ऐसे रखें खयाल अपने पशुओं का

पशुपालक बीमार पशु को समय रहते अन्य पशुओं  से अलग कर दें जिससे दूसरे पशुओं को बीमार होने से बचा सकते हैं, इसलिए पशुपालकों और किसानों को इन बातों पर ध्यान देना चाहिए :

* मवेशी को प्रतिदिन ठीक समय पर भरपेट चारदाना दिया जाए. उन की खुराक में सूखे चारे के साथ हरा चारा खली में दाना और थोड़ा नमक शामिल करना जरूरी है.

* साफ बरतन में ताजा पानी भर कर मवेशी को जरूरत के मुताबिक पीने का मौका दें.

* मवेशी के रहने की जगह साफ और ऊंची जगह पर बनाएं. उस में सूरज की रोशनी और हवा के पहुंचने की पूरी गुंजाइश रहे.

* जहां पर पशु रखे गए हैं, वहां की नियमित साफसफाई करें. समयसमय पर वहां रोगाणुनाशक दवा जैसे फिनाइल या दूसरी दवा के घोल से उस की धुलाई करें.

* मवेशियों या दूसरे पशुओं के खिलाने की नाद ऊंची रखें. नाद के नीचे कीचड़ न होने दें.

* गोबर और पशु मूत्र जितना जल्दी हो सके, वहां से हटा दें.

* मवेशियों को प्रतिदिन टहलने का मौका दें.

* मवेशियों के शरीर की सफाई पर भी खासा ध्यान दिया जाए.

* उन के साथ लाड़प्यार भरा बरताव किया जाए.

* मवेशियों में फैलने वाली ज्यादातर संक्रामक बीमारियां स्थानिक होती हैं. ये बीमारियां एक बार जिस जगह पर जिस समय फैलती हैं, उसी जगह पर और उसी समय बारबार फैला करती हैं, इसलिए समय से पहले मवेशियों को टीका लगवाएं. पशुपालन विभाग की ओर से मुहैया रहने पर नाममात्र का शुल्क ले कर यह टीका लगाया जाता है.

वनराजा मुरगीपालन यानी बैकयार्ड पोल्ट्री फार्म

किसानों की आमदनी में इजाफा करने में पशुपालन पूर्व के समय से ही अहम भूमिका निभाता रहा है और वर्तमान समय में कृषि विज्ञान व खेती से जुड़े दूसरे घटक किसानों को माली रूप से मजबूत करने के लिए दृढ़संकल्पित हैं.

सरकार किसानों की आमदनी को दोगुना करने के लिए बहुत सी योजनाएं लागू कर रही है. किसानों की आय समृद्वि के लिए जैविक खेती, नवीनतम कृषि यंत्रों का उपयोग, फसल अवशेष प्रबंधन, संतुलित उर्वरक उपयोग, मिट्टी जांच, उन्नतशील प्रजातियों के बीजों के उपयोग, जैविक कीटनाशकों का उपयोग व तकनीकियों के प्रसार के लिए ज्यादा से ज्यादा कृषि गोष्ठियों, कृषि प्रदर्शनी, प्रशिक्षणों एवं प्रदर्शनों के जरीए किसानों को जागरूक किया जा रहा है.

ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत भूमिहीन एवं छोटी जोत वाले किसानों के जीविकोपार्जन एवं उन को माली रूप से मजबूत बनाने के लिए बैकयार्ड पोल्ट्री फार्म यानी वनराजा मुरगीपालन एक बेहतर विकल्प साबित हो रहा है, जिस में कम खर्च एवं कम व्यवस्थाओं में भी अच्छी आय अंडा उत्पादन और मांस उत्पादन से हासिल किया जा सकता है.

बैकयार्ड पोल्ट्री फार्म के लिए अच्छे द्विकाजी नस्ल की जानकारी की कमी में बैकयार्ड पोल्ट्री से छोटे किसान या महिला किसानों को समुचित लाभ प्राप्त नहीं हो पा रहा है.

ऐसे में भारतीय पक्षी अनुसंधान संस्थान की शाखा हैदराबाद द्वारा विकसित नस्ल वनराजा, जो कि छिकाजी नस्ल है, एक बेहतर विकल्प पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए साबित हो सकती है.

इस नस्ल की विशेषताएं:
– यह एक बहुवर्षीय एवं आकर्षक पक्षी है.
– बेहतर रोगप्रतिरोधक क्षमता.
– निम्न आहार उपलब्धता पर अच्छी बढ़वार.
– देशी मुरगी की अपेक्षा अधिक अंडा उत्पादन.
– वनराजा का मांस स्वादिष्ठ और कम चरबी वाला होता है और टांगें लंबी होने के चलते दूसरे पक्षी से हिफाजत करने मेें माहिर होते हैं.
– वनराजा  फ्री रेंज यानी खुले विचरण में उत्तम प्रदर्शन करते हैं.

वनराजा मुरगी का प्रदर्शन
उम्र                      :           वजन
एक दिन का चूजा  :          35-40 ग्राम
6 सप्ताह               :         700-800 ग्राम
8 सप्ताह               :        1.00 किलोग्राम

अंडों की प्रतिशतता     :  70-75 फीसदी
अंडा उत्पादन उम्र      :   तकरीबन 6 माह
अंडों से चूजा उत्पादन :  80 फीसदी
औसत वजन अंडा      :  45-50 ग्राम

ब्रूडिंग: अंडों से चूजा प्राप्त होते ही उस के शरीर का तापमान नियंत्रित करने के लिए ब्रूडर की जरूरत होती है. इस के लिए ब्रूडर का उपयोग करना चाहिए. ब्रूडिंग के लिए पहले सप्ताह तापमान 95 डिगरी फोरेनहाइट रखा जाता है, जिसे हर सप्ताह 5 डिगरी फोरेनहाइट कम करते हुए 70 पर लाया जाता है. चूजों के बिखराव पर नियंत्रण के लिए चिक गार्ड का प्रयोग करना चाहिए. चिक गार्ड के अंदर चूजों का एकसमान फैलाव आदर्श तापमान का सूचक है.

आवास: गंवई इलाकों में चूजे को शुरू से बाजार भेजने तक एक शेड में रखा जाता है. स्थानीय उपलब्ध संसाधन से आवास का निर्माण कम लागत पर किया जा सकता है. आवास में उचित हवा का संचार, रौशनी की उचित व्यवस्था और दूसरे पक्षी से सुरक्षा की व्यवस्था रखी जाती है. रोग की रोकथाम में बिछाली का सूखा रहना बहुत जरूरी है. बिछाली को समयसमय पर पलटते रहना चाहिए, जिस से बिछाली को सूखा बनाए रखा जा सके, अन्यथा संक्रमण फैलने की संभावना रहती है. बिछाली के रूप् में धान की भूसी या लकड़ी के बुरादे का प्रयोग किया जाता है और गरमी में बिछाली की मोटाई 2 इंच से 3 इंच तक रखनी चाहिए.

आहार: शुरू के 2-5 दिनों तक बिछाली पर अखबार बिछा कर प्रीस्टार्टर राशन देना चाहिए. शुरू के 6 सप्ताह तक विटामिन और खनिज लवण से भरपूर संतुलित आहार दिया जाता है. आहार की उपापचयी ऊर्जा 2400, प्रोटीन प्रतिशत लाइसिन 0.77 फीसदी, मेथियोनिन 0.36 फीसदी, फास्फोरस 0.35 फीसदी और कैल्शियम 0.7 फीसदी रखा जाता है. पक्षीपालक स्थानीय उपलब्ध आहार की चीजों को ले कर खुद भी शुरुआती 6 माह तक बना सकते हैं.

अवयव मात्रा फीसदी में
मक्का, बाजरा, रागी, चावल कूट       : 50-70
चावल का चोकर या गेहूं का चोकर   : 10-15
खल                                              : 15-20
डाईकैल्शियम फास्फेट                   : 1.2
चूना पत्थर                                      : 1.3
नमक                                            : 0.5
विटामिन एवं खनिज प्रीमिक्स           : 0.3

बाजार में उपलब्ध ब्रायलर मैंस का भी प्रयोग किया जाता है. पक्षी को शुरुआती 4-6 सप्ताह अवस्था में इच्छाभार आहार प्रदान किया जाता है, जिस से इनके पंख, केकाल और प्रतिरक्षा तंत्र का उचित विकास हो. फ्री रेंजपालन में 6 सप्ताह के बाद पक्षी को दिन में खुले वातावरण में छोड़ देते हैं, ताकि वह चराई कर सकें.

टीकाकरण: मुरगे या मुरगी को सेहतमंद बनाए रखने के लिए संक्रामक बीमारियों से बचाने के लिए इन का टीकाकरण बहुत जरूरी है. इन को उम्र की अलगअलग अवस्थाओं में निम्न टीकाकरण करना जरूरी है:

उम्र –  रोग  – स्ट्रेन  – खुराक  – मार्ग

1 दिन  –   मैरेक्स – एचएमटी –  0.2 एमएल  – अधोत्वचीय
5-7 दिन –  रानीखेत – एफ1  – एक बूँद – आंख में
14 दिन  – गमबोरो  -लसोटा  – एक बूंद  – मुंह में
9वां सप्ताह  – रानीखेत  – आर2बी – 0.5 एमएल – अधोत्वचीय
10 से 12 सप्ताह  – चेचक – मुरगीमाता  – 0.2 एमएल – अधोत्वचीय

इस के साथ ही मुरगीशाला को कीटमुक्त करने के लिए 15 दिनों के अंतराल पर कीटनाशी दवा का छिड़काव करते रहें.

मीणा परिवार ने खेती में अपनाए प्राकृतिक तौरतरीके

भरतपुर जिले की भरतपुरबयाना सड़क पर गांव पना के पास कमल मीणा परिवार ने अपने 16 बीघा खेत यानी फार्महाउस में विभिन्न प्रकार के फल व फूलदार पौधे, औषधीय व सब्जियों और खाद्यान्नों की फसलें लगा कर किसानों के लिए समन्वित खेती का बेहतरीन उदाहरण सामने रखा है.

गांव पना में कमल मीणा के इस फार्महाउस को लोग मिनी कृषि विश्वविद्यालय के नाम से अधिक जानते हैं. इस मिनी कृषि विश्वविद्यालय को रोजना दर्जनों लोग देखने आते हैं, ताकि वे इन विधियों को अपने खेतों पर अपना कर आमदनी बढ़ा सकें.

इसी तर्ज पर उन्होंने अपने खेतों में अधिक आमदनी देने वाली फसलें उगाने का मन बनाया, जिसे भरतपुर की लुपिन फाउंडेशन नामक स्वयंसेवी संगठन ने तकनीकी जानकारी दी और उन्नत किस्म के फल व फूलदार पौधे और खाद्यान्नों के बीज मुहैया कराए. उन्होंने अपने फार्महाउस के चारों तरफ की तकरीबन 8 फुंट ऊची दीवार बनाई, ताकि फार्महाउस में लगाई जाने वाली फसलें महफूज रह सकें.

फल व फूलदार पौधे बने अधिक आमदनी का जरीया

गांव पना के सड़क के किनारे बने कृषि फार्महाउस में कमल मीणा ने मलिहाबाद लखनऊ से ललित, कोलकाता से थाई 7, सवाई माधोपुर से बर्फखान व धवन किस्मों के अमरूद के पौधे ला कर लगाए. ये पौधे अभी डेढ़ साल के हैं. जब वे फल देने लगेंगे, तो निश्चय ही तकरीबन 5 लाख रुपए की आमदनी शुरू हो जाएगी.

इसी प्रकार उन्होंने पुष्कर से जामुन, सऊदी अरब से खजूर के पौधे मंगा कर लगाए और काजरी से बेर के रैड कश्मीरी एपल किस्मों के और नीबू के सीडलैस व कागजी किस्मों के पौधे मंगवा कर अपने फार्महाउस में लगाए.

इस के अलावा कमल मीणा ने अपने फार्महाउस में आंवला, अनार, चीकू, शहतूत, सहजन, कचनार, अमलतास के अलावा इमारती लकड़ी व सजावटी किस्मों के सागवान, नीम, फाइकस, मछलीपाम, पाम, अर्जुन, शीशम, बांस वगैरह के पौधे लगाए हैं.

फूलदार पौधों से महका फार्महाउस

कृषि फार्महाउस में गुलाब, गेंदा, मोरपंखी, बारहमासी समेत विभिन्न किस्मों के फूलदार पौधे लगाए हैं, जिस से पूरा फार्महाउस महक रहा है. इन फूलों की बिक्री से

कमल मीणा के परिवार को हर महीने तकरीबन 8,000 से 10,000 रुपए की आमदनी अलग से  हो जाती है.

जैविक सब्जियां व खाद्यान्न बिक रहे हैं अधिक दामों पर

कमल मीणा ने अपने फार्महाउस पर गेहूं की देशी किस्म के बंशी, काली मूंछ वाला, बोधका व काला प्रजाति के गेहूं और देशी किस्म के चना व मसूर की बोआई की है, वहीं सब्जियों में मिर्च, बैगन, टमाटर, गाजर, मेथी, मटर, पालक, धनिया, बथुआ, पत्तागोभी, फूलगोभी, लहसुन व प्याज के साथ गन्ना भी लगा रखा है.

इन सभी फसलों में कैमिकल खादों और कीटनाशक दवाओं के स्थान पर जैविक खाद व डाक्टर सुभाष पालेकर द्वारा विकसित की गई प्राकृतिक कृषि विधि को अपनाया है. सब्जियों और खाद्यान्न की बिक्री से उन्हें हर साल 3 लाख से 4 लाख रुपए की आमदनी हासिल हो रही है.

औषधीय सतावर की खेती से 6 लाख की हुई आमदनी

गांव पना के कमल मीणा ने अपने फार्महाउस में तकरीबन आधा एकड़ खेत में औषधीय फसल सतावर लगाई, जिन की जड़ों की बिक्री से उन्हें आसानी से 6 लाख रुपए की आमदनी हासिल हो गई. वे अपने फार्महाउस में दूसरे औषधीय पौधे भी इस साल लगाएंगे, जिस के लिए जमीन तैयार कर ली गई है.

खुद बनाते हैं प्राकृतिक कीटनाशक व जैविक खाद

‘पद्मश्री’ अवार्ड से नवाजे गए डाक्टर सुभाष पालेकर के टे्रनिंग कैंप में कमल मीणा ने प्राकृतिक खेती की तकनीकी जानकारी हासिल की. लुपिन फाउंडेशन के कृषि वैज्ञानिकों की देखरेख में कमल मीणा ने प्राकृतिक कीटनाशक जीवामृत, नीमास्त्र, अग्नि अस्त्र, दशापणी अर्क, ब्रहा्रास्त्र वगैरह तैयार किया और खुद की फसलों, फल व फूलदार पौधों पर छिड़काव करते हैं, ताकि कीटनाशक दवाओं से उत्पाद जहरीले नहीं हो सकें. कैमिकलखादों के स्थान पर उन्होंने वर्मी कंपोस्ट का प्रयोग करने के लिए अपने फार्महाउस पर वर्मी कंपोस्ट यूनिट लगा रखी है.

Farming

 

खेती में आधुनिक उपकरणों का कर रहे हैं इस्तेमाल

कमल मीणा ने अपने फार्महाउस पर सिंचाई के लिए सोलर पंप सैट लगा रखा है और बूंदबूंद व फव्वारा सिंचाई पद्धति का उपयोग करते हैं, ताकि सिंचाई में पानी की बचत हो और उत्पादन बढ़ सके. इस के अलावा वे जुताई के लिए पावर टिलर, गुड़ाई के लिए हैंड हो साइकिल, ट्रिबलर वगैरह का उपयोग कर रहे हैं.

दुधारू पशु भी आमदनी में बन रहे हैं मददगार

कमल मीणा ने अपने फार्महाउस में गिर नस्ल की गाय और मुर्रा नस्ल की भैंसें पाल रखी हैं, जिन्हें हरा चारा मुहैया कराने के लिए बरसीम व कांचनी भी अपने फार्महाउस में लगा रखी है.

डेयरी लगाने के लिए नाबार्ड से सब्सिडी

हमारे देश के किसान अपने खेत में मवेशियों का जम कर इस्तेमाल करते हैं और उस का दूध बेच कर अतिरिक्त आमदनी हासिल करते हैं, पर ज्यादातर किसानों को पता ही नहीं है कि सरकार उन के लिए कई योजनाएं लाती है, लिहाजा वे इन योजनाओं का फायदा उठा नहीं पाते हैं.

अगर किसानों को इन सरकारी योजनाओं का फायदा लेना है तो जागरूक होना होगा. समयसमय पर इन योजनाओं की जानकारी लेनी होगी, तभी हम इन योजनाओं का भरपूर लाभ ले सकते हैं.

रोजगार की लगातार बढ़ती संभावनाओं के बीच केंद्र सरकार द्वारा डेयरी उद्यमिता विकास योजना चलाई जा रही है. इस योजना के तहत किसान दूध की डेयरी खोल कर पैसे कमा सकते हैं.

केंद्र सरकार के कृषि मंत्रालय द्वारा यह सब्सिडी राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक यानी नाबार्ड के माध्याम से दी जाती है. इस के अलावा आप वाणिज्यिक बैंक, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, राज्य सहकारी बैंक, राज्य सहकारी कृषि और ग्रामीण विकास बैंक या फिर ऐसे दूसरे संस्थान, जो नाबार्ड से पुन:वित्त पोषण के लिए योग्य पात्र हैं, से भी सब्सिडी ले सकते हैं.

कृषि मंत्रालय द्वारा जारी सर्कुलर के मुताबिक, अगर आप एक छोटी डेरी खोलना चाहते हैं, तो उस में आप को क्रौस ब्रीड देशी गाय (औसत से ज्यादा दूध देने वाली) जैसे साहीवाल, रैड सिंधी, गिर, राठी वगैरह भैंस रखनी होगी.

इस के अलावा इस योजना के तहत दूध से बने उत्पाद बनाने की यूनिट लगाने के लिए भी सब्सिडी दी जाती है. इस योजना के तहत दूध उत्पाद की प्रोसैसिंग के लिए आप उपकरण खरीद सकते हैं.

अगर दूध उत्पाद की प्रोसैसिंग से संबंधित मशीनें खरीदते हैं  तो आप को इस के लिए सब्सिडी मिल सकती है.  डेयरी उद्यमिता विकास योजना के तहत दूध और दूध से बने उत्पाद के संरक्षण के लिए आप कोल्ड स्टोरेज यूनिट लगा सकते हैं.

इस के अलावा राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक यानी नाबार्ड की तरफ से डेयरी उद्यमिता विकास योजना के तहत सीमांत किसान, बहुत ज्यादा गरीब, म?ाले व दूसरे किसानों के लिए संकर नस्ल की गाय या भैंस खरीदने, पढे़लिखे बेरोजगारों के लिए डेयरी खोलने व वर्मी कंपोस्ट इकाई लगाने, निजी पशु चिकित्सक के लिए पशु चिकित्सा इकाई और दूसरे कामों के लिए डेयरी इकाई, मिल्क कोल्ड स्टोरेज यूनिट लगाने, दूध प्रोसैसिंग प्लांट लगाने के लिए सब्सिडी वाली कर्ज व्यवस्था दिए जाने का प्रावधान है. इस के अलावा बछड़ापालन, सूअरपालन, मुरगीपालन व दूसरे कामों के लिए लघु व सीमांत किसानों समेत अन्य समूहों को प्राथमिकता दी जाती है.

योजना का खास मकसद

* स्वच्छ दूध उत्पादन के लिए आधुनिक डेरी फार्म को बढ़ावा देना.

* बछिया या बछड़ापालन को बढ़ावा देना, जिस से अच्छे प्रजनन स्टौक का संरक्षण किया जा सके.

* असंगठित क्षेत्र में संरचनात्मक बदलाव लाना, जिस से कि दूध की शुरुआती प्रोसैसिंग गांव लैवल पर ही की जा सके.

* कारोबारी पैमाने पर दूध संरक्षण के लिए क्वालिटी और पारंपरिक प्रौद्योगिकी को आगे ले जाना.

* मुख्य रूप से असंगठित क्षेत्र के लिए स्वरोजगार पैदा करना और बुनियादी सहूलियतें मुहैया कराना.

किसे मिल सकता है योजना का लाभ

किसान, निजी उद्यमी, गैरसरकारी संगठन, कंपनियां, असंगठित और संगठित क्षेत्र के समूह वगैरह. संगठित क्षेत्र के समूह में स्वयं सहायता समूह यानी एसएचजी, डेरी सहकारी समितियां, दूध संगठन, दूध महासंघ वगैरह शामिल हैं.

एक व्यक्ति इस योजना के तहत सभी घटकों के लिए सहायता ले सकता है, लेकिन हर घटक के लिए केवल एक बार ही पात्र होगा.

योजना के तहत एक ही परिवार के एक से अधिक सदस्य को सहायता दी जा सकती है, बशर्ते कि इस योजना के तहत वे अलगअलग जगहों पर अलग बुनियादी सुविधाओं के साथ अलग इकाई लगाएं. इस तरह की 2 परियोजनाओं  की चारदीवारी के बीच की दूरी कम से कम 500 मीटर होनी चाहिए.

बीते 8 वर्षों में 51 फीसदी बढ़ा दूध उत्पादन

गांधीनगर: केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने गुजरात के गांधीनगर में नेशनल कोआपरेटिव डेयरी फेडरेशन औफ इंडिया (NCDFI) लिमिटेड के मुख्यालय का शिलान्यास किया एवं ईमार्केट अवार्ड 2023 समारोह को संबोधित किया.

इस अवसर पर गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल, गुजरात विधानसभा के अध्यक्ष शंकर चौधरी, इफको के अध्यक्ष दिलीप संघाणी, एनडीडीबी के अध्यक्ष डा. मीनेश शाह और एनसीडीएफआई के अध्यक्ष डा. मंगल राय समेत अनेक लोग मौजूद थे.

अपने संबोधन में गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि हमारे देश में डेयरी और खासकर कोआपरेटिव डेयरी सैक्टर ने बहुआयामी लक्ष्यों को हासिल किया है. अगर दूध का व्यापार कोआपरेटिव सैक्टर नहीं करता है, तो दूध उत्पादन, एक बिचौलिए और दूध का उपयोग करने वाले तक सीमित रहता है.

लेकिन अगर कोऑपरेटिव सेक्टर कोऑपरेटिव तरीके से दूध का व्यापार करता है तो इसमें कई आयाम एक साथ जुड़ जाते हैं, क्योंकि इसमें उद्देश्य मुनाफे का नहीं है और इसका बहुआयामी फायदा समाज, कृषि, गांव, दूध उत्पादक और आखिरकार देश को होता है.

उन्होंने कहा कि भारत ने पिछले 50 साल में इस सफलता की गाथा की अनुभूति की है.

Amit Shahसहकारिता मंत्री ने कहा कि आज विश्व के दुग्ध उत्पादन में भारत 24% हिस्से के साथ पहले स्थान पर पहुंच चुका है और प्रधानमंत्री मोदी जी के नेतृत्व में भारत में पिछले 8 वर्षों में दूध उत्पादन में लगभग 51% वृद्धि हुई है जो विश्व में सबसे तेजी के साथ हुई बढ़ोत्तरी है. यह सिर्फ इसलिए संभव हुआ है क्योंकि इनमें ज्यादातर उत्पादन कोऑपरेटिव डेयरी के माध्यम से हुआ है.

उन्होंने कहा कि अगर कोऑपरेटिव डेयरी चलानी है तो उसे पोषित करने वाली अनेक संस्थाएं बनानी पड़ेगी और एनसीडीएफआई यह काम करेगी.

उन्होने कहा कि NCDFI एक प्रकार से सभी डेयरी को गाइडेंस देने का काम कर रही है. शाह ने कहा कि जिस वासी गांव से श्वेत क्रांति की शुरुआत हुई, वहीं आणंद जिले में लगभग 7000 वर्ग मीटर क्षेत्र में एनसीडीएफआई का मुख्यालय बनने जा रहा है. यह करीब 32 करोड़ रुपए के खर्च से बनेगा और सौर ऊर्जा संयंत्र से संचालित होगा. उन्होंने कहा कि नया मुख्यालय भवन 100 प्रतिशत ग्रीन बिल्डिंग होगा.

कोऑपरेटिव सेक्टर के जरिए पोषण आंदोलन

गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि जब कोऑपरेटिव सेक्टर डेयरी का बिजनेस करता है तब सबसे पहला फायदा दूध उत्पादकों को होता है, क्योंकि उनका शोषण नहीं होता है. उन्होंने कहा कि अगर कोई अकेला दूध का उत्पादन करता है तो उसके पास दूध के स्टोरेज की क्षमता नहीं होती और वह मार्केट को एक्सप्लोर नहीं कर सकता. लेकिन अगर कोऑपरेटिव सेक्टर दूध का बिजनेस करता है तो गांव और जिला स्तर पर दूध संघ बनते हैं और उनके पास कोल्ड स्टोरेज, प्रोसेसिंग, मार्केट की डिमांड के मुताबिक दूध को उस उत्पाद में कन्वर्ट करने की क्षमता होती है. इससे मुनाफे को कोऑपरेटिव आधार पर दूध उत्पादन करने वाली बहनों के पास पहुंचाने की व्यवस्था भी होती है और इस तरह दूध उत्पादन करने वाली बहनों का शोषण समाप्त हो जाता है. उन्होंने कहा कि अकेला दूध का उत्पादन करने वाला व्यक्ति अपने पशुओं के स्वास्थ्य की चिंता नहीं कर सकता है, लेकिन अगर कोऑपरेटिव तरीके से दूध उत्पादन किया जाए तो जिला दूध उत्पादक संघ पशु की नस्ल सुधार, स्वास्थ्य सुधार और पशुओं के अच्छे आहार की भी व्यवस्था करता है.

अन्य लाभ यह है कि अगर कोऑपरेटिव सेक्टर के जरिए दूध का बिजनेस होता है तो यह पोषण आंदोलन से स्वत: जुड़ जाता है.

अमित शाह ने कहा कि वह बनासकांठा की डेयरी सहित कई ऐसी डेरियों के बारे में जानते हैं जो कुपोषित बच्चों को पोषण युक्त दूध देकर उनके स्वास्थ्य की चिंता करती हैं. अहमदाबाद डेयरी जैसी कई डेयरियां गर्भवती महिलाओं को लड्डू देकर उनके और उनके बच्चे के पोषण की चिंता करती हैं और पूरा कोऑपरेटिव सेक्टर कुपोषण के खिलाफ लड़ाई में जुड़ गया है.

सहकारिता मंत्री ने कहा कि डेयरी और डेयरी टेक्नोलॉजी के बारे में एक जमाने में भारत के लिए कल्पना करना भी मुश्किल था, लेकिन हमने ऐसे प्रयास किए कि पूरे भारत में सिमेट्रिक दूध उत्पादन शुरू हुआ. कई क्षेत्र ऐसे हैं जो कोऑपरेटिव डेयरी से नहीं जुड़े थे, वहां भी एनडीडीबी के माध्यम से गुजरात की सक्षम डेयरियां उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे उत्तर भारतीय राज्यों में अपने काम का विस्तार कर रही हैं और कोऑपरेटिव तरीके से अपने काम को बढ़ा रही हैं.

उन्होंने कहा कि अगर देश के हर गांव में सिमेट्रिक तरीके से दूध उत्पादन करना है और हर घर को आत्मनिर्भर बनाना है तो यह काम केवल कोऑपरेटिव डेयरी के जरिए ही संभव है.

डेयरियों ने दूध उत्पादन देश का नाम किया रोशन

Milkअमित शाह ने कहा कि भारत की डेयरियों ने दूध उत्पादन में विश्व में देश का नाम रोशन किया है. उन्होंने कहा कि 1946 में जब गुजरात में एक डेयरी ने शोषण शुरू किया तो इसके खिलाफ सरदार वल्लभभाई पटेल ने त्रिभुवन भाई को प्रेरित किया और 1946 में 15 गांवों में छोटी-छोटी डेयरी की शुरुआत हुई. उन्होंने कहा कि 1946 में शोषण के खिलाफ हुई एक छोटी सी शुरुआत विराट आंदोलन में परिवर्तित हुई और इसी से देश में श्वेत क्रांति का विचार आया और एनडीबीबी का उद्भव हुआ.

देश भर में अनेक कोऑपरेटिव डेरियाँ बनी

उन्होंने कहा कि आज देश भर में विकसित होकर अनेक कोऑपरेटिव डेरियाँ बनी है. अमूल प्रतिदिन लगभग 40 मिलियन लीटर दूध की प्रोसेसिंग करता है और 36 लाख बहनें दूध का भंडारण करती हैं और हर सप्ताह उन्हें उत्पादित दूध की कीमत मिल जाती है. श्री शाह ने कहा कि 2021-22 में अमूल फेडरेशन का टर्नओवर 72000 करोड़ रुपए का है.

गोबर के गमले और ईंटें

पशुपालन से देश में काफी लोग जुड़े हैं और यह आमदनी का अच्छा जरीया भी बन रहा है. पशुपालन से दूध का कारोबार करने के साथ ही गोबर से खाद बनाई जाती रही है, लेकिन अब गोबर से गमले, ईंटें व दूसरी चीजें भी बनाई जा रही हैं, जो पशुपालकों की आमदनी तो बढ़ाती हैं, साथ ही साथ पर्यावरण के लिए यह अच्छा है.

गायभैंस जैसे पशुओं का चारा मुख्यत: पेड़पौधे ही होते हैं. गोबर उस चारे के न पचने वाले अवशेष हैं, जिन में कार्बनिक पदार्थ शामिल होते हैं.

हरियाणा गौवंश अनुसंधान केंद्र में गोबर में चिकनी मिट्टी, चूना पाउडर व अन्य चीजों को मिला कर गमले व ईंटें तैयार करने का काम हो रहा है.

गोबर का गमला

गोबर से बना गमला प्राकृतिक रूप से काफी उपयोगी है, जिसे मशीन से बनाया जाता है. इस गमले की खासीयत यह है कि इस में मिट्टी भर कर पौधे को लगा कर कहीं भी रख सकते हैं. चाहे तो पूरे गमले को पौधे सहित जमीन में भी दबा कर लगा सकते हैं. इस से गमले में लगे पौधे की अच्छी बढ़वार भी होगी.

गोबर से बना गमला एक प्राकृतिक उत्पाद है, जिस से इस गमले में लगे पौधे को गोबर के खाद का भी फायदा मिलता है.

गोबर से बने गमलों के इस्तेमाल से पौलीथिन के इस्तेमाल में भी कमी आ सकती है. जरूरी है लोगों में प्रकृति के प्रति जागरूकता लाने की.

गोबर से ईंटें बनाना

हरियाणा गौवंश अनुसंधान केंद्र का कहना है कि ऐसी ईंटें वजन में हलकी होती हैं और घर के अंदर के तापमान को नियंत्रित करती हैं. इन ईंटों में आग भी नहीं लगती.

इस अनुसंधान केंद्र ने ईंटों को वैज्ञानिक जांच व प्रमाणिकता के लिए एनएबीएल प्रयोगशाला में भेजा है. अगर सबकुछ ठीक रहा, तो यह अपनेआप में बेहतर विकल्प होगा.

बढ़ रहा अंडे और ब्रायलर का उत्पादन

नई दिल्लीः पशुपालन एवं डेयरी विभाग की सचिव अलका उपाध्याय की अध्यक्षता में दिल्ली में एक गोलमेज बैठक आयोजित की गई. यह बैठक भारतीय पोल्ट्री तंत्र को मजबूती देने के लिए की गई. इस बैठक में देश की प्रमुख पोल्ट्री कंपनियां, राज्य सरकारें और उद्योग संघ एक मंच पर साथ नजर आए.

बैठक में सचिव अलका उपाध्याय ने इस बात पर प्रकाश डाला कि भारतीय पोल्ट्री क्षेत्र, जो अब कृषि का एक अभिन्न अंग है, ने प्रोटीन और पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. जहां फसलों का उत्पादन हर साल 1.5 से 2 फीसदी दर से बढ़ रहा है, वहीं अंडे और ब्रायलर का उत्पादन 8 से 10 फीसदी की दर से हर साल बढ़ रहा है.

पिछले 2 दशकों में भारतीय पोल्ट्री क्षेत्र एक विशाल उद्योग के रूप में विकसित हुआ है, जिस ने भारत को अंडे और ब्रायलर मांस के प्रमुख वैश्विक उत्पादक के रूप में स्थापित किया है.

सचिव अलका उपाध्याय ने बताया कि पशुपालन एवं डेयरी विभाग निर्यात को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न पहलें कर रहा है. विभाग ने हाल ही में उच्च रोगजनकता वाले एवियन इन्फ्लुएंजा से मुक्ति की स्वघोषणा प्रस्तुत की.

निर्यात को बढ़ावा देने के लिए विभाग ने 33 पोल्ट्री कंपार्टमेंटों को एवियन इन्फ्लुएंजा से नजात माना है. विभाग ने वैधता के आधार पर विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन को 26 विभाग अधिसूचित किए हैं. 13 अक्तूबर, 2023 को स्वघोषणा को विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन द्वारा अनुमोदित किया गया था. इस के अलावा विभाग ने पिछले वर्षों में चारे की कमी की समस्या को हल करने के लिए कदम उठाए हैं. साथ ही, विभाग ने पोल्ट्री उत्पादों की खपत के खिलाफ कोविड काल के दौरान देशभर में फैली भ्रामक सूचनाओं का मुकाबला करने के लिए भी कदम उठाए.

अलका उपाध्याय ने पोल्ट्री निर्यात को बढ़ावा देने, भारतीय पोल्ट्री क्षेत्र को मजबूत करने, व्यापार करने में सुधार करने, पोल्ट्री उत्पाद निर्यात में चुनौतियों का समाधान करने और अनौपचारिक क्षेत्र में इकाइयों के एकीकरण की रणनीति बनाने और विश्व मंच पर पोल्ट्री क्षेत्रों की स्थिति को और मजबूत करने पर बल दिया.

उन्होंने पोल्ट्री और उस से संबंधित उत्पादों के अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को सुविधाजनक बनाने के लिए पोल्ट्री कंपार्टमेंटलाइजेशन की अवधारणा को अपना कर एचपीएआई से जुड़े जोखिमों को कम करने के लिए विभाग के सक्रिय दृष्टिकोण पर अंतर्दृष्टि भी साझा की.

वित्तीय वर्ष 2022-23 में भारत ने वैश्विक बाजार में महत्वपूर्ण प्रगति की. उल्लेखनीय 664,753.46 मीट्रिक टन पोल्ट्री उत्पादों का 57 से अधिक देशों को निर्यात किया, जिस का कुल मूल्य 1,081.62 करोड़ रुपए (134.04 मिलियन अमरीकी डालर).

एक हालिया बाजार अध्ययन के अनुसार, भारतीय पोल्ट्री बाजार ने वर्ष 2024-2032 तक 8.1 फीसदी की सीएजीआर के साथ वर्ष 2023 में 30.46 बिलियन अमेरिकी डालर का उल्लेखनीय मूल्यांकन हासिल किया.

इस गोलमेज बैठक ने गतिशील विचारविमर्श के लिए एक मंच के रूप में काम किया, जिस ने वर्तमान चुनौतियों का समाधान करने और भारतीय पोल्ट्री क्षेत्र के सतत विकास के लिए मजबूत रणनीति तैयार करने के लिए सहयोगात्मक प्रयासों को प्रोत्साहित किया. बैठक में पोल्ट्री क्षेत्र के प्रतिनिधियों, निर्यातकों ने पोल्ट्री निर्यात से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर चर्चा की.

भेड़ बकरी पालन में जागरूक बन करें विकास

अविकानगर: केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान अविकानगर में जगन्नाथ यूनिवर्सिटी चाकसू जयपुर के 70 एग्रीकल्चर स्नातक के स्टूडैंट्स का एक दिवसीय शैक्षणिक भ्रमण कार्यक्रम अपनी फैकल्टी डा. जितेंद्र कुमार शर्मा, डा. रामावोतर शर्मा, इंजीनियर एंजेलो डेनिश के साथ आयोजित किया गया.

निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर के अनुसार कृषि व पशुपालन में भविष्य में स्टूडैंट्स को ज्यादा से ज्यादा जागरूक कर ही इस में उद्यमिता का विकास किया जा सकता है, इसलिए स्टूडैंट्स ने भ्रमण के दौरान संस्थान के दुंबा भेड़, अविशान भेड़, बकरी एवं खरगोशपालन इकाई के विजिट के साथ टैक्नोलौजी पार्क, मैडिसिनल गार्डन, हौर्टिकल्चर, चारा एवं पशुओं के लिए आवश्यक चारा वृक्ष व अन्य पोषण प्रबंधन के बारे में जान कर वहां पर उपस्थित संस्थान के कर्मचारियों के साथ संस्थान मे चल रहे शोध कार्य को जाना.

एटिक सैंटर के तकनीकी कर्मचारी मोहन सिंह द्वारा स्टूडैंट्स को संस्थान का एक दिवसीय भ्रमण के तहत विभिन्न जगह जैसे वूल प्लांट, सैक्टर्स, प्रदर्शनी हाल, फिजिलौजी आदि का भी भ्रमण कराया गया

खेती और पशुपालन को बनाएं उद्योग

अविकानगर: केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान, अविका नगर में अनुसूचित जाति उपयोजना के अंतर्गत पांचदिवसीय “उन्नत भेड़बकरी एवं खरगोशपालन” पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया. इस मौके पर डा. अजय कुमार नोडल अफसर एससीएसपी उपयोजना ने संस्थान द्वारा मालपुरा के विभिन्न गांव में किए जा रहे काम के बारे में विस्तार से निदेशक व किसानो को जानकारी दी.

पांचदिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत मालपुरा तहसील के बरोल गांव के 25 अनुसूचित जाति समाज के महिला व पुरुषों ने विभिन्न विषय नस्ल चयन, पोषण, स्वास्थ्य, प्रजनन, चारा एवं उत्पादों का बाजार के अनुसार वैल्यू एडिशन पर विस्तार से संबोधन लेक्चर्स के माध्यम से जानकारी प्राप्त की.
निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर ने प्रशिक्षण के समापन अवसर पर सभी से कहा कि आप बाजार की आवश्यकता के अनुसार खेती व पशुपालन करें, जिस से उन से अच्छा मुनाफा मिल सके.

Farmingउन्होंने आगे कहा कि संस्थान में जो यहां सीखा, उस को अपने फार्म पर जा कर धीरेधीरे अपनाना है और भारत सरकार की योजनाओं का लाभ लेते हुए अपनी खेती और पशुपालन को उद्यमिता की ओर ले जाए.
अंत में निदेशक द्वारा सभी किसानों को सफलतापूर्वक प्रशिक्षण समापन पर प्रमाणपत्र का वितरण किया गया. प्रशिक्षण कार्यक्रम समन्वयक डा. लीलाराम गुर्जर प्रभारी तकनीकी स्थानांतरण विभाग एवं समन्वयक डा. रंगलाल मीना द्वारा किया गया.

घर बैठे होगा पशु टीकाकरण

संत कबीर नगर: पशुपालन विभाग द्वारा संचालित खुरपका, मुंहपका बीमारी के टीकाकरण का शुभारंभ करते हुए पशुपालन विभाग की नव बहुद्देशीय गाड़ियों को हरी झंडी दिखा कर रवाना किया गया.

मेहदावल के विधायक अनिल कुमार त्रिपाठी द्वारा बताया गया कि जनपद में कुल लगभग 2,28,000 गोवंश एवं महिषवंशीय पशु हैं, जिन में शतप्रतिशत टीकाकरण किए जाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है. राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यकम के अंतर्गत खुरपकामुंहपका टीकाकरण अभियान का तृतीय चरण जनपद में शुरू किया जा रहा है. इस कार्यकम के तहत जनपद में समस्त गोवंशीय पशु एवं महिषवंशीय पशु का टीकाकरण (4 माह से छोटे और 8 माह से ऊपर ग्याबन पशुओं को छोड़ कर) किया जाना है.

जिलाधिकारी महेंद्र सिंह तंवर ने बताया कि खुरपकामुंहपका एवं विषाणुजनित संक्रामक रोग है, जिस के संकमण में आ जाने के उपरांत पशु को तेज बुखार आता है, मुंह से लार गिरती है, मुह एवं पैरों में छाले पड़ जाते है, पशु चारा खाना छोड़ देता है, दूध उत्पादन घट जाता है. गाभिन पशु बच्चा गिरा देता है और सही समय पर उपयुक्त इलाज नहीं दिया गया, तो पशु की मौत भी हो सकती है.

Animal Careउन्होंने बताया कि इस रोग से बचाव के लिए टीकाकरण ही एकमात्र उपाय है. राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यकम, जो केंद्र सरकार द्वारा पोषित है और राज्य सरकार द्वारा संचालित है, में समस्त पशुपालकों के द्वार पर उन के पशुओं में निःशुल्क टीकाकरण किया जाता है. इस कार्यकम में टीकाकरण से पूर्व कान में छल्ला लगवाना (ईयर टैगिंग) अनिवार्य है.

मुख्य पुश चिकित्साधिकारी द्वारा सभी पशुपालकों से अपील की गई है कि पशुपालन विभाग द्वारा चलाए जा रहे 45 दिवसीय अभियान के दौरान टीकाकरण कर्मियों का सहयोग करते हुए अपने समस्त पशुओं में (4 माह से छोटे एवं 8 माह से ऊपर ग्याबन पशुओं को छोड़ कर) टीका अवश्य लगवाएं.

इस अवसर पर मुख्य चिकित्साधिकारी डा. यशपाल सिंह, उपनिदेशक कृषि डा. राकेश कुमार सिंह, जिला कृषि रक्षा अधिकारी शशांक, उपमुख्य पशु चिकित्साधिकारी, मेहदावल और जनपद के समस्त पशु चिकित्सा अधिकारी आदि उपस्थित रहे.