लोकतंत्र या राजतंत्र : किसान और मजदूर जनता की लाचारी

बस्तर : बस्तर में आए दिन किसी न किसी वीआईपी का दौरा लगा रहता है. एक बार फिर बस्तर में माननीय महामहिम का दौरा हुआ. शहर फिर से ठहर गया. मुख्य सड़कें खाली करवा दी गई. शहर की गलियों को मुख्य सड़क से जोड़ने वाले मुहानों पर शस्त्रधारी सुरक्षाकर्मी पहरे पर मुस्तैद, मजाल है कि कोई भी आम आदमी मुख्य सड़क पर पहुंच पाए. हर कोई अपने घरों में या ज्यादा से ज्यादा अपनेअपने मोहल्ले में कैद, काम धाम सब बंद. राष्ट्रीय राजमार्ग से गुजरने वाले वाहनों, यात्रियों से भरी बसों, ट्रकों की मीलों लंबी कतारें, शहर सीमा के बाहर दोनों ओर अड़ियल बैरिकेड्स के सामने सहमीसहमी सी ठहरी हुई आवाज से लोग एक दुसरे से पूछते हैं, महामहिम आए क्या? सड़क कब तक खुलने वाली है?

फिर कुछ घंटे बीतने के बाद लोग व्याकुल हो कर पूछने लगते हैं, क्या महामहिम अभी भी नहीं गए? बस्तर के लिए यह कोई नई बात नहीं है. अब तो यह बस्तर के लिए मानो ‘साप्ताहिक अनिवार्य कर्फ्यू’ जैसा हो गया है.

कभी राज्यपाल, कभी मुख्यमंत्री, कभी विभिन्न विभागों के मंत्री, प्रभारी मंत्री, अनगिनत बोर्ड्स, आयोगों के चेयरमैन, विभिन्न मंत्रालयों के मुख्यसचिव, संयुक्त सचिव, अवर सचिव वगैरावगैरा. सब के सब आदिवासियों के ‘कल्याण’ का झोला उठाए बस्तर आते हैं और बदले में यहां के जनजीवन को अघोषित कर्फ्यू की बेड़ियों में जकड़ कर लौट जाते हैं और पीछे छूट जाता है, बंद अस्पताल का गेट, रुकी हुई एंबुलेंस, स्कूल को जाती रोती बच्ची और आदिवासी युवक की गिरफ्तारी जो समय पर खेत पर या अपने काम पहुंचना चाहता था, या फिर अपने खेतों में उगाई सब्जियां शहर ला कर बेचने की कोशिश कर रहा था, पर उसे पता नहीं था कि उस के शहर में महामहिम पधारने वाले हैं.

बस्तर इन के लिए बस ‘दर्शनीय’ है, यहां रहने, जीने योग्य नहीं. यहां के बेल मेटल शिल्प, लकड़ी की मूर्तियां, कोसा सिल्क, झरने और भोलेभाले आदिवासी नृत्य इन सब का लुत्फ उठाने महामहिम, वीआईपीज आते हैं. उन्हें ये सब ‘एग्जौटिक’ लगता है. लेकिन यहां रहना, जीना, पढ़ाना, इलाज कराना, काम पाना ये सब उन के एजेंडे में नहीं होते.

अगर हर दौरे के बदले एक स्कूल या अस्पताल खुला होता, या किसानों के खेतों में पानी की व्यवस्था की गई होती, तो आज बस्तर जापान, अमेरिका से प्रतिस्पर्धा कर रहा होता. शहर में इन महामहिमों के आते ही ऐसा लगता है, जैसे नागरिकों का अपहरण कर लिया गया हो. सड़कें सील, रास्ते बंद, छावनी में बदले चौक चौराहे, पुलिस की सख्त घेराबंदी, और ऊपर से आदेश  “कोई मुख्य सड़कों पर दिखाई ना दे”. लगता है, जैसे बस्तर किसी गुप्त सैन्य परीक्षण का केंद्र बन गया है. “लोकतंत्र का वह कौन सा स्वरूप है भाई, जहां महामहिमों, मंत्रियों, वीआईपीज के आते ही संविधान मौन हो जाता है?”

असल में जनता को अपनी स्वतंत्रता त्यागने की आदत हो गई है.पिछले 70 सालों में इतनी बार इन महामहिमों की सवारी हमारे कंधों से गुजरी है कि अब उन कंधों पर छाले हैं, पर मन में सवाल नहीं. हमें अब वीआईपी तानाशाही का आदी बना दिया गया है.

अब जब कोई हाईवे बंद होता है तो दिहाड़ी कमाने निकले मजदूर को वापस खदेड़ दिया जाता है, स्कूल को निकले बच्चों को वापस लौटा दिया जाता है, रोज कुआं खोद कर पानी पीने वाले ठेलेरेहड़ी वालों को सड़कों से धकेल कर गलियों में मानों कैद कर दिया जाता है या किसी मरीज या किसी गर्भवती महिला को अस्पताल पहुंचने से रोका जाता है, तो लोग मन मसोसकर इसे स्वीकार कर लेते हैं. “प्रजा की यह सहनशीलता और उदासीनता ही असली विडंबना है, क्योंकि शोषण का पहला कदम होता है मौन.”

शाही सवारी, लाचार प्रजा : जब करोड़ों की गाड़ियों में दर्जनों हुंकारते वाहनों के काफिले के साथ महामहिम और वीआईपीज बस्तर दर्शन को निकलते हैं, तो उन के साथ स्पीडिंग सायरन, रेंगती गाडियां और सड़कों से गायब कर दी गई जनता होती है.

“जिस राज्य में आंगनबाड़ी की छत टपकती हो, वहां राजभवन, मंत्रियों, हुक्मरानों के वातानुकूलित राजसी ड्राइंग रूम शर्मसार ही करते हैं.”

दर्शनीय आदिवासी : एक लोकतांत्रिक तमाशा : महामहिमों के सामने ‘मौडल आदिवासी’ पेश किए जाते हैं. लंगोटी, बंडी, धोतीकुरता पहने, जबरिया मुस्कराते, नाचतेगाते,गेड़ी पर करतब दिखाते, पसीने से लथपथ जैसे कि उन्हें ‘राष्ट्रीय विरासत’ के रूप में प्रदर्शन के लिए प्रशिक्षित किया गया हो.

“आदिवासी का जीवन नहीं बदला, पर उस का ‘वेलकम डांस’ एचडी क्वालिटी में सोशल मीडिया के लिए रिकौर्ड हो रहे हैं.”

इन वीआईपीज दौरों का सब से बड़ा विडंबनात्मक सत्य यह है कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों के हनन के लिए कोई औपचारिक आदेशपत्र नहीं आता, कोई आधिकारिक धारा 144 लागू नहीं होती, कोई आधिकारिक ‘कर्फ्यू’ नहीं होता, पर हाईवे,चौक चौराहों सहित सब लाठी के जोर पर बंद करवा दिया जाता है.

राज्यपाल व चुने गए जन प्रतिनिधि संविधान के संरक्षक माने जाते हैं. जनप्रतिनिधि तो चुनाव के वक्त आप के दरवाजे पर हाथ जोड़ कर खड़े हो कर वोट की भीख मांगते हैं. लेकिन जब उन्हीं के आगमन पर जनता का मौलिक अधिकार बंद कमरे में लौक कर दिया जाए, तो क्या यह ‘राज्य का उत्सव’ है या ‘संविधान की शवयात्रा’? आखिर ये जनप्रतिनिधि आम आदमियों की तरह सड़क से क्यों नहीं गुजर सकते. जनता के सेवक को भला जनता से कैसा भय? प्रजातंत्र में अगर प्रजा मालिक है और जनप्रतिनिधि जनता के सेवक हैं तो सेवक के आगमन पर मालिक यानी आम नागरिक को सड़क से क्यों खदेड़ दिया जाता है. 

अमरीका में 254, भारत में 5,79,000 वीआईपीज : विश्व के सब से बड़े प्रजातंत्र और सब से ज्यादा धनी देश अमेरिका में मात्र 254 वीआईपीज हैं, जबकि हमारे भारत में 5,79,000 से ज्यादा वीआईपीज अर्थात ‘अत्यंत महत्त्वपूर्ण व्यक्ति’  हैं. यानी कि हमारे यहां अमरीका से 2,300 गुना अधिक वीआईपीज हैं.

विभिन्न देशों में वीआईपीज की संख्या निम्नानुसार :

    1. फ्रांस – 109
    2. जापान – 125
    3. जर्मनी – 142
    4. आस्ट्रेलिया – 205
    5. अमेरिका – 254
    6. रूस – 312
    7. चीन – 435
    8. भारत – 5,79,092

अन्य मामलों में हमारा देश भले अव्वल ना हो पर वीआईपीज के मामले में हम निश्चित रूप से नंबर वन हैं. कुल दुनिया भर के सभी देशों में मिल कर जितने वीआइपी होंगे उस से ज्यादा तो अकेले हमारे देश में ही भरे पड़े हैं.

भारत जैसे गरीब लोकतांत्रिक देश, जहां आज भी लाखों बच्चे कुपोषण से मरते हैं, किसान आत्महत्या करते हैं, अस्पतालों में बेड नहीं, स्कूलों में शिक्षक नहीं; वहां यह ‘राज्यपाल प्रणाली’ केवल औपनिवेशिक नकल की मानसिक विकृति है. संविधान के ‘संरक्षण’ की जिम्मेदारी जिन के सिर पर है, वे स्वयं संविधान को सब से पहले रौंदते हैं.

अब समय आ गया है कि हम इस अनुपयोगी, अत्यंत खर्चीले, गैर लोकतांत्रिक ढांचे की पुनर्समीक्षा करें. क्योंकि यह न सिर्फ आर्थिक दृष्टि से दायित्वहीन है, बल्कि समाजशास्त्रीय और संवैधानिक दृष्टि से लोकतंत्र का अपमान है.

हमें यह भी तय करना पड़ेगा कि हम प्रजाजनों की तरह व्यवहार करते रहेंगे, या नागरिकों की तरह बोलना भी शुरू करेंगे. देश ने राजशाही अब बहुत देख भी लिया और झेल भी लिया.

अब “न ये बिना ताज के राजा चाहिए, न गरीब जनता के खून पसीने के पैसों से खरीदे गए गए उन के ये अशोभनीय भौंडे राजसी ठाटबाट. जनता को चाहिए, केवल एक उत्तरदायी शासन.”

अंत में राजा का सुख प्रजा के सुख में होना चाहिए, क्योंकि प्रजा का हित ही राजा का असली हित है.

(लेखक डा. राजाराम त्रिपाठी, ग्रामीण अर्थशास्त्र एवं कृषि मामलों के विशेषज्ञ और राष्ट्रीय संयोजक, अखिल भारतीय किसान महासंघ ‘आईफा’)

Inspiring Personalities : पशुपालन ही नहीं रोजगार भी दे रही है संध्या सिंह

Inspiring Personalities : संध्या सिंह (Sandhya Singh) उत्तरप्रदेश के गांव सरौनी, जिला जौनपुर की रहने वाली हैं, जिन्होंने पोस्ट ग्रेजुएट तक शिक्षा हासिल की है और पशुपालन के क्षेत्र में बड़ा कारनामा हासिल किया है. खुद पशुपालन कर लाखों की कमाई कर रही है, इस के अलावा अपने एफपीओ कृषक प्रोडयूसर कंपनी के जरिए अनेक लोगों को रोजगार भी मुहैया करा रही हैं.

संध्या सिंह (Sandhya Singh) पशुपालन करने के साथसाथ खाद प्रसंस्करण पर निशुल्क ट्रेनिंग देने का भी काम कर रही हैं जहां से सैंकड़ों महिलाओं ने सीखकर आज खुद का काम कर रोजगार प्राप्त कर रही हैं.

फूड प्रोसैससिंग के जरिए वह दूसरी महिलाओं को बड़े पैमाने पर अचार, मुरब्बा, पेठा, जैम, जैली आदि बनाना भी सिखाती हैं. जिस की मदद से कई महिलाएं अच्छी कमाई कर रही हैं.

उन्होंने बताया कि उन के पास इस समय लगभग 200 से अधिक देशी, साहिवाल और गिर नस्ल की गायें है. साथ ही, जमुनापारी, सिरोही और बरबरी नस्ल की लगभग 25 बकरियां हैं. जिस से वह सैंकड़ों लिटर दूध उत्पादन ले कर अच्छी कमाई कर रही है. इस के अलावा वह मुरगीपालन भी करती हैं. जिस में वह कैरी और सोनाली नस्ल की मुरगियोंका पालन करती  हैं.

Sandhya Singh

संध्या सिंह (Sandhya Singh) ने बताया कि पशुपालन में वह पशुओं का रहनसहन और उन के टीकाकरण का खास ध्यान रखती हैं. सभी पशुओं के खानपान पर लगभग 9 हजार प्रतिदिन का खर्च आता है. इस के साथ ही, अलगअलग प्रकार से पशुओं के रहने की व्यवस्था भी अलगअलग तरह से की जाती है. जिस में नवजात पशुओं को अलग, सांडो को अलग, सालभर चारे का प्रबंधन, गरमी सर्दी और बरसात के अनुसार उन के रहने की व्यवस्था का भी खास ध्यान रखा जाता है.

इस के साथ ही, समयसमय पर पशुओं को टीकाकरण में खुरपका मुंहपका, तिल्ली ज्वर, लंगड़ा बुखार और गला घोटूं का टीका लगवाया जाता है. जिस से पशु स्वस्थ रहे और गुणवत्ता युक्त दूध उत्पादन लिया जा सके.

पशुओं द्वारा खाना छोड़ देने पर 100 किलोग्राम मिश्रित दाने के साथ 250 ग्राम सोडियम बाकार्बोनेट दिया जाता है. पशु में कृमि की समस्या होने पर खासतौर पर कृमि नाशक एल्बेंडाजोल और आइवरमेक्टिन का उपयोग किया जाता है. इस के साथ ही, पशुओं की आने वाली नस्ल बेहतर हो इस के लिए स्वस्थ और शुद्ध नस्ल के सांड द्वारा प्राकृतिक गर्भधान एवं कृत्रिम गर्भधान कराया जाता है.

संध्या सिंह (Sandhya Singh) ने बताया कि वह पशुपालन का सब से बड़ा फायदा यह भी है कि हम उस साल वर्मी कंपोस्ट, चारा उत्पादन, गोबर से हवन के उपले का उत्पादन कर लगभग 80 लोगों को रोजगार भी दे रहे हैं और खुद भी 60 से 70 हजार हर महीने की अतिरिक्त कमाई भी कर रहे हैं.

इस काम के लिए संध्या सिंह (Sandhya Singh) को समयसमय पर कृषि विज्ञान केंद्र जौनपुर के कृषि वैज्ञानिकों और पशु वैज्ञानिकों का भी सहयोग मिलता रहा है.

Farming Schemes : खेती योजनाओं की भरमार,किसानों को जानकारी नहीं

Farming Schemes : सरकारें किसानों की हिमायती बनने का दिखावा कर के उन को लुभानेरिझाने में लगी हैं, इसलिए हर रोज नई स्कीमों के फरमान जारी हो रहे हैं. नेता गाल और अफसर खड़ताल बजा रहे हैं. यह बात अलग है कि ज्यादातर किसान आज भी बदहाल हैं, क्योंकि बहुत से किसानों को सरकारी स्कीमों का फायदा मिलना तो दूर उन्हें पता तक नहीं चलता, क्योंकि निकम्मे व भ्रष्ट सरकारी मुलाजिम किसानों को उन के फायदे की योजनाओं की कानोंकान खबर तक नहीं लगने देते.

सरकारी योजनाओं के ज्यादातर घोड़े कागजों पर दौड़ते हैं. छुटभैए नेता और बिचौलियों की मिलीभगत से हिस्साबांट हो जाता है. सरकारी स्कीमों की छूट व सहूलियतों का फायदा लेने के लिए किसानों को खुद ही जागना होना. अपनी जानकारी बढ़ाने के लिए उन्हें पत्रपत्रिकाओं का सहारा लेना पड़ेगा.

नईनई तकनीकें सीख कर खेती की लागत घटे, बेहतर इंतजाम से नुकसान घटे व प्रोसैसिंग से आमदनी बढ़े, ऐसी बातें सीखनी होंगी. खेती में कम आमदनी की अहम वजह सही जानकारी की कमी भी है.

दर्जनों स्कीमें

खाद, बीज, कीड़ेमार दवा व खेती की मशीनें उधार लेने के लिए हर बार किसानों को कर्ज लेने के पहले अपनी खेती के कागज जमा कराने पड़ते हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश में अब ऐसा नहीं है. ज्यादातर किसान नहीं जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में खेती महकमे की स्कीमों का फायदा लेने के लिए ह्वश्चड्डद्दह्म्द्बष्ह्वद्यह्लह्वह्म्द्ग.ष्शद्व पर महज एक बार औनलाइन रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी है. फिर इस के बाद बारबार कागज जमा कराने का झंझट खत्म.

किसान अपनी जमीन की खतौनी, आधारकार्ड व बैंक पासबुक की फोटोकौपी ले कर अपने जिले में खेती महकमे के दफ्तर, जनसेवा केंद्र या साइबर कैफे में यह काम करा सकते हैं.

अगर इस तरह की बुनियादी जानकारी किसानों को मिले तो सरकारी स्कीमों का फायदा आसानी से लिया जा सकता है.

उत्तर प्रदेश में किसान अपने खेत से मिट्टी का नमूना ले कर बिना कुछ खर्च किए ही खेती महकमे की लैब से उस की जांच करा सकते हैं. इस की जानकारी ब्लौक दफ्तर के सहायक विकास अधिकारी, कृषि से ली जा सकती है. मृदा स्वास्थ्य कार्ड पर दर्ज जांच रिपोर्ट के आधार पर खेत की मिट्टी में जिन चीजों की कमी हो, जरूरी खुराक खेत में डाल कर किसान अपनी पैदावार व आमदनी में इजाफा कर सकते हैं.

Farming Schemesमशीनों पर छूट

खेती में समय और मेहनत बचा कर बेहतर काम के लिए मशीनों का इस्तेमाल करना बहुत ही फायदेमंद साबित हुआ है इसलिए सरकार उन की खरीद पर माली इमदाद देती है ताकि ज्यादा से ज्यादा किसान उन्हें खरीद सकें.

छोटे किसानों को खेती की मशीनें किराए पर मुहैया कराने के लिए अगर 8-10 किसान मिल कर अपना एक समूह बनाएं तो वे अपना खुद का कस्टम हायरिंग सैंटर या फार्म मशीनरी बैंक खोल सकते हैं.

सिंचाई में सहायता

गांव में अमूमन बिजली कम ही आती है. बिजली आए भी तो वोल्टेज कम आती है. उधर डीजल की बढ़ती कीमतों ने फसलों की सिंचाई को महंगा कर दिया है. ऐसे में सोलर पंप सैट का इस्तेमाल करना फायदेमंद है.

किसान अगर बोरिंग खुद करा लें तो 2, 3 व 5 हौर्सपावर का सोलर पंप लगाने पर उत्तर प्रदेश का खेती महकमा 40 से 70 फीसदी तक की छूट देता है.

जमीन के अंदर का पानी सब से ज्यादा फसलों की सिंचाई में खर्च होता है. पानी की कमी वाले इलाकों में फव्वारा यानी स्प्रिंकलर सिस्टम को बढ़ावा दिया जा रहा है.

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केंचुआ खाद में माली इमदाद

कैमिकल खाद के अंधाधुंध इस्तेमाल ने जमीन की सेहत को काफी हद तक खराब कर दिया है इसलिए केंचुओं की खाद यानी वर्मी कंपोस्ट के उत्पादन व इस्तेमाल पर खासा जोर दिया जा रहा है.

खेती का कचरा यानी अवशेष (पराली) का इस्तेमाल कंपोस्ट बना कर जमीन की उपजाऊ ताकत को बढ़ाने में बखूबी किया जा सकता है, जबकि इस को जलाने से माहौल खराब होता है.

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना से अलग राष्ट्रीय पशुधन बीमा योजना में पशुपालक जानवरों के नजदीकी अस्पताल में  बीमा करा सकते हैं.

सावधानी

गौरतलब है कि सभी स्कीमों में दी जाने वाली छूट किसानों के बैंक खातों में जमा की जाती है इसलिए अपना बैंक खाता जरूर चालू रखें. साथ ही, जो भी चीज नकद या उधार कृषि विभाग के स्टोर से खरीदें, उस की पक्की रसीद जरूर लें वरना छूट नहीं मिलेगी. किसान गूगल प्ले स्टोर से यूपी पारदर्शी किसान नामक मोबाइल एप भी डाउनलोड कर सकते हैं.

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दूसरे राज्यों में भी हैं ये सुविधाएं

उत्तर प्रदेश में 1 लाख रुपए तक, महाराष्ट्र में डेढ़ लाख रुपए तक, राजस्थान, कर्नाटक, मध्य प्रदेश व पंजाब में 2-2 लाख रुपए तक किसानों के कर्ज माफ किए गए हैं. महाराष्ट्र में कर्ज चुकाने वालों को 25,000 रुपए तक की माली इमदाद दी जाती है. पंजाब में खुदकुशी करने वाले किसानों के परिवारों को 5 लाख रुपए का मुआवजा दिया जाता है.

ओडि़सा में रबी खरीफ की फसल पर 5-5 हजार रुपए प्रति एकड़ खेती से जुड़े कामधंधों के लिए 12,500 रुपए, 2 लाख रुपए का दुर्घटना बीमा, बूढ़े किसानों को 10,000 रुपए व 50,000 रुपए तक बिना ब्याज के कर्ज की सहूलियत दी जा रही है. झारखंड में खरीफ की फसल पर 5,000 रुपए प्रति एकड़ की इमदाद दी जा रही है.

तेलंगाना में किसानों के लिए 24 घंटे मुफ्त बिजलीपानी मिलता है. बीते दिनों 7 अरब रुपए के पानी के बिल माफ किए गए हैं. साल में 2 फसलों के लिए 4,000 रुपए प्रति एकड़ की माली इमदाद व 5 लाख रुपए की दुर्घटना बीमा की सहूलियत दी जाती है. पश्चिम बंगाल में किसानों की फसल बीमा का प्रीमियम व किसानों की मौत पर उन के परिवार को 2 लाख रुपए का मुआवजा दिया जाता है. खेती महकमे के दफ्तर से किसान ज्यादा जानकारी हासिल कर सकते हैं.

डीजल इंजन (Diesel Engine) खरीदने में धोखा न खाएं

Diesel Engine : गांवों में बिजली कम आती है और जब आती है, तो अकसर वोल्टेज सही नहीं आता. लिहाजा खेतीकिसानी के बहुत से काम वक्त पर ठीक से पूरे नहीं हो पाते. मजबूरन किसानों को डीजल से चलने वाले इंजन का सहारा लेना पड़ता है. डीजल इंजन (Diesel Engine) खेतीकिसानी से जुड़े बहुत से कामधंधों में काम आता है.

सिंचाई के पंपसैट, सबमर्सिबल पंप, जनरेटर, थ्रैशर, आटा चक्की, धान मशीन, गन्ना कोल्हू, आरा मशीन, इंटर लाकिंग टाइल्स प्लांट व तेल का स्पेलर आदि मशीनें चलाने में डीजल इंजन का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर किया जाता है. इसीलिए डीजल इंजन को किसानों का सच्चा साथी भी कहा जाता है.

डीजल इंजन (Diesel Engine) खरीदते समय पूरी सूझबूझ व सावधानी बरतना बहुत जरूरी है. दरअसल, बाजार में बहुत से ब्रांड के डीजल इंजनों की भरमार है, लिहाजा आम किसान इंजन खरीदते समय चकरा जाते हैं. ज्यादातार किसान इनाम के लालच या दुकानदारों की चिकनीचुपड़ी बातों के झांसे में आ कर कोई भी डीजल इंजन खरीदने का फैसला कर बैठते हैं.

तकनीक में लगातार हो रही तरक्की के कारण अब नए किस्म के डीजल इंजन आसानी से स्टार्ट होने लगे हैं. आयशर आदि मशहूर कंपनियों के बनाए  हुए 46 हार्स पावर तक की कूवत के दमदार एयर कूल्ड इंजन अपने देश में आसानी से मिलने लगे हैं, मगर ज्यादातर किसानों को उन की असलियत के बारे में पूरी जानकारी नहीं होती है.

बरतें सावधानी

यह सच है कि बाजार में ग्राहकों को खूब ठगा जाता है. चालाक दुकानदार मुनाफा कमाने के चक्कर में बहुत सफाई से भोले ग्राहकों को चूना लगा देते हैं. खासतौर पर कम पढ़ेलिखे व भोले किसानों के साथ तो कई बार बहुत ही ज्यादती होती है. लिहाजा खरीदारी करते समय बहुत चौकस रहना लाजिम होता है.

किसानों को यह पहले ही तय कर लेना चाहिए कि उन्हें कौनकौन से काम डीजल इंजन से करने हैं और कामों को करने के लिए कितनी कूवत यानी हार्स पावर का इंजन लेना ठीक रहेगा. गौरतलब है कि कम हार्स पावर के इंजन से ज्यादा भारी काम लेने पर इंजन बैठ जाता है और ज्यादा हार्स पावर के इंजन से कम काम लेने से डीजल का खर्च ज्यादा आता है.

आमतौर पर डीजल इंजन 2 तरह के आते हैं, एयर कूल्ड व वाटर कूल्ड यानी एक हवा से ठंडा होने वाला और दूसरा पानी से ठंडा होने वाला. किसान पैसे व जरूरत के मुताबिक इंजन चुन सकते हैं.

सूझबूझ से करें फैसला

इंजन खरीदते समय जल्दबाजी न करें. हालांकि भीड़ में से उम्दा क्वालिटी का बेहतर इंजन छांट कर चुनना हर किसी के लिए आसान नहीं होता. लिहाजा अपने आसपास के जिन किसानों के पास डीजल इंजन हो, उन से पूरी मालूमात जरूर करें. उन के इंजन की खूबियों व दिक्कतों के तजरबे आप के काम आ सकते हैं. पूरी व सही जानकारी न होने से कई बार किसान बाजार में मात खा जाते हैं.

अकसर पूरी कीमत चुकाने के बाद भी घटिया क्वालिटी का इंजन किसानों के मत्थे मढ़ दिया जाता है. लिहाजा बहुत सोचसमझ कर फैसला करें.

याद रखें कि लोकल कंपनी के डीजल इंजन नामचीन कंपनी के इंजनों के मुकाबले सस्ते होते हैं, लेकिन उन की क्वालिटी घटिया होने से उन में घिसावट जल्दी व ज्यादा होती है. वे जल्दी खराब होते हैं. बारबार कारीगर के पास ले जा कर उन की मरम्मत करानी पड़ती है.

डीजल इंजन हमेशा अच्छी साख वाली दुकान या एजेंसी से व नामचीन कंपनी का व आईएसआई निशान वाला ही खरीदना चाहिए. नकली इंजन बेचने वाले किसानों को भरमाने के लिए आईएसआई के निशान का जाली स्टीकर लगाए रखते हैं, लेकिन उस में अंग्रेजी में एज आईएसआई यानी आईएसआई जैसा लिखा रहता है. लिहाजा चौकस रहें और किसी के बहकावे में कतई व भूल कर भी न आएं.

सस्ते पर न रीझें

लोकल कंपनी का सस्ता इंजन खरीदने में कुछ धन जरूर बच जाता है, लेकिन बाद में उस के रखरखाव पर उस से कहीं ज्यादा खर्च हो जाता है, तब पछताना पड़ता है. साथ ही महंगा रोए एक बार व सस्ता रोए बारबार वाली कहावत याद आने लगती है. लिहाजा शुरू में ही मशहूर कंपनी का असली इंजन खरीदने में समझदारी है. खरीदने से पहले पूरे बाजार में कीमत का जायजा लेना अच्छा रहता है, ताकि ठगे जाने की गुंजाइश न रहे.

आगरा, राजकोट, अहमदाबाद व मेरठ आदि शहरों में बड़े पैमाने पर डीजल इंजन बनाए जाते हैं. अलगअलग कंपनियों के माडल व हार्सपावर वाले इंजनों की कीमत भी अलगअलग शहरों में अलगअलग होती है. ब्रांडेड कंपनियों के इंजनों की कीमत में हेराफेरी करने की गुंजाइश नहीं होती, लिहाजा दुकानदार अपने मोटे मुनाफे के लिए किसानों को हमेशा लोकल कंपनियों का या मेड इन चाइना इंजन खरीदने की ही गलत सलाह देते हैं.

इंजन खरीदते समय यदि कोई भरोसे का मैकैनिक भी जांचपरख के लिए साथ में हो तो सोने में सुहागा रहता है. वह इंजन के बोर, स्ट्रोक व आरपीएम जैसी तकनीकी खासीयतों को आसानी से परख सकता है. इंजन खरीद की पक्की रसीद, मैनुअसल व उस का गारंटी कार्ड वगैरह पूरे कागजात जरूर लें. उस पर दुकानदार की मोहर लगवा कर दस्तखत कराएं व तारीख डलवाएं. इन को संभाल कर रखें ताकि वक्तजरूरत पर काम आएं.

यदि इंजन में खराबी, सेवा में चूक या धोखाधड़ी का मामला हो, तो जिले के उपभोक्ता फोरम में जा कर मुआवजा पा सकते हैं. वहां यही सुबूत काम आते हैं. इंजन के मैनुअसल में इस्तेमाल के तरीके, कई हिदायतें व सावधानियां लिखी रहती हैं, उन्हें ध्यान से पढ़ें व उन का पूरा पालन करें, ताकि बेवजह की दिक्कतें न आएं और आएं तो आसानी से हल हो जाएं.

बहुत से दुकानदार बिल या रसीद पर नीचे बाईं ओर ग्राहक के भी दस्तखत कराते हैं. वहां पहले से चैक्ड एन सैटिस्फाइड लिखा होता है, इस का मतलब होता है कि खरीदी गई चीज सही हालत में हासिल की जा रही है. इस के बाद घर जा कर उस चीज में यदि कोई खामी निकलती है, तो दुकानदार की जिम्मेदारी नहीं होती.

रखरखाव : डीजल इंजन का इस्तेमाल खेतखलिहान व दूसरे कामधंधों में किया जाता है, लिहाजा उम्मीद की जाती है कि वह ठीक से काम करे. इंजन की जितनी ज्यादा बेहतर देखभाल की जाती है, वह उतना ही अच्छा काम करता है और उतना ही ज्यादा चलता है. इस के लिए यह जरूरी है कि उसे लाने, ले जाने,

चढ़ोनउतारने व रखने में लापरवाही न बरती जाए. जहां तक मुमकिन हो इंजन को धूप व पानी से बचा कर छाया में रखें, उस की सफाई करते रहें और वक्त पर उस की सर्विसिंग भी जरूर कराएं.

इंजन में डीजल डालते समय ध्यान रखें कि उस का फिल्टर ठीक हो. तेल की टंकी में कचरा न जाने दें. यदि इंजन में कभी कोई कमी नजर आए, तो सीधे कंपनी के सर्विस स्टेशन पर ले जाएं या किसी अच्छे मिस्त्री को ही दिखाएं. इन कुछ उपायों को अपनाने से किसान इंजन के नाम पर अपनी मेहनत की कमाई को बरबाद होने से बचा सकते हैं.

किसान उम्दा क्वालिटी का इंजन खरीद कर उसे सालोंसाल बगैर किसी दिक्कत के चला सकते हैं. वे डीजल इंजन की मदद से अपना कीमती वक्त, धन व मेहनत बचा कर ज्यादा व बेहतर काम कर सकते हैं और खेती से जुड़े अपने सहायक कामधंधे बढ़ा कर अपनी कमाई में भरपूर इजाफा कर सकते हैं.

Solar Energy : ऊर्जा से ट्यूबवैल चलें

Solar Energy: पानीपत शहर से 7 किलोमीटर पहले दिल्लीचंडीगढ़ हाईवे पर बाएं हाथ पर एक गांव है सिवाह. वहां के एक प्रगतिशील किसान रामप्रताप शर्मा ने आधुनिक तरीके से खेतीबारी कर के न केवल धरती से सोना उगाया है, बल्कि कई अवार्ड भी जीते हैं.

55 साल के रामप्रताप शर्मा ने कम उम्र में ही खेतीबारी से नाता जोड़ लिया था और आज वे अपनी तकरीबन 30 एकड़ पारिवारिक जमीन पर परंपरागत व आधुनिक दोनों तरीकों से फसलें उगा रहे हैं.

वैसे तो खेतीबारी की इस बैल्ट में ज्यादातर किसान साल में 3 फसलें जैसे गेहूं, धान व गन्ना अपने खेतों में उगाते हैं, लेकिन रामप्रताप शर्मा ने कुछ हट कर सोचा. उन्होंने कृषि विज्ञान केंद्र ऊझा, पानीपत के कृषि वैज्ञानिकों डा. राजबीर गर्ग और आरएस दहिया की मदद से 4-5 एकड़ जमीन में खेतीबारी के आधुनिक तरीके अपना कर बैगन, प्याज, हरी मिर्च, टमाटर, घीया, तुरई, सेम, खीरा, आलू, शलगम के अलावा खरबूजा और पपीता की भी खेती की.

रामप्रताप शर्मा मल्चिंग तकनीक से आधुनिक खेती करते हैं, जिस में ड्रिप सिंचाई का अहम योगदान होता है. साथ ही उत्तम किस्म के बीज और उन की बोआई पर भी खास ध्यान दिया जाता है.

रामप्रताप शर्मा ने बताया, ‘नई तकनीक से खेती करने में ज्यादा मेहनत की जरूरत होती है. आम शब्दों में कहें, तो किसान को एक वैज्ञानिक की सोच अपनानी पड़ती है और ज्यादा से ज्यादा फसल लेने के लिए उसे खेतीबारी के आधुनिक उपकरणों, खाद और दवाओं की पूरी जानकारी होनी चाहिए. कृषि विज्ञान केंद्र इस के लिए किसानों के सम्मेलन और कार्यशालाएं आयोजित कराते हैं, जो बहुत उपयोगी साबित होते हैं.

‘मैं कृषि वैज्ञानिकों से साल 2010 में जुड़ा था और तब से नई तकनीक की खेतीबारी कर रहा हूं. यह कृषि वैज्ञानिकों की हिदायतों और मेरी मेहनत का ही नतीजा है कि मैं ने साल 2014 में मांगिआना, सिरसा के ‘प्रथम फल मेले’ में पपीता उगाने में पहला इनाम हासिल किया था. इतना ही नहीं, साल 2016 में घरौंडा, हरियाणा के ‘स्वर्ण जयंती मैगा ऐक्सपो’ में प्याज उगाने में पहला और शलगम उगाने में दूसरा इनाम जीता था.’

Solar Energy

पिछले 2-3 सालों से ‘सिवाह फलसब्जी उत्पादक संघ’ के प्रधान रामप्रताप शर्मा ने किसानों की समस्याओं पर बात करते हुए चिंता जताई. वे बोले, ‘किसानों की सब से बड़ी समस्या यह है कि उन्हें अपने उत्पादों की सही कीमत नहीं मिलती है. मंडी में बिचौलियों का राज है. वे किसानों से बहुत कम कीमत पर माल खरीदते हैं, क्योंकि उन्हें पता होता है कि अगर किसान समय रहते अपनी फसल नहीं बेचेंगे, तो उन की फसल खराब हो जाएगी.’

इस समस्या का क्या हल है इस सवाल पर रामप्रताप शर्मा ने बताया, ‘किसानों का भला तभी हो सकता है, जब उन की फसल सीधी सरकार या निजी कंपनियों के पास जाए. इस के लिए कलेक्शन सेंटर होने चाहिए. आजकल खेतीबारी करना बहुत महंगा सौदा है. किसान अपने घर से पैसे लगाते हैं और फसल उगा कर कुदरत के भरोसे रहते हैं.

अगर कुदरत की मार नहीं भी पड़ती है, तो भी मंडी में सही दाम नहीं मिलने से उन्हें मनचाहा मुनाफा नहीं मिलता है.

‘किसान अपनी फसल का भंडारण कहां करें, यह भी बहुत बड़ी समस्या है. निजी भंडारघरों में अपनी फसल रखना हर किसान के बस की बात नहीं है.

‘आधुनिक तरीके से खेती करने में पहली नजर में तो यही लगता है कि किसान भरपूर मुनाफा कमाते हैं, पर यह सब दूर के ढोल सुहाने जैसा है.

नई तकनीक में इस्तेमाल होने वाली मशीनें बेहद महंगी होती है. पोटैटो डिगर मशीन 85000 रुपए की आती है. छोटे किसानों के लिए इस तरह की मशीनें इस्तेमाल करना सपने जैसा है.

‘किसानों को बिजली भी बहुत सताती है. सही समय पर फसल को पानी न मिले, तो उस का फसल की उत्पादकता पर बुरा असर पड़ता है. किसान ट्यूबवैल लगवा भी लें, पर बिजली ही न हो, तो सब बेकार है.

‘मेरा मानना है कि सरकार सौर ऊर्जा से चलने वाले ट्यूबवैल लगवाए और उन पर सब्सिडी भी दे. एक और बात, सरकार स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट को सार्वजनिक करे और उसे लागू करे.

‘खेतीबारी में सरकार को किसानों की हरमुमकिन मदद करनी चाहिए, तभी तो वे करोड़ों भूखे पेटों के लिए अन्न उगा सकेंगे. किसानों के अच्छे दिन लाओ, देश के अपनेआप आ जाएंगे.’

खेती की तकनीकों के बारे में ज्यादा जानकारी लेने के लिए रामप्रताप शर्मा से उन के मोबाइल नंबर 09813300835 पर बात की जा सकती है.

Sunflower : सूरजमुखी से भरपूर आमदनी

सूरजमुखी (Sunflower) की खेती देश में पहली बार साल 1969 में उत्तराखंड के पंतनगर में की गई थी. यह एक ऐसी तिलहनी फसल है, जिस पर प्रकाश का कोई असर नहीं पड़ता. यानी यह फोटोइनसेंसिटिव है. हम इसे खरीफ, रबी और जायद तीनों मौसमों में उगा सकते हैं. इस के बीजों में 45-50 फीसदी तक तेल पाया जाता है. इस के तेल में एक खास तत्त्व लिनोलिइक अम्ल पाया जाता है. लिनोलिइक अम्ल शरीर में कोलेस्ट्राल को बढ़ने नहीं देता है. अपनी खूबियों की वजह से इस का तेल दिल के मरीजों के लिए दवा की तरह काम करता है.

प्रकाश का कोई असर न पड़ने की वजह से सूरजमुखी अचानक होने वाले मौसम के बदलावों को भी सह लेता है. इसीलिए सू्ररजमुखी की खेती किसानों को भरपूर आमदनी देती है. इसी वजह से देश के अलगअलग हिस्सों में इस की खेती का रकबा बढ़ता ही जा रहा है.

जमीन : इस की खेती अम्लीय और क्षारीय जमीनों को छोड़ कर हर तरह की जमीनों में की जा सकती है. वैसे ज्यादा पानी सोखने वाली भारी जमीन इस के लिए ज्यादा अच्छी होती है.

खेत की तैयारी : खेत में भरपूर नमी न होने पर पलेवा लगा कर जुताई करनी चाहिए. पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करने के बाद साधारण हल से 2-3 बार जुताई कर के खेत को भुरभुरा बना लेना चाहिए या रोटावेटर का इस्तेमाल करना चाहिए.

किस्में : सूरजमुखी की 2 तरह की किस्में होती हैं, एक कंपोजिट और दूसरी हाईब्रिड. कंपोजिट किस्मों में माडर्न व सूर्या खास हैं. हाईब्रिड किस्मों में केवीएसएच 1, एसएच 3222, एमएसएफएच 17 व वीएसएफ 1 वगैरह शामिल हैं.

बोआई का समय व विधि : जायद फसल की बोआई फरवरी के अंतिम हफ्ते से ले कर मध्य मार्च तक कर लेनी चाहिए, जबकि बसंतकालीन बोआई 15 जनवरी से 10 फरवरी तक कर लेनी चाहिए. लाइन से बोआई करना बेहतर होता है. बोआई हल के पीछे कूंड़ों में 4-5 सैंटीमीटर गहराई पर करें और लाइन से लाइन की दूरी 45 सेंटीमीटर व पौधे से पौधे की दूरी 15 सेंटीमीटर रखें.

Sunflower

बीजों की मात्रा : हाईब्रिड किस्म होने पर 5-6 किलोग्राम और कंपोजिट किस्म होने पर 12-15 किलोग्राम बीजों का प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए.

खाद व उर्वरक : खाद व उर्वरकों का इस्तेमाल मिट्टी की जांच कराने के बाद मिली शिफारिशों के आधार पर ही करना चाहिए. वैसे मोटे तौर पर 3-4 टन खूब सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर के हिसाब से देना लाभप्रद होता है.

कंपोजिट किस्म में 80 किलोग्राम नाइट्रोजन और हाईब्रिड किस्म में 100 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर की दर से देना चाहिए. कंपोजिट व हाईब्रिड दोनों किस्मों के लिए 60 किलोग्राम फास्फोरस और 40 किलोग्राम पोटाश देना जरूरी होता है. नाइट्रोजन की आधी मात्रा और फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा बोआई के वक्त कूंड़ों में देनी चाहिए.

नाइट्रोजन की बची हुई मात्रा बोआई के 25-30 दिनों बाद टाप ड्रेसिंग के रूप में देनी चाहिए. अगर आलू के बाद सूरजमुखी की बोआई की जा रही है, तो उर्वरकों की मात्रा 25 फीसदी घटा देनी चाहिए. तिलहनी फसलों की गुणवत्ता में सल्फर की खास भूमिका होती है, लिहाजा, 200 किलोग्राम जिप्सम प्रति हेक्टेयर की दर से देना लाभदायी रहेगा.

खरपतवार नियंत्रण : खरपतवार निकालने के लिए रासायनिक दवाओं का इस्तेमाल न कर के यांत्रिक विधि अपनाएं. अगर रासायनिक विधि ही अपनानी है, तो बोआई के 2-3 दिनों के अंदर पेंडीमेथलीन (50 फीसदी) दवा का इस्तेमाल करें.

सिंचाई : पहली सिंचाई बोआई के 20-25 दिनों बाद करना जरूरी होता है. भारी जमीन में 3-4 सिंचाई व हलकी जमीन में 4-5 सिंचाई करना ठीक होता है. फूल निकलते समय और दाना भरते समय खेत में नमी बनाए रखना बहुत ही जरूरी है. सिंचाई इस तरीके से करनी चाहिए कि पौधे गिरने न पाएं. स्प्रिंकलर विधि से सिंचाई करना बेहतर होगा.

खास कीड़े

दीमक : दीमक फसल को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाती है. इस की रोकथाम बोआई से पहले ही कर लेनी चाहिए. इस के लिए खेत में पड़े फसल अवशेषों को खूब अच्छी तरह से सड़ा देना चाहिए. खूब अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद ही खेत में इस्तेमाल करनी चाहिए. दीमक की रोकथाम के लिए बिवेरिया बैसियाना या क्लोरपाइरीफास (20 ईसी) दवाओं का इस्तेमाल कृषि वैज्ञानिक से सलाह ले कर कर सकते हैं.

हरा फुदका : इस कीट के प्रौढ़ व बच्चे पत्तियों का रस चूसते हैं, जिस से पत्तियों पर धब्बे पड़ जाते हैं. इस की रोकथाम के लिए डाईमेथोएट 30 फीसदी ईसी दवा की 1 लीटर मात्रा का 600-800 लीटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए. दवा का छिड़काव हमेशा दोपहर के बाद करना चहिए.

डस्की बग : ये कीड़े पत्तियों व डंठलों से रस चूस कर हानि पहुंचाते रहते हैं. जिन दवाआें से हरा फुदका की रोकथाम होती है, उन्हीं से इस की रोकथाम भी की जा सकती है.

फली बेधक : ये कीट फूल में बन रहे बीजों को खा कर काफी नुकसान पहुंचाते हैं. रोकथाम के लिए कृषि वैज्ञानिक से पूछ कर दवा का छिड़काव शाम के समय करें.

Sunflowerकटाईमड़ाई: जब सूरजमुखी के बीज पक कर कड़े हो जाएं तो मुंडकों यानी फूलों की कटाई कर लेनी चाहिए. पके हुए मुंडकों का पिछला भाग पीलेभूरे रंग का हो जाता है. मुंडकों को काट कर छाया में सुखा लेना चाहिए, मगर ढेर बना कर नहीं रखना चाहिए. सूखने के बाद इस की मड़ाई सूरजमुखी वाले थ्रैशर या डंडे से पीट कर करनी चाहिए.

उपज और भंडारण : सूरजमुखी की सामान्य प्रजतियों की पैदावार 12-15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर व हाईब्रिड प्रजातियों की पैदावार 20-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो जाती है. भंडारण के लिए इस के बीजों की नमी 8-10 फीसदी ही होनी चाहिए. 3 महीने के अंदर बीजों से तेल की पेराई कर लेनी चाहिए, वरना तेल में कड़वाहट आने लगती है.

कुछ अन्य ध्यान देने वाली बातें

*             बीज शोधन और बीज उपचार के बाद ही सूर्यमुखी के बीजों की खेत में बोआई करें.

*             सूरजमुखी का फूल काफी बड़ा और वजनदार होता है. लिहाजा, तेज हवा चलने पर पौधों के गिरने का खतरा रहता है. इस से बचने के लिए पहली सिंचाई करने के बाद पौधों पर 10-15 सेंटीमीटर मिट्टी जरूर चढ़ा देनी चाहिए.

*             15 दिनों के अंदर घने बोए गए पौधों को 15-20 सैंटीमीटर की दूरी पर कर देना चाहिए.

Goat Farming : बकरीपालन को कैसे दें प्रोफेशनल रंग

Goat Farming: भारत के गांवों में गरीब तबके के लाखों लोग पिछले कई दशकों से जैसेतैसे बकरीपालन (Goat Farming) कर के अपने परिवारों का पेट पालते रहे हैं. कई सालों तक बकरीपालन (Goat Farming) करने के बाद भी गरीबों की माली हालत में रत्ती भर भी सुधार नहीं हो पाता है.

आज बकरीपालन एक बड़ा कारोबार बन चुका है. अगर बकरीपालन करने वाले व्यावसायिक तरीके से गोट फार्मिंग (बकरीपालन) करें तो बकरियों की संख्या और आमदनी दोनों में लगातार इजाफा हो सकता है. इतना ही नहीं बड़े पैमाने पर बकरीपालन शुरू करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की बकरीपालन योजनाओं और अनुदान का लाभ भी लिया जा सकता है.

इस कारोबार को शुरू करने से पहले यह जानना और समझना जरूरी है कि व्यावसायिक बकरीपालन क्या है? इस में कितनी लागत आएगी? कितना मुनाफा होगा? सरकार की ओर से क्या मदद मिलती है? बकरीपालन में 100 से 1000 बकरियों को 1 ही बाड़े में रखा जा सकता है और बड़े नाद में सभी को एकसाथ खाना खिलाया जाता है. यह तरीका मुरगीपालन यानी पोल्ट्री फार्म की तरह ही होता है.

घर में 5-7 बकरियां पालने और बकरियों का व्यावसायिक रूप से पालन करने में फर्क है. अगर 1 परिवार कम से कम 100 बकरियों का पालन करे तो उस परिवार के 6-8 लोगों को काम मिलेगा और आमदनी भी बढ़ेगी.

गौरतलब है कि भारत में मांस की मांग करीब 80 लाख टन है, जबकि 60 लाख टन का ही उत्पादन हो पाता है. इस में बकरी के मांस की खपत 12 फीसदी ही है. इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि बकरीपालन का बाजार कितना खाली है.

पशु वैज्ञानिक डा. सुरेंद्र नाथ बताते हैं कि गोट फार्मिंग की छोटी यूनिट में 20 बकरियां और 1 बकरा होते हैं, जबकि बड़ी यूनिट में 40 बकरियां और 2 बकरे होते हैं. लोकल किस्म की बकरी 1 साल में 2 बार 2-2 बच्चे देती है. कुछ बकरियां 3-4 बच्चे भी देती हैं. इस हिसाब से 20 बकरियों वाली यूनिट से 1 साल में कम से कम 80 बच्चे मिल सकते हैं. 1 बकरे या बकरी की कीमत कम से 4000 रुप्ए होती है. इस लिहाज से 80 बकरेबकरियों की कीमत 320000 रुपए होगी. 1 यूनिट की बकरियों के चारे, दवा व टीकों आदि पर साल में करीब 1 लाख रुपए खर्च होते हैं. इस तरह 1 यूनिट से कम से कम ढाई लाख रुपए के करीब सालाना कमाई होती है.

पिछले 12 सालों से बकरीपालन कर के अच्छीखासी कमाई करने वाले पटना जिले के नौबतपुर गांव के मनोज बताते हैं कि इस व्यवसाय की सब से बड़ी खासीयत यह है कि बाढ़ या सूखा जैसी आपदा का इस पर खास असर नहीं पड़ता. इस के अलावा अचानक पैसों की जरूरत पड़ने पर बकरियों को बेचा जा सकता है. बकरों व बकरियों को कभी भी कहीं भी बेचा जा सकता है. कई मौकों पर तो बकरियों की मुंहमांगी कीमतें मिलती हैं.

प्रोफेशनल तरीके से बकरीपालन शुरू करने से पहले विशेषज्ञों से सलाह लेना जरूरी है. किसी की सुनीसुनाई बातों में फंस कर इस काम को शुरू नहीं करें. बकरियों की 1 छोटी यूनिट के लिए 300 वर्गमीटर जगह और करीब 1 लाख रुपए की जरूरत होती है. बकरियों को रखने के लिए जमीन से कुछ ऊंचाई पर बांस की जमीन बना ली जाती है. बकरीपालन वाली जगह पर पानी का जमाव नहीं होना चाहिए और जगह हवादार होनी चाहिए. इस कारोबार को समझने के बाद बजट और योजना बना कर ही काम शुरू करना बेहतर होगा.

Machine : किसान ने बनाई कंपोस्ट टर्निंग मशीन

Machine : हरियाणा के पानीपत जिले के सींख गांव के किसान जितेंद्र मलिक की पढ़ाई के वक्त खेती के कामों में दिलचस्पी कम ही रही, लेकिन पढ़ाई में भी उन का मन ज्यादा नहीं लगा.

उन्होंने दसवीं के बाद पढ़ाई छोड़ दी. उन्होंने साल 1995 में गांव में सफेद बटन मशरूम की खेती शुरू की. साल 2005 तक तो जैसेतैसे मशरूम की उपज ली, मगर काम में उत्साह महसूस नहीं हो रहा था. रोजरोज मजदूरों की समस्या रहती थी.

उसी बीच उन्होंने ‘खुंबी कंपोस्ट मिक्सचर मशीन’ बना डाली. मशीन को ट्रैक्टर के पीछे जोड़ कर ट्रायल किया तो मनचाही सफलता हाथ नहीं लगी. फिर से वे अनमने मन से खेती में जुट गए, मगर कसक थी कामयाब होने की.

कुछ अरसे बाद रोजरोज की परेशानियों से पीछा छुड़ाने के लिए जितेंद्र ने फिर से मशरूम की मशीन बनाने की सोची. इस बार भाई ने हिम्मत बंधाई.

15 दिनों में मशीन बनाने से जुड़े सभी उपकरणों को जुटाया. मशीन तैयार की और ट्रायल किया. सब कुछ सही हुआ. अगले साल मशीन में कुछ मामूली से बदलाव किए, जो अब तक कायम हैं. तब मशीन बनाने में 2 लाख रुपए खर्च हुए थे.

कैसे काम करती है यह मशीन

जितेंद्र ने मशीन को ‘कंपोस्ट टर्निंग मशीन’ नाम दिया है. यह मशीन खाद डालने पर पड़ी हुई सभी गांठों को खोल देती है. इन गांठों को तोड़ने के लिए छत में एक जाली भी लगाई है, जिस के संपर्क में आने से कंपोस्ट की गांठें टूट जाती हैं. यह अंदरूनी परत को बाहर और बाहरी परत को अंदर की तरफ फेंकने का काम भी करती है, जिस से अमोनिया की निकासी में बहुत सहायता मिलती है.

इस मशीन से क्वालिटी कंपोस्ट तैयार होता है. मजदूरों की तादाद कम हुई है और उत्पादन बढ़ गया है. यह अकेली मशीन 50 मजदूरों के बराबर का काम 1 दिन में करती है. इस मशीन द्वारा मात्र 60 मिनट में 300 क्विंटल के करीब कंपोस्ट टर्न होता है.

शुरू में कंपोस्ट पूरी तरह भीगता नहीं था, अब पाइप चलाने पर फुहारे से पानी मिल जाता है. मशीन को चलाना भी काफी आसान है. यह बिजली और डीजल दोनों से चल सकती है.

उन्होंने हाल ही में एक नई मशीन भी बनाई है, जिस की लागत करीब सवा 3 लाख रुपए है. पहले वाली मशीन तैयार कंपोस्ट को सीधे एक ही लाइन में रखती जाती थी, अब यह नई मशीन कंपोस्ट को मनचाही जगह दाएंबाएं रखती है. यह कंपोस्ट को ट्राली में भी लोड कर सकती है, ताकि उसे दूसरी जगह ले जाया जा सके.

यह नई मशीन जेसीबी का काम भी कर लेती है. इस मशीन से न सिर्फ पैदावार बढ़ेगी, बल्कि खर्च भी कम होगा. जो काम पहले 40-50 मजदूरों से होता था, अब महज 10 मजदूरों से ही हो जाता है.

मानसम्मान

Machines

अपने नवाचारों के लिए जितेंद्र को कई मानसम्मान भी मिले हैं. उन्हें ‘राष्ट्रीय फार्म इन्नोवेटर मीट’ 2010 में आईसीएआर ने मैसूर के केवीके में सम्मान प्रदान किया.

हरियाणा के चौधरी चरण सिंह कृषि विश्वविद्यालय ने उन्हें 3 बार सम्मानित किया. सोलन के मशरूम निदेशालय ने भी उन्हें सम्मान दिया. जितेंद्र को नेशनल इन्नोवेशन फाउंडेशन का 3 लाख रुपए का द्वितीय राष्ट्रीय पुरस्कार महामहिम राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा राष्ट्रपति भवन में 7 मार्च, 2015 को ‘कंपोस्ट टर्निंग मशीन’ बनाने के लिए दिया गया.

बीकानेर के राजस्थान पशु चिकित्सा और पशु विज्ञान विश्वविद्यालय में 9-10 मार्च को देशभर के कृषक वैज्ञानिकों, प्रगतिशील किसानों व विशेषज्ञों के राष्ट्रीय मंथन कार्यक्रम में उन्हें ‘खेतों के वैज्ञानिक’ सम्मान से नवाजा गया.

मशीन की ज्यादा जानकारी के लिए किसान निम्न पते पर संपर्क कर सकते हैं: गांवपोस्ट : सींख, तहसील : इसराना, जिला : पानीपत (हरियाणा). मोबाइल नंबर 09813718528.

Saffron Cultivation : अब केसर की खेती होगी पश्चिम उत्तर प्रदेश में भी

Saffron Cultivation :  सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में केसर की खेती को बढ़ावा देने के लिए कृषि विश्वविद्यालय की वैज्ञानिक प्रोफैसर वैशाली को एक करोड़ 55 लाख रुपए की परियोजना उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा स्वीकृत की गई है.

इसी विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफैसर केके सिंह ने कहा कि उन का प्रयास है, कि कृषि विविधीकरण पर जोर दिया जाए जिस से किसान धान, गेहूं और गन्ना फसलों से हटकर सब्जी, फूल और फल उत्पादन की तरफ भी बड़े और अगर वे सहफसली खेती को बढ़ावा देंगे तो उन की आय में वृद्धि भी होगी.

उन्होंने बताया की किसान तक केसर उत्पादन की विधि को स्टैंडर्डाइज्ड करने के लिए पहले विश्वविद्यालय में प्रयोगशाला विकसित की जाएगी और शोध के बाद इस तकनीकी को किसानों  तक पहुंचाया जाएगा. इस के लिए किसानों को प्रशिक्षण भी दिया जाएगा.

इस परियोजना की अन्वेषक प्रोफैसर वैशाली ने बताया की वैसे केसर की खेती श्रीनगर और  हिमाचल प्रदेश में जहां पर तापमान काफी कम रहता है, वहां पर की जाती है, लेकिन अब इस परियोजना के माध्यम से कोल्ड चैंबर को तैयार कर के उस में केसर की फसल के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया जाएगा और उस में इस की खेती को बढ़ावा दिया जाएगा. किसानों को तकनीकी ज्ञान उपलब्ध कराने के लिए समयसमय पर प्रशिक्षण का आयोजन किया जाएगा. जिस से किसान भी इस तकनीक को अपना कर अपने यहां केसर का उत्पादन प्रारंभ कर सके.

निदेशक शोध डा. कमल खिलाड़ी ने बताया की इस तरह की परियोजनाओं से किसानो को लाभ होगा. यह परियोजना कृषि विश्वविद्यालय के कालेज औफ बायोटैक्नोलौजी महाविद्यालय के पादप जैव प्रौद्योगिकी संभाग को मिली है. इस परियोजना में मुख्य अन्वेषक प्रोफैसर शालिनी से अन्वेषक प्रोफैसर डा. आरएस सेंगर, डा. मनोज यादव, डा. मुकेश कुमार एवं डा. नीलेश कपूर है.

केसर की खेती

केसर की खेती यूरोप और एशियाई भागों में किया जाता है. ईरान और स्पेन जैसे देश पूरी दुनिया का 80 फीसदी केसर का उत्पादन करते हैं. केसर समुद्र तल से 1000 से 2500 मीटर की ऊंचाई पर उगाया जाता है. केसर की खेती के लिए बर्फीले इलाके बेहतर माने जाते हैं. इस की खेती कर किसान भी अच्छी कमाई कर सकते हैं.

कैसर की खेती के लिए उपयुक्त मिट्टी

केसर की खेती बलुई दोमट और दोमट मिट्टी में की जाती है. लेकिन बढ़ती तकनीक और उचित देखभाल की मदद से राजस्थान जैसे शुष्क क्षेत्रों में भी इस की खेती की जा सकती है. केसर की खेती के लिए जलभराव वाली जगह नहीं होनी चाहिए. क्योंकि केसर के बीज पानी में सड़ कर नष्ट हो जाते हैं. इस की खेती के लिए भूमि का पीएच  मान सामान्य होना चाहिए.

जलभराव वाले खेत केसर की खेती के लिए सही नहीं होते, क्योंकि जलभराव से कंद सड़ सकते हैं. केसर के पौधे को हल्की सिंचाई की जरूरत होती है और ठंडे मौसम में इसे विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है. इस के लिए दिन में 17 डिगरी सैल्सियस  और रात में 10 डिगरी सैल्सियस तापमान आदर्श माना जाता है.

केसर बोआई के लिए मिट्टी की तैयारी कैसे करें:

मिट्टी की अच्छी तैयारी के लिए गहरी जुताई करें और कुछ दिनों के लिए खेत को खुला छोड़ें ताकि धूप से हानिकारक जीवाणु नष्ट हो सके. जुताई के बाद, खेत में 20-25 टन प्रति हेक्टेयर अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद मिलाकर मिट्टी की उर्वरकता और केसर की जड़ों को पोषक तत्व प्रदान करें. खेत को हल या लकड़ी के पटरे से समतल करें ताकि सिंचाई के समय पानी का समान वितरण हो और जलभराव न हो. खेत में 15-20 सैंटीमीटर ऊंची क्यारियां बनाएं. क्यारियों की चौड़ाई 1.1 मीटर और लंबाई आवश्यकता अनुसार रखें.

मुख्य उत्पादक क्षेत्र

भारत में, केसर की खेती मुख्य रूप से जम्मूकश्मीर और हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में की जाती है. विशेष रूप से, कश्मीर का पांपोर क्षेत्र केसर उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है. यहां की मिट्टी और जलवायु केसर की खेती के लिए आदर्श मानी जाती है.

केसर की उन्नत किस्में

रोपाई का समय : केसर की रोपाई का उचित समय अगस्त से सितंबर के बीच होता है, जब मौसम ठंडा और शुष्क होता है.

केसर की खेती के लिए प्रमुख किस्में : केसर की खेती से ज्यादा उत्पादन प्राप्त करने के लिए कुछ प्रमुख किस्में देखते हैं.
कश्मीरी केसर, ईरानी केसर, स्पैनिश केसर, अफगानी केसर, तुर्की केसर

कंद रोपाई का तरीका :

रोपाई के लिए 15-20 सैंटीमीटर की गहराई पर कंद को लगाएं।
कंदों के बीच की दूरी 10-15 सैंटीमीटर और कतारों के बीच की दूरी 20-25 सैंटीमीटर रखें.

कंद रोपने की विधि :
कंदों को हाथ से लगाएं या हल्के फावड़े का उपयोग करें.
कंदों को रोपने के बाद मिट्टी से ढक दें और हल्का सा दबा दें.

केसर के बीज बोने का सब से सही समय : केसर की फसल लगभग 6 माह में तैयार हो जाती है. केसर की अच्छी गुणवत्ता प्राप्त करने के लिए केसर के बीजों को सही समय पर लगाना बहुत जरूरी है. केसर अच्छी क्वालिटी के आधार पर ही बिकता है. केसर के बीज जुलाई से सितंबर तक बरसात के मौसम की समाप्ति के बाद लगाए जाने चाहिए. इन बीजों को अगस्त के महीने में लगाना सब से अच्छा माना जाता है. अगस्त के मौसम में बीज देने के बाद इस की सूक्ष्म केसर शुरुआती सीजन में देने के लिए तैयार हो जाती है. अत्यधिक ठंड में केसर को खसरा होने का खतरा नहीं रहता है.

कीटः केसर के कंदों को सफेद सुंडिया मुख्य तौर पर नुकसान पहुंचाती हैं. इस की रोकथाम के लिए क्लोरपायरीफास धूल या 5 फीसदी दानेदार क्विनाल्फास, 25-30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बिजाई के समय खेत में डालना उत्तम रहता है.

रोगः रोगों में कंद सड़न रोग केसर की मुख्य बीमारी है, जो कि फ्यूजेरियम सोलेनाइ नामक फफूंद के कारण होती है. इस की रोकथाम के लिए कंदों को बाविस्टिन के घोल से उपचारित करना चाहिए। अक्तूबर व अप्रैल में खड़ी फसल में बाविस्टिन से मृदा शोधित करने से भी रोगकारक बीजाणुओं की वृद्धि रूक जाती है.

उपज : शुद्ध केसर की औसतन उपज लगभग 2-5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक ली जा सकती है.

भंडारण : केसर के फूल अक्तूबर के महीने में खिलने आंरभ होतें है और नवंबर और कम उंचाई वाले क्षेत्रों में दिसंबर के पहले सप्ताह तक फूल प्राप्त कर सकते हैं. केसर के फूल को प्रतिदिन सुबह ओस सुखने के उपरांत तोड़ना चाहिए. ऐसा न करने पर इस की गुणवत्ता व उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है.

फूलों का रस चूसने वाली मक्खियां भी इन्हें नुकसान पहुंचाती हैं. मादा भाग को फूल से अलग करने के बाद छांवदार जगह में तब तक सुखाया जाता है, जब तक कि इन में 7 से 8 फीसदी तक नमी हो. केसर का भंडारण वायुरोधक पात्रों में किया जाता है. इसे दो या तीन साल तक भंडारित किया जा सकता है, जिस के बाद स्वाद और संगुध नष्ट हो जाती है.

घर पर बना कंपोस्ट (Compost) है बेस्ट

अगर आप गार्डनिंग की शौकीन हैं, तो आप की यही चाहत रहती है कि हमारे घर का आंगन हमेशा हराभरा रहे. पौधों पर फूल व फल लदे रहें. जिस के लिए आप तरहतरह की खाद व दवाओं का प्रयोग करती हैं, जो कि वाकई बहुत महंगे भी आते हैं और कई बार पौधों को लाभ की जगह नुकसान भी पहुंचा देते हैं.

कुछ लोग इस खर्चे को सोच कर पौधे लगाने की इच्छा को मन में ही दबा कर रह जाते हैं, लेकिन यदि आप अपने गार्डन को खूबसूरत बनाना चाहती हैं और वो भी बिना पैसे खर्च करे, तो आप घर पर ही कंपोस्टिंग तैयार कर अपने गार्डन को हराभरा बना सकती हैं.

कंपोस्टिंग के फायदे
कंपोस्ट यानी पौधों के लिए काला सोना. इस से पौधों का सही तरीके से विकास होता है, क्योंकि घर पर बने कंपोस्ट से नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटैशियम जैसे आवश्यक सभी पोषक तत्व मिलते हैं, जो कि मिट्टी की उर्वरता, पानी सोखने की क्षमता में बढ़ोतरी होती है व पीएच संतुलन भी नियंत्रित रहता है.

बनाने की विधि
– इसे आप गार्डन में गड्ढा कर या बालटी, मिट्टी या प्लास्टिक के गमले में आसानी से तैयार कर सकती हैं.
– यदि गार्डन गड्ढे में बना रहे हैं, तो मिट्टी पानी सोख लेती है और बरतन में बना रहे हैं, तो सड़न और बदबू से बचाने के लिए बरतन की तली में छोटेछोटे 3-4 छेद कर दें.
– कंपोस्ट तैयार करने के लिए पहले गत्ता या कोको पिट की परत बिछा दें, फिर डिकंपोज के लिए सब्जी, फलों के छिलके, चाय की पत्ती (चीनी रहित), अंडे के छिलके डाल दें. इस के बाद एक हलकी परत मिट्टी की बिछा दें, इस में थोड़े खराब कागज व सूखे पत्ते भी डाल दें.

यह प्रक्रिया तब तक दोहराते रहें, जब तक कि आप का बिन पूरा न भर जाए. पूरा भरने पर वेस्ट डालने की प्रक्रिया को रोक दें. 30 से 40 दिन के भीतर कंपोस्ट बन जाएगा. साथ ही, इसे किसी डंडे की मदद से बीचबीच में हिला दें, जिस से इसे औक्सीजन मिलती रहे.

– जल्दी डिकंपोज करने के लिए इस में एक लिटर पानी में थोड़ा गुड़ डाल कर एक दिन के लिए रख दें और बाद में इसे छान कर कंपोस्ट मिश्रण में डाल दें.

गलती न करें
– पका हुआ खाना, दूध, दही जैसे पदार्थ भूल कर भी ना डालें.
– सीधे सूरज की रोशनी में न रखें
– कंपोस्टिंग के लिए जो सामग्री डालें, छोटेछोटे टुकड़ों में डालें, जिस से कि यह जल्दी गल कर कंपोस्ट में बदल जाए.