गेहूं में खरपतवार नियंत्रण के प्रभावी उपाय  

खरपतवार ऐसे पौधों को कहते हैं, जो बिना बोआई के ही खेतों में उग आते हैं और बोई गई फसलों को कई तरह से नुकसान पहुंचाते हैं. मुख्यत: खरपतवार फसलीय पौधों से पोषक तत्त्व, नमी, स्थान यानी जगह और रोशनी के लिए होड़ करते हैं. इस से फसल के उत्पादन में कमी होती है. इन सब के साथसाथ कुछ खरपतवार ऐसे भी होते हैं, जिन के पत्तों और जड़ों से मिट्टी में हानिकारक पदार्थ निकलते हैं. इस से पौधों की बढ़वार पर बुरा असर पड़ता है, जैसे गाजरघास (पार्थेनियम) एवं धतूरा आदि न केवल फार्म उत्पाद की गुणवत्ता को घटाते हैं, बल्कि इनसान और पशुओं की सेहत के प्रति भी नुकसानदायक हैं.

गेहूं की फसल भारत की खेती का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है. इस के सफल उत्पादन के लिए खरपतवार नियंत्रण एक अनिवार्य प्रक्रिया है. खरपतवार न केवल फसल की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं, बल्कि फसल की वृद्धि और उपज को भी बाधित करते हैं.

गेहूं की भरपूर और स्वस्थ उपज लेने के लिए सही समय पर खरपतवार का नियंत्रण करना बहुत ही जरूरी होता है. अकसर खरपतवार कई हानिकारक कीड़े और रोगों का भी घर बन जाता है. इस के साथसाथ ये फसलों के नुकसानदायक कीटों व रोगों को भी आश्रय दे कर फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं.

अगर सही समय पर खरपतवारों का नियंत्रण नहीं किया जाता है, तो फसल उत्पादन में 50 से 60 फीसदी तक की कमी हो सकती है और किसानों को माली नुकसान भी उठाना पड़ता है. पर इन का नियंत्रण भी एक कठिन समस्या है.

इन खरपतवारों को नियंत्रित करने से फसल की उत्पादकता और गुणवत्ता में सुधार हो सकता है. इन खरपतवारों को नियंत्रित करने के लिए विभिन्न तरीकों का उपयोग किया जा सकता है, जैसे कि यांत्रिक विधियां, सस्य क्रियाएं, भूपरिष्करण क्रियाएं, कार्बनिक खादों का प्रयोग, जैव नियंत्रण उपाय और रासायनिक विधियां.

गेहूं की फसल में खरपतवार नियंत्रण के लिए विभिन्न तरीकों की विस्तृत जानकारी निम्नलिखित है :

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यांत्रिक विधियां

* हाथों से खरपतवार निकालना : यह सब से पुरानी और प्रभावी विधि है, लेकिन इस में समय और मेहनत अधिक लगती है.

* खुरपी, हंसिया, कुदाल आदि से खरपतवार निकालना : इन उपकरणों का उपयोग कर के खरपतवार को निकाला जा सकता है.

* मशीन से खरपतवार निकालना : रोटरी वीडर, वीडर और हार्वेस्टर जैसी मशीनें खरपतवार निकालने में मदद करती हैं.

सस्य क्रियाएं

* फसलों का चुनाव : तेजी से वृद्धि करने वाली फसलें और जड़ें गहरी व फैलने वाली फसलें खरपतवारों को नियंत्रित करने में मदद करती हैं.

* फसल चक्र : विभिन्न फसलों को लगाने से खरपतवारों की वृद्धि रुक जाती है.

* फसल की सघनता : अधिक सघनता से खरपतवारों को वृद्धि करने का अवसर नहीं मिलता.

कार्बनिक खादों का प्रयोग

* कार्बनिक खाद सड़ने और गलने के बाद कार्बनिक अम्ल का निस्तारण करते हैं, जो खरपतवारों की वृद्धि को कम कर देता है.

* जैविक खादों का उपयोग कर के मिट्टी की उर्वरता बढ़ाई जा सकती है और खरपतवारों को नियंत्रित किया जा सकता है.

जैव नियंत्रण के उपाय

* जैविक नियंत्रण एजेंट जैसे नेमाटोड, बैक्टीरिया और फंजाई खरपतवारों को नियंत्रित करने में मदद करते हैं.

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रासायनिक विधियां

रासायनिक विधियों के जरीए खरपतवार नियंत्रण करना एक प्रभावी तरीका है, लेकिन इस के उपयोग से पहले कुछ सावधानियां बरतें.

शाकनाशी रसायन के प्रकार

संपर्क शाकनाशी : यह शाकनाशी रसायन पत्तियों पर लगाया जाता है और खरपतवार को मारता है. उदाहरण : ग्लाईफोसेट, 2,4-डी.

सिस्टैमिक शाकनाशी : यह शाकनाशी रसायन खरपतवार के पौधे में अवशोषित होता है और उस की वृद्धि को रोकता है. उदाहरण : डाइक्लोफेनाक, मैटोलाक्लोर.

पहले उगाया गया शाकनाशी : यह शाकनाशी रसायन मिट्टी में लगाया जाता है और खरपतवार की वृद्धि को रोकता है. उदाहरण : ट्राईफ्लुरेलिन.

बाद में उगाया गया शाकनाशी : यह शाकनाशी रसायन खरपतवार के उगने के बाद लगाया जाता है और उस की वृद्धि को रोकता है. उदाहरण : ग्लाइफोसेट, 2,4-डी.

शाकनाशी रसायन के उपयोग के तरीके

फसल के पहले : शाकनाशी रसायन को फसल के पहले लगाया जाता है, ताकि खरपतवार की वृद्धि को रोका जा सके.

फसल के साथ : शाकनाशी रसायन को फसल के साथ लगाया जाता है, ताकि खरपतवार की वृद्धि को रोका जा सके.

खरपतवार के ऊपर : शाकनाशी रसायन को खरपतवार के ऊपर लगाया जाता है, ताकि उस की वृद्धि को रोका जा सके.

शाकनाशी रसायन के फायदे

यह शाकनाशी रसायन खरपतवार की वृद्धि को रोकता है और फसल की उत्पादकता को बढ़ाता है.

फसल की सुरक्षा : शाकनाशी रसायन फसल को खरपतवार से बचाता है और उस की सुरक्षा करता है.

समय और मेहनत की बचत : शाकनाशी रसायन का उपयोग करने से समय और मेहनत की बचत होती है.

शाकनाशी रसायन के नुकसान

पर्यावरण पर प्रभाव : शाकनाशी रसायन पर्यावरण पर बुरा प्रभाव डाल सकता है और जीवजंतुओं को नुकसान पहुंचा सकता है.

फसल को नुकसान : शाकनाशी रसायन फसल को नुकसान पहुंचा सकता है, अगर उस का उपयोग सही तरीके से नहीं किया जाए.

मिट्टी का प्रदूषण : शाकनाशी रसायन मिट्टी का प्रदूषण कर सकता है और उस की उर्वरता को कम कर सकता है.

इन विधियों को अपना कर गेहूं की फसल में खरपतवार को नियंत्रित किया जा सकता है.

किसानों को इन विभिन्न उपायों को अपना कर अपनी फसल की गुणवत्ता और उत्पादकता को बनाए रखना चाहिए.

वर्तमान में उपलब्ध नई तकनीकें और उन्नत विधियां खरपतवार नियंत्रण को अधिक प्रभावी और स्थायी बनाने में मददगार साबित हो रही हैं, जो कृषि की चुनौतियों का सामना करने में मददगार हैं.

गेहूं में खरपतवार नियंत्रण के प्रभावी उपाय

कंडाली : कंडाली एक वार्षिक खरपतवार है, जिस की ऊंचाई 30-60 सैंटीमीटर तक होती है. पत्तियां आकार में लंबी और चौड़ी होती हैं, जिन के किनारे दांतेदार होते हैं.

सरसों : सरसों एक वार्षिक खरपतवार है, जिस की ऊंचाई 30-90 सैंटीमीटर तक होती है. पत्तियां आकार में लंबी और चौड़ी होती हैं, जिन के किनारे दांतेदार होते हैं. फूल पीले रंग के होते हैं, जो अप्रैलमई माह में खिलते हैं.

खूबकला : खूबकला एक वार्षिक खरपतवार है, जिस की ऊंचाई 20-50 सैंटीमीटर तक होती है. पत्तियां आकार में लंबी और चौड़ी होती हैं, जिन के किनारे दांतेदार होते हैं. फूल पीले रंग के होते हैं, जो अप्रैलमई माह में खिलते हैं.

मटर के परिवार की खरपतवार

मटरी : मटरी एक वार्षिक खरपतवार है, जिस की ऊंचाई 30-60 सैंटीमीटर तक होती है. पत्तियां आकार में लंबी और चौड़ी होती हैं, जिन के किनारे दांतेदार होते हैं. फूल बैगनी रंग के होते हैं, जो अप्रैलमई माह में खिलते हैं.

फूली मटर : फूली मटर एक वार्षिक खरपतवार है, जिस की ऊंचाई 20-40 सैंटीमीटर तक होती है.

काली मटर : पत्तियां आकार में लंबी और चौड़ी होती हैं, जिन के किनारे दांतेदार होते हैं. फूल बैगनी रंग के होते हैं, जो अप्रैलमई माह में खिलते हैं. यह एक वार्षिक खरपतवार है, जिस की ऊंचाई 30-60 सैंटीमीटर तक होती है. पत्तियां आकार में लंबी और चौड़ी होती हैं. इन के किनारे दांतेदार होते हैं. फूल बैगनी रंग के होते हैं, जो अप्रैलमई माह में खिलते हैं.

गंदेरी परिवार की खरपतवार

गंदेरी : गंदेरी एक बहुवर्षीय खरपतवार है, जिस की ऊंचाई 30-100 सैंटीमीटर तक होती है. पत्तियां आकार में लंबी और चौड़ी होती हैं, जिन के किनारे दांतेदार होते हैं. फूल हरे रंग के होते हैं, जो जूनजुलाई माह में खिलते हैं. इस की जड़ें गहरी होती हैं और मिट्टी में पानी को सोख लेती हैं.

बांस घास : बांस घास एक बहुवर्षीय खरपतवार है, जिस की ऊंचाई 100-200 सैंटीमीटर तक होती है. पत्तियां आकार में लंबी और चौड़ी होती हैं, जिन के किनारे दांतेदार होते हैं. फूल हरे रंग के होते हैं, जो जूनजुलाई माह में खिलते हैं.

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खरपतवार की पहचान

खरपतवार की पहचान अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि विभिन्न प्रकार के खरपतवारों की विशेषताएं और नियंत्रण की विधियां भिन्न होती हैं. गेहूं की फसल में सामान्य रूप से उगने वाले खरपतवार निम्नलिखित हैं :

मकोय : मकोय एक वार्षिक खरपतवार है, जिस की ऊंचाई 30-100 सैंटीमीटर तक होती है. पत्तियां आकार में लंबी और चौड़ी होती हैं, जिन के किनारे दांतेदार होते हैं. मकोय गेहूं की फसल में तेजी से वृद्धि करता है और फसल की उत्पादकता को कम कर देता है.

हिरनखुरी : हिरनखुरी एक वार्षिक खरपतवार है, जिस की ऊंचाई 30-100 सैंटीमीटर तक होती है. पत्तियां आकार में लंबी और चौड़ी होती हैं, जिन के किनारे दांतेदार होते हैं. फूल पीले रंग के होते हैं, जो जूनजुलाई माह में खिलते हैं.

ककमाची : ककमाची एक वार्षिक खरपतवार है, जिस की ऊंचाई 30-100 सैंटीमीटर तक होती है. पत्तियां आकार में लंबी और चौड़ी होती हैं, जिन के किनारे दांतेदार होते हैं. फूल सफेद रंग के होते हैं, जो जूनजुलाई माह में खिलते हैं.

बथुआ : बथुआ एक वार्षिक खरपतवार है, जिस की ऊंचाई 30-100 सैंटीमीटर तक होती है. पत्तियां आकार में लंबी और चौड़ी होती हैं, जिन के किनारे दांतेदार होते हैं. फूल हरे रंग के होते हैं, जो जूनजुलाई माह में खिलते हैं. बथुआ गेहूं की फसल में तेजी से वृद्धि करता है और फसल की उत्पादकता को कम कर देता है.

चौलाई : इस की पत्तियां आकार में लंबी और चौड़ी होती हैं, जिन के किनारे दांतेदार होते हैं. फूल हरे रंग के होते हैं, जो जूनजुलाई माह में खिलते हैं.

जंगली गाजर : जंगली गाजर एक द्विवर्षीय खरपतवार है, जिस की ऊंचाई 30-100 सैंटीमीटर तक होती है. पत्तियां आकार में लंबी और चौड़ी होती हैं, जिन के किनारे दांतेदार होते हैं. फूल सफेद रंग के होते हैं, जो जूनजुलाई माह में खिलते हैं.

महिलाओं और युवाओं को मिलेंगे रोजगार (Employment)

नई दिल्ली: केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने नई दिल्ली में 10,000 नवगठित बहुद्देशीय प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (PACS), डेयरी व मत्स्य सहकारी समितियों का शुभारंभ किया. उन्होंने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपयी की जन्म शताब्दी के दिन 10,000 नई बहुद्देश्यीय प्राथमिक कृषि ऋण समितियों (MPACS), डेयरी व मत्स्य सहकारी समितियों का शुभारंभ हो रहा है.

अमित शाह ने कहा कि 19 सितंबर, 2024 को इसी स्थान पर हम ने एक SOP बनाई थी. उस के 86 दिन के अंदर ही हम ने 10,000 पैक्स को रजिस्टर करने का काम समाप्त कर दिया है. जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सहकारिता मंत्रालय की स्थापना की, तो उन्होंने ‘सहकार से समृद्धि’ का मंत्र दिया था.

मंत्री अमित शाह ने आगे कहा कि ‘सहकार से समृद्धि’ तभी संभव है, जब हर पंचायत में सहकारिता उपस्थिति हो और वहां किसी न किसी रूप में काम करे. उन्होंने कहा कि हमारे देश के त्रिस्तरीय सहकारिता ढांचे को सब से ज्यादा ताकत प्राथमिक सहकारी समिति ही दे सकती है, इसलिए मोदी सरकार ने 2 लाख नए पैक्स बनाने का निर्णय लिया था.

केंद्रीय सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कहा कि नाबार्ड (NABARD), एनडीडीबी(NDDB) और एनएफडीबी (NFDB) ने 10,000 प्राथमिक सहकारी समितियों के पंजीकरण में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है. सहकारिता मंत्रालय की स्थापना के बाद सब से बड़ा काम सभी पैक्स का कंप्यूटराइजेशन करने का काम किया गया.

उन्होंने आगे कहा कि कंप्यूटराइजेशन के आधार पर पैक्स को 32 प्रकार की नई गतिविधियों से जोड़ने का काम किया गया. हम ने पैक्स को बहुआयामी बना कर और उन्हें भंडारण, खाद, गैस, उर्वरक एवं जल वितरण के साथ जोड़ा है.

मंत्री अमित शाह ने कहा कि ट्रेंड मैनपावर न होने के कारण ये सब हम नहीं कर सकते. इस के लिए आज यहां प्रशिक्षण मौड्यूल का भी शुभारंभ हुआ है, जो पैक्स के सदस्यों और कर्मचारियों को प्रशिक्षण देने का काम करेंगे.

उन्होंने आगे यह भी कहा कि ये प्रशिक्षण मौड्यूल हर जिला सहकारी रजिस्ट्रार की जिम्मेदारी बनेगी कि पैक्स के सचिव एवं कार्यकारिणी के सदस्यों का अच्छा प्रशिक्षण सुनिश्चित हो.

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि यहां 10 सहकारी समितियों को रुपे किसान क्रेडिट कार्ड (RuPay Kisan Credit Card), माइक्रो एटीएम (Micro ATM) का वितरण किया गया है. इस अभियान के तहत आने वाले दिनों में हर प्राथमिक डेयरी को माइक्रो एटीएम दिया जाएगा. माइक्रो एटीएम और रुपे किसान क्रेडिट कार्ड (RuPay Kisan Credit Card) हर किसान को कम खर्च पर लोन यानी ऋण देने का काम करेगा.

मंत्री अमित शाह ने कहा कि पैक्स के विस्तार के लिए विजिबिलिटी, रेलेवेंस, वायबिलिटी और वाइब्रेंसी का ध्यान रखा गया है. पैक्स में 32 कामों को जोड़ कर इसे विजिबल और वायबल बनाया गया है.

उन्होंने जानकारी देते हुए कहा कि गांव में कौमन सर्विस सैंटर (Common Service Centre) (CSC) का जब पैक्स बन जाता है, तो गांव के हर नागरिक को किसी न किसी रूप में पैक्स के दायरे में आना पड़ता है. इस प्रकार हम ने इस की रेलेवेंस भी बढ़ाई है.

गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि जब पैक्स गैस वितरण, भंडारण, पैट्रोल वितरण आदि का काम करते हैं, तो उन की वाइब्रेंसी अपनेआप बढ़ जाती है. साथ ही, पैक्स के बहुद्देश्यीय होने से पैक्स का जीवन भी लंबा होने की पूरी संभावना रहती है.

उन्होंने कहा कि यह एक बहुद्देशीय कार्यक्रम है, जिस से किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने का प्रयास होगा.

मंत्री अमित शाह ने कहा कि कंप्यूटराइजेशन और टैक्नोलौजी से पैक्स में पारदर्शिता आएगी, सहकारिता का जमीनी स्तर पर विस्तार होगा और ये महिलाओं और युवाओं के रोजगार का माध्यम भी बनेगा. साथ ही, पैक्स, कृषि संसाधनों की आसान उपलब्धता भी सुनिश्चित करेगा.

अमित शाह ने कहा कि हमारी 3 नई राष्ट्रीय स्तर की कोऔपरेटिव्स के माध्यम से पैक्स, और्गेनिक उत्पादों, बीजों और ऐक्सपोर्ट के साथ किसानों की समृद्धि के रास्ते भी खोलेगा. इस से सामाजिक और आर्थिक समानता भी आएगी, क्योंकि नए मौडल में महिलाओं, दलितों, पिछड़ों और आदिवासियों की भागीदारी सुनिश्चित की है, जिस से सामाजिक समरसता भी बढ़ेगी.

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कहा कि मोदी सरकार ने लक्ष्य रखा है कि अगले 5 साल में 2 लाख नए पैक्स का गठन करेंगे. उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि 5 साल से पहले ही हम इस लक्ष्य को पूरा लेंगे.

उन्होंने आगे बताया कि पहले चरण में नाबार्ड 22,750 पैक्स और दूसरे चरण में 47,250 पैक्स बनाएगा. इसी प्रकार एनडीडीबी 56,500 नई समितियां बनाएगा और 46,500 मौजूदा समितियों को और मजबूत बनाएगा. वहीं एनएफडीबी 6,000 नई मत्स्य सहकारी समितियां बनाएगा और 5,500 मौजूदा मत्स्य सहकारी समितियों का सशक्तीकरण करेगा. इन के अलावा राज्यों के सहकारी विभाग 25,000 पैक्स बनाएंगे.

अमित शाह ने इस अवसर पर कहा कि नए मौडल के साथ अब तक 11,695 नई प्राथमिक सहकारी समितियां पंजीकृत हुई हैं, जो हमारे लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है. साथ ही, 2 लाख नए पैक्स बनने के बाद फौरवर्ड और बैकवर्ड लिंकेजेस के माध्यम से किसानों की उपज को वैश्विक बाजार में पहुंचाना बड़ा आसान हो जाएगा.

सरस मेलों से ग्रामीण महिलाएं (Rural Women) बन रहीं सशक्त

जयपुर : कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्री डा. किरोड़ी लाल मीणा ने राजस्थान ग्रामीण आजीविका विकास परिषद (राजीविका) द्वारा जवाहर कला केंद्र, जयपुर में संचालित ‘सरस राजसखी मेला, 2024’ का अवलोकन करते हुए कहा कि सरस मेलों का ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाने में अहम योगदान है. इन मेलों में देश की ग्रामीण महिलाएं अपने हाथों से बने शोपीस आइटम बेचती है.

मेले में मंत्री डा. किरोड़ी लाल ने सरस मेले में सभी स्टालों का अवलोकन किया एवं विभिन्न राज्यों से आए स्वयं सहायता समूह की महिलाओं से बातचीत की और उन के उत्पादों की सराहना की. मेले में 250 से अधिक जीआई टैग उत्पादों के तकरीबन 400 स्टाल थे.

उन्होंने आगे कहा कि सरस मेले में राजीविका दीदियों द्वारा बने शिल्पकला, एंब्रौयडरी, जैविक उत्पाद, घर का साजोसामान एवं खानेपीने से संबंधित चीजों को एक स्थान पर खरीदारी करने का अवसर प्रदान करता है. ये मेले पारंपरिक भारतीय कला एवं संस्कृति को प्रदर्शित करने के लिए एक मंच प्रदान करते हैं.
उन्होंने यह भी कहा कि मेले में विभाग द्वारा पैकेजिंग, ब्रांडिंग, सोशल मीडिया मार्केटिंग और वित्तीय प्रबंधन जैसे विषयों पर कार्यशालाओं का आयोजन भी किया गया, जिस से कि राजीविका महिलाओं को ज्यादा से ज्यादा उत्पाद बेचने के अवसर उपलब्ध हो सकें.

सरस मेले में नैशनल क्रेडिट कोर यानी एनसीसी के 70 कैडेटों ने भी अवलोकन किया और खरीदारी कर मेले का लुत्फ उठाया. साथ ही, अजमेर एवं अलवर जिले से आई स्वयं सहायता समूह की महिलाओं द्वारा भी मेले का भ्रमण किया गया एवं भविष्य में मेले में अपने उत्पादों के साथ सहभागिता निभाने की मंशा जाहिर की गई.

यह मेला ग्रामीण महिलाओं के आर्थिक एवं सामाजिक सशक्तीकरण को बढ़ावा देने का एक अहम प्रयास है, जिस में स्वयं सहायता समूह की महिलाओं के हस्तनिर्मित उत्पादों का प्रदर्शन किया गया. मेले में देशभर के 250 से अधिक भौगोलिक संकेतक (जीआई) टैग वाले उत्पादों और पारंपरिक शिल्प का शानदार संग्रह देखने को मिला.

सरस राज्य सखी राष्ट्रीय मेला एक अद्वितीय मंच है, जहां विभिन्न राज्यों की महिला सदस्य अपने पारंपरिक हस्तशिल्प, हैंडलूम, खाद्य उत्पाद और उन्नत तकनीकी उत्पादों का प्रदर्शन कर रही है. इस आयोजन में क्षेत्रवाद मंडप बनाए गए, जिन में प्रत्येक राज्य की विशिष्ट सांस्कृतिक कलाकृतियां और पारंपरिक उत्पाद प्रदर्शित हुए. यहां पर तकरीबन 300 से अधिक स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं ने अपने उत्पादों को बेचा. यह मेला देश की सांस्कृतिक विविधता, पारंपरिक स्वादों और हस्तशिल्प के अनूठे संगम को दर्शाता है.

3 लाख लिटर दूध प्रतिदिन की क्षमता का नया संयंत्र (New Milk Plant) लगेगा

जयपुर : दूध उत्पादक सहकारी संघ गोवर्धन परिसर, उदयपुर में पंजाब के राज्यपाल एवं प्रशासक चंडीगढ़ गुलाबचंद कटारिया के मुख्य आतिथ्य में विशाल ‘किसान सहकार सम्मेलन’ कार्यक्रम आयोजित किया गया.

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए संघ के अध्यक्ष डालचंद डांगी ने संघ का संयंत्र अत्यंत पुराना होने के मद्देनजर राज्यपाल पंजाब एवं गोपालन मंत्री जोराराम कुमावत से उदयपुर में 3 लाख लिटर दूध प्रतिदिन की क्षमता का नया संयंत्र स्थापित कराने एवं 150 टन प्रतिदिन की क्षमता का पशु आहार संयंत्र लगाने का अनुरोध करते हुए विस्तृत परियोजना प्रस्ताव प्रस्तुत किया.

कार्यक्रम में पंजाब के राज्यपाल एवं प्रशासक चंडीगढ़ गुलाबचंद कटारिया ने अपने उदबोधन में पशुपालकों की माली हालत को मजबूत करने और कीमत अंतर राशि दूध समितियों के बजाय सीधे दूध उत्पादकों के बैंक खातों में भेजने का सुझाव दिया. साथ ही, बाजार की होड़ के मद्देनजर दूध एवं दूध से बने उत्पादों की गुणवत्ता बनाए रखने पर भी जोर दिया.

पशुपालन, गोपालन एवं देवस्थान मंत्री जोराराम कुमावत ने अपने उद्बोधन में दूध उत्पादकों को दर अंतर दिए जाने पर ख़ुशी जाहिर करते हुए दुग्ध संघ, उदयपुर के अध्यक्ष एवं प्रबंध संचालक के प्रयासों की सराहना की एवं भविष्य में दर अंतर राशि डीबीटी के माध्यम से सीधे दूध उत्पादकों के बैंक खाते मे भेजने का सुझाव दिया.

उन्होंने आगे कहा कि दूध उत्पादकों को दूध पर दी जाने वाली सब्सिडी जारी रखी जाएगी. इस से दूध उत्पादकों की माली हालत और भी मजबूत होगी. उन्होंने सभी से अपना पूरा दूध दुग्ध उत्पादक सहकारी समिति पर ही देने के लिए कहा, ताकि उन को सहकारी डेयरी से मिलने वाली सभी सुविधाओं का लाभ मिल सके.

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार द्वारा पशुपालकों के कल्याण के लिए चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं जैसे दुधारू पशु बीमा योजना, गोपालक कार्ड योजना, किसान क्रेडिट कार्ड योजना, पशु मोबाइल चिकित्सा योजना की विस्तृत जानकारी देते हुए इन का लाभ उठाने को कहा. उन्होंने यह भी कहा कि राज्य सरकार दूध में मिलावट करने वालों के खिलाफ सख्त कार्यवाही कर रही है.

उदयपुर डेयरी परिसर में स्थित पार्लर को सरस संकुल पार्लर, जयपुर की तर्ज पर विकसित करने पर भी उन्होंने जोर दिया और कहा कि आगामी बजट मे उदयपुर में 3 लाख लिटर का नया संयंत्र एवं 150 टन प्रतिदिन की क्षमता का पशु आहार संयंत्र स्थापित लगाने का प्रयास किया जाएगा.

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जनजाति विकास एवं गृह रक्षा मंत्री बाबूलाल खराड़ी ने आज के समय में ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन एवं डेयरी व्यवसाय को रोजगार एवं आजीविका का सशक्त माध्यम बताया एवं ज्यादा से ज्यादा किसानों एवं पशुपालकों से सहकारी डेयरी से जुड़ कर आमदनी बढाने का आह्वान किया.

उदयपुर डेयरी के प्रबंध संचालक विपिन शर्मा ने किसान सहकार सम्मेलन कार्यक्रम में पधारे सभी अतिथियों का आभार एवं धन्यवाद ज्ञापित किया.

सिद्धार्थ नगर में बड़े पैमाने पर काला नमक चावल का हो रहा उत्पादन

सिद्धार्थ नगर: जिला प्रशासन अधिकारियों एवं कृषि विभाग के प्रयास से जिले में काला नमक चावल की पहचान पूरी दुनिया में पहुंचाने के लिए पिछले दिनों क्रेताविक्रेता सम्मेलन का कार्यक्रम 2 दिनों के लिए आयोजित किया गया. जिलाधिकारी का प्रयास जिले के किसानों को काला नमक चावल के उत्पादन की अच्छी कीमत मिले, यह प्रयास अत्यंत सराहनीय है.

कृषि मंत्री सूर्यप्रताप शाही ने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ओडीओपी के अंतर्गत जिले के काला नमक चावल को चुना गया है. आज जिले में काला नमक चावल का उत्पादन 18,000 एकड़ भूमि में किया जा रहा है. भारत सरकार द्वारा नौनबासमती चावल का निर्यात बंद कर दिया गया था. उस के लिए वाणिज्य मंत्री भारत सरकार से मिल कर किसानों को लाभ पहुंचाने के लिए खुलवाया गया, जिस से काला नमक चावल व अन्य चावल का उत्पादन करने वाले किसानों को उचित मूल्य प्राप्त हो सके.

सरकार किसानों की आय को दोगुना करने के लिए दृढ़संकल्पित है. इस के लिए विभिन्न योजनाओं के माध्यम से किसानों को लाभ पहुंचाया जा रहा है. कृषि विभाग द्वारा पारदर्शी रूप से किसानों को सोलर पंप, कृषि यंत्र आदि पर सब्सिडी दे कर लाभांवित किया जा रहा है.

काला नमक चावल लंबे समय तक रखने पर उस की खुशबू चली जाती थी. उस के लिए अब वैज्ञानिक शोध कर रहे हैं, जिस से काला नमक चावल की सुगंध बनी रहे. किसानों को काला नमक चावल का सही बीज मिले, इस के लिए वैज्ञानिकों द्वारा शोध किया जा रहा है.

काला नमक चावल शुगर फ्री, प्रोटीन, विटामिन व अन्य गुणवत्ता से युक्त है. भारत सरकार द्वारा 2,396 मिलियन टन नौनबासमती चावल का निर्यात किया गया था. इस से अधिक निर्यात केवल उत्तर प्रदेश द्वारा हो, इस के लिए प्रयास किया जाए.

कृषि मंत्री सूर्यप्रताप शाही ने जिलाधिकारी को नौगढ़शोहरतगढ़ के बीच आम फैसिलिटेशन सैंटर बनाए जाने का निर्देश दिया, जिस से किसान अपना चावल उस में रख सकें. उन्होंने कहा कि मखाने की खेती करने के लिए ब्लौक स्तर पर गोष्ठी आयोजित कर किसानों को प्रेरित किया जाए, जिस से किसानों को काला नमक चावल के साथ मखाने की खेती से अच्छी आय प्राप्त हो सके.

Black salt rice

डुमरियागंज के सांसद जगदंबिका पाल ने कहा कि काला नमक चावल की ब्रांडिंग एवं निर्यात के लिए क्रेताविक्रेता सम्मेलन कार्यक्रम का आयोजन किया गया है. जिला प्रशासन द्वारा काला नमक चावल को विश्व में पहचान के लिए निरंतर प्रयास किया जा रहा है. काला नमक चावल विलुप्त होता जा रहा था, लेकिन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री एवं कृषि मंत्री के प्रयास से इस की पहचान बढ़ी है.

काला नमक चावल का उत्पादन जिस तरह से हो रहा है, उस की सही कीमत किसानों को नहीं मिल रही है. इस क्वालिटी का चावल पूरी दुनिया में नहीं मिल रहा है. काला नमक चावल को शुगर का मरीज भी खा सकता है. जापान के चावल का मुकाबला आज हमारे जिले का काला नमक चावल कर रहा है. आज पूरी दुनिया में और्गेनिक फूड का महत्व बढ़ रहा है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा डा. स्वामीनाथन की रिपोर्ट को लागू किया गया. जनपद में काला नमक भवन बनाने के लिए भारत सरकार से सीएसआर मद से काम करने का प्रयास किया जा रहा है. इस भवन के बनने से बाहर से आने वाले लोगों को काला नमक चावल आसानी से प्राप्त हो जाएगा. वहीं से ही इस की मार्केटिंग भी हो सकेगी. कार्यक्रम के अंत में सांसद डुमरियागंज ने जिला प्रशासन, कृषि वैज्ञानिकों एवं किसानों को शुभकामनाएं दीं.

हाईटेक कृषि ज्ञान वाहनों से मिल रहा हर सवाल का जवाब

सबौर: बिहार कृषि विश्वविद्यालय, द्वारा संचालित “सवालजवाब” कार्यक्रम अब किसानों तक और भी प्रभावी ढंग से पहुंच रहा है. सोशल मीडिया प्लेटफौर्म पर लोकप्रिय इस कार्यक्रम का प्रसारण आज से कृषि ज्ञान वाहनों के माध्यम से भी किया गया.

समस्तीपुर, पूर्णिया और पटना जिलों के ग्रामीण क्षेत्रों में मौजूद इन कृषि ज्ञान वाहनों पर किसानों ने विश्वविद्यालय के मीडिया सेंटर से प्रसारित सवालजवाब कार्यक्रम को देखा और वैज्ञानिकों से सीधे प्रश्न पूछे. आज के कार्यक्रम में “जाड़े के मौसम में पशुओं के रखरखाव” विषय पर चर्चा की गई.

इस अवसर पर प्रसार शिक्षा निदेशक डा. आरके सोहाने, पशु विज्ञान विशेषज्ञ डा. राजेश कुमार, डा. एमज़ेड होदा और डा. ज्योतिमला ने किसानों के सवालों के उत्तर दिए. कार्यक्रम का संचालन अन्नू द्वारा किया गया.

यह कार्यक्रम हर शनिवार को प्रसारित होता है. साथ ही, अब बिहार कृषि विश्वविद्यालय के कृषि ज्ञान वाहनों के साथसाथ बामेती, बिहार पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, पटना और डा. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के वाहनों में भी उपलब्ध है. इन वाहनों में बड़े टीवी स्क्रीन पर कार्यक्रम का सीधा प्रसारण किया गया.

इस नई पहल पर खुशी जाहिर करते हुए कुलपति डा. डीआर सिंह ने कहा ” इस कदम से दूरदराज के किसानों को खेती और पशुपालन से जुड़ी समस्याओं का समाधान रियल टाइम में मिल सकेगा. यह पहल किसानों के सशक्तिकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा.”

हाईटेक कृषि ज्ञान वाहन

गौरतलब है कि इस वर्ष बिहार कृषि विश्वविद्यालय के नेतृत्व में हाईटेक कृषि ज्ञान वाहनों का निर्माण किया गया था, जिस का लोकार्पण बिहार के मुख्यमंत्री द्वारा किया गया था. ये वाहन किसानों को कृषि और पशुपालन से जुड़ी समस्याओं के समाधान के लिए अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस हैं.

किसानों के लिए उम्मीद की नई किरण

यह कार्यक्रम न केवल किसानों के दरवाजे तक पहुंच कर उन्हें जागरूक कर रहा है, बल्कि उन की समस्याओं का तुरंत समाधान भी प्रदान कर रहा है. इस से राज्य में कृषि और पशुपालन के क्षेत्र में प्रगति को नई गति मिलेगी.

कृषि कार्य में काम आने वाले ट्रैक्टरचालित उपयोगी यंत्र

सवाल : खेती की तैयारी और अन्य प्रमुख कृषि कार्य में काम आने वाले ट्रैक्टरचालित कौन से उपयोगी यंत्र हैं?

– दिनेश यादव, मथुरा

जवाब : आज खेती कृषि यंत्रों पर आधारित है. ज्यादातर किसानों के पास अपनी सुविधा के  अनुसार छोटेबड़े कृषि यंत्र भी हैं. लेकिन ट्रैक्टर सभी किसानों की पहुंच में नहीं हैं. यहां हम उन्हीं कृषि यंत्रों की बात करने जा रहे हैं, जो ट्रैक्टर द्वारा चालित हैं.

खेती की तैयारी के लिए ट्रैक्टरचालित उपयोगी यंत्र हैरो/कल्टीवेटर,  हैप्पी सीडर, रिवर्सेबल प्लाऊ, रीपर, रोटावेटर, रीपर कम बाइंडर, जीरो ट्रिल/सीड ड्रिल कम फर्टिलाइजर ड्रिल, थ्रेशर, मल्टीक्राप थ्रेशर, राइस ट्रांसप्लांटर, पोटैटो प्लांटर, पोटैटो डिगर आदि.

इन में कल्टीवेटर, रोटावेटर जैसे यंत्र खेत को तैयार करने यानी खेत की जुताई करने के काम आते हैं. रिवर्सेबल प्लाऊ खेत की मिट्टी में गहराई तक पहुंच कर काम करता है. रीपर यंत्र गेहूंधान जैसी फसलों की कटाई का काम करता है. इसी का अत्याधुनिक यंत्र है, रीपर कम बाइंडर. यह यंत्र फसल की कटाई करने के साथसाथ उन के गट्ठर भी बनाता चलता है.

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जीरो ट्रिल यंत्र से खेत में बिना जुताई किए सीधे ही बीज की बोआई की जाती है. इसी का   आधुनिक कृषि यंत्र जीरो कम फर्टिलाइजर ड्रिल है. यह यंत्र भी बिना जुताई किए खेत में बीज की बोआई करने के साथसाथ खेत में उर्वरक भी डालता है. इस यंत्र के इस्तेमाल से खेत की जुताई का खर्च बचता है. साथ ही, समय की भी बचत होती है. उदाहरण के लिए गेहूं व धान की कटाई के बाद आप सीधे ही बोआई कर सकते हैं.

थ्रेशर यंत्र की बात करें, तो यह बहुत ही आम यंत्र है. यह यंत्र तैयार फसल की गहाई करने के काम आता है, जिस से तैयार उपज से अनाज अलग हो जाता है और भूसा अलग हो जाता है.

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मल्टीक्राप थ्रेशर के बारे में जैसा नाम से ही पता चल रहा है कि इस अकेले यंत्र से कई अलगअलग फसलों की गहाई की जा सकती है. इस में गहाई करने वाली खास फसलें हैं. जैसे गेहूं, धान, मक्का, दलहनी और तिलहनी फसलें आदि.

अब बात करते हैं राइस प्लांटर की. राइस प्लांटर धान की बोआई करने वाला यंत्र है. इस के अलावा धान की रोपाई करने वाला पैडी प्लांटर भी होता है, जिस से धान पौध की बोआई की जाती है. इस यंत्र में ट्रैक्टर की आवश्यकता नहीं होती. यह इंजन फिटेड यंत्र है, जिस को एक व्यक्ति द्वारा खेत में चलाया जाता है. इस यंत्र के इस्तेमाल से धान की रोपाई में अधिक मजदूरों की जरूरत नहीं होती और कम समय में अधिक रकबे में धान की रोपाई की जा सकती है.

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ट्रैक्टर से चलने वाले पोटैटो प्लांटर यंत्र द्वारा आलू कंद की बोआई की जाती है, जो उचित दूरी और गहराई में आलू बीज गिराता है. इस यंत्र के इस्तेमाल से आलू की अच्छी पैदावार मिलती है.

आलू फसल तैयार होने के बाद उस की खुदाई के लिए पोटैटो डिगर यंत्र है. आलू खुदाई करने वाले इस यंत्र को भी ट्रैक्टर द्वारा चलाया जाता है. इस यंत्र से आलू खुदाई के बाद मजदूरों द्वारा आलू को चुन लिया जाता है. इस के अलावा अनेक कृषि यंत्र हैं, जो किसानों के लिए खेती में खासा मददगार हैं.

उत्तर प्रदेश में ये हैं कृषि यंत्रीकरण योजनाएं

सवाल : उत्तर प्रदेश में कृषि यंत्रीकरण की कौन सी योजनाएं संचालित हैं?
– राम किशन, गांव कोटकी, टूंडला

जवाब : किसानों के लिए केंद्र सरकार और राज्य सरकारों द्वारा समयसमय पर अनेक योजनाएं संचालित होती रहती हैं. इन योजनाओं के जरीए ज्यादातर किसानों को कृषि यंत्र खरीद पर सरकार द्वारा सब्सिडी दी जाती है, जिस से किसानों को अच्छीखासी आर्थिक मदद मिलती है.

इसी कड़ी में उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए कृषि यंत्रीकरण की सबमिशन औन एग्रीकल्चर मेकैनाइजेशन अंडर नैशनल मिशन औन एग्रीकल्चर ऐक्सटेंशन एंड टैक्नोलौजी योजना संचालित है. इस योजना के जरीए किसान कृषि यंत्रों का फायदा ले सकते हैं.

इस के लिए आप अपने नजदीक कृषि संस्थान से संपर्क कर सकते हैं. साथ ही, इन योजनाओं की जानकारी बड़े कृषि यंत्र विक्रेताओं को भी होती है, वे भी इस बारे में आप की मदद कर सकते हैं.

प्राकृतिक आपदा से किसान की उपज बरबाद , कैसे हो भरपाई?

सवाल : मैं बाराबंकी, उत्तर प्रदेश का किसान हूं. मैं जानना चाहता हूं कि प्राकृतिक आपदा से किसान की उपज बरबाद हो जाती है, तो उस की फसल की भरपाई के लिए क्या पैमाना है और किस तरह से फसल की क्षति का आकलन किया जाता है?

– रामजीवन मिश्रा

जवाब : सरकार द्वारा किसानों के लिए अनेक लाभांवित योजनाएं हैं. उन्हीं योजनाओं में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना है, जो किसानों की प्राकृतिक आपदा से होने वाली फसल नुकसान की भरपाई करती है.

आप के सवाल के जवाब में हम बताना चाहते हैं कि अधिसूचित फसलों पर मौसम के अंत में संपादित फसल कटाई प्रयोगों से प्राप्त उपज के आधार पर फसल की क्षति का आकलन किया जाता है और संबंधित किसानों को उपज में कमी के अनुरूप क्षतिपूर्ति प्रदान की जाती है.

योजना के नियमों के अनुरूप क्षतिपूर्ति देय होने पर बीमा कंपनी द्वारा किसानों के बैंक खाते में क्षतिपूर्ति की धनराशि जमा करा दी जाती है. इसलिए क्षतिपूर्ति प्राप्त करने के लिए किसानों को व्यक्तिगत दावा प्रस्तुत करना आवश्यक नहीं है.

ग्राम पंचायत में अधिसूचित फसल के अधिकांश किसानों द्वारा फसल की बोआई न कर पाने/असफल बोआई की स्थिति में क्षति का आकलन ग्राम पंचायत स्तर पर करते हुए प्राथमिकता पर क्षतिपूर्ति देय होती है. योजना में स्थानिक आपदाओं, ओला, भूस्खलन व जलभराव और फसल की कटाई के उपरांत आगामी 14 दिन की अवधि तक फसल नष्ट होने की स्थिति में फसल की क्षति का आकलन व्यक्तिगत बीमित किसान के स्तर पर करते हुए किसानों को प्राथमिकता पर आंशिक क्षतिपूर्ति प्रदान की जाती है, जिस को मौसम के अंत में फसल कटाई प्रयोगों से प्राप्त उपज के आधार पर देय कुल क्षतिपूर्ति की धनराशि में समायोजित किया जाता है.

इसी प्रकार फसल की मध्य अवस्था तक ग्राम पंचायत में फसल की संभावित उपज सामान्य उपज से 50 फीसदी कम होने की स्थिति में भी किसानों को आपदा की स्थिति तक उत्पादन लागत में व्यय के अनुरूप तात्कालिक सहायता प्रदान की जाती है, जिसे मौसम के अंत में फसल कटाई प्रयोगों से प्राप्त उपज के आधार पर देय कुल क्षतिपूर्ति की धनराशि में समायोजित किया जाता है.

पुनर्गठित मौसम आधारित फसल बीमा योजना में फसल की क्षति का आकलन ब्लौक में स्थापित स्वचालित मौसम केंद्र स्तर पर मौसम के प्रतिदिन के आंकड़ों के आधार पर किया जाता है. फसल की बोआई से कटाई के प्रत्येक महत्वपूर्ण चरणों में फसल की आवश्यकतानुसार निर्धारित मौसमीय स्थितियों एवं मौसम की वास्तविक स्थिति में अंतर के अनुरूप फसल की संभावित क्षति को दृष्टिगत रखते हुए किसानों को क्षतिपूर्ति प्रदान की जाती है.

क्या है फसल बीमा योजना (Crop insurance scheme)?

सवाल : फसल बीमा योजना क्या है और इस योजना में कौनकौन से जोखिम कवर होते हैं?
– रामप्रकाश, अलीगढ़

जवाब : केंद्र सरकार द्वारा वर्तमान में उपज गारंटी योजना के रूप में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना किसानों के लिए चलाई जा रही है, जिस के अंतर्गत प्रतिकूल मौसमीय स्थितियों के कारण फसल की बोआई न कर पाने/असफल बोआई, फसल की बोआई से कटाई की अवधि में प्राकृतिक आपदाओं, रोगों व कीटों से फसल नष्ट होने की स्थिति एवं फसल कटाई के बाद खेत में कटी हुई फसलों को बेमौसम/चक्रवाती वर्षा, चक्रवात से फसल नुकसान की स्थिति में फसल पैदा करने वाले किसानों, जिन के द्वारा फसल का बीमा कराया गया है, को बीमा कवर के रूप में वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है.

चयनित जनपदों में पुनर्गठित मौसम आधारित फसल बीमा योजना को लागू किया गया है, जिस में प्रतिकूल मौसमीय स्थितियों कम व अधिक तापमान, कम व अधिक वर्षा आदि से फसल नष्ट होने की संभावना के आधार पर फसल के उत्पादक किसानों, जिन के द्वारा फसल का बीमा कराया गया है, को बीमा कवर के रूप में वित्तीय सहायता दी जाती है.