मोबाइल और वैब एप्लिकेशन पर होगी पशुओं की गणना (Animal counting)

नई दिल्ली : पशुपालन और डेयरी विभाग (डीएएचडी), मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय, भारत सरकार और मेजबान राज्य जम्मू और कश्मीर ने “जम्मूकश्मीर और केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख के राज्य और जिला नोडल अधिकारियों (एसएनओ/डीएनओ) के लिए सौफ्टवेयर (मोबाइल और वैब एप्लिकेशन/डैशबोर्ड) और नस्लों पर 21वीं पशु गणना का क्षेत्रीय प्रशिक्षण” आयोजित किया.

यह कार्यशाला श्रीनगर, जम्मू और कश्मीर में आयोजित की गई थी, जिस में इन राज्यों के राज्य/जिला नोडल अधिकारियों को 21वीं पशुधन गणना आयोजित करने के लिए नए लौंच किए गए मोबाइल और वैब एप्लिकेशन पर प्रशिक्षण दिया गया, जो सितंबरदिसंबर, 2024 के लिए निर्धारित है.

अलका उपाध्याय ने वर्चुअल माध्यम से भारतीय अर्थव्यवस्था पर पशुधन क्षेत्र के प्रभाव और पशुधन क्षेत्र के उत्पादों के वैश्विक व्यापार के संदर्भ में भारत की स्थिति के बारे में जानकारी साझा की, वहीं भारत सरकार के पशुपालन और डेयरी विभाग के सलाहकार (सांख्यिकी) जगत हजारिका ने कार्यशाला का उद्घाटन किया. इस अवसर पर जम्मू और कश्मीर सरकार के कृषि उत्पादन विभाग के सचिव जीए सोफी, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद – राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो के निदेशक डा. बीपी मिश्रा, भारत सरकार के पशुपालन और डेयरी विभाग के सांख्यिकी प्रभाग के निदेशक वीपी सिंह और जम्मू और कश्मीर सरकार के पशुपालन विभाग के निदेशक डा. अल्ताफ अहमद लावे उपस्थित थे.

इस समारोह में गणमान्य व्यक्तियों के संबोधन ने उद्घाटन कार्यक्रम को विशिष्टता प्रदान की और पशुधन गणना के संचालन के लिए जिला और राज्य स्तरीय नोडल कार्यालयों के सफल प्रशिक्षण की दिशा में एक सहयोगी प्रयास के लिए मंच तैयार किया.

जगत हजारिका ने अपने संबोधन में इस कार्यशाला के महत्व पर प्रकाश डाला, सटीक और कुशल डाटा संग्रह के लिए प्रौद्योगिकी का लाभ उठाने के लिए विभाग की प्रतिबद्धता को रेखांकित किया. उन्होंने 21वीं पशुधन जनगणना की सफलता सुनिश्चित करने के लिए सभी हितधारकों की सामूहिक जिम्मेदारी पर बल दिया, जो पशुपालन क्षेत्र की भविष्य की नीतियों और कार्यक्रमों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी और उन से जनगणना की सफलता सुनिश्चित करने के लिए नवीनतम तकनीकों से लाभ प्राप्त करने का आग्रह किया.

जीए सोफी ने कार्यशाला को संबोधित किया और बुनियादी स्तर पर व्यापक प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण की आवश्यकता पर प्रकाश डाला. उन्होंने भारत की अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा के लिए पशुधन क्षेत्र के महत्व को रेखांकित किया. उन्होंने एकत्र किए गए डाटा द्वारा भविष्य की पहल को आकार देने और क्षेत्र में चुनौतियों का समाधान करने में इन की महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर देते हुए जनगणना की कुशल योजनाओं और क्रियान्वयन का आह्वान किया.

अपने संबोधन में डा. अल्ताफ अहमद लावे ने पशुधन क्षेत्र में स्थायी अभ्यासों के एकीकरण पर जोर दिया. उन्होंने बताया कि पशुधन गणना के बाद प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण और तार्किक उपयोग भविष्य की विभागीय नीतियों को तैयार करने और कार्यक्रमों को लागू करने के साथसाथ पशुपालन के क्षेत्र में पशुपालकों के लाभ के लिए नई योजनाएं बनाने और रोजगार सृजन की दिशा में मार्ग प्रशस्त करेगा.

उन्होंने जम्मूकश्मीर सरकार द्वारा पूरे भारत में दुग्ध उत्पादन में सर्वोत्तम अभ्यासों को अपनाने पर प्रकाश डाला और बताया कि कैसे पशुधन किसानों के वित्तीय सशक्तीकरण में योगदान प्रदान करता है, उन की नकदी जरूरतों की प्रभावशाली रूप से पूर्ति करता है.

उन्होंने पशुपालन और डेयरी विभाग (डीएएचडी) द्वारा विकसित नवीनतम तकनीकों के बारे में भी बताया, जैसे कि सैक्स-सौर्टेड वीर्य का उपयोग. उन्होंने सभी राज्यों से आए प्रतिनिधियों का गर्मजोशी से स्वागत किया और उन्हें सफल प्रशिक्षण सत्र की शुभकामनाएं दीं.

कार्यशाला में कई सत्रों की सीरीज आयोजित की गई, जिस की शुरुआत पशुपालन सांख्यिकी प्रभाग द्वारा 21वीं पशुधन गणना के संक्षिप्त विवरण के साथ हुई, जिस के बाद बीपी मिश्रा और आईसीएआर-राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो (एनबीएजीआर) की टीम ने गणना में शामिल की जाने वाली प्रजातियों की नस्लों के विवरण पर विस्तृत प्रस्तुति दी. सटीक नस्ल की पहचान के महत्व पर जोर दिया गया, जो विभिन्न पशुधन क्षेत्र कार्यक्रमों में उपयोग किए जाने वाले सटीक आंकड़े तैयार करने और सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) के राष्ट्रीय संकेतक ढांचे (एनआईएफ) के लिए महत्वपूर्ण है.

इस आयोजित कार्यशाला में 21वीं पशुधन गणना के सौफ्टवेयर के तरीकों और लाइव एप्लिकेशन पर विस्तृत सत्र शामिल थे. भारत सरकार के पशुपालन और डेयरी विभाग की सौफ्टवेयर टीम ने राज्य और जिला नोडल अधिकारियों के लिए मोबाइल एप्लिकेशन और डैशबोर्ड सौफ्टवेयर पर प्रशिक्षण दिया. ये नोडल अधिकारी अपनेअपने जिला मुख्यालयों पर गणनाकर्ताओं के लिए प्रशिक्षण का आयोजन करेंगे.
कार्यशाला का समापन वीपी सिंह के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ. अपने संबोधन में उन्होंने सभी गणमान्य व्यक्तियों और हितधारकों के प्रति उन की उपस्थिति के लिए आभार व्यक्त किया और कार्यशाला का समापन इस आशा के साथ किया कि गणना का काम सफल होगा.

दुधारू पशुओं (Dairy Animals) के लिए सही खुराक न्यूक्लियोटोन

आजकल पशुपालक अपने दुधारू पशुओं से ज्यादा दूध लेना चाहते हैं. इस के चलते पशुओं के लिए अपनी सेहत बनाए रखना भी एक चुनौती है. जिन पशुओं को सही खुराक मिलती है वे पशु तो इस चुनौती का सामना कर लेते हैं, पर जिन्हें सही खुराक नहीं मिल पाती वे या तो बीमार पड़ जाते हैं या फिर उन का उत्पादन कम हो जाता है.

जब भी पशु को किसी प्रकार का कोई इंफैक्शन या बीमारी होती है तो उस के चलते वहां की कोशिकाएं बेकार हो जाती हैं. कोशिकाओं के बेकार होने के चलते ही पशु को ठीक होने में ज्यादा समय लगता है.

उदाहरण के तौर पर, जिस थन में थनैला रोग हो जाता है तो इंफैक्शन के चलते उस थन की कुछ कोशिकाएं बेकार हो जाती हैं. नतीजतन, वह थन सिकुड़ कर छोटा हो जाता है. बहुत ज्यादा कोशिकाओं के बेकार होने पर थन से दूध आना भी बंद हो जाता है.

देहात में कहते हैं कि यह थन मर गया जिस से पशु में दोष लग जाता है और पशु की कीमत भी कम हो जाती है.

कई बार आप ने गौर किया होगा कि ब्याने के तुरंत बाद तनाव के कारण पशु बिलकुल भी दूध नहीं देता है. पशुपालक अनेक कोशिश करें लेकिन दूध नहीं आता. इस तरह के मामलों में न्यूक्लियोटोन पाउडर खिलाना चाहिए. इस में पशु से आसानी से दूध मिलता है.

सुबहशाम जब हम दूध निकालते हैं तो थन की कोशिकाओं को नुकसान होता है. दूध निकालने के कारण थन की कोशिकाओं के नुकसान की भरपाई के लिए न्यूक्लियोटोन पाउडर जरूर खिलाना चाहिए.

न्यूक्लियोटोन पाउडर एक ऐसा उत्पाद है जो पशु को हर इलाज में दिया जा सकता है. अगर आप किसी भी इलाज के साथ देंगे तो यह उस इलाज के असर को बढि़या तरीके से बढ़ा देता है इसलिए अच्छे नतीजों के लिए इलाज के साथसाथ न्यूक्लियोटोन पाउडर जरूर खिलाना चाहिए.

कई बार पशुओं के थन फटने लगते हैं. आप ने काफीकुछ किया, लेकिन थन फटने बंद नहीं हुए. अब आप को थनों पर चिकनाई या दूसरा कुछ लगाने की जरूरत नहीं है. सिर्फ न्यूक्लियोटोन पाउडर 20 ग्राम 10 दिनों तक लगातार खिलाएं. इस से पशु के थन फटने से छुटकारा मिल जाएगा. इस पाउडर की खुराक बड़े पशु को 10 से 20 ग्राम और छोटे पशु को 5 से 10 ग्राम देनी चाहिए. न्यूक्लियोटोन पाउडर 200 ग्राम के पैक में मिलता है.

अगर आप के पशु को भी इस तरह की परेशानियों से सामना करना पड़ रहा है तो आप ऐनिमैक्स फार्मा प्रा. लि. के मोबाइल फोन नंबर 9891321775 पर बात कर के और ज्यादा जानकारी ले सकते हैं.

ककलपुरा बना मुर्रा नस्ल की भैंसों (Murrah buffaloes) का गांव

भरतपुर जिले के बयाना पंचायत समिति क्षेत्र का ककलपुरा गांव, जहां के लोगों को अब समझ आ गया है कि परंपरागत खेती से उन का गुजारा होने वाला नहीं है. ऐसी स्थिति में गांव वालों ने मुर्रा नस्ल की भैंसों को पाल कर दूध बेचने का धंधा शुरू किया है. इस से गांव वाले की माली हालत में तेजी से बदलाव आया है. ज्यादा दूध देने के चलते ज्यादातर गांव वालों ने मुर्रा नस्ल की भैंसों को पालना शुरू किया है. इस की वजह से ककलपुरा की पहचान मुर्रा नस्ल की भैंसों के गांव के रूप में हुई है.

मुर्रा नस्ल की भैंसों (Murrah buffaloes)

ककलपुरा गांव में तकरीबन 140 परिवार रहते हैं जिन में से 19 गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करते हैं. ज्यादातर गांव वाले परंपरागत खेती कर के अपना जीवनयापन करते आ रहे हैं.

सामाजिक और माली तरक्की के क्षेत्र में भरतपुर जिले में काम कर रही लुपिन फाउंडेशन संस्था ने ककलपुरा गांव को गोद ले कर उन्हें खेती करने के साथसाथ पशुपालन का काम शुरू करने की सलाह दी, जिस के लिए उन्हें मुर्रा नस्ल की भैसों को पालने के बारे में बताया.

गांव वालों को समझाया गया कि मुर्रा नस्ल की भैंसें परंपरागत नस्लों के मुकाबले ज्यादा दूध देती हैं. साथ ही, इस नस्ल की भैंसों में रोग भी कम आते हैं. मुर्रा नस्ल की भैंसों को पालने के लिए लुपिन फाउंडेशन ने नाबार्ड की मदद से हरियाणा के जींद व महेंद्रगढ़ जिलों से मुर्रा नस्ल की 16 भैंसें खरीदवाईं, जिन के लिए संस्था ने 7 लाख, 82 हजार रुपए का कर्ज मुहैया कराया.

भैंसों की खरीद के लिए लुपिन संस्था पशुपालकों को अपने साथ ले कर गई और उन की पसंद के मुताबिक भैंसें खरीदवाईं. भैंस खरीद करने के बाद इन के रखरखाव और चारे वगैरह की जानकारी के लिए 2 दिन की ट्रेनिंग भी दी गई.

ट्रेनिंग के दौरान यह भी जानकारी दी गई कि जो पशुपालक भैंसों के रहने के लिए शैड बनाना चाहते हैं, उन्हें संस्था अनुदान मुहैया कराएगी. इस के लिए संस्था ने 6 डेरी शैडों को बनाने के लिए अनुदान मुहैया कराया. साथ ही, 30 घरों में धुआंरहित चूल्हे भी बनवाए. भैंसों को हरे चारे की उपलब्धता के लिए एमपी चरी का बीज भी पशुपालकों को मुहैया कराया गया.

लुपिन फाउंडेशन ने ककलपुरा गांव के भैंसपालकों को 8 आदर्श पशुशाला बनाने के लिए अनुदान मुहैया कराया. इस में मौसम के मुताबिक रहने की व्यवस्था के अलावा बेहतर साफसफाई रखने की सुविधा भी तय की गई.

मुर्रा नस्ल की भैंसों (Murrah buffaloes)

मुर्रा नस्ल की भैंसों के दूध उत्पादन से हर पशुपालक की रोजाना की आमदनी 500 से 600 रुपए तक होना शुरू हुआ तो इसे देख कर गांव के दूसरे किसानों ने भी मुर्रा नस्ल की भैंसों को पालने में रुचि दिखाई. इस के लिए संस्था ने दोबारा 30 मुर्रा नस्ल की पाड़ी (पडि़या), हरियाणा के जींद व महेंद्रगढ़ जिलों से दिलाई.

इस से पहले गांव के पशुपालकों को हरियाणा के नैशनल डेरी रिसर्च इंस्टीट्यूट का दौरा भी कराया, जहां उन्नत पशुपालन की गतिविधियों की जानकारी दी गई, जिन्हें पशुपालकों ने अपने यहां काम में लेना शुरू किया.

गांव में मुर्रा नस्ल की भैंसों को बढ़ावा देने के लिए 2 नर भैंसा लुपिन फाउंडेशन ने गांव वालों को अनुदान पर मुहैया कराए. साथ ही, इस गांव के नौजवान बृजेश शर्मा को कृत्रिम गर्भाधान की ट्रेनिंग दिलाई.

कृत्रिम गर्भाधान और मुर्रा नस्ल की भैंसों की उपलब्धता के कारण गांव में मुर्रा नस्ल की भैंसों की तादाद में निरंतर इजाफा होने लगा.

ककलपुरा गांव में मुर्रा नस्ल की भैंसों के पालने की वजह से आई समृद्धि को देख कर आसपास के गांव के लोग भी मुर्रा नस्ल की भैंसें पाल रहे हैं क्योंकि इस नस्ल की भैंसें ज्यादा दूध देने के साथसाथ संक्रमण रोगों से महफूज रहती हैं और इन का विक्रय मूल्य भी दूसरी नस्लों की भैंसों के मुकाबले तिगुना है.

लुपिन फाउंडेशन ने ककलपुरा गांव में मुर्रा नस्ल की भैंसों को पालने के अलावा सामुदायिक भवन बनवाने, मुख्य रास्तों पर खरंजा बनाने, सभी मकानों में शौचालय बनाने के अलावा छोटे बच्चों को स्कूल से जोड़ने जैसे सराहनीय काम भी कराए हैं.

लुवास व कैरस लैबोरेटरीज के बीच हुआ समझौता, पशु चिकित्सा छात्रों को पुरस्कार

हिसार : लाला लाजपत राय पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, हिसार के कुलपति डा. विनोद कुमार वर्मा के मार्गदर्शन में कुलपति सचिवालय लुवास, हिसार में 16 जुलाई, 2024 को लुवास विश्वविद्यालय व कैरस लैबोरेटरीज प्राइवेट लिमिटेड, करनाल के मध्य समझौता हस्ताक्षर समारोह का आयोजन किया गया.

इस अवसर पर लुवास की ओर से डा. राजेश खुराना, निदेशक मानव संसाधन एवं प्रबंधन और कारस लैब्स की ओर से प्रबंध निदेशक डा. अरुण पिलानी ने समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए. लुवास की ओर से पशु चिकित्सा महाविद्यालय के अधिष्ठाता डा. गुलशन नारंग और दूसरे पक्ष की ओर से डा. दीपक कुमार, जीएम- सेल्स एंड मार्केटिंग ने इस अवसर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई.

इस समझौता ज्ञापन का उद्देश्य बीवीएससी एंड एएच के अंतिम वर्ष के छात्रों को छात्रवृत्ति/पुरस्कार आवंटित करना है. नैदानिक विषयों यानी मैडिसिन, सर्जरी, स्त्री रोग और क्लिनिक में उन की समग्र योग्यता (ओजीपीए) के आधार पर उन की कड़ी मेहनत और ज्ञान वृद्धि के लिए मनोबल बढ़ाने के लिए पुरस्कार दिया जाएगा.

सहयोग के अनुसार टौपर को 51,000/- रुपए, प्रथम रनरअप को 31,000/- रुपए और दूसरे रनरअप को 21,000/- रुपए के 3 पुरस्कार होंगे और यह पशु चिकित्सा शिक्षा और जागरूकता को बढ़ाने और प्रोत्साहित करने के लिए कैरस प्रयोगशालाओं की सीएसआर नीति के अनुसार सीएसआर गतिविधि का हिस्सा होगा. कैरस या उस के कार्यकारी पास होने वाले छात्रों के शपथ ग्रहण समारोह में इन पुरस्कारों का आवंटन करेंगे.

लुवास के पशु चिकित्सा स्नातक छात्रों को साल 2018 बैच से पुरस्कार दिए जाएंगे. पुरस्कार 2018 बैच के पास होने से शुरू हो कर साल 2023 में न्यूनतम 10 सालों की अवधि के लिए जारी रहेंगे.

उत्तर प्रदेश में होगी पशुओं की गिनती (Animal Counting)

लखनऊ : प. दीनदयाल उपाध्याय राज्य ग्राम्य विकास संस्थान, बक्शी का तालाब, लखनऊ में 21 वीं पशुगणना की तैयारी के अंतर्गत देश के 3 राज्यों यथा उत्तर प्रदेश के साथसाथ मध्य प्रदेश एवं उत्तराखंड के राज्य/जनपदीय नोडल अफसरों को संयुक्त रूप से प्रशिक्षण प्रदान कर मास्टर्स ट्रेनर तैयार किया जाने के लिए इस एकदिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया, जिस में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश एवं उत्तराखंड के कुल 175 पशु चिकित्साविदों, संख्याधिकारियों, नोडल अधिकारियों द्वारा भारत सरकार, मत्स्य, पशुपालन मंत्रालय के सहयोग से आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम में प्रतिभाग किया गया.

उक्त कार्यक्रम का उद्घाटन प्रदेश के पशुधन एवं दुग्ध विकास मंत्री धर्मपाल सिंह द्वारा किया गया.
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए प्रदेश के पशुधन एवं दुग्ध विकास मंत्री धर्मपाल सिंह ने कहा कि पशुओं की गिनती के उपरांत प्राप्त आंकड़ों के विश्लेषण एवं तार्किक उपयोग से भविष्य की योजनाओं, विभागीय नीतियों को बनाने एवं कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में एवं पशुपालकों के हित में नई योजनाओं और पशुपालन के क्षेत्र में रोजगार सृजन का मार्ग प्रशस्त होगा.

उन्होंने आगे कहा कि उत्तर प्रदेश में पूरे देश का सर्वाधिक पशुधन है. साल 2019 की पशुओं की गिनती के मुताबिक, प्रदेश में 190.20 लाख गाय, 330.17 लाख महिषवंश, 9.85 लाख भेड़, 144.80 लाख बकरी एवं 4.09 लाख सूकर हैं. देश मे प्रत्येक 5 साल के बाद पशुओं की गिनती की जानी है. वर्तमान में 21वीं पशुगणना की तैयारी चल रही है.

उक्त अवसर पर रविंद्र,  प्रमुख सचिव, पशुधन, उप्र शासन, देवेंद्र पांडेय, विशेष सचिव, उप्र शासन, जगत हजारिका, सलाहकार (सांख्यकीय) भारत सरकार, वीपी सिंह, निदेशक, पशुपालन सांख्यकीय, भारत सरकार, डा. आरएन सिंह, निदेशक प्रशासन एवं विकास और डा. पीएन सिंह, रोग नियंत्रण एवं प्रक्षेत्र, उप्र एवं 3 प्रदेशों के प्रतिभागी उपस्थित थे.

निदेशक, प्रशासन एवं विकास, पशुपालन विभाग द्वारा अपने स्वागत भाषण में समस्त उपस्थित लोगों के साथसाथ प्रतिभागियों का भी स्वागत किया गया. उन के द्वारा प्रतिभागियों से इस महत्वपूर्ण प्रशिक्षण कार्यक्रम को अतिसंवेदनशील मानते हुए सही रूप में जानकारी प्राप्त कर पशुधन की गणना का आह्वान किया गया, ताकि सही आंकड़ों पर भविष्य की योजनाओं के सृजन में सहयोग मिल सके.

भारत सरकार से आए अधिकारियों द्वारा पशुगणना प्रत्येक 5 सालों के अंतराल पर की जाती है. पशुगणना में प्रत्येक घर, उद्यम एवं संस्थानों में पशुओं की प्रजातिवार गणना की जाती है. देश में प्रथमवार पशुगणना साल 1919 में की गई थी. इस कड़ी में अब तक कुल 20 पशुगणनाएं आयोजित की जा चुकी हैं.

20वीं पशुगणना साल 2019 में आयोजित की गई थी. उक्त पशुगणना में पहली बार टैबलेट के माध्यम से औनलाइन की गई, जिस में गणनकर्ताओं द्वारा भारत सरकार द्वारा विकसित किए गए एप पर पशुओं की गिनती की गई. आंकड़े सीधे भारत सरकार के सर्वर पर अपलोड हुए थे.

प्रमुख सचिव, पशुधन द्वारा अवगत कराया गया कि 20वीं पशुगणना की भांति इस बार भी पशुगणना एनडीएलएम (National Digital Livestock Mission) द्वारा विकसित एंड्राइड एप पर कराई जानी है, जिस के अंतर्गत एनबीएजीआर (National Bureau of Animal Genetic Resources) द्वारा पंजीकृत ब्रीड के अनुसार नस्लवार पशुओं की गिनती की जाएगी.

भारत सरकार द्वारा निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, पूरे देश में एकसाथ सितंबर से दिसंबर 2024 के मध्य पशुगणना का काम किया जाना है. 21वीं पशुगणना से प्राप्त होने वाले विस्तृत एवं विश्वासपरक आंकड़े की नींव पर नीति निर्धारण से आने वाले समय में पशुपालन विभाग प्रगति के नए आयाम को प्राप्त करेगा.

21 वी पशुगणना के लिए भारत सरकार द्वारा 5 राज्यों कर्नाटक, ओड़िसा, उत्तर प्रदेश, गुजरात व अरुणाचल प्रदेश को पायलट सर्वे के लिए चयनित किया गया है.

मुख्य अतिथि द्वारा अपने संबोधन में पशुपालन को आजीविका का मुख्य स्रोत मानते हुए गुणवत्तायुक्त पशुधन उत्पादों की चर्चा के साथ वास्तविक पशुधन के आंकड़ों पर बल दिया गया. पशुधन विकास के 4 प्रमुख आयाम उन्नत पशु प्रजनन, पशु स्वास्थ्य, पशु प्रबंधन एवं पशु पोषण के क्षेत्र में समग्र प्रयास पशुधन के चहुंमुखी विकास का प्रमुख आधार सही गणना पर ही आधारित है. इसलिए प्रशिक्षण कार्यक्रम की उपयोगिता और सार्थकता पर प्रकाश डाला. साथ ही, गोवंश के समग्र विकास एवं दुग्ध उत्पादन में वृद्धि के लिए नई तकनीकी पर बल दिया गया.

निदेशक, रोग नियंत्रण एवं प्रक्षेत्र द्वारा समस्त व्यक्तियों, विभिन्न प्रदेशों से आए प्रतिभागियों के साथसाथ इस कार्यक्रम में सहयोग प्रदान करने के लिए पंडित दीनदयाल उपाध्याय राज्य ग्राम्य विकास संस्थान के अधिकारियों व कर्मचारियों, पशुपालन विभाग, उप्र के अधिकारियों व कर्मचारियों का आभार व्यक्त किया.

प्रशिक्षण कार्यक्रम में पशुपालन विभाग, उप्र के विभिन्न अधिकारियों डा. अरविंद कुमार सिंह, अपर निदेशक, गोधन, डा. जयकेश पांडेय, अपर निदेशक, नियोजन, डा. एके वर्मा, अपर निदेशक, लघु पशु, डा. एमआई खान, संयुक्त निदेशक, सांख्यकीय, डा. संजीव शर्मा उपनिदेशक, सांख्यकीय, डा. नीलम बाला, उपनिदेशक/रजिस्ट्रार और निदेशालय पशुपालन विभाग, उप्र, लखनऊ के विभिन्न अधिकारियों व कर्मचारियों द्वारा प्रतिभाग किया गया.

पशुओं के लिए साइलेज दूध का बढ़ाए माइलेज

भारत दूध पैदावार के मामले में दुनियाभर में अव्वल है लेकिन कई बार पशुपालकों के सामने पशुओं के लिए हरे चारे की समस्या आ जाती है, क्योंकि पूरे साल हरा चारा मिलना मुमकिन नहीं होता. ऐसे में कुछ पशुपालक हरे चारे का साइलेज बना कर रखते हैं.

साइलेज बनाने में मक्का, ज्वार, बाजरा, नैपियर घास, बरसीम वगैरह का इस्तेमाल किया जाता है. साइलेज को एक खास तरीके से जमीन में दबा कर तैयार किया जाता है. इसे जरूरत के समय पशुओं को खिलाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. इसे पशुओं के लिए अचार भी कह सकते हैं.

लेकिन सभी लोग यह काम नहीं कर पाते हैं या उन के पास ऐसे संसाधन मौजूद नहीं होते जिस से वह आड़े वक्त के लिए साइलेज बना सकें. सही तरीके से बनाए गए साइलेज में अनेक पोषक तत्त्व होते हैं जो पशुओं के दूध में बढ़ोतरी भी करते हैं.

पशुओं के लिए चारा तैयार करने वाली अनेक कंपनियां भी साइलेज मुहैया करा रही हैं. तैयार साइलेज को बाजार से भी खरीदा जा सकता है जो बड़े पैकेटों में मिलता है.

साइलेज के फायदे को ध्यान में रख कर एक न्यूट्रीमील कंपनी ने मक्का का साइलेज तैयार किया है. दावा है कि यह भारत का पहला ब्रांडैड पैक्ड चारा है. यह दुधारू पशुओं के लिए ज्यादा ताकत देने वाला आहार है, जिसे पशु बड़े चाव से खाते हैं.

मक्का (कौर्न) के साइलेज में उम्दा प्रोटीन, फैट, फाइबर जैसे पोषक तत्त्व मौजूद हैं और यह खाने में स्वादिष्ठ और पचने में भी आसान है.

साइलेज की खासीयत यह है कि यह तकरीबन डेढ़ साल तक खराब नहीं होता है. बेहतर किस्म के मक्के से ड्यूपोंट पायनियर बनाया जाता है. इस के अच्छे नतीजे मिलते हैं.

इस चारे को बनाने के बाद यूरोपियन मशीनों के इस्तेमाल से इस चारे को संकुचित कर के पैक किया जाता है. इसे अच्छी क्वालिटी की फिल्म यानी पन्नी से पैक किया जाता है. यह चारा पशुपालक तक पहुंचने तक भी सुरक्षित रहता है.

साइलेज 500 किलोग्राम के पैक में मौजूद है और इस चारे को एक पशु को रोजाना 12 से 15 किलोग्राम तक खिला सकते हैं. शुरुआत 3 से 6 किलोग्राम साइलेज से करें. इस के बाद 5 से 10 दिनों में भी इस की मात्रा बढ़ाते जाएं जो 12 से 15 किलोग्राम तक होगी. इस कौर्न साइलेज को आप अपने दुधारू पशु को पूरे साल खिला सकते हैं.

मुरगीपालन (Poultry Farming) फायदे का सौदा

मुरगीपालन 3 मकसद के लिए किया जाता है, पहला अंडे पैदा करने के लिए, दूसरा मीट के लिए और तीसरा चूजे निकालने वाले अंडों के लिए. मुरगी के लिए 21-25 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान वैज्ञानिक तौर पर माकूल माना गया है. यह माकूल तापमान साल में कुदरती तौर पर केवल 4 महीने यानी अक्तूबरनवंबर और फरवरीमार्च में ही मिल पाता है. मुरगी 21-25 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान पर अपनी पूरी कूवत से अच्छा प्रोडक्शन देती है.

हमारे देश में 3 तरह की आबोहवा होती है. सूखी गरमी (ड्राई समर) वाली आबोहवा में तापमान 43 डिगरी सैंटीग्रेड से ले कर 46 डिगरी सैंटीग्रेड तक होता है और मौसम में नमी 30 फीसदी से कम होती है. गरम और गीली आबोहवा (हौट ऐंड ह्यूमिड सीजन) में तापमान 35 डिगरी सैंटीग्रेड से  कर 44 डिगरी सैंटीग्रेड के बीच रहता है और  मौसम में नमी 80 फीसदी तक होती है. सर्दी (विंटर) वाली आबोहवा में तापमान 0 डिगरी सैंटीग्रेड से  कर 10 डिगरी सैंटीग्रेड तक होता है. इन सभी आबोहवाओं में मुरगी पालना मुश्किल काम हो जाता है. इस समस्या से निबटने के लिए ऐनवायरमैंटली कंट्रोल शैड एक कारगर तकनीक साबित होती है.

मुरगियों को पूरे साल एकजैसी माकूल खुशनुमा आबोहवा यानी 21-25 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान ऐनवायरमैंटली कंट्रोल शैड बना कर दिया जा सकता है. ऐनवायरमैंटली कंट्रोल शैड को ईसी शैड या टनल वैंटिलेशन सिस्टम यानी सुरंग वैंटिलेशन भी कहते हैं. ईसी शैड में मुरगी को बहुत सही ऐनवायरमैंट (माकूल आबोहवा) मिलता है, जिस से मुरगी अपनी पूरी कूवत से अंडा उत्पादन कर पाती है.

ईसी शैड को पूरी तरह एयर टाइट पैकिंग कर के पैक करते हैं. इस में हवा एक तरफ से अंदर घुसती है. ईसी शैड में तापमान आसानी से कंट्रोल हो जाता है. जब मईजून के दौरान बाहर का तापमान 48 डिगरी सैंटीग्रेड होता है, तब ईसी शैड के अंदर का तापमान 24-27 डिगरी सैंटीग्रेड होता है. सर्दी के मौसम में जब बाहर का तापमान 0-5 डिगरी सैंटीग्रेड होता है, तब ईसी शैड के अंदर का तापमान 15-20 डिगरी सैंटीग्रेड होता है. सर्दी के मौसम में केवल 1-2 एग्जास्ट फैन टाइमर पर चलते हैं, ताकि शैड के अंदर की गैस (अमोनिया) बाहर निकलती रहे.

ईसी शैड में एक तरफ कूलिंग पैड लगा होता है वहीं दूसरी तरफ एग्जास्ट फैन लगे होते हैं. शैड का बाकी हिस्सा पूरी तरह 150-200 जीएसएम के सिल्पोलिन कर्टेन (परदा) से एयर टाइट बंद होता है. ताजीठंडी हवा केवल कूलिंग पैड एग्जास्ट से हो कर शैड के अंदर घुसती है और फैन के द्वारा ही बाहर निकलती है. अच्छा रखरखाव करने पर सिल्पोलिन कर्टेन 5-7 सालों तक चलते हैं.

ईसी शैड में बीमारी का भी कम प्रकोप होता है और इलाके में बदबू भी नहीं फैलती है. इस से अंडा पैदा करने में खर्च भी कम आता है. ईसी शैड की लंबाई 400 फुट, चौड़ाई 30 फुट और ऊंचाई 14-16 फुट रखते हैं. हर

60 स्क्वायर फुट कूलिंग पैड पर 54 इंच व्यास वाला 1 एग्जास्ट फैन लगाया जाता है, यानी 400 फुट लंबे, 30 फुट चौड़े व 16 फुट ऊंचे ईसी शेड में कुल 10 एग्जास्ट फैन लगाते हैं और कूलिंग पैड का एरिया 600 स्क्वायर फुट रखा जाता है. शैड के अंदर हवा का फ्लो 400-450 फुट प्रति मिनट होना चाहिए.

मुरगीपालन (Poultry Farming)

पोल्ट्री फार्म के आसपास के इलाके में पोल्ट्री फार्म की वजह से बदबू पैदा हो जाती है. इस से आसपास के लोगों को दिक्कत होने लगती है और वे सरकारी बाबुओं की मदद से पोल्ट्री फार्म बंद कराने की जुगाड़ में लग जाते हैं.

अगर मुरगीपालन ऐनवायरमैंटली कंट्रोल शैड में किया जाता है तो आसपास के इलाके में बदबू की समस्या नहीं होती है और अगर वैजीटेरियन पेलेट फीड यानी फीड में केवल मक्का और सोया का इस्तेमाल करते हैं, तो उस की वजह से बदबू पैदा होने के आसार बिलकुल खत्म हो जाते हैं.

आजकल पोल्ट्री फीड में एनीमल प्रोटीन (बोन/फिश/मीट मील वगैरह) का कम इस्तेमाल होने लगा है. बदबू को कम करने के लिए फीड में अमोनिया बाइंडर भी मिलाया जाता है. अमोनिया बाइंडर मिलाने की समस्या कम हो जाती है.

पोल्ट्री फार्म में बदबू कम करने के लिए समयसमय पर वहां चूना डालते रहने से जगह सूखी रहती है, इस से मक्खियां नहीं पैदा होती हैं. कोशिश यह करनी चाहिए कि मुरगीखाने में 40-60 फीसदी से ज्यादा नमी न होने पाए.

दाना डालने से पहले बरतन को अच्छी तरह साफ कर लेना चाहिए. समयसमय पर शैड के फर्श और पिंजरों पर अच्छी कंपनी के डिसइंफैक्टेंट्स व पब्लिक हैल्थ इंसैक्टिसाइड का तय खुराक में तय समय पर स्प्रे करते रहने से बदबू की समस्या कम होती है.

पीने के लिए आरओ का पानी निप्पल सिस्टम से देने से पानी की बचत होती है. मरी हुई मुरगियों को अच्छी तरह जला दें या गहरे गड्ढे में दबा दें.

पोल्ट्री शैड साइंटिफिक स्टैंडर्ड के मुताबिक ही बनाना चाहिए. सर्दी के मौसम में शैड को गरम रखने और गरमी के मौसम में ठंडा रखने के लिए शैड की छत पर 6 इंच मोटा थैच (घास का छप्पर) डाल देना चाहिए. बरसात का पानी शैड के अंदर नहीं घुसना चाहिए. कमर्शियल लेयर को केज और डीपलिटर सिस्टम से पालते हैं, जबकि कमर्शियल ब्रायलर को डीपलिटर सिस्टम से पालते हैं. जंगली जानवरों, कुत्तेबिल्ली, नेवला व सांप वगैरह से मुरगियों के बचाव के लिए शैड की जाली काफी मजबूत होनी चाहिए.

बायोबीऔन (Biobeon) से बच्चा लें हर साल

एक अच्छी दुधारू गाय या भैंस वह मानी जाती है जो हर साल एक बच्चा दे. पशु प्रजनन वैज्ञानिकों के मुताबिक भैंस के एक ब्यांत को 305 दिन का माना जाता है जो लगभग 10 महीने हुए और गाय का गर्भकाल 9 महीने के आसपास माना जाता है. इन दोनों के ब्यांत का समय हफ्ता 10 दिन आगेपीछे हो सकता है. यानी गाय का गर्भकाल भैंस के मुकाबले 1 महीना कम होता है. अगर हम भैंस से हर साल 1 बच्चा लेने में कामयाब हो जाते हैं तो गाय से भी आसानी से हर साल एक बच्चा ले सकते हैं.

लेकिन कई बार ऐसा नहीं भी हो पाता है, चाहे कारण कोई भी हो. हो सकता है कि पशुओं को वह पौष्टिक खुराक नहीं मिल पाई हो जिस के कारण उन में बांझपन की समस्या बन जाती है. ज्यादातर पशु ब्याने के 6-7 महीने बाद हीट में आते हैं और हमारे पशुपालक इस तरफ गौर नहीं करते हैं. अगर ब्याने के बाद 2 महीने के अंदरअंदर पशु हीट में नहीं आता है तो आप को उस पशु से काफी नुकसान हो रहा है और आप को इस बात का एहसास भी नहीं होता क्योंकि आप ने कभी गहराई से व्यापारी की तरह हिसाब लगाया ही नहीं.

आमतौर पर एक पशु का दूध 5-6 ब्यांत तक बेहतर मिलता है. अगर कोई पशु हर साल एक बच्चा देता है तो हमें उस पशु से 5 साल में 5 बच्चे मिलेंगे और हमें पूरे 5 ब्यांत का दूध मिलता है. जो पशु हर साल एक बच्चा देते हैं, आमतौर पर उन का दूध न देने का समय 2 महीने का होता है. लेकिन जो पशु ब्याने के बाद समय से हीट में न आ कर देरी से हीट में आते  हैं तो उन का ड्राई पीरियड भी ज्यादा होता है मतलब जो पशु 4 महीने देरी से हीट में आता है तो उस का ड्राई पीरियड 2 महीने न हो कर ज्यादा होगा यानी अगर कोई पशु ब्याने के बाद 4 महीने से देरी में हीट में आता है तो आप को उस से 5 साल में 4 बच्चे ही मिलेंगे. इस तरह 4 महीने देरी से हीट में आने के कारण आप को निम्नलिखित नुकसान होते हैं:

* पशु से 5 सालों के अंदर एक बच्चा कम मिलता है.

* पशु से एक ब्यांत का दूध कम मिलता है.

* पशु का ड्राई पीरियड 8 महीने ज्यादा होता है.

आमतौर पर एक सामान्य प्रजाति की भैंस अगर वह मुर्राह नस्ल की नहीं है तो भी 3500 लिटर दूध तो देती ही है और 8 महीने का जो ड्राई पीरियड ज्यादा हो गया उस में उस ने 3500 लिटर के हिसाब से 2800 लिटर दूध देना था. इस तरह 4 महीने देरी से हीट में आने के चलते आप को एक ब्यांत का 3500 लिटर दूध व ज्यादा ड्राई पीरियड का 2800 लिटर दूध कम मिलता है. इस तरह 5 साल में आप को 3500+2800= 6300 लिटर दूध कम मिलता है.

अब बात आती है कि इस नुकसान से कैसे बचा जा सकता है. तो इस के लिए आप को कोई खास उपाय नहीं करना है. अपने पशुओं को सिर्फ बायोबीऔन गोल्ड 30-35 ग्राम रोजाना खिलाना है. अगर आप नियमित रूप से अपने पशुओं को बायोबीऔन गोल्ड खिलाते रहेंगे तो आप के पशुओं में कभी भी बांझपन व बारबार गाभिन होने की समस्या नहीं आएगी.

यह जानकारी कंपनी के अनुसार दी गई है. सलाह के लिए आप एैनिमैक्स फार्मा प्रा. लि. के मोबाइल नंबर 09891321775 पर बात कर सकते हैं.

पशुओं को कैसे दें बायोबीऔन

*             300 किलोग्राम फीड में 1.2 किलोग्राम बायोबीऔन गोल्ड पाउडर मिलाना है.

*             मछलीपालन के लिए 1000 किलोग्राम फीड में 5 किलोग्राम बायोबीऔन गोल्ड पाउडर मिलाना है.

*             छोटे बच्चों के लिए रोजाना 20 से 30 ग्राम.

*             कटिया के लिए रोजाना 30 से 40 ग्राम.

*             बड़े पशु के लिए रोजाना 50 से 60 ग्राम.

पशुपालन में आने वाली समस्याएं और निदान

पशुपालन रोजगार का एक ऐसा जरीया है जिसे अगर सही तरीके से किया जाए तो मुनाफा निश्चित है. अनेक गांवशहरों के लोग किसान न होते हुए भी पशुपालन का काम बड़े ही बेहतर तरीके से कर के अपनी आमदनी में इजाफा कर रहे हैं.

पशुपालन हमेशा चलने वाला रोजगार है. पशुपालन से हमें केवल दूध ही नहीं, बल्कि इस के अलावा दही, छाछ, घी, मक्खन जैसे उत्पाद भी मिलते हैं. इस के अलावा पशुओं से मिलने वाले गोबर को भी उपले व खाद बनाने के काम में लिया जाता है.

पशुपालन का काम करने के लिए ज्यादा पढ़ालिखा होना भी जरूरी नहीं है. घरेलू महिलाओं का भी इस काम में बहुत सहयोग रहता है. पहले समय में और आज के समय में पशुपालन के काम में अनेक बदलाव भी हुए हैं जो हमारे काम को आसान करते हैं.

पशुपालन में कई तरह के पशुओं को पाला जाता है, जिस में बकरीपालन, भेड़पालन, भैंसपालन, गायपालन, मुरगीपालन, मछलीपालन, सुअरपालन वगैरह हैं. ये सभी काम आप के लिए रोजगार का बेहतर साधन बनते हैं. अलगअलग राज्यों की सरकारें भी अपने प्रदेश के नियमानुसार अनुदान देती हैं जो हमारी माली मदद होती है. लेकिन कोई भी काम शुरू करने से पहले उस के बारे में जमीनी जानकारी जरूर लें.

इस के लिए आप अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से भी जानकारी ले सकते हैं. सभी कृषि विज्ञान केंद्रों पर पशुपालन की जानकारी के लिए विशेषज्ञ होते हैं. अगर आप खुद यह काम नहीं कर सकते हैं तो जानकारी ले कर पशुपालन के लिए नौकर रख कर भी इस काम को कर सकते हैं.

पशुओं से आप सही आमदनी ले सकें, इस के लिए आप को कुछ बातों का ध्यान रखना भी जरूरी है. जैसे पशुओं को साफसुथरे माहौल में रखना चाहिए. कोई पशु बीमार है तो उसे दूसरे स्वस्थ पशुओं से अलग कर दें और बीमार पशु को किसी योग्य पशु चिकित्सक को दिखाएं.

इस के अलावा पशुओं में अनेक बीमारियों का खतरा भी होता है इसलिए बीमारियों से बचाने के लिए नियमित समय पर पशुओं को टीके लगवाने चाहिए.

पशुओं में गर्भाधान पर विशेष ध्यान देना चाहिए क्योंकि अगर यह नस्ल बेहतर होगी तो आप को आने वाली नस्ल भी अच्छी मिलेगी. पशुओं का गर्भाधान 2 तरीके से होता है. एक तो सांड़, भैसें या बकरे वगैरह द्वारा जिसे प्राकृतिक गर्भाधान कहा जाता है.

दूसरा कृत्रिम गर्भाधान है. इस में मादा पशु का सीधे नर पशु से मेल नहीं कराते हैं बल्कि कृत्रिम तरीके से अच्छी नस्ल के नर पशु का बीज मादा पशु के गर्भ में डालते हैं जिस से उसे कृत्रिम गर्भाधान हो सके.

पशुओं की खास समस्याएं और विरबैक के समाधान

पशुपालन के दौरान इस में अनेक समस्याएं भी हो जाती हैं जिन में कुछ समस्याओं के समाधान के लिए विरबैक कंपनी ने ऐसे उत्पादों को बाजार में उतारा है जिन का फायदा आम पशुपालक उठा सकते हैं. इन उत्पादों से पशुपालक न केवल अपने पशुओं की सेहत अच्छी रख सकते हैं बल्कि उन से दूध उत्पादन भी बढ़ा सकते हैं.

बांझपन

पशुओं को अगर उन के चारे में जरूरी पौष्टिक तत्त्व न मिलें तो उन की बच्चा पैदा करने की ताकत पर असर पड़ता है और गर्भ नहीं ठहर पाता या समय पर गर्भ नहीं होता इसलिए पशुओं में होने वाली विटामिन और मिनरल की कमी को दूर करने के लिए पशुओं को एग्रीमिन फोर्ट देना चाहिए जिस के इस्तेमाल से पशुओं की इस समस्या का समाधान होता है और पशु समय पर हीट में आते हैं. इस में मिनरल जैसे कि फास्फोरस, कौपर, कोबाल्ट, मैग्नीज, आयरन, जिंक और आयोडीन की ज्यादा मात्रा होती है और जरूरी विटामिन जैसे की विटामिन ए, विटामिन डी3, विटामिन ई और निकोटिनामाइड भी प्रचूर मात्रा में मौजूद होते हैं.

एग्रीमिन फोर्ट एक अच्छी क्वालिटी का खाद्य पूरक है जो पशुओं को जरूरी तत्त्व देता है और उन की ताकत और रोग प्रतिरोधक कूवत बढ़ाने में मदद करता है. अपने पशुओं को तकरीबन 50 ग्राम रोजाना या 1 से 2 किलोग्राम प्रत्येक 100 किलोग्राम दाना चारे में मिला कर देना चाहिए.

दूध में कमी होना

आप के किसी पशु का दूध कम हो गया है या पशु अपनी कूवत के मुताबिक दूध नहीं दे रहा है तो उस पशु के शरीर में दूध बनाने वाले जरूरी पोषक तत्त्वों की कमी होती है. मिनरल, विटामिन, फैट, कार्बोहाइड्रेट, एनर्जी, पानी वगैरह दूध के खास घटक हैं. हर दुधारू पशु के दूध के द्वारा ये पोषक तत्त्व शरीर से बाहर निकलते रहते हैं.

पशु जितना ज्यादा दूध देगा उसे उतनी ही ज्यादा इन पोषक तत्त्वों की जरूरत होगी इसलिए अगर इन पोषक तत्त्वों की कमी को पूरा न किया जाए तो दूध कम हो जाता है.

इस के लिए उन्हें विरबैक का दूध बढ़ाने का फार्मूला ओस्टोवेट/ओस्टोवेट फोर्ट और वाइमेराल दीजिए. यह फार्मूला पोषक तत्त्वों की कमी को पूरा करने के लिए मदद करेगा जिस से दूध उत्पादन बढ़ जाएगा और पशु सेहतमंद भी रहेगा.

विरबैक के दूध बढ़ाने के फार्मूले को इस्तेमाल करने के लिए शुरुआत में अपने दुधारू पशु को पेट के कीड़े मारने की दवा दें. उस के बाद चौथे दिन से ओस्टोवेट फोर्ट प्लस वाइमेराल के मिश्रण का 100 मिलीलिटर हर दुधारू पशु को रोजाना दाने चारे के साथ मिला कर देना चाहिए.

पशुपालन

मिल्क फीवर

प्रसव के बाद पशु का ठंडा पड़ जाना और खड़ा न हो पाना, यह मिल्क फीवर के लक्षण होते हैं जो काफी गंभीर समस्या है. आंकड़े बताते हैं कि जिस पशु को मिल्क फीवर हो जाता है उस के दूध में न केवल 20 से 30 फीसदी की गिरावट आती है बल्कि आने वाले समय में दूध उत्पादन की कूवत 10 से 15 फीसदी घट जाती है, जिस से हमारे पशुपालकों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है. इस के अलावा दूसरी समस्याएं होने की संभावना भी बढ़ जाती है. जैसे थनैला रोग की संभावना, कष्टदायक प्रसव, जेर न गिरना आदि.

इस के समाधान के लिए पशुपालक अपने पशुओं को विरबैक का मेटाबोलाइट मिक्स गर्भावस्था के आखिरी महीने में देना चाहिए. इस से जानवर को प्रसव में आसानी होगी. पशु के थन के विकास करने में मदद होगी और पशुओं की अन्य समस्याएं भी कम हो जाती हैं. यह पशु को मिल्क फीवर से बचाने में भी मददगार होता है.

पशुओं का चारा छोड़ना दूध कम होना : अगर प्रसव के बाद दुधारू के दूध में कमी हो गई है, पशु ने खाना भी कम कर दिया है साथ ही अपनी कूवत के मुताबिक दूध नहीं दे रहा है, उस के श्वास, मूत्र, दूध और शरीर से पके हुए फल या नेल पौलिश जैसी गंध आ रही हो तो आप अपने पशु को एनाबोलाइट मिक्स दें. इस से पशु को जल्द ही ऊर्जा मिलेगी और उस में एनर्जी आएगी.

यह पशुओं में तनाव को कम करने में मदद करता है. प्रसव के बाद पशु जल्दी अपने अधिकतम दूध उत्पादन पर आ जाते हैं और यह लंबे समय तक अधिकतम दूध पर रहने में मदद करता है. इसे तकरीबन 200 मिलीलिटर रोजाना देना चाहिए.

फैट में गिरावट

अगर आप के पशु के दूध में फैट की मात्रा कम हो गई है, उस की पाचन क्रिया में मदद करने वाले जीवाणुओं की संख्या में कमी हो गई है. चारे का पाचन ही तरीके से न होना, पेट में गैस बनना, जलन हो रही हो तो पशु को फैट प्लस खिलाएं. इसे 50 से 100 ग्राम रोजाना पशु को दें.

अपने पशुओं को ये उत्पाद देने से पहले पशु विशेषज्ञ से सलाह लें या उत्पाद बनाने वाली कंपनी विरबैक एनीमल हैल्थ इंडिया के फोन नंबर 022-40081342, 1333 पर बात करें.

लुवास करेगा राष्ट्रीय पशु चिकित्सा विज्ञान अकादमी  की मेजबानी

हिसार : लाला लाजपत राय पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, हिसार, हरियाणा राष्ट्रीय पशु चिकित्सा विज्ञान अकादमी के साथ मिल कर 29-30 नवंबर, 2024 को “सतत पशु स्वास्थ्य एवं उत्पादन : चुनौतियों एवं प्राथमिकताओं की खोज” विषय पर 22वें राष्ट्रीय दीक्षांत समारोह एवं वैज्ञानिक सम्मेलन का आयोजन किया जाएगा. इस कार्यक्रम का आयोजन कुलपति प्रो. (डा.) विनोद कुमार वर्मा के संरक्षक नेतृत्व में किया जाएगा.

इस विषय पर कुलपति सचिवालय में एक औपचारिक बैठक का आयोजन किया गया, जिस में  कुलपति प्रो. (डा.) विनोद कुमार वर्मा ने राष्ट्रीय दीक्षांत समारोह एवं वैज्ञानिक सम्मेलन की प्रथम सूचना विवरणिका का औपचारिक रूप से विमोचन किया. विमोचन के बाद उन्होंने कहा कि यह आयोजन देश में पशु चिकित्सा विज्ञान और पशुपालन के विकास में अपनी छाप छोड़ेगा. उन्होंने कहा कि आयोजन के लिए गठित आयोजक टीम समय रहते सारी तैयारी कर लेगी, ताकि इसे योजनाबद्ध तरीके से आयोजित किया जा सके.

सम्मेलन के आयोजन सचिव डा. गुलशन नारंग, अधिष्ठाता, पशु चिकित्सा विज्ञान महाविद्यालय ने बताया कि इस कार्यक्रम में कई जानेमाने पशु चिकित्सा पेशेवर, राष्ट्रीय पशु चिकित्सा विज्ञान अकादमी के सदस्य, विभिन्न विश्वविद्यालयों और देश के विभिन्न हिस्सों से वैज्ञानिक और छात्र भाग लेंगे.

उन्होंने बताया कि सम्मेलन के दौरान पशु स्वास्थ्य एवं उत्पादन के विभिन्न क्षेत्रों में 4 तकनीकी सत्र आयोजित किए जाएंगे. इस मौके पर लुवास के मानव संसाधन एवं प्रबंधन निदेशक डा. राजेश खुराना एवं आयोजक टीम के सदस्य मौजूद रहे.