डेरी पशुओं (Dairy Animals) में मौसम का असर

जब भी बहुत ज्यादा गरम नम या गरम शुष्क वातावरण होता है, तब पशु सामान्यतौर पर जीभ बाहर निकाल कर और अधिक से अधिक पसीना निकाल कर अपनी ऊर्जा को खर्च करते हैं, जिस से उन के शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है.

यह पशुओं के लिए जो एक स्वाभाविक और प्राकृतिक क्रिया है, लेकिन कभीकभी पशुओं के शरीर ऊष्मा बाहर निकालने की क्षमता, पसीना निकालना, जीभ बाहर निकलना जैसी प्राकृतिक क्रियाओं से भी शारीरिक तापमान नियंत्रित नहीं हो पाता, जिसे ऊष्मीय तनाव कहा जाता है.

तापमान, जिस के ऊपर ऊष्मीय तनाव हो सकता है :

  • संकर और विदेशी नस्ल की गायों में  26० सैंटीग्रेड से ऊपर.
  • देशी नस्ल की गायों में 33० सैंटीग्रेड से ऊपर.
  • भैंसों में 36० सैंटीग्रेड से ऊपर.

ऊष्मीय तनाव से पशुपालकों को कई प्रकार से माली नुकसान हो सकता है, जैसे :

  • दूध उत्पादन में कमी.
  • कम प्रजनन दक्षता.
  • मंदहीनता.
  • गर्भधारण दर में कमी.

संवेदनशील पशु

देशी नस्ल की गायों की अपेक्षा संकर और विदेशी नस्ल की गाय ऊष्मीय तनाव के प्रति ज्यादा संवेदनशील होती हैं. भैंसों की मोटी व काली चमड़ी होने और गायों की तुलना में कम पसीना ग्रंथि होने के कारण भैंस ऊष्मा का खर्च ठीक प्रकार से नहीं कर पाती, जिस से उन में ऊष्मीय तनाव का ज्यादा बुरा असर होता है.

ऊष्मीय तनाव को कम करने के लिए उचित प्रबंधन इस प्रकार है :

* पशुशाला की ऊंचाई बीच से 15 फुट और आसपास से 10 फुट होनी चाहिए. उस की लंबी तरफ पूर्वपश्चिम दिशा की ओर होनी चाहिए.

* पशुशाला की बाहरी छत की पुताई सफेद सीमेंट से करने से सूरज की किरणें परावर्तित होंगी व पशुशाला में ठंडक बनी रहेगी.

* पशुशाला के आसपास पेड़पौधे लगाना.

* पशुशाला की दीवारों पर घूमने वाले पंखे लगाना.

* फव्वारे लगाना.

* पंखों के आसपास एक गोले के रूप में फव्वारे लगाना.

* पशुओं को दोपहर में नहलाना.

* कट्टे के परदे लगाना व उन पर पानी का छिड़काव करना.

* ठंडे व स्वच्छ पीने योग्य पानी की पर्याप्त व्यवस्था करना.

* पशुओं के नहाने के लिए टैंक की व्यवस्था करना.

सांड़ के वीर्य की नली को देख कर नस्ल की पहचान

अकसर आप ने यह देखा होगा कि हीट या गरमी में आई हुई गायभैंसों में कृत्रिम गर्भाधान या एआई करने वाला पशुमित्र अपने साथ एक कंटेनर या पात्र ले कर चलता है, जिस में सीमन की स्ट्रा या वीर्य की नलियां एक गैस (तरल नाइट्रोजन) में संरक्षित होती है. वह उस में से एक नली निकालता है और उसे कुनकुने पानी में पिघला कर एक पाइप में डालता है और एआई गन के जरीए गाय या भैंस की बच्चेदानी में छोड़ देता है. उस के बाद उस पाइप में खाली स्ट्रा रह जाती है, जिसे वह फेंक देता है.

अगर उस पाइप में से खाली स्ट्रा को निकाल कर देखें, तो आप बाहर से यह पता लगा सकते हैं कि उस पशुमित्र या एआई करने वाले आदमी ने किस नस्ल के सांड़ के वीर्य या बीज का इस्तेमाल किया है.

सांड़ की नस्ल की पहचान 2 तरह से की जा सकती है :

* स्ट्रा या नली के रंग द्वारा.

* स्ट्रा या नली पर अंकित इंगलिश के कोड द्वारा.

स्ट्रा या नली के रंग द्वारा सांड़ की नस्ल की पहचान : केंद्र सरकार ने सांड़ के वीर्य उत्पादन के बाद स्ट्रा की पहचान के लिए अलगअलग नस्लों के लिए स्ट्रा के अलगअलग रंग तय किए हैं, जिन्हें देख कर सांड़ की नस्ल का पता लगाया जा सकता है :

* होलस्टीन फे्रजियन (एचएफ)- गुलाबी रंग.

* एचएफ संकर (एचएफ क्रौस ब्रीड)-पिस्ता जैसा हरा रंग.

* जर्सी नस्ल-पीला रंग.

* जर्सी क्रौस ब्रीड-पीच या आड़ू जैसा रंग.

* देशी नस्ल-नारंगी रंग.

* सुनंदिनी नस्ल-नीला रंग.

* भैंस-सलेटी रंग.

कभीकभी ऊपर बताए गए रंगों में से कोई भी रंग उपलब्ध न होने पर वीर्य को पारदर्शी स्ट्रा में रखा जा सकता है.

स्ट्रा या नली पर अंकित इंगलिश के कोड द्वारा : वीर्य की स्ट्रा या नली पर इंगलिश के अक्षरों में कुछ कोड छपे हुए होते हैं, जिस में सांड़ का नंबर, उस की नस्ल आदि की जानकारी होती है, जिन्हें देख कर सांड़ की नस्ल का पता लगाया जा सकता है :

जेवाई – जर्सी.

एचएफ – एचएफ.

सीबी एचएफ – एचएफ क्रौस.

सीबी जेवाई – जर्सी क्रौस.

एसयूएन – सुनंदिनी.

एसएएच – साहीवाल.

आरएस – लाल सिंधी.

केएएनके – कांकरेज.

जीआईआर- गिर.

टीएचएआर – थारपारकर.

आरएटीएचआई – राठी.

एचएआर – हरियाणा.

ओएनजीएल – अंगोल.

डीईओएनआई – देवनी.

डीएएनजीआई – डांगी.

एएमएचएल – अमृतमहल.

एमबीएफ – मुर्रा भैंस.

एसबीएफ – सूरती भैंस.

जेबीएफ – जाफराबादी भैंस.

एमएसएनबी – मेहसाणा भैंस.

एनएलआरवीबी – नीली रावी भैंस.

बीबीएफ – बन्नी भैंस.

बीडीबीएफ – भदावरी भैंस.

पीएनपीबी- पंधारपुरी भैंस.

ऊपर बताए गए रंग और कोड के आधार पर पशुपालक सांड़ की नस्ल पहचान सकते हैं. उदाहरण के तौर पर, अगर किसी स्ट्रा का रंग नारंगी है और

उस पर कोड एसएएच दर्ज है, तो नारंगी रंग से हमें यह पता चल गया कि यह तय रूप से देशी नस्ल के सांड़ का वीर्य है और कोड एसएएच से हमें पता चल गया कि यह साहीवाल नस्ल के सांड़ का बीज है.

समुद्री शैवाल की खेती

कच्छ: केंद्रीय मत्स्यपालन, मछुआरा समाज, मत्स्यपालन स्टार्टअप पूरे भारत में समुद्री शैवाल की खेती को अपनाने और समुद्री शैवाल की खेती को बढ़ावा देने के लिए पशुपालन और डेयरी मंत्री, परषोत्तम रूपाला ने राष्ट्रीय सम्मेलन की अध्यक्षता की.

कच्छ सीट से मत्स्य विभाग के सचिव डा. अभिलक्ष लिखी, मत्स्य विभाग की संयुक्त सचिव नीतू कुमारी प्रसाद, मत्स्य विभाग के संयुक्त सचिव सागर मेहरा, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के उपमहानिदेशक डा. जेक. जेना, सीमा सुरक्षा बल के महानिरीक्षक अभिषेक पाठक, राष्ट्रीय मत्स्य विकास परिषद के सीई डा. एलएन मूर्ति, गुजरात सरकार के निदेशक (एफवाई) नितिन सांगवान और अन्य गणमान्य व्यक्ति इस अवसर पर मौजूद थे.

केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री (एफएएचडी) परषोत्तम रूपाला ने प्रतिभागियों, मछुआरों और मछुआरा महिलाओं को संबोधित किया और समुद्री शैवाल की खेती के महत्व पर जोर दिया. उन्होंने व्यापक उत्पाद अवसरों को ध्यान में रखते हुए मछुआरों और मछुआरा महिलाओं को समुद्री शैवाल की खेती अपनाने के लिए भी प्रोत्साहित किया.

मंत्री परषोत्तम रूपाला ने यह भी कहा कि यह समुद्री शैवाल की खेती पर पहला राष्ट्रीय सम्मेलन है, जो समुद्री शैवाल उत्पादों के रोजगार सृजन का एक विकल्प है, क्योंकि यह समुद्री उत्पादन में विविधता लाता है और मछली किसानों की आय बढ़ाने के अवसरों को बढ़ाता है.

Seaweedउन्होंने यह भी कहा कि यह पारंपरिक मछली पकड़ने पर निर्भरता कम करता है और तटीय समुदायों की आजीविका में विविधता लाता है.

केंद्रीय मंत्री परषोत्तम रूपाला ने यह भी बताया कि कोरी क्रीक का पायलट प्रोजैक्ट समुद्री शैवाल की खेती के लिए गेमचैंजर हो सकता है. इसलिए हम यहां समुद्री शैवाल की खेती स्थल पर एकत्र हुए हैं. समुद्री शैवाल की खेती को सफल बनाने के लिए उन्होंने सभी हितधारकों से अपने सुझाव और इनपुट के साथ आगे आने का आह्वान किया.

मत्स्य विभाग के सचिव डा. अभिलक्ष लिखी ने समुद्री शैवाल की खेती की चुनौतियों और अवसरों पर प्रकाश डाला. उन्होंने समुद्री शैवाल मूल्य श्रंखला में चुनौतियों का आकलन करने और समाधान खोजने की आवश्यकता पर जोर दिया.

उन्होंने आगे यह भी कहा कि सरकार का लक्ष्य समुद्री शैवाल उत्पादन में नवाचार करना, नीतिगत ढांचे, विनियमों पर विचारविमर्श करना, नैटवर्किंग के अवसरों को सुविधाजनक बनाना और रिश्तों को बढ़ावा देना है.

उन्होंने यह भी बताया कि समुद्री शैवाल मूल्य श्रंखला की इंडटूइंड मैपिंग और मूल्य श्रंखला में बाधाओं को संबोधित करना समय की मांग है और हमारा विभाग इस के लिए प्रतिबद्ध है.

केंद्रीय मंत्री परषोत्तम रूपाला ने अन्य गणमान्य व्यक्तियों के साथ मत्स्यपालन स्टार्टअप जैसे कि क्लाइमैक्रू (गुजरात) और पुकाई एक्वाग्री (आंध्र प्रदेश), अनुसंधान संस्थानों अर्थात आईसीएआर- सैंट्रल मरीन फिशरीज रिसर्च इंस्टीट्यूट (सीएमएफआरआई), सीएसआईआर – सेंट्रल साल्ट मरीन कैमिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट, रसायन अनुसंधान संस्थान (सीएसएमसीआरआई) और आईसीएआर-केंद्रीय मत्स्य प्रौद्योगिकी संस्थान (सीआईएफटी) और एनएफडीबी (भारत सरकार) द्वारा स्थापित प्रदर्शनी के विभिन्न स्टालों का दौरा किया. स्टालों में समुद्री शैवाल के मूल्यवर्धित उत्पादों और खेती की प्रक्रियाओं और प्रयुक्त सामग्री का प्रदर्शन किया गया.

केंद्रीय मंत्री परषोत्तम रूपाला ने प्रदर्शनी में भाग लेने वाले उद्यमियों और वैज्ञानिकों से बातचीत की.

केंद्रीय मंत्री परषोत्तम रूपाला को सीमा सुरक्षा बल की हाई स्पीड नौका से कोरी क्रीक परियोजना स्थल पर गए और समुद्री खरपतवार की खेती के विभिन्न तरीकों को देखा. समुद्री शैवाल विकास पर राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान गुजरात के कच्छ जिले के कोरी क्रीक में सीएमएफआरआई, सीएसएमसीआरआई और एनएफडीबी पायलट परियोजनाओं की ओर से मोनोलिन, ट्यूबनैट और राफ्ट भी प्रदर्शित की गईं.

Seaweedमंत्री परषोत्तम रूपाला ने अत्याधुनिक समुद्री शैवाल खेती देखी, राफ्ट कल्चर और ट्यूबनैट पायलट आईसीएआर-सीएमएफआरआई, सीएसएमसीआरआई और टीएससी-पर्पल टर्टल के साथ समुद्र से पैदा होने वाले भोज्य पदार्थों को अपनाने के बेहतर तरीके प्रदान कर रहे हैं. गणमान्य लोगों ने अनुसंधान संस्थानों और निजी उद्यमियों के प्रतिनिधियों के साथ बात की और प्रगति, चुनौतियों और आगे की योजनाओं को ले कर भी बात की.

आईसीएआर-केंद्रीय समुद्री मत्स्य अनुसंधान संस्थान (सीएमएफआरआई) कोच्चि के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. दिवु, सीएसआईआर-केंद्रीय नमक समुद्री रसायन अनुसंधान संस्थान (सीएसएमसीआरआई), भावनगर के वरिष्ठ प्रोफैसर डा. मंगल सिंह राठौड़ और वैज्ञानिकों एवं सीवीड कंपनी, लक्षद्वीप से उद्यमी हरि एस. थिवाकर की ओर से औनफील्ड अनुभव अन्य विवरण प्रस्तुत किए गए.

नीतू प्रसाद ने केंद्रीय मंत्री परषोत्तम रूपाला और अन्य गणमान्य व्यक्तियों को उन के प्रयासों, उन के मार्गदर्शन और समर्थन के लिए धन्यवाद दिया. उन्होंने समुद्री शैवाल क्षेत्र में हासिल की गई उपलब्धियों और प्रगति पर प्रकाश डाला.

केंद्रीय मंत्री परषोत्तम रूपाला ने लाभार्थियों को पीएमएमएसवाई की विभिन्न परियोजनाओं के स्वीकृति आदेश भी वितरित किए. इन में नई फिन फिश हैचरी, नया तालाब आदि शामिल थे. इस के अलावा घेड फिश एंड फाम्र्स प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड को मोनोलाइन के साथ समुद्री शैवाल कल्चर की मोनोलाइन प्रति ट्यूबनैट मेथड इनपुट सहित स्थापना के लिए वित्तीय सहायता प्रदान की गई.

इस मौके पर प्रतिभागी भी शामिल हुए. इन में मत्स्य किसान, मछुआरे, मत्स्यपालन सहकारी समितियां और राज्य व केंद्र शासित प्रदेशों के मत्स्य प्रबंधन में शामिल सरकारी अधिकारी, वैज्ञानिक और विभिन्न मत्स्यपालन विश्वविद्यालयों और कालेजों आदि के शोधकर्ता शामिल रहे. सम्मेलन में 300 लाभार्थियों ने भाग लिया. इस दौरान सभी प्रतिभागियों को सर्वोत्तम तरीकों आदि के बारे में जानने और समुद्री शैवाल विशेषज्ञों के साथ विचारों का आदानप्रदान करने का अवसर मिला.

सम्मेलन के दौरान पूरे समुदाय के लाभ के लिए मत्स्यपालन क्षेत्र में समुद्री शैवाल की खेती की पहुंच को मजबूत करने और विस्तार देने के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया गया.

सम्मेलन के दौरान भिन्नभिन्न हितधारकों के साथ जागरूकता बढ़ा कर मत्स्यपालन समुदाय में अनुभवों और सफलता के विवरण के प्रस्तुत किए गए. इस ने समुद्री शैवाल की खेती को अपनाने के लिए उद्यमियों, प्रसंस्करणकर्ताओं, किसानों के बीच सहयोग और साझेदारी की समझ बढ़ाने और इसे बढ़ावा देने का एक बेहतर अवसर प्रदान किया.

सावधानीपूर्वक किए गए बहुआयामी कार्यक्रमों के माध्यम से देश का मत्स्यपालन क्षेत्र प्रगति के पथ पर है. प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) मत्स्यपालन विभाग (डीओएफ) की महती योजना है और इस में समुद्री शैवाल की खेती सहित विभिन्न मत्स्यपालन गतिविधियों के लिए वित्तीय सहायता के प्रावधान शामिल हैं. समुद्री शैवाल को विश्व स्तर पर पोषक तत्वों के एक महत्वपूर्ण स्रोत और कार्बन अलग करने वाले घटक के रूप में देखा जाता है, इसलिए इस का विकास और उपयोग पर्यावरण के नुकसान को कम करने, समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित करने और आबादी की खातिर पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए महत्वपूर्ण है. भारत में समुद्री शैवाल का आर्थिक महत्व, खेती, भोजन, फार्मास्यूटिकल्स, सौंदर्य प्रसाधन, जलीय कृषि और जैव ईंधन उत्पादन की क्षमता में इस के योगदान से निर्मित हुआ है. यह रोजगार उत्पन्न करता है, ब्लू इकोनोमी का समर्थन करता है और निर्यात के अवसर प्रदान करता है.

समुद्री शैवाल के क्षेत्र का विकास, पर्यावरण और स्वास्थ्य संबंधी लाभों के साथ मत्स्यपालन विभाग की प्रमुख योजना, पीएमएमएसवाई के लिए प्रमुख क्षेत्रों में से एक है. इस क्षेत्र को विकसित करने की पहल की गई है.

प्रसार्ड ट्रस्ट द्वारा गणतंत्रता दिवस पर किसान गोष्ठी का आयोजन

देवरिया: किसानों एवं गांव वालों के उत्थान के लिए समर्पित स्वयं सेवी संस्था प्रो. रवि सुमन, कृषि एवं ग्रामीण विकास (प्रसार्ड) ट्रस्ट मल्हनी, भाटपार रानी, देवरिया के वरिष्ठ सदस्य सुरेश चंद्र मौर्य द्वारा 26 जनवरी को प्रातः 10 बजे राष्ट्रीय ध्वजारोहण ट्रस्ट सैंटर महुआवारी पर किया गया.

इस के उपरांत किसान गोष्ठी आयोजित की गई. बाहर रहने के कारण ट्रस्ट के निदेशक प्रो. रवि प्रकाश मौर्य ने डिजिटल माध्यम से सभी को शुभकामनाएं देते हुए कृषि एवं ग्रामीण विकास के उत्थान पर बल दिया. साथ ही, वर्तमान में पड़ रही शीत लहर एवं ठंड से आमजन, पशुओं एवं फसलों को बचाने के उपाय बताए.

गोष्ठी को संबोधित करते हुए चंद्र प्रकाश मौर्य ने कहा कि इस समय जैविक खेती पर विशेष बल देने की जरूरत है, जो पशुपालन से ही मुमकिन है. रासायनिक खेती से बहुत सी बीमारियां हो रही हैं. कृषक उत्पादक संगठन (एफपीओ) का गठन कर उत्पादन में वृद्धि की जा सकती है.

डा. विकास कुमार मौर्य ने फिजियोथैरेपी पर प्रकाश डालते हुए बताया कि फिजियोथैरेपी के माध्यम से इनसान की बहुत सी बीमारियों को दूर किया जा सकता है.

नर्सरी उत्पादक ओमप्रकाश ने जायद की सब्जियों की खेती पर प्रकाश डालते हुए बताया कि फरवरी माह में भिंडी, लौकी, कद्दू, तुरई, खीरा, ककड़ी, करेला आदि की बोआई कर सकते हैं.

कार्यक्रम में सेवानिवृत्त लेखाकार, प्रदीप कुमार, सेवानिवृत्त मेजर चंद्र मोहन यादव, ग्राम प्रधान स्वामी प्रसाद, संजय यादव, जयराम, ब्रजेश गुप्ता सहित कई दर्जन वरिष्ठ नागरिक, सेवानिवृत्त लोगों ने भाग लिया.

गौशालाओं के लिए तीन सौ करोड़ और ग्रीन कलर योजना

चंडीगढ़ : मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने कहा कि पशुपालन एवं डेयरी और विकास एवं पंचायत विभाग, सामाजिक संस्थाएं व गौ सेवा आयोग नई गौशालाएं खोलने के लिए एक त्रिपक्षीय समझौता करे. जहांजहां पंचायती विभाग की जमीन उपलब्ध है, वहां पर नई गौशालाएं खोली जाएं. आधारभूत ढांचा उपलब्ध करवाया जाएगा और सामाजिक संस्थाओं को गौशालाएं संचालित करने के लिए आगे आना होगा.

उन्होंने कहा कि गौ वंश के संरक्षण व गौ धन की देखभाल के लिए गौ सेवा आयोग का बजट 40 करोड़ रुपए से बढ़ा कर 400 करोड़ रुपए है. इस में 300 करोड़ रुपए नई गौशालाएं स्थापित करने के लिए आवंटित किया गया है.

उन्होंने कहा कि सांझी डेयरी अवधारणा के तहत भी पशुपालक डेयरी व्यापार करने के लिए आगे आएं.

ग्रीन कवर योजना

मुख्यमंत्री मनोहर लाल ने कहा कि राज्य सरकार ने ग्रीन कवर को बढ़ावा देने के लिए भी योजना बनाई है, जिस के तहत स्थानीय युवा 3 वर्ष तक वन विभाग द्वारा लगाए गए पौधे की देखभाल करेगा. इन्हें वन मित्र कहा जाएगा. इस के लिए विभाग हर गांव में 500 से 700 पेड़ों को चिह्नित कर वन मित्रों को सौंपे. हर पेड़ की देखभाल के लिए वन मित्र को 10 रुपए प्रति पेड़ प्रोत्साहन स्वरूप दिया जाएगा.

उन्होंने निर्देश दिए कि वन विभाग के अधिकारी वन मित्र के लिए एसओपी भी तैयार करे.

बैठक में मुख्य सचिव संजीव कौशल, राजस्व एवं आपदा प्रबंधन विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव और वित्त आयुक्त, राजस्व टीवीएसएन प्रसाद, कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव सुधीर राजपाल, पशुपालन एवं डेयरी विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव अंकुर गुप्ता, उद्योग एवं वाणिज्य विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव आनंद मोहन शरण, सहकारिता विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव राजा शेखर वुंडरू, पर्यावरण, वन एवं वन्य जीव विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव विनीत गर्ग, विकास एवं पंचायत विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव अनिल मलिक और मुख्यमंत्री की अतिरिक्त प्रधान सचिव आशिमा बराड़ सहित वर्किंग ग्रुप के सदस्य उपस्थित रहे.

गोपशुओं में होने वाला दुग्ध ज्वर

दुग्ध ज्वर गोपशुओं में होने वाला एक उपापचयी रोग है, जो मादा पशुओं में प्रसव के 3 दिन के अंदर कभी भी हो सकता है. इस रोग में खून में कैल्शियम की मात्रा कम हो जाती है. शरीर का तापमान सामान्य से कम हो जाता है और मांसपेशियां कमजोर हो जाती हैं, जिस के चलते पशु लेट जाता है और बाद में उस की मौत हो जाती है.

यह बीमारी ज्यादा दूध देने वाली गायों में होती है. विशेष रूप से उन में, जो अपने दुग्ध उत्पादन की उच्चतम सीमा पर पहुंच चुकी होती हैं. सामान्यतया तीसरे, चौथे और 5वें ब्यांत में इस बीमारी के होने की संभावना ज्यादा रहती है. इस बीमारी पर मौसम का भी असर देखा गया है और यह जाड़े के दिनों में ज्यादा होती है.

वजह

शरीर द्रव्य में कैल्शियम आयन का कम होना इस बीमारी का मुख्य कारण है. वहीं शरीर में कैल्शियम की मात्रा कम होने के कई कारण हैं जैसे :

* प्रसव के बाद जो पहला गाढ़ा पीला दूध होता है, उस में कैल्शियम की मात्रा बहुत ज्यादा (खून में कैल्शियम की मात्रा की तुलना में 12-13 गुना) होती है. दूध निकालने के बाद पशु के शरीर में कैल्शियम की मात्रा एकदम से कम हो जाती है.

* बच्चा देने के समय आंत से कैल्शियम का अवशोषण भी कम हो जाता है, जिस से शरीर द्रव्य में कैल्शियम की मात्रा कम हो जाती है.

* कभीकभी इस बीमारी में कैल्शियम के साथसाथ मैग्नीशियम की भी कमी हो जाती है, जिस से पशु लकवाग्रस्त सा हो जाता है और लेट जाता है.

* कभीकभी कैल्शियम और मैग्नीशियम के साथ खून में फास्फोरस की मात्रा भी कम हो जाती है, जिस से रोग अधिक जटिल हो जाता है.

लक्षण

इस बीमारी में उत्पन्न लक्षणों को 3 अवस्थाओं में बांटा जा सकता है.

पहली अवस्था

इस अवस्था में बीमारी के शुरुआती लक्षण दिखाई देते हैं, जिस में पशु को बहुत उत्तेजना होती है. पिछले पैरों की मांसपेशियों में झटके आते हैं. पशु खाने के प्रति अनिच्छा जाहिर करता है और चलनाफिरना नहीं चाहता है. जीभ बाहर निकल आती है और वह दांतों को आपस में रगड़ता है. पिछले पैर सख्त हो जाते हैं और पशु जमीन पर गिर जाता है.

दूसरी अवस्था

बीमारी की इस अवस्था में पशु सीधा बैठ जाता है, आराम करता है और सुस्त हो जाता है. वह अपना सिर बगल में पीछे की तरफ मोड़ लेता है. अति उत्तेजना खत्म हो जाती है.

पशु खड़े होने में अक्षम हो जाता है व उस का शरीर ठंडा पड़ने लगता है. शरीर का तापमान सामान्य से कम हो जाता है, नथुना सूख जाता है, आंख की शलेष्मिका भी सूख जाती है और पुतली चौड़ी हो जाती है. पशु अपनी आंख नहीं झपका पाता है.

तीसरी अवस्था 

यह पशु के लेटने की अवस्था है. इस अवस्था में पशु बैठने में भी अक्षमता प्रदर्शित करता है और वह लेट जाता है. शरीर का तापमान और कम हो जाता है. नाड़ी का प्रवाह पता नहीं चलता. लेटने की वजह से पशु के पेट में गैस भर जाती है और अफारा हो सकता है. पेशाब कम या बंद हो सकता है. इस हालत में पशु को अगर तुरंत इलाज उपलब्ध नहीं कराया गया, तो उस की मौत भी हो सकती है.

Animal Careउपचार

बीमार पशु को जितना जल्दी हो सके, उतना जल्दी इलाज उपलब्ध कराना चाहिए. रोग की पहली अवस्था में ही, पशु के लेटने के पहले उपचार कराना जरूरी है. इलाज में देरी होने पर उस की मौत भी हो सकती है.

इस बीमारी के इलाज के लिए पशु के नस में कैल्शियमयुक्त लवण दिया जाता है. नस में इंजैक्शन देने से उस का असर तुरंत होता है और पशु जल्दी ही ठीक हो जाता है.

कैल्शियम लगने के तुरंत बाद पशु ठीक होने के लक्षण दिखाने लगता है, जैसे सिर उठा कर बैठना, गोबर करना, पशु की आंखें खुल जाती हैं और कई बार पशु तुरंत खड़ा भी हो जाता है.

कभीकभी इस रोग में कैल्शियम के साथसाथ मैग्नीशियम और फास्फोरस की भी कमी पाई जाती है. अगर कैल्शियम देने से जानवर खड़ा न हो तो उस को कैल्शियम के साथसाथ मैग्नीशियम और फास्फोरस का इंजैक्शन भी देना चाहिए.

इन सब दवाओं के अलावा जब जानवर खड़ा हो जाए तो उसे हिमालयन बत्तीसा 20 ग्राम दिन में 2 बार 3 दिन तक खिलाना चाहिए.

पशुपालक यह ध्यान रखें कि कैल्शियम चढ़ाते समय पशु की धड़कन बढ़ सकती है और उस की मौत हो सकती है, इसलिए कैल्शियम को धीरेधीरे चढ़ाना चाहिए.

यह बीमारी ज्यादातर सर्दियों में होती है. उस समय यह ध्यान रखें कि कैल्शियम को शरीर के तापमान के बराबर गरम कर के ही नस में दें, क्योंकि ठंडा कैल्शियम नस में देने से जानवर की मौत हो सकती है.

बचाव व रोकथाम

दुग्ध ज्वर से बचाव किसानों के लिए आर्थिक रूप से बहुत ही महत्त्वपूर्ण है. पशु को दुग्ध ज्वर से बचाने के लिए उन का उचित भोजनचारा प्रबंधन जरूरी है.

* पशु जब दूध नहीं दे रहा हो, तो उस समय उस को ज्यादा कैल्शियमयुक्त चारा जैसे अल्फाअल्फा घास नहीं देनी चाहिए.

* मादा पशु को बच्चा देने से 2 हफ्ते पहले बहुत ज्यादा कैल्शियम नहीं देना चाहिए.

* जिन पशुओं में दुग्ध ज्वर होने की संभावना ज्यादा हो, उन्हें ब्यांने के तुरंत बाद कैल्शियम जैल देना चाहिए.

* पशुपालक ध्यान दें कि बच्चा देने के बाद पशु का सारा खीस (पहला दूध) एकसाथ निकालने के बजाय दिन में 2 से 3 बार में निकालना चाहिए.

अजोला की खेती और दुधारू जानवरों के चारा

अब तक अजोला का इस्तेमाल  खासकर धान में हरी खाद के रूप में किया जाता था, लेकिन अब इस में छोटे किसानों के पशुपालन के लिए चारे की बढ़ती मांग को पूरा करने की जबरदस्त क्षमता दिखती है.

अजोला खेती की प्रक्रिया

* किसी छायादार स्थान पर पशुओं की संख्या के अनुसार किसान 1.5 मीटर चौड़ी, लंबाई जरूरत के मुताबिक (3 मीटर) और 0.30 मीटर गहरी क्यारी बनाएं. क्यारी को खोद कर या ईंट लगा कर भी बनाया जा सकता है.

* क्यारी में जरूरत के मुताबिक सिलपुटिन शीट को बिछा कर ऊपर के किनारों पर मिट्टी का लेप कर व्यवस्थित कर दें.

* सिलपुटिन शीट को बिछाने की जगह पशुपालक पक्की क्यारी बना कर तैयार कर सकते हैं. 100-120 किलोग्राम साफ उपजाऊ मिट्टी की 3 इंच मोटी परत क्यारी में बना दें.

नोट : आजकल बाजार में कृत्रिम अजोला टब भी उपलब्ध हैं. किसान चाहें तो उन्हें भी खरीद सकते हैं.

अब इस में 5-10 सैंटीमीटर तक जलस्तर आ जाए, इतना पानी क्यारी में भरते हैं.

5-7 किलोग्राम गोबर (2-3 दिन पुराना) 10-15 लिटर पानी में घोल बना कर मिट्टी पर फैला दें. यदि जानवर गोबर के घोल वाले अजोला को नहीं खाते हैं, तो इस के लिए रासायनिक खाद भी तैयार कर के डाला जाता है, जैसे :

एसएसपी – 5 किलोग्राम

मैग्नीशियम सल्फेट – 750 ग्राम

पोटाश – 250 ग्राम

इन का मिश्रण तैयार कर लें.  तैयार मिश्रण का 10-12 ग्राम 1 वर्गमीटर 1 सप्ताह के अंतराल पर क्यारी में डालें. इस मिश्रण पर 2 किलोग्राम ताजा अजोला को बिछा दें. इस के बाद 10 लिटर पानी को अच्छी तरह से अजोला पर छिड़कें, जिस से अजोला अपनी सही स्थिति में आ सके.

Ajola

ध्यान रहे कि मिट्टी और जल का अनुपात 5-7 और क्यारी का तापमान 25-30 डिगरी सैंटीग्रेड अजोला की अच्छी बढ़वार के लिए सही रहता है. क्यारी को नायलोन की जाली से ढक कर 20-21 दिन तक अजोला को बढ़ने दें.

लागत

अजोला उत्पादन इकाई स्थापना में क्यारी निर्माण, सिलपुटिन शीट, छायादार नायलोन जाली और अजोला बीज की लागत पशुपालक को प्रतिवर्ष नहीं देनी पड़ती है. इन कारकों को ध्यान में रखते हुए अजोला उत्पादन लागत लगभग 10 रुपए प्रति किलोग्राम से कम आंकी गई है. अजोला क्यारी से हटाए पानी को सब्जियों व पुष्प खेती में काम लेने से यह एक वृद्धि नियामक का काम करता है.

अजोला लगाने के लिए उचित समय

अक्तूबर महीने से ले कर मार्च महीने तक इस को शुरू किया जा सकता है. अप्रैल, मई, जून महीने में अजोला उत्पादन काफी कम हो जाता है. लेकिन छाया का इस्तेमाल किया जा सके, तो अजोला का उत्पादन उपरोक्त महीनों में भी किया जा सकता है.

रखरखाव

शीत ऋतु व गरमी में तापमान कभीकभी कम और अधिक होने की संभावना रहती है, इसलिए उस स्थिति में क्यारी का तापमान उचित बनाए रखने के लिए क्यारी को पुरानी बोरी के टाट अथवा चादर से ढक सकते हैं.

क्यारी के जलस्तर को 10 सैंटीमीटर तक बनाए रखें. हर 3 महीने के बाद अजोला को हटा कर पानी व मिट्टी बदलें और नई क्यारी के रूप में पुन: संवर्धन करें.

किस्म : अजोला पीनाटा, अजोला माइक्रो फाईला.

उपज : 200 से 250 वर्गफुट.

अजोला का पशुओं के लिए चारे के रूप में उपयोग

क्यारी में तैयार अजोला को छलनी की सहायता से बाहर निकाल कर इस को अलग से साफ पानी से भरी बालटी में धोया जाता है, ताकि जानवर को इस की गंध न आए.

बड़े जानवर (गाय, भैंस) : 1 से 1.5 किलोग्राम/प्रतिदिन.

छोटे जानवर (बकरी, भेड़) : 150-200 ग्राम/प्रतिदिन.

मुरगियां : 30-50 ग्राम/प्रतिदिन.

नोट : जो जानवर 3-4 लिटर/प्रतिदिन दूध देते हैं, उन को अजोला खिलाने से प्रोटीन की पूर्ति हो जाती है.

लाभ : अजोला को रोज दाने या चारे में मिला कर पशुओं को खिलाने से ऐसा पायागया है कि इस से मिलने वाले पोषण से दूध उत्पादन में 10-15 फीसदी तक की वृद्धि होती है. इस के साथ 20-25 फीसदी चारे की बचत होती है. अजोला को मुरगियों को खिलाने से उन का वजन 10-12 फीसदी ज्यादा बढ़ता है.

अजोला की पोषण क्षमता

शुष्क मात्रा के आधार पर प्रोटीन (20-25 फीसदी), कैल्शियम (67 मिलीग्राम/100 ग्राम) और लोहा (73 मिलीग्राम/100 ग्राम), रेशा (12-15 फीसदी), खनिज (10-15 फीसदी) और 7-10 फीसदी एमिनो एसिड, जैव सक्रिय पदार्थ व पौलीमर्श आदि पाए जाते हैं.

पशुपालक रखें पशुओं के आहार का ध्यान

पशु की खुराक की मात्रा उन की उम्र, शरीर का वजन, दूध उत्पादन, गाभिन पशु, बो झा ढोने, जुताई, हल चलाने वगैरह को ध्यान में रख कर तय की जाती है. पशु की जरूरत के मुताबिक चारेदाने की मात्रा तय करना ही संतुलित आहार कहलाता है.

देश के ज्यादातर पशुपालक पशुओं की खुराक व संतुलित आहार पर कोई खास ध्यान नहीं देते, जो भी मुहैया होता है उसे पशु को खाने को देते हैं, जिस के चलते पशु बीमार, कमजोर, अपनी कूवत के मुताबिक दूध वगैरह नहीं दे पाते हैं इसलिए जरूरी है कि हर पशुपालक अपने पशु को संतुलित खुराक ही दें.

पशु की जरूरत के आधार पर ही  चारेदाने में मौजूद पोषक तत्त्वों और पशु की राशन खाने की कूवत को ध्यान में रख कर ही राशन तैयार करें. राशन में पोषक तत्त्वों की कमी होने पर पशु ज्यादा मात्रा में चारा खाता है. रोमंथी यानी जुगाली करने वाले पशु का राशन तैयार करते समय उस में मौजूद सूखा पदार्थ, ऊर्जा, पचनीय प्रोटीन, खनिज तत्त्व व विटामिन का भी ध्यान रखें.

राशन तैयार करने से पहले पशु की गुजरबसर यानी निर्वाह, बढ़वार व उत्पादन को जोड़ कर उस की पूरी जरूरतों का पता लगाया जाता है. दुधारू गायभैंस की पोषक तत्त्वों की जरूरत उस के शरीर वजन व दूध की मात्रा पर निर्भर करती है.

ध्यान रखें कि 6 महीने के गर्भकाल के बाद गायभैंस को अलग से पोषक तत्त्व दें. 3 साल से कम उम्र और 6 महीने से ज्यादा गर्भवती गायभैंस को अलग से पोषक तत्त्वों की जरूरत पड़ती है.

पशुओं का राशन बनाते समय इन बातों को ध्यान में रखें :

* जवान देशी पशु को सौ किलोग्राम शरीर वजन पर 2 से ढाई किलो सूखा पदार्थ दें, जबकि उन्नत नस्ल की गायभैंस को ढाई से 3 किलोग्राम सूखा पदार्थ जरूर खिलाएं.

* सूखे पदार्थ का दोतिहाई भाग चारा और एकतिहाई भाग दाने के रूप में दें. चारे से दिए जाने वाले सूखे पदार्थ का आधा भाग सूखे चारे से व आधा भाग हरे चारे द्वारा दिया जा सकता है.

* सूखे पदार्थ के आधार पर राशन में 25 से 35 फीसदी रेशा होना चाहिए. किसी भी पशु के राशन में 35 फीसदी से ज्यादा रेशा (अपरिष्कृत रेशा) नहीं होना चाहिए.

* सूखे पदार्थ वाले राशन में प्रोटीन 8 से 12 फीसदी होनी चाहिए. छोटे बच्चों के राशन में प्रोटीन की मात्रा 20 फीसदी होनी चाहिए.

* पशु को दिए जाने वाले राशन से तकरीबन सौ किलोग्राम शरीर के वजन पर 1.6 से 1.8 मैगा कैलोरी ऊर्जा मिलनी जरूरी होती है.

विभिन्न वर्ग और उम्र के पशुओं का राशन अलगअलग तरह से तैयार करें. हम यहां कुछ खास पशुओं के राशन तैयार करने के बारे में बता रहे हैं.

Animal Feedदूध न देने वाली जवान ओसर

दूध न देने वाली गायों व जवान ओसरों को उन के शरीर के वजन के मुताबिक पोषक तत्त्वों की जरूरत के आधार पर आहार बनाएं. अगर मादा गर्भवती न हो या दूध न दे रही हो, तो उन की सभी पोषक जरूरतें अच्छे चारे या अच्छे चरागाह में चरने से ही पूरी हो जाती हैं. आधा हरा चारा व आधा सूखा चारा मिला कर खिलाने से उन्हें दाना देने की जरूरत नहीं पड़ती है.

गाभिन पशु

गाभिन पशुओं को अपनी गुजरबसर  यानी निर्वाह जरूरत के साथसाथ बच्चे के पोषण के लिए भी पोषक तत्त्वों की जरूरत पड़ती है.

6 महीने के गर्भकाल तक मादा की जरूरतें अच्छे चारे से ही पूरी की जा सकती हैं. लेकिन 6 महीने बाद पशु को आधा किलोग्राम दाना जरूर दें, जबकि ब्याने के समय तक दाने की मात्रा बढ़ा कर 1 से 2 किलोग्राम तक कर दें. मादाओं को वही राशन दिया जाए, जिस को हमेशा खिलाना है.

अगर दाना पहले से देना शुरू कर देते हैं, तो ज्यादा बेहतर होगा. इस से मादा को दाना खाने व पचाने की आदत बन जाती है. किसी खास किस्म के दाने के न खाने पर पता चल जाता है और उसे उस समय से ही बदला जा सकता है.

पेट में पल रहे बच्चे के लिए जरूरी पोषक तत्त्व दाने में मिल जाते हैं. दाना न देने पर मादा के शरीर से पोषक तत्त्व भू्रण को जाते हैं और मादा कमजोर हो जाती है, जिस से मादा को प्रसव के समय परेशानी उठानी पड़ती है और बीमारियां भी पलती है. सही मात्रा में पोषक तत्त्व देने से बच्चा सेहतमंद पैदा होता है और मादा ज्यादा दूध देती है और समय पर दोबारा गर्भधारण भी कर लेती है.

गर्भवती मादाओं को शुरू से सिर्फ आधा किलोग्राम दाना दें. इसे धीरेधीरे बढ़ा कर उस की नस्ल, दूध देने की कूवत व शरीर के वजन के मुताबिक 1 से 2 किलोग्राम तक कर दें.

प्रसव के समय व ब्याने के बाद 3-4 दिन तक दाना न दें. ज्यादा दाना देने पर अयन से जुड़ी बीमारियां ज्यादा होती हैं. ब्याने के 3-4 दिन तक जब दाना न दिया जाए, तो उसे थोड़ी मात्रा में गेहूं का दलिया, चोकर जैसे पाचक दाना देना फायदेमंद रहता है.

दुधारू पशु

दुधारू पशुओं की पोषक जरूरतें उन के दूध देने की कूवत पर निर्भर करती हैं. आमतौर पर गाय को ढाई लिटर दूध पर व भैंसों को 2 लिटर दूध पर एक किलोग्राम दाना दिया जाता है. अगर अच्छे किस्म का फलीदार चारा है, तो 10 लिटर दूध की गाय और 7 लिटर दूध की भैंस को दाना देने की जरूरत नहीं पड़ती. ज्यादा दूध देने वाली गायों को ज्यादा दूध पर 1 किलोग्राम दाना प्रति ढाई लिटर दूध पर दिया जाता है.

पशु के दुबले व मोटे होने पर भी उस की खुराक घटाएं या बढ़ाएं. बहुत ज्यादा दूध देने वाली संकर व विदेशी नस्ल की गायों की सूखे चारे खाने की कूवत इतनी ज्यादा सीमित होती है कि मोटे चारे द्वारा उन की ऊर्जा की जरूरत पूरी नहीं हो पाती. ऐसी गाय को आहार के रूप में पूरा दाना भी नहीं खिलाया जा सकता. इन हालात में पशुपालक दुधारू गायों को खिलाते समय इन बातों को ध्यान में रखें :

* चारेदाने का हिसाब लगाते समय यह ध्यान रखें कि आहार में रेशे का भाग कम व सूखा पदार्थ ज्यादा हो. इस के लिए आहार में दाना ज्यादा व चारा कम दें. लेकिन संपूर्ण आहार दाने के रूप में ही न हो, क्योंकि दाना बढ़ाने का सही असर एक सीमित मात्रा तक ही होता है, बाद में नहीं होता.

* ज्यादा दाने वाले आहार से पशुओं में लार कम पैदा होती है, जिस से आमाशय का पीएच कम हो जाता है. पशुओं को चारा देना भी जरूरी है.

* अच्छे नतीजे हासिल करने के लिए राशन में 30-40 फीसदी पोषक तत्त्व दाने से और 60-70 फीसदी चारे से दें.

* अगर ज्यादा मात्रा में दाना देना हो तो उसे चारे के साथ मिला कर या थोड़ा सा चारा खिलाने के बाद दाना खिलाने से आहार की उपयोगिता बढ़ जाती है. दुधारू गायों के आहार में हरे चारे की मात्रा ज्यादा रखें.

बैलों के लिए

जवान बैलों को गुजरबसर व काम करने के लिए आहार द्वारा पोषक तत्त्व दिए जाते हैं. जुताई करने या बोझा ढोने वाले बैलों की कुछ ऊर्जा मांसपेशियों के चलने से खर्च हो जाती है. बाकी बची ऊर्जा गरमी के रूप में बरबाद हो जाती है, इसलिए काम वाले बैलों की पोषक तत्त्वों की जरूरत उन के वजन, काम की किस्म व काम करने के समय पर निर्भर करती है.

हलके काम करने वाले बैलों की पोषक जरूरतें अच्छे चारे द्वारा ही पूरी हो जाती हैं.

भारी काम में लगे बैलों को ऊर्जा व पोषक तत्त्व देने के लिए अच्छी किस्म का सूखा, हरा चारा व 1 से 2 किलोग्राम दाना रोज दें.

Animal Feed

बढ़वार वाली ओसर

ओसरों व पडि़यों को अकसर दाना नहीं दिया जाता है. अगर बछियों और पडि़यों को दाना दिया जाए तो महंगा जरूर लगता है, लेकिन उन की बढ़वार इतनी अच्छी होती है कि वे बिना दाने पर पाली गई बछियों से बहुत पहले ब्याती हैं. कम पोषण पर रखी गई बछियों की बढ़वार दर कम, गर्भधारण की उम्र ज्यादा और ब्याते समय शरीर का वजन कम होता है.

आमतौर पर ओसरों की पोषक जरूरतें बराबर मात्रा में सूखा व हरा चारा भरपेट खिलाने या अच्छे चरागाहों में चराने से ही पूरी हो जाती हैं. लेकिन सूखे व खराब क्वालिटी के चारों के साथ आधा से एक किलोग्राम दाना रोज देना फायदेमंद रहता है. अगर बछियों और पडि़यों को दाना खिलाना मुमकिन न हो, तो भूसा, पुआल व कड़वी को यूरिया से उपचारित कर के जरूर खिलाएं.

बढ़वार वाले नर बच्चे

बढ़ते हुए बछड़ों को एक साल की उम्र तक बछियों की तरह ही दाना देते हैं, लेकिन एक साल के बाद उन्हें 30 फीसदी ज्यादा पोषक तत्त्वों की जरूरत पड़ती है. इस समय उन की बढ़वार दर बछियों के मुकाबले 30 फीसदी ज्यादा होती है. उन्हें पोषक तत्त्वों की भी ज्यादा जरूरत पड़ती है.

बढ़वार वाले बच्चों का अच्छे चरागाह में चराने या एकतिहाई भाग सूखा व दोतिहाई भाग हरा चारा मिला कर खिलाने से उन की दैनिक पोषक जरूरतें पूरी हो जाती हैं.

इस तरह पशुपालक अपने पशुओं को बदलती उम्र, काम करने की दशा, मादा पशुओं के शरीर व दुधारूपन को ध्यान में रखते हुए संतुलित आहार दें, तो इस से पशु की सेहत ठीक होने के साथसाथ बढ़वार भी अच्छी होगी और उन की काम करने व दूध देने की कूवत में भी खासी बढ़ोतरी होगी. इस से पशुपालक को ज्यादा से ज्यादा फायदा होगा और पशुपालन का काम उन के लिए फायदेमंद साबित होगा.

पशुपालन में टीकाकरण का रखें ध्यान

एक प्रचलित कहावत है कि रोगों से बचाव, उस के इलाज की अपेक्षा बेहतर विकल्प है, इसलिए कुछ खास रोगों से बचाव के लिए समय पर टीकाकरण जरूरी है. पशुओं को अनेक संक्रामक रोगों से बचाने के लिए उन्हें समय पर टीके लगवाना बहुत जरूरी है. टीके खास रोगों की रोकथाम के लिए बनाए जाते हैं और ये टीके सही समय पर डाक्टरों द्वारा लगाए जाते हैं. ये टीके होने वाले रोगों को रोकने की कूवत बढ़ाते हैं और अप्रैल महीने के आखिरी सप्ताह को विश्वभर में ‘विश्व टीकाकरण सप्ताह’ के रूप में भी मनाया जाता है.

भारत में पशुओं के लिए टीकाकरण खासकर 4-5 बीमारियों के विरुद्ध चलाया जाता है. अब समय के साथसाथ पशुपालन की इस टीकाकरण का ध्यान रखने लगे है. जो लोग पशुपालन करते हैं, उन्हें अपने पशुओं के टीकाकरण को ले कर डायरी बनानी चाहिए, जिस से कोई टीका छूटने न पाए.

पशुओं में लगने वाले टीके

खुरपका मुंहपका : पशुओं के होने वाला यह खास रोग है और इस की रोकथाम के लिए पशुओं में यह टीका 4 से 8 माह की उम्र में लगाया जाता है उसे 4 हफ्ते के बाद बूस्टर डोज दी जाती है. इस के बाद साल में 2 बार टीकाकरण करवाना चाहिए. एक टीका फरवरी के आखिरी हफ्ते से मार्च के पहले हफ्ते तक और दूसरा टीका अगस्त से सितंबर महीने तक लगाया जाता है.

पशु जब 6 महीने का हो जाए, तब गलघोंटू और लंगड़ी का टीका लगाया जाता है. लंगड़ी व गलघोंटू का टीका मई से जून महीने तक लगवा लें. कोशिश करें यह टीका बारिश के मौसम से पहले लगवा लें.

4 से 8 माह की उम्र में गर्भपात का टीका लगाया जाता है, जो पशु को जीवनभर रोग प्रतिरोधात्मक कूवत को बढ़ाता है.

पशु टीकाकरण में सावधानी : टीके लगवाते समय पशु स्वस्थ होना चाहिए.

* पशु बीमारी वाले मौसम (बरसात से) एक महीने पहले तक टीका लगवा लेना चाहिए.

* टीके का सही तापमान पर रखना चाहिए.

* टीकाकरण के समय कोई अन्य दवा या एंटीबायोटिक्स पशु को नहीं दिए जाने चाहिए.

* अगर पशु गर्भ से है तो टीकाकरण से पहले पशु विशेषज्ञ को इस की जानकारी देनी चाहिए.

* टीकाकरण की सभी जानकारी भी डायरी में नोट करनी चाहिए.

* पशु को टीका लगाने के बाद उसे धूप में नहीं छोड़ना चाहिए.

* टीकाकरण के लिए सुबह का समय अच्छा रहता है.

* टीकों को गरमी व सीधे धूप से बचा कर रखना चाहिए.

* अगर टीके को गलत तरीके से लगाया जाता है या समय पर नहीं लगाया जाता है तो वह टीकाकरण विफल भी हो सकता है, इसलिए सभी टीके समय पर और दिए गए दिशानिर्देशों के आधार पर लगाएं जाने चाहिए.

* अगर आप के झुंड में पशु हैं तो खास ध्यान रखें, पूरे झुंड का टीकाकरण समय पर सही तरीके से करवाएं वरना उन में बीमारी फैल सकती है.

* पशुओं में अनेक टीके मुफ्त भी लगाए जाते हैं. इस के किए जगहजगह कृषि केंद्रों में पशु विशेषज्ञ भी हैं, इसलिए पशु में कोई समस्या आने पर या टीकों की जानकारी लेने के लिए आप उन से भी संपर्क कर सकते हैं.

पशुपालन में उन्नत तकनीकियां

पशुओं को बीमारी से बचाने की दिशा में भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, इज्जतनगर, बरेली ने सराहनीय काम किया है. यह दुनिया का एक अग्रणी शोध संस्थान है. इस संस्थान ने पशुओं की सेहत और उत्पादन के क्षेत्र में बहुत शोध कर अनेक टीके, औषधियां व तकनीकें ईजाद की हैं.

इस के अलावा इस संस्थान ने अनेक बैक्टीरियल, वायरल व परजीवी रोगों जैसे गलघोंटू, लंगड़ी, खुरपकामुंहपका, शूकर बुखार, पीपीआर, एंटेरोटौक्सीमिया, भेड़बकरी चेचक, भैंस चेचक, एंथ्रैक्स वगैरह के लिए टीकों और जांच किटों की खोज की है.

इस संस्थान द्वारा विकसित इन टीकों, रोग जांच किटों का इस्तेमाल पशुपालकों व पशु चिकित्सकों द्वारा लगातार किया जा रहा है. इस से उन की सेहत व उत्पादन में काफी सुधार हुआ है. साथ ही, विभिन्न बीमारियों से होने वाली पशुओं की मौत की दर में भी काफी कमी आई है.

पशुओं की सेहत के लिए टीके या वैक्सीन

गाय व भैंसों के लिए टीके : खुरपका और मुंहपका के टीके ईजाद करने के अलावा गलघोंटू, एंथ्रैक्स, लंगड़ी, ब्रूसेलोसिस, भैंस चेचक, रेबीज वगैरह के टीके ईजाद किए गए.

बकरी और भेड़ के लिए ईजाद किए टीके : पीपीआर, भेड़ चेचक, बकरी चेचक, एंटेरोटौक्सीमिया, सीसीपीपी वगैरह.

शूकरों यानी सूअरों के लिए टीका : शूकर बुखार टीका.

मुरगियों के लिए टीके : रानीखेत रोग, पक्षी चेचक, पक्षी स्पाइरोकीटोसिस, गमबोरो, एग ड्रौप सिंड्रोम, संक्रामक सांस नली शोथ, मेरेक्स रोग वगैरह.

कुत्तों के लिए टीके : रेबीज वगैरह.

ये टीके और वैक्सीन पशुओं व कुक्कुटों में होने वाली बीमारियों की रोकथाम में काफी कारगर साबित हुए हैं. नतीजतन,किसानों की आमदनी में भी काफी इजाफा हुआ है.

औषधि और दवाएं : कहने को तो पशुओं में तमाम बीमारियां पनपती हैं, साथ ही सेहत संबंधी दूसरी परेशानियां भी उन में आएदिन होती रहती हैं. इस के समाधान के लिए संस्थान ने बहुत सी दवाएं व औषधियां तैयार की हैं. इन में पशुओं में दस्त के उपचार के लिए आईवीआरआई एंटीडायरियल औषधि, पशुओं के साथसाथ पालतू पशुओं में किलनी की रोकथाम के लिए एकेरीनाशी औषधि, पशुओं में चमड़ी की परेशानी के लिए औषधि, थनैला की रोकथाम के लिए एक हर्बल मैस्टिडिप, मैस्टीक्योर, विभिन्न दूसरी औषधियां, जैसे खाजखुजली से छुटकारा दिलाने के लिए एलए-1 या एसए-1 और खाज होने पर मैंगोल औयल, दाद के लिए रिंगवर्म क्योर, त्वचा संबंधी सभी तरह की समस्याओं के लिए औलइनऔल मरहम, जले हुए घावों के लिए बर्न मरहम वगैरह प्रमुख हैं.

पशु आहार उत्पाद : पशुओं को %