Pulses Processing : मशीनों से दाल की प्रोसेसिंग बढ़ाएं रोजगार

Pulses Processing : किसान दाल दलने वाली मशीन लगा कर अपना रोजगार भी शुरू कर सकते हैं. वे इस काम की शुरुआत अपने घर में छोटी दाल मिल मशीन लगा कर भी सकते हैं. कई कृषि संस्थानों ने घरेलू छोटी दाल दलने की मशीनें भी बनाई हैं, जो कम पूंजी में ही मिल जाती हैं और मुनाफा पूरा देती हैं.

पूसा संशोधित दाल मिल : इस मशीन से मटर, सोयाबीन, चना, अरहर, उड़द, मूंग वगैरह से दाल तैयार की जाती है. यह मशीन छोटे उद्यमियों के लिए ठीक है. जिस के लिए ज्यादा जगह की भी जरूरत नहीं है.

इस मशीन में 2 हार्सपावर की मोटर लगी होती है, जो बिजली से चलती है. यह मशीन 1 घंटे में तकरीबन 40 से 50 किलोग्राम तक दाल तैयार कर देती है.

यह मशीन कृषि अनुसंधान संस्थान पूसा नई दिल्ली के कृषि अभियांत्रिकी द्वारा बनाई गई है. अधिक जानकारी के लिए आप वहां संपर्क कर सकते हैं.

Pulses Processing

दाल मिल : दाल मिल के नाम से यह मिनी मशीन कृषि अभियांत्रिकी संस्थान भोपाल द्वारा बनाई गई है. इस मशीन की कार्य कूवत 100 किलोग्राम प्रति घंटा है. मशीन की कीमत तकरीबन 30 हजार रुपए है. मशीन के बारे में अधिक जानकारी के लिए केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान नबी बाग बैरसिया रोड, भोपाल से संपर्क कर सकते हैं.

कोई भी व्यक्ति इस काम को पार्ट टाइम जौब के रूप में भी कर सकता है. किसान दाल को अपनी खुद की पैकिंग में बेच सकते हैं. इस तरह से अपना खुद का रोजगार शुरू कर सकते हैं. आज के समय में यह बहुत ही फायदे का सौदा है. शुरू में दुकानों या खरीदारों से मिलना पड़ेगा, बाद में धीरेधीरे पहचान बनने पर खुद माल उठने लगता है.

अच्छा मुनाफा लेने के लिए फसल के समय ही साबुत दालें खरीदें. उस समय वे कम दामों पर मिलेंगी. फिर धीरेधीरे मांग के हिसाब से उन्हें दल कर बेचते रहें.

Training : युवा महिलाओं के लिए फलसब्जी प्रसंस्करण पर ट्रेनिंग

Training : महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के अनुसंधान निदेशालय में आयोजित तीन दिवसीय “फलसब्जी प्रसंस्करण प्रशिक्षण” का सफल समापन हुआ. यह प्रशिक्षण केंद्रीय कृषिरत महिला संस्थान, भुवनेश्वर (उड़ीसा) के निर्देशन में संचालित अखिल भारतीय समन्वित कृषिरत महिला अनुसंधान परियोजना के अंतर्गत “तकनीकी हस्तक्षेप और उद्यमशीलता विकास के माध्यम से लैंगिक समानता को बढ़ावा देना” विषय पर केंद्रित रहा.

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम की प्रभारी डा. विशाखा सिंह ने बताया कि इस कार्यक्रम में उदयपुर जिले के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों की युवा महिलाओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया. प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को मौसमी फलसब्जियों के प्रसंस्करण से संबंधित विभिन्न उत्पादों की व्यावहारिक जानकारी दी गई. इन में टोमैटो कैचअप, टोमैटो प्यूरी, लहसुन का अचार, कच्चे आम का अचार, मशरूम अचार, लहसुन कचरी की चटनी और मिश्रित सब्जियों का तुरंत अचार शामिल है.

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में विशेषज्ञों ने प्रसंस्करण के साथसाथ पैकेजिंग, लेबलिंग, मार्केटिंग, श्रम प्रबंधन, सरकारी योजनाओं की जानकारी, उद्योग स्थापना की प्रक्रिया एवं आवश्यक लाइसेंसिंग पर भी विस्तार से युवा महिलाओं का मार्गदर्शन किया. इस कार्यक्रम की प्रशिक्षण समन्वयक डा. सुमित्राने बताया कि प्रतिभागियों को विश्वविद्यालय की लहसुन प्रसंस्करण इकाई, टोमैटो प्रोसेसिंग प्लांट और बैकरी इकाई का भ्रमण भी कराया गया, जिस से उन्हें उद्योग संचालन का वास्तविक अनुभव प्राप्त हुआ.

इस कार्यक्रम की परियोजना समन्वयक डा. विशाखा बंसल ने स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं के लिए वित्तीय सहयोग की संभावनाओं पर प्रकाश डालते हुए उन्हें संगठित हो कर व्यवसाय शुरू करने के लिए प्रेरित किय. इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि निदेशक डा. अरविंद वर्मा ने प्रशिक्षणार्थियों द्वारा निर्मित उत्पादों का अवलोकन किया एवं उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए अपने स्वयं के उद्यम की शुरुआत करने के लिए प्रोत्साहित किया.

इस प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागी चंदा देवी एवं शांता मेघवाल ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि इस प्रशिक्षण ने उन्हें आत्मनिर्भरता की ओर एक ठोस दिशा दी है और वे प्राप्त ज्ञान का सदुपयोग करते हुए स्वावलंबन की राह पर आगे बढेंगी. सभी प्रतिभागियों को प्रशिक्षण किट के रूप में एप्रन, ग्लव्स, हेड कवर, शेफ चाकू सेट, सब्जियों के बीज, खाद्य प्रसंस्करण एवं सरकारी योजनाओं की बुकलेट वितरित की गई.

Beekeeping : मधुमक्खीपालन आमदनी बढ़ाने का जरीया

Beekeeping: भारत में कृषि के क्षेत्र में अनेक समस्याएं हैं. कई दफा किसानों को अपनी फसल पैदावार से खेती में लगाई गई लागत भी वापस नहीं मिलती है. ऐसे में कृषि से जुडे़ अनेक सहयोगी काम हैं, जिन्हें किया जा सकता है.

ऐसे ही कामों में से एक काम मधुमक्खीपालन (Beekeeping) है, जिसे अपनाया जा सकता है. जानकारों का मानना है कि मधुमक्खीपालन (Beekeeping) कम खर्च और कम समय में अच्छीखासी आमदनी देने वाला काम है.

इस विषय को ले कर केंद्रीय शुष्क बागबानी संस्थान, बीकानेर, राजस्थान के अध्यक्ष और प्रधान वैज्ञानिक डा. धुरेंद्र सिंह से हमारी बात हुई.

डा. धुरेंद्र सिंह ने बताया कि कृषि से जुडे़ युवा और वे लोग, जो कम लागत में अच्छा रोजगार करना चाहते हैं, उन के लिए मधुमक्खीपालन काफी फायदेमंद कारोबार साबित हो सकता है.

उन्होंने बातचीत में आगे कहा कि लोेगों की बढ़ती इच्छाओं के चलते आज औद्योगीकरण बढ़  रहा है. यातायात वाहन बढ़ रहे हैं, जिस के कारण पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है. प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है. कहीं अधिक बरसात है, तो कहीं सूखे जैसे हालात बन रहे हैं. मौसम का मिजाज बदल रहा है और मानसून चक्र बिगड़ रहा है. इस का असर खेतखलिहानों तक में हो रहा है.

परंपरागत रूप से पैदा होने वाली बागबानी की फसलों का नामोनिशान मिट गया है. कम पानी और बिना रासायनिक खादों से पैदा होने वाली कई फसलें काश्त से बाहर हो चुकी हैं. उन की जगह गन्ना व आलू जैसी फसलें पैदा की जा रही हैं.

इस का नतीजा सब के सामने है. किसान बेहाल हैं. खेती में लगाई लागत भी वापस नहीं मिल पा रही है और किसान औनेपौने दामों में फसलों की पैदावार को बेच रहे हैं या उसे ऐसे ही सड़कों पर फेंक रहे हैं.

ऐसी स्थिति में जरूरी हो जाता है कि आज के दौर में एक ऐसा सहयोगी रोजगार भी करें, जिसे कर के खेती के साथसाथ अतिरिक्त आमदनी भी हो सके.

बागबानी आधारित मधुमक्खीपालन इस इरादे में भरपूर मदद कर सकता है.

पिछले कुछ सालों से अनेक लोगों का रुझान इस की तरफ बढ़ा है. मधुमक्खीपालन एक छोटा व्यवसाय है, जिस से शहद और मोम प्राप्त होते हैं. यह एक ऐसा व्यवसाय है, जो गंवई इलाकों के विकास का पर्याय बनता जा रहा है.

डा. धुरेंद्र सिंह ने बताया कि इस व्यवसाय को यदि बागबानी फसलों के साथ किया जाए, तो 20 से 80 फीसदी तक फसल पैदावार में बढ़ोतरी संभव है. नीबू, किन्नू, आंवला, पपीता, अमरूद, आम, संतरा, मौसमी व अंगूर जैसे बागों में और विभिन्न सब्जियों के साथ भी मधुमक्खीपालन आसानी से किया जा सकता है.

इन तमाम फसलों के साथ मधुमक्खीपालन करने से इन फसलों की पैदावार तो बढे़गी ही, साथ ही साथ शहद का उत्पादन भी अच्छा होगा.

मधुमक्खीपालन के लिए सरकार बढ़ावा दे रही है. इस रोजगार को करने के लिए सरकार अनुदान भी देती है. इस रोजगार को शुरू करने से पहले मधुमक्खीपालन की ट्रेनिंग लेनी होती है. फिर अपना काम आप खुद शुरू कर सकते हैं.

मधुमक्खीपालन करने वाले लोगों की खादी ग्राम उद्योग भी मदद करता है. गांवों के लोग मधुमक्खी का धंधा अपना कर आगे बढ़ रहे हैं.

50 बौक्स से मधुमक्खीपालन की शुरुआत करने के लिए 1 से 2 लोगों की जरूरत पड़ती है. मधुमक्खीपालन के लिए दिसंबर से मार्च यानी 4 महीने का समय सब से अच्छा होता है.

बाकी महीनों में समयसमय पर मौसम के हिसाब से हम कई इलाकों में जा कर अपने मौन बौक्सों को लगाते हैं, इसलिए यह काम हमेशा रोजगार देने वाला है.

हां, जब कभी फूलों का मौसम न हो, तो मधुमक्खियों को पालने के लिए चीनी का इस्तेमाल करना पड़ता है, जिस पर बहुत मामूली खर्च होता है.

वैज्ञानिक तरीके से करें मधुमक्खीपालन

वैज्ञानिक ढंग से मधुमक्खीपालन करने के लिए मधुमक्खियों को आधुनिक ढंग से लकड़ी के बने हुए बौक्सों, जिन्हें आधुनिक मधुमक्षिकागृह या मौन बौक्स कहा जाता है, में पाला जाता है.

इस तरह से मधुमक्खियों को पालने से अंडे और बच्चे वाले छत्तों को नुकसान नहीं पहुंचता. शहद अलगअलग छत्तों में भरा जाता है और उसे बिना छत्तों को काटे मशीन द्वारा आसानी से निकाल लिया जाता है. शहद निकालने के बाद इन खाली छत्तों को वापस बक्सों में रख दिया जाता है, ताकि मधुमक्खियां इन पर बैठ कर फिर से मधु इकट्ठा करना शुरू कर दें.

जरूरी सामान

मधुमक्खियों के लिए लकड़ी का बौक्स, बौक्सफ्रेम, मुंह पर ढकने के लिए जालीदार कवर, दस्ताने, चाकू, शहद रिमूविंग मशीन व शहद इकट्ठा करने के लिए ड्रम वगैरह की जरूरत होती हैं. ये चीजें आसानी से मिल जाती हैं. वैसे तो आप जहां मधुमक्खीपालन की ट्रेनिंग ले रहे हैं, वहां से भी सामान खरीद सकते हैं.

सावधानियां

जहां मधुमक्खियां पाली जाएं, उस के आसपास की जमीन साफसुथरी होनी चाहिए. बड़े चींटे, मोमभझी कीड़े, छिपकली, चूहे, गिरगिट और भालू मधुमक्खियों के दुश्मन हैं, इन से बचाव के पूरे इंतजाम होने चाहिए.

कहां मिलेगा ज्यादा मुनाफा

फूलों की खेती के साथ मधुमक्खीपालन ज्यादा फायदेमंद साबित होता है. सूरजमुखी, गाजर, मिर्च, सोयाबीन, पापीलेनटिल्स ग्रैम, फलदार पेड़ (जैसे नीबू, किन्नू, आंवला, पपीता, अमरूद, आम, संतरा, मौसमी, अंगूर), यूकेलिप्टस और गुलमोहर जैसे पेड़ों वाले क्षेत्रों में मधुमक्खीपालन आसानी से किया जा सकता है.

शहद के अलावा भी मिलती हैं चीजें

मधुमक्खियों से शहद के अलावा मोम भी हासिल किया जाता है, उस से भी मुनाफा होता है. इस के अलावा मधुमक्खीपालन से पोलन सुपरफूड भी हासिल किया जा सकता है, जिस का आयुर्वेदिक दवाओं में इस्तेमाल किया जाता है.

क्या है पोलन सुपरफूड

मधुमक्खियां जब फूलों का रस चूसने जाती हैं, तब उन के पैरों में परागकण चिपक जाते हैं. ये परागकण एक फूल से दूसरे फूल में जाते रहते हैं.

इस प्रक्रिया के साथसाथ पैरों से चिपकी रज के साथ मधुमक्खी अपने निवास स्थान पर पहुंचती है, तब वह एक विशेष प्रकार की प्लेट से हो कर गुजरती है. इस से रज एक पात्र में जमा हो जाते हैं, इसे ही पोलन सुपरफूड कहते हैं.

मधुमक्खीपालन के लिए सरकार ने राष्ट्रीयकृत बैंकों से लोन सुविधा मुहैया कराई है. इस की ज्यादा जानकारी के लिए आप अपने क्षेत्र के उद्यान विभाग से भी संपर्क कर सकते हैं. मधुमक्खीपालन की ट्रेनिंग के लिए खास पढ़ाईलिखाई की जरूरत नहीं होती. कम पढ़ालिखा व्यक्ति भी, जो इस व्यवसाय में दिलचस्पी रखता हो, प्रशिक्षण हासिल कर के अपना काम शुरू कर सकता है. कुछ मधुमक्खीपालन करने वाले फ्री में भी ट्रेनिंग देते हैं, क्योंकि इस से उन्हें भी फायदा होता है.

Beekeeping

मधुमक्खी के डंक से अब बन रही है दवा

इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्राणी विज्ञान विभाग में पैरासिटालाजी प्रयोगशाला विभाग के प्रमुख वैज्ञानिक प्रो. संदीप कुमार मल्होत्रा का कहना है कि मधुमक्खी के डंक में मिलने वाले विष यानी जहर से अब दवा भी बनाई जा रही है, जिस की कीमत अंतर्राष्ट्रीय बाजार में 10000 रुपए प्रति ग्राम है.

उन्होंने बताया कि विष निकालने के लिए अब तक मधुमक्खियों को मारना पड़ता था. मरे हुए कीटों का डंक निकाला जाता था. लेकिन विभाग में तैयार यह विशेष वेनम एक्सट्रैक्टर मधुमक्खियों को बिना मारे ही विष निकाल कर जमा कर लेगा. इस नए यंत्र की सहायता से मधुमक्खियों को बिना नुकसान पहुंचाए विष निकाला जाता है. एक्सट्रैक्टर को सामान्य रूप से पाली जाने वाली मधुमक्खियों के बक्से के सामने लकड़ी के बक्सों के विशेष फ्रेम में रखा जाता है.

इस फ्रेम के किनारे कटी नाली में फिट बैठने वाले एक छोटे फ्रेम पर लगी कौपर की तार का सर्किट लगाया जाता है, जिस से विद्युत करंट एक छोर से दूसरे छोर की ओर प्रवाहित होता है. इस तार वाले फ्रेम के भीतरी किनारे पर कटी एक और नाली में फिट बैठता समुचित मोटाई का एक शीशा लगा होता है. मधुमक्खी जैसे ही विद्युत करंट वाले तारों के जाल में उलझती है, तो हलका करंट लगते ही वह शीशे पर डंक मार देती है. इसी डंक लगे स्थान पर लार को सूख जाने पर तेजधार ब्लेड से खुरच कर निकाला जाता है.

वे आगे बताते हैं कि मधुमक्खी का विष दर्जनों औषधियों में इस्तेमाल होता है, इस के अलावा इस से कई तरह की क्रीम और इंजेक्शन बनाए जाते हैं. इन का इस्तेमाल तंत्रिका से संबंधित बीमारियों, विभिन्न बीमारियों के दर्द, एलर्जी, दिल के रोग, कैंसर, त्वचा रोग, पीठ के दर्द, थकान वगैरह मिटाने में किया जाता है.

यह विष इनसान के प्रतिरक्षा तंत्र को भी बढ़ाता है, जिस से शरीर में बीमारियों से लड़ने की कूवत बढ़ती है. यह विष कई प्रकार के एंजाइम बनाने में मददगार है, जो मानव शरीर में बहुत जरूरी होते हैं.

भारत सरकार ने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग की इस परियोजना को पेटेंट कर दिया है. इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्राणी विभाग की परजीवी प्रयोगशाला में बने इस ‘हनी बी वेनम एक्सट्रैक्टर’ को विभाग के इतिहास में प्रथम पेटेंट माना जा रहा है.

Onion Processing : प्याज की प्रोसैसिंग से होगी ज्यादा कमाई

Onion Processing: प्याज काटने से अकसर आंखों में आंसू आ जाते हैं, लेकिन पिछले दिनों मंडियों में प्याज के दाम गिरने से किसान खून के आंसू रोते रहे. किसान मुनाफा तो दूर, उपज की लागत व मंडी में प्याज लाने का भाड़ा तक नहीं निकाल पाए. लिहाजा बहुत से किसानों ने इस बार प्याज की खेती से तोबा कर ली.

प्याज ही क्या आलू हो या गन्ना, मिर्च हो या टमाटर, जब जिस फसल की पैदावार ज्यादा हो जाती है, तो उस की कीमतें धड़ाम से नीचे गिर जाती हैं. इस से नुकसान किसानों का होता है. अकसर वे बरबाद हो जाते हैं. लिहाजा बेहद जरूरी है कि किसान इस मुसीबत से नजात पाने के लिए कारगर उपाय अपनाएं.

प्याज की प्रोसैसिंग (Onion Processing)

उपज की कीमत बढ़ाने व उसे बरबाद होने से बचाने के लिए उस की प्रोसेसिंग करना एक कारगर तरीका साबित हुआ है. प्याज की भी प्रोसेसिंग यानी डब्बाबंदी की जा सकती है. प्याज उत्पादक तकनीक सीख कर प्याज प्रोसेसिंग इकाई लगा सकते हैं और प्याज से कई तरह के उत्पाद बना सकते हैं.

बाजार में सिरके की प्याज, प्याज का पेस्ट व पाउडर आदि कई उत्पाद मिलते हैं. ज्यादातर किसान नहीं जानते कि अब देशविदेश में प्याज का पेस्ट, क्रीम, भुनी प्याज, करारी प्याज, प्याज के छल्ले, प्याज का तेल, प्याज का अचार, प्याज फ्लेक्स, सूखा प्याज, प्याज का सिरका, प्याज का सास, प्याज का सूप, प्याज का जूस, छिली प्याज व प्याज के बेवरेज पेय आदि की मांग दिनोंदिन तेजी से बढ़ रही है.

दरअसल, ताजे प्याज के मुकाबले प्याज के प्रोसेस्ड उत्पादों को इस्तेमाल करना ज्यादा आसान है. नई तकनीक से प्याज का इस्तेमाल रंग व एसेंस आदि बनाने में भी किया जा सकता है. साथ ही बचे प्याज का कचरा व सड़ी हुई प्याज भी बेकार नहीं जाती. उसे बायोगैस बनाने में इस्तेमाल किया जाता है. लिहाजा सूझबूझ के साथ व चेन बना कर उत्पादन करने से उत्पादों की लागत घटती है, उपज खपती है व मुनाफा बढ़ता है.

भरपूर पैदावार

प्याज की पैदावार के मामले में भारत दुनिया भर में दूसरे नंबर पर है. देश में प्याज का कुल रकबा 11 लाख, 50 हजार हेक्टेयर है, जिस में 187 लाख, 36 हजार टन प्याज की पैदावार होती है. पड़ोसी देश चीन सिर्फ 9 लाख 30 हजार हेक्टेयर जमीन में भी हम से ज्यादा यानी 205 लाख टन प्याज पैदा करता है.

भारत में प्याज को महफूज रखने के लिए भंडारण के सही इंतजाम कम हैं, लिहाजा काफी प्याज हर साल गलसड़ कर खराब हो जाता है. बेहतर भंडारण से ही उसे बचाया जा सकता है. ज्यादातर भारतीय किसानों की माली हालत कमजोर है, लिहाजा अपना खर्च चलाने के लिए उन्हें उपज बेचने की जल्दी रहती है. बड़े व्यापारी प्याज का भंडारण कर के मौके का फायदा उठाते हैं और किसान बेचारे देखते रह जाते हैं.

जागरूकता जरूरी

कुल पैदा होने वाले प्याज के तकरीबन 7 फीसदी हिस्से की ही प्रोसैसिंग होती है, जबकि प्याज उत्पादों के बढ़ रहे निर्यात से इस काम में भारी इजाफा होने की उम्मीद है. बढ़ती मांग को देखते हुए प्याज की प्रोसैसिंग व उस के कारोबार की बड़ी गुंजाइश है. प्याज प्रोसैसिंग की तकनीक सीखना मुश्किल नहीं है.

जरूरत किसानों के जागरूक होने व पहल करने की है. प्याज की प्रोसैसिंग सीखने व उस का तजरबा करने की है. यदि किसान ठान लें, तो वे आपस में मिल कर प्याज प्रसंस्करण की बड़ी इकाई भी लगा सकते हैं. अपनी उपज को कच्चे माल की तरह न बेच कर खुद उसे प्रोसैस करने में इस्तेमाल कर सकते हैं. वे अपने बच्चों को बेहतर रोजगार का जरीया दे सकते हैं.

लागत घटाएं

किसानों के मुताबिक, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्याज की उत्पादन लागत 12 रुपए प्रति किलोग्राम आ रही है, जबकि पिछले दिनों मेरठ की मंडी में प्याज के दाम घट कर 3-4 रुपए प्रति किलोग्राम तक रह गए थे. लिहाजा, प्याज की बोआई से कटाई तक नई तकनीक अपना कर लागत में कमी लाने की जरूरत है.

इस के अलावा कम जमीन में ज्यादा उपज लेना भी लाजिम है, ताकि प्रति हेक्टेयर औसत उपज बढ़े. साथ ही, किसान प्याज को महफूज रखने के लिए भंडारण की कूवत भी जरूर बढ़ाएं. प्याज की पैदावार में महाराष्ट्र सब से आगे है, दूसरे नंबर पर मध्य प्रदेश है व तीसरे पर कर्नाटक है. अब उत्तर प्रदेश में भी प्याज की खेती बहुत तेजी से बढ़ रही है.

प्याज की खेती में नई तकनीक अपना कर व नई किस्में उगा कर प्याज की पैदावार बढ़ाई जा सकती है, लेकिन सिर्फ पैदावार ही नहीं, उस से आमदनी बढ़ाने की भी जरूरत है. जब भी प्याज की पैदावार ज्यादा होती है, उस की कीमतें गिर जाती हैं और खेतों व गोदामों में प्याज सड़ जाता है.

प्याज की प्रोसेसिंग में हम आज भी बहुत पीछे हैं. प्याज की बड़ी मंडियां महाराष्ट्र के नासिक व लासलगांव में हैं. प्याज के जमाखोर किसानों व प्याज की मंडियों को आसानी से काबू कर लेते हैं. ऐसे में किसानों व उपभोक्ताओं को बचाने के लिए जमाखोरों का जाल तोड़ना बेहद जरूरी है.

कमजोर ढांचा

प्याज की मांग व खपत देश में सब से ज्यादा है, लिहाजा भारत सरकार के लघु कृषक कृषि व्यापार संघ ने निगरानी के लिए मार्केट इंटेलीजेंस सिस्टम बना रखा है, लेकिन इस के बावजूद प्याज उत्पादकों को उन की उपज की वाजिब कीमत नहीं मिलती, दूसरी ओर फुटकर ग्राहकों को प्याज खरीदने के लिए मुंहमांगी कीमत चुकानी पड़ती है.

प्याज की प्रोसैसिंग को बढ़ावा दे कर और प्याज की खरीद व बिक्री सहकारिता के जरीए कर के यह मसला काफी हद तक हल हो सकता है, लेकिन राष्ट्रीय सहकारी कृषि विपणन महासंघ, नैफेड जैसी संस्थाएं भी नाकाम हैं. लिहाजा किसान पिस रहे हैं और बिचौलिए चांदी काट रहे हैं.

पुरानी तकनीक

भारत में आज भी ऐसे कई इलाके हैं, जिन में प्याज की प्रति हेक्टेयर औसत उपज 10 टन से भी कम है. दरअसल किसान प्याज की खेती तो करते हैं, लेकिन ज्यादातर किसान प्याज की पुरानी किस्में उगाते हैं और खेती के पुराने तौरतरीके अपनाते हैं. लिहाजा प्याज की खेती में फायदा दूर, लागत भी मुश्किल से निकलती है. लिहाजा प्याज की खेती में सुधार व बदलाव लाना जरूरी है.

खोजबीन

Onion Processing

दरअसल, अभी तक नकदी फसलों पर ज्यादा जोर होने की वजह से प्याज जैसी फसलों पर खास ध्यान नहीं दिया गया. बहुत से किसान यह नहीं जानते कि प्याजलहसुन की खेती को बढ़ावा देने के लिए साल 1994 से पुणे में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का एक अनुसंधान निदेशालय चल रहा है. देशभर में उस के 28 सेंटर हैं.

प्याज निदेशालय के वैज्ञानिकों ने प्याज की पैदावार, क्वालिटी व निर्यात बढ़ाने के लिए काफी खोजबीन की है. उन्होंने प्याज की नई किस्में खोजने के साथसाथ प्याज महफूज रखने की तकनीक व उस की प्रोसैसिंग के तरीके भी निकाले हैं. वहां प्याज की उन्नत खेती करने के लिए किसानों को बीज, सलाह व ट्रेनिंग भी दी जाती है. यह बात अलग है कि तमाम किसानों को ऐसी बातों का पता ही नहीं चलता. लिहाजा, वे इन सहूलियतों का फायदा नहीं उठा पाते.

प्याज परियोजना निदेशालय में खेती व बागबानी महकमों के मुलाजिमों, कारोबारियों व किसानों को प्याज की ज्यादा पैदावार देने वाली नई संकर किस्मों, खेती की नई तकनीक, प्याज फसल का रोगोंकीटों से बचाव, प्याज का बेहतर भंडारण व उस की बिक्री जैसे पहलुओं पर ट्रेनिंग दी जाती है. लिहाजा, वहां के माहिरों से तालमेल बना कर उस का फायदा उठाया जा सकता है.

प्याज निदेशालय ने 5 व 10 टन कूवत के किफायती भंडारघरों के 2 डिजाइन निकाले हैं, जिन में तली व दीवारों से हवा जाने का इंतजाम है. साथ ही बड़ी, छोटी व मझली साइजों की प्याज को छांट कर अलग करने वाली ग्रेडर मशीन भी बनाई है. इस से हाथ से काम करने के मुकाबले 20 गुना ज्यादा व जल्दी प्याज की बेहतर छंटाई होती है.

उम्दा किस्में

देश के अलगअलग इलाकों में लाल प्याज की 45, सफेद प्याज की 10, पीली प्याज की 3 व भूरी प्याज की 1 किस्म सहित कुल 59 किस्में फिलहाल चलन में हैं. इन में से खासतौर पर एन 2-4-1, एन 53, एन 257-9-1, फुले सफेद, पूरा रैड, भीमा सुपर, भीमा रैड, भीमा शक्ति, भीमा शुभ्रा, भीमा श्वेता व भीमा डार्क रैड वगैरह किस्में ही ज्यादा बोई जाती हैं.

आमतौर पर ज्यादातर किसान जल्दी पक कर ज्यादा उपज देने वाली किस्मों की प्याज बोना पसंद करते हैं.

इस लिहाज से करीमनगर, तेलंगाना में डब्ल्यूएम 514 किस्म की 4-6 कंद वाली सफेद गुच्छेदार प्याज पहचानी गई है., जो सिर्फ 110 से 125 दिनों में पक कर 20 टन प्रति हेक्टेयर तक की पैदावार देती है. जरूरत उस का बीज मुहैया कराने की है.

हालांकि प्याज की नई किस्मों की खोजबीन करने पर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के वैज्ञानिकों ने काफी काम किया है, लेकिन वह खोज बेकार है, जो गांवों तक न पहुंचे. पिछले दिनों असम व अरुणाचल प्रदेश से जंगली व बोई जा रही प्याज की 49 किस्में इकट्ठा की गई हैं. साथ ही, जल्दी पकने व ज्यादा उपज देने वाली अमेरिकन प्याज की 40 किस्मों को भी भारत की आबोहवा में बो कर आजमाया जा रहा है.

जल्द ही इस खोजबीन के नतीजे आने की उम्मीद है. जरूरत जागरूकता बढ़ाने व प्याज उत्पादकों को बाजार, बिक्री, वाजिब कीमत व प्रोसैसिंग आदि की सहूलियतें मुहैया कराने की है, ताकि प्याज पैदा करने वालों की आमदनी में इजाफा हो सके. सरकार के भरोसे रह कर कुछ होने वाला नहीं है, लिहाजा किसानों को खुद एकजुट हो कर कोशिशें करनी होगी. प्याज के बारे में और ज्यादा जानकारी के लिए किसान निम्न पते पर संपर्क कर सकते हैं:

निदेशक

प्याज और लहसुन अनुसंधान निदेशालय

राजगुरु नगर, पुणे, महाराष्ट्र. पिन : 410505 फोन : 02135-222026.

प्याज की प्रोसैसिंग से करें कमाई

बीते दिनों देश के कई हिस्सों में किसानों ने अपनी प्याज सड़क पर फेंक कर गुस्से का इजहार किया, लेकिन ओहदेदारों के कानों पर जूं नहीं रेंगी. दिल्ली आदि में प्याज की फुटकर कीमतें भले ही गिरें, लेकिन थोक मंडियों में प्याज की तबाही होने से किसान खून के आंसू रोते हैं. गिरती कीमतों से निबटने का उपाय भंडारण है, लेकिन शीत भंडारों की गिनती व कूवत कम है. किसानों को जरूरतों व कर्ज चुकाने को तुरंत पैसा चाहिए. वे कीमतें बढ़ने तक का इंतजार नहीं कर पाते. इसलिए कम दामों पर ही अपनी  प्याज बेच देते हैं.

प्याजलहसुन अनुसंधान निदेशालय, राजगुरु नगर, पुणे के मुताबिक प्याज को प्रोसैस कर के छिली, सूखी, पाउडर व पेस्ट बना कर बेच सकते हैं. उस का अचार, तेल, सिरका, पेय व सास वगैरह बना सकते हैं. प्याज के कचरे से रेशा, रंग व बायोगैस बनते हैं. लिहाजा निजी, सहकारी व सरकारी क्षेत्र की छोटी, मझोली व बड़ी प्रोसैसिंग इकाइयों को बढ़ाना होगा. इसलिए कृषि, खाद्य प्रसंस्करण महकमे व किसान पहल करें. प्याज उत्पादक प्रसंस्करण की तकनीक सीखें. ताकि प्याज की कीमतें गिरने की मुसीबत से नजात मिले व कमाई में इजाफा हो.

नैस्ले, पैप्सी व आईटीसी वगैरह बहुत सी कंपनियां सूखी प्याज खरीदती हैं. प्याज प्रोसैसिंग की 80 इकाइयों में से 65 अकेले गुजरात में व बाकी महाराष्ट्र वगैरह में हैं. कटाई के बाद की तकनीक का एक केंद्रीय संस्थान, सीफेट, लुधियाना में है, जो किसानों को प्याज सुखाने की ट्रेनिंग देता है. प्याज का पाउडर बनाने की मशीनों की जानकारी अलीबाबा डाट काम से कर सकते हैं. प्याज प्रोसैसिंग यूनिट की लागत, लाभ, मशीनरी, निर्यात, बाजार, नियमकानून व सरकारी स्कीमों वगैरह की जानकारी यहां से भी कर सकते हैं.

Group Working : समूह बना कर करेंगे काम, कमाएंगे दाम

उदयपुर : भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रबंधन अकादमी राजेंद्र नगर, हैदराबाद, तेलंगाना की ओर से महाराणा प्रताप कृषि एंव प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के प्रसार शिक्षा निदेशालय में ‘श्रीअन्न का प्रसंस्करण, मूल्य संवर्द्धन एवं निर्यात’ विषय पर पांचदिवसीय महिला प्रशिक्षण कार्यक्रम पिछले दिनों संपन्न हुआ. प्रशिक्षण में बांसवाड़ा, राजसमंद व उदयपुर जिले की 30 महिलाओं ने हिस्सा लिया.

अनुसूचित जाति उपयोजना के अंतर्गत कौशल विकास प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल महिलाओं को पिछले दिनों 25 से 29 मार्च तक विशेषज्ञों ने ‘श्रीअन्न’ के विभिन्न बेकरी आइटम जैसे रागी केक, ज्वार डोनट्स, ओट्स कुकीज, ज्वार ब्रेड, बाजरा लड्डू, ज्वार पापड़, कांगणी नमकीन, बाजरा लच्छा परांठा, ज्वार नान, कांगणी के लड्डू व सावां के फ्राइम, ब्राउनी, कप केक आदि लगभग दो दर्जन खाद्य वस्तुओं को न केवल बनाना सीखा, बल्कि समूह बना कर इन चीजों से कमाई करने का संकल्प लिया.

प्रशिक्षणार्थियों को विशेषज्ञ वेलेंटीना ने केक, कुकीज, ब्राउनी, कप केक बनाना सिखाया, वहीं विजयलक्ष्मी ने पापड़, पापड़ी, लड्डू बनाना सिखाया. हजारी लाल ने नान, बाजरा नान, ज्वार नान व नूडल्स बनाना सिखाया.

एमपीयूएटी में पादप अनुवांशिकी विभाग की हेड प्रो. हेमलता शर्मा ने प्रशिक्षणार्थियों को ‘श्रीअन्न’ यानी मोटे अनाज में मौजूद पोषक तत्वों के बारे में बताया. साथ ही, उन्होंने आह्वान किया कि वे मोटे अनाज को नियमित आहार के काम में लें.

निदेशालय सभागार में आयोजित समापन समारोह में मुख्य अतिथि पूर्व निदेशक प्रसार शिक्षा निदेशालय डा. आईजे माथुर ने कहा कि प्रशिक्षण के दौरान जो भी बेकरी उत्पाद बनाना सीखे हैं, इसे अब व्यवसायिक स्तर पर बनाएं. महिला समूह बना कर अपने उत्पाद बेकरी संस्थानों को दे और मुनाफा कमाएं.

Group Work

कभी मोटे अनाज (श्रीअन्न) यानी बाजरा, ज्वार, रागी, कांगणी, सावां, चीना आदि को ‘गरीबों का भोजन’ माना जाता था, लेकिन आज अमीर आदमी मोटे अनाज के पीछे भाग रहा है. मोटे अनाज में तमाम रोगों को रोकने संबंधी पोषक तत्वों की भरमार है, इसलिए लोग ‘श्रीअन्न’ को अपने भोजन में शामिल करने लगे हैं.

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रबंधन अकादमी, राजेंद्र नगर, हैदराबाद के संयुक्त निदेशक डा. गोपाल लाल ने कहा कि लोगों को मोटे अनाज का महत्व समझ में आने लगा है और ‘श्रीअन्न’ की मांग भी बढ़ी है. प्रशिक्षण का ध्येय भी यही है कि सुदूर गांवों के समाज के कमजोर तबके की युवा महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़े और वे अपने क्षेत्र में नया र्स्टाटअप शुरू कर सकें.

कार्यकम के आरंभ में निदेशक प्रसार शिक्षा निदेशालय, एमपीयूएटी डा. आरएल सोनी ने प्रतिभागी महिलाओं से आह्वान किया कि अपनेअपने गांव पंहुच कर सब से पहले ‘श्रीअन्न’ के विविध उत्पाद बना कर खुद तो खाएं ही, साथ ही पड़ोसियों व मेहमानों को खिलाएं.

इस के बाद समूह बना कर बड़े पैमाने पर उत्पादन कर स्वरोजगार से जुड़ें. खाद्यान्न उत्पादन में हमारा देश आत्मनिर्भर है, वहीं फलसब्जी व दूध उत्पादन में भी देश शीर्ष पर है. कमी केवल प्रसंस्करण यानी प्रोसैसिंग की है. प्रोसैसिंग की उचित व्यवस्था न होने से बड़ी मात्रा में फलसब्जी बेकार हो जाती है.

हैदराबाद से आए प्रमुख वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष एससीएसपी योजना डा. एम. बालाकृष्णन ने कहा कि बाजरा उत्पादन में राजस्थान का नाम देश में अव्वल है. बाजरा डायबिटीज को नियंत्रण में करने का अच्छा माध्यम है. महिलाएं बाजरा व्यंजन बना कर नया धंधा शुरू कर सकती है.

प्रशिक्षण प्रभारी व कार्यक्रम संचालक डा. लतिका व्यास ने बताया कि प्रतिभागी महिलाओं को एक मुफ्त किट, जिस में 3 जार मिक्सर, आलू चिप्स मेकर प्रदान किए गए. साथ ही, मिलेट्स रेसिपी की बुकलेट भी दी गई.

Food processing : खाद्य प्रसंस्करण शौक को बनाया रोजगार

Food processing| तरक्की के नजरिए से खाद्य प्रसंस्करण काफी बड़ा क्षेत्र है. इस से तरक्की की अनेक संभावनाएं हैं. इस के तहत अनेक तरह की फलसब्जियों की प्रोसेसिंग कर अनेक उत्पाद तैयार किए जाते हैं, जिन की बाजार में अच्छी कीमत भी मिलती है. इस में खासकर अचार, मुरब्बे, जैम, चटनी, जूस, पापड़, बड़ी, चिप्स, बिसकुट जैसे अनेक उत्पाद हैं, जिन्हें गांवदेहात से ले कर बड़े शहरों तक बहुत पसंद किया जाता है. सरकार की भी प्रोसेसिंग के क्षेत्र में लोगों को बढ़ावा देने के लिए अनेक योजनाएं हैं.

फूड प्रोसेसिंग के तहत अनेक संस्थाओं व अनेक कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा इस तरह के कोर्स कराए जाते हैं, जहां से ट्रेनिंग ले कर कोई भी महिला या पुरुष इसे रोजगार का साधन बना सकता है और आमदनी ले सकता है. फूड प्रोसेसिंग के क्षेत्र में पुरुषों के मुकाबले महिलाएं ज्यादा हाथ आजमा रही हैं और सफल भी हो रही हैं, क्योंकि इस क्षेत्र में महिलाएं घरेलू तौर पर पहले ही दक्ष होती हैं.

ऐसी ही एक महिला हैं राजवंती, जो हरियाणा के जींद जिले की रहने वाली हैं. उन्होंने ‘सुप्रीम अचार उद्योग’ के नाम से अपनी इकाई लगा रखी है. पटियाला चौक रेलवे रोड पर स्थित इन की इकाई में तकरीबन 45 तरह के उत्पाद तैयार किए जाते हैं, जिन में 30 तरह के अचार, 6 तरह के मुरब्बे शामिल हैं. इन के अलावा वे अनेक तरह की चटनी, जैम, शर्बत, कैंडी वगैरह भी बनाती हैं. उन की इकाई में 15 से 20 लोगों को रोजगार भी मिल रहा है.

Food processing

हरियाणा के रोहतक व दादरी, पंजाब के चंडीगढ़ और दिल्ली के रोहिणी में इन के शोरूम हैं.

अभी हाल ही में चौधरी चरण सिंह कृषि विश्वविद्यालय, हिसार में लगे कृषि मेले में राजवंती से मुलाकात हुई. उन्होंने बताया, ‘मुझे बचपन से ही तरहतरह के व्यंजन बनाने का शौक था.

‘यही शौक आज मेरा रोजगार बन गया और मैं इस लायक हो गई कि 15-20 लोगों को भी अपने साथ रोजगार दिया.’

हालांकि राजवंती ने सिलाईकढ़ाई में आईटीआई की है, लेकिन तरहतरह के पकवान बनाने के शौक ने उन्हें इस मुकाम तक पहुंचाया है.

राजवंती ने बताया कि वे घरेलू तौरतरीकों से आयुर्वेद की पद्धति के मुताबिक अपने उत्पाद तैयार करती हैं, जिन्हें पूरी शुद्धता के साथ तैयार किया जाता है. लोगों का उन पर विश्वास ही उन की सफलता की सीढ़ी है.

उन्होंने आगे बताया कि खुद का रोजगार शुरू करने के लिए उन्होंने प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम योजना की जानकारी अपने क्षेत्र के जिला उद्योग केंद्र, जींद से ली, जहां से उन्हें पूरा सहयोग मिला और प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम के तहत साल 2012-13 में उन्हें 25 लाख रुपए लोन बैंक द्वारा मुहैया कराया गया. उस के बाद उन्होंने ‘सुप्रीम अचार उद्योग’ के नाम से अपनी इकाई स्थापित की. इस के बाद वे दिल्ली व हरियाणा में लगने वाले कृषि मेलों में भी पहुंचने लगीं, जहां उन्होंने स्टाल लगा कर अपने उत्पादों को आम लोगों तक पहुंचाया.

आज के समय में फूड प्रोसेसिंग खासा मुनाफे का सौदा है. कम पढ़ेलिखे लोग भी इस की ट्रेनिंग ले कर इसे अपने रोजगार का जरीया बना सकते हैं. अनेक संस्थाओं और कृषि विश्वविद्यालयों द्वारा बहुत कम समय की ट्रेनिंग दी जाती है, जहां से टे्रनिंग ले कर कोई भी व्यक्ति अपना रोजगार शुरू कर सकता है.

Kisan Samman : भोपाल में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के किसानों का सम्मान

Kisan Samman : दिल्ली प्रेस की कृषि पत्रिका फार्म एन फूड द्वारा 28 फरवरी, 2025 को मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के रवींद्र भवन में राज्य स्तरीय फार्म एन फूड कृषि सम्मान अवार्ड का आयोजन किया गया. इस कार्यक्रम में मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ के 150 से ज्यादा किसान और कृषि वैज्ञानिक शामिल हुए और खेती में नवाचार और तकनीकी के जरिए विभिन्न 17 श्रेणियों में बदलाव लाने वाले तकरीबन 30 किसानों, कृषि वैज्ञानिकों और कृषि विज्ञान केंद्रों को राज्य स्तरीय फार्म एन फूड कृषि सम्मान अवार्ड से सम्मानित किया गया.

दिल्ली प्रेस के कार्यकारी प्रकाशक अनंत नाथ ने कहा, ‘कृषि जगत हमारे देश की रीढ़ की हड्डी है. इसी क्षेत्र में किसानों के योगदान को लोगों को बताने के लिए हम ने फार्म एन फूड पत्रिका को शुरू करने की सोची और यह भी माना कि यह किसान समाज को जोड़ने की कड़ी है. मैं खुद को कृषि का छात्र मानता हूं. कोरोना काल मे घर पर एक किचन गार्डन बनाया था जो अब भी बरकरार है. हमारे जो आज के विजेता हैं वे बहुत मेहनती हैं और वे इस क्षेत्र में बहुत ज्यादा अचीव कर रहे हैं. मेरी अपील है कि किसान इस पत्रिका से जुड़े रहें ताकि हमारी संस्था कृषि जगत में होने वाली हर बात को जनजन तक पहुंचा सकें.

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और मध्य प्रदेश के सहकारिता, खेल एवं युवा कल्याण मंत्री विश्वास सारंग ने कहा, ‘भारत गांव में, खेत में और खलिहान में बसता है. हमें खेती पर और किसान पर ध्यान देना होगा. हमें फूड प्रोसेसिंग पर जोर देना होगा. ‘नदी जोड़ो अभियान’ इस में सहायक है. खेत से ही इस देश को मजबूत करने की इबारत लिखी जा सकती है. सरकार का यही उद्देश्य की खेती मुनाफे का धंधा बने.’

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि और मध्य प्रदेश सरकार में कौशल विकास एवं रोजगार मंत्री गौतम टेटवाल ने कहा, ‘सीखने की कोई उम्र नहीं होती और किसान हमेशा सीखता है. वह नवाचार करता है, नई तकनीक इस्तेमाल करता है. जब किसान के पास पर्याय खाद होगी और दूसरी सुविधाएं मुहैया होंगी, वह इस क्षेत्र में और आगे बढ़ेगा.’

विजेता किसानों में रतलाम के कपिल धाकड़ को बेस्ट यंग फार्मर अवार्ड दिया गया. महासमुंद के मिलन सिंग विश्वकर्मा और भोपाल के मनोहर पाटीदार को बेस्ट मेल फार्मर अवार्ड मिला. ग्वालियर की निशा निरंजन को बेस्ट फीमेल फार्मर अवार्ड से सम्मानित किया गया, जबकि भोपाल के गीता प्रसाद पाटीदार, शाजापुर के जयनारायण पाटीदार और टीकमगढ़ के पूरन लाल कुशवाहा को बेस्ट फार्मर अवार्ड इन इनोवेटिव फार्मिंग अवार्ड दिया गया.

अशोकनगर के खुमान सिंह रघुवंशी, भिंड के रामगोपाल सिंह, दंतेवाड़ा के जयलाल यादव को बेस्ट फार्मर अवार्ड इन आर्गेनिक/नेचुरल फार्मिंग का अवार्ड मिला. उज्जैन के अश्विनी सिंह चौहान, नारायणपुर के सुरेंद्र कुमार नाग को बेस्ट फार्मर अवार्ड इन इंटीग्रेटेड फार्मिंग दिया गया.

नरसिंहपुर के कृष्णपाल लोधी को बेस्ट फार्मर अवार्ड इन शुगरकेन प्रोडक्शन मिला, जबकि अशोकनगर के राजपाल सिंह नरवरिया को बेस्ट फार्मर अवार्ड इन मैकेनाइजेशन अवार्ड हासिल हुआ. इसी तरह बलौदाबाजार के विरेंद्र अग्रवाल को बेस्ट डेयरी/एनिमल कीपर का अवार्ड, तो मुरैना के यशपाल कुशवाह को बेस्ट मधुमक्खीपालक फार्मर अवार्ड दिया गया. शाजापुर के कृष्णपाल सिंह राजपूत को बेस्ट पोल्ट्री/हैचरी फार्मर अवार्ड मिला, तो नरसिंहपुर के राकेश दुबे को बेस्ट फार्मर अवार्ड इन मार्केटिंग दिया गया.

कोंडागांव, छत्तीसगढ़ के डा. राजाराम त्रिपाठी को सस्टेनेबल फार्मिंग टेक्नोलॉजी अवार्ड, तो कोंडागांव की ही डा. अपूर्वा त्रिपाठी को वुमन एग्री-इनोवेटर आफ द ईयर का अवार्ड मिला. रतलाम के डा. सुशील कुमार, भिंड के डा. सत्येंद्र पाल सिंह, दुर्ग की डा. ज्योत्स्ना मिश्रा को बेस्ट रिसर्च अवार्ड इन फार्मिंग सिस्टम से नवाजा गया.

इसी तरह केवीके बड़वानी, जिला बड़वानी, केवीके जावरा, जिला रतलाम, केवीके, रायसेन, जिला रायसेन, केवीके, नारायणपुर, जिला नारायणपुर, केवीके, बालोद, जिला बालोद को बेस्ट कृषि विज्ञान केंद्र अवार्ड मिला. भोपाल के खारपी फार्मर एफपीओ और नरसिंहपुर के शक्तिपूजा एफपीओ को बेस्ट एफपीओ अवार्ड दिया गया.

इन श्रेणियों में मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ से कृषि विज्ञान केंद्रों व कृषि संस्थानों के संस्तुति सहित 200 से भी अधिक नोमिनेशन प्राप्त हुए थे. विभिन्न श्रेणियों में प्राप्त इन नोमिनेशन का 4 सदस्यीय जूरी द्वारा मूल्यांकन किया गया, जिस में सर्वश्रेष्ठ नोमिनेशन को पुरस्कार के लिए चुना गया.

इस सम्मान समारोह में पुरस्कृत किसानों के साथसाथ कृषि विज्ञान केंद्रों, कृषि विश्वविद्यालयों और अन्य कृषि संस्थानों के वैज्ञानिक, अन्य शासकीय और प्रशासनिक अधिकारी भी उपस्थित रहे. इस कार्यक्रम का मंच संचालन विजी श्रीवास्तव ने किया. इस कार्यक्रम में कृभको और जात्रे आइसक्रीम की विशेष रूप से सहभागिता रही. उन्होंने सह प्रायोजक के रूप में किसानों का हौसला बढ़ाया.

‘फार्म एन फूड जौन डियर अवार्ड’ हाथों में सम्मान चेहरे पर मुसकान

पत्रिका ‘फार्म एन फूड’ दिल्ली प्रैस के गौरवशाली प्रकाशनों में शुमार देश के किसानों को न केवल खेतीकिसानी से जुड़ी जानकारियां उपलब्ध कराती है, बल्कि यह आम बोलचाल की भाषा में कृषि की नई तकनीकी जानकारी, बागबानी, मत्स्यपालन, डेरी व डेरी उत्पाद, फूड प्रोसेसिंग, खेतीबारी से जुड़ी मशीनों, खेतखलिहान से बाजार तक का सफर समेत ग्रामीण विकास और किसानों की सफलता की कहानियों और अनुभवों को किसानों तक अपने लेखों और खबरों के जरीए पहुंचाने का काम करती रही है. यही वजह है कि इस पत्रिका का प्रसार देश में तेजी से बढ़ रहा है और खेतीबारी में दिलचस्पी रखने वाले पाठकों की तादाद में इजाफा भी हो रहा है.

पत्रिका ‘फार्म एन फूड’ न केवल लेखों के जरीए किसानों की मददगार बनी हुई है, बल्कि समयसमय पर उन का सम्मान कर किसानों के प्रयासों और अनुभवों को लोगों की नजर में लाने का काम करती रही है. इसी कड़ी में किसानों के सम्मान के लिए पिछले 3 सालों से ‘फार्म एन फूड अवार्ड’ का आयोजन पूर्वी उत्तर प्रदेश में किया जाता रहा है.

इस वर्ष यह आयोजन उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले के पिंक स्मार्ट विलेज, हसुड़ी, औसानपुर में ‘फार्म एन फूड जौन डियर अवार्ड’ के नाम से किया गया, जिस के आयोजन में सिद्धार्थनगर जिले के एसपी आटोमोबाइल्स व हसुड़ी ग्राम पंचायत ने मुख्य प्रायोजक के रूप में सहयोगी भूमिका निभाई.

कार्यक्रम का ये हिस्सा बने

17 जनवरी, 2018 को हसुड़ी ग्राम पंचायत तकरीबन 1200 किसानों के जमावड़े की गवाह बनी, जब खेती में नवाचार और तकनीकी के जरीए बदलाव लाने वाले किसानों को सम्मानित किया गया.

अवार्डइस कार्यक्रम का उद्घाटन उत्तर प्रदेश सरकार में आबकारी व मद्यनिषेध विभाग के कैबिनेट मंत्री राजा जय प्रताप सिंह ने मुख्य अतिथि के रूप में फीता काट कर किया. इस दौरान डुमरियागंज विधानसभा के विधायक राघवेंद्र प्रताप सिंह, बस्ती मंडल के कमिश्नर दिनेश कुमार सिंह, जिलाधिकारी कुणाल सिल्कू, पुलिस अधीक्षक धर्मवीर सिंह ने शिरकत की.

इस के अलावा परियोजना निदेशक संत कुमार, जिला विकास अधिकारी सुदामा प्रसाद, सीएमओ डाक्टर वेद प्रकाश शर्मा, बेशिक शिक्षा अधिकारी मनीराम सिंह, एसडीएम जुबेर बेग सहित जिले के तमाम आला अधिकारी मौजूद रहे, जिन्होंने किसानों द्वारा लगाए गए स्टालों पर जा कर उन की सफलता की न केवल कहानी जानी, बल्कि सरकार द्वारा खेतीबारी से जुड़ी योजनाओं से उन किसानों को जोड़ने का भरोसा भी दिया.

इस दौरान वहां मौजूद किसानों को संबोधित करते हुए मुख्य अतिथि राजा जय प्रताप सिंह ने कहा कि सिद्धार्थनगर प्रदेश के पिछड़े जिलों में भले ही गिना जाता रहा हो, लेकिन खेती के नजरिए से यह बहुत धनी जिला है. काला नमक और बासमती के लिए इस जिले की पहचान पूरी दुनिया में है. ऐसे में दिल्ली प्रैस की पत्रिका ‘फार्म एन फूड’ ने देश के किसानों के सम्मान के लिए अवार्ड का आयोजन कर सिद्धार्थनगर जैसे जिले में एक नई अभिनव पहल की है.

उन्होंने हसुड़ी, औसानपुर गांव में हुए विकास के कामों की तारीफ की और कहा कि देश की दूसरी ग्राम पंचायतों को ग्राम प्रधान दिलीप त्रिपाठी के कामों से सीख लेनी चाहिए.

विधायक राघवेंद्र प्रताप सिंह ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि ‘फार्म एन फूड’ में लगाए गए नवाचारी किसानों के स्टाल पर जा कर यह पता चला कि अगर किसान उन्नत तकनीकी का उपयोग करें तो वे कभी भी घाटे में नहीं रहें.

बस्ती मंडल के कमिश्नर दिनेश प्रताप सिंह ने इस तरह के आयोजन को बेहद सराहनीय कदम बताया और कहा कि इस से किसानों का मनोबल बढ़ता है.

सीनियर डाक्टर वीके वर्मा ने कहा कि वे पिछले 30 सालों से भी ज्यादा समय से दिल्ली प्रैस की पत्रिकाओं के नियमित पाठक रहे हैं. जिस तरह दिल्ली प्रैस ने देश के हर वर्ग को ध्यान में रख कर पत्रिकाएं निकाली हैं, उस ने समाज को एक नई दिशा देने का काम किया है. उन्होंने कहा कि वे चिकित्सा के क्षेत्र में होने के बावजूद साल 2009 से ‘फार्म एन फूड’ पत्रिका के नियमित पाठक हैं.

जिला अधिकारी कुणाल सिल्कू ने किसानों को संबोधित करते हुए कहा कि किसान तभी प्रगति कर सकते हैं, जब वे आधुनिक तकनीक और उन्नत कृषि प्रणाली का उपयोग करें. इस के लिए सरकार भी तमाम योजनाएं चला रही है. किसान इन योजनाओं का लाभ ले कर घाटे की खेती से उबर सकते हैं. किसानों के लिए इतने बड़े स्तर का आयोजन अपनेआप में अनूठी बात है.

स्टाल रहे आकर्षण का केंद्र

अवार्ड

‘फार्म एन फूड जौन डियर अवार्ड’ में प्रगतिशील किसानों द्वारा लगाए गए कृषि उत्पाद और नवाचारों के बारे में यहां आए किसानों ने तमाम जानकारी ली.

एक तरफ किसानों ने युवा किसान प्रेम प्रकाश सिंह द्वारा की जा रही बड़े स्तर पर खस की खेती, उस की प्रोसेसिंग व मार्केटिंग की जानकारी ली, तो वहीं दूसरी तरफ किसान राममूर्ति मिश्र द्वारा इंटीग्रेटेड खेती के तहत की जा रही राजमा, सुगंधित धान व चीकू की खेती की जानकारी ली.

किसानों द्वारा लगाए गए स्टालों पर युवा किसानों का जमावड़ा रहा. किसान अरविंद पाल द्वारा किए जा रहे मछलियों की विभिन्न प्रजातियों के पालन व उस की तकनीकी जानकारी, किसान राजेंद्र सिंह सिंह द्वारा की जा रही जैविक खेती, बिजेंद्र पाल द्वारा विकसित विशेष प्रजाति के धान, किसान अरविंद सिंह के आलू बीज उत्पादन की तकनीकों समेत दूसरे स्टालों से खूब जानकारियां बटोरीं.

ग्राम प्रधान हुए सम्मानित

अवार्ड‘फार्म एन फूड जौन डियर अवार्ड’ के आयोजन के प्रमुख सहयोगी व स्मार्ट ग्राम, हसुड़ी के ग्राम प्रधान दिलीप कुमार त्रिपाठी को ‘फार्म एन फूड’ द्वारा विशेष रूप से सम्मानित किया गया.

इस दौरान कार्यक्रम में आए किसानों और अतिथियों ने गांव में किए गए विकास के कामों का जायजा भी लिया, जिन में पिंक विलेज के रूपम  गांव के रंगरोगन, औरतों की सुरक्षा और खुले में शौच की रोकथाम के लिए लगाए गए सीसीटीवी कैमरे, फ्री वाईफाई, गांव के स्कूल और शिक्षा व्यवस्था, कूड़ा प्रबंधन व साफसफाई, हर घर में एलईडी व बिजली खंभों पर लगे एलईडी की स्ट्रीट लाइट, पूर्वांचल की संस्कृति को बचाने के लिए पूर्वांचल संस्कृति संग्रहालय, गांव की लड़कियों व औरतों के लिए मुफ्त कंप्यूटर व सिलाईकढ़ाई की ट्रेनिंग समेत करए गए विकास के दूसरे कामों की जम कर सराहना की गई.

साझा किए अपने अनुभव

राजस्थान से आए युवा किसान पवन के. टाक ने कार्यक्रम में आए किसानों को जैविक खेती की जानकारी दी और बताया कि किसान जैविक विधि से खेती कर के न केवल अपनी लागत में कमी ला सकते हैं, बल्कि डेढ़ से दोगुना आमदनी भी ले सकते हैं.

राजस्थान के ही किसान राकेश चौधरी ने किसानों को औषधीय खेती से आमदनी बढ़ाने के टिप्स दिए और बताया कि उन्होंने किस तरह से राजस्थान में औषधीय खेती करने वाले किसानों को बिचौलियों के चंगुल से छुटकारा दिला कर उन की आमदनी को दोगुना किया है.

महराजगंज जिले के वर्मी कंपोस्ट के बड़े उत्पादक किसान नागेंद्र पांडेय ने अपनी सफलता के राज बताए, वहीं सिद्धार्थनगर जिले के किसान राम उजागिर, जुगानी मौर्य, सिविल सर्जन हरदेव मिश्र, नुरुल हक जैसे किसानों ने अपनी कामयाबी के राज बताए.

बांटे गए गिफ्ट

अवार्डकार्यक्रम में सहयोगी रही जौन डियर ट्रैक्टर की स्थानीय एजेंसी एसपी आटोमोबाइल्स द्वारा किसानों को जौन डियर की तरफ से डायरी, पैन, बैग, पर्स वगैरह गिफ्ट भी बांटे गए.

इस मौके पर एसपी आटोमोबाइल्स के मालिक आशीष दुबे ने कहा कि किसानों के सम्मान के इतने बड़े आयोजन का हिस्सा बन कर उन्हें बेहद खुशी हो रही है.

खिले किसानों के चेहरे

पिंक स्मार्ट विलेज, हसुड़ी, औसानपुर के पंचायत भवन का प्रांगण देश के अन्नदाता किसानों के सम्मान का द्योतक बना, जब इन्हें अतिथियों के हाथों ‘फार्म एन फूड जौन डियर अवार्ड’ से नवाजा गया.

सम्मानित किसानों में सिद्धार्थनगर जिले से मोरध्वज सिंह को गन्ना उत्पादन के लिए, जटाशंकर पांडेय और जगदंबा प्रसाद को कृषि यंत्रीकरण, जुगानी मौर्य को चने की खेती, रामदास मौर्य को सब्जी की खेती, राम उजागिर को कृषि विविधीकरण, सिविल सर्जन साधन संरक्षण तकनीकी द्वारा धानगेहूं की खेती, हरदेव मिश्र को सब्जी की खेती, प्रेमशंकर चौधरी को बीज उत्पादन, नुरुल हक को मुरगीपालन, हम्माद हसन को मछलीपालन, प्रदीप मौर्य को कृषि यंत्रीकरण, चंद्रभान मौर्य और ज्ञानचंद्र गुप्ता को सब्जी उत्पादन, रामलखन मौर्य को करेले की खेती, परशुराम यादव को काला नमक धान उत्पादन, भगौती प्रसाद को तिलहन उत्पादन, श्रीराम यादव को फसल उत्पादन, अकबर अली को तिलहन उत्पादन और श्रीधर पांडेय को कृषक उन्नयन के लिए अवार्ड मिला.

बस्ती जिले से सम्मानित होने वाले किसानों में अरविंद पाल को इंट्रीग्रेटेड फार्मिंग, प्रेम प्रकाश सिंह को औषधीय व सुगंधित खेती, राममूर्ति मिश्रा को फसलोत्पादन, राजेंद्र सिंह को दलहनतिलहन, बिजेंद्र पाल को बीज उत्पादन, जिला महराजगंज से नागेंद्र पांडेय को केंचुआ खाद, राजस्थान से पवन के. टाक को जैविक खेती के क्षेत्र में नवाजा गया.

साथ ही, यह सम्मान राकेश चौधरी को औषधीय खेती, मोईनुद्दीन चिश्ती को कृषि पर्यावरण पत्रकारिता, गांव कनेक्शन, लखनऊ की नीतू सिंह को कृषि ग्रामीण पत्रकारिता,

डा. वीके वर्मा को चिकित्सा, आलोक शुक्ल को ग्रामीण कला शिक्षा, कृषि विज्ञान केंद्र, सिद्धार्थनगर के वैज्ञानिकों में डा. डीपी सिंह, वैज्ञानिक पशु विज्ञान, वैज्ञानिक ई. अशोक कुमार पांडेय को कृषि अभियंत्रण, वैज्ञानिक डा. अशोक सिंह को सस्य विज्ञान, वैज्ञानिक

डा. प्रदीप कुमार कोफसल सुरक्षा, डाक्टर पीके सिंह को वैज्ञानिक उद्यान, वैज्ञानिक डाक्टर एसके मिश्र को कृषि प्रसार, वैज्ञानिक डा. एम सिंह को फार्म प्रबंधक, वैज्ञानिक नीलम सिंह को गृहविज्ञान में मिला.

अवार्ड

बस्ती जिले से सम्मानित होने वाले कृषि विज्ञान केंद्र, बस्ती के वैज्ञानिकों में डाक्टर एसएन सिंह, कार्यक्रम समन्वयक, वैज्ञानिक राघवेंद्र विक्रम सिंह, कृषि प्रसार, वरिष्ठ वैज्ञानिक डाक्टर एसएन लाल, पशुविज्ञान शामिल रहे.

इस मौके पर सम्मानित हुए किसानों का कहना था कि वे दिनरात खेतों में मेहनत कर के फसल उगाते हैं, तब कहीं जा कर देश की सवा अरब जनता का पेट भर पाते हैं. उस के बावजूद भी किसानों की अनदेखी की जाती है. ऐसे हालात में किसानों की मददगार पत्रिका ‘फार्म एन फूड’ ने उन का सम्मान कर उन के हौसले को दोगुना कर दिया.

इस कार्यक्रम के मंच संचालन की जिम्मेदारी युवा पत्रकार भृगुनाथ त्रिपाठी ने कुशलतापूर्वक निभाई. सचिंद्र शुक्ल, विशाल पांडेय व सत्यप्रकाश पांडेय का भी कार्यक्रम को सफल बनाने में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा.

विभिन्न व्यावसायिक प्रशिक्षणों (Vocational Trainings) के लिए करें तुरंत आवेदन

हिसार: चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय स्थित सायना नेहवाल कृषि प्रौद्योगिकी प्रशिक्षण एवं शिक्षा संस्थान में हरियाणा के अनुसूचित जाति /जनजाति के उम्मीदवारों को विभिन्न प्रकार के व्यावसायिक प्रशिक्षण दिए जाएंगे. विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बी.आर. काम्बोज ने यह जानकारी देते हुए बताया कि संस्थान में समय-समय पर अनुसूचित जाति/जनजाति के बेरोजगार और जरूरतमंद विशेष कर ग्रामीण युवक एवं युवतियों को प्रशिक्षण दिया जाता है ताकि वे स्वयं का रोजगार स्थापित कर आत्मनिर्भर बन सके.

इसी कड़ी में अनुसूचित जाति/जनजाति के व्यक्तियों के लिए 5 दिवसीय व्यवसायिक प्रशिक्षण का आयोजन भी किया जाएगा. जिस के अंतर्गत दूध से मूल्य संवर्धित उत्पाद तैयार करना, आचार और परिरक्षित पदार्थ बनाने के लिए खाद्य प्रसंस्करण, बेकरी में मिलेट्स के उपयोग पर प्रशिक्षण दिया जाएगा. अनुसूचित जाति/ जनजाति के बेरोजगार और जरूरतमंद विशेष कर ग्रामीण युवक एवं युवतियां जो यह प्रशिक्षण लेना चाहते हैं वो गेट नंबर 3, लुद्दास रोड़ के नजदीक सायना नेहवाल कृषि प्रौद्योगिकी, प्रशिक्षण एवं शिक्षा संस्थान, चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविधालय हिसार मे आकर आवेदन कर सकते हैं. इन प्रशिक्षणों के लिए आवेदक की उम्र प्रमाणपत्र के अनुसार 18 से कम नहीं होनी चाहिए और वो किसी स्कूल मे अध्ययनरत नहीं होना चाहिए .विकलांग, विधवा, तलाकशुदा इत्यादि उम्मीदवारों को चयनित कमेटी द्वारा वरीयता दी जाएगी.

संस्थान के सहनिदेशक डा. अशोक गोदारा ने बताया कि आवेदन फौर्म 16 दिसम्बर 2024 तक किसी भी कार्य दिवस को सुबह 9 बजे से शाम 4.30 तक जमा करवा सकते है. चयनित प्रतिभागियों को सफलतापूर्वक प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद स्कीम के तहत खुद का रोजगार शुरू करने के लिए सहायता सामग्री देने का भी प्रावधान है.

फौर्म में सही विवरण न भरने या अधूरा छोड़ने या कोई आवश्यक दस्तावेज न लगाने की अवस्था में आवेदन रद्द कर दिया जाएगा. आवेदन फौर्म के साथ स्वयं सत्यापित दस्तावेजों की कौपी को संलग्न करना अति आवश्यक है जैसे शैक्षणिक योग्यता के प्रमाणपत्र, आयु के लिए कोई भी हरियाणा सरकार द्वारा प्रमाणित प्रमाणपत्र, हरियाणा सरकार द्वारा जारी अनुसूचित-जाति/जनजाति प्रमाणपत्र, आधारकार्ड, स्वयं सत्यापित नवीनतम रंगीन फोटो, सक्रिय बैंक अकाउंट की कौपी के पहले पृष्ठ की प्रति जिस पर खाताधारक और बैंक का विवरण दिया हो इत्यादि.

फौर्म भरने से पहले ध्यान दिया जाए कि परिवार पहचान पत्र के अनुसार किसी भी सदस्य ने इस से पहले इस विश्वविद्यालय या इस के संबंधित हरियाणा के किसी भी कृषि विज्ञान केन्द्रों/संस्थानों से अनुसूचित जाति/जनजाति के लोगों के लिए सहायता प्राप्त स्कीम के तहत किसी भी तरह का प्रशिक्षण न लिया हुआ हो और इस संबंध में उम्मीदवार को एक अंडरटेकिंग इस संस्थान में देनी होगी. आवेदक को निर्धारित फौर्म भर कर ही खुद के हस्ताक्षर करने होंगे वरना उम्मीदवार का फौर्म रद्द कर दिया जाएगा.

प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्यम उन्नयन योजना है लाभकारी

खंडवा : प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्यम उन्नयन योजना के अंतर्गत शासकीय उद्यान रोपणी बोरगांव खुर्द विकासखंड खंडवा में जिला स्तरीय कार्यशाला (डीआरपी एवं खाद्य प्रसंस्करण उद्यमियों आदि) की संगोष्ठी का आयोजन किया गया. मुख्य अतिथि के रूप में ग्राम पंचायत बोरगांव खुर्द की महिला सरपंच नन्नी बाई पांडे उपस्थित हुईं.

उपसंचालक, उद्यान, अजय चौहान ने बताया कि कार्यशाला में 35 उद्यमियों/किसानों ने भाग लिया, जिस में मुख्य प्रवक्ता के रूप में बैंक औफ इंडिया, जिला खंडवा के लीड बैंक मैनेजर संजय करोड़ी एवं चीफ मैनेजर डेविड डोंगरे द्वारा मार्केटिंग स्किल एवं बैंक लोन स्वीकृति के बारे में बताया गया कि आवेदन करने के पश्चात 2 दिन के भीतर हार्ड कौपी बैंक में भी प्रस्तुत करें, जिस से तत्काल सिविल स्कोर देखा जा सकें. सिविल स्कोर सही पाए जाने पर 10 फीसदी मार्जिन मनी जमा कर 1 लाख, 60 हजार रुपए तक का लोन स्वीकृत बैंक ब्रांच से ही किया जाता है एवं इस से अधिक की राशि होने पर लोन स्वीकृति खंडवा से होती है, जिस में अधिकतक 6 से 7 दिन का समय लगता है.

इस के बाद कृषि विज्ञान केंद्र से उपस्थित डा. रश्मि शुक्ला द्वारा बताया गया कि प्याज पाउडर एवं पेस्ट बना कर वेल्यु एडिशन कर अच्छे मूल्य पर बेच कर अधिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं. मशरूम, बेकरी प्रोडक्ट, मल्टीग्रेन आटे के बिसकुट, टमाटर, मिर्च की प्रोसैसिंग भी पीएमएफएमई योजना के तहत इकाई लगा कर लाभ प्राप्त किया जा रहा है. सोयाबीन से सोया पनीर एवं सोया दूध की विधि को विस्तार से बताया गया. इस के पश्चात जिला रिसोर्स पर्सन सिद्धार्थ राठौर ने पीएमएफएमई योजना के अंतर्गत आवश्यक दस्तावेज आधारकार्ड, पेनकार्ड, बैंक की पासबुक, कोटेशन एवं मशीनों की जानकारी दी.