शकरकंद (Sweet Potatoes) सर्दियों से बचाए

सर्दियां शुरू होते ही बाजार में तरहतरह की सब्जियां, फल और कंदमूल आने लगते हैं. सर्दियों से बचाव के लिए लोग कई तरह के उपाय करते हैं, इन में गरम कपड़ों से ले कर खानेपीने की चीजें भी हैं. अमीर तो जो चाहे वह खरीद कर खा सकते हैं, लेकिन गरीबों को अपने बजट के हिसाब से खर्च करना पड़ता है. हम आप को बता रहे हैं, ऐसी ही एक चीज जिसे आसानी से खरीद कर खा सकते हैं और सर्दियों में अपने शरीर को गरम रख सकते हैं.

हम बात कर रहे हैं शकरकंद की, जिसे स्वीट पोटैटो भी कहा जाता है. यह ऊर्जा का खजाना है. अकसर लोग इसे आलू से जोड़ कर देखते हैं, लेकिन पोषक तत्त्वों और सेहत के लिहाज से इस के कई फायदे हैं. शकरकंद खाने में मजेदार तो होता ही है, साथ ही काफी फायदेमंद भी है.

शकरकंद का इस्तेमाल सर्दियों में बहुत मुफीद होता है. सर्दियों में कंदमूल ज्यादा फायदेमंद रहते हैं, क्योंकि ये शरीर को गरम रखते हैं. इसलिए सर्दी के मौसम में शकरकंद खाना सेहत के लिए फायदेमंद है.

* शकरकंद विटामिन ‘डी’ का एक अच्छा सोर्स है. यह दांतों, हड्डियों, त्वचा और नसों की बढ़ोतरी और मजबूती के लिए जरूरी है. शकरकंद विटामिन ‘ए’ का भी काफी अच्छा माध्यम है. इस के इस्तेमाल से शरीर की 90 फीसदी तक विटामिन ‘ए’ की पूर्ति होती है.

*             शकरकंद में भरपूर आयरन होता है. आयरन की कमी से हमारे शरीर में ऐनर्जी नहीं रहती, रोग प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित होती है और ब्लड सेल्स का निर्माण भी ठीक से नहीं होता. शकरकंद आयरन की कमी को दूर करने में मददगार रहता है.

*             शकरकंद पोटैशियम का अच्छा स्रोत है. यह नर्वस सिस्टम की सक्रियता को सही बनाए रखने के लिए जरूरी है. साथ ही किडनी को भी स्वस्थ रखने में यह खास योगदान देता है.

*             शकरकंद में आयरन, फोलेट, कौपर, मैगनीशियम, विटामिन्स आदि होते हैं. इसे खाने से त्वचा में चमक आती है और चेहरे पर जल्दी झुर्रियां नहीं पड़तीं. इस में मौजूद विटामिन ‘सी’ त्वचा में कोलाजिन का निर्माण करता है जिस से आप हमेशा जवान और खूबसूरत दिखते हैं.

*             शकरकंद डायट्री फाइबर और कार्बोहाइड्रेट से भरपूर है. शकरकंद खाने में मीठा होता है. इस के इस्तेमाल से खून बढ़ता है, शरीर मोटा होता है साथ ही यह कामशक्ति को भी बढ़ाता है. नारंगी रंग के शकरकंद में विटामिन ‘ए’ सही मात्रा में होता है. शकरकंद में कैरोटीनौयड नामक तत्त्व पाया जाता है जो ब्लड शुगर को कंट्रोल करता है.

*             अगर आप का ब्लड शुगर लैवल कुछ भी खाने से तुरंत बढ़ जाता है तो शकरकंद खाना ज्यादा अच्छा है. इसे खाने से ब्लड शुगर हमेशा कंट्रोल रहता है और इंसुलिन बढ़ने नहीं देता.

*             शकरकंद में कैलोरी और स्टार्च की सामान्य मात्रा होती है. वहीं, सैचुरेटेड फैट और कोलेस्ट्रौल की मात्रा इस में न के बराबर रहती है. इस में फाइबर, एंटीऔक्सीडेंट्स, विटामिन और लवण भरपूर होते हैं.

*             शकरकंद में भरपूर मात्रा में विटामिन ‘बी6’ पाया जाता है, जो शरीर में होमोसिस्टीन नाम के अमीनो एसिड के स्तर को कम करने में सहायक होता है. इस अमीनो एसिड की मात्रा बढ़ने पर बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है.

आलू खुदाई करने वाला खालसा पोटैटो डिगर (Potato Digger)

खालसा डिगर आवश्यक जनशक्ति और समय बचाता है. इस डिगर को जड़ वाली फसलों की खुदाई के लिए डिजाइन किया गया है. इस का गियर बौक्स में गुणवत्तापूर्ण पुरजों का इस्तेमाल किया गया है, जो लंबे समय तक साथ देने का वादा करते हैं.

कृषि यंत्र पर आप के द्वारा किया गया खर्चा आप को रिटर्न देने की गारंटी के साथ हार्वेस्टर वाली सभी जरूरतें पूरी करता है. इस पोटैटो डिगर से एक दिन में तकरीबन 6-8 एकड़ क्षेत्रफल की आलू खुदाई की जा सकती है.

यह भारत सरकार द्वारा परीक्षण किया गया आलू खुदाई यंत्र है.

खालसा सिंगल कन्वेयर पोटैटो डिगर

यह सिंगल कन्वेयर 2 लाइनों में आलू खुदाई करने वाला यंत्र है. भारी मिट्टी वाले खेत में भी यह आसानी से काम करता है. इस यंत्र में लगा ङ्क आकार का नोज ब्लेड आलू को खराब होने से बचाता है और सिंगल कन्वेयर आलू से मिट्टी अलग कर उसे साफसुथरा करता है.

इस यंत्र में लगा बैक रोलर खेत की मिट्टी को समतल कर उचित सतह बनाता है, जिस से खुदाई के बाद सभी आलू ऊपरी सतह पर आ जाते हैं. इस वजह से आलू चुनने में दिक्कत नहीं होती.

सभी तरह की मिट्टी के लिए खास पोटैटो डिगर

खालसा ब्रांड का 2 लाइनों में आलू खोदने वाला यह यंत्र चलाने में बहुत आसान है. यह आसानी से ट्रैक्टर से जुड़ सकता है. यह यंत्र सभी प्रकार की मिट्टी, जैसे रेतीली, चिकनी और कठोर सभी के लिए उपयुक्त है. कम समय में भी अधिक रकबे को यह कवर करता है और आलू को नुकसान पहुंचाए बिना उस की बेहतर खुदाई करता है.

फ्रंट कन्वेयर और यंत्र में लगी यूनिट के साथ यह आलू का 100 फीसदी ऐक्सपोजर सुनिश्चित करता है अर्थात आलू मिट्टी के ऊपर आ कर दिखता है, जिस से आलू को खेत से उठाने में भी आसानी होती है.

खालसा विंड्रो पोटैटो डिगर

विंड्रो सिस्टम के साथ लगे 2 पंक्ति वाले डिगर एलिवेटर कटाई की नवीनतम तकनीक प्रदान करते हैं. यह पूरी तरह से एडजस्टेबल है और 20 इंच की डिगर हाई कार्बन स्टील डिस्क में गहराई बनाए रखने के लिए पीछे की तरफ 2 पहिए लगे हैं.

इस यंत्र से आलू खुदाई का समय अन्य डिगर के मुकाबले एकतिहाई ही लगता है, जिस से मेहनत, समय और पैसे की काफी अधिक बचत होती है.

2 पंक्ति वाला पोटैटो हार्वेस्टर

खालसा का ट्रैक्टरचालित 2 पंक्ति आलू कंबाइन हार्वेस्टर वी-नोज खुदाई फ्रंट ब्लेड के साथ आता है. यह भारत का पहला स्वचालित आलू हार्वेस्टर है.

कन्वेयर बेल्ट की मदद से आलू बिना मिट्टी के साफसुथरा निकलता है, जो यंत्र में लगे आलू टैंकर में इकट्ठा किया जाता है. उस के बाद आलू को अपनी सुविधानुसार  ट्रौली/बालटियों में ले जाया जा सकता है. ये सभी काम स्वचालित तरीके से होते हैं. इस में किसी मानवशक्ति की जरूरत नहीं होती.

अधिक जानकारी के लिए आप फोन नंबर 0121-2511627, 6541627 पर बात कर सकते हैं या वैबसाइट पर जानकारी ले सकते हैं.

गाजर (Carrot) की खेती और बीज उत्पादन

गाजर का जड़ वाली सब्जियों में खास स्थान है. इसे देशभर में उगाया जाता है. उत्तर प्रदेश, असम, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, पंजाब व हरियाणा प्रमुख गाजर उत्पादक राज्य हैं.

किस्में : गाजर की किस्मों को 2 भागों में बांटा है, एशियन व यूरोपीय. एशियन किस्म सालाना होती है. इस का आकार व रंग अलग होता है. इस का ऊपरी भाग चौड़ा होता है, जो नीचे की ओर पतला होता जाता है. यह लाल, पीले, नारंगी व बैंगनी रंग की होती है. यह उच्च तापमान को सहन करने वाली किस्म है. यूरोपीय किस्म आकार में छोटी, चिकनी और समान रूप से मोटी होती है. इस का रंग नारंगी होता है.

एशियन : इस किस्म से अधिक उपज मिलती है. इन से हलुआ, अचार, मुरब्बा, सब्जी, सलाद आदि बनाए जाते हैं. इन्हें सुखा कर बेमौसमी फलों का मजा लिया जाता है. खास एशियन किस्मों के खास लक्षणों की जानकारी नीचे दी गई है :

पूसा केसर : यह एक संकर किस्म है, जो 90 से 110 दिनों में तैयार होती है. इसे अगस्त से अक्तूबर के शुरू में बोया जाता है. इस की जड़ें गहरे लाल रंग की होती हैं. इस का मध्य भाग छोटा और हलके लाल रंग का होता है. प्रति हेक्टेयर यह 250-300 क्विंटल तक उपज देती है.

पूसा मेघाली : यह किस्म 110 से 120 दिनों बाद तैयार होती है. इस की जड़ें और गूदा नारंगी रंग का होता है. यह अगस्तसितंबर में बोने के लिए सही किस्म है. प्रति हेक्टेयर यह 250-300 क्विंटल उपज देती है.

सेलेक्शन 223 : यह किस्म महज 60 दिनों में तैयार हो जाती है और खेत में 90 दिनों तक अच्छी तरह रहती है. इस की जड़ें 15 से 18 सेंटीमीटर लंबी, नारंगी और खाने में स्वादिष्ठ होती हैं. इस प्रजाति की बोआई देर से की जा सकती है. इस की औसतन उपज 200 से 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक होती है.

गाजर नंबर 29 : यह एक अगेती किस्म है. इस की जड़ें लाल और लंबी बढ़ने वाली होती हैं. इस का बीज मैदानी क्षेत्रों में आसानी से तैयार किया जाता है. इस प्रजाति की औसतन उपज 250-300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है.

गाजर (Carrot)

यूरोपीय किस्में

पूसा यमदग्नि : यह अधिक उपज देने वाली किस्म है. यह किस्म 86 से 130 दिनों में तैयार होती है. इस की जड़ें 15-20 सेंटीमीटर लंबी, हलकी, केसरिया रंग की आधी ठूंठ के आकार की होती हैं. यह किस्म तेजी से बढ़ती है. इस में कैरोटीन अधिक मात्रा में पाया जाता है. इस का गूदा केसरिया रंग का अच्छी खुशबू वाला कोमल और स्वादिष्ठ होता है. पूसा नयनज्योति भी एक अच्छी किस्म है.

नैनटिस : इस किस्म का ऊपरी भाग छोटा और हरी पत्तियों वाला होता है. इस की जड़ें 12 से 15 सेंटीमीटर लंबी, बेलनाकार और नारंगी रंग की होती हैं. फसल 90 से 110 दिनों में तैयार होती है. खाने में यह बेहद लजीज होती है और प्रति हेक्टेयर 200 क्विंटल तक उपज देती है. मध्य अक्तूबर से दिसंबर तक इस की बोआई की जाती है.

चैंटेन : यह किस्म 100 से 120 दिनों में तैयार होती है. इस की जड़ें मोटी और गहरे लाल रंग की होती हैं. इस किस्म का बीज मैदानी क्षेत्रों में तैयार किया जाता है. प्रति हेक्टेयर यह 150 क्विंटल तक उपज देती है. इस किस्म को मध्य अक्तूबर से दिसंबर के शुरू तक बोया जा सकता है.

जैनो : यह किस्म 115 से 120 दिनों में तैयार होती है. इस की जड़ें करीब 15 सेंटीमीटर लंबी होती हैं. तमिलनाडु का नीलगिरि क्षेत्र इस किस्म को उगाने के लिए सही है.

इंप्रेटर : इस किस्म को संकरण से तैयार किया जाता है. यह मध्य से देर अवधि वाली किस्म है. इस का गूदा नारंगी रंग का होता है. यह अधिक उपज देने वाली किस्म है.

जलवायु : वैसे तो गाजर ठंडी जलवायु की फसल है, लेकिन इस की कुछ किस्में अधिक तापमान को भी सहन कर लेती हैं. जड़ों के रंग का विकास और उन की बढ़वार पर तापमान का प्रभाव पड़ता है.  10-15 डिगरी सेल्सियस तापमान पर जड़ों का आकार छोटा होता है. लेकिन यूरोपीय किस्मों के लिए 4 से 6 हफ्ते तक 4.8 से 10 डिगरी सेल्सियस तापमान  होना चाहिए .

जमीन : गाजर के उत्पादन के लिए उचित जल निकास वाली गहरी, बलुई दोमट जमीन अच्छी मानी गई है. जमीन का पीएच मान साढे़ 6 होना चाहिए. अधिक क्षारीय या अधिक अम्लीय मिट्टी इस के सफल उत्पादन में बाधक मानी जाती है.

खेत की तैयारी : गाजर की अधिक उपज लेने के लिए खेत की तैयारी होना जरूरी है. पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें. इस के बाद 2-3 बार कल्टीवेटर या हैरो से जुताई करें. जुताई के बाद पाटा चलाएं.

खाद व उर्वरक : गाजर को आमतौर पर कम उपजाऊ व हलकी मिट्टी में उगाया जाता है. लिहाजा, खाद और उर्वरकों के इस्तेमाल से इस पर अच्छा प्रभाव पड़ता है. मिट्टी की जांच के बाद इन का इस्तेमाल करना फायदेमंद होता है. फसल को 25-30 टन गोबर की खाद के अलावा 50 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50 किलोग्राम फास्फोरस और 45 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर देनी चाहिए. नाइट्रोजन की आधी मात्रा, फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा खेत की आखिरी जुताई के समय खेत में मिला कर  पाटा चलाएं. उस के बाद बोआई करें. नाइट्रोजन की बची आधी मात्रा का बोआई के 40-45 दिनों बाद छिड़काव करें, जिस से पैदावार पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा.

बीजों की मात्रा : प्रति हेक्टेयर 5-6 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है. फसल को फफूंदी जनित रोगों से बचाने के लिए बीजों को बोने से पहले कार्बेंडाजिम 3 ग्राम पाउडर प्रति किलोग्राम बीज की दर से ले कर उस से उपचारित कर के बोना चाहिए. बीज को जल्दी अंकुरण के लिए 12 से 24 घंटे पानी में भिगो कर बोना चाहिए.

बोने का समय : गाजर की बोआई का समय इस बात पर निर्भर करता है कि उस की कौन सी किस्म उगानी है. उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में एशियाई किस्मों को अगस्त के आखिरी सप्ताह से अक्तूबर के पहले सप्ताह तक बोते हैं, जबकि यूरोपीय किस्मों की बोआई नवंबर में की जाती है. पर्वतीय इलाकों में बोआई मार्च से जून तक की जाती है. दक्षिण और मध्य भारत में बोआई जनवरीफरवरी, जूनजुलाई और अक्तूबरनवंबर में की जाती है.

बोने की विधि : गाजर की बोआई समतल क्यारियों व मेंड़ों पर की जाती है. इस की ज्यादाउपज लेने के लिए इसे मेंड़ों पर उगाना ठीक रहता है. लाइनों और पौधों की आपसी दूरी 45×7.5 सेंटीमीटर रखनी चाहिए. बीज को 1.5 सेंटीमीटर से अधिक गहरा नहीं बोना चाहिए. गाजर की लगातार फसल लेने के लिए 10-15 दिनों बाद बोआई करनी चाहिए. गाजर का अंकुरण धीमी गति से होता है. अकसर 10-20 दिनों बाद अंकुरण होता है.

सिंचाई और जल निकास : बोआई के बाद मेंड़ों को तब तक नम रखना जरूरी है, जब तक कि बीजों का अंकुरण न हो जाए. इस के बाद 8-10 दिनों के अंतर पर सिंचाई करनी चाहिए. कम नमी के कारण उपज कम मिलती है, जबकि अधिक नमी से उपज में भारी कमी हो सकती है. लिहाजा, गाजर की सिंचाई पत्तियों के मुरझाने से पहले करनी चाहिए.

जल प्रबंधन पर दें ध्यान

सिंचाई करते समय यह ध्यान रहे कि सिंचाई पौधे में की जा रही है, न कि जमीन में. इस में सिंचाई की आधुनिक विधियां इस्तेमाल करें. करीब 3 दशकों में सिंचाई की सूक्ष्म प्रणाली से फसल के उत्पादन में पाया गया है कि औसतन अन्य पारंपरिक सिंचाई विधियों की तुलना में इस के द्वारा 50 से 60 फीसदी जल बचाया जा सकता है.

खेत में खरपतवार भी कम आते हैं. जिस तरह ड्रिपरों से बूंदबूंद जल दिया जाता है, उसी प्रकार रासायनिक उर्वरकों को भी सिंचाई में फर्टिलाइजर इंजेक्टर की मदद से फसलों को दिया जा सकता है.

ऐसी व्यवस्था के तहत उर्वरकों को कम मात्रा में कम अंतराल रख कर जल्दीजल्दी सिंचाई के साथ दिया जा सकता है.

खरपतवार नियंत्रण : गाजर की फसल के साथ उगे खरपतवार उस की बढ़वार व उपज पर खराब असर डालते हैं. लिहाजा, उन की रोकथाम समय पर करना जरूरी है. इस के लिए समयसमय पर निराईगुड़ाई करें. इस दौरान घने पौधों को उखाड़ दें, ताकि पौधों का विकास व बढ़वार अच्छी तरह हो सके. खरपतवारों की रोकथाम के लिए पेंडामेथलीन नामक खरपतवारनाशी की 3.3 लीटर मात्रा 800 से 1,000 लीटर पानी में घोल कर अंकुरण से पहले छिड़काव करें.

गाजर (Carrot)

कीड़ों की रोकथाम

पत्ती फुदका : इस कीट के वयस्क और निम्फ  दोनों ही पौधों का रस चूसते हैं. इस वजह से प्रकाश संश्लेषण की क्रिया पर खराब असर पड़ता है. इस कीड़े की रोकथाम के लिए 0.05 फीसदी मोनोक्रोटोफास का छिड़काव करना चाहिए.

कट वर्म : यह कीट रात के समय पौधों को आधार से काट देता है. इस की रोकथाम के लिए 0.1 फीसदी क्लोरोपाइरीफास के घोल से जमीन को अच्छी तरह भिगो दें.

गाजर की सुरसुरी : इस कीट के सफेद टांगरहित शिशु गाजर के ऊपरी हिस्से में सुरंग बना कर नुकसान पहुंचाते हैं. इस कीट की रोकथाम के लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल 1 मिलीलीटर या डाइमेथोएट 30 ईसी 2 मिलीलीटर का छिड़काव करें.

जंग मक्खी : इस कीट के शिशु पौधों की जड़ों में सुरंग बनाते हैं, जिस से पौधे मर भी सकते हैं. इस कीट की रोकथाम के लिए क्लोरोपायरीफास 20 ईसी का 2.5 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से हलकी सिंचाई के साथ इस्तेमाल करें.

सूरन की खेती और उस के व्यंजन

सूरन एक जड़ वाली फसल है. इस का उपयोग सब्जी के अलावा अनेक तरह के व्यंजन बनाने के लिए भी किया जाता है. सेहत के नजरिए से भी यह काफी लाभकारी है. इस में पर्याप्त मात्रा में कार्बोहाइडे्ट्स, प्रोटीन, फाइबर, विटामिन बी 1, विटामिन बी 6, फोलिक एसिड, बीटा कैरोटीन जैसे पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में पाए जाते हैं. बवासीर के अलावा कई अन्य समस्याओं में भी सूरन का सेवन बहुत फायदेमंद है.

इतना ही नहीं, सूरन के सेवन से जोड़ों का दर्द कम होता है, क्योंकि इस में एंटीइंफ्लेमेशन और दर्द कम करने वाले गुण मौजूद होते हैं. वजन घटाने में सहायक होने के साथसाथ, कब्ज, तनाव को सूरन दूर करता है. इस में बीटा कैरोटीन, एंटीऔक्सीडेंट इम्यूनिटी को मजबूत करने वाले गुण पाए जाते हैं.

प्राकृतिक रूप से उपलब्ध सूरन के घनकंदों में कैल्शियम आक्जेलेट नामक रसायन पाया जाता है, जिस के कारण खाने से गले में खुजली होती है, लेकिन वैज्ञानिकों ने नवीन उन्नतिशील किस्मों को विकसित किया है, जिस में कैल्शियम आक्जेलेट की मात्रा कम पाया जाता है. उन्नत किस्मों में गजेंद्र, कोवुर, संतरागाछी, नरेंद्र अगात आदि प्रमुख हैं.

मार्च से अप्रैल माह रोपण का सही समय है. आधा किलोग्राम से कम वजन का कंद नहीं रोपें, पंक्ति से पंक्ति और पौधे से पौधे की दूरी आधाआधा मीटर रखें. घनकंदों को लगाते समय प्रत्येक गड्ढे में 2-3 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद,18 ग्राम यूरिया, 38 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट एवं 15 ग्राम म्यूरेट औफ पोटाश का प्रयोग करना चाहिए. 32 से 40 क्विंटल कंद की प्रति एकड़ में आवश्यकता होती है. पैदावार 320 से 400 क्विंटल तक प्रति एकड़ की दर से होती है, जो प्रजाति, दूरी एवं लगाने के समय पर निर्भर है. 7-8 माह में खुदाई के लिए फसल तैयार हो जाती है. अंतःफसल के रूप में लोबिया, भिंडी ले सकते हैं. बगीचे में भी इस की खेती कर सकते है.

इस से बनने वाले विभिन्न पौष्टिक खाध्य पदार्थो के बारे में प्रो. सुमन प्रसाद मौर्य, अध्यक्ष, मानव विकास एवं परिवार अध्ययन आचार्य नरेंद्र देव कृषि ए्वं प्रौद्योगिक विश्वविद्यालय, अयोध्या ने बताया कि सूरन को छोटेछोटे टुकड़ों में काट कर और उबाल कर सब्जी या चोखा/भरता बनाया जाता है.

उबले हुए सूरन को चाट मसाला ,नीबू का रस, प्याज और धनिया के साथ मिला कर एक ताजगी भरी चाट बनाई जा सकती है. इसे टिक्की के रूप में भी प्रयोग कर सकते हैं. सूरन को कद्दूकस कर के घी में भून कर दूध, चीनी के साथ मेवा आदि डाल कर स्वादिष्ठ हलवा बनाया जाता है.

सूरन को कद्दूकस कर के बराबर नाप से लहसुन, हरी मिर्च को कूट कर मिलाएं. नमक और खटाई मिला कर धूप में पानी सूखने तक रखें. फिर सरसों का तेल गरम कर कुनकुना होने पर अचार में मिला दें. एक सप्ताह में तैयार होने पर इसे खाने के साथ खाया जा सकता है.

सर्दी की गुलाबी फसल शलगम (Turnip)

शलगम जड़ वाली हरी फसल है. इसे ठंडे मौसम में हरी सब्जी के रूप उगाया व इस्तेमाल किया जाता है. शलगम का बड़ा साइज होने पर इस का अचार भी बनाया जाता है. ठंडे मौसम की फसल होने से कम तापमान पर भी ज्यादा स्वाद होता है. बोआई के 20-25 दिनों के बाद से ही शलगम को साग के रूप में इस्तेमाल किया जाता है.

शलगम की जड़ों व पत्तियों में ज्यादा पोषक तत्त्व पाए जाते हैं. इस से ज्यादा मात्रा में कैल्शियम और विटामिन ‘सी’ मिलता है. साथ ही इस में अन्य पोषक तत्त्व फास्फोरस, कार्बोहाइड्रेट्स वगैरह भी भरपूर मात्रा में मिलते हैं.

शलगम की फसल को सभी तरह की जमीन में उगाया जा सकता है. लेकिन अच्छी पैदावार के लिए हलकी चिकनी दोमट या बलुई दोमट मिट्टी वाली जमीन बेहतर होती है. जल निकासी भी ठीक होनी चाहिए, वरना पानी भरा रहने पर फसल खराब हो सकती है.

शलगम सर्दी की फसल होने के कारण ज्यादा ठंड को भी सहन कर लेती है. अच्छी बढ़वार के लिए ठंड व नमी वाली जलवायु सही रहती है. इसी कारण पहाड़ी इलाकों में शलगम की अच्छीखासी पैदावार मिलती है.

अच्छी पैदावार के लिए खेत की जुताई अच्छी तरह करनी चाहिए, जिस से जमीन भुरभुरी हो जाए. साथ ही घास व ठूंठ वगैरह को बाहर निकाल कर नष्ट कर दें और छोटीछोटी क्यारियां बना लें, ताकि इन की देखभाल अच्छी तरह से हो सके.

उपज से फायदा : शलगम जब छोटेछोटे साइज की हों, तभी उन्हें मंडी में साग के रूप में बेचा जाता है और बाद में जब शलजम बड़ी हो जाती है, तो उसे लोग अचार व सब्जी वगैरह में भी इस्तेमाल करते हैं.

यह कम समय में तैयार होने वाली सामान्य फसल है. इस की खास देखभाल की भी जरूरत नहीं होती और किसान को मुनाफा भी ज्यादा मिलता है.

शलगम की कुछ खास प्रजातियां

लाल 4 : यह किस्म जल्दी तैयार होने वाली है. लाल किस्म को ज्यादातर सर्दी के मौसम में लगाते हैं. इस की जड़ें गोल, लाल और मध्यम आकार की होती हैं. फसल 60 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है.

सफेद 4 : इस किस्म को ज्यादातर बरसात के मौसम में लगाते हैं. यह जल्दी तैयार होती है और इस की जड़ों का रंग बर्फ जैसा सफेद होता है. गूदा चरपराहट वाला होता है. ये 50-55 दिनों में तैयार हो जाती है. इस की उपज 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर मिलती है.

परपल टोप : इस किस्म की जड़ें बड़े आकार की होती हैं. ऊपरी भाग बैगनी, गूदा सफेद और कुरकुरा होता है. यह ज्यादा उपज देती है. इस का गूदा ठोस और ऊपर का भाग चिकना होता है.

पूसा स्वर्णिमा : इस किस्म की जड़ें गोल, मध्यम आकार वाली, चिकनी और हलके पीले रंग की होती हैं. गूदा भी पीलापन लिए होता है. यह 65-70 दिनों में तैयार हो जाती है. सब्जी के लिए यह अच्छी किस्म है.

पूसा चंद्रिमा : यह किस्म 55-60 दिनों में तैयार हो जाती है. इस की जड़ें गोलाई लिए हुए होती हैं. यह ज्यादा उपज देती है.

पूसा कंचन : इस किस्म का छिलका ऊपर से लाल, गूदा पीले रंग का होता है. यह अगेती किस्म है, जो शीघ्र तैयार होती है. इस की जड़ें मीठी व खुशबूदार होती  हैं.

पूसा स्वेती : यह किस्म भी अगेती है. बोआई अगस्तसितंबर में की जाती है. जड़ें काफी समय तक खेत में छोड़ सकते हैं. जड़ें चमकदार व सफेद होती हैं.

स्नोवाल : यह भी अगेती किस्मों में शामिल है. इस की जड़ें मध्यम आकार की, चिकनी, सफेद और गोलाकार होती हैं. गूदा नरम व मीठा होता है.

गाजर (Carrots) में होने वाली बीमारियां

गाजर जड़ वाली फसल है और यह खरीफ मौसम में उगाई जाने वाली फसल है. गाजर से सब्जी, अचार व अनेक पकवान बनाए जाते है. यह सेहत के लिए काफी लाभकारी है. गाजर की फसल में भी कई तरह की बीमारियों का प्रकोप होता रहता?है, जिन की वजह से किसानों को काफी नुकसान उठाना पड़ता है. यहां ऐसी ही बीमारियों की जानकारी दी जा रही है.

जड़ों की बीमारियां

जड़ों में दरारें पड़ना : गाजर की खेती वाले इलाकों में ये दरारें ज्यादा सिंचाई के बाद अधिक मात्रा में नाइट्रोजनयुक्त उर्वरकों का इस्तेमाल करने से पड़ती हैं, लिहाजा इन उर्वरकों का इस्तेमाल सोचसमझ कर करना चाहिए.

जड़ों में खाली निशान पड़ना : जड़ों में घाव की तरह आयताकार धंसे हुए धब्बे दिखाई पड़ते हैं, जो धीरेधीरे बढ़ने लगते हैं. इसलिए जरूरत से ज्यादा सिंचाई नहीं करनी चाहिए.

अन्य बीमारियां

आर्द्र विगलन रोग : यह रोग पिथियम स्पीसीज नामक फफूंदी से होता है. इस रोग से बीज अंकुरित होते ही पौधे मुरझा जाते हैं. अकसर अंकुर बाहर नहीं निकलता और बीज सड़ जाता है.

तने का निचला हिस्सा जो जमीन की सतह से लगा होता है, सड़ जाता है. पौधे का अचानक सड़ना व गिरना आर्द्र विगलन का पहला लक्षण है. इस रोग की रोकथाम के लिए बीजों को बोने से पहले 3 ग्राम कार्बेंडाजिम से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिए.

जीवाणुज मृदु विगलन रोग : यह रोग इर्वीनिया कैरोटोवोरा नामक जीवाणु से फैलता है, इस रोग का असर खासकर गूदेदार जड़ों पर होता है. जिस से इस की जड़ें सड़ने लगती हैं. ऐसी जमीन जिस में जल निकासी की सही व्यवस्था नहीं होती या निचले क्षेत्र में बोई गई फसल पर यह रोग ज्यादा लगता है. इस रोग की रोकथाम के लिए खेत के पानी की निकासी की सही व्यवस्था करें. रोग के लक्षण दिखाई देने पर नाइट्रोजनधारी उर्वरकों का छिड़काव न करें.

कैरेट यलोज : यह एक विषाणुजनित रोग है, जिस के कारण पत्तियों का बीच का हिस्सा चितकबरा हो जाता है और पुरानी पत्तियां पीली पड़ कर मुड़ जाती हैं. जड़ें आकार में छोटी रह जाती हैं और उन का स्वाद कड़वा हो जाता है. इस रोग की रोकथाम के लिए 0.02 फीसदी मैलाथियान का छिड़काव करना चाहिए, ताकि इस रोग को फैलाने वाले कीडे़ मर जाएं.

सर्कोस्पोरा पर्ण अंगमारी : इस रोग के लक्षण पत्तियों, तनों व फूल वाले भागों पर दिखाई पड़ते हैं. रोगी पत्तियां मुड़ जाती हैं. पत्तियों की सतह व तनों पर बने दागों का आकार अर्धगोलाकार और धूसर, भूरा या काला होता है.

फूल वाले हिस्से बीज बनने से पहले ही सिकुड़ कर बरबाद हो जाते हैं. इस रोग की रोकथाम के लिए बीज बोते समय थायरम कवकनाशी का उपचार करें. खड़ी फसल में रोग के लक्षण दिखाई देते ही मैंकोजेब 25 किलोग्राम, कापर आक्सीक्लोराइड 3 किलोग्राम या क्लोरोथैलोनिल 2 किलोग्राम का 1000 लीटर पानी में घोल बना कर प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करें.

स्क्लेरोटीनिया विगलन : पत्तियों, तनों और डंठलों पर सूखे धब्बे होते हैं. रोगी पत्तियां पीली हो कर झड़ जाती हैं. कभीकभी पूरा पौधा ही सूख कर बरबाद हो जाता है. फलों पर रोग का लक्षण पहले सूखे दाग के रूप में दिखता है, फिर कवक गूदे में तेजी से बढ़ती है और फल को सड़ा देती है.

इस रोग की रोकथाम के लिए फसल लगाने से पहले ही खेत में थायरम 30 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से मिलाना चाहिए. कार्बेंडाजिम 50 डब्ल्यूपी कवकनाशी की 1 किलोग्राम मात्रा का 1000 लीटर पानी में घोल बनाएं और प्रति हेक्टेयर की दर से 15-20 दिनों के भीतर 3-4 बार छिड़काव करें.

चूर्ण रोग : पौधे के सभी हिस्सों पर सफेद हलके रंग का चूर्ण आ जाता है. चूर्ण के लक्षण आने से पहले ही कैराथेन 50 मिलीलीटर प्रति 100 लीटर पानी या वैटेबल सल्फर 200 ग्राम प्रति 100 लीटर पानी का छिड़काव 10 से 25 दिनों के अंतर पर लक्षण दिखने से पहले करें.

सूत्रकृमि की रोकथाम : सूत्रकृमि सूक्ष्म कृमि के समान जीव है, जो पतले धागे की तरह होते हैं, जिन्हें सूक्ष्मदर्शी से देखा जा सकता है. इन का शरीर लंबा व बेलनाकार होता है. मादा सूत्रकृमि गोल व नर सांप की तरह होते हैं. इन की लंबाई 0.2 से 10 मिलीमीटर तक हो सकती है. ये खासतौर से मिट्टी या पौधे के ऊतकों में रहते हैं. इन का फसलों पर प्रभाव ज्यादा देखा गया है. ये पौधे की जड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं, जिस से जड़ों की गांठें फूल जाती हैं और उन की पानी व पोषक तत्त्व लेने की कूवत घट जाती है. इन के असर से पौधे आकार में बौने, पत्तियां पीली हो कर मुरझाने लगती हैं और फसल की पैदावार कम हो जाती है.

रोकथाम : रोकथाम की कई विधियों में से किसी एक विधि से सूत्रकृमियों की पूरी तरह रोकथाम नहीं की जा सकती. इसलिए 2 या 2 से ज्यादा विधियों से सूत्रकृमियों की रोकथाम की जाती है. ये विधियां?हैं :

* गरमियों में गहरी जुताई करनी चाहिए.

* नर्सरी लगाने में पहले बीजों को कार्बोफ्यूरान व फोरेट से उपचारित करना चाहिए.

* फसल लगाने से 20-25 दिनों पहले कार्बनिक खाद को मिट्टी में मिलाना चाहिए.

* रोग प्रतिरोधी जातियों का चयन करें.

* अंत में यदि इन सब से रोकथाम न हो, तब रसायनों का इस्तेमाल करें.

रासायनिक इलाज

कार्बोफ्यूरान व फोरेट 2 किलोग्राम सक्रिय तत्त्व प्रति हेक्टेयर जमीन में मिलाएं या 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज दर से जरूरत के मुताबिक करें. कुछ दानेदार रसायन जैसे एल्डीकार्ब (टेमिक) को 11 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में मिलाना चाहिए.

खुदाई : गाजर की खुदाई का समय आमतौर पर उस की किस्म पर निर्भर करता है, वैसे जब गाजर की जड़ों के ऊपरी सिरे ढाई से साढे़ 3 सेंटीमीटर व्यास के हो जाएं, तब खुदाई कर लेनी चाहिए.

पैदावार : गाजर की पैदावार कई बातों पर निर्भर करती है, जिन में जमीन की उर्वराशक्ति, उगाई जाने वाली किस्म, बोने की विधि और फसल की देखभाल पर निर्भर करती है, लेकिन बीज उगाने के लिए गाजर के बीजों को घना बोते हैं, ताकि गाजर में 90 से 100 दिन बाद रोपाई के लिए जडें तैयार हो सकें.

तैयार जड़ों को हम खेत से निकाल लेते हैं और पौधों को बढ़ने के लिए छोड़ दिया जाता है, गाजर की उपज में कमी न आए, इस के लिए 30 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर के हिसाब से हलकी सिंचाई के बाद इस्तेमाल करना ठीक रहता है. आमतौर पर प्रति हेक्टेयर 200 क्विंटल तक औसतन उपज मिल जाती है.

आलू की खेती और बोआई मशीन (Planting Machine)

हमारे देश में आलू की अच्छीखासी पैदावार होती है. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार व गुजरात जैसे राज्य आलू की खेती करने में आगे हैं. उत्तर प्रदेश राज्य में सब से ज्यादा आलू की खेती की जाती है. कई बार आलू की खेती से किसान अच्छाखासा मुनाफा कमाते हैं, लेकिन कभीकभी यही ज्यादा पैदावार किसानों के लिए घाटे का सौदा भी बन जाती है. किसानों को चाहिए कि वे आलू की खेती करने के लिए अपने इलाके के हिसाब से बेहतर बीज का चुनाव करें और फसल समय पर बोएं. आलू की अधिकता होने पर प्रोसेसिंग की जानकारी ले कर आलू के उत्पाद बनाने की कोशिश करें. अगेती फसल बोने पर भी किसानों को मंडी से अच्छे दाम मिल जाते हैं.

उत्तर प्रदेश की जलवायु के हिसाब से आलू की तकरीबन 35 किस्में हैं, जिन में कुछ खास किस्मों के बीजों की जानकारी और फसल तैयार होने की जानकारी बाक्स में दी गई है.

खेत की तैयारी : फसल से अच्छी पैदावार लेने के लिए जमीन समतल और पानी के अच्छे निकास वाली होनी चाहिए. आलू की खेती के लिए अधिक उर्वरायुक्त बलुई दोमट व दोमट मिट्टी ठीक रहती है. खेत की 2-3 बार जुताई करें और पाटा चला कर खेत को समतल करें.

बोआई का समय : आलू की अगेती बोआई के लिए 15 सितंबर से मध्य अक्तूबर तक का समय ठीक होता है. बोने के 70-80 दिनों बाद आलू खोदने लायक हो जाते हैं. सामान्य फसल की बोआई के लिए मध्य अक्तूबर से 15 नवंबर तक का समय सही रहता है.

बोआई करने से पहले बीजोपचार जरूर करें. इस से जड़ वाली बीमारियों से छुटकारा मिलता है. इस के लिए बोरिक एसिड 3 फीसदी का घोल यानी 30 ग्राम प्रति लीटर पानी के हिसाब से घोल बनाएं.

उर्वरकों का इस्तेमाल : आलू की फसल के लिए 150 किलोग्राम नाइट्रोजन, 100 किलोग्राम फास्फोरस और 80 किलोग्राम पोटाश की जरूरत प्रति हेक्टेयर होती है. अच्छी पैदावार के लिए गोबर की खाद भी डालें. यदि आप ने फसल बोने से पहले मिट्टी की जांच कराई हो और उस में जस्ता व लोहा जैसे सूक्ष्म तत्त्वों की कमी हो, तो 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट और 50 किलोग्राम फेरस सल्फेट प्रति हेक्टेयर की दर से उर्वरकों के साथ बोआई से पहले खेत में डालें.

बोआई मशीन (Planting Machine)

बीजों की मात्रा : बोआई के लिए आलू के रोगरहित बीज भरोसे की जगह से खरीदें. वैसे सरकारी संस्थानों, राज्य बीज निगमों या बीज उत्पादन एजेंसियों से ही बीज खरीदना चाहिए. आमतौर पर 1 हेक्टेयर फसल बोने के लिए 30 से 35 क्विंटल बीजों की जरूरत होती है.

बोआई : आलू की बोआई करने के लिए मेंड़ से मेंड़ की दूरी 50-60 सेंटीमीटर रखें और पौधे से पौधे की दूरी 15 से 20 सेंटीमीटर रखें. कई बार आलू के आकार के हिसाब से यह दूरी कम या ज्यादा भी की जाती है. आमतौर पर आलू को 8 से 10 सेंटीमीटर की गहराई पर खुरपी की सहायता से बोया जाता है, ताकि अंकुरण के लिए मिट्टी में सही नमी बनी रहे. इस के अलावा आलू बोने की मशीन पोटैटो प्लांटर से भी आलू को बोया जाता है.

पोटैटो प्लांटर से आलू की बोआई : मोगा पौटेटो प्लांटर के बारे में अमनदीप सिंह ने बताया कि मोगा इंजीनियरिंग वर्क्स के पोटैटो प्लांटर मैन्यूअल और आटोमैटिक दोनों तरह के बाजार में मौजूद हैं. पोटैटो प्लांटर 2, 3 व 4 लाइनों में आलू की बोआई करता है, लेकिन सामान्यतया 85 फीसदी लोग 2 लाइनों में बोआई करने वाले पोटैटो प्लांटर को अधिक पसंद करते हैं.

बोआई मशीन (Planting Machine)

2 लाइनों में बोआई करने वाले मैन्यूअल पोटैटो प्लांटर की कीमत तकरीबन 38000 3 लाइनों में बोआई करने वाले प्लांटर की कीमत तकरीबन 48000 और 4 लाइनों में बोआई करने वाले प्लांटर की कीमत तकरीबन 58000 रुपए होती है.

आटोमैटिक पोटैटो प्लांटर की कीमत तकरीबन 1 लाख, 20 हजार रुपए है, जिस की रोजाना आलू बोआई करने की कूवत 35 बीघे से 50 बीघे तक है. इस के अलावा 2 से 4 लाइनों तक में बोआई करने वाले आटौमेटिक प्लांटर भी मौजूद हैं.

आलू बोने की इस मशीन के बारे में आप अमनदीप सिंह से उन के मोबाइल नंबर 08285325047 पर बात कर के अधिक जानकारी ले सकते हैं.

खरपतवार नियंत्रण और मिट्टी

चढ़ाना : आलू बिजाई के 20 से 25 दिनों बाद जब पौधे 8 से 10 सेंटीमीटर ऊंचाई के हो जाएं, तो लाइनों के बीच स्प्रिंग टाइन कल्टीवेटर या खुरपी से खरपतवार निकालने का काम करें.

इसी दौरान नाइट्रोजन की शेष मात्रा डाल कर खुरपी या ट्रैक्टर चालित रिजर से मिट्टी चढ़ा दें.

मैदानी इलाकों में आलू की फसल में खरपतवार का प्रकोप बिजाई के 4 से 6 हफ्ते बाद ज्यादा होता है यानी इस विधि से फसल को खरपतवार से मुक्त रखा जा सकता है. खरपतवारों के रासायनिक नियंत्रण के लिए फ्यूक्लोरेलिन, मैट्रीव्यूजीन, पैराक्लोट और प्रोपिनल खरपतवारनाशी रसायनों को 1000 लीटर पानी में घोल कर आवश्यकतानुसार दी गई विधियों को अपना कर छिड़काव करें.

उपज : जल्दी तैयार होने वाली किस्मों की पैदावार कुछ कम होती है, जबकि लंबी अवधि वाली किस्में ज्यादा उपज देती है. सामान्य किस्मों के मुकाबले संकर किस्मों से ज्यादा पैदावार (600 से 800 क्विंटल प्रति हेक्टेयर) मिलती है.

सिंचाई : फसल की पहली सिंचाई बोआई के 15-20 दिनों के अंदर कर लेनी चाहिए. सिंचाई करते समय ध्यान रखें कि मेंड़ें पानी में आधे से अधिक नहीं डूबनी चाहिए.

इस के बाद तकरीबन 15 दिनों के अंतराल पर दोबारा सिंचाई करें. आलू की फसल में तकरीबन 8 से 10 बार सिंचाई की जरूरत होती है. आलू तैयार होने पर जब उस की खुदाई करनी हो तो तकरीबन 10 दिन पहले ही उस की सिंचाई बंद कर दें.

फसल सुरक्षा : आलू की फसल को अनेक रोग व कीटों से बचाने के लिए बीमारी के हिसाब से दवाओं का इस्तेमाल करें. आलू में अनेक तरह की बीमारयिं जैसे अगेती झुलसा और पछेती झुलसा होने पर पौधे की पत्तियों पर गोल आकार के भूरे धब्बे बनने शुरू हो जाते हैं.

इन की रोकथाम के लिए 2 से ढाई किलोग्राम डाइथेन जेड 78 या डाइथेन एम 45 का 1000 लीटर पानी में घोल बना कर फसल पर छिड़काव करें. जरूरत पड़े तो 15 दिनों बाद फिर यह क्रिया अपनाएं.

आलू की दूसरी बीमारी है आलू का कोढ़ (कौमन स्कैब) इस रोग से फसल की पैदावार में तो कमी नहीं आती, लेकिन आलू भद्दे हो जाते हैं, जिस से बाजार में उन का सही दाम नहीं मिल पाता. आलू के कंदों के छिलकों पर लाल या भूरे रंग के छोटेछोटे धब्बे बन जाते हैं. इस बीमारी से बचाव के लिए बीजोपचार सब से अच्छा तरीका है.

बोआई मशीन (Planting Machine)

कीट नियंत्रण

एपीलेक्ना विटिल : इस कीट की सूंड़ी व वयस्क दोनों ही पत्तियां खाते हैं, जिस से पत्तियों में केवल नसें बचती हैं. यह कीट पीले रंग के होते हैं. इन की रोकथाम के लिए इंडोसल्फान 35 ईसी 1.25 लीटर या कार्बरिल 5 फीसदी घुलनशील चूर्ण की 2 किलोग्राम मात्रा 800 लीटर पानी में मिला कर छिड़काव करें.

कटवर्म  : यह जमीन के अंदर रहने वाला कीट है, इस की सूंड़ी रात के समय छोटेछोटे पौधों के तनों को काट देती है. इस की रोकथाम के लिए एल्ड्रिन 5 फीसदी चूर्ण अंतिम जुताई के समय मिट्टी में मिला दें.

आलू का माहूं : यह हरे रंग का कीट होता है, जो विषाणु फैलाता है. बचाव के लिए डाइमेथेएट 30 ईसी की 1 लीटर मात्रा 600 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें.

सफेद लट या गुबरेला : यह कीट जमीन के अंदर फसल को नष्ट कर देता है. फोरेट 10 जी या काबोफ्यूराल 3 जी 15 किलोग्राम बोआई से पहले इस्तेमाल करें.

खुदाई : अगेती फसल से ज्यादा कीमत हासिल करने के लिए बिजाई के 60-70 दिनों के बाद खुदाई की जा सकती है. मुख्य फसल की खुदाई तापमान 20-30 डिगरी सेंटीग्रेड तक पहुंचने से पहले कर लें, ताकि फसल ज्यादा तापमान पर मृदुगलन और काला गलन जैसे रोगों से ग्रसित न होने पाए.

लहसुन (Garlic) की आधुनिक खेती

लहसुन कंद वाली मसाला फसल है. मध्य प्रदेश में लहसुन का रकबा 60000 हेक्टेयर है और उत्पादन 270 हजार टन है. लहसुन की खेती मंदसौर, नीमच, रतलाम, धार, व उज्जैन के साथसाथ प्रदेश के सभी जिलों में की जा सकती है. आजकल इस का प्रसंस्करण कर के पाउडर, पेस्ट व चिप्स तैयार करने की तमाम इकाइयां मध्य प्रदेश में कार्यरत हैं, जो प्रसंस्करण किए गए उत्पादों को दूसरे देशों में बेच कर अच्छा मुनाफा कमा रही है.

जलवायु : लहसुन को ठंडी जलवायु की जरूरत होती है. वैसे तो लहसुन के लिए गरमी और सर्दी दोनों ही मौसम मुनासिब होते हैं, लेकिन ज्यादा गरम और लंबे दिन इस के कंद बनने के लिए सही नहीं रहते हैं. छोटे दिन इस के कंद बनने के लिए अच्छे माने जाते हैं. इस की सफल खेती के लिए 29 से 35 डिगरी सेल्सियस तापमान मुनासिब होता है.

खेत की तैयारी : इस के लिए जल निकास वाली दोमट मिट्टी बढि़या रहती है. भारी मिट्टी में इस के कंदों की सही बढ़ोतरी नहीं हो पाती है. मिट्टी का पीएच मान 6.5 से 7.5 ठीक रहता है. 2-3 बार जुताई कर के खेत को अच्छी तरह बराबर कर के क्यारियां व सिंचाई की नालियां बना लेनी चाहिए.

अन्य किस्में : नासिक लहसुन, अगेती कुआरी, हिसार स्थानीय, जामनगर लहसुन, पूना लहसुन, मदुराई पर्वतीय व मैदानी लहसुन, वीएलजी 7 आदि स्थानीय किस्में हैं.

लहसुन (Garlic)

बोआई का समय : लहसुन की बोआई का सही समय अक्तूबर से नवंबर के बीच होता है.

बीज व बोआई : लहसुन की बोआई के लिए 5 से 6 क्विंटल कलियों बीजों की प्रति हेक्टेयर जरूरत होती है. बोआई से पहले कलियों को मैंकोजेब और कार्बांडाजिम दवा के घोल से उपचारित करना चाहिए. लहसुन की बोआई कूंड़ों में बिखेर कर या डिबलिंग तरीके से की जाती है. कलियों को 5 से 7 सेंटीमीटर की गहराई में गाड़ कर ऊपर से हलकी मिट्टी से ढक देना चाहिए. बोते समय कलियों के पतले हिस्से को ऊपर ही रखते हैं. बोते समय बीज से बीज की दूरी 8 सेंटीमीटर व कतार से कतार की दूरी 15 सेंटीमीटर रखना ठीक होता है. बड़े क्षेत्र में फसल को बोने के लिए गार्लिक प्लांटर का भी इस्तेमाल किया जा सकता है.

खाद व उर्वरक : सामान्यतौर पर प्रति हेक्टेयर 20 से 25 टन पकी गोबर या कंपोस्ट या 5 से 8 टन वर्मी कंपोस्ट, 100 किलोग्राम नाइट्रोजन 50 किलोग्राम फास्फोरस व 50 किलोग्राम पोटाश की जरूरत होती है. इस के लिए 175 किलोग्राम यूरिया, 109 किलोग्राम डाई अमोनियम फास्फेट व 83 किलोग्राम म्यूरेट औफ पोटाश की जरूरत होती है. गोबर की खाद, डीएपी व पोटाश की पूरी मात्रा और यूरिया की आधी मात्रा खेत की आखिरी तैयारी के समय खेत में मिला देनी चाहिए. बची हुई यूरिया की मात्रा को खड़ी फसल में 30 से 40 दिनों बाद छिड़काव के साथ देना चाहिए. सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की मात्रा का इस्तेमाल करने से उपज में बढ़ोत्तरी हाती है. 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर 3 साल में 1 बार इस्तेमाल करना चाहिए.

सिंचाई व जल निकास : बोआई के तुरंत बाद हलकी सिंचाई कर देनी चाहिए. वानस्पतिक बढ़ोतरी के समय 7 से 8 दिनों के अंतर पर और फसल पकने के समय 10 से 15 दिनों के अंतर पर सिंचाई करते रहना चाहिए पर खेत में पानी नहीं भरने देना चाहिए.

निराईगुड़ाई व खरपतवार नियंत्रण : जड़ों में हवा की सही मात्रा के लिए खुरपी या कुदाली द्वारा बोने के 25 से 30 दिनों बाद पहली निराईगुड़ाई व 45 से 50 दिनों बाद दूसरी निराईगुड़ाई करनी चाहिए.

लहसुन (Garlic)खुदाई व लहसुन का सुखाना : जिस समय पौधों की पत्तियां पीली पड़ जाएं और सूखने लग जाएं तो सिंचाई बंद कर के खुदाई करनी चाहिए. इस के बाद गांठों को 3 से 4 दिनों तक छाया में सुखा लेते हैं. फिर 2 सेंटीमीटर छोड़ कर पत्तियों को कंदों से अलग कर लेते हैं. कंदों को भंडारण में पतली तह में रखते हैं. ध्यान रखें कि फर्श पर नमी न हो.

बढ़ोतरी नियामक का प्रयोग : लहसुन की उपज ज्यादा हो इसलिए 0.05 मिलीलीटर प्लैनोफिक्स या 500 मिग्रा साइकोसिल या 0.05 मिलीलीटर इथेफान प्रति लीटर पानी में घोल बना कर बोआई के 60 से 90 दिनों बाद छिड़काव करना सही रहता है.

कंद की खुदाई से 2 हफ्ते पहले 3 ग्राम मैलिक हाइड्रोजाइड प्रति लीटर पानी में छिड़काव करने से भंडारण के समय अंकुरण नहीं होता है व कंद 10 महीने तक बिना नुकसान के रखे जा सकते हैं.

भंडारण : अच्छी तरह से सुखाए गए लहसुन को उन की छंटाई कर के हवादार घरों में रख सकते हैं. 5 से 6 महीने भंडारण से 15 से 20 फीसदी तक का नुकसान मुख्य रूप से सूखने से होता है. पत्तियां सहित बंडल बना कर रखने से कम नुकसान होता है.

औषधीय गुण : भोजन को पचाने व सोखने में लहसुन काफी फायदेमंद है. यह रक्त कोलेस्ट्राल के गाढ़ेपन को कम करता है. इस का इस्तेमाल करने से कई बीमारियों जैसे गठिया, तपेदिक, कमजोरी, कफ व लाल आंखें हो जाना आदि से छुटकारा पाया जा सकता है.

कीटनाशी प्रभाव : लहसुन के रस में कीटनाशी गुण के कारण 10 मिलीलीटर अर्क प्रति लीटर पानी में घोल कर इस्तेमाल करने से मच्छर व घरेलू मक्खी की रोकथाम की जा सकती है.

जीवाणुनाशी प्रभाव : स्टेफाइलोकोकस आरियस नामक जीवाणु की रोकथाम लहसुन के इस्तेमाल से की जा सकती है. खाद्य पदार्थो में 2 फीसदी से ज्यादा लहसुन की मात्रा जहर पैदा करने वाले जीवाणु क्लोस्ट्रीडियम परिफ्रंजेंस से रक्षा करती है. इस के अलावा इस में अन्य कई प्रकार के हानिकाक जीवाणुओं से बचाने की कूवत होती है.

खास कीट

माहूं (माईजस परसिकी) : इस के निम्फ व वयस्क पौधे से रस चूसते हैं, जिस से पत्तियां किनारों से मुड़ जाती हैं. कीट की पंख वाली जाति लहसुन में वाइरस जनित रोग भी फैलाती है. ये चिपचिपा मधुरस पदार्थ अपने शरीर के बाहर निकालते हैं, जिस से पत्तियों के ऊपर काली फफूंद पनपती देखी जा सकती है, जिस से पौधों की भोजन बनाने की क्रिया पर असर पड़ता है.

रोकथाम : माहूं का प्रकोप होने पर पीले चिपचिपे ट्रैप का इस्तेमाल करें, जिस से माहूं ट्रैप पर चिपक कर मर जाएं. परभक्षी काक्सीनेलिड्स या सिरफिड या क्राइसोपरला कार्निया को एकत्र कर 50000-100000 अंडे या सूंड़ी प्रति हेक्टेयर की दर से छोडे़ं. जरूरतानुसार डाइमेथोएट 30 ईसी या मेटासिसटाक्स 25 ईसी 1.25-2.0 मिलीलीटर प्रति लीटर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

लहसुन का मैगट : मैगट पौधे के तने व शल्ककंद में घुस कर नुकसान पहुंचाते हैं. बड़े शल्ककंदों में 8 से 10 मैगट एकसाथ घुस कर उसे खोखला बना देते हैं.

रोकथाम : शुरुआत में रोगी खेत पर काटाप हाइड्रोक्लोराइड 4जी की 10 किलोग्राम मात्रा को प्रति हेक्टेयर की दर से भूमि में बिखेर कर सिंचाई कर दें. बढ़ते हुए पौधों पर मिथोमिल 40 एसपी की 1.0 किलोग्राम या ट्रायजोफास 40 ईसी की 750 मिलीलीटर मात्रा को 500-600 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करने पर नए निकले हुए मैगट मर जाते हैं.

थ्रिप्स : इस कीट का हमला तापमान के बढ़ने के साथसाथ होता है व  मार्च महीने में इस का हमला जयादा दिखाई देता है. यह पत्तियों से रस चूसता है, जिस से पत्तियां कमजोर हो जाती हैं और रोगी जगह पर सफेद चकत्ते पड़ जाते हैं, जिस के कारण पत्तियां मुड़ जाती हैं.

रोकथाम : लहसुन की कीट रोधी प्रजातियां उगानी चाहिए. कीट के ज्यादा प्रकोप की दशा में 150 मिलीलीटर इमिडाक्लोपिड 17.8 एसएल को 500-600 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.

माइट्स : इस कीट के प्रकोप से पत्ती का असर वाला भाग पीला हो जाता है और पत्तियां मुड़ी हुई निकलती हैं. वयस्क और शिशु कीट दोनों ही नई पत्तियों का रस चूस कर फसल को नुकसान पहुंचाते हैं. रोग के शुरू में सब से पहले पौधों की निचली पत्तियां तैलीय हो जाती हैं और बाद में पूरा पौधा तैलीय हो जाता है. रोगी पत्तियां छोटी हो जाती हैं और चमड़े की तरह दिखाई देती हैं. पत्तियां निचली तरफ से तांबे जैसी रंगत की दिखाई देती हैं. माइट का ज्यादा हमला होने से रोगी पत्तियां सूख कर गिर जाती हैं और पूरा पौधा मुरझा कर सूख जाता है.

रोकथाम : रोगी पौधों को कंद व जड़ सहित उखाड़ कर नष्ट कर दें. घुलनशील गंधक 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर या कैराथीन 500 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर के हिसाब से इस्तेमाल करें. मैटासिस्टाक्स का छिड़काव भी लाभदायक होता है.

लहसुन (Garlic)

लहसुन के रोग

विगलन : इस रोग का असर कंदों पर खेतों में या भंडारगृह दोनों में हो सकता है. खेत में रोगी पौधा पीला हो जाता है और जड़ें सड़ने लगती हैं. कभीकभी रोग के लक्षण बाहर से नहीं दिखाई पड़ते हैं, लेकिन लहसुन की गर्दन के पास दबाने से कुछ शल्क मुलायम जान पड़ते हैं. बाद में ये शल्क भूरे रंग के हो जाते हैं. सूखे मौसम में शल्क धीरेधीरे सूख कर सिकुड़ जाते हैं, जिस की वजह से छिलका फट कर अलग हो जाता है.

रोकथाम : खेत को ट्राईकोडर्मा नामक जैव फफूंद की 2.5 किलोग्राम मात्रा से प्रति हेक्टेयर की दर से उपचारित करना चाहिए. गरमी के महीनों में खेत की अच्छी तरह जुताई कर के खुला छोड़ दें, जिस से कि कवक व अन्य रोग जनकों की मौत हो जाए. कंदों को बोआई से पहले 2.0 ग्राम कार्बेंडाजिम का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर उपचारित करें.

बैगनी धब्बा : इस रोग से लहसुन को काफी नुकसान होता है. इस रोग के लक्षण पत्तियों, कंदों पर उत्पन्न होते हैं, शुरू में छोटे धंसे हुए धब्बे बनते हैं, जो बाद में बड़े हो जाते हैं. धब्बे का बीच का भाग बैगनी रंग का हो जाता है. यदि आप उसे हाथों से छुएं तो काले रंग का चूर्ण हाथ में चिपका हुआ दिखाई देता है. रोगी पत्तियां झुलस कर गिर जाती हैं. रोगी पौधों से प्राप्त कंद सड़ने लगते हैं.

रोकथाम : 2-3 साल का सही फसलचक्र अपनाएं. रोग के लक्षण दिखाई देते ही मैंकोजेब की 2.0 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर 2 बार छिड़काव करें.

सफेद सड़न : इस बीमारी से कलियां सड़ने लगती हैं.

रोकथाम : जमीन को ट्राईकोडर्मा नामक जैव फफूंद की 2.5 किलोग्राम मात्रा से प्रति हेक्टेयर की दर से उपचारित करना चाहिए. गरमी के महीनों में खेत की अच्छी तरह जुताई कर के खुला छोड़ दें जिस से कि कवक व अन्य रोगजनकों की मौत हो जाए. कंदों को बोआई के पहले 2.0 ग्राम कार्बेंडाजिम का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर उपचारित करें.

कंद सड़न : इस बीमारी का हमला भंडारण में होता है.

रोकथाम : इस की रोकथाम के लिए कंद को 2 फीसदी बोरिक अम्ल से उपचारित कर के भंडारण करना चाहिए. बीज के लिए यदि कंद को रखना हो तो 0.1 फीसदी मरक्यूरिक क्लोराइड से उपचारित कर के रखें. खड़ी फसल में मैंकोजेब की 2.0 ग्राम मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें.

फुटान : नाइट्रोजन युक्त उर्वरकों के ज्यादा इस्तेमाल से यह बीमारी फैलती है. इस के अलावा ज्यादा पानी या ज्यादा दूरी पर रोपाई की वजह से फुटान ज्यादा होती है. इस बीमारी से लहसुन कच्ची दशा में कई छोटेछोटे फुटान देता है, जिस से कलियों का भोजन पदार्थ वानस्पतिक बढ़वार में इस्तेमाल होता है.

रोकथाम : लहसुन की रोपाई कम दूरी पर करें और नाइट्रोजन व सिंचाई का इस्तेमाल ज्यादा न करें. ऐसे रोगी पौधों को देखते ही पौलीथीन की थैली से ढक कर सावधानीपूर्वक उखाड़ कर मिट्टी में दबा दें. बीजों को बोने से पहले विटावैक्स 2.5 ग्राम या टेबूकोनाजोल 1.0 ग्राम से प्रति किलोग्राम की दर से उपारित करें.

मूंगफली की खेती (Peanut Cultivation)

भारत में मूंगफली के उत्पादन का तकरीबन 75 से 85 फीसदी हिस्सा तेल के रूप में इस्तेमाल होता है. इस के फायदे इस तरह हैं:

मूंगफली में 30 फीसदी प्रोटीन, 21 से 25 फीसदी कार्बोहाइड्रेट, 45 से 50 फीसदी वसा, विटामिन, कैल्शियम और दूसरे पोषक तत्त्व मौजूद हैं. इनसान के लिए ये तत्त्व जरूरी होते हैं.

मूंगफली की खेती

खरीफ और जायद दोनों मौसमों में इस की खेती की जाती है. जहां पर जायद के समय ज्यादा बारिश होती है, वहां पर भी मूंगफली की खेती की जाती है. इस के लिए शुष्क जलवायु की जरूरत होती है.

मूंगफली की खेती के लिए दोमट और हलकी दोमट मिट्टी अच्छी होती है. खेत में पानी के निकलने का पुख्ता बंदोबस्त होना चाहिए.

खरीफ की खेती के लिए किस्में इस तरह हैं:

जेजीएन 3 व 23, जेएल 501, टाइप 28 व 64, चंद्रा, चित्रा, प्रकाश, अंबर, उत्कर्ष वगैरह.

कार्बंडाजिम और ट्राइकोडर्मा विरिडी 4 से 5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज को उपचारित करना चाहिए. अगर आप जैविक तकनीक से बीज का उपचार करना चाहते हैं तो राइजोबियम और फास्फोरस घोलक जीवाणु 7 से 10 ग्राम प्रति किलोग्राम के हिसाब से उपचारित करना चाहिए.

किसी भी मौसम में मूंगफली फसल के लिए खेत की तैयारी अच्छी तरह करनी चाहिए. खेत की पहली जुताई गहरी करें. उस के बाद 2 से 3 जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से करें और अंतिम जुताई के बाद पाटा लगा कर खेत को समतल बना लेना चाहिए.

आखिरी जुताई से पहले 120 से 150 क्विंटल सड़ी गोबर की खाद या कंपोस्ट खाद प्रति हेक्टेयर अच्छी तरह से मिला देनी चाहिए. इस के अलावा 25 से 30 किलोग्राम नाइट्रोजन, 35 किलोग्राम फास्फोरस, 50 किलोग्राम पोटाश और 300 से 350 किलोग्राम जिप्सम डालनी चाहिए. जिप्सम की आधी मात्रा बोआई से पहले और आधी मात्रा फूलों के समय देना अच्छा रहता है.

खरीफ में बीज की बोआई मध्य जून से मध्य जुलाई तक कर लेनी चाहिए. लाइन से लाइन की दूरी 35 से 45 सैंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 15 से 20 सैंटीमीटर होनी चाहिए.

खरीफ फसल के लिए बीज की मात्रा 95 से 100 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर होनी चाहिए और बीज को 2 से 4 सैंटीमीटर गहराई पर डालना चाहिए.

खरीफ मौसम में मूंगफली फसल के लिए बारिश नहीं होने पर 2 से 3 सिंचाई जरूरी हैं. पहली सिंचाई जरूरत के मुताबिक कभी भी. दूसरी खुटिया बनते समय और तीसरी फूलों के समय बहुत जरूरी होती है.

मूंगफली फसल के खेत की निराईगुड़ाई बोने के 15 से 20 दिन बाद और दूसरी निराईगुड़ाई बोने के 35 से 40 दिन बाद करनी चाहिए, लेकिन दूसरी निराईगुड़ाई से पहले जो जिप्सम बचा के रखी थी, उस का बुरकाव कर दें. उस के बाद निराईगुड़ाई करनी चाहिए.

मूंगफली की खेती (Peanut Cultivation)

खरपतवार पर नियंत्रण पाने के लिए खरपतवारनाशक का इस्तेमाल कर सकते हैं. इस का नाम पेंडीमिथेलीन 30 ईसी या एलाक्लोर 50 ईसी 4 लिटर का 700 से 1000 लिटर पानी में घोल बना कर बोने के तुरंत बाद छिड़काव करना चाहिए और मिट्टी नमी वाली होनी चाहिए. इस से खरपतवार का जमाव या तो होगा ही नहीं. अगर जमाव हुआ भी तो बहुत कम मात्रा में होगा.

मुख्य रोग

मूंगफली की फसल में टिक्का रोग, बड़ने क्रोसिस, डाई रूट, क्राउन राट और पत्ता झुलसा रोग वगैरह लग सकते हैं.

इस रोग की रोकथाम के लिए डाइमेथोएट 30 ईसी की 1 लिटर मात्रा को 700 से 900 लिटर पानी में घोल बना कर प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए या फिर जीरम 27 फीसदी की मात्रा को 3 लिटर प्रति हेक्टेयर में 2 छिड़काव 10 से 15 दिन के अंतराल पर करना चाहिए.

मूंगफली फसल में कीटों का हमला होता है जैसे दीमक, सफेद गिड़ार और फलीबेधक. इन की रोकथाम के लिए बोने से पहले फोरेट 10जी 25 किलोग्राम डालनी चाहिए या फिर लिंडेन चूर्ण 1.3 फीसदी 30 किलोग्राम या सेबीडाल 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर मिट्टी में मिलाना चाहिए.

किसान भाइयों को प्रति हेक्टेयर क्लोरोपायरीफास 4 लिटर प्रति हेक्टेयर सिंचाई के साथ प्रयोग करना चाहिए. दीमक कीट की रोकथाम के लिए मूंगफली की खुदाई और भंडारण तब करना चाहिए जब मूंगफली के दाने का रंग गुलाबी हो जाए और आप को लगे कि फसल पक चुकी है.

मूंगफली को अच्छी तरह छाया में सुखा कर ही उस का भंडारण करें, नहीं तो आप की मूंगफली खराब हो सकती है. खरीफ की फसल में मूंगफली की पैदावार 27 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर ले सकते हैं.

मूंगफली की खेती (Peanut Cultivation)मूंगफली सेवन के फायदे

मूंगफली वानस्पतिक प्रोटीन का एक सस्ता स्रोत है. इस में प्रोटीन की मात्रा मांस की तुलना में 1.3 गुना, अंडों से 2.4 गुना और फलों से 8 गुना ज्यादा होती है. 100 ग्राम कच्ची मूंगफली में 1 लिटर दूध के बराबर प्रोटीन होता है.

मूंगफली में प्रोटीन की मात्रा 25 फीसदी से ज्यादा होती है, जबकि मांस, मछली और अंडों में उस का फीसदी 10 फीसदी से ज्यादा नहीं.

250 ग्राम मूंगफली के मक्खन से 300 ग्राम पनीर, 2 लिटर दूध या 15 अंडों के बराबर ऊर्जा मिलती है.

मूंगफली पाचनशक्ति को बढ़ाने में कारगर है. 250 ग्राम भुनी मूंगफली में जितनी मात्रा में खनिज और विटामिन पाए जाते हैं, वो 250 ग्राम मांस से भी प्राप्त नहीं हो सकता है.

हफ्ते में 5 दिन मूंगफली खाने से दिल की बीमारियों के होने का खतरा कम रहता है वहीं कोलेस्ट्रौल भी नियंत्रण में रहता है. इस में प्रोटीन, वसा, फाइबर, खनिज, विटामिन और ऐंटीऔक्सीडैंट भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं इसलिए मूंगफली खाने से त्वचा में चमक बनी रहती है.

मूंगफली में कैल्शियम और विटामिन डी भी अधिक मात्रा में होता है, इसलिए इसे खाने से हड्डियां मजबूत होती हैं. रोजाना थोड़ी मात्रा में मूंगफली खाने से औरतों और मर्दों में हार्मोन का संतुलन बना रहता है. इस का प्रोटीन दूध से मिलताजुलता है. चिकनाई घी से मिली है.

मूंगफली खाने से दूध, बादाम और घी की भरपाई हो जाती है. मूंगफली शरीर में गरमी पैदा करती है, इसलिए सर्दी के मौसम में यह ज्यादा फायदेमंद है.

आलू की खेती (Potato Farming) में मुनाफा ऐसे लें

इस समय आलू उत्पादन में चीन के बाद भारत दूसरे पायदान पर है. यूरोप व कई दूसरे देशों में आलू की खपत 100 से 120 किलोग्राम हर आदमी हर साल है जबकि भारत में यह तकरीबन 20 किलोग्राम हर आदमी हर साल है. भारत में आलू पैदावार में पिछले सालों में काफी इजाफा हुआ है और साल 1949 में जब केंद्रीय आलू संस्थान की नींव रखी गई थी, उस समय भारत में आलू 0.23 मिलियन हेक्टेयर रकबे में उगाया गया था.

मिट्टी व आबोहवा

आलू की खेती के लिए जीवाणु वाली बलुई व हलकी दोमट मिट्टी बढि़या होती है. पानी के निकलने का पुख्ता बंदोबस्त होना चाहिए. आलू की फसल के लिए ज्यादा अम्लीय या क्षारीय और पानी रुकने वाली जमीन कभी न लें.

खेत की तैयारी

आलू को बोने से पहले हरी खाद वाली सनई, ढेंचा, मूंग व उड़द खेत में लगाने से नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश की  30 फीसदी से भी कम मात्रा की जरूरत पड़ती है.

आलू की फसल के लिए मिट्टी को ज्यादा भुरभुरी बनाए रखने के लिए बोआई से 6-8 हफ्ते पहले मिट्टी पलटने वाले हल से जुताई करें और उस के बाद हैरो से 2 बार अथवा कल्टीवेटर से जुताई कर पाटा लगा कर खेत को समतल कर लें. मुनासिब नमी बनाए रखने के लिए पलेवा कर के फिर से कल्टीवेटर से 2 जुताई करना फायदेमंद होगा.

बीज की तैयारी

बोआई से कम से कम 10 दिन पहले कोल्ड स्टोर से आलू के बीज को निकाल लें. बीज की बोरियों को कम से कम 24 घंटे तक सामान्य कमरे में रखें. कभी बीज को कोल्ड स्टोर से सीधे ज्यादा तापमान में न निकालें, नहीं तो बीज सड़गल सकता है.

एगलाल 3 फीसदी के 250 ग्राम को 250 लिटर पानी में घोल कर बीज को उपचारित किया जाना चाहिए.

आलू के ब्लैक स्कार्फ रोग से बचाव के लिए कंदों के टुकड़ों को बोआई के पहले 0.5 फीसदी एरिटान अथवा टेफासान (6 फीसदी पारायुक्त घोल में) 2 मिनट तक डुबोने के बाद बोएं.

बोआई का उचित समय : बोआई का मुनासिब समय आमतौर पर जब तापमान  30-32 सैंटीग्रेड हो और सब से कम तापमान 18-20 डिगरी सैंटीग्रेड के बीच, मुनासिब होता है.

उत्तर भारत के मैदानी इलाकों में आलू की अगेती फसल सितंबर व अगस्त में बोई जाती है. खास फसल अक्तूबर, नवंबर और देर से या बीज के लिए बोई जाने वाली फसल दिसंबर और जनवरी में सही रहती है.

कोहरा या पाला से निबटने के लिए बोआई ऐसे समय पर करें, जब आलू का कंद दिसंबर माह तक पूरा बन जाए. इस के लिए अक्तूबर का पहला पखवारा सही है.

बोने का तरीका : बोआई से पहले हलका पानी देने से आलू का जमाव व फुटाव अच्छा होता है. खाद के इस्तेमाल के लिए बनाई गई नालियों में आलू का बीज रखें. मशीन से आलू बनाने की दशा में लाइन की दूरी 60-65 सैंटीमीटर रखें. कंद से कंद की दूरी बीज कंद के आकार के मुताबिक रखी जाती है. बीज कंद का आकार 40-80 ग्राम होने पर बीज से बीज की दूरी 15-25 सैंटीमीटर रखें.

मजदूरों द्वारा 30-40 ग्राम वजन वाले बीज आलू की बोआई करने की दशा में लाइन से लाइन की दूरी 55-60 सैंटीमीटर और बीज से बीज की दूरी 10-30 सैंटीमीटर रखें.

बोआई के तुरंत बाद आलुओं को मिट्टी की 8-10 सैंटीमीटर मोटी तह से ढक दें ताकि बोआई के समय मिट्टी में नमी बनी रहे.

अकसर इस विधि के अलावा जहां आलू की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है वहां ज्यादातर आलू बोआई की मशीन (पोटैटो प्लांटर) से करते हैं.

खाद और उर्वरक : हरी खाद न होने की दशा में फसल की बोआई के 15-20 दिन पहले गोबर की सड़ी खाद अथवा कंपोस्ट खाद की 30-40 टन प्रति हेक्टयर मात्रा डालनी चाहिए.

रासायनिक उर्वरकों में नाइट्रोजन की उम्दा मात्रा के लिए 100 से 120 किलोग्राम नाइट्रोजन व 80 से 100 किलोग्राम फास्फोरस और 100 से 120 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई के समय देना फायदेमंद होता है और नाइट्रोजन की 100 से 120 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई के 25 से 30 दिन बाद मिट्टी चढ़ाते समय दे देनी चाहिए.

सिंचाई : हलकी मिट्टियों व बलुई दोमट मिट्टी में 6 से 10 दिनों के फासले पर, जबकि भारी मिट्टियों में 12 से 15 दिनों के बाद सिंचाई करनी चाहिए. बलुई दोमट मिट्टी में कुल 8 से 10 सिंचाइयां करनी पड़ती हैं जबकि भारी मिट्टी में कुल सिंचाई 5 से 6 बार हो सकती है. डंठल कटाई के 10 दिन पहले सिंचाई बंद कर दें.

निराई, गुड़ाई और खरपतवार नियंत्रण

बोआई के 4-6 हफ्ते बाद खरपतवार उग आते हैं. इस पर नियंत्रण कर्षण व यंत्रों और रसायनों द्वारा कर सकते हैं.

खरपतवार नियंत्रण के लिए बोआई के 25 से 30 दिनों बाद जब पौधों की ऊंचाई 8 से 10 सैंटीमीटर तक हो जाए तब ट्रैक्टरचालित स्प्रिंग टाइन कल्टीवेटर की मदद से लाइनों के बीच से खरपतवार हटा लें या खुरपी की मदद से यह काम किया जा सकता है.

निराई व गुड़ाई करने के बाद मिट्टी में नमी बनी रहे, इस के लिए मिट्टी चढ़ाने का काम तुरंत करें. इस के बाद ट्रैक्टरचालित पोटैटो रीजर या कुदाल से मोटी मेंड़ बना दें.

आलू के खास कीट

कुरमुला कीट : ये सूंड़ी आलू के कंदों को खा कर नुकसान पहुंचाती हैं. इस कीट की दूसरी व तीसरी सूंड़ी अवस्थाएं पौधे की जड़ों को काटती हैं.

रोकथाम : वयस्क कीट प्रकाश प्रपंच के ऊपर भारी तादाद में खिंचते हैं. बोआई से पहले ब्यूवेरिया ब्रोंगनियार्टी, मेटारायजियम एनासोप्ली 1.0 किलोग्राम व सूत्रकृमि का पाउडर या फार्मुलेशन से बनाए गए घोल को 2.5-5×109 लार्वा प्रति हेक्टेयर की दर से सिंचाई के साथ कीड़ों के लगने से पहले खेत में डालें. कीटनाशी रसायन क्लोरोपायरीफास 10 ईसी, इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल द्वारा बीज उपचारित करें.

माहू : ये कीट पत्तियों के रस को चूसते हैं जिस से विषाणु आलू कंदों तक पहुंच जाते हैं.

रोकथाम : परभक्षी कौक्सीनेलिड्स अथवा सिरफिड अथवा क्राइसोपरला कार्निया का संरक्षण कर 50,000-1,00,000 अंडे या सूंड़ी प्रति हेक्टयर की दर से छोड़ें.

जरूरत होने पर डाइमेथोएट 30 ईसी या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल की 0.5 मिलीलिटर प्रति लिटर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

एपीलेकना बीटल : वयस्क भृंग व भृंगक दोनों ही पत्तियों के हरे भाग को खुरचखुरच कर खाते हैं.

रोकथाम : इस कीट का ज्यादा हमला होने पर क्लोरोपायरीफास 20 ईसी कीटनाशी रसायन की 2.0 मिलीलिटर मात्रा प्रति लिटर पानी दर से घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए.

आलू का कंद शलभ : इस की गिड़ारें आलू की पत्तियों और आलू कंदों में सुरंग बना कर अंदर का गूदा खा कर खराब कर देती हैं. आलू सड़ने पर बदबू करने लगता है.

रोकथाम : अगर आलू बीज के लिए रखा जा रहा है तो उस में 1.5 किलोग्राम मेलाथियान डस्ट को प्रति मीट्रिक टन के हिसाब से मिलाना चाहिए.

आलू की फसल में अंडा व सूंड़ी परजीवी केलोनस बलकयूमी 50,000 प्रति हेक्टेयर की दर से 2 बार 40 से 70 दिन के बाद छोड़ें.

आलू की फसल में यदि कीट द्वारा पत्तियों पर नुकसान दिखाई देने पर 5 फीसदी का नीम का अर्क या क्यूनसल्फास 35 ईसी का 2 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी का छिड़काव करें.

कर्तन कीट : इस कीट की सूंड़ी आलू के नए छोटे पौधों के तनों को जमीन की सतह से काट कर नुकसान पहुंचाती हैं और बाद में पौधों की शाखाओं से अपना भोजन ग्रहण करती हैं.

रोकथाम : खेतों के पास प्रकाश प्रपंच 20 फेरोमोन ट्रैप प्रति हेक्टेयर की दर से लगाएं. खेतों के बीचबीच में घासफूस के छोटेछोटे ढेर शाम के समय लगा देने चाहिए.

रात में जब सूंडि़यां खाने को निकलती हैं तो बाद में इन्हीं में छिपेंगी जिन्हें घास हटाने पर आसानी से खत्म किया जा सकता है.

प्रकोप बढ़ने पर क्लोरोपायरीफास 20 ईसी की 1 लिटर प्रति हेक्टेयर मात्रा या नीम का तेल 3 फीसदी की दर से छिड़काव करें.

सफेद मक्खी : यह मक्खी पौधों का रस चूस कर नुकसान पहुंचाती है. इस से पौधे मुरझा जाते हैं या उन की बढ़वार रुक जाती है.

रोकथाम : पीले चिपचिपे 12 ट्रैप प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें. ग्रसित पौधों पर नीम का तेल 5 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी में या मछली रोसिन सोप 25 मिलीग्राम प्रति लिटर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

ज्यादा तादाद में दिखने पर मेटासिस्टाक्स 25 ईसी या डाइमिथोएट 30 ईसी या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल या थायोमेक्जाम 25 ईसी 1 मिलीमीटर प्रति लिटर की दर से छिड़काव करें.

आलू के खास रोग

झुलसा रोग (आलू का अगेती अंगमारी) : यह रोग आल्टरनेरिया सोलेनाई नामक कवक द्वारा पैदा होता है. इस रोग के लक्षण पछेती अंगमारी से पहले यानी फसल बोने के 3-4 हफ्ते बाद पौधों की निचली पत्तियों पर छोटेछोटे, दूरदूर बिखरे हुए कोणीय आकार के चकत्तों या धब्बों के रूप में दिखाई देते हैं. बाद में यह कवक की गहरी हरी नीली बढ़वार से ढक जाते हैं. ये धब्बे काफी तेजी से बढ़ते हैं और ऊपर की पत्तियों पर भी बन जाते हैं.

रोकथाम : कवकनाशी जैसे जिनेब 0.2 फीसदी, डाइथेन एम 45 या 0.2 फीसदी बिलटोक्स के 0.25 फीसदी डिफोल्टान और कैप्टौन 0.2 फीसदी की दर से 4-5 छिड़काव प्रति हेक्टेयर की दर से करना चाहिए.

फसल पर बीमारी का ज्यादा प्रकोप दिखाई देने पर यूरिया 1 फीसदी और मैंकोजेब (75 फीसदी ) का 0.2 फीसदी का छिड़काव प्रति हेक्टेयर की दर से करना चाहिए.

झुलसा रोग (आलू का पिछेता अंगमारी) : यह रोग फाइटोप्थोरा इंफैस्टैंस नामक कवक की वजह से फैलता है. आलू में पछेती अंगमारी बेहद विनाशकारी रोग है. इस रोग का प्रकोप पौधों की निचली पत्तियों से शुरू होता है. पत्ती की निचली सतह में सफेद रंग का गोला बन जाता है और बाद में यह भूरा व काला हो जाता है.

रोकथाम : आलू की पत्तियों पर कवक के प्रकोप को रोकने के लिए बोर्डेक्स मिश्रण या फ्लोटान का छिड़काव करना चाहिए. बीजों को बोने से पहले मेटालेक्सिल नामक फफूंदीनाशक की 10 ग्राम मात्रा को प्रति 10 लिटर पानी में घोल बना कर आधा घंटे तक डुबो कर उपचारित करें. इस के बाद इसे छाया में सुखा कर बोआई करें.

आलू की फसल में कवकनाशी जैसे मैंकोजेब (75 फीसदी) का 0.2 फीसदी यानी 2 ग्राम प्रति लिटर या क्लोरोथलोनील 0.2 फीसदी या मेटालेक्सिल 0.25 फीसदी या सायमोक्सेनिल 0.03 फीसदी यानी 3 ग्राम प्रति लिटर या डाइथेन एम 45 की 0.2 फीसदी की दर से 4-5 छिड़काव प्रति हेक्टेयर की दर से करना चाहिए.

जीवाणु रोग : यह आलू का एक खास रोग है. इस रोग को स्यूडोमोनास सोलेनेसिएरस नामक जीवाणु पैदा करता है. पौधे की शुरुआती अवस्था में ही यह रोग पूरे पौधे को मुरझा देता है. अकसर 2-3 दिन के अंदर पौधा मुरझा जाता है और जीवाणु जड़ से पौधे की चोटी तक पहुंच जाते हैं. इन के सूक्ष्म जीवाणु जमीन और पौधे के कंदों में पाए जाते हैं.

रोकथाम : आलू के कंदों को बोने से पहले चाकू से बीच में तकरीबन आधा सैंटीमीटर गहरा काट कर आधा घंटे तक स्ट्रैप्टोसाइक्लीन के घोल (2 ग्राम रसायन प्रति 10 लिटर पानी) में डुबोना चाहिए.

आलू को बोने से पहले 1 फीसदी फार्मेलीन, 0.5 फीसदी नीला थोथा या 0.5 फीसदी स्ट्रैप्टोसाइक्लीन से मिट्टी का उपचार करना चाहिए.

विषाणु रोग : यह रोग 2 प्रकार से फैलता है. एक छूने से और दूसरा कीटों (माहू) से. यह फैलने वाले विषाणु होते हैं और ज्यादा नुकसानदायक होते हैं. यह छूने वाला विषाणु मजदूरों और दूसरे जीवों के छूने से फैलता है. फलस्वरूप कंदों का आकार छोटा रह जाता है. पत्ती मोड़क में पहले नीचे की पत्तियां मुड़ती हैं और बाद में ऊपर वाली पत्तियों में यह रोग लगता है.

रोकथाम : थिमेट 16 किलोग्राम प्रति किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से आलू की बोआई के समय जमीन में इस्तेमाल करना चाहिए. कीटों द्वारा फैलने वाले विषाणु को रोकने के लिए बाद में फसल में मैटासिस्टाक्स (0.1 फीसदी) या थायोडान रोगार वगैरह कीटनाशकों का छिड़काव 15 दिन के अंतराल पर करना चाहिए.

आलू की काली रूसी : यह रोग राइजोक्टोनिया सोलेनाई नामक कवक द्वारा फैलता है. इस रोग के लक्षण संक्रमित कंदों को बोने के तुरंत बाद ही दिखने लग जाते हैं. काला कवक मिट्टी के द्वारा दूसरे कंदों पर फैल जाता है और कंदों की सतह पर चिपके हुए बिना आकार वाले, काले रंग के धब्बे बनते हैं. रोगी पौधे छोटे व हलके पीले रंग के हो जाते हैं.

रोकथाम : आलू के कंदों को बोने से पहले 6 फीसदी कार्बंडाजिम पारायुक्त कवकनाशी जैसे: एगालाल 6, टेफासान, एरिटान 6 वगैरह के 0.2 फीसदी घोल में एक मिनट तक डुबो देना चाहिए. बीज को 3 फीसदी बोरिक एसिड में आधा घंटे तक डुबोने से रोका जा सकता है.

आलू की खेती (Potato Farming)

आलू की कटाई, छंटाई और खुदाई

आलू की खुदाई आमतौर पर 65 से 70 दिनों के भीतर कर दी जाती है. किस्मों के आधार पर 75 से 120 दिनों में खुदाई का काम होना चाहिए.

सामान्य फसल पत्तों के पीलेपन के साथ खुदाई के लिए मुनासिब होती है. भंडारण के लिए बीज तैयार करते समय आमतौर पर लत्तर अथवा डंठल को माहू की कम अवधि वाले समय में निकाल लिया जाता है.

बीज आलू की फसल के लिए छांटे गए आलू कंदों को 2.5 फीसदी बोरिक एसिड के घोल से उपचारित कर लिया जाता है. आलू की खुदाई ट्रैक्टरचालित 1 व 2 लाइनों वाले आलू डिगर या बैलचालित एक लाइन वाले डिगर से भी की जा सकती है.