Orchards: लीची, आम, आंवला व अमरूद के बागों की रोपाई

 

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Orchards : फलों की मांग दिनोंदिन बढ़ती जा रही है. फल वाले पौधों को लगा कर किसान ज्यादा फायदा कमाने लगे हैं. किसान फल वाले पेड़ों को लगा कर मिट्टी व पानी को बचाते हुए प्रति हेक्टेयर क्षेत्रफल से अच्छा लाभ प्राप्त कर सकते हैं. फल के पेड़ों से ज्यादा लाभ कमाने के लिए बागों को लगाते समय खास बातों को ध्यान में रखना चाहिए.

फल वाले पौधों का चुनाव

बागबानी की सफलता के लिए फल वाले पौधों का चुनाव स्थान, मिट्टी की किस्म, सिंचाई के साधन व जमीन के अंदर के पानी की गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए करते हैं. शीतोष्ण जलवायु में सेब, आड़ू, चेरी आदि व समशीतोष्ण जलवायु में लीची, अंगूर, लोकाट आदि और उष्ण जलवायु में आम, अमरूद, आंवला, कटहल आदि लगाना ठीक रहता है.

जगह का चुनाव

रोपाई के लिए फल वाले पौधों का चुनाव करने के बाद सही जगह का चुनाव सफल बागबानी के लिए जरूरी है. जगह चुनने के लिए निम्न बातें ध्यान में रखना जरूरी है:

* चुनी गई जगह में पानी नहीं भरा होना चाहिए और मिट्टी का पीएच मान 7-8 के करीब होना चाहिए.

* सिंचाई व जल निकास का अच्छा इंतजाम होना चाहिए.

* वाहन आनेजाने का सही रास्ता होना चाहिए.

* जगह गांव के पास होनी चाहिए.

बाग का रेखांकन

बाग की रोपाई में बाग के रेखांकन को ध्यान में रखते हैं. हर पौधे की वृद्धि के लिए काफी जगह होनी चाहिए ताकि उस का रखरखाव करने में कोई परेशानी न हो. इस बात को ध्यान में रखते हुए आम, अमरूद, लीची व आंवला की रोपाई वर्गाकार व आयताकार तरीके से करनी चाहिए. आम, अमरूद, लीची व आंवला की  रोपाई में लाइन से लाइन और पौध से पौध की दूरी इस तरह रखते हैं:

आम  : 10×10 मीटर

लीची : 12×10 मीटर

आंवला : 10×18 मीटर

अमरूद : 6×6 मीटर.

बाग का रेखांकन बहुत जरूरी है. रेखांकन ठीक न होने पर बाग की उत्पादकता पर असर पड़ता है. बाग का रेखांकन करने के लिए पौधे की तय दूरी से आधी दूरी पर खेत के एक कोने से पहली लाइन बनाते हैं. पहली लाइन के बाद सभी लाइनें पौधों हेतु निर्धारित पूरी दूरी पर बनाते हैं. जहां लाइनें एकदूसरे को काटती हैं, उसी जगह पर गड्ढा खोदते हैं.

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गड्ढों की खुदाई

आम, आंवला व लीची के लिए 3×3×3 फुट और अमरूद व बेल के लिए 2×2×2 फुट के आकर के गड्ढे खोदते हैं. खुदाई करने के बाद गड्ढों को धूप में खुला छोड़ देते हैं, जिस से उन में मौजूद नुकसानदायक कीट व रोगों की विभिन्न अवस्थाएं खत्म हो जाएं.

इस के बाद गड्ढे को गोबर की खाद, बालू व उसी खेत की मिट्टी को 1:1:1 में मिला कर जमीन से 20 सेंटीमीटर ऊंचाई तक भरते हैं. इस मिश्रण में 100 ग्राम ट्राइकोडर्मा भी मिला देते हैं. गड्ढा भरने के बाद उस की सिंचाई कर देते हैं. जिस से गड्ढा बैठ जाए. इस के बाद बैठे हुए गड्ढों में दोबारा उसी मिश्रण को भर देते हैं और गड्ढे के स्थान पर कुछ निशान लगा देते हैं.

पौध का चुनाव

आम, अमरूद, लीची व आंवला की रोपाई के लिए मुख्य प्रजातियां निम्न प्रकार हैं :

आम : दशहरी, दशहरी 51, लंगड़ा, चौसा, आम्रपाली व बंबइया.

अमरूद : लखनऊ 49, इलाहाबादी, सफेदा व ललित.

लीची : रोज सैंटेड, कलकतिया व साही.

आंवला : बनारसी, बलवंत, नरेंद्र आंवला 6, नरेंद्र आंवला 7, नरेंद्र आंवला 10, चकइया व फ्रांसिस.

रोपाई के लिए पौध किसी जानीमानी पौधशाला से खरीदें. फल की स्वस्थ पौध निम्न मानक के अनुसार होनी चाहिए :

* पौध की औसत ऊंचाई 75-100 सेंटीमीटर हो.

* पौधे के तने की मोटाई 1 से 1.5 सेंटीमीटर हो.

* ग्राफ्टिंग व बडिंग किए गए पौधे की उम्र करीब 1 साल हो.

* पौधा रोग व बीमारियों से मुक्त हो.

पौध की रोपाई

आम, अमरूद, लीची व आंवला के पौधों की रोपाई जुलाई व अगस्त महीने में करते हैं. रोपाई के समय पिंडी के आकार का गड्ढा मुख्य गड्ढे में ऊपरी सतह के बीच में बनाते हैं. इस के बाद पौधे की पिंडी की उस में इस प्रकार से रोपाई करते हैं कि पिंडी का ऊपरी हिस्सा जमीन की सतह से 2 से 3 सेंटीमीटर नीचे रहे. रोपाई शाम के समय करने के बाद हलकी सिंचाई कर देते हैं. पौधा लगाते समय इस बात का खास ध्यान रखते हैं कि किसी भी हालत में पौधे की पिंडी न टूटने पाए.

खास सावधानियां

*  आम व आंवला के बाग में अच्छी फसल लेने के लिए 10 फीसदी दूसरी प्रजाति के पौधे परागणकर्ता पौधों के रूप में लगाएं, जैसे दशहरी आम का बाग लगाते समय 10 फीसदी पौधे बंबई हरा या पीला के लगाएं. इसी तरह लंगड़ा या चौसा प्रजाति के आमों का बाग लगाते समय 10 फीसदी पौधे दशहरी आम के लगाएं.

* हर तीसरी लाइन में तीसरा पौधा परागणकर्ता पौधा लगाएं.

* आंवले की पौध की रोपाई करते समय एक जगह पर एक से अधिक प्रजातियों की रोपाई करें.

* जल्दी पकने वाली प्रजातियों के पौधे एक जगह पर और देर से पकने वाली प्रजातियों के पौधे दूसरी जगह पर लगाएं ताकि फल तैयार होने पर तोड़ने में परेशानी न हो.

* जंगल के पास बाग न लगाएं.

* लगाए गए पौधों में ग्राफ्टिंग/बडिंग से नीचे (मूलवृंत से निकले) कल्ले तोड़ते रहें.

* बागों में सहफसली खेती के रूप में दलहनी, तिलहनी व सब्जियों वाली फसलों का ही चयन करें. किसी भी दशा में रोपित पौधे से ज्यादा ऊंचाई वाली फसलों का चयन न करें.

* पौधों की रोपाई के बाद उर्वरक डालने के लिए और रोगों व कीटों से पौधों की हिफाजत के लिए समयसमय पर विशेषज्ञों की सलाह लेते रहें.

बगीचे (Garden) लगाने से पहले करें जरूरी काम

फलों के बाग (Garden) लगाना आमदनी का अच्छाखासा जरीया साबित हो रहा है. मगर बगैर पूरी जानकारी के बाग (Garden) लगाना घाटे का सौदा साबित होता है. इसलिए वैज्ञानिक तरीके से बाग (Garden) लगाने में ही भलाई है.

बगीचा (Garden) लगाने से पहले निम्न जरूरी बातों का ध्यान रखना चाहिए:

फलों के बाग की योजना : ज्यादातर फलों के पेड़ लंबे समय के लिए होते हैं, इसलिए बाग इस तरह लगाए जाएं, ताकि उन से फायदा मिलता रहे, देखने में अच्छा लगे, देखभाल में कम खर्च हो, पेड़ स्वस्थ रहें और बाग में मौजूद साधनों का पूरा इस्तेमाल हो सके. उद्यान यानी बाग की योजना इस तरह की होनी चाहिए कि हर फल वाले पेड़ को फैलने के लिए सही जगह मिल सके व फालतू जगह नहीं रहे और हर पेड़ तक सभी सुविधाएं आसानी से पहुंच सकें.

फलों के उत्पादन के लिए सिंचाई का इंतजाम, मिट्टी व जलवायु वगैरह ठीक होनी चाहिए. बाग में काम करने के लिए मजदूर व तकनीकी कर्मचारी भी होने चाहिए.

जमीन का चयन : प्रधानमंत्री मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के तहत आप अपने नजदीकी कृषि पर्यवेक्षक के माध्यम से मिट्टी की जांच सकते हैं. फल उद्यानों यानी फलों के बगीचों के लिए गहरी, दोमट या बलुई दोमट मिट्टी अच्छी रहती है. जमीन में ज्यादा गहराई तक कोई भी सख्त परत नहीं होनी चाहिए. जमीन में भरपूर मात्रा में खाद होनी चाहिए व जल निकासी का सही इंतजाम होना चाहिए. लवणीय व क्षारीय जमीन में बेर, आंवला, लसोड़ा, खजूर व बेलपत्र वगैरह फल लगाने चाहिए.

पौधों का चयन : राजस्थान की जलवायु में खासतौर से अनार, आम, पपीता, करौंदा, आंवला, नीबू, मौसमी, माल्टा, संतरा, अनार, बेल, बेर व लसोड़ा आदि फलों की खेती आसानी से की जा सकती है. जिन भागों में पाले का ज्यादा असर रहता है, उन इलाकों में आम, पपीता व अंगूर के बाग नहीं लगाने चाहिए. ज्यादा गरमी व लू वाले इलाकों में लसोड़ा व बेर के पेड़ लगाने चाहिए. अधिक नमी वाले इलाकों में मौसमी, संतरा व किन्नू के पेड़ लगाने चाहिए.

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वायुरोधी पेड़ लगाना : गरम व ठंडी हवाओं और अन्य कुदरती दुश्मनों से रक्षा करने के लिए खेत के चारों ओर देशी आम, जामुन, बेल, शहतूत, खिरनी, देशी आंवला, कैथा, शरीफा, करौंदा, इमली आदि फलों के पेड़ लगाने चाहिए. इन से खेत गरम रहेगा व सर्द हवाओं से बचा रहेगा. अगर बाग का इलाका कम हो तो केवल उत्तर व पश्चिम दिशा में 1 या 2 लाइनों में इन पेड़ों को लगा सकते हैं.

ध्यान रहे कि इन पेड़ों की जड़ें बाग में घुस कर पोषक तत्त्वों का इस्तेमाल करने लग जाती हैं, जिस का नतीजा यह होता है कि उद्यान की उपज में कमी आने लगती है. इस से बचने के लिए उद्यान व बाड़ के बीच में 3 साल में 1 बार 3 फुट गहरी खाई खोद कर जड़ों को काट देना चाहिए.

सिंचाई : बगीचा लगाने से पहले सिंचाई कैसे होगी, इस पर ध्यान देना जरूरी है. पानी की कमी वाले इलाकों में बूंदबूंद सिंचाई विधि का इस्तेमाल करना चाहिए, जिस से पानी व मेहनत दोनों की बचत होगी और पौधों को जरूरत के हिसाब से पानी मिलने के कारण पैदावार में बढ़ोतरी होगी.

सिंचाई की नालियां पौधों की कतारों के बीच से निकाल कर दोनों ओर पौधों की जरूरत के हिसाब से थाले बना कर पानी दिया जाना चाहिए. पौधों की कतार में सीधी सिंचाई करने से पौधों में रोग फैलने की संभावना बढ़ जाती है और नाली का पहला पौधा काफी कमजोर हो जाता है. लवणीय व क्षारीय पानी सभी फलों के पेड़ों के लिए सही नहीं होता है.

इन इलाकों में आंवला, बेर, खजूर, कैर, लसोड़ा आदि फलों के पेड़ लगाने चाहिए. पानी के भराव वाले इलाकों में पानी निकलने का सही इंतजाम होना चाहिए.

फल के पेड़ों का सही दूरी पर रेखांकन करना :  उद्यान का रेखांकन करने के लिए सब से पहले खेत के किसी एक किनारे से जरूरी दूरी की आधी दूरी रखते हुए पहली लाइन का रेखांकन करते हैं. इस के बाद हर लाइन के लिए जरूरी दूरी रखते हुए पूरे खेत में दोनों किनारे से इसी विधि द्वारा रेखांकन कर लेते हैं व निशान लगी जगहों पर पौधे रोपते हैं. बगीचों को वर्गाकार विधि से ही लगाना चाहिए, क्योंकि यह सब से आसान तरीका है. इस में सभी प्रकार के काम आसानी से किए जा सकते हैं. पौधे लगाने से 1 महीने पहले मईजून में गड्ढे खोद कर 20 से 25 दिनों तक उन्हें खुला छोड़ देना चाहिए, ताकि तेज धूप से कीटाणु खत्म हो जाएं. गड्ढे खोदते समय ऊपर की आधी उपजाऊ मिट्टी एक तरफ रख देनी चाहिए और आधी मिट्टी दूसरी तरफ डालनी चाहिए.

गड्ढों की भराई : खुदाई के 1 महीने बाद गड्ढों को गोबर की सड़ी हुई खाद 25 किलोग्राम, सुपर फास्फेट 250 ग्राम, क्यूनाल्फास 1.5 फीसदी 50 ग्राम, नीम की खली 2 किलोग्राम, क्षारीय जमीन हो तो 250 ग्राम जिप्सम और गड्ढे की मिट्टी डाल कर भर देना चाहिए. मिश्रण में खेत की ऊपरी मिट्टी को मिलाना चाहिए.

बरसात शुरू होने से पहले मिश्रण से गड्ढे को खेत की सतह से कुछ ऊंचाई तक दबा कर भर देना चाहिए व काफी मात्रा में पानी डाल देना चाहिए, ताकि गड्ढे की मिट्टी अच्छी तरह से बैठ जाए. पौधों की रोपाई जहां तक मुमकिन हो, 2 से 3 बार अच्छी बारिश होने के बाद ही करनी चाहिए.

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पौधों की रोपाई : सरकारी व अच्छी नर्सरी से खरीदे गए पौधों को तैयार गड्ढों में रोप देना चाहिए. रोपाई जुलाईअगस्त में शाम के समय करनी चाहिए. पौधे को रोपने से 2 घंटे पहले लिपटी हुई घास पिंड व पालिथीन थैली को थोड़े समय के लिए पानी में रख कर उस में भरी हवा को बाहर निकालें, जिस से पौधा लगाते समय पिंड की मिट्टी बिखरे नहीं.

पौधा लगाने से पहले लिपटी हुई घास व पालीथीन थैली को मिट्टी के पिंड से हलके से हटा देना चाहिए और जड़ों को पूरी तरह बचा कर रखना चाहिए.

पौधों पर लगी पैबंद वाली जगह व शाखा के जुड़ाव वाले बिंदु को जमीन के तल से 25 सेंटीमीटर ऊपर रखना चाहिए. जरूरत हो तो पौधे को सहारा दें, ताकि पौधा झुके नहीं.

पौधा लगाने के बाद सिंचाई करें व जरूरत के हिसाब से पानी देते रहें. पैबंद के नीचे से निकलने वाली शाखाओं व रोग लगी शाखाओं को हटाते रहें.

सिंचाई : शुरू के 2 महीने तक पौधों को पानी की ज्यादा जरूरत होती है. इस समय 2-3 दिनों के अंतर पर पानी देना चाहिए. 2 सिंचाइयों के बीच का समय जगह, मौसम, जमीन, फलों की किस्म, फलन का समय व वहां की जलवायु आदि पर निर्भर करता है.

* अगर बारिश के मौसम में बारिश होती रहे तो पानी देने की जरूरत नहीं होती.

* सर्दी के मौसम में 10 से 15 दिनों के अंतर पर सिंचाई करनी चाहिए.

* गरमी के मौसम में 7 से 10 दिनों के अंतर पर सिंचाई करनी चाहिए.

जल निकास जरूरत के मुताबिक हो, क्योंकि बाग को उस की जरूरत से कम पानी देने से पेड़ों की बढ़वार कम होती है, जबकि जरूरत से अधिक पानी देने से भी नुकसान होता है. पानी की अधिक मात्रा देने से जमीन पर पानी भर जाता है और पेड़ों के खाद्य पदार्थ जमीन की निचली सतह में चले जाते हैं. फलों में पानी की अधिक मात्रा होने के कारण मिठास कम हो जाती है और स्वाद खराब हो जाता है. इसलिए ज्यादा पानी को तुरंत खेत से निकाल देना चाहिए. उद्यान क्षेत्र का जलस्तर 2 से 3 मीटर नीचे रहना चाहिए.

Sunflower : सूरजमुखी से भरपूर आमदनी

सूरजमुखी (Sunflower) की खेती देश में पहली बार साल 1969 में उत्तराखंड के पंतनगर में की गई थी. यह एक ऐसी तिलहनी फसल है, जिस पर प्रकाश का कोई असर नहीं पड़ता. यानी यह फोटोइनसेंसिटिव है. हम इसे खरीफ, रबी और जायद तीनों मौसमों में उगा सकते हैं. इस के बीजों में 45-50 फीसदी तक तेल पाया जाता है. इस के तेल में एक खास तत्त्व लिनोलिइक अम्ल पाया जाता है. लिनोलिइक अम्ल शरीर में कोलेस्ट्राल को बढ़ने नहीं देता है. अपनी खूबियों की वजह से इस का तेल दिल के मरीजों के लिए दवा की तरह काम करता है.

प्रकाश का कोई असर न पड़ने की वजह से सूरजमुखी अचानक होने वाले मौसम के बदलावों को भी सह लेता है. इसीलिए सू्ररजमुखी की खेती किसानों को भरपूर आमदनी देती है. इसी वजह से देश के अलगअलग हिस्सों में इस की खेती का रकबा बढ़ता ही जा रहा है.

जमीन : इस की खेती अम्लीय और क्षारीय जमीनों को छोड़ कर हर तरह की जमीनों में की जा सकती है. वैसे ज्यादा पानी सोखने वाली भारी जमीन इस के लिए ज्यादा अच्छी होती है.

खेत की तैयारी : खेत में भरपूर नमी न होने पर पलेवा लगा कर जुताई करनी चाहिए. पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करने के बाद साधारण हल से 2-3 बार जुताई कर के खेत को भुरभुरा बना लेना चाहिए या रोटावेटर का इस्तेमाल करना चाहिए.

किस्में : सूरजमुखी की 2 तरह की किस्में होती हैं, एक कंपोजिट और दूसरी हाईब्रिड. कंपोजिट किस्मों में माडर्न व सूर्या खास हैं. हाईब्रिड किस्मों में केवीएसएच 1, एसएच 3222, एमएसएफएच 17 व वीएसएफ 1 वगैरह शामिल हैं.

बोआई का समय व विधि : जायद फसल की बोआई फरवरी के अंतिम हफ्ते से ले कर मध्य मार्च तक कर लेनी चाहिए, जबकि बसंतकालीन बोआई 15 जनवरी से 10 फरवरी तक कर लेनी चाहिए. लाइन से बोआई करना बेहतर होता है. बोआई हल के पीछे कूंड़ों में 4-5 सैंटीमीटर गहराई पर करें और लाइन से लाइन की दूरी 45 सेंटीमीटर व पौधे से पौधे की दूरी 15 सेंटीमीटर रखें.

Sunflower

बीजों की मात्रा : हाईब्रिड किस्म होने पर 5-6 किलोग्राम और कंपोजिट किस्म होने पर 12-15 किलोग्राम बीजों का प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए.

खाद व उर्वरक : खाद व उर्वरकों का इस्तेमाल मिट्टी की जांच कराने के बाद मिली शिफारिशों के आधार पर ही करना चाहिए. वैसे मोटे तौर पर 3-4 टन खूब सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर के हिसाब से देना लाभप्रद होता है.

कंपोजिट किस्म में 80 किलोग्राम नाइट्रोजन और हाईब्रिड किस्म में 100 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर की दर से देना चाहिए. कंपोजिट व हाईब्रिड दोनों किस्मों के लिए 60 किलोग्राम फास्फोरस और 40 किलोग्राम पोटाश देना जरूरी होता है. नाइट्रोजन की आधी मात्रा और फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा बोआई के वक्त कूंड़ों में देनी चाहिए.

नाइट्रोजन की बची हुई मात्रा बोआई के 25-30 दिनों बाद टाप ड्रेसिंग के रूप में देनी चाहिए. अगर आलू के बाद सूरजमुखी की बोआई की जा रही है, तो उर्वरकों की मात्रा 25 फीसदी घटा देनी चाहिए. तिलहनी फसलों की गुणवत्ता में सल्फर की खास भूमिका होती है, लिहाजा, 200 किलोग्राम जिप्सम प्रति हेक्टेयर की दर से देना लाभदायी रहेगा.

खरपतवार नियंत्रण : खरपतवार निकालने के लिए रासायनिक दवाओं का इस्तेमाल न कर के यांत्रिक विधि अपनाएं. अगर रासायनिक विधि ही अपनानी है, तो बोआई के 2-3 दिनों के अंदर पेंडीमेथलीन (50 फीसदी) दवा का इस्तेमाल करें.

सिंचाई : पहली सिंचाई बोआई के 20-25 दिनों बाद करना जरूरी होता है. भारी जमीन में 3-4 सिंचाई व हलकी जमीन में 4-5 सिंचाई करना ठीक होता है. फूल निकलते समय और दाना भरते समय खेत में नमी बनाए रखना बहुत ही जरूरी है. सिंचाई इस तरीके से करनी चाहिए कि पौधे गिरने न पाएं. स्प्रिंकलर विधि से सिंचाई करना बेहतर होगा.

खास कीड़े

दीमक : दीमक फसल को बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाती है. इस की रोकथाम बोआई से पहले ही कर लेनी चाहिए. इस के लिए खेत में पड़े फसल अवशेषों को खूब अच्छी तरह से सड़ा देना चाहिए. खूब अच्छी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद ही खेत में इस्तेमाल करनी चाहिए. दीमक की रोकथाम के लिए बिवेरिया बैसियाना या क्लोरपाइरीफास (20 ईसी) दवाओं का इस्तेमाल कृषि वैज्ञानिक से सलाह ले कर कर सकते हैं.

हरा फुदका : इस कीट के प्रौढ़ व बच्चे पत्तियों का रस चूसते हैं, जिस से पत्तियों पर धब्बे पड़ जाते हैं. इस की रोकथाम के लिए डाईमेथोएट 30 फीसदी ईसी दवा की 1 लीटर मात्रा का 600-800 लीटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए. दवा का छिड़काव हमेशा दोपहर के बाद करना चहिए.

डस्की बग : ये कीड़े पत्तियों व डंठलों से रस चूस कर हानि पहुंचाते रहते हैं. जिन दवाआें से हरा फुदका की रोकथाम होती है, उन्हीं से इस की रोकथाम भी की जा सकती है.

फली बेधक : ये कीट फूल में बन रहे बीजों को खा कर काफी नुकसान पहुंचाते हैं. रोकथाम के लिए कृषि वैज्ञानिक से पूछ कर दवा का छिड़काव शाम के समय करें.

Sunflowerकटाईमड़ाई: जब सूरजमुखी के बीज पक कर कड़े हो जाएं तो मुंडकों यानी फूलों की कटाई कर लेनी चाहिए. पके हुए मुंडकों का पिछला भाग पीलेभूरे रंग का हो जाता है. मुंडकों को काट कर छाया में सुखा लेना चाहिए, मगर ढेर बना कर नहीं रखना चाहिए. सूखने के बाद इस की मड़ाई सूरजमुखी वाले थ्रैशर या डंडे से पीट कर करनी चाहिए.

उपज और भंडारण : सूरजमुखी की सामान्य प्रजतियों की पैदावार 12-15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर व हाईब्रिड प्रजातियों की पैदावार 20-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हो जाती है. भंडारण के लिए इस के बीजों की नमी 8-10 फीसदी ही होनी चाहिए. 3 महीने के अंदर बीजों से तेल की पेराई कर लेनी चाहिए, वरना तेल में कड़वाहट आने लगती है.

कुछ अन्य ध्यान देने वाली बातें

*             बीज शोधन और बीज उपचार के बाद ही सूर्यमुखी के बीजों की खेत में बोआई करें.

*             सूरजमुखी का फूल काफी बड़ा और वजनदार होता है. लिहाजा, तेज हवा चलने पर पौधों के गिरने का खतरा रहता है. इस से बचने के लिए पहली सिंचाई करने के बाद पौधों पर 10-15 सेंटीमीटर मिट्टी जरूर चढ़ा देनी चाहिए.

*             15 दिनों के अंदर घने बोए गए पौधों को 15-20 सैंटीमीटर की दूरी पर कर देना चाहिए.

Home Garden : बागबानी से महकाएं घरद्वार

Home Garden | बागबानी का शौक हर किसी को होता है. यह शौक पूरा करने के लिए कुछ समय तो देना ही पड़ता है. हम अगर पूरे बाग को रंगबिरंगे फूलों से सजाएं, तो हमें पेड़पौधों और गमलों का ध्यान तो रखना ही पड़ेगा. ऐसा नहीं है कि सिर्फ 4-5 पौधे लगाए और पूरा बाग सज गया या सिर्फ गमले के बीच में पानी भर दिया तो हो गई बागबानी.

बाग लगाने के लिए उस की देखरेख भी जरूरी है. जरूरत पड़ने पर उस में खादों और कीटनाशकों का भी प्रयोग किया जाता है. किस तरह के बीज बोएं  कितनी धूप दिखाएं  कितना पानी और उर्वरक दें. बागबानी में इन सब बातों का ध्यान रखना पड़ता है.

बरसात के मौसम में जहां बालसम, गमफरीना, नवरंग व मुर्गकेश वगैरह के पौधे लगाए जा सकते हैं, तो वहीं सर्दी के मौसम में पैंजी, पिटुनिया, डहेलिया, गेंदा व गुलदाऊदी वगैरह के पौधे लगाए जा सकते हैं. इन के अलावा बारहमासी फूलों के पौधे जैसे गुड़हल, रात की रानी व बोगनवेलिया वगैरह भी लगाए जा सकते हैं. यह जरूरी नहीं है कि आप ढेरों पौधे लगाएं. आप उतने ही पौधे लगाएं, जिन की देखरेख आसानी से कर सकते हैं.

रंगबिरंगे फूल जो सितंबर से नवंबर तक खिलते हैं, वे कई तरह के होते हैं. उन में सेवंती और गेंदे के ढेर सारे विकल्प होते हैं. सितंबर से ले कर नवंबर के शुरुआती दिनों तक कभी भी इन्हें लगा सकते हैं.

यदि सिर्फ फूल वाले पौधे लगाना चाहते हैं, तो पिटूनिया, सालविया, स्वीट विलियम, स्वीट एलाइसम, चायना मोट, जीनिया, गुलमेहरी, गमफरीना, सूरजमुखी और डहेलिया जैसे पौधे चुन सकते हैं और यदि सजीले पौधों से बगीचे को सजाना है, तो कोलियस और इंबेशन लगाना बेहतर होगा.

कुछ पौधे जैसे मनीप्लांट, कैक्टस और ड्राइसीना इनडोर प्लांट हैं यानी हम ये पौधे छांव में, कमरे में या कहीं भी लगा सकते हैं. इन सब में मनीप्लांट आसानी से मिलने वाला, हमेशा हराभरा रहने वाला पौधा है. इस के हरे पत्तों पर हलके हरेसफेद धब्बे सुंदर लगते हैं.

ऐसा ही एक और इनडोर पौधा है कैक्ट्स. इस कांटेदार पौधे की भी देखभाल करनी पड़ती है. इसे लगाते समय मिट्टी में नीम की खली, गोबर की खाद और रेत बराबर मात्रा में मिलानी चाहिए. इसे काफी कम पानी देना पड़ता है. हर साल पौधे को निकाल कर उस की सड़ी जड़ें काट देनी चाहिए और फिर से गमले में लगा देना चाहिए. बहुत तेज धूप होने पर या तेज बरसात में पौधों को छाया में ही रखना बेहतर होता है. अपने समय में इन में फूल आते हैं, जिन की खूबसूरती देखते ही बनती है.

गेंदे के पौधे साल में 3 बार नवंबर, जनवरी और मईजून में लगा सकते हैं. इस तरह पूरे साल गेंदे के फूल मिल सकते हैं. यह कीड़ों से सुरक्षित रहता है. गेंदे की कई किस्में होती हैं, जैसे हजारा गेंदा, मेरी गोल्ड, बनारसी या जाफरानी.

यदि इस के फूलों को सुखा कर रख लें तो हम इस से अगली बार पौधे तैयार कर सकते हैं. असल में सूखा हुआ फूल बीज के लिए तैयार हो जाता है.

दूसरा फूल है गुड़हल का. इसे सितंबर से अक्तूबर में लगाना चाहिए. गुड़हल कई रंगों का होता है जैसे लाल, गहरा लाल, गुलाबी, बैगनी, नीला वगैरह. समयसमय पर इस में खाद डालते रहना चाहिए. इस की नियमित सिंचाई भी जरूरी है.

एक खूबसूरत सा पौधा है सूरजमुखी. इस के कई साइज होते हैं. बड़ा सूरजमुखी गोभी के फूल से भी बड़ा होता है. इस के बीजों से तेल भी निकाला जाता है. छोटा सूरजमुखी ढेर सारे पीले फूल देता है. इसे अप्रैल में लगाना चाहिए. यह घरों में बगीचे की शान बढ़ाता है.

एक और सुंदर दिखने वाला पौधा है जीनिया. यह 3 किस्मों में मिलता है. इस की छोटी किस्म पर्सियन कारपेट कहलाती है. इसे अगस्त या सितंबर में लगाना चाहिए ताकि इसे बरसाती कीड़ों से बचाया जा सके. इस के कागज जैसे रंगीन फूल पौधे पर कभी नहीं सूखते हैं.

एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण पौधा है तुलसी. यह तकरीबन हर घर में मिलता है. इस की 3 किस्में होती हैं रामा तुलसी, श्यामा तुलसी और बन तुलसी. इसे साल में कभी भी लगा सकते हैं. यह औषधीय गुणों का वाला पौधा है. यह वातावरण को शुद्ध रखता है. इस की पत्तियों को चबाने से अनगिनत बीमारियों से बचा जा सकता है.

एक और पौधा है डहेलिया. डहेलिया को क्यारियों और गमलों दोनों में उगाया जा सकता है. इसे उगाने के लिए पूरी तरह खुला स्थान चाहिए, जहां कम से कम 4 से 6 घंटे तक धूप आती हो.

पौधा लगाने की विधि

पौधा लगाने की सब से अच्छी विधि कटिंग द्वारा पौधा तैयार करना है. पुराने पौधों की शाखाओं के ऊपरी भाग से 8 सेंटीमीटर लंबी कटिंगें काट लें. उन को मोटी रेत या बदरपुर में 2 इंच की दूरी पर, डेढ़ इंच गहराई में लगाएं. लगाने के बाद 3 दिनों तक कटिंग लगाए गए गमलों को छायादार जगह पर रखें. उन से 15 दिनों के बाद जड़ें निकल आती हैं. इस के बाद ही इन्हें 10 से 12 इंच के गमलों में लगाते हैं. ये पौधे ज्यादा धूप या पानी से मुरझा जाएंगे, लिहाजा इस बात का खास ध्यान रखें.

यदि पौधों को गमलों में उगाना है, तो गमलों में 3 हिस्से मिट्टी व 1 भाग गोबर की खाद मिला कर भर दें. गमले का ऊपरी हिस्सा कम से कम 1 से डेढ़ इंच खाली रखें, जिस से पानी के लिए जगह मिल सके. 1 गमले में 1 ही पौधा रोपें. पौधे रोपने के तुरंत बाद पानी देना चाहिए. यदि पौधे क्यारी में लगाने हों, तो उन्हें 40-50 सेंटीमीटर की दूरी पर रोपें. क्यारी को 10-12 इंच गहरा खोद लें. इस के बाद 100 ग्राम सुपर फास्फेट, 100 ग्राम सल्फेट पोटेशियम, 25 ग्राम मैग्नेशियम सल्फेट प्रति वर्गमीटर क्षेत्र के हिसाब से दें. साथ ही फूलों में चमक लाने के लिए खड़ी फसल में 1 चम्मच मैग्नेशियम सल्फेट को 10 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करें.

क्यारियां कंकड़पत्थर रहित होनी चाहिए. क्यारियों की मिट्टी में 5 किलोग्राम प्रति वर्गमीटर के हिसाब से गोबर की खाद जरूर मिलानी चाहिए.

अगर आप डहेलिया को गमलों में उगाना चाहते हैं, तो गमले कम से कम 12 से 14 इंच के लें. मिट्टी व गोबर की खाद की बराबर मात्रा को गमलों में भर दें. गमले पूरी तरह मिट्टी से न भरें. उन का ऊपरी हिस्सा कम से कम 2 से ढाई इंच खाली होना चाहिए, जिस से गमलों में पानी के लिए जगह रहे.

गरमी पड़ने पर हफ्ते में 2 बार पानी देने की जरूरत होती है. सर्दी के मौसम में 8 से 10 दिनों के अंतर पर पौधों को पानी देना चाहिए.

फूलों की खुशबू (Fragrance of Flowers) से खिला किसान का भविष्य

मध्य प्रदेश के गांव करसरा के किसान रामसुजान कुशवाहा की कहानी संघर्ष, मेहनत और उम्मीदों की अनोखी मिसाल है. छोटे से गांव से बड़े सपने देखने वाले रामसुजान का जीवन संघर्षों और कठिनाइयों से भरा रहा, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी. खेती, परिवार और विपरीत हालात के बीच उन की जद्दोजेहद प्रेरणा देती है.

रामसुजान का गांव सतना जिला मुख्यालय से तकरीबन 28 किलोमीटर दूर सतना पन्ना स्टेट हाईवे पर बसा हुआ है. उन्होंने अपनी ससुराल से लिया गया कर्ज चुकाने के लिए उन्हीं की जमीन पर खेती कर के यह मुकाम पाया है.

शुरुआत का संघर्ष

रामसुजान कुशवाह का जीवन साधारण किसान परिवार में शुरू हुआ. उन के पिता  लल्लू कुशवाहा खुद संघर्षशील किसान थे. रामसुजान के पास अपनी जमीन नहीं थी, इसलिए उन्होंने 2 एकड़ जमीन ठेके पर ले कर खेती शुरू की. सालाना 12,000 रुपए ठेका भर कर उन्होंने आलू, प्याज और टमाटर की खेती की.

रामसुजान बताते हैं, ‘‘हमारे पास जमीन नहीं थी, लेकिन मेहनत करने का हौसला था. मैं ने सोचा कि खेती ही हमारा सहारा है, इसलिए आलू, टमाटर और प्याज की खेती शुरू की.’’ रामसुजान कुशवाहा ने साल 2018 में  पहली बार प्याज की खेती में हाथ आजमाया.

2 एकड़ में 15,000 रुपए लगा कर उन्होंने 100 क्विंटल प्याज का उत्पादन किया. यह उन का पहला बड़ा मुनाफा था, जिस में उन्होंने 50,000 रुपए कमाए. लेकिन अगले साल हालात बदल गए.

साल 2019 में प्याज की खेती में लागत बढ़ गई. बीज, कटाई, निदाई और खुदाई पर 30,000 रुपए खर्च हुए, लेकिन पैदावार घट गई. उन्हें 50 क्विंटल प्याज के उत्पादन से 20,000 रुपए का घाटा हुआ. यह पहली बार था, जब उन्होंने खेती में इतना बड़ा नुकसान देखा था.

दुर्घटना और माली परेशानी

साल 2020 रामसुजान कुशवाहा की जिंदगी का सब से कठिन वर्ष साबित हुआ. एक दिन जब वह प्याज ले कर सतना बाजार जा रहे थे, तो उन की गाड़ी करसरा के पास ट्रक से टकरा गई. इस दुर्घटना में उन की पसलियां टूट गईं और इलाज में एक लाख रुपए से ज्यादा का खर्च आया.

माली तंगी के इस दौर में उन के ससुर ने उन की मदद की, लेकिन जो पैसे दिए थे, वे कर्ज के रूप में दिए थे. इसे चुकाने के लिए ससुर की जमीन में ही रामसुजान ने खेती शुरू कर दी. ससुर भगवती प्रसाद का खेत सतना शहर से सटे महदेवा गांव में है. अब यह गांव सतना नगरनिगम का वार्ड नंबर 41 है.

रामसुजान बताते हैं, ‘‘एक पल को लगा कि सब खत्म हो गया. पैसे नहीं थे, लेकिन ससुरजी ने मदद (कर्ज)  की और परिवार ने भी सहायता की. ससुर ने जो पैसे दिए, उन्हें आज नहीं तो कल चुकाना ही था, सो काम कर के चुका रहे हैं. अब यह कर्ज हम चुका चुके हैं, पर और कोई काम नहीं है तो उन्हीं का खेत ठेके पर ले कर काम कर रहे हैं.’’

ससुर भगवती प्रसाद रेलवे में नौकरी करते थे. वे अब रिटायर हो चुके हैं. वे बताते हैं, ‘‘दामाद की बीमारी में कर्ज ले कर ही पैसा दिया था. रेलवे की जो नौकरी थी, उस से बहुत पहले ही रिटायर हो गया था, इसलिए अपनी गारंटी पर पैसा ले कर दिया था, उसे तो चुकाना ही था. तो खेत में काम कर के दामाद ने वे पैसे चुका दिए हैं. अब तो जो कमाई आ रही है, उसी की है. हम बस खेत का किराया, जो कि 12,000 रुपए प्रति सीजन है, ले लेते हैं.’’

फूलों की खेती से उम्मीद की किरण

साल 2022 में रामसुजान कुशवाहा ने फूलों की खेती में कदम रखा. उन्होंने आधा एकड़ में गेंदे, गुलाब और सेवंती के पौधे लगाए. फूलों ने उन की जिंदगी में नई रोशनी बिखेरी.

रामसुजान ने बताया, ‘‘गेंदे के फूल से हमें उम्मीद की नई किरण मिली. हर सीजन में 50,000 रुपए तक की कमाई होने लगी. गुलाब और सेवंती भी अच्छी आमदनी देने लगे.’’

फूलों की खुशबू (Fragrance of Flowers)

गेंदे के 100 पौधे हर रोज लगभग 150-200 रुपए की कमाई देने लगे. एक सीजन में 50,000 रुपए की आमदनी हुई. नवंबर और अप्रैल में बोआई करने के बाद गेंदे के फूल 4 महीनों में तैयार हो जाते हैं. गुलाब और सेवंती ने भी अच्छी आमदनी दी है. गुलाब के पौधों से प्रति किलोग्राम 100 रुपए और सेवंती से प्रति किलोग्राम 30 रुपए की कमाई होने लगी.

उद्यानिकी एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग के उद्यानिकी अधिकारी नरेंद्र सिंह ने सतना जिले का डाटा शेयर करते हुए बताया कि साल 2022-23 का फाइनल डाटा आया है, उस के आधार पर 1744 हेक्टेयर में फूलों की खेती होती है. इस में 14192.5 मीट्रिक टन फूलों का उत्पादन हुआ है. इस में 684 हेक्टेयर में अकेले गेंदा फूल की खेती दर्ज की गई है.

इस रकबे में 8130 मीट्रिक टन गेंदा फूल का उत्पादन हुआ है. इस के अलावा ग्लैडियोलस 23 हेक्टेयर में 281.5 मीट्रिक टन, गुलाब 238 हेक्टेयर में 2048 मीट्रिक टन, ट्यूब रोज 11 हेक्टेयर में 100 मीट्रिक टन और अन्य फूल 788 हेक्टेयर में 3633 मीट्रिक टन का उत्पादन हुआ है.

फूलों की खेती में पनपे सपने और उम्मीदें

आज रामसुजान और उन की पत्नी मुन्नी कुशवाहा अपनी मेहनत और दृढ़ता से आगे बढ़ रहे हैं. उन के परिवार की माली हालत धीरेधीरे सुधर रही है. गांव के 2 एकड़ खेतों और उन की मेहनत ने उन्हें अपने सपनों की ओर बढ़ने का साहस दिया है.

रामसुजान अपनी कमाई के बारे में कहते हैं, ‘‘अब फूलों की खेती से एक लाख रुपए तक आ जाते हैं. आलू और प्याज से 30 से 40 हजार रुपए और अन्य फसलों से भी 20-30 हजार रुपए मिल जाते हैं. कुलमिला कर हमारी सालाना आय 1.5 से 2 लाख रुपए तक पहुंच जाती है.’’

रामसुजान का मानना है कि जिंदगी में कितनी भी मुश्किलें आएं, उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए. उन की कहानी संघर्षशील किसानों के लिए प्रेरणा है, जो कम संसाधनों में बड़े सपने देखते हैं और उन्हें पूरा करने के लिए बड़ी शिद्दत से मेहनत करते हैं.

भावनात्मक पहलू

रामसुजान कुशवाहा की जिंदगी हमें यह सिखाती है कि असफलताएं जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन सच्चा योद्धा वही है, जो हर गिरावट के बाद फिर खड़ा हो जाए. उन की दुर्घटना, माली तंगी, और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच उन की मेहनत और हौसला काबिलेतारीफ है.

रामसुजान के खेत आज सिर्फ फसल ही नहीं, बल्कि उम्मीद और सपनों की फसल उगा रहे हैं. उन के फूलों की खुशबू उन की मेहनत और जज्बे की कहानी सुनाती है.

रामसुजान कहते हैं, ‘‘खेती में घाटा भी होता है और मुनाफा भी. सब से जरूरी है मेहनत और उम्मीद. मैं ने मुश्किल समय में भी अपने खेतों को नहीं छोड़ा और आज मेरे खेत हमारी उम्मीदों का सहारा बने हैं.’’

प्रदेश चौथे नंबर पर

रामसुजान की कहानी भारत में फूलों की खेती के बढ़ते महत्त्व को दर्शाती है. राष्ट्रीय बागबानी बोर्ड द्वारा प्रकाशित राष्ट्रीय बागबानी डाटाबेस के अनुसार, साल 2023-24 के दौरान भारत में पुष्पकृषि का क्षेत्र 285 हजार हेक्टेयर था, जिस में 2,284 हजार टन शिथिल फूलों  और 947 हजार टन कटे फूलों का उत्पादन हुआ.

मध्य प्रदेश में उद्यानिकी एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग के आंकड़ों के अनुसार, साल 2021-22 में 35,720 हेक्टेयर भूमि पर फूलों की खेती हुई, जिस से 4,12,730 मीट्रिक टन उत्पादन हुआ, वहीं साल 2023-24 में यह आंकड़ा 41,049 हेक्टेयर और 4,71,584 मीट्रिक टन तक पहुंच गया, जिस से 4 सालों में 58,854 मीट्रिक टन उत्पादन की वृद्धि दर्ज की गई.

मध्य प्रदेश अब फूलों के उत्पादन में तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक के बाद देश में चौथे स्थान पर है.

Guava Garden: पथरीली जमीन पर उगाया अमरूद का बगीचा

Guava Garden| मध्य प्रदेश के सतना जिले से तकरीबन 40 किलोमीटर दूर उत्तरपूर्व में बसे खुटहा गांव के किसान कृष्ण किशोर त्रिपाठी ने अपनी दूरदृष्टि, मेहनत और मजबूत इरादे से आज वह कर दिखाया है, जो कई किसानों के लिए प्रेरणा बन गया है. पथरीली जमीन पर खेती करना हमेशा से चुनौती भरा होता है, लेकिन आज कृष्ण किशोर ने इस जमीन को उपजाऊ बना दिया है. उन्होंने 30 साल से बंजर पड़ी इस जमीन पर अमरूद का बगीचा (Guava Garden) लगाया है और अब वे हर साल लाखों रुपए की आमदनी कर रहे हैं.

पहली बार लगाए 75,000

कृष्ण किशोर त्रिपाठी ने साल 2022 में अपने एक एकड़ खेत में अमरूद के 400 पौधे लगाए थे. इस के लिए उन्होंने रतलाम से सुनहरा (गोल्डन) अमरूद की किस्म के पौधे 85 रुपए प्रति पौध की दर से खरीदे थे. पौधों को लगाने के लिए गड्ढे खोदने, खाद डालने और मजदूरी का खर्च मिला कर प्रति पौधा 150 रुपए का खर्च आया था. इस के अलावा ड्रिप इरिगेशन (टपक सिंचाई) प्रणाली लगाने पर तकरीबन 12,000 रुपए का खर्च आया. इस प्रकार पहले साल उन्हें कुल 75,000 रुपए खर्च करने पड़े थे. उन के बगीचे में अब 3 फुट ऊंचे पेड़ों पर

12 किलोग्राम तक के फल लग चुके हैं.

किसान कृष्ण किशोर झुके हुए अमरूद के पेड़ को संभालते हुए बताते हैं कि जमीन तो पथरीली थी, लेकिन मैं ने ठान लिया था कि इसे उपजाऊ बनाना है. अमरूद के पौधे लगाते वक्त हर पौधे के लिए गड्ढे खोदने, खाद डालने और पानी की व्यवस्था में काफी मेहनत लगी. ड्रिप इरिगेशन सिस्टम लगा कर पानी की समस्या को भी हल किया. पहले साल में 75,000 रुपए का खर्च हुआ, लेकिन यह मेरी मेहनत का आधार था. अब हर पेड़ पर 12 किलोग्राम के फल आ रहे हैं, जो मेरी उम्मीद से भी ज्यादा हैं.

1.44 लाख रुपए की कमाई

कृष्ण किशोर त्रिपाठी ने इस समय 400 अमरूद के पेड़ों से प्रति पेड़ 12 किलोग्राम फल निकाले हैं. कुलमिला कर 4.8 टन फल का उत्पादन हुआ, जो थोक बाजार में 30 रुपए प्रति किलोग्राम के भाव से 1.44 लाख रुपए में बिका. आने वाले 2 सालों में जब पेड़ 5 फुट से अधिक ऊंचे हो जाएंगे, तब प्रति पेड़

20 किलोग्राम फल मिलने की उम्मीद है. ऐसे में कुल उत्पादन 8 टन होगा और तकरीबन 2.4 लाख रुपए की कमाई होगी.

कृष्ण किशोर ने कहा कि अमरूद की खेती ने हमें एक नई दिशा दी है. पहली फसल में ही 1.44 लाख रुपए की कमाई ने हमारी मेहनत पर भरोसा बढ़ाया है. आने वाले 2 सालों में उत्पादन और आय दोनों में बढ़ोतरी की उम्मीद है. इस से हमें कृषि के क्षेत्र में और भी नए प्रयोग करने की प्रेरणा मिल रही है.

सतना जिले के अमरूद उत्पादन का डाटा शेयर करते हुए उद्यानिकी एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग के उद्यानिकी अधिकारी नरेंद्र सिंह बताते हैं कि साल 2022-23 के अंतिम अनुमान में 971 हेक्टेयर में 11,364 मीट्रिक टन अमरूद का उत्पादन दर्ज किया गया है, जबकि मध्य प्रदेश राज्य देश में अमरूद उत्पादन के मामले में दूसरे स्थान पर है. पहले स्थान पर उत्तर प्रदेश है. राष्ट्रीय उद्यानिकी बोर्ड द्वारा जारी 2021-22 के पहले अतिरिक्त अनुमान के मुताबिक मध्य प्रदेश में 776.75 लाख मीट्रिक टन का उत्पादन हुआ.

मेहनत से हासिल की सफलता

खुटहा गांव के किसान कृष्ण किशोर त्रिपाठी की जमीन के नीचे केवल 2 फुट खेती लायक ही मिट्टी थी. इस के नीचे पत्थर ही पत्थर थे. इस जमीन पर खेती करना लगभग नामुमकिन था. किसान कृष्ण किशोर के परदादा ने तकरीबन 50 साल पहले इस जमीन को उपयोगी बनाने के लिए 3 फुट मिट्टी डलवाई थी, जिस में कोदोकुटकी जैसी मोटे अनाज की फसलें उगाई जाती थीं, लेकिन बाद में यह जमीन बंजर हो गई.

इस के बाद कृष्ण किशोर ने 30 साल बाद इस जमीन को फिर से खेती लायक बनाने का फैसला किया. वे बताते हैं कि जमीन पर पड़ी मिट्टी को उन्होंने दोबारा उपयोगी बनाया. अब इस में अमरूद का बगीचा लगा कर वे हर साल लाखों रुपए की आमदनी ले रहे हैं.

कृष्ण किशोर त्रिपाठी ने बताया कि यह विचार उन के मन में तब आया था, जब उन की बेटी की तबीयत खराब थी और वे फल खरीदने बाजार गए थे. उस समय सेब का दाम 280 रुपए प्रति किलोग्राम था. उन्होंने तभी तय किया कि वे फलों की खेती करेंगे.

जल संकट से निबटने के लिए ड्रिप योजना खुटहा गांव में पानी की कमी हमेशा से एक बड़ी समस्या रही है. किसान कृष्ण किशोर त्रिपाठी को भी इस का सामना करना पड़ा. उन्होंने 3 बार बोरिंग कराई. पहले 2 बार वे असफल रहे, लेकिन तीसरी बार 150 फुट की गहराई पर पानी मिला. इस के बाद उन्होंने इसे 300 फुट गहराई तक कराया. बोरिंग पर कुल 2.4 लाख रुपए का खर्च आया.

पानी की कमी के कारण किसान कृष्ण किशोर ने टपक सिंचाई प्रणाली का सहारा लिया. यह विधि पानी की बचत में सहायक है और इस से पेड़ों को जरूरत के अनुसार पानी मिलता है. वे बताते हैं कि पानी की कमी हमारे इलाके की सचाई है, लेकिन तकनीक और मेहनत से इस का समाधान संभव है.

सागौन और सेब के पौधे भी लगाए

किसान कृष्ण किशोर ने 2,000 सागौन के पौधे लगाए, जो अब बड़े हो चुके हैं. इस के अलावा उन्होंने सेब के पौधे भी लगाए हैं. सेब के पौधों पर फिलहाल फूल नहीं आए हैं, लेकिन अगले 2 सालों में फल मिलने की संभावना है.

वे बताते हैं कि सागौन के पौधे बड़े हो गए हैं. खेती से जुड़ कर मन को शांति मिलती है.

भरपूर लें उपज तरबूजेखरबूजे (Watermelon and Melon) की खेती से

भारत में कद्दूवर्गीय सब्जीफलों में तरबूज और खरबूजे का खास स्थान है. ये दोनों ही संतुलित भोजन माने जाते हैं. पाचनशक्ति ठीक होने के साथ ही ये पोषक तत्त्वों से भी भरपूर होते हैं. इन का इस्तेमाल पके फल के रूप में ज्यादा किया जाता है. तरबूज खा कर गरमी से राहत मिलती है, वहीं यकृत और आंत के रोगों में आराम मिलता है. खरबूजा भी कब्ज के रोगियों के लिए बहुत फायदेमंद फल है.

तरबूज और खरबूजे का इस्तेमाल गरमी में बहुतायत किया जाता है. दूसरे फलों की तुलना में ये सस्ते होते हैं. इसे हर तबके के लोग आसानी से इस्तेमाल कर सकते हैं. इन को दूसरे कद्दूवर्गीय सब्जीफलों की अपेक्षा बाजार भाव ज्यादा मिलता है, इसलिए ज्यादा उपज लेने के लिए नई प्रजातियों और वैज्ञानिक विधि से खेती की जानकारी का होना बहुत जरूरी है. इस से कम लागत में ज्यादा उपज ली जा सके.

जमीन की तैयारी

दूसरी कद्दूवर्गीय फसलों के साथ इन की खेती समतल खेतों में भी अच्छी तरह से उगाई जा सकती है. बलुई दोमट मिट्टी बढि़या मानी जाती है. इस में जीवांश की मात्रा काफी हों, खेत की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें और 2-3 जुताई कल्टीवेटर से करें. हर जुताई के बाद पाटा चला कर जमीन को इकसार और मिट्टी को बारीक कर लेते हैं.

उन्नतशील प्रजातियां

उत्पादन के लिहाज से तरबूज और खरबूजा की लोकल किस्मों के अलावा बहुत सी उन्नतशील प्रजातियां ईजाद की गई हैं. ये किस्में मिठास के साथसाथ दूर तक भेजने में भी खराब नहीं होती हैं.

तरबूज की सामान्य किस्में

सुगर बेबी : इस किस्म का फल मध्यम आकार का होता है और वजन औसतन 3 से 4 किलोग्राम का होता है. फल का रंग हरा, गूदा लाल और काफी मीठा होता है. इस की भंडारण कूवत दूसरी किस्मों की तुलना में ज्यादा होती है.

अर्का ज्योति : इस किस्म के फलों का वजन 6 से 8 किलोग्राम होता है. गूदा चमकीला और लाल रंग का होता है. खाने योग्य गूदा दूसरी किस्मों की तुलना में ज्यादा होता है औैर इस की भंडारण कूवत दूसरी किस्मों की तुलना में ज्यादा होती है.

तरबूज की संकर किस्में

राज रस : यह किस्म सनग्रो सीड्स कंपनी द्वारा ईजाद की गई है. इस के फलों में शर्करा की मात्रा ज्यादा होती है. यह फसल 80 से 85 दिन में पक कर तैयार हो जाती है. फलों का आकार गोल, लाल रंग का गूदा और फलों के ऊपर हरे रंग की पट्टी होती है.

पीएस एस 742: इस किस्म के बीज शीतल सीड्स कंपनी द्वारा तैयार किए गए हैं. इस के फल गोल, जिन का रंग हलका हरा होता है. यह किस्म बोने के 85 से 90 दिन में पक कर तैयार हो जाती है.

तरबूजेखरबूजे (Watermelon and Melon)

खरबूजा की सामान्य किस्में

पूसा शरबती : यह अगेती किस्म की फसल है. इस के फल गोल और हरी धारी होती है. इस का गूदा मोटा संतरी रंग का और कम रसदार होता है. इस के फलों को कई दिनों तक रखा जा सकता है. इस में मिठास तकरीबन 8 से 10 फीसदी होती है.

पंजाब सुनहरी : इस किस्म के फलों का औसत वजन 700 से 800 ग्राम और फलों में मिठास 10 से 12 फीसदी होती है. इस का गूदा संतरी रंग का, मध्यम रसदार और खुशबूदार होता है.

हरा मधु : यह देर से तैयार होने वाली किस्म है. इस के फलों का आकार गोले और वजन 1 किलोग्राम होता है. इस में शर्करा की मात्रा 14 से 15 फीसदी होती है जो दूसरी किस्मों की तुलना में काफी ज्यादा है. मोटा गूदा हरा और रसीला होता है और इस के छिलके का रंग हलका पीला और हरी धारियां होती हैं.

खरबूजा की संकर किस्में

पताशा : बीजो शीतल सीड्स कंपनी ने इस किस्म को ईजाद किया है. फलों का वजन तकरीबन 1 से डेढ़ किलोग्राम होता है. इस के फलों में अच्छी खुशबू, गोल और शर्करा की मात्रा ज्यादा होती है.

खाद और उर्वरक

तरबूज और खरबूजा की फसल में अच्छी उपज हासिल करने के लिए जहां तक संभव हो, मिट्टी की जांच करा कर ही संतुलित मात्रा में खाद का इस्तेमाल करना चाहिए.

वैसे तो तरबूज और खरबूजा में 150 से 250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर गोबर की सड़ी खाद की जरूरत होती है.

खेत की तैयारी के समय ही मिट्टी में गोबर की सही खाद मिला देनी चाहिए. फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन की आधी मात्रा बोआई के पहले मिट्टी में मिला देनी चाहिए और नाइट्रोजन की बाकी बची मात्रा बोआई के एक महीने के बाद फूल आने के पहले इस्तेमाल करनी चाहिए. तरबूज और खरबूजा की फसल में फलों की मिठास और खास पोषक तत्त्व पोटाश की संतुलित मात्रा पर निर्भर करता है.

बोआई की विधि

दोनों फसलों की बोआई एक ही तरह से की जाती है. इस के लिए 3 मीटर की दूरी पर 40-50 सैंटीमीटर की चौड़ी नाली बनाते हैं और नाली के दोनों किनारों पर 60 सैंटीमीटर चौड़े गड्ढे बनाते हैं.

नाली के दोनों किनारों पर 60 सैंटीमीटर की दूरी पर 2 से 3 बीजों की बोआई करते हैं. बीजों को 2-3 सैंटीमीटर की गहराई पर बोते हैं और जमाव हो जाने पर 1 या 2 स्वस्थ पौध ही रखते हैं.

अच्छे जमाव के लिए बीजों को बोआई के पहले पानी में कुछ समय तक भिगो कर रखना चाहिए.

सिंचाई का तरीका

बोआई के समय यदि खेत में मुनासिब नमी की कमी हो तो बोआई के बाद पहली सिंचाई तुरंत कर देनी चाहिए. दूसरी और तीसरी सिंचाई 4-5 दिन के फासले पर करनी चाहिए ताकि खेत में मुनासिब नमी बनी रहे.

सिंचाई करते समय पानी नाली के ऊपर न जाए. उतना ही पानी नाली में रखना चाहिए जितना बोआई की जगह तक नमी पहुंच जाए. दूसरी सिंचाई समयसमय पर करते रहना चाहिए.

पकने की अवस्था पर सिंचाई कम कर देनी चाहिए, नहीं तो अधिक पानी देने पर फल फट जाते हैं और फलों की क्वालिटी पर बुरा असर पड़ता है. बाजार में भाव भी उस का कम मिलता है.

पादप हार्मोंस का इस्तेमाल

पौधों की शुरुआती अवस्था में जब 2-4 पत्तियां निकल आएं, तब इथराल नामक हार्मोन 200 से 250 पीपीएम की मात्रा का छिड़काव करने पर मादा फूलों की तादाद में इजाफा होता है.

आमतौर से गरमी में ज्यादा तापमान होने पर यह समस्या आती है. नर फल संख्या में ज्यादा और मादा फूलों की संख्या कम आती है. इस के उपचार के लिए मुनासिब हार्मोन का इस्तेमाल करना चाहिए जिस से उपज में काफी इजाफा होगा.

कटाई और छंटाई

तरबूज और खरबूजा की फसल में कटाईछंटाई एक जरूरी प्रक्रिया है. तरबूज मुख्य शाखाओं को 3-4 गांठ के बाद काट देना चाहिए. इस में निकलने वाली दूसरी शाखाओं पर फूल आते हैं और एक शाखा पर एक जैसे फल ही लेना चाहिए.

इस तरह एक पौध पर केवल 3 से 4 फल लेना और खरबूजा की मुख्य शाखाओं पर निकलने वाली 3 से 5 गांठ तक की सभी दूसरी शाखाओं को काट देना चाहिए और एक पौध से 4 फल ही लेना चाहिए.

कटाईछंटाई से होने वाले लाभ

* पौधों की बढ़वार अच्छी होती है.

* फलों की क्वालिटी प्रभावित नहीं होती है. फलों का बाजार भाव ज्यादा मिलता है.

कीट और रोग नियंत्रण

तरबूजेखरबूजे (Watermelon and Melon)

कीट नियंत्रण : तरबूज और तरबूजा में कई तरह के कीट फसल को नुकसान पहुंचाते हैं. जैसे कद्दू का लाल कीड़ा.

इस कीट की प्रौढ़ और ग्रव दोनों ही फसल को नुकसान पहुंचाती हैं. प्रौढ़ कीट फरवरी माह के आखिर तक सूखी पत्तियों और जमीन की दरारों में निष्क्रिय अवस्था में रहती हैं.

मार्च माह के शुरू में ये सक्रिय हो कर पौधों की मुलायम पत्तियों, फूलों की कलियों और कोमल तनों को खा कर जगहजगह छेद बना देती हैं.

ग्रव कीट जमीन के अंदर जड़ और तनों में छेद बना कर उन को खाते हैं. ये जमीन के संपर्क में आने वाले फलों में घुस कर छेद बना देते हैं. इस कीट का प्रकोप मार्च से अप्रैल माह तक ज्यादा होता है.

नियंत्रण

* सुबह ओस पड़ने पर राख का बुरकाव करने से प्रौढ़ कीट पौधों पर नहीं बैठता है, जिस से नुकसान कम होता है.

* जैविक विधि से नियंत्रण के लिए अजादीरैक्टिन 300 पीपीएम 5 से 10 मिलीलिटर या अजादीरैक्टिन 5 फीसदी 0.5 मिलीलिटर की दर से 2-3 छिड़काव करने से फायदा होता है.

इस कीट का ज्यादा हमला होने पर कीटनाशी जैसे डाईक्लोरोवास 76 ईसी 1.25 मिलीलिटर या ट्राइक्लोफेरान 50 ईसी 1 मिलीलिटर या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एमएल 0.5 मिलीलिटर की दर से 10 दिनों के फासले पर पत्ती पर छिड़काव करें.

फलमक्खी : यह कीट कोमल फलों के छिलके के नीचे अंडे देती है. अंडे 1 से 9 दिन में फूटते हैं. अंडे से बहुत छोटा मैगेट निकलता है जो गूदे में छेद कर फल को अंदर से खाता है. दोहरे बैक्टीरियल संक्रमण के कारण फल सड़ जाता है. मिट्टी में जा कर मैगेट प्यूपा बन जाता है.

नियंत्रण

* 0.3 फीसदी डाइजेनान या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल 1.0 लिटर मात्रा को 1000 से 1200 लिटर पानी में मिला कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.

* मैलाथियान 50 ईसी की 50 मिलीलिटर मात्रा को 50 लिटर पानी में मिला कर इस में 0.5 किलोग्राम गुड़ मिला दें. इस घोल का पौधे पर छिड़काव करने से कीट खिंचे चले आते हैं और घोल को चूस कर मर जाते हैं.

* क्यूल्योर और मैलाथियान 50 ईसी 1:1 के अनुपात में 10 मिलीलिटर का घोल बना कर किसी बरतन में 25 हेक्टेयर की दर से जहर खाद्य के रूप में इस्तेमाल करते हैं.

* क्यूल्योर, एल्कोहल, कीटनाशक मैलाथियान 50 ईसी का मिश्रण 6:4:1 के अनुपात में बनाते हैं. लकड़ी के गुटके 2×2×1 सैंटीमीटर को इस मिश्रण में 24 घंटे डुबोने के बाद खेत में 25 हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करते हैं.

* सड़ा हुआ केला एक किलोग्राम, कार्बोफ्यूरान 5 ग्राम, खमीर 5 ग्राम, साइट्रिक एसिड 5 ग्राम को किसी पात्र में रख कर इस्तेमाल करते हैं.

चूर्णिल आसिता

इस रोग का हमला खासतौर से सूखे मौसम में ज्यादा होता है. शुरुआती लक्षणों में तने, पत्तियों और दूसरे हिस्सों पर सफेद आटे जैसी परत दिखाई देती है. ज्यादा प्रकोप की दशा में पत्तियां पीली हो कर गिर जाती हैं और फलों का आकार छोटा रह जाता है.

नियंत्रण

* रोग लगे पौधों को खेत से निकाल कर जला दें.

* इस पर नियंत्रण के लिए केराथेन या सल्फर नामक दवा 1 से 2 ग्राम दवा प्रति लिटर पानी का छिड़काव करना चाहिए.

मृदुरोमिल आसिता

उत्तरी भारत में इस रोग का प्रकोप ज्यादा होता है. आमतौर पर यह रोग बारिश के बाद तापमान बढ़ने पर तेजी से फैलता है.

शुरुआती लक्षणों में पत्तियों की सतह पर पीले कोणीय धब्बे दिखाई देते हैं. ज्यादा नमी होने पर पत्तियों की निचली सतह पर इस कवक की ज्यादा बढ़वार दिखाई देती है.

नियंत्रण

* रोगी पत्तियों को निकाल कर जला दें.

* मैंकोजेब 2.5 लिटर पानी में मिला कर छिड़काव करें.

फलों की तुड़ाई

तरबूज और खरबूजा के पकने के बाद तुड़ाई की जाती है. फलों की सही समय पर तुड़ाई करना बहुत जरूरी होता है, क्योंकि उसी समय फल का रंग मनमोहक व खुशबूदार बना रहता है.

तरबूज के पक जाने पर को हाथ की उंगली से थपथपाने पर धपधप की आवाज निकलती है. फल का जो भाग जमीन के संपर्क में रहता है, उतना भाग पीला पड़ जाता है.

वैसे, इस के पकने की खास पहचान यह है कि जिस गांठ से फल निकलता है, उस पर लगा ट्रेडिल डंठल यदि सूख जाए तो समझना चाहिए कि फल पूरी तरह से पक गया है.

विपणन

तरबूज और खरबूजा का फल ताजा अवस्था में बाजार में पहुंचाने पर ही फसल की वाजिब कीमत मिलती है. इन फलों को बाजार तक पहुंचाने के लिए तरबूज को बोरे में और खरबूजा को टोकरी में भर कर लंबी दूरी तक भेजा जा सकता है.

लेकिन ध्यान रखना चाहिए कि बहुत दूर के बाजार में बेचने वाले फलों को पूरी तरह पकने से पहले तोड़ लेना चाहिए, जिस से फलों को 2-3 दिन तक महफूज रखा जा सके.

उपज

फलों की उपज उस की किस्मों पर निर्भर है. तरबूज की सामान्य प्रजातियों की 250 से 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और संकर प्रजातियों से 300 से 350 क्विंटल प्रति हेक्टेयर औसतन उपज मिल जाती है, वहीं खरबूजा की सामान्य प्रजातियों से 180 से 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और संकर किस्मों से 250 से 300 क्विंटल औसतन उपज मिल जाती है.

आम (Mango) के रोग और उपचार

आम का नाम सुनते ही मुंह में पानी आ जाता है और दिल को सुकून मिलता है. हमारे दिमाग में एक ऐसे फल की तसवीर उभरती है जिसे सोच कर ही खुशी से झूमने लगता है. आम ऐसी फसल है जिसे हर कोई खाना पसंद करता है.

भारत में आम फलों का राजा है. इस की पैदावार तकरीबन पूरे भारत में होती है, लेकिन खासतौर से उत्तर प्रदेश आम के लिए जाना जाता है. यहां पर मलीहाबाद के आमों की मिठास विदेशों में भी लोगों को अपना मुरीद बना चुकी है.

पाकिस्तान, बंगलादेश, अमेरिका, फिलीपींस, संयुक्त अरब अमीरात, दक्षिण अफ्रीका, जांबिया, माले, ब्राजील, पेरू, केन्या, जमायका, थाईलैंड, इंडोनेशिया, श्रीलंका वगैरह देशों में भी आम उगाया जाता है.

भारत में आम के बाग सब से ज्यादा उत्तर प्रदेश में हैं, लेकिन इस की सब से ज्यादा पैदावार आंध्र प्रदेश में होती है. आम की बागबानी के लिए गरम आबोहवा बेहतर है.

आम के लिए 24 से 26 डिगरी सैल्सियस तापमान वाला इलाका सब से अच्छा माना गया है. यह नम व सूखी दोनों तरह की जलवायु में उगता है. लेकिन जिन इलाकों में जून से सितंबर माह तक अच्छी बारिश होती है और बाकी महीने सूखे रहते हैं, वहां आम की पैदावार ज्यादा होती है.

आम के पेड़ों को रोगों से बचाना बहुत जरूरी है. समयसमय पर आम में लगने वाली खास बीमारियों पर नजर रख कर ही रोगों से बचाया जा सकता है.

काली फफूंद रोग

आम के पुराने और घने गहरे बगीचों में आम के फूलों और मुलायम पत्तियों से रस चूसने वाले कीट जैसे भुनगा, फुदका, मधुआ और कढ़ी कीट का प्रकोप चैत्र माह से ही शुरू हो जाता है. ये कीट छोटीछोटी नई मुलायम पत्तियों और फूलों से रस चूसते रहते हैं. इस वजह से आम की पत्तियों और फूलों के ऊपर एक चिपचिपाहट सी बनने लगती है और फल झड़ने लगते हैं.

यह रोग भुनगा कीट की वजह से होता है. फफूंद के जरीए भी यह रोग तेजी से फैलती है. कुछ समय बाद आम के बगीचों में पेड़ों की पत्तियों पर काले रंग की एक परत बन जाती है, जो सीधा पत्तियों से भोजन बनाने की प्रक्रिया को प्रभावित करती है.

उपचार

काली फफूंदी के नियंत्रण के लिए नीम की पत्तियों को उबालें. इस के बाद 10-12 लिटर उबले हुए पानी को 100 लिटर पानी में मिला कर पेड़ों पर 2-3 बार अच्छी तरह से स्प्रेयर पंप की मदद से छिड़काव करना चाहिए.

आम का भुनगा, फुदका और कढ़ी कीट पर 300 से 400 मिलीलिटर नीम के तेल को 100 लिटर पानी में घोल कर फूल खिलने से पहले या फिर मटर के दाने के बराबर फल बनने के बाद 2-3 छिड़काव करने से इन कीटों पर काबू पाया जा सकता है.

इस के अलावा ब्यूबेरिया बेसियाना की 200 ग्राम मात्रा को 100 लिटर पानी में घोल कर 2-3 बार छिड़काव करने या 15-20 दिन पुरानी सड़ी हुई छाछ या मट्ठा 10 लिटर व 8 से 10 दिन पुराने 10 लिटर गौमूत्र को 100 लिटर पानी में मिला कर पूरे पौधे पर 2-3 छिड़काव करने से कीट पर नियंत्रण पाया जा सकता है.

चूर्णिल आसिता रोग

आम का यह रोग फफूंद की वजह से फैलता है. इस रोग का हमला होने आम की पत्तियों पर सफेद चूर्ण जैसे धब्बे बन जाते हैं. कभीकभी फूलों की टहनियों और छोटेछोटे फलों पर भी ये धब्बे हवा के रुख के साथ फैल जाते हैं. इस वजह से फल पकने से पहले ही पेड़ से पत्ते गिर जाते हैं.

इस रोग की रोकथाम के लिए 100 लिटर पानी में मिलाएं 10 दिन पुरानी सड़ी हुई छाछ या मट्ठा 10 लिटर या 10 लिटर गौमूत्र 10-12 दिन के अंतराल पर 2 छिड़काव करने से रोग इस पर नियंत्रण पाया जा सकता है.

सूखा रोग

आम के पेड़ों में लगने वाला सूखा रोग यानी तनाछेदक कीट हरियाली का दुश्मन है. इस रोग के प्रकोप से आम का हराभरा पेड़ कुछ ही महीनों में सूख कर ढांचे में तबदील हो जाता है.

तनाछेदक कीट पौधे के तने में छेद कर आसानी से अंदर घुस जाता है. पेड़ के तने को सावधानी से देखने पर किसानों को कीड़ों के होने की प्रारंभिक दशा में छाल पर चूर्ण जैसा पदार्थ देखने को मिलता है. तना गीला हो जाता है. कीट के बड़े हो जाने पर तने में सुराख साफसाफ दिखाई देने लगता है.

उपचार न होने की दशा में कीट तने को खोखला कर देते हैं. इस से पेड़ सूखने लगता है. इस में पत्तियां ऊपर से सूखना शुरू होती हैं, जो नीचे की ओर बढ़ती जाती हैं.

ऐसे करें रोकथाम

तनाबेधक या तनाछेदक कीट साल में सिर्फ 2 महीने मई व जून माह में बाहर रहता है. नियंत्रण के लिए क्विनालफास व साइपरमैथलीन दवा का स्प्रे करें.

रोकथाम के लिए बाद में तने को छील कर सुराख में साइकिल की तीली डाल कर बड़े कीटों को मारा जा सकता है.

अंडे बच्चों को नष्ट करने के लिए मोनोक्रोटोफास के घोल को रुई में भिगो कर सुराख में डाल दें व ऊपर से गाय के गोबर में मिट्टी मिला कर लेप लगा दें.

देशी उपचार में 2 किलोग्राम तंबाकू व ढाई सौ ग्राम फ्यूरोडान प्रति पेड़ की जड़ में डालने से भी रोकथाम हो सकती है.

बौर का रोग

आम के बौरों, फलों या पत्तियों पर सफेद चूर्ण की तरह का पदार्थ दिखाई देता है. ऐसा लगता है कि पेड़ों पर राख छिड़क दी गई है. प्रकोप होने से उन की बढ़वार रुक जाती है और फूल गिरने लगते हैं.

बौर के समय फुहार और ठंडी रातें इस रोग के बढ़ने में मददगार होती हैं. कवक से नए फल बिलकुल ढक जाते हैं और धीरेधीरे उस की बाहरी सतह पर दरारें पड़ने लगती हैं. दरार वाला वह भाग कड़ा हो जाता है. नए फल मटर के दाने के बराबर होने के पहले ही गिर जाते हैं.

नई पत्तियों की पिछली सतह पर यह रोग काफी फैलता है और स्लेटी रंग के धब्बे बनने लगते हैं, जिस पर सफेद चूर्ण दिखाई पड़ता है और रोगग्रस्त पत्तियां टेढ़ी हो जाती हैं. ऐसी पत्तियां पूरे साल पौधों पर लगी रहती हैं और अगले साल भी रोगों को फैलाने में सहायक होती हैं.

उपचार से करें बचाव

इस रोग से बचाव के लिए फूल के मौसम में कुल 3 छिड़काव करने चाहिए. पहला छिड़काव 0.2 फीसदी विलयशील गंधक (वेटेबल सल्फर) (सल्फेट या दूसरा विलयशील गंधक फफूंदनाशक 2 ग्राम प्रति लिटर), दूसरा छिड़काव 0.1 फीसदी ट्राइडीमार्फ या 0.04 फीसदी फ्लूजिजाल (1 मिलीलिटर कैलिक्सीन या 0.4 मिलीलिटर पंच प्रति लिटर) और तीसरा छिड़काव 0.1 फीसदी डाइनोकैप या बावस्टीन (1 मिलीलिटर 5 प्रति केराथेन या 1 ग्राम ट्राइडीमेफान प्रति लिटर) से करना चाहिए.

पहला छिड़काव बौर निकलने के दौरान करना चाहिए. दूसरा और तीसरा छिड़काव 10-15 दिन के अंतराल पर करना चाहिए.

आम (Mango)

पत्तियों पर एंथ्रेक्नोज रोग

तुड़ाई के बाद आम का यह सब से खास रोग है. यह एक फफूंद कोलेटोट्राइकम ग्लोयोस्पोराइडिस से होती है. इस का प्रकोप हर आम उगाने वाली जगहों पर होता है. फलों पर इन के लक्षण शुरू में छोटेछोटे भूरे रंग के धब्बों के रूप में दिखाई देते  हैं, जो बाद में बढ़ कर पूरे फल को ढक लेते हैं. ये धब्बे 3-4 दिन में ही पूरे फल को ढक लेते हैं और पूरा फल काला हो कर सड़ जाता है.

रोकथाम

कार्बंडाजिम या टापसिन-एम (0.1 फीसदी यानी 1 ग्राम प्रति लिटर) का 3 छिड़काव तुड़ाई से पहले करें फिर 15 दिनों के अंतराल पर करना चाहिए. छिड़काव इस तरह करना चाहिए कि अंतिम छिड़काव तुड़ाई से 15 दिन पहले हो जाए.

फलों को 0.05 फीसदी कार्बंडाजिम (0.5 ग्राम प्रति लिटर) के कुनकुने पानी में 15 मिनट तक डुबो कर रखने से इस रोग को नियंत्रित किया जा सकता है.

शाखा रोग

इस रोग से शाखाएं और टहनियां सूखने लगती हैं. उन्हें देखने से ऐसा मालूम होता है कि शाखा आग से झुलस गई है. रोग की शुरुआत में शाखाओं के अगले भाग की छाल काली पड़ जाती है, जो धीरेधीरे बढ़ती है और फिर पूरी शाखा ही सूख जाती है. साथ ही, गोंद का रिसाव भी होने लगता है.

रोकथाम

रोगग्रस्त शाखाओं की कटाई रोग से ग्रसित हिस्से के करीब 7.5-10 सैंटीमीटर नीचे से करनी चाहिए. इस के बाद 3 ग्राम फफूंदनाशक दवा प्रति लिटर पानी में मिला कर छिड़काव करना चाहिए और कटे हुए भाग पर इसी फफूंदनाशक दवा का लेप लगाना चाहिए. छोटे पेड़ों में भी रोगग्रस्त शाखाओं की छंटाई के बाद कौपर औक्सीक्लोराइड का लेप लगाना फायदेमंद है.

रेड रस्ट रोग

पत्तियों पर गोलाकार, मटमैले रंग के मखमली धब्बे दिखाई देते हैं, जिन का आकार बाद में बड़ा और रंग बादामी हो जाता है.

धब्बे की सतह भी उभरी हुई होती है. इस के ऊपर काई के बीजाणु बनते हैं जो बाद में तांबे के रंग के हो जाते हैं. आखिर में बीजाणुओं के झड़ने की वजह से पत्तियों पर गोलाकार सफेद निशान रह जाते हैं.

इस रोग के कारण पत्तियां और टहनियां छोटी रह जाती हैं और बाद में सूखने लगती हैं.

दिसंबरजनवरी माह में रोग से ग्रसित पत्तियां अधिक झड़ती हैं और पौधे दूर से ही मुरझाए हुए से दिखाई देते हैं.

रोकथाम

इस रोग की रोकथाम के लिए 0.3 फीसदी कौपर औक्सीक्लोराइड (3 ग्राम प्रति लिटर का 2-3 ग्राम प्रति लिटर) का छिड़काव करना असरदार पाया गया है.

ये सारे रोग आम के फलों में तुड़ाई से पहले लगते हैं, लेकिन इन सारे रोगों से निबटने के बाद भी आम के उत्पादकों को तुड़ाई के बाद भी कई तरह के रोगों से अपने फलों को बचाने की चुनौती रहती है. अगर जरा सी लापरवाही की गई तो सारी मेहनत पर पानी फिर सकता है.

आम (Mango)

तुड़ाई के बाद रोग

फलों में तुड़ाई के बाद भी उत्पादन का तकरीबन 25-40 फीसदी कई वजहों से खराब हो जाता है. यह नुकसान गलत समय पर फलों की तुड़ाई, गलत तुड़ाई के तरीके और गलत ढंग से भंडारण करने की वजह से होता है. लेकिन जो नुकसान होता है, वह मुख्य रूप से फलों की तुड़ाई के बाद लगने वाले रोग हैं.

आम की तुड़ाई के बाद होने वाले रोगों में मुख्य फफूंद है. तुड़ाई के बाद फलों में संक्रमण, आम की ढुलाई, भंडारण और लाने और ले जाने के दौरान होता है.

आम में बीमारियों का प्रकोप 2 तरह से होता है. एक तो फलों के लगते समय ही उन को संक्रमित कर देते हैं, दूसरे तुड़ाई के बाद फलों के रखरखाव के दौरान होता है.

आम की तुड़ाई के बाद भी बहुत सी बीमारियां लगती हैं, लेकिन इन में एंथ्रेक्नोज, ढेपी विगलन और काला सड़न बीमारी से अधिक नुकसान का डर रहता है.

गहरे भूरे रंग का डंठल

तुड़ाई के बाद आम की यह खास बीमारी है. यह लेसियोडिपलोडिया थियोब्रोमी नामक फफूंद से होती है. इस में तकरीबन 15-20 फीसदी तक का नुकसान होता है. यह बीमारी आम की चौसा किस्म में अधिक पाई जाती है. फलों में यह बीमारी ढेपी की तरह से शुरू होती है तभी इसे ढेपी विगलन रोग कहते हैं.

शुरू में जहां पर डंठल लगा होता है, वह भाग गहरे भूरे रंग का हो जाता है और धीरेधीरे बढ़ कर यह पूरे फल को ढक लेता है. 3-4 दिन बाद पूरा फल सड़ कर काले रंग का हो जाता है.

रोकथाम

फल को 1 से 2 सैंटीमीटर के डंठल सहित तोड़ना चाहिए. इस के बाद फल को मिट्टी के संपर्क में नहीं आने देना चाहिए.

तुड़ाई से पहले 2 छिड़काव 15 दिन के अंतराल पर कार्बंडाजिम या टापसिन एम (0.1 फीसदी यानी 1 ग्राम प्रति लिटर) का करना चाहिए. फलों को 0.05 फीसदी कार्बंडाजिम (0.5 ग्राम प्रति लिटर) के कुनकुने पानी में 5 मिनट डुबो कर रखने से इस रोग पर नियंत्रण किया जा सकता है.

काला सड़न रोग

यह रोग एस्परजीलस नाइजर नामक फफूंद से होता है. यह रोग फलों में चोट या कटे स्थान से शुरू होता है.

शुरू में इस के लक्षण पीले रंग के गोल धब्बे के रूप में दिखाई देते हैं, जो बाद में भूरे रंग के हो जाते हैं. 3-4 दिन में धब्बे आकार में बढ़ जाते हैं और इन के ऊपर काले रंग के फफूंद के जीवाणु दिखाई देने लगते हैं.

रोकथाम

फलों को सावधानी से तोड़ना चाहिए, ताकि फलों पर खरोंच न लगे या फल न कटे.

फलों को 0.5 फीसदी कार्बंडाजिम (0.5 ग्राम प्रति लिटर) के कुनकुने पानी में 5 मिनट तक डुबो कर रखने से इस रोग पर काबू किया जा सकता है.

अगर आप को आम की अच्छी उपज लेनी है तो शुरू से ही पौधों की देखभाल करें. आम के पौधों को जितना फल लगने के बाद देखभाल की जरूरत होती है, उस से कहीं ज्यादा फल आने के पहले होती है.

आमतौर पर किसान यहीं गलती करते हैं. इस वजह से उन्हें नुकसान उठाना पड़ता है. बौर आने के पहले रोगों से आम को बचाएं, साथ ही, बौर आने के बाद भी कई तरह के छिड़काव से रोगों से बचाना अहम हो जाता है. जब फल बड़े हो कर तुड़ाई के लिए तैयार हो जाएं तब भी उन्हें सड़नेगलने से बचाना उतना ही जरूरी है, जितना शुरुआत में बचाया गया था.

नीम से करें कीटनाशक (Insecticide) तैयार

भारत एक कृषि प्रधान देश है और यहां की बढ़ती जनसंख्या का असर आने वाले समय में खाद्यान्न पर पड़ेगा. देश में अनाज का उत्पादन तो बढ़ा है, लेकिन यह जनसंख्या के मुकाबले काफी कम है. यदि यही हाल रहा तो देश को फिर से खाद्यान्नों का आयात करना पड़ेगा.

इसलिए सरकार को इस दिशा में सावधानीपूर्वक कदम उठाने होंगे. किसानों की सब से बड़ी दिक्कत है कि वे अपनी फसलों को कीड़ेमकोड़ों से कैसे बचाएं. उन के पास संसाधनों की भारी कमी है. कोल्ड स्टोरेज में उपज रखना महंगा पड़ता है, साथ ही वहां तक उपज ले जाने में भी काफी भाड़ा लग जाता है.

आज अनाज को सुरक्षित रखने के लिए जिन कीटनाशकों या रसायनों का इस्तेमाल किया जाता है, वे सेहत के लिए नुकसानदेय हैं, इन जहरीले कीटनाशकों से बचने के लिए किसान परंपरागत कीटनाशकों का इस्तमाल कर सकते हैं, इन के इस्तेमाल से अनाज को कीड़ेमकोड़ों व फफूंद और घुन से भी सुरक्षित रखा जा सकता है. पहले लोग कीटनाशक के तौर पर नीम का इस्तेमाल करते थे, जिस का सेहत पर बुरा असर नहीं पड़ता था.

नीम का इस्तेमाल

* जब आप अनाज को इकट्ठा कर के रख रहे  तो उस दौरान अनाज में सूखी नीम की पत्तियां मिला दें, इस से घुन और अन्य कीड़ेमकोड़े नहीं लगते हैं और अनाज सुरक्षित रहता है.

* आप जिस जगह अनाज रख रहे हों, वहां अनाज रखने से पहले तकरीबन 3-4 इंच नीम की सूखी पत्तियों की परत बिछा देनी चाहिए. इस के बाद आप तकरीबन 2 फुट तक अनाज भरें, फिर नीम की पत्तियों की तह लगाते जाएं.

* कुछ किसान अनाज को जूट की बोरियों में भी भर कर रखते हैं, जिस बोरे में अनाज भरना हो, नीम की पत्तियां डाल कर उबाले गए पानी में रातभर भिगो दें, फिर बोरे को छांव में सुखा लें, उस के बाद उस में अनाज भरें. आप का अनाज एकदम सुरक्षित रहेगा.

* दालों के भंडारण के लिए 1 किलोग्राम दाल में 1 ग्राम नीम का तेल ऐसे मिलाएं जिस से वह पूरी तरह फैल जाए, जब दालों को पकाने के लिए निकालना हो, तब उसे अच्छी तरह धो कर इस्तेमाल करें, समय के साथ नीम के तेल की महक धीरेधीरे कम होने लगती है. जब दलहन को बोआई के लिए तैयार करना हो तो उस स्थिति में 1 किलोग्राम दाल बीज में 2 ग्राम नीम के तेल की जरूरत पड़ती है. इस विधि से दाल के बीज खराब नहीं होते.

* नीम की पकी निबौली को 12 से 18 घंटे पानी में भिगोएं, उस के बाद भीगी निबौली को लकड़ी के डंडे से चलाएं, जिस से निबौली के बीज का छिलका व गूदा अलग हो जाए, गूदा निकाल कर छाया में सुखाएं और सूखे गूदे को बारीक पीस कर पाउडर बना कर पतले सूती कपड़े में पोटली बना कर शाम को पानी में भिगो दें. सुबह पोटली को दबा कर उस निकाल लें और रस में 1 फीसदी साबुन मिला दें, अब आप तैयार निबौली कीटनाशक का खेत में छिड़काव कर सकते हैं.

* 1 हेक्टेयर क्षेत्र में छिड़काव के लिए 5 फीसदी घोल तैयार करने के लिए 25 किलोग्राम निबौली 500 लीटर पानी और 5 किलोग्राम साबुन की जरूरत होती है.

नीम की पत्तियों से कीटनाशक बनाने में किसानों को ज्यादा फायदा होता है, क्योंकि अन्य रासायनिक कीटनाशक बाजार में इस से महंगे मिलते हैं, जो स्वास्थ्य के अलावा मिट्टी के लिए भी हानिकारक हैं. नीम की पत्तियां हर जगह आसानी से मिल जाती हैं और इस पर किसी तरह का खर्च भी नहीं आता. किसानों के साथ ही अन्य लोग भी इस विधि से अपने अनाज को कीड़ेमकोड़ों, फफूंद और घुन से बचा सकते हैं.

केला उत्पादन से आमदनी बढ़ाएं

हमारे देश में केला एक लोकप्रिय फल है. यह लाभदायक होता है और आसानी से ज्यादा पैदावार होने से किसानों में काफी लोकप्रिय है. देश में केले की सभी किस्मों में गुच्छे के निचले हिस्से के फलों का कमजोर होना सब से बड़ी समस्या है, पर इस का अभी तक कोई इलाज नहीं है. कार्बनिक, जैविक, रासायनिक खादों और सूक्ष्म पोषक तत्त्वों के छिड़काव के बावजूद इस समस्या से नजात नहीं मिल पाई है. दक्षिणपूर्वी देशों में गुच्छे के निचले आधे भाग को गुच्छा बनने के तुरंत बाद काट देते हैं, लेकिन भारत की जलवायु की वजह से यह संभव नहीं है.

भारत में (2013-14 के अनुसार) केले की खेती 802.6 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में की जाती है. क्षेत्रफल के हिसाब से आम व नीबू के बाद केले का तीसरा स्थान है, जबकि 29724.6 हजार मीट्रिक टन (2013-14 के अनुसार) उत्पादन के साथ यह पहले स्थान पर है.

मिट्टी : केला सभी तरह की मिट्टी में उग जाता है, लेकिन व्यावसायिक रूप से खेती करने के लिए अच्छे जल निकास वाली गहरी दोमट मिट्टी जिस का पीएच मान 6.5 से 7.5 के बीच हो, फायदेमंद रहती है. ज्यादा रेतीली मिट्टी जो देर तक पोषक तत्त्वों को रोकने में असमर्थ रहती है और ज्यादा चिकनी मिट्टी जिस में पानी की कमी से दरारें पड़ जाती हैं, केले की खेती के लिए अच्छी नहीं होती हैं.

जलवायु : केला उष्ण जलवायु का पौधा है. गरम और नमी वाली जलवायु में इस की अच्छी पैदावार होती है. केले की खेती के लिए 20 से 35 डिगरी सेल्सियस तापमान अच्छा रहता है. 500 से 2000 मिलीमीटर वर्षा वाले इलाकों में इस की खेती की जा सकती है. केले को पाला और शुष्क तेज हवाओं से नुकसान होता है.

किस्में

ड्वार्फ कैवेंडिस (एएए) : यह सब से ज्यादा उगाई जाने वाली एक व्यावसायिक प्रजाति है. पौधे लगाने के 250-260 दिनों बाद इस में फूल आने शुरू हो जाते हैं. फूल आने के 110-115 दिनों बाद घार (फलों का गुच्छा) काटने लायक हो जाती है. इस तरह पौधे लगाने के 12-13 महीने बाद घार तैयार हो जाती है. फल 15 से 20 सेंटीमीटर लंबे और 3.0-3.5 सेंटीमीटर मोटे पीले व हरे रंग के होते हैं. घार का वजन 20 से 27 किलोग्राम तक होता है, जिस में औसतन 130 फल होते हैं.

यह प्रजाति पनामा रोग प्रतिरोधी है, लेकिन शीर्ष गुच्छा रोग के प्रति संवेदनशील होती है.

रोवस्टा (एएए) : इस किस्म के पौधे मध्यम ऊंचाई के होते हैं. फल 12-13 महीने में पक कर तैयार हो जाते हैं. फल आकार में 20 से 25 सेंटीमीटर लंबे और 3-4 सेंटीमीटर मोटे होते हैं. घार का भार औसतन 25 से 30 किलोग्राम तक होता है. यह प्रजाति पनामा रोग प्रतिरोधी है और सिगाटोका रोग के प्रति संवेदनशील होती है.

रसथली (एएबी) : इस किस्म के फल आकार में बड़े तथा पकने पर सुनहरेपीले रंग के होते हैं. घार का भार 15 से 18 किलोग्राम तक होता है. फसल 13 से 15 महीने में पक कर तैयार हो जाती है. इस किस्म में फल फटने की समस्या आती है.

पूवन (एएबी) : यह दक्षिण और उत्तरपूर्वी राज्यों में उगाई जाने वाली एक लोकप्रिय प्रजाति है. इस के पौधों की लंबाई ज्यादा होने से उन्हें सहारे की जरूरत नहीं होती है. पौधा लगाने के 12 से 14 महीने बाद घार काटने लायक हो जाती है. घार में मध्यम लंबाई वाले फल ऊपर की तरफ लगते हैं.

फल पकने के बाद पीले और स्वाद में हलका सा खट्टापन लिए मीठे होते हैं. फलों की भंडारण कूवत अच्छी है, इसलिए फल एक जगह से दूसरी जगह आसानी से भेजे जा सकते हैं. घार का औसत वजन 20 से 24 किलोग्राम तक होता है. यह प्रजाति पनामा रोग प्रतिरोधी है और स्ट्रीक विषाणु रोग से प्रभावित होती है.

नेंद्रेन (एएबी) : इस किस्म का इस्तेमाल मुख्य रूप से चिप्स और पाउडर बनाने के लिए किया जाता है. इसे सब्जी केला भी कहा जाता है. इस के फल लंबे, मोटी छाल वाले थोड़े मुड़े हुए होते हैं. फल पकने पर पीले हो जाते हैं. घार का भार 8 से 12 किलोग्राम तक होता है. हर घार में 30-35 फल होते हैं. इस की खेती केरल और तमिलनाडु के कुछ हिस्सों में की जाती है.

मांथन (एएबी) : इस किस्म के पौधे ऊंचे और मजबूत होते हैं. घार का भार 18 से 20 किलोग्राम होता है. प्रति घार औसतन 60-70 फल होते हैं. यह किस्म पनामा उकटा रोग से प्रभावित होती है, लेकिन पत्ती धब्बा और सूत्रकृमि रोगों की प्रतिरोधी होती है.

गें्रड नाइन (एएए) : इस किस्म के पौधों की ऊंचाई मध्यम और उत्पादकता ज्यादा होती है. फसल की अवधि 11-12 महीने की होती है. घार का भार 25 से 30 किलोग्राम होता है. सारे फल समान लंबाई के होते हैं.

कपूराबलि (एबीबी) : इस किस्म के पौधों की बढ़ोतरी काफी अच्छी होती है. घार का भार 25 से 35 किलोग्राम होता है. प्रति घार करीब 200 फल लगते हैं. फलों में मिठास और पेक्टिन की मात्रा दूसरी किस्मों के मुकाबले ज्यादा पाई जाती है. फलों की भंडारण क्षमता काफी अच्छी होती है. यह किस्म पनामा मिल्ट रोग और तना छेदक कीट के प्रति संवेदनशील और पत्ती धब्बा रोग की प्रतिरोधी होती है. यह तमिलनाडु और केरल की एक महत्त्वपूर्ण किस्म है.

संकर किस्में

एच 1 : इस किस्म के पौधे मध्यम ऊंचाई के होते हैं. घार का भार 14 से 16 किलोग्राम होता है. फल लंबे और पकने पर सुनहरेपीले होते हैं. इस किस्म से 3 साल के फसलचक्र में 4 बार फसलें ली जा सकती हैं.

एच 2 : इस के पौधे मध्यम ऊंचाई (2.13 मीटर से 2.44 मीटर) के होते हैं. फल छोटे, गसे हुए और गहरे हरे रंग के थोड़ा खट्टापन लिए हुए मीठी खुशबू वाले होते हैं.

को 1 : इस के फल में खास अम्लीय महक होती है. यह किस्म ज्यादा ऊंचाई वाले क्षेत्रों के लिए ज्यादा कारगर होती है.

एफएचआर 1 (गोल्ड फिंगर) : इस किस्म की घार का वजन 18 से 20 किलोग्राम होता है. यह किस्म सिगाटोका और फ्यूजेरियम बिल्ट के प्रति अवरोधी होती है.

केले की खेती मुख्य रूप से अंत: भूस्तारी से की जाती है. केले की जड़ों से 2 तरह के सकर निकलते हैं यानी तलवार सकर और जलीय सकर. व्यावसायिक नजरिए से तलवार सकर खेती के लिए सब से सही हैं. इन की पत्तियां तलवार की तरह पतली और ऊपर की तरफ उठी रहती हैं. 0.5 से 1 मीटर ऊंचे और 3-4 महीने पुराने तलवार सकर रोपाई के लिए सही होते हैं. सकर ऐसे पौधों से लेने चाहिए, जो अच्छे और पूरी तरह विकसित हों और किसी रोग से पीडि़त न हों.

वर्तमान दौर में केले की खेती शूट टोप कल्चर, इन विट्रो, ऊतक प्रवर्धन विधि से भी की जाती है. इस विधि से तैयार पौधे विषाणु रोग से बचे रहते हैं.

banana production

रोपाई का समय

रोपाई का सही समय जलवायु, प्रजाति के चयन और बाजार की मांग आदि पर निर्भर करता है. तमिलनाडु में ड्वार्फ कैवेंडिश और नेंद्रेन किस्मों को फरवरी से अप्रैल, जबकि पूवन और कपूरावली किस्मों को नवंबरदिसंबर में रोपा जाता है. महाराष्ट्र में साल में 2 बार यानी जूनजुलाई और सितंबरअक्तूबर में रोपाई की जाती है.

रोपाई की विधि : खेत को 2-3 बार कल्टीवेटर चला कर समतल कर लें. रोपाई के लिए 60×60×60 सेंटीमीटर आकार के गड्ढे खोदें. हर गड्ढे में मिट्टी, रेत और गोबर की खाद 1:1:1 के अनुपात में भरें. सकर को गड्ढे के बीच में रोप कर उस के चारों तरफ मिट्टी को अच्छी तरह से दबाएं. पौधों की दूरी, किस्म, जमीन की उर्वराशक्ति पर निर्भर करती है. सामान्य रूप से केले के पौधों की दूरी किस्मों के अनुसार सारणी में दिखाई गई है.

घनी रोपाई : घनी रोपाई विधि आर्थिक नजरीए से खास है. इस विधि में खरपतवारों की बढ़ोतरी कम होती है और तेज हवाओं से नुकसान कम होता है.

बौनी या मध्यम ऊंचाई वाली किस्मों जैसे कैवेंडिश, बसराई और रोबस्टा आदि घनी रोपाई के लिए सही होती हैं. रोबस्टा और ग्रेंड नाइन को 1.2×1.2 मीटर की दूरी पर रोप कर क्रमश: 68.98 और 94.07 टन प्रति हेक्टेयर की उपज हासिल होती है.

खाद व उर्वरक : केला अधिक पोषक तत्त्व लेने वाली फसल है. खाद और उर्वरक की मात्रा मिट्टी की उर्वराशक्ति, किस्म, उर्वरक देने की विधि और जलवायु पर टिकी रहती है. सामान्य वृद्धि और विकास के लिए 100 से 250 ग्राम नाइट्रोजन, 20 से 50 ग्राम स्फुर और 200-300 ग्राम पोटाश प्रति पौधा जरूरी है. नाइट्रोजन और पोटाश को 4-5 भागों में बांट कर देना चाहिए और स्फुर की पूरी मात्रा को रोपण के समय ही देनी चाहिए.

सिंचाई : केले की रोपाई से ले कर तोड़ाई के समय तक 1800 से 2200 मिलीमीटर पानी की जरूरत होती है. केले में खासकर कूंड़, थाला और टपक सिंचाई विधि से सिंचाई की जाती है. केले को गरमियों में 3-4 दिनों और सर्दियों में 8-10 दिनों के भीतर सिंचाई की जरूरत पड़ती है. ड्रिप विधि से सिंचाई किसानों के बीच लोकप्रिय हो रही है. इस विधि से सिंचाई करने पर 40-50 फीसदी पानी की बचत के साथ ही उत्पादन भी ज्यादा हासिल होता है.

मल्च का इस्तेमाल : मल्च के इस्तेमाल से जमीन में नमी बनी रहती है. साथ ही खरपतवारों की बढ़ोतरी भी रुकती है. गुजरात कृषि विश्वविद्यालय, नवसारी में ड्रिप सिंचाई विधि से गन्ने की खोई या सूखी पत्तियों द्वारा 15 टन प्रति हेक्टेयर की दर से मल्चिंग करने से केले के उत्पादन में 49 फीसदी तक बढ़ोतरी दर्ज की गई है और इस के साथ ही 30 फीसदी पानी की बचत भी होती है. इस के अलावा पौलीथीन शीट द्वारा मल्चिंग से भी अच्छे नतीजे हासिल हुए हैं.

देखभाल

मिट्टी चढ़ाना : पौधों पर मिट्टी चढ़ाना जरूरी होता है, क्योंकि इस की जड़ें उथली होती हैं. कभीकभी कंद जमीन से बाहर आ जाते हैं, जिस की वजह से उन की बढ़ोतरी रुक जाती हैं.

बेकार सकर हटाना : केले के पौधों में पुष्प गुच्छ निकलने से पहले तक बेकार सकर्स को हटाते रहना चाहिए. जब 3/4 पौधों में फूल आ जाएं तब 1 सकर को छोड़ कर अन्य को काटते रहें.

सहारा देना : केले के फलों का गुच्छा भारी होने से पौधे नीचे झुक जाते हैं. पौधों को गिरने से बचाने के लिए बांस की बल्ली या 2 बांस आपस में बांध कर कैंची की तरह बना कर फलों के गुच्छों को सहारा दें.

गुच्छों को ढकना : गुच्छों को सूरज की सीधी रोशनी से बचाने और फलों का आकर्षक रंग हासिल करने के लिए गुच्छों को छेद वाले पौलिथीन बैगों या सूखी पत्तियों से ढकना चाहिए.