लुवास करेगा राष्ट्रीय पशु चिकित्सा विज्ञान अकादमी  की मेजबानी

हिसार : लाला लाजपत राय पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, हिसार, हरियाणा राष्ट्रीय पशु चिकित्सा विज्ञान अकादमी के साथ मिल कर 29-30 नवंबर, 2024 को “सतत पशु स्वास्थ्य एवं उत्पादन : चुनौतियों एवं प्राथमिकताओं की खोज” विषय पर 22वें राष्ट्रीय दीक्षांत समारोह एवं वैज्ञानिक सम्मेलन का आयोजन किया जाएगा. इस कार्यक्रम का आयोजन कुलपति प्रो. (डा.) विनोद कुमार वर्मा के संरक्षक नेतृत्व में किया जाएगा.

इस विषय पर कुलपति सचिवालय में एक औपचारिक बैठक का आयोजन किया गया, जिस में  कुलपति प्रो. (डा.) विनोद कुमार वर्मा ने राष्ट्रीय दीक्षांत समारोह एवं वैज्ञानिक सम्मेलन की प्रथम सूचना विवरणिका का औपचारिक रूप से विमोचन किया. विमोचन के बाद उन्होंने कहा कि यह आयोजन देश में पशु चिकित्सा विज्ञान और पशुपालन के विकास में अपनी छाप छोड़ेगा. उन्होंने कहा कि आयोजन के लिए गठित आयोजक टीम समय रहते सारी तैयारी कर लेगी, ताकि इसे योजनाबद्ध तरीके से आयोजित किया जा सके.

सम्मेलन के आयोजन सचिव डा. गुलशन नारंग, अधिष्ठाता, पशु चिकित्सा विज्ञान महाविद्यालय ने बताया कि इस कार्यक्रम में कई जानेमाने पशु चिकित्सा पेशेवर, राष्ट्रीय पशु चिकित्सा विज्ञान अकादमी के सदस्य, विभिन्न विश्वविद्यालयों और देश के विभिन्न हिस्सों से वैज्ञानिक और छात्र भाग लेंगे.

उन्होंने बताया कि सम्मेलन के दौरान पशु स्वास्थ्य एवं उत्पादन के विभिन्न क्षेत्रों में 4 तकनीकी सत्र आयोजित किए जाएंगे. इस मौके पर लुवास के मानव संसाधन एवं प्रबंधन निदेशक डा. राजेश खुराना एवं आयोजक टीम के सदस्य मौजूद रहे.

सभी पशु रोग जूनोटिक नहीं होते

नई दिल्ली :  विश्व जूनोसिस दिवस के उपलक्ष में पशुपालन और डेयरी विभाग द्वारा विश्व जूनोसिस दिवस पर पशुपालन और डेयरी सचिव (एएचडी) की अध्यक्षता में एक बातचीत सत्र का आयोजन किया गया.

जूनोसिस संक्रामक रोग है. इस का संक्रमण जानवरों से मनुष्यों में हो सकता है, जैसे रेबीज, एंथ्रेक्स, इन्फ्लुएंजा (एच1, एन1 और एच5, एन1), निपाह, कोविड-19, ब्रुसेलोसिस और तपेदिक. ये रोग बैक्टीरिया, वायरस, परजीवी और कवक फफूंद सहित विभिन्न रोगजनकों के कारण होते हैं.
यद्यपि, सभी पशु रोग जूनोटिक नहीं होते हैं. कई बीमारियां पशुधन को प्रभावित करती हैं, किंतु मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा नहीं हैं. ये गैरजूनोटिक रोग प्रजाति विशिष्ट हैं और मनुष्यों को संक्रमित नहीं कर सकते.

उदाहरण के लिए, खुरपका और मुंहपका रोग, पीपीआर, लंपी स्किन डिजीज, क्लासिकल स्वाइन फीवर और रानीखेत रोग इस में शामिल हैं. प्रभावी सार्वजनिक स्वास्थ्य रणनीतियों और पशुओं के प्रति अनावश्यक भय और दोषारोपण को दूर करने लिए यह समझना महत्वपूर्ण है कि कौन सी बीमारियां जूनोटिक हैं.

भारत पशुधन की सब से बड़ी आबादी से संपन्न है, जिस में 536 मिलियन पशुधन और 851 मिलियन मुरगी हैं, जो क्रमशः वैश्विक पशुधन और मुरगी आबादी का तकरीबन 11 फीसदी और 18 फीसदी है. इस के अतिरिक्त, भारत दूध का सब से बड़ा उत्पादक और वैश्विक स्तर पर अंडों का दूसरा सब से बड़ा उत्पादक है.

अभी कुछ समय पहले, केरल के त्रिशूर जिले के मदक्कथरन पंचायत में अफ्रीकी स्वाइन फीवर (एएसएफ) की पुष्टि हुई थी. एएसएफ की पुष्टि सर्वप्रथम भारत में मई, 2020 में असम और अरुणाचल प्रदेश में की गई थी. तब से, यह बीमारी देश के लगभग 24 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में फैल चुकी है.

विभाग ने साल 2020 में एएसएफ के नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना तैयार की. वर्तमान स्थिति के लिए, राज्य पशुपालन विभाग द्वारा त्वरित प्रतिक्रिया दलों का गठन किया गया है, और 5 जुलाई, 2024 को उपरिकेंद्र के 1 किलोमीटर के दायरे में सूअरों को न्यूनीकरण के लिए मारने का काम किया गया. कुल 310 सूअरों को मार कर उन्हें गहरे खोद कर दफना दिया गया. कार्य योजना के अनुसार आगे की निगरानी उपरिकेंद्र के 10 किलोमीटर के दायरे में की जानी है.

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि एएसएफ जूनोटिक नहीं है और मनुष्यों में इस का संक्रमण नहीं हो सकता है. वर्तमान में, एएसएफ के लिए कोई टीका नहीं है.

जूनोटिक रोगों की रोकथाम और नियंत्रण टीकाकरण, उत्तम स्वच्छता, पशुपालन पद्धति और रोगवाहक नियंत्रण पर निर्भर करता है.

वन हेल्थ विजन के माध्यम से सहयोगात्मक प्रयास, जो मानव, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य के परस्पर महत्वपूर्ण संबंध को दर्शाता है. पशु चिकित्सकों, चिकित्सा पेशेवरों और पर्यावरण वैज्ञानिकों के बीच सहयोग जूनोटिक रोगों को व्यापक रूप से संबोधित करने के लिए आवश्यक है.

जूनोटिक रोगों के जोखिम को कम करने के लिए, पशुपालन और डेयरी विभाग (डीएएचडी) ने एनएडीसीपी के तहत गोजातीय बछड़ों के ब्रुसेला टीकाकरण के लिए एक राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया है और एएससीएडी के तहत रेबीज टीकाकरण किया गया है.

विभाग आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण पशु रोगों के लिए एक व्यापक राष्ट्रव्यापी निगरानी योजना भी कार्यान्वित कर रहा है. इस के अतिरिक्त, वन हेल्थ विजन के तहत, राष्ट्रीय संयुक्त प्रकोप प्रतिक्रिया दल (एनजेओआरटी) की स्थापना की गई है, जिस में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, आईसीएमआर, पशुपालन और डेयरी विभाग, आईसीएआर और पर्यावरण वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के विशेषज्ञ शामिल हैं. यह स्वास्थ्य दल अत्यधिक रोगजनक एवियन इन्फ्लुएंजा (एचपीएआई) के सहयोगी प्रकोप जांच में सक्रिय रूप से जुड़ा रहा है.

जागरूकता रोग की शुरुआती पहचान, रोकथाम और नियंत्रण में सहायक है, जिस से अंततः सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षित रहता है. जूनोटिक और गैरजूनोटिक रोगों के बीच के अंतर के बारे में जनता को शिक्षित करने से अनावश्यक भय को दूर करने में सहयोग मिलता है और पशु स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए अधिक सूचित दृष्टिकोण को बढ़ावा मिलता है.

यद्यपि जूनोटिक रोग महत्वपूर्ण सार्वजनिक स्वास्थ्य जोखिम की स्थिति को दर्शाते हैं, इस की पहचान करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि कई पशुधन रोग गैरजूनोटिक हैं और मानव स्वास्थ्य को प्रभावित नहीं करते हैं. इस अंतर को समझ कर और उचित रोग प्रबंधन पद्धितयों पर ध्यान केंद्रित कर के, हम पशु और मनुष्य दोनों के स्वास्थ्य को सुनिश्चित कर सकते हैं, जिस से सभी के लिए एक सुरक्षित और अधिक सुरक्षित पर्यावरण में योगदान मिल सके.

विश्व जूनोसिस दिवस लुई पाश्चर के सम्मान में हर साल मनाया जाता है, जिन्होंने 6 जुलाई, 1885 को एक जूनोटिक बीमारी, रेबीज का पहला सफल टीका लगाया था. यह दिन जूनोसिस के बारे में जागरूक करने, साथ ही ऐसी बीमारियां, जो जानवरों से मनुष्यों में फैल सकती हैं और इन के निवारक और नियंत्रण के उपायों को बढ़ावा मिलता है.

पशुधन डेटा के लिए मोबाइल एप्लिकेशन (Mobile Application)

नई दिल्ली : केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह ने पिछले दिनों विज्ञान भवन, नई दिल्ली में 21वीं पशुधन गणना की तैयारी के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को रणनीति बनाने और सशक्त करने के लिए कार्यशाला का उद्घाटन किया. इस अवसर पर मत्स्यपालन, पशुपालन एवं डेयरी राज्य मंत्री प्रो. एसपी सिंह बघेल और जार्ज कुरियन भी मौजूद थे. कार्यशाला में केंद्रीय मंत्री ने 21वीं पशुधन डेटा संग्रह के लिए विकसित मोबाइल एप्लीकेशन का भी शुभारंभ किया.

केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने भारत की अर्थव्यवस्था और खाद्य सुरक्षा के लिए पशुधन क्षेत्र का महत्व बताया. उन्होंने पशुधन गणना की सावधानीपूर्वक योजना बनाने और उसे लागू करने का आह्वान किया. उन्होंने कहा कि एकत्र किया गया डाटा, भविष्य की पहलों को आकार देने और क्षेत्र में चुनौतियों का समाधान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे.

केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्री राजीव रंजन सिंह ने बताया कि कार्यशाला का उद्देश्य सितंबरदिसंबर 2024 के दौरान निर्धारित आगामी पशुधन गणना के लिए एक समन्वित और कुशल दृष्टिकोण सुनिश्चित करना है.

केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन एवं डेयरी राज्य मंत्री प्रो. एसपी सिंह बघेल ने कार्यशाला को संबोधित किया और जमीनी स्तर पर व्यापक प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण की आवश्यकता बताई. उन्होंने इस तरह की रणनीतिक कार्यशाला आयोजित करने के लिए विभाग के प्रयासों की सराहना की और प्रतिभागियों को अपनी समझ और क्षमताओं को बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण सत्रों में सक्रिय रूप से शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया.

केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन एवं डेयरी राज्य मंत्री जार्ज कुरियन ने पशुधन क्षेत्र में मौजूदा प्रथाओं के एकीकरण पर बल दिया. उन्होंने बताया कि गणना के आंकड़े सतत विकास लक्ष्यों के राष्ट्रीय संकेतक ढांचे में योगदान देंगे, जिस से व्यापक राष्ट्रीय और वैश्विक स्थिरता लक्ष्यों के साथ तालमेल किया जा सकेगा.

पशुपालन एवं डेयरी विभाग की सचिव अलका उपाध्याय ने अपने संबोधन में इस कार्यशाला का महत्व बताते हुए कहा कि यह विभाग सटीक और कुशल डेटा संग्रह के लिए प्रौद्योगिकी का लाभ उठाने के लिए प्रतिबद्ध है. उन्होंने 21वीं पशुधन गणना की सफलता सुनिश्चित करने के लिए सभी हितधारकों की सामूहिक जिम्मेदारी पर बल दिया और कहा कि यह पशुपालन क्षेत्र की भविष्य की नीतियों और कार्यक्रमों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी. उन्होंने गणना की सफलता सुनिश्चित करने के लिए नवीनतम तकनीकों का लाभ उठाने का आग्रह किया.

कार्यशाला में 21वीं पशुधन गणना के लिए कार्यप्रणाली और दिशानिर्देशों पर विस्तृत सत्र, मोबाइल एप्लिकेशन और डैशबोर्ड सौफ्टवेयर पर प्रशिक्षण और प्रश्नों और चिंताओं के समाधान के लिए एक खुली चर्चा शामिल थी.

मत्स्यपालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय के पशुपालन एवं डेयरी विभाग ने 21वीं पशुधन गणना की तैयारी के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को रणनीति बनाने और सशक्त करने के लिए एक व्यापक कार्यशाला आयोजित की. कार्यशाला में कई सत्र आयोजित किए गए. इस दौरान पशुपालन सांख्यिकी प्रभाग ने 21वीं पशुधन गणना का संक्षिप्त विवरण दिया और बाद में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो द्वारा गणना में शामिल की जाने वाली प्रजातियों के नस्ल विवरण पर विस्तृत प्रस्तुति दी गई. सटीक नस्ल पहचान के महत्व पर जोर दिया गया. सटीक नस्ल पहचान, विभिन्न पशुधन क्षेत्र कार्यक्रमों में उपयोग किए जाने वाले सटीक आंकड़े तैयार करने और सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) के राष्ट्रीय संकेतक ढांचे (एनआईएफ) के लिए महत्वपूर्ण है.

चुनौती से भरा है पशुओं का इलाज (Treatment of animals)

छिंदवाडा : मानव स्वास्थ्य में पशु स्वास्थ्य का अहम योगदान है. पशुपक्षियों का स्वास्थ्य बिगड़ने पर इस का प्रतिकूल प्रभाव मानव पर भी पड़ता है. मानव स्वास्थ्य के क्षेत्र में तो हर रोग के लिए विशेषज्ञ हैं, परंतु पशु स्वास्थ्य का दायरा सीमित है. जितना ध्यान मानव स्वास्थ्य पर दिया जा रहा है, उतना ही पशु स्वास्थ्य एवं पर्यावरण स्वास्थ्य के प्रति भी सजगता होनी चाहिए, तभी हम समग्र स्वास्थ्य की बात कर सकते हैं. वाइल्डलाइफ हेल्थ पर भी पूरा ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है.

बर्ड फ्लू (एवियन इन्फ्लूएंजा) पर 2 दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला में ये विचार भारत सरकार के पशुपालन आयुक्त  अभिजीत मिश्रा ने व्यक्त किए.

प्रमुख सचिव, पशुपालन एवं डेयरी विभाग,  गुलशन बामरा ने कहा कि अभी पशु चिकित्सा के क्षेत्र में काफी चुनौतियां हैं, जिन्हें हमें दूर करना है. वर्ल्ड बैंक और भारत सरकार पशुपालन एवं डेयरी विभाग द्वारा एक बेहद सार्थक संगोष्ठी एवं परिचर्चा आयोजित की गई, जिस के लिए वे धन्यवाद के पात्र हैं. इस वैज्ञानिक परिचर्चा के निष्कर्ष निश्चित रूप से पशु स्वास्थ्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण साबित होंगे.

पीसीसीएफ, वाइल्ड लाइफ डा. अतुल वास्तव ने कहा कि पशुओं का इलाज बेहद चुनौतीपूर्ण है. मनुष्य तो अपनी बीमारी और परेशानी बता सकता है, लेकिन पशुओं के लक्षण देख कर ही बीमारी का इलाज करना होता है.

उन्होंने पशुओं के पंजीयन की भी आवश्यकता बताई. कार्यशाला में वर्ल्ड बैंक की वरिष्ठ कृषि अर्थशास्त्री डा. हीकूईपी, प्रमुख वैज्ञानिक डा. चंद्रधर तोष ने भी अपने विचार व्यक्त किए.

कार्यशाला में बर्ड फ्लू से संबंधित वैज्ञानिक परिचर्चा की गई. साथ ही, पशुओं में होने वाली अन्य नई बीमारियों और जेनेटिक डिजीज के परिपेक्ष में भी वन हेल्थ के विषय पर गहन चर्चा की गई.

कार्यशाला का आयोजन वर्ल्ड बैंक और पशुपालन एवं डेयरी विभाग के संयुक्त तत्वावधान में किया गया. कार्यशाला में असम, ओड़िसा, कर्नाटक, केरल, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, दिल्ली आदि राज्यों के पशु विशेषज्ञ एवं वाइल्ड लाइफ विशेषज्ञ उपस्थित हुए.

वर्ल्ड बैंक के विशेषज्ञ, राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशु रोग अनुसंधान प्रयोगशाला के वरिष्ठ वैज्ञानिक, राज्यों के पशुपालन एवं डेयरी विभाग एवं स्वास्थ्य विभाग अधिकारी, राष्ट्रीय स्तर की स्वास्थ्य संस्थानों के अधिकारी, वन विभाग और वन्य प्राणी विभाग से संबंधित अधिकारी व अन्य रोग अनुसंधान प्रयोगशालाओं के अधिकारी आदि शामिल हुए.

बायोकंटेनमेंट सुविधा के विकास के लिए राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के साथ हुआ समझौता

बागपत : मत्स्यपालन और डेयरी मंत्रालय के पशुपालन एवं डेयरी विभाग (डीएएचडी) ने पिछले दिनों सचिव, अलका उपाध्याय की उपस्थिति में राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) के साथ चौधरी चरण सिंह राष्ट्रीय पशु स्वास्थ्य संस्थान (सीसीएसएनएआईएच), बागपत में “बायोकंटेनमेंट सुविधा के उन्नयन और संबंधित मरम्मत कार्यों” के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए. इन कार्यों के लिए अनुमानित बजटीय व्यय 160 करोड़ रुपए का है और इसे 20 महीनों के भीतर पूरा करने की योजना है.

इस अवसर पर विभाग, सीसीएसएनआईएएच, बागपत और राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे. विभाग के तत्वावधान में बागपत की शीर्ष प्रयोगशाला सीसीएसएनआईएएच, भारत में उपयोग किए जाने वाले पशु चिकित्सा टीकों और निदान के गुणवत्ता मूल्यांकन के लिए एक राष्ट्रीय संस्थान है.

संस्थान की जैव नियंत्रण (बायोकंटेनमेंट) सुविधा साल 2010 में चालू की गई थी और संस्थान को पशु चिकित्सा जैविक एचएस (रक्तस्रावी सेप्टिसीमिया) और आरडी (रानीखेत रोग) के गुणवत्ता नियंत्रण परीक्षण के लिए भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा केंद्रीय औषधि प्रयोगशाला के रूप में मान्यता दी गई है.

अपनी तय भूमिका के अलावा, संस्थान को एलएच एंड डीसी कार्यक्रम के तहत एफएमडी, ब्रुसेला, पीपीआर और सीएसएफ टीकों के क्यूसी परीक्षण की जिम्मेदारी सौंपी गई है.

बदलती तकनीक और सुरक्षा मानकों को देखते हुए ऐसी सुविधाओं के संचालन के लिए जैव प्रौद्योगिकी विभाग, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय, भारत सरकार के दिशानिर्देशों का पालन करना और उन से प्रमाणन प्राप्त करना अनिवार्य है.

इस प्रकार, पशुधन स्वास्थ्य की चुनौतियों का सामना करने और विभिन्न राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय संगठनों द्वारा निर्धारित जैव सुरक्षा और उस के मानकों को पूरा करने के लिए इस सुविधा को उन्नत करने की योजना बनाई गई है.

प्रमुख संस्थान में जैव निरोध सुविधा के उन्नयन के प्रस्तावित कार्यों के साथ, विभाग ने बहुआयामी उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए जैसे कि राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पशु चिकित्सा सेवाएं, पशु चिकित्सा जैविक की गुणवत्ता नियंत्रण परीक्षण, वैक्सीन प्रभावकारिता और सुरक्षा के संदर्भ में गुणवत्ता नियंत्रण प्रोटोकाल का परिशोधन, पशुधन स्वास्थ्य कार्यक्रमों में सहायता, पशुधन स्वास्थ्य प्रोफिलैक्सिस और निदान के क्षेत्र में अनुसंधान और विकास और राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए एक मंच के रूप में काम करने के लिए सुविधा में परिवर्तन का लक्ष्य निर्धारित किया है.

इस के अलावा संस्थान में एक अत्याधुनिक पशु गृह निरोध सुविधा होगी, जो चिकित्सा और वैक्सीन अनुसंधान के क्षेत्र में अनुबंध और सहयोगी अनुसंधान के लिए एक मंच के रूप में काम करेगी.

प्रस्तावित कार्यों के कार्यान्वयन के माध्यम से विभाग के कार्य और क्षमता में वृद्धि के संदर्भ में निम्नलिखित लाभ की उम्मीद है:

– प्रयोगशाला प्रमाणन और सत्यापन के लिए जैव प्रौद्योगिकी विभाग के नवीनतम दिशानिर्देशों का अनुपालन और डीसीजीआई से पूर्ण सीडीएल स्थिति.

– सीसीएसएनआईएएच, बागपत देश का एकमात्र संस्थान है, जो बड़े और छोटे जानवरों पर नियंत्रक प्रयोग करने की क्षमता रखता है.

– पशुधन स्वास्थ्य के क्षेत्र में नई चुनौतियों (जैसे, लंपी स्किन डिजीज, एवियन इन्फ्लूएंजा, ग्लैंडर्स रोग आदि) के लिए तैयार रहना.

– टीका परीक्षण, पशु प्रयोग, प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण और सरकारों व गैरसरकारी एजेंसियों की गुणवत्ता नियंत्रण आवश्यकताओं की पूर्ति के माध्यम से संशोधित राजस्व सृजन मौडल के साथ आत्मनिर्भरता के लिए संस्थान की क्षमता में वृद्धि.

– “राष्ट्रीय एक स्वास्थ्य मिशन के तहत बीमारियों के प्रकोप की जांच और महामारी की तैयारी” के लिए प्रमुख संस्थान के रूप में काम करना.

– राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए अधिक अवसर.

सीसीएसएनआईएएच, बागपत में जैव नियंत्रण सुविधा के उन्नयन और संबंधित मरम्मत के कामों को राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) को सौंपा गया है. एनडीडीबी मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के तहत संसद के एक अधिनियम द्वारा स्थापित एक वैधानिक निकाय है और इस में जैव नियंत्रण सुविधाओं के निर्माण और रखरखाव के लिए एक विशेष प्रभाग है.

एनडीडीबी ने हाल के वर्षों में देशभर में पशुधन स्वास्थ्य क्षेत्र में कई जैव नियंत्रण प्रयोगशालाओं और संबंधित बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं को पूरा किया है, जिन में आईसीएआर-राष्ट्रीय खुरपका व मुंहपका रोग संस्थान, भुवनेश्वर, आईसीएआर-राष्ट्रीय उच्च सुरक्षा पशु रोग सुविधा संस्थान, भोपाल, प्रयोगशाला और पशु परीक्षण इकाई, टीएएनयूवीएएस, आईसीएआर-राष्ट्रीय पशु चिकित्सा महामारी विज्ञान और रोग सूचना विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु, वैक्सीन निर्माण इकाइयां आदि शामिल हैं.

बकरीपालन (Goat Rearing) पर तीनदिवसीय ट्रेनिंग, 9 जुलाई से

टीकमगढ़ : उद्यमिता विकास केंद्र मध्य प्रदेश (सेडमैप) द्वारा पशुपालन विशेषकर बकरीपालन पर  आधारित तीनदिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम 9 जुलाई से है. प्रशिक्षण के लिए आवेदन करने की अंतिम तिथि 20 जून है.

सेडमैप की कार्यकारी संचालक मती अनुराधा सिंघई ने बताया कि प्रशिक्षण के इच्छुक युवाओं की बढ़ती तादाद को देखते हुए इस वर्ष प्रशिक्षण का तीसरा बैच संचालित किया जा रहा है. उद्यमिता भवन अरेरा हिल्स में 9 से 11 जुलाई तक आयोजित प्रशिक्षण में पशुपालन से संबंधित स्वरोजगार, नियमप्रक्रियाओं और शासकीय योजनाओं आदि की जानकारी दी जाएगी.

उन्होंने बताया कि अत्याधुनिक तरीके से पशुपालन कैसे करें, इस बारे में विषय विशेषज्ञ मार्गदर्शन प्रदान करेंगे. इच्छुक व्यक्तियों की जिज्ञासाओं का समाधान भी किया जाएगा. पशुपालन पर आधारित स्वरोजगार के इच्छुक व्यक्ति अधिक जानकारी के लिए मोबाइल नंबर 8770555820 पर संपर्क कर सकते हैं.

भेड़बकरियों की बीमारी (Sheep-Goat Disease) न बने महामारी

गरीब और मध्यम तबके के किसानों व खेतिहर मजदूरों के लिए भेड़बकरी पालना फायदे का सौदा साबित होता है. घरेलू तौर पर भी इन्हें बहुत से किसान मजदूर पालते हैं. छोटे किस्म के पशुओं के लिए न तो बहुत जगह की जरूरत होती है और न ही इन के लिए चारे का बहुत ज्यादा बंदोबस्त करना पड़ता है. घरेलू साग, फल, सब्जी के अलावा खेत की घास या पेड़ों की पत्तियां वगैरह ऐसे अनेक घरेलू खाद्य पदार्थ होते हैं जो ये सब खाते हैं.

भेड़बकरियां आमतौर पर साल में 2 बार बच्चे देती हैं, जिस से इन की तादाद में इजाफा होता है जिस से पशुपालकों की आमदनी भी बढ़ती है.

कभीकभी ये पशु बीमार भी हो जाते हैं जिन का ध्यान रखना भी जरूरी है. पशुओं में संक्रामक बीमारियां होना आम होता है. इन संक्रामक बीमारियों को अनेक नामों से जाना जाता है.

कई दफा भेड़बकरियों में तेज बुखार होता है, मुंह और जीभ में छाले हो जाते हैं. दस्त और निमोनिया के लक्षण दिखने लगते हैं.

ज्यादा दस्त होने से जानवरों के शरीर में पानी की कमी हो जाती है, उन की चमड़ी चिपकीचिपकी सी हो जाती है, पशु सूखने लगता है और बीमार पशु चारापानी खाना बंद कर देता है या कम खाता है.

कई बार पशुओं की आंख, नाक और मुंह से पानी आने लगता है. बाद में उन की हालत खराब हो जाती है और ज्यादा बीमार होने पर कई दफा वह पशु मर भी जाता है.

अगर भेड़बकरियों में इस तरह के लक्षण दिखाई दें तो पशुपालक को सचेत हो जाना चाहिए. यह पशुओं में महामारी के लक्षण भी हो सकते हैं. किसी एक पशु में भी अगर यह लक्षण हो तो उस के साथ में रहने वाले दूसरे पशु भी इस की चपेट में आ सकते हैं.

ऐसे समय में बीमार पशु को तुरंत ही सेहतमंद पशुओं से अलग रखें. बीमार पशु की बीमारी की रोकथाम के तुरंत उपाय करें और किसी अच्छे पशुचिकित्सक को दिखाएं.

कैसे करें बचाव

* बीमार पशु को सहतमंद पशुओं से तुरंत अलग कर दें. उस को चारापानी अलग से दें.

* अगर आप किसी दूसरी जगह से पशु लाए हैं या खरीद कर लाए हैं तो उस को कुछ दिनों तक दूसरे पशुओं से अलग रखें.

* पशुओं को समयसमय पर टीके लगवाएं. टीका लगवाने से भेड़बकरियों पर बीमारी हमला नहीं कर पाती है.

सरकार के पशुपालन विभाग द्वारा पशुओं को?टीके मुफ्त में लगाए जाते हैं. आप इस बारे में अपने नजदीकी पशु अस्पताल के डाक्टर से सलाह ले सकते हैं. पशु की किसी भी बीमारी को हलके में न लें. वह बड़ी बीमारी भी हो सकती है जो महामारी का रूप ले सकती?है. इसलिए सुरक्षा ही बेहतर बचाव है. समय पर टीके लगवाने और सही देखभाल से आप अपने पशु से ज्यादा फायदा ले सकते हैं.

पशुओं के नवजातों (Newborn Animals) में खीस का महत्व

पशुओं के नवजात बच्चों के जन्म से ले कर युवा अवस्था तक अच्छी प्रबंधन व्यवस्था, पशुओं और किसानों दोनों के लिए एक सफल और लाभदायक है. नवजात पशु के अच्छे  स्वास्थ्य के लिए खीस प्रबंधन बहुत महत्वपूर्ण है.

ब्यांने के बाद गाय जो पहला पीला और गाढ़ा दूध देती है, उसे ‘कोलोस्ट्रम’ यानी ‘खीस’ कहा जाता है. नवजात बच्चे के लिए यह दूध बहुत ही गुणकारी है, क्योंकि यह उन्हें संक्रामक रोगों से बचाता है. पोषक तत्वों और एंटीबौडी से यह भरपूर होता है. खीस में मौजूद एंटीबौडीज नवजात बच्चे को उन की शुरुआती सुरक्षा प्रदान करते हैं.

लगभग सौ साल पहले एक शोध से यह पता चला था कि जिन नवजात बछड़ों को दूध पिलाया गया था, उन में से कई की मृत्यु दस्त लगने के कारण हो गई थी, जबकि जिन बछड़ों को जन्म के बाद ही खीस खिलाया गया, वे स्वस्थ रहे. इसलिए यह माना गया कि खीस में कुछ महत्वपूर्ण तत्व होते हैं, जो नवजात पशु को प्रतिरक्षा (बीमारियों से बचाव) प्रदान करते हैं और ब्यांत के बाद मृत्यु दर को काफी कम करते हैं.

जन्म के तुरंत बाद नवजात बछड़े में बीमारी से सुरक्षा का अभाव होता है, क्योंकि एंटीबौडी गाय की नाल से हो कर भ्रूण के संचार तंत्र तक नहीं पहुंच पाती है, इसलिए उन्हें संक्रामक रोग होने का खतरा हमेशा बना रहता है. हालांकि नवजात बछड़े में एंटीबौडी पैदा करने की क्षमता होती है, लेकिन यह क्षमता बहुत कम होती है.

नवजात बछड़े  दस्त और पेट की समस्याओं से पीड़ित रहते हैं. मनुष्यों में यह गर्भावस्था के दौरान मां से नवजात शिशु में मिल जाता है, इसलिए उन में जन्म से पहले ही बीमारियों से लडने की क्षमता होती है, वहीं पशुओं में यह प्रणाली जन्म के समय विकसित नहीं होती है. इसलिए, नवजात पशुओं को संक्रामक रोगों से बचाना बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है.

खीस में मातृ एंटीबौडी या विभिन्न प्रकार की प्रतिरक्षा कोशिकाएं मौजूद होती हैं, जो नवजात को संक्रामक रोगों से बचाती हैं. ये एंटीबौडीज बड़े आकार के प्रोटीन अणुओं से बनते हैं. यदि संक्रामक रोगों के रोगाणु नवजात पर हमला करते हैं, तो ये प्रतिरक्षा कोशिकाएं उन रोगाणुओं से जुड जाती हैं और उन्हें नष्ट कर देती हैं. खीस में मौजूद एंटीबौडीज नवजात बछडों को संक्रामक रोगों से बचाता है.

खीस पिलाने का उचित समय

यदि जन्म के तुरंत बाद खीस नहीं पिलाया जाता है, तो नवजात में प्रतिरक्षा कोशिकाओं को अवशोषित करने की क्षमता कम हो जाती है, इसलिए खीस को एक घंटे के भीतर नवजात को जरूर देना चाहिए.

इसलिए जन्म के बाद नवजात बछड़े को जितनी जल्दी हो सके यानी जन्म के 2 घंटे के भीतर खीस देना चाहिए. नवजात को बीमारी के खिलाफ प्रतिरक्षा प्राप्त करने के लिए अधिमानतः 6 घंटे के भीतर और निश्चित रूप से जन्म के 12 घंटे के भीतर खीस जरूर देना चाहिए.

यदि 12 घंटे के भीतर भी नवजात को खीस न पिलाई गई हो, तो जन्म के 24 से 28 घंटों के भीतर खीस का सेवन करा देना चाहिए. जन्म के 48 घंटों के बाद नवजात को खीस खिलाने का बहुत कम या कोई लाभ नहीं होता है.

खीस की मात्रा

नवजात को उस के शरीर के वजन का 1/10 भाग के बराबर खीस पिलानी चाहिए यानी हर 10 किलोग्राम शरीर के वजन के लिए 1 किलोग्राम खीस दिया जाना चाहिए. उदाहरण के लिए, यदि नवजात का वजन 25 किलोग्राम है, तो इसे पूरे दिन में 2.5 किलोग्राम खीस 3 बराबर भागों में बांट कर दिया जाना चाहिए.

आमतौर पर पशुपालकों के बीच यह गलत सोच रहती है कि खीस पिलाने से नवजात की मृत्यु हो सकती है और खीस निकलने से गाय या भैंस अपना वजन कम कर लेती है, इसलिए  पशुपालक न तो खीस निकालते हैं और न ही नवजात बछडों को खीस पीने देते हैं. यह वजह पशुओं और नवजात दोनों की सेहत के लिए ठीक नहीं है.

यदि गाय ब्यांने के बाद दूध नहीं दे रही है  या ब्यांने के दौरान मर गई है और नवजात को खीस उपलब्ध नहीं हो सका है, तो उन्हें किसी दूसरी गाय का खीस भी दिया जा सकता है. खीस के अभाव की स्थिति में 560 मिलीलिटर दूध, 280 मिलीलिटर पानी, 1/2 चम्मच अरंडी का तेल और एक फेंटा हुआ पूरा अंडा अच्छी तरह मिला लें. यह मिश्रण नवजात को 5 दिनों तक देना चाहिए. इस से नवजात का पाचन तंत्र भी साफ होता है और कार्यक्षमता भी बढ़ती है.

खीस में जरूरी पोषक तत्व, विटामिन, खनिज और जैविक योगिक होते हैं, जो नवजात के अच्छे विकास और वृद्धि के लिए जरूरी है. यह परिपक्व दूध की तुलना में प्रोटीन, वसा, और ऊर्जा के स्तर में परिपूर्ण होता है. खीस में दूध की तुलना में अधिक मात्रा में प्रोटीन (14 फीसदी) होता है, जो बछड़े के विकास में मदद करता है.

दूध की तुलना में खीस में वसा की मात्रा 6-10 फीसदी तक अधिक होती है. यह उच्च वसा जीवन के शुरुआती दिनों के दौरान नवजात शिशु की चयापचय जरूरतों के लिए आवश्यक ऊर्जा प्रदान करती है. खीस में कैल्शियम, फास्फोरस और आयरन भरपूर होता है.

खीस नवजात की कोशिका वृद्धि, ऊतक मरम्मत और पेशियों की वृद्धि और विकास को प्रोत्साहित करता है, जो नवजातों में तेजी से वजन बढ़ाने और पेशियों के विकास को मजबूत बनाता है. इस के अलावा खीस पोषण अवशोषण, आंतों के विकास और अच्छे जीवाणुओं के संवर्धन को बढ़ाते हैं, इसलिए क्रिया विकास को प्रोत्साहित करते हैं और नवजात के विकास के लिए मूल बुनियाद रखते हैं.

वैज्ञानिक विधि द्वारा करें पशुओं का प्रबंधन (Animal Management)

पशुधन और खेती दोनों एकदूसरे पर निर्भर हैं. भारत की 70 फीसदी आबादी गांवों में रहती है और खेती के कामों से जुड़ी है. खेती के कामों में पशुओं का काफी महत्त्व है. पशुधन ने पिछले साल भारतीय सकल घरेलू उत्पाद में 4 फीसदी और कृषि सकल घरेलू उत्पाद में 21 फीसदी योगदान दिया है.

यह सच है कि पशुओं पर जलवायु का बहुत गहरा असर पड़ता है और उन के मुताबिक ही उन की शारीरिक बनावट भी होती है. ज्यादा बारिश होने वाली जगहों के पशु सूखी जगहों के अपेक्षा छोटे कद के होते हैं. इन जगहों के पशु ज्यादा सेहतमंद होते हैं जबकि कम बारिश होने वाली जगहों के पशु छोटे व कमजोर होते हैं.

स्थानीय जलवायु में बदलाव लाना तो इनसान के लिए मुमकिन नहीं है, पर वैज्ञानिक विधि को अपना कर हम अपने पशुओं की सेहत को ज्यादा सही रख सकते हैं.

पशुओं की वैज्ञानिक तरीके से देखरेख व प्रबंधन कर पशुओं को सेहतमंद रखने के लिए संतुलित भोजन, अच्छी तरह से देखभाल करना बहुत जरूरी है. धूप, ठंड और बारिश से भीगने से बचाने के लिए उन्हें पशुशालाओं में रखने की जरूरत होती है.

हमारे देश में पशुओं को अंधेरी बंद और छोटी कोठरियों में रखने का चलन है जहां न तो हवा, पानी और रोशनी का कोई पुख्ता इंतजाम होता है और न ही पशुओं द्वारा किए गए मलमूत्र को जाने के लिए कोई नाली होती है.

इतना ही नहीं, पशुओं को भीगे कच्चे फर्श पर बैठना होता है जिस से उन्हें बड़ा कष्ट होता है और वे सेहतमंद नहीं रह पाते हैं. इसलिए जरूरी है कि पशुओं के ठहरने का समुचित इंतजाम किया जाए. हर पशु के रहने के लिए खुली जगह होनी चाहिए. इस के लिए जरूरी है कि पशुशालाएं आरामदेह, साफसुथरी, खुली जगह पर हों, जिन में रोशनी और हवा आजा सके.

बारिश में खुले आंगन की कीचड़ से पशुओं को बचाने के लिए ईंट बिछवा लेनी चाहिए. पशुओं के बैठने की जगह पर कीचड़ होने से अनेक तरह की बीमारियां हो सकती हैं. रोजाना पशुशाला की साफसफाई की जाए. इस के लिए सुबहशाम दोनों समय पशुशाला साफ पानी से धो कर साफ रखनी चाहिए. पशुशाला में रोजाना फिनाइल भी डाली जानी चाहिए.

भोजन की व्यवस्था

पशुओं के खाने के लिए संतुलित भोजन की व्यवस्था करनी चाहिए. पशुओं का भोजन पौष्टिक, मुलायम, रुचिकर व साफ होना चाहिए. हरा चारा, खली, भूसा और लवण मिश्रण, नमक को सही मात्रा में देने से उन की सेहत अच्छी बनी रहती है.  साथ ही, दूध भी ज्यादा देते हैं.

पशुओं को बासी या जूठा खाना नहीं खिलाना चाहिए. पशु को खिलाने के लिए दाने का मिश्रण सही अवयवों को ठीक अनुपात में मिला कर बनाना जरूरी है.

साफ पानी का प्रबंधन

पशुओं को साफ पानी पिलाएं. पानी की अहमियत इस बात से और भी साफ हो जाती है कि पशुओं के शरीर में 57 फीसदी पानी होता है.

इतना ही नहीं, पशुओं के दूध में 80 फीसदी पानी होता है. गंवई इलाकों में पशुओं को पानी पिलाने की बड़ी दिक्कत रहती है.

ज्यादातर पशु पोखरों का गंदा पानी पीते हैं. यही वजह है कि वहां के पशु तमाम बीमारियों से पीडि़त रहते हैं. आमतौर पर गांवों में साफ पानी की कमी नहीं होती लेकिन पशुपालक अपनी नासमझी के चलते पशुओं को मैला और सड़ा हुआ गंदा पानी पीने के लिए देते हैं. इस से पशुओं की सेहत पर बुरा असर पड़ता है, इसलिए पशुओं को अपनी इच्छानुसार ही हैंडपंप या कुएं का साफ पानी पीने को देना चाहिए.

खुरैरा करना

पशुओं पर खुरैरा करने पर शरीर की धूल और उखड़े बाल अलग हो जाते हैं. इस के अलावा खुरैरा करने से गायों को बड़ा आराम मिलता है और उन के शरीर में खून के दौरे की गति बढ़ जाती है, इसलिए पशुपालकों को नियमित रूप से खुरैरा करना चाहिए.

व्यायाम

पशुओं को सेहतमंद रखने के लिए उन्हें थोड़ाबहुत व्यायाम देने की बहुत जरूरत होती है लेकिन व्यायाम का यह मतलब कतई नहीं है कि उन को इधरउधर भगाया जाए. अगर गाय या भैंस हर दिन चारागाह में चरने के लिए भेजी जाती हैं तो उन का व्यायाम हो जाता है.

रोगी पशु की जांच

पशु किसी रोग से पीडि़त तो नहीं है, इस बात की जांच अच्छी तरह से कर लेनी चाहिए और जो पशु किसी भी बीमारी से पीडि़त हों उसे वहां से हटा कर उपचार करना चाहिए, वरना किसी एक पशु के भी रोगी होने पर यह बीमारी दूसरे पशुओं में बड़ी जल्दी फैल सकती है. समयसमय पर पशुओं को जरूर टीका लगवाएं.

सर्दी के मौसम में पशुओं को ठंड, ओस व कुहरे से बचाने के लिए उन्हें गरम जगह पर, छत के नीचे, फूस व छप्पर के नीचे रखना चाहिए. रात में पशुओं को कभी भी खुले में नहीं बांधना चाहिए. ठंड से बचाव के लिए फर्श पर पुआल बिछा दें. ज्यादा ठंड होने पर पशु के शरीर को गरम रखने के लिए उस के शरीर पर कपड़ा या जूट की बोरी बांध दें. पशुशाला को गरम रखने के लिए अलाव का इस्तेमाल सावधानी से करना चाहिए.

समय की पाबंदी

यह जरूरी है कि पशुओं को समय पर भोजन मिले, समय पर पानी पिलाया जाए और उस के दूध दुहने का भी एक तय समय हो. चारा खिलाने व दूध दुहने के समय में जरा सी भी देरी होने पर पशु चंचल हो उठेगा और उस के उत्पादन पर उलटा असर पड़ेगा.

जो आदमी पशु को पानी पिलाता है, चारादाना खिलाता है या उसे एक जगह से हटा कर दूसरी जगह ले जाता है, उस से वह जल्दी ही हिलमिल जाता है इसलिए बारबार ग्वालों का उलटफेर जरूरी नहीं है. यदि उन्हें हर दिन एक ही ग्वाले से दुहाया जाए तो और भी सही रहेगा. पशु को मारनापीटना भी नहीं चाहिए.

जीवों के लिए टैंकर से पानी, रूमा देवी फाउंडेशन की मुहिम

बाड़मेर: तपती गरमी के मौसम में एक ओर जहां आम जनजीवन पर असर होता है, वहीं दूसरी तरफ पशुधन का गरमी से बचाव करना भी  जरूरी  हो जाता है. अनेक इलाकों में गरमी के समय पशुचारे के साथसाथ पानी की भी समस्या  हो जाती है खासकर गरमी में तप रहे राजस्थान के रेगिस्तान में इनसानों के साथसाथ पशुपक्षी भी पीने की पानी की समस्या से त्रस्त दिखाई दे रहे हैं.

कई इलाकों में पेयजल की गंभीर समस्या बनी हुई है, जिसे देखते हुए सामाजिक कार्यकर्ता व फैशन डिजाइनर डा. रूमा देवी ने ऐसे जरूरतमंद गांवों में मीठे पानी के टैंकर भिजवाने के साथ ही राहत का काम शुरू कर दिया है.

रूमा देवी फाउंडेशन (Ruma Devi Foundation)

रूमा देवी ने बताया कि सूखे पड़े सार्वजनिक टांके, होदी, कुंड आदि की जानकारी प्राप्त कर उन की सफाई कर के वहीं के नजदीकी पेयजल स्त्रोत से ट्रैक्टर में पानी ला कर इन टांकों व कुंड में भरा जा रहा है. ग्रामीण इलाकों में मानसून के आने तक अगले एक महीने तक यह मुहिम जारी रहेगी.

पश्चिम राजस्थान के बाड़मेर व बालोतरा जिले में लगभग 2,000 टैंकर इस फाउंडेशन व जनसहयोग से उपलब्ध करवाने का काम जारी रहने वाला है. फाउंडेशन की जलसेवा मुहिम से प्रसन्न हो कर मुंबई के संत दुलाराम कुलरिया ट्रस्ट, प्रकाश फाउंडेशन और सुरत की टेक्सटाइल एशोसिएशन भी उन के साथ इस काम में उन की मदद कर रही हैं.