गाजर घास (Carrot Grass) से फसल का बचाव

गाजर घास की 20 प्रजातियां पूरे विश्व में पाई जाती हैं. गाजर घास की उत्पत्ति का स्थान दक्षिण मध्य अमेरिका है. अमेरिका, मैक्सिको, वेस्टइंडीज, चीन, नेपाल, वियतनाम और आस्ट्रेलिया के विभिन्न भागों में फैला यह खरपतवार भारत में अमेरिका या कनाडा से आयात किए गए गेहूं के साथ आया.

हमारे देश में साल 1951 में सब से पहले पूना में नजर आने के बाद यह विदेशी खरपतवार करीब 35 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में फैल चुका है. यह खरपतवार जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड के विभिन्न भागों में फैला हुआ है.

गाजर घास को देश के विभिन्न भागों में अलगअलग नामों जैसे कांग्रेस घास, सफेद टोपी, चटक चांदनी व गंधी बूटी आदि नामों से जाना जाता है. कांग्रेस घास इस का सब से ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला नाम है. यह घास खाली जगहों, बेकार जमीनों, औद्योगिक क्षेत्रों, बगीचों, पार्कों, स्कूलों, सड़कों और रेलवे लाइनों के किनारों पर बहुतायत में पाई जाती है. पिछले कुछ सालों से इस का प्रकोप सभी तरह की खाद्यान्न फसलों, सब्जियों व फलों में बढ़ता जा रहा है.

वैसे तो गाजर घास पानी मिलने पर साल भर फलफूल सकती है, पर बारिश के मौसम में ज्यादा अंकुरण होने पर यह खतरनाक खरपतवार का रूप ले लेती है. गाजर घास का पौधा 3-4 महीने में अपना जीवनचक्र पूरा कर लेता है. 1 साल में इस की 3-4 पीढि़यां पूरी हो जाती हैं.

करीब डेढ़ मीटर लंबे गाजर घास के पौधे का तना काफी रोएंदार और शाखाओं वाला होता है. इस की पत्तियां काफी हद तक गाजर की पत्तियों की तरह होती हैं. इस के फूलों का रंग सफेद होता है. हर पौधा 1000 से 50000 बेहद छोटे बीज पैदा करता है, जो जमीन पर गिरने के बाद नमी पा कर अंकुरित हो जाते हैं.

गाजर घास के पौधे हर प्रकार के वातावरण में तेजी से बढ़ते हैं. ये ज्यादा अम्लीयता व क्षारीयता वाली जमीन में भी उग सकते हैं. इस के बीज अपनी 2 स्पंजी गद्दियों की मदद से हवा व पानी के जरीए एक स्थान से दूसरे स्थान तक आसानी से पहुंच जाते हैं.

गाजर घास से होने वाले नुकसान

* गाजर घास से इनसानों को एग्जिमा, एलर्जी, बुखार व दमा जैसी बीमारियां हो जाती हैं. इस का 1 परागकण भी इनसान को बीमार करने के लिए काफी है. इस के परागकण श्वसन तंत्र में घुस कर दमा व एलर्जी पैदा करते हैं. इस के  ज्यादा असर से इनसानों की मौत तक हो जाती है.

* गाजर घास की वजह से खाद्यान्नों की फसलों की पैदावार में 40 फीसदी तक की कमी आंकी गई है. इस से फसलों की उत्पादकता घट जाती है.

* इस पौधे से ऐलीलो रसायन जैसे पार्थेनिन, काउमेरिक एसिड, कैफिक ऐसिड वगैरह निकलते हैं, जो अपने आसपास

किसी अन्य पौधे को उगने नहीं देते हैं. इस से फसलों के अंकुरण और बढ़वार पर बुरा असर पड़ता है.

* गाजर घास के वन क्षेत्रों में तेजी से फैलने के कारण कई खास वनस्पतियां और जड़ीबूटियां खत्म होती जा रही हैं.

* दलहनी फसलों में यह खरपतवार जड़ ग्रंथियों के विकास को प्रभावित करता है और नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले जीवाणुओं की क्रियाशीलता को कम कर देता है.

* इस के परागकण बैगन, मिर्च व टमाटर वगैरह सब्जियों के पौधों पर जमा हो कर उन के परागण, अंकुरण व फल विन्यास को प्रभावित करते हैं और पत्तियों में क्लोरोफिल की कमी व पुष्प शीर्षों में असामान्यता पैदा कर देते हैं.

* पशुओं के चारे में इस खरपतवार के मिल जाने से दुधारू पशुओं के दूध में कड़वाहट आने लगती है. ज्यादा मात्रा में इसे चर लेने से पशुओं की मौत भी हो सकती है.

गाजर घास के इस्तेमाल

* गाजर घास से कई तरह के कीटनाशक, जीवाणुनाशक और  खरपतवारनाशक बनाए जा सकते हैं.

* इस की लुगदी से कई तरह के कागज तैयार किए जा सकते हैं.

* बायोगैस उत्पादन में भी इसे गोबर के साथ मिलाया जा सकता है.

ऐसे करें रोकथाम

* बारिश के मौसम में गाजर घास को फूल आने से पहले जड़ से उखाड़ कर कंपोस्ट व वर्मी कंपोस्ट बनाना चाहिए.

* घर के आसपास गेंदे के पौधे लगा कर गाजर घास के फैलाव को रोका जा सकता है.

* मैक्सिकन बीटल (जाइगोग्रामा बाइकोलाराटा) रामकीट को बारिश के मौसम में गाजर घास पर छोड़ना चाहिए.

* गाजर घास की रासायनिक विधि द्वारा रोकथाम करने के लिए खरपतवार वैज्ञानिक की सलाह लेनी चाहिए.

* नमक के 20 फीसदी घोल से गाजर घास की रोकथाम की जा सकती है, पर यह विधि छोटे क्षेत्र के लिए ही ठीक है.

* गैर कृषि क्षेत्रों में इस की रोकथाम के लिए शाकनाशी रसायन एट्राजिन का इस्तेमाल फूल आने से पहले 1.5 किलोग्राम सक्रिय तत्त्व प्रति हेक्टेयर की दर से करना चाहिए. ऐसे क्षेत्रों में शाकनाशी रसायन जैसे ग्लाइफोसेट 1.5-2.0 फीसदी या मेट्रीब्यूजिन 0.3-0.5 फीसदी घोल का फूल आने से पहले छिड़काव करने से गाजर घास नष्ट हो जाती है.

* मक्का, ज्वार व बाजरा की फसलों में एट्राजिन 1-1.5 किलोग्राम सक्रिय तत्त्व प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई के तुरंत बाद (अंकुरण से पहले) इस्तेमाल करना चाहिए.

* जमीन को गाजर घास से बचाने के लिए सामुदायिक कोशिशें बहुत जरूरी हैं. गांवों, शहरी कालोनियों, स्कूलों, महाविद्यालयों में रहने या पढ़ने वाले लोगों को चाहिए कि वे अपने आसपास की जमीन को गाजर घास से मुक्त रखें. इसी तरह की कोशिशों से पंजाब राज्य के लुधियाना जिले का मनसूरा गांव पहला गाजर घास मुक्त क्षेत्र बन गया है.

* जगहजगह जा कर लोगों को गाजर घास के नुकसानों व रोकथाम के बारे में जानकारी दे कर उन्हें जागरूक करना चाहिए.

* हर साल अगस्तसितंबर में गाजर घास जागरूकता सप्ताह मनाया जाता है, क्योंकि अक्तूबरनवंबर में गाजर घास सब से ज्यादा होती है.

आलू (Potato) की खेती

आलू (Potato) दैनिक आहार का एक अभिन्न हिस्सा है. वर्षभर आलू (Potato) की उपलब्धता रहती है. आलू (Potato) से सब्जी, पकौड़े, समोसे, चिप्स बनाने के अलावा इस का व्रत में फलाहार के रूप में भी प्रयोग किया जाता है. प्रति व्यक्ति आलू (Potato) की उपलब्धता 16 किलो प्रति वर्ष है, जो निश्चित रूप से कम है. आलू (Potato) की उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए इस की तकनीकी को समझना होगा.

प्रसार्ड ट्रस्ट मल्हनी, देवरिया के निदेशक का कहना है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में धान काटने के बाद किसान दिसंबर तक आलू लगाते है, जिस से कीट बीमारियों का प्रकोप बढ़ जाता है, उपज पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है. यदि आलू 25 अक्तूबर तक लगा दिया जाए तो कीट और बीमारियों का प्रकोप कम होता है तथा उत्पादन भी अच्छा होता है.

आलू की प्रमुख किस्मों में कुफरी अशोका, कुफरी चंद्रमुखी, कुफरी सूर्या 70-80 दिनों में तैयार हो जाती हैं. इन की उत्पादन क्षमता 250 से 300 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है. कुफरी बहार, कुफरी पुखराज, कुफरी लालिमा, कुफरी अरुण, कुफरी गिरीराज, कुफरी कंचन, कुफरी पुष्कर, कुफरी ज्योति 90-100 दिनों में तैयार हो जाती हैं. उत्पादन क्षमता 250-300 क्विंटल प्रति हैक्टेयर है.

कुफरी सतलुज,कुफरी आनंद, कुफरी सिंदूरी, कुफरी चिप्सोना-1, 2, 3 आदि 110-120 दिनों की किस्में हैं, जिस का उत्पादन प्रति हैक्टेयर 350 से 400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

आलू की खेती के लिए बलुई दोमट एवं दोमट मृदा सर्वोच्च होती है. प्रति हैक्टेयर में 30 से 35 क्विंटल कंद (35-40 या 40-50 ग्राम के कंद अथवा 3.5 से 4।सैंटीमीटर वाले कंद) प्रर्याप्त होते हैं. पंक्ति से पंक्ति की दूरी 60 सैंटीमीटर तथा कंद से कंद की दूरी बीज आलू के आकार के अनुसार 20-30 सैंटीमीटर पर रखी जाती है.

आलू बोआई से पहले 250 क्विंटल गोबर की सड़ी खाद प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में मिला दें. उर्वरक का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर करना चाहिए. 150:80:100 नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटाश का प्रयोग प्रति हेक्टेयर की दर से कर सकते हैं. इस की पूर्ति के लिए 260 किलो यूरिया, 176 किलो डाईअमोनियम फास्फेट और 170 किलो म्यूरेट औफ पोटाश का प्रयोग करें. बोआई के समय नाइट्रोजन की आधी मात्रा, फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा का प्रयोग करें. नाइट्रोजन की शेष मात्रा का मिट्टी चढ़ाते समय 20-25 दिन बाद प्रयोग करना चाहिए. आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहना चाहिए. कीट और बीमारियों की निगरानी रखनी चाहिए. अगर आलू भंडारण करना है तो परिपक्व होने पर ही खुदाई करें.

ज्वार (sorghum) की नई किस्म : प्रताप ज्वार 2510

उदयपुर : महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के वैज्ञानिकों ने किसानों, पशुपालकों के लिए ज्वार की नई किस्म प्रताप ज्वार 2510 विकसित की है. इस किस्म का विकास अखिल भारतीय ज्वार अनुसंधान परियोजना, उदयपुर में कार्यरत वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है.

डा. अरविंद वर्मा, निदेशक अनुसंधान, महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर ने बताया कि राजस्थान के दक्षिणीपूर्वी क्षेत्र में ज्वार एक प्रमुख मिलेट फसल है, जो वर्षा आधारित क्षेत्रों में अनाज और पशु चारे के लिए उगाई जाती है. पशु चारे के लिए ज्वार का प्रदेश में प्रमुख योगदान है. उन्होंने बताया कि राजस्थान में ज्वार की खेती लगभग 6.4 लाख हैक्टेयर में की जा रही है एवं मुख्य रूप से अजमेर, नागौर, पाली, टोंक, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, राजसमंद एवं भीलवाड़ा जिलों में इस की खेती होती है.

अनुसंधान निदेशक ने बताया कि अखिल भारतीय ज्वार अनुसंधान परियोजना सन 1970 में प्रारंभ हुई थी तथा इस परियोजना के अंतर्गत अभी तक कुल 11 किस्में क्रमशः एसपीवी 96, एसपीवी 245, राजचरी-1, राजचरी-2, सीएसवी 10, एसपीएच 837, सीएसवी 17, प्रताप ज्वार 1430, सीएसवी 23, प्रताप चरी 1080 एवं प्रताप राज ज्वार-1 अनुमोदित हो चुकी हैं.

ज्वार की नई किस्म प्रताप ज्वार 2510 को पत्र संख्या 40271 के अंतर्गत 9 अक्तूबर, 2024 को जारी भारत सरकार के राजपत्र में राजस्थान राज्य के लिए अधिसूचित किया गया.

परियोजना प्रभारी डा. हेमलता शर्मा ने बताया कि यह मध्यम अवधि (105-110 दिन) में पकने वाली किस्म है, जिस से 40-45 क्विंटल प्रति हैक्टेयर दाने की एवं 130-135 क्विंटल प्रति हैक्टेयर सूखे चारे की उपज प्राप्त होती है तथा यह किस्म एंथ्रेकनोज, जोनेट, मोल्ड रोगों एवं तना मक्खी तथा तना छेदक कीटों के लिए सामान्य प्रतिरोधी है.

डा. अजीत कुमार कर्नाटक, कुलपति, महाराणा प्रताप कृषि प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर ने बताया कि राजस्थान में ज्वार मुख्य रूप से चारे के लिए उगाई जाती है किंतु विगत वर्ष 2023 ‘अंतर्राष्ट्रीय मिलेट वर्ष’ के रूप में मनाया गया, जिस से ज्वार के दानों में पोषक गुणों के बारे में आमजन में जागृति आई है. ज्वार एक ग्लुटेन मुक्त अनाज होता है, अतः इस का उपयोग दलिया, ब्रैड, केक आदि बनाने में किया जाता है. ज्वार के दाने का उपयोग खाद्य तेल, स्टार्च, डेक्सट्रोज आदि के लिए भी किया जाता है.

उन्होंने आगे बताया कि वैज्ञानिक तरीके से ज्वार की खेती करने से राजस्थान के किसान इस से अधिक उत्पादन एवं आर्थिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं.

सर्वोत्तम मिलेट्स मिशन – मोटे अनाज हैं पोषण का भण्डार

रीवा: देश भर में मिलेट्स मिशन चलाया जा रहा है. रीवा जिले में भी कृषि के विविधीकरण के प्रयासों के तहत मोटे अनाजों की पैदावार बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं. मोटे अनाज उगाने के लिए बड़ी संख्या में किसानों ने प्राकृतिक खेती के लिए पंजीयन कराया है. अन्य अनाजों की तुलना में मोटे अनाज आसानी से पचने वाले और अधिक पोषण देने वाले होते हैं. मोटे अनाजों में फाइबर, प्रोटीन, विटामिन और कई तरह के खनिज पाए जाते हैं. मोटे अनाज प्राकृतिक रूप से ग्लूटेन फ्री होते हैं. मोटे अनाज उगाने के लिए परंपरागत खेती की विधियाँ उपयुक्त हैं. इसलिए मोटे अनाज मिट्टी के स्वास्थ्य और पर्यावरण की सुरक्षा में भी सहायक होते हैं.

इस संबंध में उप संचालक कृषि यूपी बागरी ने बताया कि रीवा जिले ही नहीं पूरे विंध्य क्षेत्र में 50 वर्ष पूर्व तक मोटे अनाजों की बड़े पैमाने पर खेती होती थी. कोदौ, ज्वार, मक्का तथा अन्य मोटे अनाज मुख्य रूप से मेहनतकशों और गरीबों का भोजन थे. कम बारिश में भी इनकी अच्छी फसल होती थी.

मोटे अनाजों को कई सालों तक बिना किसी दवा के सुरक्षित भण्डारित रखा जा सकता है. मोटे अनाजों की खेती परंपरागत विधि से की जाती थी. खेती का आधुनिकीकरण होने तथा अधिक उत्पादन के लिए रासायनिक खाद एवं अन्य खादों का उपयोग करने के कारण मोटे अनाजों की खेती कम हो गई. इनका उत्पादन अपेक्षाकृत कम होता है, लेकिन इनकी पोषकता अधिक होती है. इसलिए शासन द्वारा मिलेट्स मिशन के माध्यम से मोटे अनाजों की खेती को बढ़ावा देने के प्रयास किए जा रहे हैं.

चावल और गेंहू के कुल कृषि आच्छादन में 20 प्रतिशत की कमी करके इनके स्थान पर मोटे अनाजों की खेती का लक्ष्य रखा गया है. इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए देश में 10.8 लाख टन मोटे अनाजों की खेती करनी होगी. मोटे अनाजों की खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने इनका न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करना शुरू किया है.

खेतों में संतुलित खाद का उपयोग करें

रीवा: उप संचालक कृषि ने किसानों को फसलों में खाद के संतुलित उपयोग की सलाह दी है. उन्होंने कहा है कि किसान भाई खेतों में खाद का संतुलित उपयोग करके कम खर्चे में अधिक फसल प्राप्त कर सकते हैं. सिंचित गेंहू में प्रति हेक्टेयर 16 किलोग्राम यूरिया, 30 किलोग्राम एनपीके तथा 17 किलोग्राम एमओपी का उपयोग करें. इसके विकल्प के रूप में प्रति हेक्टेयर 35 किलोग्राम यूरिया, 25 किलोग्राम एसएसपी तथा 17 किलोग्राम एमओपी का भी उपयोग किया जा सकता है.

किसान भाई चना में 25 किलोग्राम एमएसपी का उपयोग प्रति हेक्टेयर करें. सरसों में 16 किलोग्राम यूरिया, 44 किलोग्राम एनपीके तथा 8 किलोग्राम एमओपी का उपयोग प्रति हेक्टेयर करें. इसके विकल्प के रूप में प्रति हेक्टेयर यूरिया 40 किलोग्राम, एसएसपी 38 किलोग्राम तथा एमएसपी 33 किलोग्राम का उपयोग भी किया जा सकता है. उप संचालक कृषि ने कहा है कि इन विकल्पों के प्रयोग से कृषकों को उर्वरक उपलब्धता के अनुसार संतुलित उर्वरकों के उपयोग करने से सहायता मिलेगी.

कलेक्टर की उपस्थिति में “फसल कटाई प्रयोग” विधि से हुई कटाई

बडवानी: कलेक्टर डॉ. राहुल फटिंग के द्वारा विकासखण्ड ठीकरी का भ्रमण किया गया. इस दौरान कलेक्टर ग्राम चकेरी के किसान नारायण पिता नाथजी के कपास के खेत में पहुंचे. इस दौरान उन्होंने अपने सामने कपास की फसल की कटाई “फसल कटाई प्रयोग” विधि के तहत करवाई . इस दौरान कलेक्टर डा. फटिंग ने खेत में लगी हुई फसल की किस्मों के बारे में किसान से जानकारी ली. साथ ही फसलों की स्थिति के संबंध में भी चर्चा करते हुए जाना कि उन्हें फसल उपज लेने में किनकिन समस्याओं का सामना करना पड़ता है.

भ्रमण के दौरान कलेक्टर ने ग्राम दवाना के किसान वीरेन्द्रसिंह के कपास के खेत का भी निरीक्षण किया. इस दौरान उन्होंने कृषक से जाना कि उसने खेत में कपास की कौन सी किस्म लगाई गई है और इस किस्म से उसे कितना उत्पादन प्राप्त होगा .

क्या है फसल कटाई प्रयोग :

फसल कटाई प्रयोग एक विधि है, जिसके माध्यम से फसल का औसत उत्पादन ज्ञात किया जाता है.

सर्वप्रथम खेत में जाकर खेत की उत्तरपश्चिम के कोने से फसल की कतार गिनते है. फिर कतार की लंबाई देखकर, उसमें से 10 कतार कम करके कतार चुनी जाती है. इसके बाद 10 कतार गिनकर प्लाट का निर्धारण किया जाता है. प्लाट निर्धारण कर किसान को बता दिया जाता है कि इस खेत में जब भी फसल की चुनाई हो तब सूचना दी जाए.

चुनाई के समय फसल का वजन लिया जाकर उसे नोट कर लिया जाता है. कलेक्टर के निरीक्षण के दौरान एसडीएम राजपुर जितेन्द्र कुमार पटेल, तहसीलदार ठीकरी कार्तिक मौर्य, उप संचालक कृषि आरएल जामरे सहित अधिकारी कर्मचारी उपस्थित थे.

किसान नीलेश पाटीदार ने 37 लाख का लिया मुनाफा

झाबुआ: एकीकृत बागवानी विकास मिशन के तहत कृषक निलेश पाटीदार ने संरक्षित तरीके से खेती की. सब्जियों की खेती ने उनका जीवन बदल दिया. पारंपरिक खेती को छोड उद्यानिकी फसलों को अपनाकर किसान और उनके परिवार के चेहरें पर खुशी की मुस्कान छा गई.

कृषक निलेश पाटीदार द्वारा बतलाया गया कि उनके पास लगभग 18.750 एकड़ कृषि योग्य भूमि है, जिसमें पहले वह पारंपरिक खेती करतें थे. फिर एक दिन उनके पास उद्यान विभाग के क्षेत्रीय अधिकारी सुरेश ईनवाती आए उन्होने उन्हे पारंपरिक खेती छोड उद्यानिकी खेती करनें की सलाह दी. उद्यानिकी अधिकारी की बातें सुनकर पहले उन्होने 01 एकड़ का एक नेटहाउस बनवाया, जिसमें उन्हे उस वर्ष अच्छा मुनाफा प्राप्त हुआ. जिसे देखतें हुए उन्होने धीरे धीरे 03 और नेटहाउस बनवाए.

इस वर्ष कृषक ने अपने 03 एकड़ के नेटहाउस में खीरा, ककड़ी लगाई और कुल 1050 क्विंटल उत्पादन प्राप्त किया. किसान ने बताया कि उसने अपनी उपज को जयपुर और दिल्ली में लगभग 2700 रुपए प्रति क्विंटल के भाव से बेचा. इस प्रकार कृषक को लगभग 28 लाख 35 हजार रुपये प्राप्त हुए व उनका कुल खर्चा लगभग 07 लाख का आया. इस प्रकार शेडनेट हाउस से कृषक ने लगभग 21 लाख 35 हजार का शुद्ध मुनाफा कमाया.

पाटीदार ने अपने खेत पर लगभग 4 एकड़ में लगभग 4000 पौधे अमरुद के लगाए ,जिसमें उन्हे लगभग 700 क्विंटल अमरुद की उपज प्राप्त हुई, जिसे उन्होंने बॉक्स में पैकिंग कर दिल्ली में 4000 रुपए प्रति क्विंटल की दर से बेचकर लगभग 28 लाख रुपए कमाए. कृषक द्वारा बताया गया कि बॉक्स में पैकिंग करने से उसे अन्य कृषक से 10 रुपए प्रति किलो के भाव से अधिक मुल्य प्राप्त हुआ.

लेकिन इस वर्ष पौधे को सहारा देने के लिए लोहे के एंगल व तार का स्ट्रैक्चर बनाने में अधिक खर्चा आया, जिस में उन का लगभग 12 लाख का खर्चा हुआ और उन्होंने अमरूद की फसल से 16 लाख रुपए का शुद्ध मुनाफा प्राप्त किया. प्रकार कृषक द्वारा दोनों उद्यानिकी फसलों से लगभग 37 लाख का मुनाफा कमाया. इन पैसों से किसान नीलेश ने एक जेसीबी गाड़ी खरीदी व अब खेती के साथ साथ जेसीबी से एक व्यवसाय भी शुरु कर दिया. यह सब सिर्फ उद्यानिकी फसल से ही संभव हो पाया है.

झाबुआ कलेक्टर नेहा मीना के निर्देशानुसार झाबुआ जिले में उन्नत तकनीक से खेती को बढावा देने के लिए शेडनेट हाउस का एक कलस्टर तैयार करने के लिए उद्यान विभाग को निर्देशित कर समय समय समीक्षा की गई. जिस के फलस्वरुप मात्र एक वर्ष में ही 80,000 वर्ग मीटर के शेडनेट तैयार कर उच्च कोटि की खेती की जा रही है और 33,500 वर्ग मीटर के शेडनेट हाउस अभी निर्माणाधीन है.

मोबाईल एप के जरिए कृषि उपज का विक्रय करने की सुविधा

भोपाल :किसानों को कृषि उपज विपणन के क्षेत्र में अभिनव कदम उठाते हुए मोबाईल एप के माध्यम से अपनी कृषि उपज का विक्रय अपने घर, खलिहान, गोदाम से कराने की सुविधा प्रदान की गई है. सर्वप्रथम किसान अपने एंड्राइड मोबाईल पर प्ले स्टोर में जाकर मंडी बोर्ड भोपाल का मोबाईल एप MP FARM GATE APP डाउनलोड करना होगा तथा एप इंस्टाल कर कृषक पंजीयन पूर्ण करना होगा. फसल विक्रय के समय किसानों को अपनी कृषि उपज के संबंध में मंडी फसल, ग्रेड-किस्म, मात्रा एवं वांछित भाव की जानकारी दर्ज करना होगा.

किसानों द्वारा अंकित की गई समस्त जानकारियां चयनित मंडी के पंजीकृत व्यापारियों को प्राप्त हो जाएगी तथा प्रदर्शित होगी. व्यापारी द्वारा फसल की जानकारी एवं बाजार की स्थिति के अनुसार अपनी दरें ऑनलाईन दर्ज की जाएगीं जिसका किसान को एप में मैसेज प्राप्त होगा. जिसके उपरांत आपसी सहमति के आधार पर चयनित स्थल पर कृषि उपज का तौल कार्य होगा.

कृषि उपज का तौल कार्य होने के बाद ऑनलाईन सौदा पत्रक एवं भुगतान पत्रक जारी किया जाएगा और शासन, मंडी बोर्ड के नियमानुसार नगर या बैंक खाते में भुगतान किया जाएगा. इस प्रकार किसान MP FARM GATE APP मोबाईल एप के माध्यम से मंडी में आए बिना अपने घर, गोदाम, खलिहान से भी अपनी कृषि उपज का विक्रय कर सकते हैं. इस एप किसान प्रदेश की मंडियों में विक्रय की जाने वाली उपजों के दैनिक भाव की जानकारी भी प्राप्त कर सकते हैं.

किसानों से इस एप को अपने एंड्राइड मोबाईल में इंस्टाल कर राज्य शासन एवं मंडी बोर्ड की इस अभिनव पहल का अधिक से अधिक लाभ उठाने की अपील की गई है.

कृषि उत्पादन (Agricultural Production) में देशभर में आगे है हरियाणा

हिसार : चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय में ‘कृषि वैज्ञानिकों का किसानों से संवाद- कृषि विश्वविद्यालय की उपलब्धियां’ विषय पर मौलिक विज्ञान एवं मानविकी महाविद्यालय के सभागार में एक गोष्ठी का आयोजन किया गया. इस गोष्ठी में विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बीआर कंबोज ने बतौर मुख्यातिथि एवं प्रस्तोता व अध्यक्षता पूर्व अध्यक्ष, हरियाणा राज्य उच्च शिक्षा परिषद, पंचकूला, पूर्व कुलपति, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल एवं अध्यक्ष, पंचनद शोध संस्थान, चंडीगढ़ के प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने की.

विशिष्ट अतिथि हरियाणा विद्युत विनियामक आयोग के पूर्व अध्यक्ष जगजीत सिंह घनघस रहे. यह गोष्ठी पंचनद शोध संस्थान, अध्ययन केंद्र, हिसार व चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित की गई.

प्रो. बीआर कंबोज ने कहा कि कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा लगातार किए जा रहे शोध कार्यों, उच्च तकनीकों और किसानों की कड़ी मेहनत के कारण प्रदेश के खाद्यान्न उत्पादन में रिकौर्ड बढ़ोतरी हुई है. खाद्यान्न उत्पादन, जो प्रदेश के गठन के समय मात्र 2.59 मिलियन टन था, जो 7 गुना बढ़ कर वर्ष 2022-23 में 18.43 मिलियन टन हो गया है. हरियाणा क्षेत्रफल की दृष्टि से अन्य राज्यों से छोटा है, जबकि केंद्रीय खाद्यान्न भंडार में योगदान देने वाला दूसरा सब से बड़ा राज्य है. देश के 60 फीसदी से अधिक बासमती चावल का निर्यात केवल हरियाणा से ही होता है. हरियाणा राज्य बाजरा, दलहन व तिलहन के उत्पादन में देशभर में अग्रणी है.

उन्होंने आगे यह भी बताया कि विश्वविद्यालय द्वारा किसानों को उच्च गुणवत्ता के प्रमाणित बीज उपलब्ध करवाने के लिए 20 हजार क्विंटल से अधिक विभिन्न फसलों के बीज तैयार कर किसानों को वितरित किए जा रहे हैं. कृषि तकनीकी को किसानों तक पहुंचाना विश्वविद्यालय का एक ध्येय है, इसी कड़ी में विश्वविद्यालय द्वारा 6.50 लाख किसानों को मौसम एवं कृषि संबंधी जानकारी नियमित रूप से उपलब्ध कराई जा रही है. इस के अतिरिक्त प्रदेश के प्रत्येक गांव के 20-20 किसानों का डाटा बेस एकत्रित किया गया है, जिस के माध्यम से कृषि संबंधी जानकारियां प्रदान की जा रही हैं.

कृषि उत्पादन (Agricultural Production)

प्रो. बृज किशोर कुठियाला ने अपने अध्यक्षीय भाषण में कहा कि विकसित भारत के मिशन में चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय की महत्वपूर्ण भूमिका होगी.

उन्होंने किसानों एवं युवाओं से संवाद स्थापित करने के साथसाथ किसानों को कृषि क्षेत्र की ओर आकर्षित करने का भी आह्वान किया और कृषि को आकर्षक बनाने के लिए युवाओं में सामाजिक, आर्थिक व मनौविज्ञानिक बदलाव की जरूरत है.

उन्होंने यह भी कहा कि बड़े हर्ष की बात है कि हकृवि किसानों से सीधे तौर पर जुड़ कर न केवल नईनई तकनीक व किस्में किसानों तक पहुंचा रहा है, बल्कि किसानों की समस्याओं के फीडबैक के आधार पर अपने शोध को गति भी प्रदान कर रहा है.

उन्होंने कहा कि पंचनद हकृवि के माध्यम से किसानों से संवाद शुरू करने की मुहिम को ओर अधिक गति प्रदान करेगा. उन्होंने कृषि क्षेत्र में कीटनाशकों एवं रासायनिक उर्वरकों के संतुलित प्रयोग पर बल दिया.

विशिष्ट अतिथि जगजीत सिंह घनघस ने बताया कि राष्ट्र की प्रगति के लिए कृषि एवं पावर सैक्टर बहुत जरूरी है. प्रदेश में गत 10 सालों से उपभोक्ताओं को सस्ती बिजली मुहैया करवाने के साथसाथ कृषि क्षेत्र को 10 पैसे प्रति यूनिट की दर से बिजली दी जा रही है.

उन्होंने बताया कि लगभग 13 हजार लंबित कृषि नलकूप को भी बिजली से जोड़ा गया है. किसानों को सोलर पंप के माध्यम से सिंचाई करने के लिए भी प्रेरित किया जा रहा है.

मौलिक विज्ञान एवं मानविकी महाविद्यालय के अधिष्ठाता व उपाध्यक्ष डा. नीरज कुमार ने गोष्ठी में आए सभी का धन्यवाद किया और मंच का संचालन सचिव मोहित कुमार ने किया.

इस अवसर पर राज्य सूचना आयुक्त, हरियाणा एवं पंचनद शोध संस्थान, अध्ययन केंद्र, हिसार के अध्यक्ष डा. जगबीर सिंह, मीडिया एडवाइजर डा. संदीप आर्य सहित पंचनद संस्थान के अनेक पदाधिकारी, वैज्ञानिक, किसान व छात्र उपस्थित थे.

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) ने बनाए कई रिकॉर्ड

वर्तमान में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) द्वारा विकसित गेहूं की किस्में तकरीबन 9 मिलियन हेक्टेयर में फैली हुई हैं और अन्न भंडार में 40 मिलियन टन गेहूं का योगदान करती हैं. वर्ष 2023 में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा भारत के गेहूं उत्पादन क्षेत्रों के लिए ब्रेड गेहूं की 5 किस्में जारी की गईं.

इन में से एक एमएएस व्युत्पन्न किस्म है, एक एचडी 3437 किस्म है, जिस में पत्तियों और स्ट्राइप रस्ट्स के प्रति प्रतिरोधी है और क्रमशः एचडी 3386 व एचडी 3388 किस्में शामिल हैं, जो कि पश्चिमी मैदानी क्षेत्र और उत्तरपूर्वी मैदानी क्षेत्र की समय पर बोई गई सिंचित स्थितियों के लिए उपयुक्त हैं.

चावल किस्म विकास में अग्रणी

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान यानी IARI  बासमती चावल की किस्म के विकास में वैश्विक अग्रणी है. IARI द्वारा जारी बासमती किस्मों अर्थात पूसा बासमती 1121, पूसा बासमती 1718, पूसा बासमती 1509 और पूसा बासमती 6 ने देश में बासमती चावल के 95 फीसदी से अधिक क्षेत्र को अधिकृत कर लिया है. वर्ष 2023-2024 के दौरान 40,000 करोड़ रुपए का विदेशी मुद्रा में योगदान दिया है.

पराली जलाने में आएगी कमी

धान की पराली जलाने और वायु प्रदूषण की समस्या से निबटने के लिए IARI ने बासमती में कम समय में पकने  वाली धान की किस्में जैसे कि पूसा बासमती 1509, पूसा बासमती 1847, पूसा बासमती 1692 और गैरबासमती किस्में जैसे कि पूसा 2090 और पूसा 1824 विकसित और जारी की हैं, जो उक्त समस्या के समाधान में काफी हद तक मदद करेगा.

धान किस्म पूसा नरेंद्र काला नमक हुई जारी

भाकृअनुसं ने सुगंधित लघु अनाज वाले धान की भूमि प्रजाति वाली पूर्वी उत्तर प्रदेश की किस्म ‘‘काला नमक‘‘ में उपज, अपतन की समस्या में सुधार कर ‘‘पूसा नरेंद्र काला नमक” किस्म जारी की है, जो इस क्षेत्र के धान उपज करने वाले किसानों की लाभप्रदता में क्रांतिकारी बदलाव लाएगा.

धान की मैगा किस्म विकसित

सीआरआईएसपीआर-सीएएस जीनोम संपादन नई प्रजनन प्रौद्योगिकी के रूप में सामने आया है. इस अत्याधुनिक विज्ञान का उपयोग करते हुए संस्थान ने डीएसटी जीन को संपादित कर के धान की मैगा किस्म एमटीयू 1010 की पृष्ठभूमि में सूखा और लवणता सहिष्णु धान लाइन विकसित की हैं, जिन्हें वर्ष 2023 में पूरे भारत में एआईसीआरआईपी परीक्षणों में जांच के लिए उपयोग किया जा रहा है, ताकि इसे जारी किया जा सके.

मिलेट संकर, पूसा 1801 जारी

अंतर्राष्ट्रीय मिलेट्स वर्ष‘ 2023 के उत्सव के एक भाग के रूप में, देश को पोषण सुरक्षा प्रदान करने के लिए आयरन और जिंक से समृद्ध एक बायोफोर्टिफाइड पर्ल मिलेट संकर, पूसा 1801 जारी किया गया था और विविध प्रकार के मिलेट्स के प्रदर्शन भी आयोजित किए गए थे.

दलहन की 8 नई किस्में जारी

संस्थान द्वारा दलहन की 8 किस्में जारी की गईं. साथ ही, चने की 2 उन्नत किस्में जारी वही की गई हैं, जिन में पूसा चना 3057, एक अधिक उपज देने वाली काबुली किस्म है और पूसा चना 10217, एक सूखा व सहिष्णु उच्च उपज देने वाली देसी किस्म शामिल है.

पूसा अरहर हाईब्रिड 5, एक सीजीएमएस आधारित अरहर संकर, हमारे संस्थान का पहला संकर भी खेती के लिए जारी किया गया था.

मूंग दाल की 3 उच्च उपज वाली किस्में, जिन में एक मध्यम लवण सहिष्णु किस्म पीएमएस-8 शामिल है. पीएमडी 9 और पीएमडी 10 और 2 लवण सहिष्णु मसूर दाल की किस्में अर्थात पीएसएल-17 और पीएसएल-19 जारी की गई हैं.

तिलहनी फसल सरसों की अनेक किस्में जारी

संस्थान ने भारतीय सरसों की किस्मों को विकसित करने और जारी करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, जो तकरीबन 45 फीसदी सरसों क्षेत्र को अधिकृत करती है. भाकृअनुसं ने कैनोला गुणवत्ता वाली भारतीय सरसों के विकास और व्यावसायीकरण में अग्रणी भूमिका निभाई है. वर्ष 2023 में, 2 उच्च उपज देने वाली डबल जीरो गुणवत्ता वाली सरसों की किस्में, पूसा डबल जीरो मस्टर्ड 35 और पूसा डबल जीरो मस्टर्ड 36 जारी की गईं. कम इरुसिक एसिड और ग्लूकोसाइनोलेट्स दोनों को वाणिज्यिक खेती के लिए जारी किया गया है.

सोयाबीन की नई किस्म

एक एमएएस व्युत्पन्न कुनित्ज ट्रिप्सिन अवरोधकमुक्त सोयाबीन किस्म, डीएस 9421 विकसित और जारी किया गया था.

उच्च बायोइथेनाल के लिए संकर मक्का

वर्ष 2025 तक 20 फीसदी बायोइथेनाल मिश्रित पैट्रोल के सरकार के लक्ष्य की दिशा में आईएआरआई ने उच्च बायोइथेनाल रिकवरी के साथ 2 मक्का संकर विकसित की हैं.

सब्जियों की नई किस्म जारी  

सब्जियों की फसलों में, बैगन की किस्म पूसा छोटा बैगन 1 और संरक्षित खेती के लिए उपयुक्त 2 किस्में अर्थात करेले की किस्म पूसा करेला 2, और पूसा टीओएलसीवी चेरी टमाटर संकर 1 को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के लिए जारी किया गया.

आम की बौनी प्रजाति जारी

देश में पहली बार आम के 2 बौने मूलवृंतों, पूसा मूलवृंत 1 और पूसा मूलवृंत 2 जारी किए गए, जो कलम किए गए आम की ऊंचाई को कम करने में मदद करेंगे और बागबानी के बेहतर प्रबंधन की सुविधा प्रदान करेंगे.

फूलों की अनेक नई किस्में

पुष्प की फसलों में, ग्लेडियोलस की एक मध्य ऋतुकालीन बहुरंगी किस्म, ‘पूसा सिंदूरी‘ को पश्चिम बंगाल, पंजाब, दिल्ली और राजस्थान में खेती के लिए जारी की गई थी. गुलाब की 2 किस्में, जिन में ‘पूसा लक्ष्मी‘, एक फ्लोरिबंडा प्रकार की गहरे गुलाबी रंग की किस्म और ‘पूसा भार्गव‘, एक हाइब्रिड टी टाइप गुलाबी रंग की किस्म को उद्यान प्रदर्शन के उद्देश्यों के लिए पहचाना गया था.

गेंदे की 2 किस्मों, ‘पूसा पर्व‘, जिस में गहरा लाल रंग होता है और ‘पूसा उत्सव‘, जिस में गहरे नारंगी रंग के फूल होते हैं, को लूज फ्लावर और बेडिंग के उद्देश्यों के लिए पहचाना गया था.

8 बीज उत्पादन में बढ़ोतरी

भाकृअनुसं किस्मों को लोकप्रिय बनाने के लिए संस्थान ने लगभग 6,700 क्विंटल प्रजनक बीज और 16,400 क्विंटल ट्रुथफुली लैबल वाले बीज का उत्पादन किया है और लगभग 22.00 करोड़ रुपए की राजस्व प्राप्त किया है.

पराली जलाने के मामलों पर निगरानी

अक्तूबर और नवंबर माह के दौरान एक प्रमुख समस्या धान के पुआल जलाने को कम करने के लिए, भाकृअनुसं उपग्रह चित्रों का उपयोग कर के भारत के 6 राज्यों में धान के अवशेष जलाने की वास्तविक समय पर निगरानी करता है. इसे दैनिक बुलैटिन को हितधारकों के साथ साझा किया गया. धान के पुआल को जलाने की रोकथाम में उपयोग के लिए क्रीम्स वैबसाइट और आईसीएआर जियो पोर्टल पर मानचित्र के रूप में उपलब्ध कराया गया. पिछले साल की तुलना में पंजाब व हरियाणा में पुआल के जलने के घटनाक्रम में 26.5 फीसदी और 37.0 फीसदी की कमी आई, जबकि उत्तर प्रदेश में 32.5 फीसदी, राजस्थान में 40.0 फीसदी और मध्य प्रदेश में 6.5 फीसदी की वृद्धि हुई.

नई पद्धति विकसित

संस्थान ने ‘‘कार्बन क्रेडिट‘‘ को प्रोत्साहित करने के लिए उपग्रह रिमोट सैंसिंग का उपयोग कर के किसानों द्वारा अपनाई गई पुनर्योजी कृषि पद्धतियों के मापन, रिपोर्टिंग और सत्यापन के लिए कम लागत वाली पद्धति विकसित की है.

उर्वरक पर भी फोकस

हम ने नत्रजन, फास्फोरस, जिंक, और बोरोन से भरपूर नवीन नैनो क्ले पौलिमर कंपोजिट उर्वरक फार्मूलेशन विकसित और मान्य किया है, जिस में नत्रजन और फास्फोरस के लिए उर्वरक निर्माणी दर को 25 फीसदी तक कम करने और बोरोन व जिंक की दक्षता को 3 से 5 गुना तक कम करने की क्षमता है.

ड्रोन का इस्तेमाल

संस्थान ने जमीन, ड्रोन और उपग्रह प्लेटफार्म आधारित सैंसर का उपयोग कर के कृत्रिम बुद्धिमत्ता के आधार पर मिट्टी और फसल स्वास्थ्य की निगरानी हेतु पद्धति विकसित की है. साथ ही, पोषक तत्वों सहित 14 मृदा स्वास्थ्य मापदंडों के माप के लिए एक सैंसर आधारित विधि विकसित की गई है.

उच्च एनयूई चावल किस्में

मिट्टी के स्वास्थ्य और जलवायु तन्यकता हेतु, संस्थान ने उच्च एनयूई चावल की किस्मों से सिनकौम (सिंथैटिक माइक्रोबियल समुदाय) विकसित किया है. इसे चावल में पौधों की वृद्धि को बढ़ावा देने में अत्यधिक कुशल पाया गया है.

रोबोट से होगी रसायनों की बचत

खरपतवारनाशी के सटीक अनुप्रयोग के लिए एक सौर ऊर्जा संचालित वैरिएबल स्वाथ हर्बिसाइड एप्लिकेटर रोबोट विकसित किया गया है, जो पारंपरिक विधि की तुलना में लगभग 25 फीसदी रसायनों की बचत करता है.

कीट प्रबंधन तकनीक का विकास

पर्यावरण के अनुकूल और कम लागत वाला प्रभावी कीट प्रबंधन तकनीक, ‘‘मीफ्लाई किट‘‘ का विकास किया गया है, जो कि फल मक्खियों और सब्जियों की फसलों में सफेद मक्खियों के प्रबंधन के लिए उपयुक्त है.

किसानों की समस्या का समाधान

संस्थान ने कृषि सलाहों के साथ दूरदराज के किसानों तक पहुंचने के लिए एक वीडियो आधारित प्रसार मौडल ‘‘पूसा समाचार‘‘ विकसित किया है. यह हिंदी, तेलुगु, कन्नड़, तमिल, बांग्ला और उड़िया सहित 6 अलगअलग भाषाओं में एक साप्ताहिक कार्यक्रम है, जो हर शनिवार को शाम 7 बजे संस्थान के आधिकारिक यूट्यूब चैनल पर प्रसारित होता है. वर्तमान में यह 44,000 सब्सक्राइबर के साथ 14 लाख व्यूज प्राप्त कर चुका है. इस के अंतर्गत ‘पूसा व्हाट्सएप सलाह‘ (9560297502) नंबर भी किसानों को दिया गया है, जिस के द्वारा किसानों को व्हाट्सएप के माध्यम से प्रश्न पूछने और विशेषज्ञों से उत्तर देने की सुविधा दी जा रही है.

28 फरवरी से 1 मार्च तक किसान मेला

संस्थान नवीनतम तकनीकों का प्रदर्शन करने और हितधारकों के बीच कृषि जानकारी को बढ़ावा देने के लिए सालाना आधार पर पूसा कृषि विज्ञान मेले का आयोजन करता है. पिछले साल मेले की थीम ‘‘श्रीअन्न पोषण, खाद्य एवं पर्यावरण सुरक्षा‘‘ रखी गई थी, जिस में एक लाख से अधिक किसानों ने भाग लिया था. इस साल मेला 28 फरवरी से 1 मार्च, 2024 के दौरान ‘कृषि उद्यमिताः समृद्ध किसान‘ विषय पर आयोजित किया जाएगा.

नवाचारों को मान्यता

मेले के दौरान संस्थान ने 40 किसानों को उन के नवाचारों के लिए ‘अध्येता’ और ‘नवोन्मेषी’ किसानों के रूप में मान्यता दी है.

किसानों को हुआ लाभ

विभिन्न आउटरीच कार्यक्रमों के तहत सलाह और क्षमता निर्माण के अलावा बीज, रोपण सामग्री और उपकरणों की उपलब्धता के माध्यम से लगभग 76,497 किसान सीधे लाभान्वित हुए हैं.

कृषि नवाचारों को बढ़ावा

‘‘पूसा कृषि‘‘ के माध्यम से हम इस संस्थान में कृषि नवाचारों को बढ़ावा देते हैं. साल 2023-24 के दौरान, 3 पेटेंट दिए गए, और 6 ट्रेडमार्क और 3 कौपीराइट पंजीकृत किए गए. 176 कंपनियों के लिए 64 प्रौद्योगिकियों का व्यावसायीकरण किया गया और 4.75 करोड़ रुपए का राजस्व अर्जित किया गया.