्राम पोटैशियम सल्फेट डालें.

शुरू के सालों में यानी 1 साल में 10 किलोग्राम सड़ी गोबर की खाद, 217 ग्राम यूरिया, 312 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट और 210 ग्राम पोटैशियम सल्फेट डालें.

फार्म यार्ड खाद और फास्फोरस अक्तूबर माह में ही डाल देना चाहिए. यूरिया और पोटैशियम सल्फेट की आधी खुराक अक्तूबर माह में और बाकी आधी मात्रा जूट की फसल की कटाई (जूनजुलाई माह) के बाद दी जाती है.

जस्ता और मैंगनीज की कमी को पूरा करने के लिए मार्चअप्रैल, जून और सितंबर माह के दौरान 2 फीसदी जिंक सल्फेट और 1 फीसदी चूना डाला जाना चाहिए, वहीं पर्ण स्प्रे द्वारा 0.5 फीसदी मैंगनीज सल्फेट. बोरेक्स 250-500 ग्राम प्रति पेड़ का छिड़काव फलों की क्वालिटी में सुधार करने में मदद करता है.

अप्रैलमई माह में 10 दिनों के अंतराल पर बोरेक्स की 0.6 फीसदी घोल के साथ बोरोन की कमी होने पर छिड़कें. सिंचाई ठीक से होनी चाहिए. ड्रिप सिंचाई अत्यधिक कारगर है और फलों की क्वालिटी में भी सुधार करती है.

कुलतार का प्रयोग

आम के पेड़ में हर साल फल आने व पेड़ की बढ़वार के नियंत्रण के लिए कुलतार यानी पैक्लोब्यूटाजोल का इस्तेमाल किया जाता है. इस के लिए हर पेड़ को उस की सालाना उम्र पर 1 मिलीलिटर कुलतार को 5 लिटर पानी में मिला कर मुख्य तने के चारों ओर मिट्टी में मिला कर हलकी सिंचाई कर देनी चाहिए.

उत्तर भारत में कुलतार के इस्तेमाल का सही समय 15 सितंबर से 15 नवंबर माह माना जाता है. इस के इस्तेमाल से जुलाईअगस्त माह में आई नई शाखाओं पर, फरवरीमार्च माह में फूलों का खिलना व फलना शुरू हो जाता है.

कीट व रोगों की रोकथाम

नाशकीट प्रबंधन : आम के पौधों को नर्सरी से ले कर फल लगने तक तकरीबन दर्जनभर कीटों की प्रजातियां नुकसान पहुंचाती हैं इसलिए इन की रोकथाम बेहद जरूरी है. इन में से मुख्य कीट जैसे भुनगा, गुजिया, डासी मक्खी वगैरह आम की फसल को अच्छाखासा नुकसान पहुंचाती हैं. इन की रोकथाम कुछ इस तरह करनी चाहिए.

भुनगा :

इस कीट की सूंड़ी व वयस्क दोनों ही मुलायम प्ररोहों, प्रत्तियों व फलों का रस चूसते हैं. फूलों पर इस का बुरा असर पड़ता है. इस वजह से फूल सूख कर गिर जाते हैं.

यह कीट एक प्रकार का मीठा रस निकालता है जो पेड़ों की पत्तियों, प्ररोहों वगैरह पर लग जाता है. इस मीठे रस पर काली फफूंदी पनपती है. यह पत्तियों पर काली परत के रूप में फैल कर पेड़ों के प्रकाश संश्लेषण पर बुरा असर डालती है.

रोकथाम :

बाग से खरपतवार हटा कर उसे साफसुथरा रखें. घने बाग की कटाईछंटाई दिसंबर माह में करें. वहीं दूसरी ओर बौर फूटने के बाद बागों की बराबर देखभाल करें.

पुष्प गुच्छ की लंबाई 8-10 सैंटीमीटर होने पर भुनगा कीट का हमला होता है. इस की रोकथाम के लिए 0.005 फीसदी इमिडा क्लोप्रिड का पहली बार छिड़काव करें. 0.005 फीसदी थायोमेथोक्जाम या 0.05 फीसदी प्रोफेनोफास का दूसरा छिड़काव फल लगने के तुरंत बाद करें.

गुजिया :

इस कीट के बच्चे व वयस्क मादा प्ररोहों, पत्तियों व फूलों का रस चूसते हैं. जब इन की तादाद बढ़ जाती है तो इन के द्वारा रस चूसे जाने के चलते पेड़ों के प्ररोह, पत्तियों व बौर सूख जाते हैं और फल नहीं लगते हैं.

यह कीट मीठा रस पैदा करता है, जिस के ऊपर काली फफूंदी पनपती है. इस कीट का प्रकोप दिसंबर से मई माह तक देखा जाता है.

रोकथाम :

खरपतवार और दूसरी घास को नवंबर माह में जुताई कर के निकाल दें. बाग से निकालने से सुसुप्तावस्था में रहने वाले अंडे धूप, गरमी व चींटियों द्वारा खत्म हो जाते हैं.

दिसंबर माह के तीसरे सप्ताह में पेड़ के तने के आसपास 250 ग्राम क्लोरोपाइरीफास चूर्ण 1.5 फीसदी प्रति पेड़ की दर से मिट्टी में मिला देने से अंडों से निकलने वाले निम्फ मर जाते हैं. पौलीथिन की 30 सैंटीमीटर पट्टी पेड़ के तने के चारों ओर जमीन की सतह से 30 सैंटीमीटर ऊंचाई पर दिसंबर में गुजिया के निकलने से पहले लपेटने से निम्फ का पेड़ों पर ऊपर चढ़ना रुक जाता है.

पट्टी के दोनों सिरों को सुतली से बांधना चाहिए. इस के बाद थोड़ी ग्रीस पट्टी के निचले घेरे पर लगाने से गुजिया को पट्टी पर चढ़ने से रोका जा सकता है. यह पट्टी बाग में स्थित सभी आम के पेड़ों व दूसरे पेड़ों पर भी बांधनी चाहिए.

यदि किसी कारणवश गुजिया पेड़ पर चढ़ गई है तो ऐसी अवस्था में 0.05 फीसदी कार्बोसल्फान 0.2 मिलीलिटर प्रति लिटर या 0.06 फीसदी डाईमिथोएट 2.0 मिलीलिटर प्रति लिटर का छिड़काव करें.

पुष्प गुच्छ मिज :

आम के पौधों पर मिज के प्रकोप से 3 चरणों में नुकसान होता है. इस का पहला प्रकोप कली के खिलने की अवस्था में होता है. नए विकसित बौर में अंडे दिए जाने व लार्वा द्वारा बौर के मुलायम डंठल में घुसने से बौर पूरी तरह से खराब हो जाते हैं. पूरी तरह विकसित लार्वा बौर के डंठल से निकलने के लिए छेद बनाते हैं. इस का दूसरा प्रकोप फलों के बनने की अवस्था में होता है. फलों में अंडे देने और लार्वा के घुसने के फलस्वरूप फल पीले हो कर गिर जाते हैं और तीसरा प्रकोप बौर को घेरती हुई पत्तियों पर होता है.

रोकथाम :

अक्तूबरनवंबर माह में बाग में की गई जुताई से मिज की सूंडि़यों के साथ सुसुप्तावस्था में पड़े प्यूपा खत्म हो जाते हैं. जिन बागों में इस कीट का असर होता रहा है, वहां बौर फूटने पर 0.06 फीसदी डाईमिथोएट का छिड़काव करना चाहिए.

वहीं, अप्रैलमई माह में 250 ग्राम क्लोरोपाइरीफास चूर्ण प्रति पेड़ के हिसाब से छिड़काव करने पर पेड़ के नीचे सूंडि़यां नष्ट हो जाती हैं. फरवरी माह में भुनगा कीट के लिए किए जाने वाले कीटनाशी छिड़काव से इस कीट का भी नियंत्रण हो जाता है.

डासी मक्खी :

प्रौढ़ मक्खियां अप्रैल माह में जमीन से निकल कर पके फलों पर अंडे देती हैं. एक मक्खी 150 से 200 तक अंडे देती है. 2-3 दिन के बाद सूंडि़यां अंड़ों से निकल कर गूदे को खाना शुरू कर देती हैं. इस कीट की सूंडि़यां आम के गूदे खा कर उसे एक सड़े अर्धतरल बदबूदार पदार्थ के रूप में बदल देती हैं.

रोकथाम :

इस कीट के प्रकोप के असर को कम करने के लिए सभी गिरे हुए फल और मक्खी के प्रकोप से ग्रसित फलों को इकट्ठा कर जला देना चाहिए.

पेड़ों के आसपास सर्दियों में जुताई करने से जमीन में मौजूद प्यूपा को खत्म किया जा सकता है, वहीं लकड़ी की बनी यौनगंध टैंप को पेड़ पर लगाना काफी कारगर है.

इस टैंप के लिए प्लाइवुड के 5×5×1 सैंटीमीटर आकार के गुटके को 48 घंटे तक 6:4:1 के अनुपात में अल्कोहल : मिथाइल यूजीनौल : मैलाथियान के घोल में भिगो कर लगाना चाहिए. यौनगंध टैंप को 2 माह के अंतराल पर बदलना चाहिए. 10 टैंप प्रति हेक्टेयर लटकाने चाहिए.

रोग की रोकथाम :

आम के पेड़ों में नर्सरी से ले कर फल लगने तक तमाम रोग लगते हैं जो पौधे के तकरीबन हरेक भाग को प्रभावित कर नुकसान पहुंचाते हैं. फल भंडारण के दौरान भी तमाम रोगों का प्रकोप होता है जो फलों में सड़न पैदा करते हैं. इसलिए इस के लक्षण व रोकथाम की जानकारी होना बेहद जरूरी है.

पाउडरी मिल्ड्यू :

इस रोग के लक्षण बौर, पुष्प गुच्छ की डंडियों, पत्तियों व नए फलों पर देखे जा सकते हैं. इस रोग का खास लक्षण सफेद कवक या चूर्ण के रूप में दिखाई देता है.

नई पत्तियों पर यह रोग आसानी से दिख जाता है, जब पत्तियों का रंग भूरे से हलके हरे रंग में बदलता है. नई पत्तियों पर ऊपरी और निचली सतह पर छोटे सलेटी रंग के धब्बे दिखाई देते हैं जो निचली सतह पर ज्यादा साफ दिखते हैं.

बौरों पर यह रोग सफेद चूर्ण की तरह दिखाई पड़ता है और बोरों में लगे फूलों के झड़ने की वजह बनता है. भीतरी दल के मुकाबले बाहरी दल इस से ज्यादा प्रभावित होते हैं. ग्रसित होने पर फूल नहीं खिलते हैं और समय से पहले ही झड़ जाते हैं. नए फलों पर पूरी तरह सफेद चूर्ण फैल जाता है और मटर के दाने के बराबर हो जाने के बाद फल पेड़ से झड़ जाते हैं.

रोकथाम :

पहला छिड़काव 0.2 फीसदी घुलनशील गंधक का घोल बना कर उस समय करना चाहिए जब बोर 3-4 इंच का होता है. दूसरा छिड़काव 0.1 फीसदी डिनोकेप का होना चाहिए, जो पहले छिड़काव के 15-20 दिन बाद हो. दूसरे छिड़काव के 15-20 दिन बाद तीसरा छिड़काव 0.1 फीसदी टाइडीमार्फ का होना चाहिए.

एंथ्रेक्नोज :

यह रोग पत्तियों, टहनियों, मंजरियों और फलों पर देखा जा सकता है. पत्तियों की सतह पर पहले गोल या अनियमित भूरे या गहरे भूरे रंग के धब्बे बनते हैं. प्रभावित टहनियों पर पहले काले धब्बे बनते हैं और फिर पूरी टहनी या पर्णवृंत सलेटी काले रंग की हो जाती है. पत्तियां नीचे की ओर झुक कर सूखने लगती हैं और आखिर में गिर जाती हैं.

बौर पर सब से पहले पाए जाने वाले लक्षण हैं, गहरे भूरे रंग के धब्बे, जो कि फूलों और पुष्पवृंतों पर प्रकट होते हैं. बौर व खिले फूलों पर छोटे काले धब्बे उभरते हैं जो धीरेधीरे फैलते हैं और आपस में जुड़ कर फूलों को सुखा देते हैं. अधिक नमी होने पर यह कवक तेजी फैलता है.

रोकथाम :

सभी रोग से ग्रसित टहनियों की छंटाई कर देनी चाहिए. बाग में गिरी हुई पत्तियों, टहनियों और फलों को इकट्ठा कर जला देना चाहिए. मंजरी संक्रमण को रोकने के लिए 0.1 फीसदी कार्बंडाजिम का 2 बार छिड़काव 15 दिनों के अंतराल पर करने से इस रोग को नियंत्रित किया जा सकता है.

पर्णीय संक्रमण को रोकने के लिए 0.3 फीसदी कौपर औक्सीक्लोराइड का छिड़काव कारगर है. 0.1 फीसदी थायोफेनेट मिथाइल या 0.1 फीसदी कार्बंडाजिम का बाग में फल की तुड़ाई से पहले छिड़काव करने से अंदरूनी संक्रमण को कम किया जा सकता है.

उल्टा सूखा रोग :

टहनियों का ऊपर से नीचे की ओर सूखना इस रोग का मुख्य लक्षण है. खासतौर पर पुराने पेड़ों में बाद के पत्ते सूख जाते हैं जो आगे से झुलसे हुए से मालूम पड़ते हैं. शुरू में नई हरी टहनियों पर गहरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं. जब ये धब्बे बढ़ते हैं, तब नई टहनियां सूख जाती हैं. ऊपर की पत्तियां अपना हरा रंग खो देती हैं. इस रोग का साफसाफ असर अक्तूबरनवंबर माह में दिखाई पड़ता है.

रोकथाम :

छंटाई के बाद गाय का गोबर व चिकनी मिट्टी मिला कर कटे भाग पर लगाना फायदेमंद होता है. संक्रमित भाग से 3 इंच नीचे से छंटाई करने के बाद बोर्डो मिश्रण 5:5:50 या 0.3 फीसदी कौपर औक्सीक्लोराइड का छिड़काव अधिक प्रभावशाली है.

यह भी ध्यान रखें कि कलम के लिए इस्तेमाल में आने वाली सांकुर डाली रोग से ग्रसित न हो.

ऐसे सीख सकते हैं बागबानी करना जो व्यक्ति इस काम में नए हैं, उन को पहले बागबनी की ट्रेनिंग ले लेनी चाहिए. ट्रेनिंग लेने के लिए केंद्रीय उपोष्ण बागबानी संस्थान, रहमान खेड़ा, काकोरी, लखनऊ से संपर्क कर सकते हैं या फिर आप अपने जिले के उद्यान विभाग से भी संपर्क कर दूसरे बागबानी संस्थानों पर जा कर ट्रेनिंग ले सकते हैं. इस के लिए प्रदेश सरकार समयसमय पर किसानों को सहयोग भी करती है.

ट्रेनिंग के बाद यही काम आप दूसरों को भी सिखा सकते हैं और अतिरिक्त आमदनी ले सकते हैं. अच्छा उत्पादन हासिल करने के बाद बाजार में भेज कर अच्छा मुनाफा कमाने के साथसाथ स्वयंसहायता समूह बना कर आम से बनने वाली दूसरी चीजें भी बना सकते हैं और दूसरों को भी रोजगार दे सकते हैं.

आम के बाग में बरतें कुछ जरूरी निर्देश

*           आम के नए और सघन बाग लगाने से पहले सभी जरूरी चीजों की सटीक जानकारी ले लेनी चाहिए.

*           किसानों को हमेशा ये बातें ध्यान रखनी चाहिए कि पुरानी पद्धतियों के साथसाथ उन्हें नई तकनीक को अपनाने में संकोच नहीं करना चाहिए.

*           जब भी मौका मिले, बागबानी करने वालों और उद्यान विशेषज्ञों से समयसमय पर सलाह लेते रहना चाहिए. उन के द्वारा सुझाए गए उपायों को अमल में लाना चाहिए.

*           बाग से समयसमय पर खरपतवार निकालते रहना चाहिए.

*           पौधों के लिए महत्त्वपूर्ण है समय पर सिंचाई करना. इस का लगातार ध्यान रखना चाहिए.

*           सिंचाई के लिए बूंदबूंद टपक सिंचाई व्यवस्था अच्छी मानी गई है.

*           अच्छी पैदावार हासिल करने के लिए कीट व रोगों का नियंत्रण बेहद जरूरी है.