बाजरे (Millet) की खेती

Millet : अगर कहा जाए कि सूखे मौसम या कम सिंचाई वाले खेतों के लिए बाजरा (Millet) बहुत ही उम्दा फसल है, तो यह बिलकुल सही बात होगी. बाजरा (Millet) फसल है, जो सूखा सहन करने वाली सभी तरह के अनाज वाली फसलों में सब से आगे है. यही वजह है कि बाजरे (Millet) की खेती राजस्थान के साथसाथ उत्तर प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, गुजरात, ओडिशा व पश्चिम बंगाल के सूखाग्रस्त इलाकों में भी बड़े पैमाने पर की जाती है.

सूखा सहनशील फसल होने के कारण ही बाजरे की खेती बहुत आसानी से गरमियों के मौसम में भी कर सकते हैं. बाजरा मोटे अनाजों की श्रेणी में आता है. यह कई रोगों को दूर करने के साथ ही साथ शरीर को फिट रखने में भी कारगर है. यही वजह है कि शहरों में लोग इस की ऊंची कीमत भी अदा करने को तैयार रहते हैं.

मिट्टी : बाजरे की खेती के लिए अच्छी जल निकास वाली हलकी दोमट या बलुई दोमट मिट्टी अच्छी होती है.

खेत की तैयारी : पहली बार की जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें और उस के बाद 2-3 बार देशी हल या कल्टीवेटर से जुताई कर के खेत को तैयार करें.

बोआई का समय और विधि: बोआई का सही समय मध्य जुलाई से ले कर मध्य अगस्त तक का है. ध्यान रहे कि इस की बोआई लाइन से करने पर ज्यादा फायदा होता है. लाइन से लाइन की दूरी 45 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 10 से 15 सेंटीमीटर रखें. बीज बोने की गहराई तकरीबन 4 सेंटीमीटर तक ठीक रहती है.

बीज दर और उपचार : इस की बोआई के लिए प्रति हेक्टेयर 4-5 किलोग्राम बीजों की जरूरत होती है. बीजों को 2.5 ग्राम थीरम या 2 ग्राम कार्बेंडाजिम से प्रति किलोग्राम बीज की दर से शोधित कर लेना चाहिए.

खरपतवार नियंत्रण : अच्छा होगा कि खरपतवारों को निराईगुड़ाई कर के निकाल दें. इस से एक ओर जहां मिट्टी में हवा और नमी पहुंच जाती है, वहीं दूसरी ओर खरपतवार भी नहीं पनप पाते हैं. खरपतवारों की रासायनिक दवाओं से रोकथाम करने के लिए एट्राजीन 50 फीसदी नामक रसायन की 1.5-2 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से ले कर 700-800 लीटर पानी में मिला कर बोआई के बाद व जमाव से पहले एक समान रूप से छिड़काव कर देना चाहिए.

Millet

खाद और उर्वरक : खाद और उर्वरकों का इस्तेमाल खेत की मिट्टी की जांच के आधार पर मिली सलाह के मुताबिक करना चाहिए. हालांकि मोटे तौर पर संकर प्रजातियों (हाईब्रिड) के लिए 80-100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम फास्फोरस और 40 किलोग्राम पोटाश व देशी प्रजातियों के लिए 40-50 किलोग्राम नाइट्रोजन, 25 किलोग्राम फास्फोरस व 25 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए. फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन की आधी मात्रा बोआई से पहले इस्तेमाल करें. नाइट्रोजन की बची हुई आधी मात्रा टापड्रेसिंग के रूप में जब पौधे 25-30 दिनों के हो जाएं तो छिटक कर दें.

सिंचाई : ज्यादातर देखने में आता है कि बरसात का पानी ही इस के लिए सही होता है. यदि बरसात का पानी न मिल सके, तो 1-2 बार फूल आने पर जरूरत के मुताबिक सिंचाई करनी चाहिए.

रोग प्रबंधन : बाजरे में खासतौर पर कंडुआ, अरगट और बाजरे का हरित बाल (डाउनी मिल्ड्यू) रोग लगते हैं, जिन के बारे में विस्तार से जानकारी निम्न प्रकार है:

अरगट : यह रोग भुट्टों या बालियों के कुछ दानों पर ही दिखाई देता है. इस में दाने के स्थान पर भूरे काले रंग की सींग के आकार की गांठे बन जाती हैं, जिन्हें स्कलेरोशिया कहते हैं. प्रभावित दाने इनसानों और जानवरों के लिए नुकसानदायक होते हैं, क्योंकि उन में विषैला पदार्थ होता है. इस रोग की वजह से फूलों में से हलके गुलाबी रंग का गाढ़ा और चिपचिपा पदार्थ निकलता है, जो सूखने पर कड़ा हो जाता है.

इस की रोकथाम के लिए बोने से पहले 20 फीसदी नमक के घोल में बीजों को डुबो कर स्कलेरोशिया अलग किए जा सकते हैं. खड़ी फसल में इस की रोकथाम के लिए फूल आते ही घुलनशील मैंकोजेब चूर्ण को 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 5-7 दिनों के अंतराल पर छिड़कना करना चाहिए.

कंडुआ : इस रोग में दाने आकार में बड़े, गोल, अंडाकार व हरे रंग के हो जाते हैं, जिन में काला चूर्ण भरा होता है. मंड़ाई के समय ये दाने फूट जाते हैं, जिस से उन में से काला चूर्ण निकल कर, स्वस्थ दानों पर चिपक जाता है.

इस की रोकथाम के लिए किसी पारायुक्त रसायन से बीज शोधित कर के बोने चाहिए. सावधानी के लिए एक ही खेत में हर साल बाजरे की खेती नहीं करनी चाहिए.

हरित बाली रोग : इसे अंगरेजी में डाउनी मिल्ड्यू नाम से जाना जाता है. यह एक फफूंद जनक रोग है. इस रोग में बाजरे की बालियों के स्थान पर टेढ़ीमेढ़ी हरी पत्तियां सी बन जाती हैं, जिस से पूरी की पूरी बाली झाड़ू के समान नजर आती है और पौधे बौने रह जाते हैं.

इस रोग से बचाव के लिए अरगट रोग की तरह रासायनिक दवा का छिड़काव करें और बोआई से पहले बीजों का शोधन करें. रोगग्रसित पौधों को काट कर जला दें.

कीट प्रबंधन : बाजरे में दीमक, तना मक्खी, तना छेदक और मिज कीट का प्रकोप कभीकभी देखने को मिलता है. इन कीटों की रोकथाम के लिए किसी स्थानीय विशेषज्ञ से मिली सलाह के मुताबिक किसी असरकारक रासायनिक दवा का छिड़काव करना चाहिए.

Millet

कुछ और ध्यान रखने वाली बातें

* इलाके की अनुकूलता के हिसाब से बताई गई प्रजातियों के बीज प्रयोग करें.

* यदि बरसात नहीं हो पा रही है, तो सिंचाई जरूर करें. ध्यान रहे कि फूल आने पर सिंचाई ज्यादा जरूरी होती है.

* बोआई के 15 दिनों बाद कमजोर पौधों को खेत से उखाड़ कर पौधे से पौधे की दूरी 10-15 सेंटीमीटर कर देनी चाहिए. इस के अलावा ज्यादा नजदीक जमे पौधों को उखाड़ कर खाली जगहों पर लगा देना चाहिए.

बाजरे (Millet) की वैज्ञानिक खेती

सूखे मौसम या कम सिंचाई वाले खेतों के लिए बाजरा बहुत ही उम्दा फसल है. यही वजह है कि बाजरे की खेती राजस्थान के अलावा उत्तर प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, गुजरात, ओडिशा व पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर की जाती है.

बाजरा मोटे अनाजों की कैटीगरी में आता है. इस की खेती गरमियों में भी कर सकते हैं. यह कई रोगों को दूर करने के साथ शरीर को भी फिट रखने में कारगर है. यही वजह है कि शहरों में लोग इस की ऊंची कीमत देने को तैयार रहते हैं.

मिट्टी : बाजरे की खेती के लिए हलकी या बलुई दोमट मिट्टी अच्छी मानी गई है. साथ ही पानी के निकलने का अच्छा बंदोबस्त होना चाहिए.

खेत की तैयारी : पहली बार की जुताई मिट्टी पलटने वाले हल या रोटावेटर से करें और उस के बाद 2-3 बार देशी हल या कल्टीवेटर से जुताई कर के खेत को तैयार करें.

बोआई का समय और विधि : बोआई का सही समय जुलाई से ले कर अगस्त माह तक है. ध्यान रहे कि इस की बोआई लाइन से करने पर ज्यादा फायदा होता है. लाइन से लाइन की दूरी 40 सैंटीमीटर और पौध से पौध की दूरी 10 से 15 सैंटीमीटर रखें. बीज बोने की गहराई तकरीबन 4 सैंटीमीटर तक ठीक रहती है.

बीज दर और उपचार: इस की बोआई के लिए प्रति हेक्टेयर 4-5 किलोग्राम बीजों की जरूरत होती है. बीजों को 2.5 ग्राम थीरम या 2 ग्राम कार्बंडाजिम से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर लेना चाहिए. अरगट के दानों को 20 फीसदी नमक के घोल में डाल कर निकाला जा सकता है.

खरपतवार पर नियंत्रण : बाजरे की फसल में खरपतवार ज्यादा उगते हैं. बेहतर होगा कि खरपतवारों को निराईगुड़ाई कर के निकाल दें. इस से एक ओर जहां मिट्टी में हवा और नमी पहुंच जाती है, वहीं दूसरी ओर खरपतवार भी नहीं पनप पाते हैं.

खरपतवारों की कैमिकल दवाओं से रोकथाम करने के लिए एट्राजीन 0.50 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से 800-1000 लिटर पानी में मिला कर बोआई के बाद व जमाव से पहले एकसमान रूप से छिड़काव कर देना चाहिए.

खाद और उर्वरक : खाद और उर्वरकों का इस्तेमाल खेत की मिट्टी की जांच के आधार पर करना चाहिए. हालांकि मोटेतौर पर संकर प्रजातियों में हाईब्रिड के लिए 80-100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम फास्फोरस और 40 किलोग्राम पोटाश व देशी प्रजातियों के लिए 40-50 किलोग्राम नाइट्रोजन, 25 किलोग्राम फास्फोरस व 25 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए.

फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन की आधी मात्रा बोआई से पहले इस्तेमाल करें. उस के बाद नाइट्रोजन की बची आधी मात्रा टौप ड्रेसिंग के रूप में जब पौधे 25-30 दिन के हो जाएं तो छिटक कर छिड़काव करें.

सिंचाई : बाजरे की फसल बारिश के मौसम में उगाई जाती है. बरसात का पानी ही इस के लिए सही होता है. यदि बरसात का पानी न मिल सके तो फूल आने पर जरूरत के मुताबिक सिंचाई करनी चाहिए.

बाजरे (Millet)

खास रोगों का उपचार

बाजरे का अरगट : यह रोग क्लेविसेप्स माई क्रोसिफैला नामक कवक से फैलता है. यह रोग बालियों या बालियों के कुछ ही दानों पर ही दिखाई देता है. इस में दाने की जगह पर भूरे काले रंग की सींग के आकार की गांठें बन जाती हैं. इसे स्केलेरोशिया कहते हैं. प्रभावित दाने इनसानों और जानवरों के लिए नुकसानदायक होते हैं, क्योंकि उन में जहरीला पदार्थ होता है. इस रोग की वजह से फूलों में से हलके गुलाबी रंग का गाढ़ा और चिपचिपा पदार्थ निकलता है. रोग ग्रसित बालियों पर फफूंद जम जाता है.

रोकथाम : बोने से पहले 20 फीसदी नमक के घोल में बीजों को डुबो कर स्केलेरोशिया अलग किए जा सकते हैं. खड़ी फसल में इस की रोकथाम के लिए फूल आते ही घुलनशील जिरम 80 फीसदी चूर्ण 1.5 किलोग्राम या जिनेब 75 फीसदी चूर्ण 2 किलोग्राम या मैंकोजेब चूर्ण को 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 5-7 दिन के अंतराल पर छिड़कना चाहिए.

कंडुआ : यह रोग टालियोस्पोरियम पेनिसिलेरी कवक से लगता है. इस रोग में दाने आकार में बड़े, गोल अंडाकार व हरे रंग के हो जाते हैं. इन में काला चूर्ण भरा होता है. मंड़ाई करते समय ये दाने फूट जाते हैं, जिस से उन में से काला चूर्ण निकल कर सेहतमंद दानों पर चिपक जाता है.

रोकथाम : इस की रोकथाम के लिए किसी पारायुक्त कैमिकल से बीज उपचारित कर के बोने चाहिए. सावधानी के लिए एक ही खेत में हर साल बाजरे की खेती नहीं करनी चाहिए.

हरित बाली रोग : इसे डाउनी मिल्ड्यू नाम से जाना जाता है. रोगकारक स्केलेरोस्पोरा ग्रैमिनीकोला पत्तियों पर पीलीसफेद धारियां पड़ जाती हैं. इस के नीचे की तरफ रोमिल फफूंदी की बढ़वार दिखाई देती है. बाल निकलने पर बालों में दानों की जगह पर टेढ़ीमेढ़ी हरी पत्तियां बन जाती हैं और बाली गुच्छे या झाड़ू सी दिखाई देती है.

रोकथाम : शोधित बीज ही बोने चाहिए. रोग से ग्रसित पौधे को जला दें और फसल चक्र अपनाएं. शुरुआती अवस्था में जिंक मैगनिज कार्बामेट या जिनेब 0.2 फीसदी को पानी में घोल कर छिड़काव करें.

मुख्य कीट

तनामक्खी कीट : यह कीट बाजरे का दुश्मन है, जो फसल की शुरुआती अवस्था में बहुत नुकसान पहुंचाता है. जब फसल 30 दिन की होती है तब तक कीट से फसल को 80 फीसदी नुकसान हो जाता है.

इस के नियंत्रण के लिए बीज को इमिडाक्लोरोप्रिड गोचो 14 मिलीलिटर प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर के बोआई करनी चाहिए और बोआई के समय बीज की मात्रा 10 से 12 फीसदी ज्यादा रखनी चाहिए.

जरूरी हो तो अंकुरण के 10-12 दिन बाद इमिडाक्लोप्रिड 200 एसएल 5 मिलीलिटर प्रति 10 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए. फसल काटने के बाद खेत में गहरी जुताई करें और फसल के अवशेषों को इकट्ठा कर के जला दें.

तनाभेदक कीट : तनाभेदक कीट का प्रकोप फसल में 10 से 15 दिन से शुरू हो कर फसल के पकने तक रहता है. इस के नियंत्रण के लिए फसल काटने के बाद खेत में गहरी जुताई करें और फसल के अवशेषों को जला दें.

खेत में बोआई के समय कैमिकल खाद के साथ 10 किलोग्राम की दर से फोरेट 10 जी अथवा कार्बोफ्यूरान दवा खेत में अच्छी तरह मिला दें और बोआई 15-20 दिन बाद इमिडाक्लोरोप्रड 200 एसएल 5 मिलीलिटर प्रति 10 लिटर या कार्बोरिल 50 फीसदी घुलनशील पाउडर 2 ग्राम प्रति लिटर पानी में घोल बना कर 10 दिन के अंतराल पर 2 छिड़काव करें.

टिड्डा कीट : यह बाजरे की फसल को छोटी अवस्था से ले कर फसल पकने तक नुकसान पहुंचाता है. यह कीट पत्तों के किनारों को खा कर धीरेधीरे पूरी पत्तियों को खा जाता है. बाद में फसल में केवल मध्य शिराएं और पतला तना ही रह जाता है.

इस के नियंत्रण के लिए फसल में कार्बोरिल 50 फीसदी घुलनशील पाउडर 2 ग्राम प्रति लिटर पानी में घोल बना कर 10 से 15 दिन के अंतराल पर 2 छिड़काव करें.

पक्षियों से बचाव : बाजरा पक्षियों का मुख्य भोजन है. फसल में जब दाने बनने लगते हैं तो सुबहशाम पक्षियों से बचाव करना बहुत ही जरूरी है.

धान की जगह मक्का, बाजरा, ज्वार उगाएं

जुलाई माह में अब तक उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में विशेषकर उत्तर प्रदेश के मध्य भाग में तथा बुंदेलखंड में औसत वर्षा से काफी कम वर्षा हुई है और अभी भी 25 से 30 प्रतिशत खेतों में बोआई होनी है.

आप सभी लोगों से अनुरोध है कि धान की फसल लगाने का इंतजार करने की जगह आप मक्का, बाजरा, ज्वार की फसल लगाएं. इस वर्ष योगी आदित्यनाथ सरकार ने उत्तर प्रदेश के किसानों की आय बढ़ाने और बाजार में मक्के की बढ़ती मांग को देखते हुए प्रदेश के सभी 75 जनपदों के लिए त्वरित मक्का विकास कार्यक्रम एवं राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के अंतर्गत संकर मक्का सामान्य बीज वितरण पर 50 प्रतिशत अनुदान की व्यवस्था की गई है. देशी मक्का, संकर मक्का एवं पौपकौर्न मक्का के प्रदर्शन पर 6,000 रुपए प्रति हेक्टेयर, बेबीकौर्नर्न मक्का पर 40,000 रुपए प्रति हेक्टेयर एवं स्वीटकौर्नर्न मक्का पर 50,000 रुपए प्रति हेक्टेयर अनुदान दिया जाएगा.

इस के अतिरिक्त प्रदेश के सभी विकास खंडों पर मक्का, बाजरा एवं ज्वार के हाईब्रिड बीज के निजी कंपनियों के स्टौल लगाए जा रहे हैं. इन बीजों पर भी 50 प्रतिशत अनुदान आप के खाते में भेजा जायेगा.

विकास खंड के विक्रय केंद्रों पर मिलेट्स में मडुआ, सावा, कोदो, बाजरा के मुफ्त बीज मिनी किट के साथ दलहन और तिलहन के बीज विशेषकर उड़द, मूंग, अरहर एवं तिल के बीज सामान्य वितरण कार्यक्रम में भेजे गए हैं, जो पीओएस मशीन से बीज पर मिलने वाले अनुदान को समायोजित कर मात्र 50 प्रतिशत कीमत के भुगतान पर किसानों को मिल जाएगा, इसलिए आप सभी से अनुरोध है कि मौसम को देखते हुए आप अपने खाली खेतों में मक्का, मिलेट्स, दलहन और तिल की फसलों की बोआई शुरू कर दें, जिस से आप का किसानी का काम समय से पूरा हो सके और आप संभावित आर्थिक क्षति से अपनेआप को बचा सकें.

बाजरा (millet) की उन्नत किस्मों से बढ़े पैदावार

हमारे देश में बाजरा उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में खासकर उगाया जाता है और राजस्थान में तो बाजरा काफी मात्रा में उगाया जाता है क्योंकि बाजरा कम पानी में पैदा होने वाली फसल है और उत्तर प्रदेश में पैदावार के मामले में गेहूं, धान, मक्का के बाद बाजरे का ही नंबर आता है.

बाजरा मोटे अनाजों की श्रेणी में आता है और बाजरे की फसल को पशुओं के लिए पौष्टिक हरे चारे के रूप में भी उगाया जाता है.

पुराने समय में लोग ज्यादातर बाजरा व मक्का जैसे मोटे अनाजों की ही रोटी खाते थे. उस समय गेहूं की खेती बहुत ही कम होती थी. आज के समय में भी बाजरे को लोग बड़े चाव से इस्तेमाल करते हैं. तरहतरह के पकवानों में इस का इस्तेमाल होता है.

आज अनेक बड़ी कंपनियां मल्टीग्रेन आटे में भी बाजरे का इस्तेमाल करती हैं. बाजरे से अनेक प्रकार के बिसकुट, नमकीन, केक जैसी अनेक पौष्टिक चीजें बन रही हैं. बहुत से लोग तो इस तरह की चीजों को बना कर बेचते भी हैं. इन्हें बनाने के लिए कई इलाकों में ट्रेनिंग भी दी जाती है.

बाजरा कम पानी में पैदा होने वाली फसल है, जिस की थोड़ी देखभाल और कर ली जाए तो बेहतर नतीजे आते हैं. तो आइए जानते हैं बाजरे की पैदावार बढ़ाने के उन खास तौरतरीकों को और उन खास बीजों को, जिन की जानकारी हमें बाजरा अनुभाग, चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार से मिली है.

पैदावार के उपाय

* बाजरे की खेती करने के लिए गरमी के दिनों में खेत की 1-2 जुताई और 3-4 सालों में एक बार गहरी जुताई जरूर करनी चाहिए जो बीमारी रोकने और जमीन में नमी बनाए रखने के लिए बहुत ही जरूरी है.

* सिफारिश के मुताबिक सही मात्रा में प्रमाणित और उपचारित बीज (1.5-2 किलोग्राम प्रति एकड़) का इस्तेमाल करना चाहिए.

* बिजाई लाइनों में करनी चाहिए और लाइन से लाइन का फासला 45 सैंटीमीटर रखें. बोआई इस प्रकार करें कि बीज तकरीबन 2.0 सैंटीमीटर गहराई पर पड़ें. पौधे से पौधे की दूरी 10 से 12 सैंटीमीटर रहे.

* बेहतर फसल के लिए रिजर सीड ड्रिल का बिजाई के लिए इस्तेमाल करना चाहिए.

* जुलाई का पहला पखवाड़ा इस की बिजाई का सही समय है. परंतु 10 जून के बाद भी 50-60 मिलीमीटर बारिश होने पर बाजरे की बिजाई की जा सकती है.

* बिजाई के 3 से 5 हफ्ते बाद निराईगुड़ाई जरूरी है जो खरपतवार की रोकथाम तो करती ही है साथ ही नमी बनाए रखने के लिए भी सही है: इस से पौधों की जड़ों तक सही मात्रा में हवा का भी आवागमन हो जाता है.

* अगर निराईगुड़ाई नहीं कर सकते या फिर मजदूरों की कमी है तो खरपतवारनाशक एट्राजिन (50 फीसदी) 400 ग्राम प्रति एकड़ 250 लिटर पानी में मिला कर बिजाई के समय छिड़कें. यदि बिजाई के तुरंत बाद एट्राजीन का इस्तेमाल न कर सकें तो बिजाई के 10-15 दिन के बाद भी उतनी ही मात्रा का इस्तेमाल कर सकते हैं.

* बिजाई के 3 हफ्ते बाद देखें कि जहां कम पौधे हैं वहां पर खाली जगह है, वहां पर दोबारा बीज डाल दें. बारिश वाले दिन यह काम अति उचित है ताकि सही तादाद में पौधे हासिल हो सकें और बेहतर पैदावार मिल सके.

* उर्वरक की मात्रा मिट्टी जांच के आधार पर इस्तेमाल करें.

* फसल में फुटाव होना, फूल आना और बीज की दूधिया अवस्था में बारिश न होने पर सिंचाई करना बहुत जरूरी है और बारिश आधारित इलाकों में नमी बनाए रखने के लिए विभिन्न उपायों का इस्तेमाल करना बहुत जरूरी है.

* बाजरे की उत्पादन कूवत 50-55 मन प्रति एकड़ तक मिल सकती है लेकिन यह तभी संभव है जब किसान उपरोक्त बातों का ध्यान रखेंगे.

बाजरा (millet)

बाजरे की उन्नत किस्में

एचएचबी 67 (संशोधित) : इस संकर किस्म में बायोटैक्नोलौजी विधि से जोगिया प्रतिरोधी जीन डाले गए हैं. देखने से यह किस्म हूबहू एचएचबी 67 जैसी ही है लेकिन इस में जोगिया बीमारी नहीं लगती और सिट्टों पर छोटेछोटे बाल भी होते हैं.

इस के दानों व सूखे चारे की औसत पैदावार क्रमश: 31 मन व 90 मन प्रति एकड़ है. यह किस्म 62 से 65 दिन में पक कर तैयार हो जाती है. इस वजह से यह किस्म कुछ हद तक सूखे की स्थिति को सहन करने में सक्षम है और वैज्ञानिक विधि द्वारा खेती करने की अवस्था में यह 37.5 मन प्रति एकड़ तक पैदावार दे सकती है.

एचएचबी 197 : इस संकर किस्म में सिट्टों पर लंबे बाल होते हैं जो फसल को पक्षियों के नुकसान से रोकते हैं. यह किस्म अच्छे फुटाव वाली होने के साथसाथ जोगिया व कांगियारी रोगरोधी भी है. इस के दानों व सूखे चारे की औसत उपज क्रमश: 35 मन व 115 मन प्रति एकड़ है. यह किस्म 68-72 दिन में पक कर तैयार हो जाती है. अच्छे प्रबंधन से यह किस्म 50 मन प्रति एकड़ तक पैदावार दे सकती है.

एचएचबी 223 : यह किस्म जोगिया रोगरोधी व कांगियारी के प्रति सहनशील है. इस किस्म के सिट्टों पर जामुनी रंग के लंबे बाल होते हैं जो फसल को पक्षियों के नुकसान से बचाते हैं. इस के दानों व सूखे चारे की औसत उपज क्रमश: 36.3 मन व 115 मन प्रति एकड़ है. यह किस्म 72-75 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है.

मध्यम ऊंचाई की बढ़ने वाली इस संकर किस्म में फुटाव अच्छा होता है. पत्तियां मध्यम चौड़ी व गहरे हरे रंग की होती हैं. अच्छा रखरखाव करने पर यह किस्म 55 मन प्रति एकड़ पैदावार दे सकती है.

एचएचबी 226 : इस किस्म के सिट्टे मोमबत्ती के आकार के मध्यम लंबे होते हैं जिन पर भूरे रंग के लंबे बाल होते हैं जो फसल को पक्षियों के नुकसान से बचाते हैं.

इस के दानों व सूखे चारे की औसत उपज क्रमश: 35 मन व 115 मन प्रति एकड़ है. यह किस्म 70-72 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है.

अच्छा रखरखाव करने पर यह संकर किस्म 44 मन प्रति एकड़ तक पैदावार देने की कूवत रखती है. यह किस्म सूखे के प्रति सहनशील है और जोगिया रोगरोधी है.

एचएचबी 234 : इस किस्म के सिट्टे मध्यम लंबे होते हैं. इस के दानों व सूखे चारे की औसत उपज क्रमश: 31 मन व 95-98 मन प्रति एकड़ है. यह किस्म 70-72 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है. अच्छा रखरखाव करने पर यह संकर किस्म 45 मन प्रति एकड़ तक पैदावार देने की कूवत रखती है. यह किस्म सूखे के प्रति सहनशील है और जोगिया रोगरोधी है.

एचएचबी 272 : इस किस्म के सिट्टे मध्यम लंबे होते हैं. इस के दानों व सूखे चारे की औसत उपज क्रमश: 37.3 मन व 90 मन प्रति एकड़ है. यह किस्म 65-68 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है.

अच्छा रखरखाव करने पर यह संकर किस्म 44.8 मन प्रति एकड़ तक पैदावार देने की कूवत रखती है. यह किस्म सूखे के प्रति सहनशील है और जोगिया रोगरोधी है.

एचसी 10 व एचसी 20 : जोगिया प्रतिरोधक संयुक्त किस्में, मध्यम मोटा तना, सीधा लंबा व ऊपर से थोड़ा पतला सिट्टा. सामान्य बीजाई के लिए उपयुक्त, चारा ज्यादा गुणवत्ता वाला. एचसी 10 व एचसी 20 के दानों व सूखे चारे की औसत उपज क्रमश: 29 मन व 125 मन और 31 मन व 130 मन प्रति एकड़ है. एचसी 10 व एचसी 20 किस्म क्रमश: 75-80 व 80-83 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है.

मोटे अनाजों की खेती

लघु या छोटी धान्य फसलों जैसे मंडुआ, सावां, कोदों, चीना, काकुन आदि को मोटा अनाज कहा जाता है. इन सभी फसलों के दानों का आकार बहुत छोटा होता है. लघु अनाज पोषक तत्त्वों और रेशे से भरपूर होने के चलते इस का औषधीय उपयोग भी है.

यह आयरन, कैल्शियम और प्रोटीन के साथसाथ फास्फोरस का भी अच्छा स्रोत है. मंडुआ से रोटी, ब्रेड, सत्तू, लड्डू, बिसकुट आदि तैयार किए जाते हैं, वहीं सावां, कोदों, चीना व काकुन को चावल, खीर, दलिया व मर्रा के रूप में उपयोग करते हैं और पशुओं को चारा भी मिल जाता है.

जहां मुख्य अन्य फसलें नहीं उगाई जा सकती हैं, वहां पर ये फसलें आसानी से उगा ली जाती हैं. ये फसलें सूखे व अकाल को सहन कर लेती हैं और 70-115 दिन में तैयार हो जाती हैं. फसलों पर कीट व रोगों का प्रकोप कम होता है.

ग्रामीण क्षेत्रों में इन मोटे अनाजों के बारे में अनेक कहावतें प्रचलित हैं, जैसे :

मंडुआ मीन, चीन संग दही,

कोदों भात दूध संग लही.

मर्रा, माठा, मीठा.

सब अन्न में मंडुआ राजा.

जबजब सेंको, तबतब ताजा.

सब अन्न में सावां जेठ.

से बसे धाने के हेठ.

 

खेत की तैयारी

 

मिट्टी पलटने वाले हल से एक गहरी जुताई करें. इस के बाद 2-3 बार हैरो से गहरी जुताई करें.

मंडुआ की उन्नत किस्में

जल्दी पकने वाली प्रजाति (90-95 दिन) वीआर 708, वीएल 352, जीपीयू 45 है, जिस की उपज क्षमता प्रति बीघा (2500 वर्गमीटर/20 कट्ठा) 4-5 क्विंटल है.

मध्यम व देर से पकने वाली प्रजाति (100-115 दिन) जीपीयू 28, 67, 85, आरएयू 8 है. इस की उपज क्षमता 5-6 क्विंटल प्रति बीघा है.

सावां की प्रजाति

वीएल 172  (80-85 दिन), वीएल 207, आरएयू 3, 9 (85-90 दिन).

कोदों प्रजाति

जेके 65, 76, 13, 41, 155, 439 (अवधि 85-90 दिन), जीपीयूके पाली, डिडरी (अवधि 100-115 दिन) है.

चीना की प्रजाति

कम अवधि (60-70 दिन) एमएस 4872, 4884 व बीआर 7, मध्यम व देर से पकने वाली प्रजाति (70-75 दिन अवधि) जीपीयूपी 21, टीएनएयू 151, 145 है.

काकुन की उन्नत किस्में

आरएयू 2, को. 4, अर्जुन (75-80 दिन अवधि) व एसआईए 326, 3085, बीजी 1, मध्यम व देर से (80-85 दिन) पकने वाली है.

बीज की दर

प्रति बीघा मंडुआ 2.5-3.0 किलोग्राम सावां, कोदों, चीना, काकुन का 2.0 से 2.5 किलोग्राम की आवश्यकता होती है. सभी फसलों की बोआई जून से जुलाई महीने तक की जाती है.

बोआई की दूरी

मंडुआ में लाइन से लाइन की दूरी 20-25 सैंटीमीटर और पौध से पौध की दूरी 10 सैंटीमीटर रखनी चाहिए. सावां, कोदों, चीना व काकुन के लिए 25-30 सैंटीमीटर लाइन से लाइन और पौध से पौध की दूरी 10 सैंटीमीटर रखें. सभी फसलों की बोआई की गहराई 2 सैंटीमीटर से ज्यादा नहीं होनी चाहिए.

खाद एवं उर्वरक

सभी फसलों में मिट्टी की जांच के आधार पर ही खाद व उर्वरक का प्रयोग करें. बोआई से पहले 17 किलोग्राम यूरिया, 62 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट व 10 किलोग्राम म्यूरेट औफ पोटाश का प्रयोग प्रति बीघा में करें. 25-30 दिन की पौध होने पर निराई के बाद 17 किलोग्राम यूरिया डालें.

उपज क्षमता

सावां, कोदों, चीना व काकुन की जल्दी पकने वाली प्रजातियों की 3-4 क्विंटल और मध्यम व देर से पकने वाली प्रजातियों की उपज 3.50 से 4.50 क्विंटल प्रति बीघा है.

अंत:वर्ती खेती

अरहर, ज्वार व मक्का के साथ आसानी से मोटे अनाजों की अंत:खेती की जा सकती है.

मोटे अनाज (श्री अन्न) का प्रयोग करें किसान

बस्ती : अंतर्राष्ट्रीय मिलेट वर्ष 2023-24 के तहत उत्तर प्रदेश मिलेट्स पुनरुद्धार कार्यक्रम के अंतर्गत स्कूल कैरिकुलम के माध्यम से अध्यापकों का एकदिवसीय प्रशिक्षण का जिलाधिकारी अंद्रा वामसी एवं मुख्य विकास अधिकारी जयदेव सीएस ने नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, कुमारगंज, अयोध्या द्वारा संचालित कृषि विज्ञान केंद्र, बस्ती पर स्थित नानाजी देशमुख सभागार में कार्यक्रम का आयोजन हुआ.

जिलाधिकारी अंद्रा वामसी ने केंद्र के वैज्ञानिकों को निर्देशित किया कि केंद्र पर सालभर विभिन्न प्रजाति के मोटे अनाजों जैसे सांवा, कोदो, मडुवा, ज्वार आदि का उत्पादन करने के लिए प्रशिक्षण व प्रदर्शन कराए, जिस से बेरोजगार स्वरोजगार के रूप में इसे अपना कर स्वास्थ्य वृद्धि व आय अर्जित कर सकें.

जिलाधिकारी अंद्रा वामसी ने बताया कि परंपरागत फसलों की अपेक्षा मोटे अनाजों में पोषक तत्व ज्यादा होते हैं. उन्होंने इंडोइजराइल फल उत्कृष्टता केंद्र का भ्रमण किया और इस केंद्र द्वारा किसानों के हित में किए जा रहे कामों की सराहना की.

Shri Annउन्होंने भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली के सहयोग से संचालित काला नमक धान की विभिन्न प्रजातियों के ट्रायल, पौलीहाउस, नेटहाउस, मातृवृक्ष फल पौधशाला, जगरी यूनिट, बकरीपालन, मुरगीपालन एवं जैविक उत्पादन इकाई (वर्मी कंपोस्ट एवं अजोला यूनिट) का अवलोकन किया. साथ ही, उन्होंने नेटहाउस व फलवृक्ष मातृ पौधशाला में लगी हुई आम, चीकू, शरीफा, सेब, अंजीर, नीबू, आंवला, कटहल, लीची, पपीता आदि की विभिन्न किस्मों को देख कर प्रसन्नता व्यक्त की और निर्देशित किया कि इन की अधिक से अधिक पौध तैयार कर अध्यापकों के माध्यम से किसानों में पहुंचाएं.

मुख्य विकास अधिकारी जयदेव सीएस ने मोटे अनाज की खेती को जनपद में बढ़ावा देने के लिए वैज्ञानिकों को निर्देश दिया कि कार्य योजना बना कर किसानों को मिलेट क्राप की तकनीक पर प्रशिक्षण व प्रदर्शन आयोजित करें.

केंद्र के अध्यक्ष डा. एसएन सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि पौलीहाउस में बेमौसमी सब्जियों की पौध उपलब्ध हैं. वहीं उपनिदेशक, कृषि, अनिल कुमार ने मोटे अनाजो की महत्ता पर बल दिया.

केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. डीके श्रीवास्तव ने जिलाधिकारी अंद्रा वामसी को अवगत कराया कि केंद्र द्वारा जिले की गौशालाओं को निःशुल्क नैपियर घास वितरित की जा रही है. किसानों तक कृषि तकनीकों को पहुंचाने हेतु प्रगतिशील किसानों का एक व्हाट्सएप ग्रुप बनाया गया है, जिस पर आवश्यक सलाहकारी सेवाएं समयसमय पर दी जाती हैं.

कार्यक्रम का संचालन डा. बीबी सिंह ने किया. इस अवसर पर जिला कृषि अधिकारी मनीष कुमार सिंह, केंद्र के वैज्ञानिक डा. प्रेम शंकर, हरिओम मिश्र और संबंधित अधिकारी उपस्थित रहे.

नया रिवाज – मोटे अनाज

पारंपरिक भारतीय अनाजों में स्वास्थ्य का खजाना छिपा है. बीते कुछ सालों में कई ऐसी फसलें खेतों में लगी हैं और फिर ऐसा खाना थाली में लौट आया है, जिन्हें कुछ वक्त पहले तक बिलकुल भुला दिया गया था. भारत में 60 के दशक के पहले तक मोटा अनाज हमारे भोजन का हिस्सा था. तकरीबन 5-6 दशक पहले कुछ फसलें नाममात्र थीं. उदाहरण के लिए, धान और कोदो की एकसाथ बोई गई फसल को धनकोडाई कहा जाता था. इसी प्रकार गेहूं और जौ के साथ बोई गई फसल को गोजाई कहा जाता था.

ये फसलें अपनी परंपरा में इस कदर समाई थीं कि उन दिनों गांव में कुछ लोग गोजाई और कोडाई के नाम से भी मिलते थे. खाद्य क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने के लिए और कुपोषण पर काबू पाने के लिए भारत में 60 के दशक में हरित क्रांति हुई और उस के परिणामस्वरूप चावल और गेहूं की अधिक पैदावार वाली किस्मों को उगाया जाना शुरू किया गया और धीरेधीरे हम मोटे अनाज को भूल गए.

वर्ष 1960 और 2015 के बीच, गेहूं का उत्पादन 3 गुना से भी अधिक हो गया और चावल के उत्पादन में 800 फीसदी की वृद्धि हुई, लेकिन इस दौरान मोटे अनाजों का उत्पादन कम ही बना रहा. जिस अनाज को हम 6,500 साल से खा रहे थे, उस से हम ने मुंह मोड़ लिया और आज पूरी दुनिया उसी मोटे अनाज की तरफ वापस लौट रही है और बाजार में इन्हें सुपर फूड का दर्जा दिया गया है.

वैश्विक स्तर पर मोटे अनाजों में भारत का स्थान देखें, तो उन के उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी 20 फीसदी के करीब है. एशिया के लिहाज से यह हिस्सेदारी करीब 80 फीसदी है. इस में बाजरा और ज्वार हमारी मुख्य फसल हैं खासकर बाजरे के उत्पादन में भारत दुनिया में पहले नंबर पर है और उत्तर प्रदेश भारत में पहले नंबर पर है, इसलिए अंतर्राष्ट्रीय बाजरा वर्ष को सफल बनाने में भारत, खासकर उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी बढ़ जाती है. राज्य सरकार भी इस के लिए पूरी तरह से तैयार है. बाजरे को लोकप्रिय बनाने की पूरी योजना पहले ही तैयार की जा चुकी है.

मोटे अनाजों को बढ़ावा देने के लिए ही सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य को बढ़ाया गया है. इस के अलावा उपज की बिक्री के लिए एक टिकाऊ बाजार मुहैया करने के उद्देश्य से सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली को शामिल किया है.

अब इस के लिए गुणवत्तापूर्ण बीजों की उपलब्धता पर ध्यान दिया जा रहा है. सरकार द्वारा किसानों को बीज किट और निवेश लागत उपलब्ध कराई गई है. इसी अवधि के दौरान मोटे अनाज की 150 से अधिक उन्नत किस्में, जो अधिक उपज देने वाली और रोग प्रतिरोधी हैं, को भी लौंच किया गया है.

क्या हैं मोटे अनाज

मोटे अनाज की श्रेणी में ज्वार, बाजरा, मक्का, रागी, कोदो, सामा और कुटकी जैसे पुरातन पारंपरिक अनाज आते हैं. इन्हें मोटा अनाज 2 कारणों से कहा जाता है. एक तो इन की सतह खुरदरी होती है. दूसरा, इन के उत्पादन में ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती. ये अनाज कम पानी और कम उपजाऊ भूमि में भी उगाए जा सकते हैं.

अधिकांश मोटे अनाज कम उर्वरता वाली मिट्टी में उगाए जा सकते हैं. कुछ अम्लीय मिट्टी में, कुछ लवणीय मिट्टी में. बाजरे को रेतीली मिट्टी में भी उगाया जा सकता है, जैसा कि राजस्थान में होता है.

मोटे अनाज के भंडारण में कोई विशेष देखभाल नहीं करनी पड़ती. ये अनाज जल्दी खराब भी नहीं होते. 10 से 12 साल बाद भी ये खाने के लायक होते हैं.

गरीब का भोजन बता कर भारतीयों द्वारा लगभग छोड़ दिए गए इस पोषक अनाज की महत्ता विश्व स्तर पर साबित होने के बाद अब इस अनाज के सम्मान में वर्ष 2023 को ‘इंटरनेशनल ईयर आफ मिलेट्स’ के रूप में राष्ट्रों ने समर्पित किया है. गौरतलब है कि भारत ने वर्ष 2018 में ही मिलेट ईयर मनाया था.

बहुद्देशीय मोटे अनाज  

वैसे, चावल के मुकाबले मोटे अनाज 70 फीसदी कम पानी की खपत करते हैं. इस को इस्तेमाल के लिए तैयार करने में 40 फीसदी कम ऊर्जा की जरूरत होती है.

पोषक तत्त्वों का पावरहाउस होने के अलावा बाजरा पर्यावरण के लिए अनुकूल भी है. उन्हें कम उर्वरक, पानी की आवश्यकता होती है और वे किसी भी प्रकार की भूमि में विकसित हो सकते हैं.

खेत की तैयारी से ले कर जमीन की जुताई से ले कर सिंचाई तक में कम ऊर्जा और डीजल का प्रयोग होता है, जिस से पर्यावरण संरक्षण होता है. इस के अलावा रसायनों, उर्वरकों और कीटनाशकों के जहर से लोगों, जमीन और पानी को काफी हद तक बचाया जाता है. दूसरे अनाज के मुकाबले मोटे अनाज में पोषण के गुण ज्यादा मात्रा में मौजूद हैं.

पारंपरिक भारतीय अनाजों में स्वास्थ्य का खजाना छिपा है. बीते कुछ सालों में कई ऐसी फसलें खेतों में लगी हैं और फिर ऐसा खाना थाली में लौट आया है, जिन्हें कुछ वक्त पहले तक बिलकुल भुला दिया गया था. भारत में 60 के दशक के पहले तक मोटा अनाज हमारे भोजन का हिस्सा था. तकरीबन 5-6 दशक पहले कुछ फसलें नाममात्र थीं. उदाहरण के लिए, धान और कोदो की एकसाथ बोई गई फसल को धनकोडाई कहा जाता था. इसी प्रकार गेहूं और जौ के साथ बोई गई फसल को गोजाई कहा जाता था.

ये फसलें अपनी परंपरा में इस कदर समाई थीं कि उन दिनों गांव में कुछ लोग गोजाई और कोडाई के नाम से भी मिलते थे. खाद्य क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने के लिए और कुपोषण पर काबू पाने के लिए भारत में 60 के दशक में हरित क्रांति हुई और उस के परिणामस्वरूप चावल और गेहूं की अधिक पैदावार वाली किस्मों को उगाया जाना शुरू किया गया और धीरेधीरे हम मोटे अनाज को भूल गए.

वर्ष 1960 और 2015 के बीच, गेहूं का उत्पादन 3 गुना से भी अधिक हो गया और चावल के उत्पादन में 800 फीसदी की वृद्धि हुई, लेकिन इस दौरान मोटे अनाजों का उत्पादन कम ही बना रहा. जिस अनाज को हम 6,500 साल से खा रहे थे, उस से हम ने मुंह मोड़ लिया और आज पूरी दुनिया उसी मोटे अनाज की तरफ वापस लौट रही है और बाजार में इन्हें सुपर फूड का दर्जा दिया गया है.

वैश्विक स्तर पर मोटे अनाजों में भारत का स्थान देखें, तो उन के उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी 20 फीसदी के करीब है. एशिया के लिहाज से यह हिस्सेदारी करीब 80 फीसदी है. इस में बाजरा और ज्वार हमारी मुख्य फसल हैं खासकर बाजरे के उत्पादन में भारत दुनिया में पहले नंबर पर है और उत्तर प्रदेश भारत में पहले नंबर पर है, इसलिए अंतर्राष्ट्रीय बाजरा वर्ष को सफल बनाने में भारत, खासकर उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारी बढ़ जाती है. राज्य सरकार भी इस के लिए पूरी तरह से तैयार है. बाजरे को लोकप्रिय बनाने की पूरी योजना पहले ही तैयार की जा चुकी है.

मोटे अनाजों को बढ़ावा देने के लिए ही सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य को बढ़ाया गया है. इस के अलावा उपज की बिक्री के लिए एक टिकाऊ बाजार मुहैया करने के उद्देश्य से सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली को शामिल किया है.

अब इस के लिए गुणवत्तापूर्ण बीजों की उपलब्धता पर ध्यान दिया जा रहा है. सरकार द्वारा किसानों को बीज किट और निवेश लागत उपलब्ध कराई गई है. इसी अवधि के दौरान मोटे अनाज की 150 से अधिक उन्नत किस्में, जो अधिक उपज देने वाली और रोग प्रतिरोधी हैं, को भी लौंच किया गया है.

क्या हैं मोटे अनाज

मोटे अनाज की श्रेणी में ज्वार, बाजरा, मक्का, रागी, कोदो, सामा और कुटकी जैसे पुरातन पारंपरिक अनाज आते हैं. इन्हें मोटा अनाज 2 कारणों से कहा जाता है. एक तो इन की सतह खुरदरी होती है. दूसरा, इन के उत्पादन में ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ती. ये अनाज कम पानी और कम उपजाऊ भूमि में भी उगाए जा सकते हैं.

अधिकांश मोटे अनाज कम उर्वरता वाली मिट्टी में उगाए जा सकते हैं. कुछ अम्लीय मिट्टी में, कुछ लवणीय मिट्टी में. बाजरे को रेतीली मिट्टी में भी उगाया जा सकता है, जैसा कि राजस्थान में होता है.

मोटे अनाज के भंडारण में कोई विशेष देखभाल नहीं करनी पड़ती. ये अनाज जल्दी खराब भी नहीं होते. 10 से 12 साल बाद भी ये खाने के लायक होते हैं.

गरीब का भोजन बता कर भारतीयों द्वारा लगभग छोड़ दिए गए इस पोषक अनाज की महत्ता विश्व स्तर पर साबित होने के बाद अब इस अनाज के सम्मान में वर्ष 2023 को ‘इंटरनेशनल ईयर आफ मिलेट्स’ के रूप में राष्ट्रों ने समर्पित किया है. गौरतलब है कि भारत ने वर्ष 2018 में ही मिलेट ईयर मनाया था.

बहुद्देशीय मोटे अनाज

वैसे, चावल के मुकाबले मोटे अनाज 70 फीसदी कम पानी की खपत करते हैं. इस को इस्तेमाल के लिए तैयार करने में 40 फीसदी कम ऊर्जा की जरूरत होती है.

पोषक तत्त्वों का पावरहाउस होने के अलावा बाजरा पर्यावरण के लिए अनुकूल भी है. उन्हें कम उर्वरक, पानी की आवश्यकता होती है और वे किसी भी प्रकार की भूमि में विकसित हो सकते हैं.

खेत की तैयारी से ले कर जमीन की जुताई से ले कर सिंचाई तक में कम ऊर्जा और डीजल का प्रयोग होता है, जिस से पर्यावरण संरक्षण होता है. इस के अलावा रसायनों, उर्वरकों और कीटनाशकों के जहर से लोगों, जमीन और पानी को काफी हद तक बचाया जाता है. दूसरे अनाज के मुकाबले मोटे अनाज में पोषण के गुण ज्यादा मात्रा में मौजूद हैं.

पर्यावरण में योगदान

* मोटे अनाज अपेक्षाकृत ज्यादा तापमान में फलफूल सकते हैं और सीमित पानी की आपूर्ति में भी इन का उत्पादन होता है. मोटे अनाज बेहद गरम तापमान से ले कर सूखे और खारेपन को भी बरदाश्त कर सकते हैं.

* पानी के हिसाब से देखें, तो मोटे अनाज की वृद्धि के लिए धान के मुकाबले 6 गुना कम पानी की जरूरत होती है. धान के लिए जहां औसत 120-140 सैंटीमीटर बारिश की आवश्यकता होती है, वहीं मोटे अनाज के लिए सिर्फ 20 सैंटीमीटर, कुछ मोटे अनाज को तैयार होने में 45-70 दिन का समय लगता है, जो चावल (120-140 दिन) के मुकाबले आधा है.

* मोटे अनाज के सी4 ग्रुप का होने की वजह से मोटे अनाज ज्यादा मात्रा में कार्बनडाईऔक्साइड को औक्सीजन में बदलते हैं और इस तरह से ये जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने में योगदान देते हैं.

* कम से कम पानी की खपत, कम कार्बन फुटप्रिंट वाली वजह से मोटे अनाज की उपज सूखे की स्थिति में भी संभव है. यही वजह है कि ये जलवायु के अनुकूल फसल की श्रेणी में आते हैं. खासतौर पर जलवायु परिवर्तन से प्रभावित क्षेत्रों में, दबाव में कमी के जरीए मोटे अनाज की खेती के सकारात्मक असर का संकेत मिलता है.

खेती के लिए जलवायु

* ज्वार, रागी, बाजरा आदि खरीफ फसलों के रूप में उगाए जाते हैं यानी जून से नवंबर माह के बीच मानसून या शरद ऋतु की फसलें उगाई जाती हैं, क्योंकि उन की नमी और वर्षा की आवश्यकताएं ऐसी होती हैं.

* मोटे अनाज उन क्षेत्रों में अच्छी तरह से उगाया जा सकता है, जहां अन्य फसलें नहीं उगती हैं.

* बाजरे की खेती वर्षा सिंचित परिस्थितियों में की जाती है, जिन्हें बहुत कम या कोई सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है, क्योंकि उन्हें अधिक मात्रा में नमी की आवश्यकता नहीं होती है. इस के अलावा मोटे अनाज अन्य फसलों की तुलना में जलवायु के झटकों के प्रति अधिक अनुकूल और सहनशील होते हैं.

* बाजरे की खेती का मौसम तकरीबन 65 दिनों का होता है, जो इसे वर्षा सिंचित और सिंचित दोनों क्षेत्रों में बहुफसली प्रणालियों का हिस्सा बनने की अनुमति देता है.

 

सेहत के लिए फायदेमंद मोटे अनाज

ज्वार, बाजरा और रागी जैसे मोटे अनाज में पौष्टिकता की भरमार होती है. सभी मोटे अनाजों में प्रोटीन, डायटरी फाइबर, मैग्नीशियम, आयरन, कैल्शियम एवं विटामिन भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं, जो हमारे भोजन को पौष्टिक बनाते हैं. मोटे अनाज में एंटीऔक्सीडैंट पर्याप्त मात्रा में होता है और ये संभावित स्वास्थ्य फायदों के साथ प्रोबायोटिक्स की क्षमता को बढ़ाने में मदद करते हैं. मोटे अनाज कोलैस्ट्रौल को कम करने में मदद करते हैं, क्योंकि इन में पौलीअनसैचुरेटेड एसिड और ओमेगा-3 एसिड भरपूर मात्रा में होते हैं. ये शरीर की रोग प्रतिरोधक प्रणाली में एक भूमिका अदा करते हैं और बचपन के कुपोषण एवं आयरन की कमी से एनीमिया को रोकने का समाधान हैं. यही कारण है कि आधुनिक विज्ञान कई शोधों के बाद मोटे अनाज को पोषण का ‘पावरहाउस’ बता रहा है.

बाजरा

बाजरा को पर्ल मिलेट के नाम से भी जाना जाता है. बाजरे में एंटीऔक्सीडैंट्स घुलनशील और अघुलनशील फाइबर, आयरन और प्रोटीन प्रचुरता में होते हैं. बाजरे का ग्लाईसेमिक इंडैक्स कम होने की वजह से यह डायबिटीज में फायदेमंद है. बाजरा रक्त में ट्राईग्लिसराइड और रक्त शर्करा (ब्लड शुगर) के स्तर को काबू रखता है. अघुलनशील फाइबर की अधिकता के कारण वजन कम करने में भी सहायक है. कैल्शियम की कमी होने पर भी इस के आटे की रोटियां खाने की सलाह दी जाती है.

जौ

जौ ऐसा मोटा अनाज है, जिस में फाइबर पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है. इस का सेवन शरीर को ठंडक देता है, इसलिए इसे गरमियों में भी खाया जा सकता है. यह मैग्नीशियम का भी अच्छा स्रोत है. जौ में अन्य अनाजों की तुलना में ज्यादा अलकोहल पाया जाता है.

रागी

रागी या फिंगर मिलेट में कौंप्लैक्स कार्बोहाइड्रेट पाए जाते हैं. हाई फाइबर और हाई प्रोटीन से युक्त इसे खून में शर्करा को काबू रखने में फायदेमंद माना जाता है. वजन नियंत्रित करने के साथ यह मानसिक सेहत के लिए भी फायदेमंद है. गर्भवती महिलाओं को खासतौर पर इसे खाने की सलाह दी जाती है.

ज्वार

इस में फाइबर और एंटीऔक्सीडैंट्स पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं. साथ ही, इस में विटामिन-बी कौंप्लैक्स पाया जाता है. उम्र बढ़ने के साथ शरीर में विटामिन बी की पूर्ति बनाए रखना जरूरी हो जाता है. ज्वार रक्त में शर्करा व कोलैस्ट्रौल कम रखने में भी सहायक माना जाता है. ज्वार के आटे को गेहूं के आटे के साथ मिला कर भी खाया जा सकता है.

मक्का

मक्का कई तरह से खाया जाता रहा है. गेहूं, चना के आटे के साथ भी इस के आटे को मिला कर खाते हैं. इस में फाइबर पर्याप्त होता है. नाश्ते में मक्का को दलिया के रूप में लेने से यह उच्च रक्तचाप और हृदय रोगों की रोकथाम में सहायक है. पेट के अल्सर से ग्रस्त लोगों के लिए भी यह सुपाच्य अनाज है.

जई (ओट्स)

फाइबर ज्यादा होने के कारण यह बहुत ही सुपाच्य होता है. यही वजह है कि वजन कम करने के इच्छुकों को ओट्स खाने की सलाह दी जाती है. कब्ज में भी यह फायदेमंद है. बेहतर है कि फल व सब्जियां मिला कर दलिए की तरह खाएं.

जई में अन्य पोषक तत्त्वों के साथ फोलिक एसिड भी होता है, जो बच्चों के विकास के लिए उपयोगी है. गर्भवती महिलाओं में इसे खाना शिशु के लिए अच्छा माना जाता है. इस में कैंसररोधी गुण भी पाया जाता है.

पर्यावरण में योगदान

* मोटे अनाज अपेक्षाकृत ज्यादा तापमान में फलफूल सकते हैं और सीमित पानी की आपूर्ति में भी इन का उत्पादन होता है. मोटे अनाज बेहद गरम तापमान से ले कर सूखे और खारेपन को भी बरदाश्त कर सकते हैं.

* पानी के हिसाब से देखें, तो मोटे अनाज की वृद्धि के लिए धान के मुकाबले 6 गुना कम पानी की जरूरत होती है. धान के लिए जहां औसत 120-140 सैंटीमीटर बारिश की आवश्यकता होती है, वहीं मोटे अनाज के लिए सिर्फ 20 सैंटीमीटर, कुछ मोटे अनाज को तैयार होने में 45-70 दिन का समय लगता है, जो चावल (120-140 दिन) के मुकाबले आधा है.

* मोटे अनाज के सी4 ग्रुप का होने की वजह से मोटे अनाज ज्यादा मात्रा में कार्बनडाईऔक्साइड को औक्सीजन में बदलते हैं और इस तरह से ये जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने में योगदान देते हैं.

* कम से कम पानी की खपत, कम कार्बन फुटप्रिंट वाली वजह से मोटे अनाज की उपज सूखे की स्थिति में भी संभव है. यही वजह है कि ये जलवायु के अनुकूल फसल की श्रेणी में आते हैं. खासतौर पर जलवायु परिवर्तन से प्रभावित क्षेत्रों में, दबाव में कमी के जरीए मोटे अनाज की खेती के सकारात्मक असर का संकेत मिलता है.

 खेती के लिए जलवायु

* ज्वार, रागी, बाजरा आदि खरीफ फसलों के रूप में उगाए जाते हैं यानी जून से नवंबर माह के बीच मानसून या शरद ऋतु की फसलें उगाई जाती हैं, क्योंकि उन की नमी और वर्षा की आवश्यकताएं ऐसी होती हैं.

* मोटे अनाज उन क्षेत्रों में अच्छी तरह से उगाया जा सकता है, जहां अन्य फसलें नहीं उगती हैं.

* बाजरे की खेती वर्षा सिंचित परिस्थितियों में की जाती है, जिन्हें बहुत कम या कोई सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है, क्योंकि उन्हें अधिक मात्रा में नमी की आवश्यकता नहीं होती है. इस के अलावा मोटे अनाज अन्य फसलों की तुलना में जलवायु के झटकों के प्रति अधिक अनुकूल और सहनशील होते हैं.

* बाजरे की खेती का मौसम तकरीबन 65 दिनों का होता है, जो इसे वर्षा सिंचित और सिंचित दोनों क्षेत्रों में बहुफसली प्रणालियों का हिस्सा बनने की अनुमति देता है.