Developed India 2047: छोटे और सीमांत किसानों तक पहुंचेगी टेक्नोलॉजी

कम पानी में खेती, ड्रोन का उपयोग, स्मार्ट कृषि, AI, मशीन लर्निंग में छोटा और सीमांत किसान कैसे लाभ ले सकता है, इस पर सरकार और वैज्ञानिकों को साथ मिलकर काम करना है. ये कहना है केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान का, अंतर्राष्ट्रीय शस्य विज्ञान कांग्रेस में किसानों के लिए क्या रहा ख़ास , जानने के लिए पढ़े यह लेख –

International Agronomy Conference

छठा अंतर्राष्ट्रीय शस्य विज्ञान कांग्रेस (IAC–2025) का कार्यक्रम नई दिल्ली के एनपीएल ऑडिटोरियम, पूसा परिसर में 24 – 26 नवंबर तक आयोजित हुआ , जिसमें 20 देशों के कृषि विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया. पहले दिन केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान की भी मौजूदगी रही. यह कांग्रेस भारत को जलवायु–स्मार्ट तथा स्मार्ट कृषि–खाद्य प्रणालियों में वैश्विक नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित करेगी.

कृषि मंत्री को छोटे और सीमांत किसानों की चिंता

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह ने कृषि वैज्ञानिकों से कहा कि, वे ऐसा अनुसंधान करें, जिससे आम किसानों को उसका लाभ मिले. पोषणयुक्त खाद्यान्न की उपलब्धता के साथ किसानों की आजीविका सुरक्षित करने की आवश्यकता बताते हुए कहा कि आज प्राकृतिक खेती को बढ़ाना आवश्यक है, हम सबको चिंता करना जरूरी है कि यह धरती कैसी सुरक्षित रहे. कृषि में विज्ञान के माध्यम से हमने खाद्यान्न उत्पादन में नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं, परंतु छोटी जोत के किसानों की आजीविका सुनिश्चित करने हेतु चिंतन करने की आवश्यकता है.

कृषि वैज्ञानिक करें विचार

कृषि मंत्री ने कहा कि, खराब बीज व मिलावटी इनपुट किसानों को बहुत नुकसान करते हैं, साथ ही मौसम की मार से उत्पाद की गुणवत्ता खराब हो जाती है. बदलती जलवायु परिस्थितियों के अनुसार समाधान देने की आवश्यकता है. साथ ही, दलहन और तिलहन उत्पादक बढ़ाने का समाधान देने की आवश्यकता है. अनुसंधान को सदृढ़ करने पर विचार करने की आवश्यकता है. दलहनों में वायरस अटैक से नुकसान होता है, उस पर भी कृषि वैज्ञानिक विचार करें.

रिसर्च पेपर नहीं किसानों के लिए काम करना होगा

उन्होंने यह भी कहा कि, जैविक कार्बन, सूक्ष्म पोषक तत्व की मृदा में निरंतर कमी हो रही है. डायरेक्ट सीडेड राइस में समस्याएं आ रही हैं, उसमें मैकेनाइजेशन की आवश्यकता है. कार्बन क्रेडिट का लाभ किसानों को मिले, इसको कैसे सुनिश्चित करें, यह भी वैज्ञानिक देखें. कृषि वैज्ञानिक किसानों की समस्याओं का व्यावहारिक समाधान निकालते हुए इंटीग्रेटेड फार्मिंग को प्रोत्साहन दें. छोटे और सीमांत किसानों को नई टेक्नोलॉजी का सही अर्थों में लाभ मिलना सुनिश्चित करना चाहिए. छठी सस्य विज्ञान कांग्रेस की जो भी रिकमेंडेशन आएगी, उनको देश के नीति निर्धारण में शामिल करने पर कार्य किया जाएगा. साथ ही  पेपर लिखने पर रिसर्च करने से आगे बढ़कर किसान के लिए भी काम करने और किसानों की समस्याओं का मिलकर समाधान ढूंढ़ने पर जोर दिया.

सम्मेलन में इन विषयों पर हुआ फोकस

सम्मेलन के विभिन्न सत्रों में जलवायु–सहिष्णुता से लेकर डिजिटल कृषि तक व्यापक चर्चा हुई. जिसके खास बिंदु रहें –

  • जलवायु–सहिष्णु कृषि एवं कार्बन–न्यूट्रल फार्मिंग
    Climate-Resilient Agriculture and Carbon-Neutral Farming
  • प्रकृति–आधारित समाधान और वन–हेल्थ
    Nature-Based Solutions and One Health
  • सटीक इनपुट प्रबंधन और संसाधन दक्षता
    Precision Input Management and Resource Efficiency
  • आनुवंशिक क्षमता का दोहन
    Harnessing Genetic Potential
  • ऊर्जा-कुशल मशीनरी, डिजिटल समाधान और पोस्ट-हार्वेस्ट प्रबंधन
    Energy-Efficient Machinery, Digital Solutions, and Post-Harvest Management
  • पोषण-संवेदनशील कृषि और इको–न्यूट्रिशन
    Nutrition-Sensitive Agriculture and Eco-Nutrition
  • लैंगिक सशक्तिकरण और आजीविका विविधीकरण
    Gender Empowerment and Livelihood Diversification
  • कृषि 5.0, नेक्स्ट–जेन शिक्षा और विकसित भारत 2047
    Agriculture 5.0, Next-Generation Education, and Developed India 2047

युवा वैज्ञानिक एवं छात्र सम्मेलन के सत्र भी आयोजित किए गए.

ICAR के महानिदेशक ने किया संबोधित 

डॉ. एम.एल. जाट ने IAC–2025 को भारतीय शस्य विज्ञान का ‘Turning Point Congress’ बताते हुए कहा, “हमें भविष्य की खेती के लिए फ्यूचरिस्टिक शस्य विज्ञान, डेटा–आधारित निर्णय प्रणाली, AI–enabled advisories, सटीक प्रबंधन तकनीकें, और जलवायु–स्मार्ट कृषि मॉडल विकसित करने होंगे. इस कांग्रेस में प्रस्तुत सुझाव और नवाचार ICAR की दीर्घकालिक शोध दिशा—Vision 2050—और राष्ट्रीय नीति–निर्माण के लिए Guiding Path का कार्य करेंगे. कृषि–विज्ञान को आज के किसान, आज के बाजार और आज की जलवायु–वास्तविकताओं से जोड़ना समय की मांग है.” उन्होंने आश्वस्त किया कि, IAC–2025 की सिफारिशों को ICAR व्यापक शोध कार्यक्रमों में प्राथमिकता के साथ सम्मिलित करेगा.

इन्होंने कही अपनी बात

3 दिन तक चले इस समारोह में डॉ. संजय सिंह राठौर ने IAC–2025 से उभरी प्रमुख सिफारिशों एवं निष्कर्षों को प्रस्तुत किया. डॉ. हिमांशु पाठक ने कहा, “भविष्य की चुनौतियां अलग–थलग प्रयासों से नहीं, बल्कि सिस्टम साइंस के दृष्टिकोण से हल होंगी. हमें अनुसंधान, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और जलवायु परिवर्तन अनुकूलन में मौजूद अंतरालों (research & NRM gaps) की पहचान कर समग्र समाधान विकसित करने होंगे.” डॉ. पंजाब सिंह, पूर्व DG ICAR, और डॉ. अरविंद कुमार, पूर्व कुलपति, CAU झांसी ने भी संबोधित किया.

कौन रहें उपस्थित 

इस मौके पर केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी, केंद्रीय कृषि सचिव डॉ. देवेश चतुर्वेदी, ICAR के महानिदेशक डॉ. मांगीलाल जाट, भारतीय शस्य विज्ञान सोसाइटी के अध्यक्ष डॉ. शांति कुमार शर्मा भी उपस्थित थे.भारतीय शस्य विज्ञान सोसाइटी (ISA) द्वारा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR), भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI), राष्ट्रीय कृषि विज्ञान अकादमी (NAAS) एवं ट्रस्ट फॉर ऐड्वैन्समेंट ऑफ एग्रीकल्चरल साइंसेज (TAAS) के सहयोग से आयोजित इस सम्मेलन में विश्वभर से 1,000 से अधिक प्रतिभागियों ने की सहभागिता की है. इनमें वैज्ञानिक, नीति–निर्माता, कृषि के विद्यार्थी, विकास साझेदार तथा उद्योग विशेषज्ञ भी शामिल हैं.
फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गनाइजेशन (FAO), अंतर्राष्ट्रीय मक्का एवं गेहूं विकास संस्थान (CIMMYT), अर्द्ध-शुष्क कटिबंधीय क्षेत्रों के लिए अंतर्राष्ट्रीय फसल अनुसंधान संस्थान (ICRISAT), अंतर्राष्ट्रीय धान अनुसंधान संस्थान (IRRI), अंतरराष्ट्रीय शुष्क क्षेत्रों के लिए कृषि अनुसंधान केंद्र (ICARDA), अंतर्राष्ट्रीय उर्वरक विकास केंद्र (IFDC) सहित कई अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के वैज्ञानिक भी उपस्थित रहे.

New Technologies : नई तकनीकों से किसान बढ़ाएं अपनी आमदनी

New Technologies : कृषि विज्ञान केंद्र, राजसमन्द में 32वीं वैज्ञानिक सलाहकार समिति की बैठक पिछले दिनों आयोजित हुई. इस बैठक की अध्यक्षता डा. अजीत कुमार कर्नाटक, महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर ने की. इस बैठक की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने बताया कि किसान कृषि के साथ प्रसंस्करण की नवीन तकनीकों को अपना कर अपनी आमदनी बढ़ाएं और फल एवं सब्जी की उपयोगिता और उत्पादन के बारें में विस्तार से जानकारी दी.

डा. आरएल सोनी, निदेशक, प्रसार शिक्षा निदेशालय, उदयपुर ने बताया कि किसान तकनीकी ज्ञान को अपना कर उन्नत बागबानी और सब्जी उत्पादन द्वारा अधिकतम उपज प्राप्त कर आत्मनिर्भर बने.

डा. जेपी मिश्र निदेशक अटारी जोधपुर, जोनद्वितीय ने सभी विभागों के अधिकारियों से आह्वाहन किया कि दूरदराज में बैठे हुए किसानों को पूरापूरा तकनीकी लाभ मिले, उस के लिए  सभी विभाग मिल बैठ कर कार्य योजना तैयार करें और कृषि विज्ञान केंद्र को अवगत कराएं ताकि, उस के अनुसार किसानों के लिए प्रशिक्षण आयोजित कराएं जा सकें.

इस कार्यक्रम की शुरुआत में डा. पीसी रेगर, वरिष्ठ वैज्ञानिक और अध्यक्ष कृषि विज्ञान केंद्र, राजसमंद ने सभी का स्वागत किया और साल 2024-25 के सालाना प्रगति प्रतिवेदन और साल 2025-26 की कार्य योजना प्रस्तुत की.

इस बैठक में भूपेंद्र सिंह राठौड, संयुक्त निदेशक कृषि विस्तार राजसमंद ने अधिक उत्पादन देने वाली और कम अवधी वाली किस्मों के प्रदर्शन लगाने के बारें में बताया. संतोष दूरीया सहायक उपनिदेशक आत्मा परियोजना कृषि विभाग, राजसमंद ने जैविक खेती के बारे में बताया.

डा. जगदीश चौधरी, शस्य वैज्ञानिक ने समन्वित कृषि प्रणाली को बढ़ावा देने के बारे में और गणपत लौहार कृषि अधिकारी ने प्राकृतिक खेती के बारे में बताया. सेवा मंदिर प्रतिनिधि ने प्रशिक्षण कार्यक्रमों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के बारे में बताया. डा. जगदीश जीनगर उपनिदेशक पशुपालन विभाग ने एनएलएम योजना के अंर्तगत पशुपालन इकाई स्थापित करने के बारे में जानकारी दी. शिवागं नेहरा कृषि अधिकारी, उद्यान विभाग ने खाद्य प्रसंस्करण और  मुल्य संवर्धन के बारे में जानकारी दी.

इस बैठक मे गैरसरकारी संगठन के पदाधिकारीयों और प्रगतिशील किसानों और महिला किसानों  भाग लिया और वार्षिक कार्ययोजना पर चर्चा की. इस बैठक के बाद कुलपति महोदय और अन्य अतिथियों द्वारा कार्यालय परिसर में पौधारोपण किया गया. सभी विभागीय अधिकारीयों के साथ बैठक में 10 प्रगतिशील महिलाओं और किसानों ने भाग लिया.

किसान गोष्ठी में हुई किसानों के हित की बात

कृषि विज्ञान केंद्र, वल्लभनगर में जनजातीय उपयोजना के तहत एक किसान गोष्ठी का आयोजन किया गया. इस किसान गोष्ठी की अध्यक्षता डा. अजीत कुमार कर्नाटक, महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय उदयपुर ने की. कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि डा. आरए कौशिक, निदेशक प्रसार, शिक्षा एवं डा. पीके सिंह, अधिष्ठाता कृषि प्रौद्योगिकी एवं अभियांत्रिकी महाविद्यालय, उदयपुर ने की. कार्यक्रम में छगनलाल जाट, जिला अध्यक्ष भारतीय किसान संघ ने भी शिरकत की.

डा. आरएल सोनी ने बताया कि पिछले 5 वर्ष से कृषि विज्ञान केंद्र, वल्लभनगर किसानों की सेवा में तत्पर एवं कार्यरत हैं. वर्तमान में कृषि विज्ञान केंद्र का नया प्रशासनिक भवन, किसानघर, मशरूम प्रदर्शन इकाई, बकरी एवं मुरगीपालन इकाई बन कर तैयार हैं, जहां किसान आ कर नवीन तकनीकी से प्रशिक्षण प्राप्त कर सकते हैं.

कुलपति अजीत कुमार कर्नाटक ने अध्यक्षीय भाषण में किसानों से कृषि में नवाचार अपना कर खेती को लाभकारी बनाने के लिए किसानों को आव्हान किया. इन्होंने बकरीपालन, मुरगीपालन में नवाचार करने के लिए युवा किसानों को आगे आने के लिए प्रेरित किया.

उन्होंने सब्जी उत्पादन में ब्रोकली, लाल, पीली और हरी शिमला मिर्च, बेबीकौर्न, पापकौर्न, चैरी, टमाटर, छप्पन कद्दू एवं जैकुनी जैसी नकदी फसलें अपना कर खेती को लाभकारी बनाने के लिए प्रेरित किया.

कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने खेती में नवाचार एवं प्रसंस्करण के माध्यम से किसानों को आमदनी दुगुनी करने के लिए सुझाव दिया.

Kisan Goshthi

डा. आरए कौशिक, निदेशक, प्रसार, शिक्षा ने किसानों को फलफूल, सब्जी में नवाचार कर खेती को लाभकारी बनाने पर जोर दिया, वहीं डा. पीके सिंह, अधिष्ठाता कृषि प्रौद्योगिकी एवं अभियांत्रिकी महाविद्यालय, उदयपुर ने किसानों को जल बचत एवं प्रबंधन कर कम पानी में अधिक पैदावार लेने के बारे में जानकारी दी एवं वर्षा जल को फार्म एवं खेत पर संरक्षित कर के भूजल स्तर में इजाफा करे.

छगनलाल जाट ने किसानों को बताया कि कृषि विज्ञान केंद्र एवं कृषि विभाग से जुड़ कर सरकारी योजना का लाभ लें. कृषि विभाग से डा. कैलाश अहीर ने कृषि में समेकित कीट प्रबंधन पर विचार व्यक्त किए.

इस कार्यक्रम में लसाडिया, सलूंबर, वल्लभनगर उपखंड के 240 किसानों एवं कृषक महिलाओं ने भाग लिया. कार्यक्रम में जनजाति उपयोजना के बजट से सौ किसानों को अनाज भंडारण संरक्षण पात्र का अनुप्रयोग हेतु आदान वितरण किए गए और किसानों को भिंडी का संकर बीज भी दिया. कृषि संकाय एवं आरएनटी महाविद्यालय, कपासन के 40 विद्यार्थियों ने भाग लिया.

इस कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्र के फार्म मैनेजर मोहन लाल खटीक एवं कंप्यूटर प्रोग्रामर अभिलाषा पोखरना मौजूद रहे.

कृषि उपज की पैकेजिंग से करें ज्यादा कमाई

रहनसहन में बदलाव, ग्राहकों की पसंद, खरीद व इस्तेमाल में आसानी के चलते खानेपीने की पैकेटबंदी चीजों का चलन दुनियाभर में बहुत तेजी से बढ़ा है. बाजार के ताजा रुझान की खोजबीन में लगी संस्था ‘यूरोमौनिटर इंटरनैशनल’ के मुताबिक, पैकेटबंद चीजों का कारोबार तकरीबन 17 फीसदी की दर से बढ़ कर अब 5 लाख करोड़ रुपए सालाना हो गया है.

कुछ अपवादों को छोड़ दें तो ज्यादातर किसान अपनी उपज मंडी में ले जा कर थोक में बेचते?हैं, लेकिन किसी भी फसल की बहुतायत होने पर किसानों को मुनाफा मिलना तो दूर उस की वाजिब कीमत भी नसीब नहीं होती. यह किसानों की सब से बड़ी समस्या है.

इस समस्या से निबटने के लिए किसानों को खेती से एक कदम आगे बढ़ कर मार्केटिंग के गुण सीखने होंगे और उपज की कीमत बढ़ाने के तरीके अपनाने होंगे.

ऐसा करना मुश्किल या नामुमकिन नहीं है. शुरू में यह काम सीख कर तजरबे के तौर पर कुल उपज के थोड़े से हिस्से से शुरू कर के बाद में धीरेधीरे बढ़ाया जा सकता है.

कई बार लागत व मेहनत मिट्टी में मिलती देख गुस्साए किसान अपने आलू, प्याज व टमाटर वगैरह को औनेपौने दामों में बेच कर पीछा छुड़ाते हैं या उन्हें सड़कों पर यों ही फेंक देते हैं. इस से नेताओं व अफसरों के कानों पर तो कभी कोई जूं नहीं रेंगती, लेकिन किसानों को बहुत नुकसान होता है इसलिए सरकार के भरोसे रह कर कुछ होने वाला नहीं है.

तकनीक से तरक्की

अब जमाना नई तकनीक का है व हर रोज नई मशीनों के इस्तेमाल करने का है. इन की मदद से खेती के नुकसान को फायदे में बदलना कोई मुश्किल काम नहीं है. जरूरत है, अपना दकियानूसी नजरिया बदल कर इस रास्ते पर पहल करने की.

ऐसे बहुत से उद्यमी हैं, जो दलहन, तिलहन, फलसब्जी व मसालों वगैरह की पैकेटबंदी कर के बेचने में कामयाब हुए हैं और अपना कारोबार बढ़ा कर खासी कमाई कर रहे हैं.

गौरतलब है कि आम कारोबारी तो बाजार से कच्चा माल खरीद कर पैक करते हैं तब उस पर मुनाफा कमाते हैं, लेकिन किसानों के पास कच्चा माल अपना होता है इसलिए उन्हें लागत कम रहने से फायदे की गुंजाइश ज्यादा होती है. अगर किसान मार्केटिंग के गुण अपनाएं तो उम्दा माल के लिए बाजार तलाशना व उस में पैर जमाना मुश्किल या नामुमकिन नहीं है.

दूसरी ओर पैकेटबंद चीजों की कीमतें कई गुना बढ़ जाती हैं. मसलन, मेरठ की थोक सब्जी मंडी में बागबानों को 10 किलोग्राम हरा धनिया के 1 गट्ठर की कीमत बमुश्किल 40-50 रुपए मिलती है, जबकि यही धनिया मैगा मौल या किसी बड़े स्टोर में पैक हो कर 10 रुपए का 100 ग्राम यानी 100 रुपए किलोग्राम तक में आसानी से बिकता है.

माहिरों का कहना है कि 10 इंच लंबी व 6 इंच चौड़ी पौलीथिन में 50 ग्राम हरा धनिया की डंडी रख कर अगर 2 लाइनों में 12 छेद कर दिए जाएं तो उसे ठंडक में आसानी से हफ्तेभर तक हरा रखा जा सकता है. ऊपर से मुंह चिपकाने वाली ऐसी थैलियां अब आसानी से बाजारों में मिल जाती हैं. बस, किसानों को नए खुल रहे बड़ेबड़े बाजारों में जा कर पैकेजिंग के तरीके देखने और सीखने चाहिए.

पैकेटबंदी करने का सब से सस्ता व आसान उपाय है पौली बैग. हालांकि कई राज्यों में पौलीथिन पर पाबंदी है, लेकिन पैक्ड पैकेटों के इस्तेमाल पर छूट है.

पहले मोमबत्ती की लौ से गरम कर के पन्नी की थैलियों का मुंह बंद किया जाता था, फिर बिजली से चलने वाली हौट प्लेट आई, स्टैपलर की पिन लगी. अब तो हर साइज की तैयार थैलियां मिलती हैं, जिन के मुंह पर लगी छोटी सी महीन परत हटाने के बाद उन्हें चिपका कर आसानी से बंद किया जा सकता है.

मेरठ के महेश ने थोक में खजूर खरीद कर उन्हें 250 ग्राम के पैकेट में बंद कर फल वालों, कंफैक्शनरी वालों व किराना कारोबारियों को सप्लाई करना शुरू किया था. धीरेधीरे उस का यह धंधा चल निकला तो उस ने खजूर की गुठली निकाल कर उस में एक काजू रख दिया. इस से उस की बिक्री दोगुनी हो गई इसलिए इस धंधे में उस ने अपने भाइयों को भी लगा लिया.

इसी तरह बिशन सिंह ने एक चीनी मिल से गन्ने के मैले से तैयार जैविक खाद के बोरे खरीदे. उन से 250 ग्राम, 500 ग्राम, 1 किलोग्राम व 2 किलोग्राम के पैकेट बनाए व नर्सरियों को सप्लाई किया और हौकरों से कालोनियों में आवाज लगा कर बिकवाया तो चौगुनी कीमत मिली. ऐसे 1-2 नहीं, बल्कि बहुत से लोग हैं जो पैकेटबंदी के काम में खासी कमाई कर रहे हैं.

सावधानी

ज्यादातर ग्राहक बाजार में मौजूद खानेपीने की चीजों में मिलावट की समस्या से परेशान हैं. मुंहमांगी कीमत देने के बावजूद भी शुद्धता की गारंटी नहीं मिलती. इसलिए पैकेटबंदी में सब से पहला व जरूरी कदम है, ग्रेडिंग यानी छंटाई व सफाई, ताकि माल खालिस, उम्दा क्वालिटी का हो और धूलमिट्टी व कंकड़ रहित हो. साथ ही, उस की पैकिंग अच्छी हो व कीमत भी वाजिब होने से बाजार में साख जल्दी व अच्छी बन जाती है. ग्राहकों का भरोसा बढ़ने पर माल की कीमत भी अच्छी मिलती है.

बाजार में पैकेटबंद चीजों की मांग लगातार बढ़ रही है. शहरों में खुल रहे बड़ेबड़े मौल में ज्यादातर चीजें पैकेटबंद बिकती हैं. सब्जी मंडी व ठेलों पर बिकने वाली मशरूम, मटर के दाने व अंकुरित अनाज वगैरह के पैकेट कहीं भी देखे जा सकते हैं इसलिए किसान अपने मोटे अनाज साबुत या उन्हें पिसवा कर, सब्जी, फल व मसाले वगैरह पैकेट बंद कर के बेच सकते हैं.

अब पैकेजिंग तकनीक में इतने ज्यादा सुधार और बदलाव हुए हैं कि टिन, लकड़ी व गत्ते की भारी पैकिंग अब बीते जमाने की बात हो गई है. अब ऊपरी सिरे से बंद होने वाले पौली पैक, छोटेबड़े पाउच, थर्मोकोल की हलकी प्लेट व उस पर चिपकी महीन पौली फिल्म जैसी सहूलियतों वाली किफायती पैकिंग के तरीके ज्यादा अपनाए जाने लगे हैं.

पैकेटबंदी शुरू करने से पहले यह तय करना जरूरी है कि हमें किस चीज की पैकिंग करनी है. उत्पाद तरल, ठोस, दानेदार या पाउडर किस किस्म का है? प्रति पीस कितने वजन की पैकिंग करनी है? उसे इकाई से बाजार तक पहुंचाने के लिए किस तरह के डब्बे में रखना होगा कि वह महफूज भी रहे और आसानी से पहुंचाया भी जा सके. खानेपीने की चीजों की पैकेटबंदी करने में इस बात की खास सावधानी बरतनी पड़ती है कि अंदर रखी चीज पैकेट के संग, रंग या गंध वगैरह की वजह से खराब न हो.

जानकारी

खानेपीने की चीजें तैयार करने, उन्हें टिकाऊ बनाने से ले कर पैक करने तक के बारे में तकनीकी जानकारी केंद्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी संस्थान यानी सीएफटीआरआई, मैसूर, कर्नाटक से हासिल की जा सकती है.

इस संस्थान के माहिरों ने तकरीबन 300 तरह की खानेपीने की चीजें तैयार करने की तकनीकें व 40 तरह की मशीनें निकाली हैं. यह संस्थान तालीम, ट्रेनिंग व सलाह देता है. इस बारे में फोन नंबर 0821-2514534 पर जानकारी ली जा सकती है.

मुंबई में अंधेरी पूर्व की रोड नंबर 8 में भारतीय पैकेजिंग तकनीक का राष्ट्रीय संस्थान है. पटपड़गंज, दिल्ली, चेन्नई, कोलकाता, हैदराबाद व अहमदाबाद में इस की 5 शाखाएं हैं. इस संस्थान के माहिरों ने सालों की खोजबीन के बाद खानेपीने की चीजों को ज्यादा देर तक ताजा, टिकाऊ व महफूज रखने के लिए खास तरह की पैकेजिंग तरकीबें ईजाद की हैं. पैकेजिंग तकनीक के कमाल से स्ट्राबेरी व फूल सी नाजुक चीजें भी निर्यात हो रही हैं.

इंडियन इंस्टीट्यूट औफ पैकेजिंग सरकारी संस्था है. यह उद्यमियों की जरूरत के मुताबिक बेहतर पैकिंग रने की ट्रेनिंग, तकनीक, मशीनों की जानकारी व रायमशवरा की सहूलियतें मुहैया कराती है. पैकेटबंदी करने के इच्छुक किसान व उद्यमी इस संस्थान के फोन नंबर 9122-28219803 पर जानकारी हासिल कर सकते हैं.

बाजार

किसी भी माल को खपाने व उस की वाजिब कीमत पाने के लिए बाजार की जरूरत पड़ती है. राहत की बात यह है कि खानेपीने की चीजों का खुदरा व थोक बाजार ज्यादातर इलाकों में पसरा हुआ है, बशर्ते अपने उत्पाद का कोई ब्रांडनेम रख लें ताकि उस की अलग पहचान बन सके. शहरी इलाकों में लगी इकाइयों को जिला उद्योग केंद्र व गंवई इलाकों की इकाइयों को बाजार दिलाने में राज्यों के ग्रामोद्योग बोर्ड मदद करते हैं.

किसान खुद का बिक्री केंद्र खोल कर भी अपने बच्चों को रोजगार का मौका दे सकते हैं. आसपास के शहरों में खुले मौल, डिपार्टमैंटल स्टोर, सुपर बाजार, थोक व खुदरा दुकानदारों से सीधे भी संपर्क कर सकते हैं.

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान वगैरह राज्यों में कृषि उपज की मार्केटिंग के लिए हर तहसील लैवल पर सहकारी क्रयविक्रय समितियां व बहुत से सहकारी उपभोक्ता संघ भी काम कर रहे हैं इसलिए उन का भी फायदा उठाया जा सकता है.

गांवकसबों में लगने वाली साप्ताहिक पैठ, मेला, प्रदर्शनी में स्टौल लगा कर अपना प्रचार व बिक्री की जा सकती  है. शहरी कालोनियों में रिकशा ठेली पर घूमघूम कर कमीशन बेस पर घरेलू सामान बेचने वाले हौकरों की मदद ली जा सकती है. अब तो ह्वाट्सएप वगैरह सोशल मीडिया पर घरेलू चीजों की होम डिलीवरी करने वाले ग्रुप बन गए हैं.

मशीनरी

किसी भी सामान को पैक कर के बेचने के लिए अब हर तरह की पैकिंग करने की मशीनें देश में आसानी से मिल जाती हैं.

ज्यादातर कारखानेदार व कारोबारी अपनी पैकिंग के लिए खाली पाउच व पैकेट वगैरह खुद न बना कर बाहर से बनवातेछपवाते हैं, फिर उन्हें अपनी इकाई में मंगा कर भरने के बाद सीलबंद करते हैं.

शुरू में ही पैकेजिंग के बड़े और आटोमैटिक प्लांट लगाने के बजाय कम पैसे व छोटी मशीनों से भी काम चलाया जा सकता?है. मसलन, गेहूं उगाने वाले किसान आटा, सूजी, दलिया व मैदा व चना उगाने वाले किसान भुने चने, चने की दाल व शुद्ध बेसन की पैकेटबंदी कर सकते हैं.

छोटीबड़ी पैकेजिंग की मशीनें मंगाने के इच्छुक निम्न पते पर संपर्क कर सकते हैं :

-मै. विजय पैकेजिंग सिस्टम, 3213, राम बाजार, मोरी गेट, दिल्ली – 110 006 फोन नंबर : 011-23976263.

-मै. पैकेजिंग सोल्यूशंस, राजेंद्र नगर, सैक्टर -3, साहिबाबाद, उत्तर प्रदेश, मोबाइल फोन : 8071681600.