कम पानी और कम लागत वाली प्रजातियां हों विकसित

मेरठ : सरदार वल्लभभाई पटेल कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति डा. केके सिंह और द जिनोमिक फाउंडेशन, नई दिल्ली के अध्यक्ष प्रो. एनके सिंह ने शोध के क्षेत्र में काम करने के लिए एमओयू पर हस्ताक्षर किए. इस अवसर पर कुलपति प्रो. केके सिंह ने कहा कि जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए विज्ञान को शोध के काम करने होंगे.

उन्होंने आगे कहा कि अब समय आ गया है कि नईनई प्रजातियों को विकसित किया जाए, जिस से कम पानी और कम लागत में किसानों को अच्छी उपज प्राप्त हो सके. हमारा प्रयास है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों को जल्द से जल्द नई प्रजातियां एवं तकनीकियां विकसित कर के दी जाएं, जिस से किसानों को लाभ हो सके.

द जिनोमिक फाउंडेशन के अध्यक्ष डा. एनके सिंह ने कहा कि जिनोम एडिटिंग के द्वारा नई प्रजातियों में जल्द से जल्द सुधार किया जा सकता है. इस क्षेत्र में वह विश्वविद्यालय के साथ मिल कर काम करेंगे, जिस से प्रजातियों को सुधारने और विकसित करने में कम समय लगेगा. वहीं प्रो. आरएस सेंगर ने बताया कि जिनोमिक फाउंडेशन के अध्यक्ष डा. एनके सिंह का धान अनुसंधान के क्षेत्र में और अरहर, आम डालनी फसलों आदि प्रजातियों के सीक्वेंस करने में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर योगदान दिया है.

अब इस का लाभ विश्वविद्यालय को भी मिल सकेगा, जिस का सीधा फायदा पश्चिम उत्तर प्रदेश के किसानों का होगा. कुलपति प्रो. केके सिंह द्वारा उठाए गए इन कदमों से आने वाले समय में कृषि उत्पादन और अनुसंधान के क्षेत्र में एक नई दिशा मिल सकेगी. इस दौरान कुल सचिव डा. रामजी सिंह निदेशक शोध डा. कमल खिलाड़ी मौजूद रहे.

प्राकृतिक खेती और जरूरी संसाधनों को सहजने पर रहेगा केवीके का फोकस

Natural Farming :  अनुसंधान निदेशक महाराणा प्रताप कृषि प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (एमपीयूएटी) डा. अरविंद वर्मा ने कहा कि आज भारत खाद्यान्न उत्पादन में 6.5 गुणा वृद्धि के साथ आत्मनिर्भर की श्रेणी में खड़ा है, लेकिन हमें  यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जनसंख्या के मामले में भी हम विश्व में अव्वल हैं. खाद्यान्न के साथसाथ दुधत्पादन , तिलहनदलहन उत्पादन में भी हम ने काफी वृद्धि की है, लेकिन यह काफी नहीं है. अब समय आ गया है कि हम अपने प्राकृतिक संसाधनों को सहेजते हुए प्राकृतिक खेती की जड़ों को मजबूत करें.

डा. अरविंद वर्मा पिछले दिनों मंगलवार को एमपीयूएटी में प्रसार शिक्षा निदेशालय सभागार में कृषि विज्ञान केंद्रों की सालाना कार्य योजना 2025-26 की समीक्षा के लिए आयोजित कार्यशाला को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित किया. डा. अरविंद वर्मा का कहना था कि प्राकृतिक खेती भारत सरकार की 2,481 करोड़ रुपए की एक महत्त्वपूर्ण परियोजना है. जिसे साल 2025-26 तक एक करोड़ किसानों तक पहुंचाने का लक्ष्य है. मिट्टी को जीवंत बनाए रखने के लिए कार्बनिक पदार्थों की मात्रा बढ़ानी होगी. हमारे देश की भूमि पर आज 52 हजार 500 मैट्रिक टन रसायनों की खपत हो रही है, जो कि काफी चिंता की बात है. आज आलम यह है कि कई जीवजंतु विलुप्त हो चुके हैं, जो प्राकृतिक संतुलन को बनाए रखने के लिए बहुत आवश्यक है.

इस कार्यक्रम के अध्यक्ष अटारी जोधपुर के निदेशक डा. जेपी मिश्रा ने कहा कि प्रकृति ने हमें हवा, पानी, मिट्टी, पेड़पौधे, जीवजंतु की अनूठी सौगात दी है. हमारे पास जल काफी सीमित मात्रा में है. धरती माता को दुबारा वास्तविक स्वरूप में लाने के लिए कृषि विज्ञान केंद्रों को यह साल प्राकृतिक खेती को समर्पित करना होगा. साथ ही किसानों को भी प्रेरित करना होगा कि वे प्राकृतिक खेती को अपनाएं. रासायन मुक्त खेती या बहुत ही कम रासायन युक्त खेती ही आगे का लक्ष्य होना चाहिए. केवीके को मौका मिल रहा हैं तो वे लीक से हट कर सर्वोत्तम लक्ष्य का चयन करे और कड़ी मेहनत से काम करें तभी किसानों और इस देश का भला होगा. उन्होंने नेचर पौजिटिव, मार्केट पौजिटिव और जेंडर पौजिटिव एग्रीकल्चर पर जोर दिया.

इस कार्यक्रम के आरंभ में प्रसार शिक्षा निदेशक डा. आरएल सोनी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए बताया कि साल 2025-26 केवीके के लिए चुनौतीपूर्ण है, लेकिन वरिष्ठ वैज्ञानिक व प्रभारी हर चुनौती पर खरे उतरेंगे. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद – कृषि तकनीकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान जोनद्वितीय जोधपुर (अटारी) एवं महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय उदयपुर के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित कार्यशाला में संभाग में कार्य कर रहे 9 कृषि विज्ञान केंद्रों के वरिष्ठ वैज्ञानिकों व प्रभारियों ने प्रेजेंटेशन के माध्यम से किसानों के लिए चलाई जा रही गतिविधियों पर प्रकाश डाला. इस के साथ ही, साल 2025-26 में केवीके की क्या तैयारी है और  किसानों के लिए क्या नए कार्यक्रम व अनुसंधान शुरू किए जाएंगे, इस पर पूरा रोडमैप सामने रखा.

इस कार्यशाला में राजूवास बीकानेर में पशुपालन विभाग में प्रो. डा. आरके नागदा ने कहा कि कृषि और पशुपालन विकास की बैलगाड़ी के दो पहिए हैं. कृषि विज्ञान केंद्रों को पशुपालन से जुड़ी योजनाओं को भी बढ़ावा देना होगा तभी कृषि में हम बेहतर परिणाम दे पाएंगे.

Natural Farmingइस कार्यक्रम के तकनीकी सत्र में केवीके बांसवाड़ा के वैज्ञानिक व प्रभारी डा. बीएस भाटी, भीलवाड़ा प्रथम व द्वितीय- डा. सीएम यादव, केवीके चित्तौड़गढ़- डा. आरएल सौलंकी, डूंगरपुर- डा. सीएम बलाई, प्रतापगढ़- डा. योगेश कनोजिया, केवीके राजसमंद- डा. पीसी रेगर, केवीके उदयपुर डा. मणीराम ने साल 2025-26 की सालाना कार्य योजना प्रस्तुत की.

इस के बाद अटारी जोधपुर के निदेशक डा. जेपी मिश्रा ने प्रेजेंटेशन के माध्यम से आगामी साल 2025-26 में विभिन्न क्षेत्रो में अनुसंधान की आवश्यकता के बारे में बताते हुए कहा कि सभी कृषि विज्ञान केंद्रों को एकजुट हो कर कार्य करना होगा.

इस कार्यक्रम में अटारी जोघपुर के डा. पीपी रोहिला, डा. डीएल जांगिड़, डा. एमएस मीणा, डा. एचएच मीणा, प्रो. एसके इंटोदिया, डा. एसएस लखावत और डा. रमेश बाबू ने भी अपने विचार रखे. डा. राजीव बैराठी ने धन्यवाद ज्ञापित किया व कार्यक्रम का संचालन डा. लतिका व्यास ने किया.

Unseasonal Rain : अप्रैल माह में बेमौसम बरसात से फसल सुरक्षा

Unseasonal Rain : अप्रैल में बेमौसम बारिश से गेहूं, प्याज एवं अन्य सब्जियों जैसी फसलों को भारी नुकसान होगा, इस से किसानों की आय प्रभावित होगी और कीमतें बढ़ेगी.

प्रसार्ड ट्रस्ट मल्हनी भाटपाररानी देवरिया के निदेशक प्रो. रवि प्रकाश मौर्य सेवानिवृत वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक ने बताया, कि बेमौसम बारिश (Unseasonal Rain) से उन किसानों को नुकसान होगा जिन्होंने अभी तक गेहूं की फसल की कटाईमड़ाई नहीं की है.

मौसम ठीक होने पर फसल सुखने के बाद तुरंत गेहूं की कटाईमड़ाई कर अनाज को सुखा कर भंडारण करें.

प्याज की फसल में नमी बढ़ने से पत्ते सड़ जाते हैं और प्याज जमीन में सड़ने लगती है. प्याज का रंग और क्वालिटी खराब हो सकती है. इस के साथ ही, लहसुन जो खुदाई की स्थिति में है, उसे भी नुकसान होगा.

बेमौसम बारिश (Unseasonal Rain) से पोस्टहार्वेस्ट गतिविधियों पर असर पड़ सकता है, जिस से जल्द खराब होने वाली फलों व सब्जियों की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है. अब और बारिश होती है, तो मिट्टी में नमी बनी रहने से फसल में फंगस, बैक्टीरिया और कीट आदि सहित पीला मोजेक रोग का खतरा बढ़ जाएगा. ऐसे में फसल पीली हो कर सड़ जाएगी.

मक्का की फसलों को हवा चलने के कारण गिरने से नुकसान हाेने की संभावना है. कद्दू वर्गीय सब्जियों में फल सड़ने की आशंका बनेगी. आम के टिकोरे(फल) तेज हवा चलने से गिरेगें. इस के साथ ही दलहनी फसलों में उड़द व मूंग की फसल प्रभावित हो सकती है.

जो किसान खेत से फसल काट कर खलिहान में रखे हैं, वे प्रभावित होगी. मौसम साफ होने पर खलिहान में रखी फसल को फैला कर सुखाएं. किसानों को सलाह दी जाती है, कि जल निकास की व्यवस्था सुनिश्चित करें जिस से फसलों को बचाया जा सके.

जो खेत खाली है उन की मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई करें, जिस से तेज धूप होने से हानिकारक कीट,खरपतवार फंगस आदि नष्ट हो जाएंगे और मृदा की गुणवत्ता बनी रहेगी.

इस के साथ ही, आकाशवाणी, दूरदर्शन से मौसम समाचार समयसमय पर सुनते रहें. मोबाइल पर मौसम ऐप डाउनलोड कर ताजा मौसम की जानकारी ले सकते हैं.

DAP Bags : किसानों को डीएपी की बोरी 1350 रूपए में मिलेगी

DAP Bags : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने फास्फेटिक और पोटासिक उर्वरकों पर खरीफ सीजन, 2025 (01.04.2025 से 30.09.2025 तक) के लिए पोषक तत्व आधारित सब्सिडी  दरें तय करने के लिए उर्वरक विभाग के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है. खरीफ सीजन 2025 के लिए बजटीय आवश्यकता लगभग 37,216.15 करोड़ रुपए होगी. यह रबी सीजन 2024-25 के लिए बजटीय आवश्यकता से लगभग 13,000 करोड़ रुपए अधिक है.

कृषि एवं किसान कल्याण और ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने केंद्रीय मंत्रिमंडल के इस  फैसले पर कहा कि मोदी सरकार निरंतर किसानों की आय बढ़ाने के प्रयास में लगी है. किसानों की आय बढ़ाने के साथ उत्पादन बढ़ाना भी ज़रूरी है और उत्पादन बढ़ाने के लिए फर्टिलाइजर या खाद की आवश्यकता पर भी ध्यान देना होगा.

उन्होंने आगे कहा कि उत्पादन बढ़ने के साथ ही फर्टिलाइजर की कीमतें भी नियंत्रित रहे, यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्राथमिकता रही है. किसानों पर फर्टिलाइजर विशेषकर डीएपी की बढ़ी हुई लागत का बोझ न आए इसलिए सरकार बढ़ी हुई कीमतों का भार उठाने के लिए विशेष पैकेज देती है.

कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार किसान हितैषी सरकार है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने 1350 रूपए प्रति बोरी कीमत तय की है, ताकि किसानों को अधिक कीमत न देनी पड़े इस के लिए भारी सब्सिडी किसानों को दी जा रही है.

उन्होंने बताया कि इस साल भी लगभग 1लाख 75 हजार करोड़ रूपए की सब्सिडी किसानों को सस्ती खाद उपलब्ध कराने के लिए सरकार ने दी है. अब किसानों को डीएपी की बोरी 1350 रूपए में ही मिलेगी. खरीफ के सीजन में ही सस्ती डीएपी देने के लिए 37 हजार 216 करोड़ रूपए विशेष रूप से सब्सिडी दी जाएगी.

इस के साथ ही किसानों के पक्ष में आयातनिर्यात नीति में परिवर्तन किया गया है, चना उत्पादक किसानों के लिए चने पर 10  फीसदी आयात शुल्क लागू करने के फैसले की अधिसूचना कल केंद्र सरकार ने जारी कर दी है, जिस से चना  उत्पादक किसानों को लाभ होगा.

केंद्र सरकार के इस निर्णय पर कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि 10 फीसदी आयात शुल्क लगाने के कारण सस्ता चना विदेश से नहीं आएगा. इस से हमारे किसानों को उन की उपज का बाजार में सही दाम मिलेगा.

कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बताया कि इस साल चने का भी बंपर उत्पादन हुआ है. कृषि के 2024-25 के अग्रिम अनुमान के अनुसार चने का उत्पादन 115 लाख मीट्रिक टन से अधिक होगा जबकि पिछले साल 110 लाख मीट्रिक टन उत्पादन हुआ था.

सरकार ने ऐसे अनेकों किसान हितैषी फैसले किए हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का मंत्र है, कि किसानों को उस के उत्पादन के ठीक दाम दें, इसलिए न केवल उत्पादन की लागत पर 50 फीसदी लाभ दे कर न्यूनतम समर्थन मूल्य एमएसपी घोषित की जाती है बल्कि, खरीदने की भी उचित व्यवस्था की जाती है.

किसान के उत्पाद की कीमत घटने पर हम आयातनिर्यात नीति को भी किसान हितैषी बनाते हैं. उन्होंने बताया कि पिछले दिनों आयतित मसूर आई थी. जिस पर जीरो फीसदी आयात शुल्क था. जिस से कीमतें कम होती और किसान को घाटा होता. इसलिए, सरकार ने फैसला किया कि आयतित मसूर पर आयात शुल्क 11 फीसदी वसूली जाएगी.

Group Working : समूह बना कर करेंगे काम, कमाएंगे दाम

उदयपुर : भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रबंधन अकादमी राजेंद्र नगर, हैदराबाद, तेलंगाना की ओर से महाराणा प्रताप कृषि एंव प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के प्रसार शिक्षा निदेशालय में ‘श्रीअन्न का प्रसंस्करण, मूल्य संवर्द्धन एवं निर्यात’ विषय पर पांचदिवसीय महिला प्रशिक्षण कार्यक्रम पिछले दिनों संपन्न हुआ. प्रशिक्षण में बांसवाड़ा, राजसमंद व उदयपुर जिले की 30 महिलाओं ने हिस्सा लिया.

अनुसूचित जाति उपयोजना के अंतर्गत कौशल विकास प्रशिक्षण कार्यक्रम में शामिल महिलाओं को पिछले दिनों 25 से 29 मार्च तक विशेषज्ञों ने ‘श्रीअन्न’ के विभिन्न बेकरी आइटम जैसे रागी केक, ज्वार डोनट्स, ओट्स कुकीज, ज्वार ब्रेड, बाजरा लड्डू, ज्वार पापड़, कांगणी नमकीन, बाजरा लच्छा परांठा, ज्वार नान, कांगणी के लड्डू व सावां के फ्राइम, ब्राउनी, कप केक आदि लगभग दो दर्जन खाद्य वस्तुओं को न केवल बनाना सीखा, बल्कि समूह बना कर इन चीजों से कमाई करने का संकल्प लिया.

प्रशिक्षणार्थियों को विशेषज्ञ वेलेंटीना ने केक, कुकीज, ब्राउनी, कप केक बनाना सिखाया, वहीं विजयलक्ष्मी ने पापड़, पापड़ी, लड्डू बनाना सिखाया. हजारी लाल ने नान, बाजरा नान, ज्वार नान व नूडल्स बनाना सिखाया.

एमपीयूएटी में पादप अनुवांशिकी विभाग की हेड प्रो. हेमलता शर्मा ने प्रशिक्षणार्थियों को ‘श्रीअन्न’ यानी मोटे अनाज में मौजूद पोषक तत्वों के बारे में बताया. साथ ही, उन्होंने आह्वान किया कि वे मोटे अनाज को नियमित आहार के काम में लें.

निदेशालय सभागार में आयोजित समापन समारोह में मुख्य अतिथि पूर्व निदेशक प्रसार शिक्षा निदेशालय डा. आईजे माथुर ने कहा कि प्रशिक्षण के दौरान जो भी बेकरी उत्पाद बनाना सीखे हैं, इसे अब व्यवसायिक स्तर पर बनाएं. महिला समूह बना कर अपने उत्पाद बेकरी संस्थानों को दे और मुनाफा कमाएं.

Group Work

कभी मोटे अनाज (श्रीअन्न) यानी बाजरा, ज्वार, रागी, कांगणी, सावां, चीना आदि को ‘गरीबों का भोजन’ माना जाता था, लेकिन आज अमीर आदमी मोटे अनाज के पीछे भाग रहा है. मोटे अनाज में तमाम रोगों को रोकने संबंधी पोषक तत्वों की भरमार है, इसलिए लोग ‘श्रीअन्न’ को अपने भोजन में शामिल करने लगे हैं.

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रबंधन अकादमी, राजेंद्र नगर, हैदराबाद के संयुक्त निदेशक डा. गोपाल लाल ने कहा कि लोगों को मोटे अनाज का महत्व समझ में आने लगा है और ‘श्रीअन्न’ की मांग भी बढ़ी है. प्रशिक्षण का ध्येय भी यही है कि सुदूर गांवों के समाज के कमजोर तबके की युवा महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़े और वे अपने क्षेत्र में नया र्स्टाटअप शुरू कर सकें.

कार्यकम के आरंभ में निदेशक प्रसार शिक्षा निदेशालय, एमपीयूएटी डा. आरएल सोनी ने प्रतिभागी महिलाओं से आह्वान किया कि अपनेअपने गांव पंहुच कर सब से पहले ‘श्रीअन्न’ के विविध उत्पाद बना कर खुद तो खाएं ही, साथ ही पड़ोसियों व मेहमानों को खिलाएं.

इस के बाद समूह बना कर बड़े पैमाने पर उत्पादन कर स्वरोजगार से जुड़ें. खाद्यान्न उत्पादन में हमारा देश आत्मनिर्भर है, वहीं फलसब्जी व दूध उत्पादन में भी देश शीर्ष पर है. कमी केवल प्रसंस्करण यानी प्रोसैसिंग की है. प्रोसैसिंग की उचित व्यवस्था न होने से बड़ी मात्रा में फलसब्जी बेकार हो जाती है.

हैदराबाद से आए प्रमुख वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष एससीएसपी योजना डा. एम. बालाकृष्णन ने कहा कि बाजरा उत्पादन में राजस्थान का नाम देश में अव्वल है. बाजरा डायबिटीज को नियंत्रण में करने का अच्छा माध्यम है. महिलाएं बाजरा व्यंजन बना कर नया धंधा शुरू कर सकती है.

प्रशिक्षण प्रभारी व कार्यक्रम संचालक डा. लतिका व्यास ने बताया कि प्रतिभागी महिलाओं को एक मुफ्त किट, जिस में 3 जार मिक्सर, आलू चिप्स मेकर प्रदान किए गए. साथ ही, मिलेट्स रेसिपी की बुकलेट भी दी गई.

Water Management : विकसित भारत के लिए सतत जल प्रबंधन

Water Management: भारत की प्राथमिक क्षेत्र ‘कृषि’ को रीढ़’ कहा जाता है, क्योंकि यह खाद्य और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करता है और किसानों व कृषि मजदूरों के रूप में लगभग 54 फीसदी कार्यबल प्रदान करता है. यह जान कर खुशी होती है कि भारतीय कृषि ने अपनी स्वतंत्रता के बाद से पिछले 78 सालों के दौरान पोषक तत्वों, जल उपयोग दक्षता व फसल उत्पादकता के बारे में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया है, जिस का श्रेय भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के शोधकर्ताओं द्वारा विकसित वैज्ञानिक उन्नत प्रबंधन प्रौद्योगिकियों को दिया जा सकता है.

यद्यपि, इस क्षेत्र को जलवायु संबंधित प्राकृतिक आपदाओं, मृदा और जल संसाधनों के घटते आधार, छोटी भूमि क्षेत्रों, मृदा और जल प्रदूषण आदि के रूप में अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. इसलिए हमें अमृत काल 1947 तक विकसित भारत के लिए प्रस्तावित उद्देश्यों को पूरा करने के लिए जलवायु अनुकूल और सतत जल प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है.

इस अवधि के दौरान भारत 550 मिलियन टन खाद्यान्न उत्पादन हासिल करने का लक्ष्य ले कर चल रहा है. इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हमें कुशल जल संसाधन प्रबंधन और जल उपयोग दक्षता बढ़ाने के दोहरे उद्देश्यों के साथ बहुआयामी प्रबंधन योजना पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है.

‘ग्लेशियर संरक्षण : विश्व जल दिवस-2025 का विषय जैसा कि हम 22 मार्च, 2025 को ‘विश्व जल दिवस’ मना रहे हैं, हम अपना ध्यान इस के केंद्रीय विषय यानी ग्लेशियर संरक्षण पर केंद्रित करेंगे.

भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वे की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय हिमालय में लगभग 9,575 ग्लेशियर मौजूद हैं. ग्लेशियर काफी मात्रा में मीठे पानी का भंडारण करते हैं और उन्हें धीरेधीरे छोड़ते हैं, जो मानव जाति के लिए बहुपयोगी है. वे पृथ्वी की जलवायु को संतुलित और विनियमित करने, जैव विविधता को बनाए रखने, कृषि, पीने के लिए साफ पानी और बिजली उत्पादन के लिए जल संसाधन प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

यद्यपि, इन ग्लेशियरों को जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के रूप में गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. परिणामस्वरूप, भारत के हिमालयी क्षेत्र सहित पूरे विश्व में इन के गलने की उच्च दर देखी जा रही है. इस से हिमनद झीलों का विस्तार होगा, जिस से नीचे की ओर विनाशकारी बाढ़ आ सकती है.

इस के अलावा ग्लेशियर की मात्रा में कमी के चलते कृषि क्षेत्र को जल संसाधनों में गिरावट का सामना करना पड़ेगा. इसलिए, हमें इस मूल्यवान प्राकृतिक संसाधन को संरक्षित करने की जरूरत है.

सतत जल प्रबंधन एक उपाय

फसल उत्पादन के लिए जल जरूरी है. सिंचाई के लिए बढ़ते जल संसाधनों ने खाद्यान्न उत्पादन में तेजी लाने में काफी योगदान दिया है. देश में शुद्ध बोआई क्षेत्र के 141 मिलियन हेक्टेयर में से शुद्ध सिंचित क्षेत्र लगभग 78 मिलियन हेक्टेयर (55 फीसदी) है और शेष 63 मिलियन हेक्टेयर (45 फीसदी ) वर्षा सिंचित क्षेत्र के अंतर्गत है.

वर्तमान में भारत में 112.2 मिलियन हेक्टेयर सकल सिंचित क्षेत्र है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (साल 2015) के विजन 2050 दस्तावेज के अनुसार, 1498 (बीसीएम) की अनुमानित कुल जल मांग की तुलना में उपलब्ध आपूर्ति केवल 1121 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) है.

ग्लेशियर पिघलने के कारण कृषि के लिए पानी की उपलब्धता में कमी की पृष्ठभूमि में एकीकृत जल प्रबंधन कार्य योजना पर ध्यान देने की जरूरत है. घरेलू, औद्योगिक और ऊर्जा क्षेत्रों में अतिरिक्त जल की मांग के लिए साल 2050 तक अतिरिक्त 222 बीसीएम पानी की जरूरत होगी. नतीजतन, भारत में कृषि में सिंचाई क्षेत्र में उपयोग किए जाने वाला पानी वर्तमान में 80 फीसदी से घट कर साल 2050 तक 74 फीसदी होने की उम्मीद है.

उभरते परिदृश्यों को देखते हुए अब चुनौती जल की प्रति इकाई मात्रा में अधिक फसल का उत्पादन करना है. भाकृअनुप-राष्ट्रीय कृषि अर्थशास्त्र और नीति अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2050 तक कृषि के लिए संसाधनों की उपलब्धता, खाद्य मांग में वृद्धि की तुलना में धीमी दर से बढ़ेगी और इसलिए कृषि उत्पादों की भविष्य की मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बनाने के लिए हमें साल 2050 तक जल उत्पादकता में दोगुना वृद्धि करने की जरूरत है.

साल 2047 तक विकसित भारत के उद्देश्य को पूरा करने की दिशा में कम होते जल संसाधनों से 550 मिलियन टन खाद्यान्न उत्पादन के परिदृश्य के तहत हमें अमृत काल (2047) तक कृषि में अपनी सिंचाई दक्षता को 38 फीसदी से 65 फीसदी तक सुधारने के लिए सतत और जलवायु अनुकूल जल प्रबंधन कार्ययोजना निष्पादित करनी होगी.

जल निकायों के पुनरुद्धार के माध्यम से प्रति व्यक्ति जल भंडारण में वृद्धि 2050 तक भारत की आबादी 1.67 बिलियन होने की संभावना है, जिस के परिणामस्वरूप जल, भोजन और ऊर्जा की मांग में वृद्धि होगी. व्यापक बांध निर्माण गतिविधियों के रूप में भारत सरकार द्वारा की गई पहलों के कारण, भारत में बड़े बांधों (जलाशयों) की कुल संख्या 5264 के आंकड़े को पार कर चुकी है. इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता 171.1 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का लगभग 66.36 फीसदी यानी 257.8 बीसीएम है. यद्यपि, भारत के प्रति व्यक्ति भंडारण को 190 क्यूबिक मीटर प्रति व्यक्ति के वर्तमान स्तर से सुधारने की आवश्यकता है.

एक प्रमुख चिंता जलाशयों में अवसादन है, जो भंडारण क्षमता को काफी कम कर देता है. भंडारण क्षमता बढ़ाने के लिए, अपस्ट्रीम और डाउनस्ट्रीम दोनों क्षेत्रों की आवश्यकताओं पर विचार करते हुए जलाशय नियंत्रण प्रणाली को मजबूत किया जाना चाहिए. वर्षा जल संचयन संरचनाओं के माध्यम से जल भंडारण बुनियादी ढांचे का निर्माण महत्वपूर्ण है और भारत सरकार का अमृत सरोवर मिशन जिसे वर्ष 2022 में शुरू किया गया था, उस के द्वारा 68,000 से अधिक जल निकायों का निर्माण या नवीनीकरण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

हमें उच्च जल उपयोग दक्षता प्राप्त करने के लिए उपलब्ध जल संसाधनों से मेल खाते हुए उपयुक्त फसल पैटर्न तैयार करने की आवश्यकता है. चावल और गन्ने जैसी जल गहन फसलों से दलहन और तिलहन जैसी कम जल मांग वाली फसलों को चरणबद्ध तरीके से फसल विविधीकरण कर बड़े क्षेत्र में फसलों की खेती करने की आवश्यकता है, जिस से कि अधिक से अधिक संख्या में छोटे और सीमांत किसान लाभान्वित होंगे.

हालांकि, फसल विविधीकरण योजना वर्षा, मिट्टी के प्रकार, जल के अंतर, मौजूदा फसल उत्पादकता और किसानों की शुद्ध आय पर विचार करते हुए एक सूचकांक पर आधारित होनी चाहिए.

सूक्ष्म सिंचाई और सुनियोजित जल प्रबंधन की जरूरत

भारत में सूक्ष्म सिंचाई के तहत 3.1 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र (साल 1992) से बढ़ कर 16.7 मिलियन हेक्टेयर (साल 2023) हो गया है. यद्यपि, सूक्ष्म सिंचाई की सांद्रता कुछ ही राज्यों में है और हमें इसे अन्य राज्यों में भी बढ़ावा देने की आवश्यकता है, जहां संभावनाएं मौजूद हैं. भारत के 5 राज्य कर्नाटक (2.42 मिलियन हेक्टेयर), राजस्थान (2.09 मिलियन हेक्टेयर), महाराष्ट्र (2.03 मिलियन हेक्टेयर), आंध्र प्रदेश (1.92 मिलियन हेक्टेयर) और गुजरात (1.70 मिलियन हेक्टेयर) मिल कर सूक्ष्म सिंचाई में लगभग 70 फीसदी  (10.16 मिलियन हेक्टेयर) का योगदान करते हैं. अमृत काल 2047 तक सूक्ष्म सिंचाई के तहत इष्टतम क्षेत्र प्राप्त करने के लिए, विभिन्न समितियों द्वारा सुझाए गए सभी संभावित राज्यों में सिंचाई के बुनियादी ढांचे का विस्तार करने के प्रयास किए जाने चाहिए.

हमें सुनियोजित/सटीक सिंचाई प्रणाली पर भी ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है, जो सही समय पर और सही तरीके से पौधे को इष्टतम मात्रा में जल आपूर्ति को सुनिश्चित करता है. यह परिवर्तनीय दर सिंचाई के माध्यम से जल तनाव के संदर्भ में भूमि के विषमता कारक को भी संबोधित करता है. सूचना प्रौद्योगिकी, मशीन लर्निंग, भौगोलिक स्थिति प्रणाली (जीपीएस), भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस), ड्रोन आधारित निगरानी और स्वचालन में आधुनिक विकास के आगमन के साथ, आईओटी सक्षम सटीक सिंचाई प्रणाली अब और अधिक मजबूत हो गई है.

हाल की प्रगति ने सतह और भूजल सिंचाई दोनों में स्वचालन के अनुप्रयोग की सुविधा प्रदान की है, जो अधिकतम जल उपयोग दक्षता के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायता करता है. जल प्रौद्योगिकी केंद्र, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित मृदा नमी सैंसर आधारित स्वचालित बेसिन सिंचाई प्रणाली में 3 मुख्य इकाइयां शामिल हैं : एक संवेदन इकाई, एक संचार इकाई और एक नियंत्रण इकाई है और यह गेहूं में पारंपरिक मैन्युअल रूप से नियंत्रित प्रणाली की तुलना में 25 फीसदी पानी की बचत में मदद करता है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा प्रदान की गई तकनीकी सहायता से राष्ट्रीय जल मिशन द्वारा विकसित राज्य विशिष्ट जल प्रबंधन कार्ययोजनाओं को भारतीय कृषि की जीत सुनिश्चित करने के लिए कार्यान्वित किए जाने की आवश्यकता है. ये योजनाएं संबंधित राज्यों में कृषि पारिस्थितिक स्थितियों और जल संसाधन उपलब्धता और फसल जल की मांग को देखते हुए तैयार की गई हैं.

कुलमिला कर, सभी हितधारकों की सक्रिय भागीदारी के साथ सतत और जलवायु अनुकूल जल प्रबंधन को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है. समय की मांग है कि संस्थागत और तकनीकी दोनों हस्तक्षेपों को एकीकृत किया जाए और जल और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य को पूरा करने के लिए किसानों के खेतों में अच्छी तरह से सिद्ध औन फार्म जल प्रबंधन प्रौद्योगिकियों को बढ़ाया जाए, जिस से अमृत काल 2047 तक विकसित भारत के उद्देश्य को पूरा किया जा सके.

Training : किसानों ने लिया बीज उत्पादन प्रशिक्षण

Training |  मधेपुरा, बिहार से आए 40 किसानों ने भाकृअनुप-राष्ट्रीय बीज विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान, कुशमौर, मऊ में आयोजित 18 मार्च से 22 मार्च, 2025 तक चलने वाले 5 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लिया. डा. संजय कुमार, निदेशक के मार्गदर्शन में ‘खेतीय फसलों और सब्जियों में गुणवत्तायुक्त बीज उत्पादन’ विषय पर आधारित इस कार्यक्रम की शुरुआत 18 मार्च, 2025 को हुई.

इस कार्यक्रम का संचालन संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डा. अंजनी कुमार सिंह की अध्यक्षता में हुआ. कार्यक्रम में भाग ले रहे किसानों ने अपना परिचय देते हुए बताया कि मधेपुरा, बिहार में विभिन्न खाद्यान्न फसलों के साथ मक्का, केला, पपीता और सब्जियों की खेती भी की जाती है.

प्रधान वैज्ञानिक डा. अंजनी कुमार सिंह ने  मधेपुरा से आए किसानों से कहा कि किसानों को फसलों की नई किस्मों की खेती करनी चाहिए, न कि पुराने किस्मों पर ही निर्भर रहना चाहिए. बीज बाजार में बीजों की अत्यधिक मांग के अनुपात में अपेक्षाकृत कम आपूर्ति को देखते हुए यह जरूरी है कि  किसान को स्वयं बीज उत्पादित करना चाहिए.

उन्होंने संस्थान की उपलब्धियों के बारे में जानकारी देते हुए किसानों को प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए शुभकामनाएं दीं. इस  कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. कल्याणी कुमारी  ने बीज प्रमाणीकरण में शामिल प्रक्रियाएं, महत्वपूर्ण फसलों के प्रक्षेत्र और बीज मानक से संबंधित जानकारी किसानों को दी. साथ ही, बीज प्रयोगशाला में उस विषय पर व्यावहारिक सत्र भी आयोजित किया.

वैज्ञानिक डा. विनेश बनोथ ने किसानों को प्रमुख फसलों में संकर बीज उत्पादन प्रौद्योगिकी के बारे में बताया. प्रशिक्षण कार्यक्रम का समन्वयन डा. अंजनी कुमार सिंह, डा. आलोक कुमार, डा. पवित्रा वी. एवं पी. शिवम्मा कर रहे थे.

Mobile App : मत्स्यपालन मोबाइल ऐप शुरू, मत्स्यपालकों को होगा फायदा

Mobile App|  मत्स्यपालन विभाग, मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय ने मत्स्यपालन क्षेत्र में नवाचार और विकास को बढ़ावा देने के लिए हैदराबाद, तेलंगाना में बीते दिनों 8 मार्च, 2025 को मत्स्यपालन स्टार्टअप कौन्क्लेव 2.0 का आयोजन किया.

इस कार्यक्रम में राजीव रंजन सिंह, केंद्रीय मंत्री, मत्स्यपालन, पशुपालन, डेयरी और पंचायती राज मंत्रालय, प्रोफैसर एसपी सिंह बघेल, राज्य मंत्री, मत्स्यपालन, पशुपालन, डेयरी और पंचायती राज मंत्रालय भी शामिल हुए.

कार्यक्रम में भारत सरकार के मत्स्यपालन विभाग के सचिव डा. अभिलक्ष लिखी के साथसाथ प्रो. रमेश चंद, सदस्य, नीति आयोग, भारत सरकार और श्याम सिंह राणा, मत्स्यपालन मंत्री, हरियाणा भी शामिल हुए.

कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने राष्ट्रीय मत्स्यपालन डिजिटल प्लेटफौर्म मोबाइल ऐप्लीकेशन लौंच किया. गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध यह ऐप स्टार्टअप्स को विभिन्न मौड्यूल और योजना के लाभों तक पहुंचने के लिए एक सहज इंटरफेस प्रदान करेगा.

इस के अलावा केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने मत्स्यपालन और संबद्ध क्षेत्रों में तकनीकी प्रगति को बढ़ावा देने के लिए 1 करोड़ रुपए की निर्धारित निधि के साथ मत्स्यपालन स्टार्टअप ग्रैंड चैलेंज 2.0 का भी अनावरण किया. 10 विजेता स्टार्टअप को मत्स्यपालन और जलीय कृषि में उत्पादन दक्षता और स्थिरता बढ़ाने के लिए अभिनव समाधान विकसित करने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन सहायता प्राप्त होगी.

मंत्री राजीव रंजन सिंह ने कहा कि मत्स्यपालन क्षेत्र के विकास और भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए स्टार्टअप की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है. स्टार्टअप विशेष रूप से युवाओं के लिए रोजगार में मददगार होते हैं, इसलिए भारत सरकार हर संभव तरीके से स्टार्टअप का समर्थन करने के लिए प्रतिबद्ध है.

इस अवसर पर उन्होंने स्टार्टअप से आगे बढ़ कर निर्यात बढ़ाने के लिए मूल्य संवर्धन, उन्नत प्रौद्योगिकी समाधान, टूना क्षमता का उपयोग करने के लिए अंडमान एवं निकोबार और लक्षद्वीप के द्वीप विकास, औनबोर्ड प्रसंस्करण इकाइयों के साथ उच्च समुद्र और गहरे समुद्र में मछली पकड़ने के लिए जहाजों के उन्नयन आदि के क्षेत्रों में योगदान देने का आग्रह किया.

केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने स्टार्टअप्स को मत्स्यपालन स्टार्टअप ग्रैंड चैलेंज 2.0 में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया, जिस का उद्देश्य स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना और इस क्षेत्र में तकनीकी नवाचारों को बढ़ावा देना है.

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उन्होंने स्टार्टअप्स से मत्स्यपालन अवसंरचना विकास कोष और प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सहयोजना जैसी सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने का भी आग्रह किया, ताकि उन की वृद्धि और विकास को समर्थन मिल सके.

इस कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने जलीय कृषि, मूल्य श्रृंखला आधुनिकीकरण और टिकाऊ मत्स्यपालन में उन की परियोजनाओं को मान्यता देने के लिए 33.46 करोड़ रुपए की कुल परियोजना लागत के साथ 8 चयनित मत्स्यपालन स्टार्टअप/ उद्यमी/ एफएफपीओ को पीएमएमएसवाई के तहत उद्यमी मौडल स्वीकृति मिली.

पुरस्कार विजेताओं में मध्य प्रदेश के संतोख सिंह व अवतार सिंह को मीठे पानी की मछली की खेती के लिए, नए ग्रोआउट तालाब और बायोफ्लोक टैंक बनाने के लिए, ओडिशा के एमआर एक्वाटैक को एफआरपी कार्प हैचरी, पानी की टंकी, नाव और मछलीघर टैंकों के बनाने के लिए, उत्तर प्रदेश की पीवीआर एक्वा प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड को कार्प मछली की खेती और जीवित मछली की बिक्री के लिए, गुजरात के कृष्ण नरेशभाई धिम्मर को एकीकृत मत्स्य प्रवाह के लिए, छत्तीसगढ़ के मैसर्स मंडल मनीत एक्वा जेनेटिक्स टैक्नोलौजी रिसर्च प्राइवेट लिमिटेड को तिलापिया (ओरियोक्रोमिस निलोटिकस) के लिए आनुवंशिक सुधार केंद्र की स्थापना के लिए, गुजरात के मेसर्स औस्को इंडिया मरीन प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड को पारंपरिक झींगापालन को एक टिकाऊ सुपर गहन परिशुद्धता खेती मौडल में बदलने के लिए, आंध्र प्रदेश की विनीशा वलसराज को रोगजनक मुक्त रेत के कीड़ों के उत्पादन के लिए और महाराष्ट्र के मैसर्स संजीवनी मत्स्य विकास सोसाइटी शामिल हैं.

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी और पंचायती राज राज्य मंत्री प्रो. एसपी सिंह बघेल ने सभी महिला उद्यमियों को आगे आने और 300 से अधिक मत्स्यपालन स्टार्टअप इकोसिस्टम का एक अभिन्न अंग बनने के लिए प्रोत्साहित किया.

इस कार्यक्रम में नीति आयोग के सदस्य प्रो. रमेश चंद ने स्टार्टअप को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि आने वाला भविष्य विचारों और प्रौद्योगिकी व्यवधानों से प्रेरित होगा. उन्होंने स्टार्टअप से प्रसंस्कृत मछली के निर्यात को बढ़ावा देने, आपूर्ति श्रृंखला को सही करने, उपभोक्ताओं के लिए लागत कम करने और उत्पादक राजस्व बढ़ाने के लिए मूल्य संवर्धन पर ध्यान केंद्रित करने का आग्रह किया.

मत्स्य विभाग के सचिव डा. अभिलक्ष लिखी ने मत्स्यपालन स्टार्टअप को बढ़ावा देने के लिए सरकार के प्रयासों पर जोर दिया. उन्होंने उभरती प्रौद्योगिकियों के बारे में जागरूकता लाने के लिए मत्स्य मंथन श्रृंखला में स्टार्टअप की भागीदारी की तारीफ की.

उन्होंने शोध संस्थानों से आग्रह किया कि वे नवाचारों का व्यवसायीकरण करें और सभी स्टार्टअप्स को बढ़ावा दें, जिन में प्रारंभिक चरण में या अप्रमाणित स्टार्टअप्स भी शामिल हैं. आईसीएआर सीआईएफटी के निदेशक जौर्ज निनान ने अपने 8 शोध संस्थानों के माध्यम से लाइसैंसिंग, इनक्यूबेशन, प्रोटोटाइपिंग और व्यावसायीकरण में स्टार्टअप के लिए आईसीएआर के समर्थन पर प्रकाश डाला.

मुख्य केंद्र बिंदु वाले क्षेत्रों में मछली प्रसंस्करण उपकरण, सौर ऊर्जा से चलने वाली नावें, मूल्य संवर्धन, मछली पकड़ने का सामान, जलवायु स्मार्ट जलीय कृषि, पोषक तत्वों से भरपूर फीड और नैनो प्रौद्योगिकी उपयोग शामिल हैं.

Water Productivity : खेती में पानी की उत्पादकता बढ़ाने पर प्रशिक्षण

Water Productivity| पानी की कमी को ले कर बीते 3 मार्च, 2025 को महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के अनुसंधान निदेशालय द्वारा संचालित अखिल भारतीय समन्वित सिंचाई जल प्रबंधन अनुसंधान परियोजना के अंतर्गत कृषि अनुसंधान उपकेंद्र, वल्लभनगर पर खेती में पानी की उत्पादकता बढ़ाने के लिए 2 दिवसीय किसान प्रशिक्षण का शुभारंभ केंद्र के प्रभारी अधिकारी एवं परियोजना अधिकारी प्रोफैसर केके यादव ने किया.

प्रोफैसर केके यादव ने ‘फव्वारा पद्वति से सिंचाई’ विषय पर किसानों को सिंचाई जल की बचत करते हुए फसलों की पैदावर बढ़ाने के तरीकों पर विस्तृत जानकारी दी. कृषि महाविद्यालय, उदयपुर के उद्यानिकी प्रोफैसर श्रीधर सिंह लखावत ने ‘फलदार पौधों में ड्रिप पद्यति से सिंचाई’ विषय पर किसानों को जानकारी दी एवं गरमी के मौसम में फलदार पौधो में सिंचाई जल की आवश्यकता एवं उन के रखरखाव पर प्रकाश डाला.

प्रौद्योगिकी एवं अभियांत्रिकी महाविद्यालय, उदयपुर के तकनीकी सहायक दामिनी आर्य ने सिंचाई जल की प्रयोगशाला जांच करवाने पर अपने विचार व्यक्त किए. कार्यक्रम के अंत में केंद्र के फार्म मैनेजर धनपाल कोठारी, मनीश उज्ज्वल, सेवानिवृत्त कृषि अधिकारी नाथुलाल कुम्हार ने भी सिंचाई जल प्रबंधन पर अपने विचार रखे.

Jiji Bai : बाड़मेर की ‘जीजी बाई’ ने बनाई ग्लोबल पहचान

Jiji Bai| : थार रेगिस्तान को दुनिया के औयल मैप पर लाने वाले बाड़मेर के तेल क्षेत्रों के नाम अब एक और उपलब्धि जुड़ गई है. यहां के औयल फील्ड्स के सुदूर गांवों में बसी महिलाएं अपने कौशल से देशविदेश में जानी जा रही हैं. इसी कड़ी में अब जीजी बाई स्वयं सहायता समूह का नाम जुड़ गया है. उन के द्वारा बाड़मेर में तैयार मिलेट कुकीज यानी बाजरे के बिसकुट्स अब लंदन तक प्रसिद्ध हो चुके हैं.

‘विश्व महिला दिवस’ की पूर्व संध्या पर जीजी बाई कुकीज को ग्लोबल मार्केट से जोड़ने के लिए क्यूआर कोड मार्केटिंग की शुरुआत मंगला प्रोसैसिंग टर्मिनल के ली कैफे से की गई.

जीजी बाई के उत्पादों की सफलता को देखते हुए उन्हें हाल में दिल्ली में आयोजित इंडिया एनर्जी वीक में केयर्न, वेदांता के प्रदर्शनी स्थल में शामिल किया गया था. वहां उन के कौशल की तारीफ हुई और लोगों ने उन के बनाए उत्पादों को खूब पसंद किया. उन की सफलता की कहानियां अब देश के दूसरे क्षेत्रों में लोगों के लिए प्रेरणा बन रही हैं.

भारत की डायरेक्टर जनरल हाइड्रोकार्बन डा. पल्लवी जैन गोविल ने जीजी बाई के कार्यों की तारीफ करते हुए उन्हें दिल्ली भ्रमण का न्योता दिया.

इस से पूर्व जयपुर में हुए जयगढ़ फैस्टिवल और जयपुर लिटरेचर फैस्टिवल में भी जीजी बाई स्वयं समूह ने विदेशी मेहमानों की भरपूर प्रशंसा बटोरी. उन्हें अब लंदन स्थित प्रशंसकों से और्डर मिलने शुरू हो गए हैं.

बाड़मेर की इन महिलाओं का कौशल सिर्फ मिलेट कुकीज तक ही सीमित नहीं है, बल्कि डेयरी और कृषि क्षेत्र में भी उन्होंने अपनी अलग जगह बनाई है. ब्रह्माणी सेल्फ हेल्प ग्रुप के अंतर्गत बनी डेयरी प्रोडक्ट्स और हस्तशिल्प वस्तुएं लोगों को खूब पसंद आ रही हैं. केयर्न एंटरप्राइज सैंटर से बैंकिंग, ब्यूटीशियन, ग्रूमिंग आदि स्किल्स निखार कर वे आत्मनिर्भर बनी हैं और अपने कौशल से गांव का नाम रोशन कर रही हैं.