Buckwheat: कुट्टू उगाने की नई तकनीक

Buckwheat कुट्टू की खेती दुनियाभर में की जाती है. चीन, दक्षिण कोरिया, जापान, यूरोप, कनाडा समेत अन्य देशों में भी इस की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है. वहीं भारत की बात करें, तो उत्तरपश्चिमी हिमालयी क्षेत्रों में इस की खेती अधिक की जाती है.

किसान इस की खेती परंपरागत तरीके से करते हैं, जिस के चलते बेकार गुणवत्ता वाली कम पैदावार मिलती है. अधिक पैदावार लेने के लिए अच्छी गुणवत्ता वाली नई तकनीक को अपना कर कुट्टू (Buckwheat) की खेती की जानी चाहिए.

भूमि का चयन

कुट्टू (Buckwheat) को विभिन्न प्रकार की कम उपजाऊ मिट्टी में उगाया जा सकता है. वैसे, उचित जल निकास वाली दोमद मिट्टी इस के सफल उत्पादन के लिए सर्वोत्तम मानी गई है, लेकिन अधिक अम्लीय और क्षारीय मिट्टी इस के उत्पादन के लिए अच्छी नहीं होती है.

खेत की तैयारी

कुट्टू (Buckwheat) की अधिक पैदावार लेने के लिए खेत की तैयारी अच्छी तरह करनी चाहिए. पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए. उस के बाद 2 जुताई कल्टीवेटर या हैरो से आरपार करनी चाहिए, फिर पाटा लगा कर भूमि को समतल कर लेना चाहिए.

खाद एवं उर्वरक

कुट्टू (Buckwheat) उत्पादन के लिए खाद एवं उर्वरकों की कम मात्रा में जरूरत होती है. वैसे, मिट्टी जांच के बाद ही खाद एवं उर्वरक का उपयोग करना सही रहता है.

यदि किसी कारणवश मिट्टी की जांच न हो सके, तो यहां दी गई मात्रा के अनुसार खाद एवं उर्वरकों का उपयोग करना चाहिए :

गोबर की खाद : 10 टन

नाइट्रोजन : 40 किलोग्राम

फास्फोरस : 20 किलोग्राम

पोटाश : 20 किलोग्राम

गोबर की खाद को खेत की तैयारी से पहले खेत में समान रूप से बिखेर कर मिट्टी पलटने वाले हल से जुताई करनी चाहिए. साथ ही, फास्फोरस, पोटाश की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन की आधी मात्रा को अंतिम जुताई से पहले खेत में डालें. नाइट्रोजन की बाकी बची आधी मात्रा को बोआई के 50-60 दिन बाद खड़ी फसल में टौप ड्रैसिंग के दौरान डालें.

प्रवर्धन

ध्यान रखें कि कुट्टू (Buckwheat) का विस्तारण बीज द्वारा किया जाता है.

बीज दर

कुट्टू (Buckwheat) के उत्पादन के लिए प्रति हेक्टेयर 60-80 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है.

बीजोपचार

कुट्टू (Buckwheat) के बीज को खेत में बोने से पहले कैपरौन 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज से उपचारित करना चाहिए. इस से फसल को फफूंदी से होने वाले रोगों से बचाया जा सकता है.

बीजों को उपचारित करने के 10-15 मिनट बाद 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से दोबारा उपचारित करने के 15-20 मिनट बाद बीज की बोआई कर देनी चाहिए.

आपसी दूरी व उचित समय

कुट्टू (Buckwheat) के बीजों को हमेशा पंक्तियों में बोना चाहिए. पंक्तियों और पौधों की आपसी दूरी 20×10 सैंटीमीटर रखनी चाहिए. इस के अंकुरण के लिए 35 सैंटीमीटर सही माना जाता है. पर्वतीय क्षेत्रों में इस की बोआई मईजून माह में करनी चाहिए.

सिंचाई एवं जल निकासी

आमतौर पर कुट्टू (Buckwheat) को वर्षा आधारित फसल के रूप में उगाया जाता है. इस के सफल उत्पादन के लिए इस की फसल अवधि में फूल आने व दाने बनने के समय सिंचाई करनी चाहिए.

फसल सुरक्षा

खरपतवार नियंत्रण

चूंकि कुट्टू (Buckwheat) की फसल को खरीफ मौसम में उगाया जाता है, जिस के कारण फसल के साथसाथ खरपतवार भी उग जाते हैं, जो फसल के विकास की बढ़ोतरी और उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं.

फसल की शुरुआती अवस्था में खेत को खरपतवारों से मुक्त रखना बहुत जरूरी है, इसलिए जरूरत के अनुसार निराईगुड़ाई करनी चाहिए.

रोग नियंत्रण

पत्ती झुलसा: यह एक फफूंदीजनित रोग है. यह रोग फूल बनने या फसल की शुरुआती अवस्था में होता है. रोग की शुरुआती अवस्था में पत्तियों पर छोटेछोटे धब्बे आ जाते हैं, फिर बाद में पत्तियां गिर जाती हैं. ये छोटे धब्बे बाद में बड़े हो जाते हैं. इस वजह से पौधे की भोजन बनाने की प्रक्रिया पर बुरा असर पड़ता है. बाद में पूरा पौधा सूख जाता है.

इस रोग की रोकथाम के लिए रोग का शुरूआती लक्षण दिखाई देने पर 0.2 फीसदी कौपरऔक्साइड के घोल का पर्णीय छिड़काव करना चाहिए.

कीट नियंत्रण

आमतौर पर इस फसल पर कोई कीट नहीं पनपता है.

फसल की कटाई

बीज बोने के 40-50 दिन बाद फसल कटाई के लिए तैयार हो जाती है. जब फसल में फूल आने शुरू हो जाते हैं, तो यह कटाई की सर्वोत्तम अवस्था होती है.

कुट्टू (Buckwheat) की फसल की कटाई का सब से बढि़या समय सितंबरअक्तूबर माह का होता है यानी दानों के बनने से पहले इस की कटाई कर लेनी चाहिए.

यदि कटाई देरी से की जाती है, तो उस में रूटीन की मात्रा 6 फीसदी से घट कर 3.8 फीसदी रह जाती है. यह कटाई का समय औषधि उत्पादन के लिए सब से बेहतर है. जब कुट्टू (Buckwheat) को इस के दाने के लिए उगाया जाता है, तब दाने पूरी तरह से पक जाने के बाद ही फसल की कटाई करनी चाहिए.

मड़ाई

फसल को 2-3 दिन सुखा कर फिर उस की गहाई करनी चाहिए. फसल के दाने और भूसे को अलगअलग कर लेना चाहिए.

उपज

कुट्टू (Buckwheat) की उपज कई बातों पर निर्भर करती है, जिस में भूमि की उर्वराशक्ति, फसल उगाने की विधि और फसल की देखभाल प्रमुख है.

यदि बताई गई नई तकनीक से इस की खेती की जाए, तो तकरीबन 10-12 क्विंटल दाने की उपज मिल जाएगी.

मुनाफे के लिए अपनाएं ये तरीके

सब्जी पैदावार में भारत दुनिया का अव्वल देश है. यहां पर 12 महीने ही तरहतरह की सब्जियां उगाई जाती हैं. सब्जियां देश के तकरीबन सभी राज्यों में उगाई जाती हैं.

सब्जियों की ज्यादा पैदावार से हमें अपने भोजन में पोषक तत्त्व आसानी से मिल हो जाते हैं. एक तरफ ज्यादा पैदावार से जहां आम लोग भी आसानी से सब्जियां खरीद लेते हैं, वहीं ज्यादा पैदावार से कीमत भी काफी कम रहती है. किसान अब नई तकनीक अपना कर सब्जियों की खेती कर के अच्छा मुनाफा कमा लेते हैं.

ज्यादातर भारतीय किसान की दिक्कत यह है कि वे अभी तक परंपरागत तौरतरीकों से ही खेती कर रहे हैं. इसलिए उन्हें मेहनत के बराबर फायदा नहीं मिल पाता, लेकिन यदि किसान वैज्ञानिक तरीके से खेती करें तो उन्हें पहले से ज्यादा मुनाफा मिल सकता है, लेकिन इस के लिए किसानों को लीक से हट कर काम करना होगा. ऐसा करने से सब्जियों की पैदावार तो बढ़ेगी ही, साथ ही उन की फसल की कीमत भी कम हो जाएगी.

हम आप को ऐसा तरीका बता रहे हैं, जिसे अपना कर आप कम लागत में ज्यादा मुनाफा कमा सकते हैं.

यदि किसान जागरूक है तो वह सब्जियों की खेती से ज्यादा फायदा उठा सकते हैं. इस के लिए किसान जनवरी में राजमा, शिमला मिर्च, मूली, पालक, बैगन और कद्दू की खेती कर सकते हैं.

सब्जियों की बोआई के लिए खेत की अच्छी तरह जुताई करें, फिर गीली भुरभुरी मिट्टी की मेंड़ बना कर उस में 4 से 5 इंच की दूरी पर बीज डाल दें. उस के बाद मेंड़ को प्लास्टिक से ढक दें.

इतना करने के बाद कुछ ही दिन में जैसे ही बीज अंकुरित हों, पौधे की जगह पर प्लास्टिक में छेद कर के पौधे को बाहर निकाल दें. पौधे निकालने में किसानों को काफी सावधानी से काम लेना होगा वरना अंकुर टूटने से पौधे खराब हो जाएंगे.

इस तरीके से खेती करने में किसानों को ज्यादा मुनाफा होगा, क्योंकि इस में न तो ज्यादा पानी की जरूरत होती है और न ही ज्यादा लागत आती है.

परंपरागत खेती में जहां कीड़े लगने का खतरा रहता है, वहीं इस तरीके से खेती करने में कीड़े भी नहीं लगते और ज्यादा सिंचाई की भी जरूरत नहीं पड़ती, क्योंकि प्लास्टिक से ढके होने के चलते नमी बरकरार रहती है.

पानी में उर्वरक मिला कर मेंड़ों में डाल दिया जाए तो वह हर पौधे की जड़ में पहुंच जाता है. पौधे के ऊपर पानी टपका कर भी सिंचाई हो जाती है. प्लास्टिक से ढकने के कारण नीचे नमी भी रहती है.

यह नई तरकीब किसानों के लिए काफी कारगर साबित हो रही है. इस के जरीए मेंड़ों पर न तो घास पैदा होती है और न ही कीटपतंग फसल को बरबाद करते हैं.

इस के अलावा प्लास्टिक बिछाने से एक फायदा यह भी होता है कि घास प्लास्टिक के नीचे ही रहती है और पेड़ों तक नहीं पहुंच पाती. पौधों को बीमारी व कीटों से बचाने के लिए आर्गेनिक दवा का छिड़काव काफी आसानी से किया जा सकता है और दवा भी काफी कम मात्रा में लगती है.

यदि किसानों को खेती से ज्यादा से ज्यादा मुनाफा लेना हो तो वे समयसमय पर नईनई तकनीक अपना कर अपनी पैदावार बढ़ा सकते हैं.

उद्यानिकी फसल से किसान की आय में हुआ इजाफा

खंडवा : परंपरागत खेती से हट कर कुछ अलग किया जाए या कृषि में नई तकनीकों को अपना कर खेती की जाए, तो निश्चित ही खेती में मुनाफा बढ़ता है खासकर उद्यानिकी फसलों में यह देखने में आया है कि जिस ने भी इस में काम किया, उसे खेती में पहले से अधिक फायदा हुआ.

इसी बात को ले कर हम यहां किसान आंनद राम पटेल की बात कर रहे हैं. वे गांव धनगांव विकासखंड छैगांवमाखन जिला खंडवा के रहने वाले हैं. अभी तक उन के द्वारा परंपरागत तरीके से कपास की खेती 2.40 हेक्टेयर में की जाती थी, जिस में किसान को शुद्ध मुनाफा मात्र 1.82 लाख रुपए मिलता था.

उपसंचालक, उद्यान, अजय चौहान ने बताया कि उद्यानिकी विभाग द्वारा किसान को खीरा फसल की खेती के बारे में तकनीकी मार्गदर्शन दिया गया, जिस से प्रोत्साहित हो कर किसान ने 2.40 हेक्टेयर में ड्रिप व मल्चिंग पद्धती अपना कर खीरा की फसल लगाई, जिस से किसान को कुल उत्पादन 1100 क्विंटल प्राप्त हुआ, जिस का बाजार मूल्य 15.50 लाख रुपए प्राप्त हुए. इस में किसान को कुल खर्च लगभग 6 लाख रुपए आया. इस प्रकार किसान को शुद्ध लाभ 9.50 लाख रुपए प्राप्त हुआ, जिस से किसान की आय में वृद्धि हुई.

समय प्रबंधन से बदल सकती है गन्ना किसानों की हालत

परंपरागत खेती में किसान जहां गन्ना-पेड़ी-गेहूं, गन्ना-पेड़ी-गेहूं फसलचक्र अपना रहे हैं, उस में फौरन बदलाव की जरूरत है. इस फसलचक्र को अपनाने से किसान भाइयों को काफी नुकसान हो रहा है. गेहूं काट कर देरी से गन्ने की बोआई होती है, तो गन्ने की उपज बहुत कम (औसतन 375-400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर) हासिल होती है. साथ ही देरी से (जनवरी के अंत में) बोआई करने पर गेहूं की पैदावार औसतन 20-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हासिल होती है, जो काफी कम है.

वहीं दूसरी ओर ज्यादा पैदावार लेने के प्रयास में किसान भाई ज्यादा मात्रा में खादबीज का इस्तेमाल कर के उत्पादन लागत बढ़ा रहे हैं. इस से किसानों को दोहरी हानि का सामना करना पड़ रहा है. ऐसे हालात में यह जरूरी है कि हम नए अंदाज में खेती करना शुरू करें, जिस के लिए जरूरी है कि हम सब से पहले अपने फसलचक्र में बदलाव करें.

जिस खेत में गन्ना बोना है, उस में रबी की फसल काटने के बाद किसान ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई कर के खेत का सौरीकरण करें. फिर उस में हरी खाद लेने के लिए ढैंचे की बोआई करें. अगस्त में ढैंचे को खेत में पलट कर रोटावेटर से अच्छी तरह मिला लें. इस के बाद सितंबर के पहले व दूसरे हफ्ते में गन्ने की बोआई करें (बरसात को देखते हुए गन्ने की बोआई करें). इस समय बोए गए गन्ने का जमाव अच्छा होता है और बढ़वार तेज गति से होती है. अच्छी तरह देखभाल किए गए गन्ने की अगले साल पेराई सत्र में औसतन 1,000-1,200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से उपज आसानी से हासिल की जा सकती है. यहां किसानों के मन में यह सवाल आना लाजिम है कि उन की खरीफ व रबी की 2 फसलों (धान व गेहूं) का नुकसान हो रहा है, लेकिन सचाई कुछ और है.

अब किसानों के मन में सवाल आता है कि उन्हें अपने घरेलू इस्तेमाल के लिए भी धान व गेहूं चाहिए. इस के लिए सुझाव है कि वे अपने खेत को इस तरह बांटें कि जरूरत के मुताबिक उन्हें धान, गेहूं व दूसरी फसलें भी मिल जाएं, उत्पादन लागत भी घटे और प्रति इकाई क्षेत्रफल से ज्यादा पैदावार भी मिले. तभी हम खेती को लाभकारी बना सकते हैं, वरना आप समझ गए होंगे कि ज्यादा उत्पादन लागत लगा कर भी हमें शुद्ध लाभ के रूप में मात्र 95,000 रुपए की आमदनी होती है, जबकि कम लागत से 1,80,000 रुपए की आमदनी हो सकती है.

सर्वोत्तम मिलेट्स मिशन – मोटे अनाज हैं पोषण का भण्डार

रीवा: देश भर में मिलेट्स मिशन चलाया जा रहा है. रीवा जिले में भी कृषि के विविधीकरण के प्रयासों के तहत मोटे अनाजों की पैदावार बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं. मोटे अनाज उगाने के लिए बड़ी संख्या में किसानों ने प्राकृतिक खेती के लिए पंजीयन कराया है. अन्य अनाजों की तुलना में मोटे अनाज आसानी से पचने वाले और अधिक पोषण देने वाले होते हैं. मोटे अनाजों में फाइबर, प्रोटीन, विटामिन और कई तरह के खनिज पाए जाते हैं. मोटे अनाज प्राकृतिक रूप से ग्लूटेन फ्री होते हैं. मोटे अनाज उगाने के लिए परंपरागत खेती की विधियाँ उपयुक्त हैं. इसलिए मोटे अनाज मिट्टी के स्वास्थ्य और पर्यावरण की सुरक्षा में भी सहायक होते हैं.

इस संबंध में उप संचालक कृषि यूपी बागरी ने बताया कि रीवा जिले ही नहीं पूरे विंध्य क्षेत्र में 50 वर्ष पूर्व तक मोटे अनाजों की बड़े पैमाने पर खेती होती थी. कोदौ, ज्वार, मक्का तथा अन्य मोटे अनाज मुख्य रूप से मेहनतकशों और गरीबों का भोजन थे. कम बारिश में भी इनकी अच्छी फसल होती थी.

मोटे अनाजों को कई सालों तक बिना किसी दवा के सुरक्षित भण्डारित रखा जा सकता है. मोटे अनाजों की खेती परंपरागत विधि से की जाती थी. खेती का आधुनिकीकरण होने तथा अधिक उत्पादन के लिए रासायनिक खाद एवं अन्य खादों का उपयोग करने के कारण मोटे अनाजों की खेती कम हो गई. इनका उत्पादन अपेक्षाकृत कम होता है, लेकिन इनकी पोषकता अधिक होती है. इसलिए शासन द्वारा मिलेट्स मिशन के माध्यम से मोटे अनाजों की खेती को बढ़ावा देने के प्रयास किए जा रहे हैं.

चावल और गेंहू के कुल कृषि आच्छादन में 20 प्रतिशत की कमी करके इनके स्थान पर मोटे अनाजों की खेती का लक्ष्य रखा गया है. इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए देश में 10.8 लाख टन मोटे अनाजों की खेती करनी होगी. मोटे अनाजों की खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने इनका न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करना शुरू किया है.

जीरो फॉर्मिंग के जरिए किसान होगा आत्मनिर्भर

बस्ती : खेती में रसायनों के अधिक प्रयोग से अधिक पानी की आवश्यकता होती है, लगातार रासायनिक खाद के उपयोग से उपजाऊ से उपजाऊ भूमि के उपज क्षमता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है.

रासायनिक खाद से उपजे अनाज से मनुष्य के अंदर के कहीं न कहीं धीमा जहर भी पहुंच रहा है. इससे लोग तरह-तरह की बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं. अगर स्वस्थ जीवन जीना है, तो प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहन करना जरूरी है.

भारत सरकार ने “नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फॉर्मिंग” के अंतर्गत किसानों की आर्थिक हालत में सुधार के लिए कई कदम उठाए जाने का ऐलान किया है, जिसमें जीरो बजट खेती मुख्य बिन्दु है.

जीरो फॉर्मिंग के जरिए कृषि के पारंपरिक और मूलभूत तरीके पर लौटने पर जोर दिया जा रहा है. जीरो बजट फॉर्मिंग में किसान जो भी फसल उगाएंगे उसमें फर्टिलाइजर, कीटनाशकों के स्थान पर प्राकृतिक खेती के तरीकों को अपनाएंगे. इसमें रासायनिक खाद के स्थान पर खरपतवार से बनी देशी खाद, गोबरखाद, गौमूत्र, चने के बेसन, गुड़ और मिट्टी से बनी खाद आदि का इस्तेमाल किया जाता है.
देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की अधिकांश आबादी आजीविका के लिए कृषि पर आधारित हैं . कृषि क्षेत्र से ही सबसे ज्यादा रोजगार मिलता हैं .

प्रदेश में किसानों के हित से जुड़ी अनेकों योजनाएं संचालित की जा रही हैं. किसान को आत्मनिर्भर बनाने के लिए गोवंश आधारित जीरो बजट प्राकृतिक को प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिससे कम लागत में अधिक उत्पादन हो और किसानों की आय बढ़ सके. जीरो बजट की प्राकृतिक खेती किसान की आय दोगुनी करने का सबसे सस्ता माध्यम है. प्रदेश में निराश्रित गोवंश पशुशालाओं को गौ आधारित प्राकृतिक कृषि एवं अन्य गौ उत्पादों को प्रशिक्षण केन्द्र में विकसित किया जा रहा है, जो बुंदेलखण्ड को जीरो बजट खेती के माध्यम से संभव हो सकेगा. प्राकृतिक कृषि को बढ़ावा देने के लिए विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में भी शामिल किया गया है.

गोवंश आधारित प्राकृतिक खेती का मुख्य आधार देसी गाय है. गोबर, गौमूत्र और कुछ कृषि उत्पादों को मिलाकर बनने वाले जीवामृत और घनजीवामृत में जमीन को उपजाऊ बनाने और फसल को पोषण देने की पर्याप्त क्षमता होती है. निराश्रित गायों के पालनपोषण के लिए गोपालकों को प्रति माह प्रति गाय 1500 रूपये की सहायता राशि प्रदान की जा रही है. देसी गायों के पालन और उनके गोबर के इस्तेमाल से बेहतर खेती की जा सकती है और काफी पानी बचाया जा सकता है. ऐसे में सूखे का दंश झेलने वाले बुंदेलखण्ड में प्राकृतिक खेती किसी अचंभे से कम नहीं है.

कम खर्च में अधिक पैदावार प्राकृतिक खेती का मुख्य उद्देश्य है. किसानों को महंगे बीज, रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों की खरीद के चंगुल से मुक्त कराना है. किसान प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग कर खेती कर आत्मनिर्भर हो जायेंगे. कम लागत लगने से खेती करने पर किसानों को अधिक मुनाफा प्राप्त होता है.

सोने पे सुहागा यह है कि इस विधि से जो भी फसल उगाई जाती है वह सेहत के लिए काफी लाभदायक होती है, क्योंकि इसे उगाने के लिए किसी भी तरह के रासायनिक पदार्थाे का इस्तेमाल नहीं किया जाता. इन्हीं विशेषताओं के कारण योगी सरकार प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित कर रही है.

प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए केन्द्र पोषित “नेशनल मिशन ऑन नेचुरल फॉर्मिंग” के अंतर्गत प्रदेश सरकार ने प्रदेश के 49 जनपदों की 85710 हेक्टेयर भूमि पर प्राकृतिक खेती कराने की व्यवस्था की है ,जिसे भारत सरकार ने स्वीकृति सहित धनराशि दे दी है.

राज्य सेक्टर से बुंदेलखण्ड के समस्त जनपदों में 23500 हेक्टेयर क्षेत्र में गौ-आधारित प्राकृतिक खेती कार्यक्रम संचालित करते हुए कार्य शुरू हो गए है.

गंगातट के 1038 ग्राम पंचायतों में व्यापक रूप से प्राकृतिक खेती 27 जिलों, 21 नगर निकाय, 1038 ग्राम पंचायतों और 1648 राजस्व ग्रामों में आयोजित गंगा यात्रा के दौरान प्राकृतिक खेती के प्रति किसानों को विशेष रूप से जागरूक किया गया.

गंगा के तटवर्ती दोनों ओर नमामि गंगे परियोजना के तहत व्यापक रूप से प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित किया जा रहा है. गंगा किनारे कुल 4909 क्लस्टरों के 92180 हेक्टेयर क्षेत्र में प्राकृतिक खेती कराई जा रही है. पहले चरण में 1038 ग्राम पंचायतों में मास्टर ट्रेनर तैयार किये जा रहे हैं, जो गांवों में जाकर किसानों को गो आधारित खेती का प्रशिक्षण दे रहे हैं.

गंगा किनारे गंगा मैदान, गंगा उद्यान, गंगा वन तथा गंगा तालाब को विकसित किया जा रहा है, जो प्राकृतिक खेती के लिए काफी सहायक होंगे.

कृषि विज्ञान केन्द्रों और विश्वविद्यालयों के माध्यम से न सिर्फ प्राकृतिक कृषि का प्रशिक्षण दिया जा रहा है, बल्कि अधिक से अधिक किसानों को इसके प्रति प्रोत्साहित भी किया जा रहा है. मुख्य उद्देश्य प्राकृतिक खेती का रकबा बढ़ाना है. प्राकृतिक कृषि उत्पाद मूल्यों का उचित मूल्य मिल सकें, इसके लिए भी सरकार द्वारा व्यापक कार्य किये गये हैं.

प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गो आधारित प्राकृतिक खेती के लिए बुंदेलखण्ड के 07 जनपदों के 47 विकासखण्डों में योजना की शुरूआत कर दी है. प्रत्येक ब्लाक में 500 हेक्टेयर क्षेत्र में चरणबद्ध ढंग से विकसित किया जा रहा है. प्रथम चरण में (वर्ष 2022-23 से 2025-26) में 23500 क्लस्टर व दूसरे चरण में (वर्ष 2023-24 से 2026-27) में 235 क्लस्टर कुल 2350 हेक्टेयर भूमि में प्राकृतिक खेती किये जाने का प्राविधान किया गया है. प्रत्येक क्लस्टर 50 हेक्टेयर क्षेत्रफल का होगा.

जनपद स्तर पर समस्त कृषि कर्मी, कृषि वैज्ञानिकों, प्राकृतिक खेती से जुड़े कृषकों को प्रशिक्षण दे रहे है. प्रदेश सरकार द्वारा प्राकृतिक खेती हेतु किसानों को प्रोत्साहन स्वरूप आवश्यक सहयोग भी दिया जा रहा है.

युवा किसान (Young Farmer) की पहल : औषधीय खेती, आमदनी बढ़ाने में मददगार

आजकल देश के किसान जिन हालात से दोचार हो रहे हैं, ऐसे में अब हर कोई नौकरियों की तरफ भागने लगा है. इस की वजह सरकार की खेती को ले कर ढुलमुल नीतियां, कृषि उत्पादों के सही दाम न मिलना और बाजार की समस्या खास है. यही वजह है कि किसान सरकार के ऊपर खुल कर अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं.

यही वजह है कि किसान खेतों से निकल कर सड़कों पर उतर खेती को उद्योग की तरह सहूलियतें देने की मांग भी करने लगे हैं, क्योंकि किसान के लिए खेत में अनाज, सब्जियां, फल, फूल, औषधियां उगाना आसान है लेकिन उस की कीमत तय होने से ले कर मार्केटिंग तक के लिए सरकार और बिचौलियों के भरोसे पर निर्भर रहना पड़ता है. यही वजह है कि किसान अकसर खेती में घाटा सहने के लिए मजबूर हो जाते हैं.

किसानों की इन्हीं समस्याओं को देख कर उत्तर प्रदेश के गोरखपुर शहर के पादरी बाजार के रहने वाले अविनाश कुमार ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महकमे की नौकरी छोड़ कर औषधीय खेती की राह पकड़ी तो फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. इस के चलते उन्होंने उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड के हजारों किसानों की आमदनी में इजाफा करने में भी कामयाबी पाई है.

ऐसे बढ़ा रुझान 

अविनाश कुमार ने पुलिस की नौकरी के दौरान कई बार गांवों में जाने पर यह देखा कि किसान पारंपरिक खेती के चलते और उत्पाद का सही दाम न मिलने के चलते गरीबी, तंगहाली से अकसर जूझते रहते हैं. ऐसे में खेती में घाटे और कर्ज के दबाव के चलते वे खुदकुशी करने जैसा कदम उठाने से भी नहीं हिचकते हैं.

इसी बात ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया और उन्होंने पुलिस महकमे की नौकरी से इस्तीफा दे कर किसानों की माली हालत सुधारने की कोशिश शुरू कर दी. इस दौरान उन्होंने किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए जानकारियां इकट्ठा की तो पता चला कि बदहाली की खास वजह उन की फसल का वाजिब दाम न मिलना और बिचौलयों का दबदबा है.

इस के बाद अविनाश कुमार ने पारंपरिक खेती से हट कर औषधीय पौधों की जैविक व प्राकृतिक विधि से खेती सीखने के लिए देश के विभिन्न राज्यों के कृषि विश्वविद्यालयों, कृषि विज्ञान केंद्रों और दूसरी संस्थाओं का दौरा किया और विश्वविद्यालयों द्वारा आयोजित विभिन्न कार्यशालाओं में भाग लिया जहां उन्हें न केवल औषधीय खेती से जुड़ी तकनीकी जानकारी हासिल हुई, बल्कि वहीं से उन्होंने अनुबंधित खेती के बारे में जाना और तमाम जानकारियां जुटाई.

उन्होंने तमाम आयुर्वेदिक उत्पाद बनाने वाली कंपनियों से बात कर किसानों की औषधीय फसलों को खरीदे जाने का अनुबंध किया और साल 2016 में सब से पहले अपने 2 एकड़ खेत से ब्रह्मी और कौंच के औषधीय पौधों की जैविक विधि से खेती की शुरुआत की. इस की फसल तैयार होने के बाद उन्होंने कंपनियों से अनुबंध करने के चलते फसल को अच्छे दामों पर बेचा. यहीं से उन्होंने किसानों से अनुबंधित औषधीय खेती किए जाने के लिए संपर्क करना शुरू किया.

अविनाश कुमार से जो भी किसान जुड़े, उन्हें औषधीय खेती से अच्छी आमदनी होनी शुरू हो गई, जिस का नतीजा यह रहा कि आज पूरे देश से इन के साथ तकरीबन 2,000 से ज्यादा किसान जुड़ कर 800 एकड़ खेत में औषधीय फसल ले रहे हैं और उस का सीधा फायदा पा रहे हैं.

जमीनों को बनाया उपजाऊ 

अविनाश कुमार ने औषधीय खेती के जरीए न केवल किसानों की माली हालत सुधारी, बल्कि उन्होंने बंजर, ऊसर और बेकार पड़ी जमीनों को भी खेती लायक बना कर उस पर औषधीय खेती की शुरुआत कराई. इस के लिए उन्होंने जैव उर्वरकों, जैविक खादों व जैविक कीटनाशकों का सहारा लिया.

औषधीय पौधों की खेती 

अविनाश कुमार से जुड़ कर किसान कम लागत में ज्यादा मुनाफे की विधि पर खेती करते हैं. जिन औषधीय पौधों की खेती वे कराते हैं, वे बारिश पर आधारित होती हैं और पारंपरिक फसलों की तुलना में कम सिंचाई और कम लागत वाली होती हैं. वे ऐसे औषधीय फसलों को बढ़ावा देते हैं जिन से पारंपरिक फसलों की तुलना में ज्यादा मुनाफा होता है.

आज इस विधि से अविनाश कुमार की संस्था के साथ बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ के तकरीबन 2,000 किसान प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ कर औषधीय पौधों की जैविक विधि से खेती कर रहे हैं.

जिन औषधीय फसलों को किसान ले रहे हैं उन में ब्रह्मी, मंडूकपर्णी, वच, तुलसी, कालमेघ, कौंच, भुई आंवला, कुठ, कुठकी, कपूर, कचरी, चियां, अर्जुन जैसी फसलें शामिल हैं.

किसानों की करते हैं मदद

अविनाश कुमार किसानों की माली हालत सुधारने के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं. इस से किसानों को गुणवत्ता वाली औषधीय फसलों का ज्यादा उत्पादन मिल सके.

इस के लिए किसानों को मुफ्त बीज के साथ ही जरूरी तकनीकी और व्यावहारिक ट्रेनिंग देने का काम करते हैं. वे किसानों को नर्सरी तैयार करने से ले कर, खेत की तैयारी, उन्नतशील बीजों का चयन, सिंचाई, मड़ाई, भंडारण वगैरह की जानकारी भी मुहैया करा रहे हैं.

तैयार फसल बेचने के लिए किसान को भटकना नहीं पड़ता है क्योंकि अनुबंधित खेती के चलते अविनाश कुमार की संस्था ‘सबला सेवा संस्थान’ किसानों के औषधीय फसल की सुनिश्चित खरीदारी भी करती है.

बिचौलियों का दबदबा खत्म

किसानों की बदहाली की अहम वजह है उन की खेती का लागत के मुताबिक दाम न मिल पाना. सरकार द्वारा किसानों के फसल का जो न्यूनतम मूल्य तय भी किया जाता है, उस में बिचौलियों और अधिकारियों के गठजोड़ के चलते उन की फसल मंडियों और सरकार के खरीद केंद्रों पर बिक नहीं पाती है. ऐसे किसान अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए औनेपौने दाम पर अपनी फसल बेचने को मजबूर हो जाता है.

अविनाश कुमार ने किसानों को ऐसे हालात से उबारने के लिए किसानों और कंपनियों के साथ अनुबंधित खेती की शुरुआत की है, जिस से किसान सीधे अपनी औषधीय फसल को आयुर्वेदिक दवाओं को बनाने वाली कंपनियों को बेच पाते हैं. इस वजह से किसान को अपनी फसल को बेचने के लिए परेशान होना पड़ता है. बिचौलियों का दबदबा खत्म होने से फसल के वाजिब दाम भी किसानों को मिलने लगा है, जिस से किसानों की आमदनी में इजाफा भी हुआ है.

जैविक विधि से होती खेती

औषधीय फसलों में रासायनिक खादों और कीटनाशकों के इस्तेमाल से न केवल उस की गुणवत्ता प्रभावित होती है, बल्कि उस के औषधीय गुणों में कमी आ जाती है, इसलिए औषधियों को बनाने वाली कंपनियां ऐसे औषधीय फसलों की खरीदारी नहीं करतीं तभी तो अविनाश कुमार किसानों के साथ अनुबंधित खेती करा रहे हैं.

अनुबंधित किसानों द्वारा की जाने वाली औषधीय खेती में जैविक खादों और जैविक कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं जिस से औषधीय कंपनियां किसानों की फसल की अच्छी कीमत देती हैं.

अविनाश कुमार ने झारखंड के खूंटी इलाके में आदिवासियों के साथ अनुबंधित खेती कर के उन की माली और सामाजिक हालत में सुधार करने में भी कामयाबी पाई है.

उन्होंने बताया कि आने वाले साल में वे किसानों द्वारा औषधीय फसल की प्रौसैसिंग पर भी काम करने वाले हैं. उत्पादित फसल को विदेशों में निर्यात किए जाने पर भी वे काम कर रहे हैं, ताकि उन के साथ जुड़ कर खेती करने वाले किसानों को और ज्यादा फायदा मिल सकेगा.

अविनाश कुमार ने बताया कि अनुबंधित खेती के जरीए किसान लागत के मुकाबले 80 फीसदी ज्यादा मुनाफा ले रहे हैं. उन का कहना है कि अगर खेती से दूरी बना चुके नौजवान पारंपरिक खेती की जगह उन के नक्शेकदम पर खेती करें तो उन्हें नौकरियों से ज्यादा पैसे की कमाई हो पाएगी.

अविनाश कुमार से जुड़ कर कोई भी किसान औषधीय फसलों की अनुबंधित खेती करना चाहता है तो उन के मोबाइल फोन नंबर 9430502802 पर संपर्क कर सकता है.

गेंदा का रकबा बढाने के लिए उद्यान विभाग की अनूठी पहल

झाबुआ : कलक्टर नेहा मीना के मार्गदर्शन में उद्यान विभाग द्वारा गेंदे की खेती का रकबा बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं, जिस में विकासखंड थांदला व पेटलावद में ट्रांसफौम रूरल इंडिया फाउंडेशन (टीआरआई) संस्था और कृष्ण संकुल आदिवासी महिला फार्मर प्रोडयुसर कंपनी द्वारा उद्यान विभाग के साथ क्लस्टर तैयार कर गेंदे की खेती को बढ़ावा देने के लिए नवाचार किए गए.

उसी कड़ी में विकासखंड रामा में गेंदे की खेती का रकबा बढ़ाने के लिए विकासखंड अधिकारी मानु चौबे द्वारा इंदौरअहमदाबाद राजमार्ग के आसपास के गांव भंवर पिपलिया, राछवा, कोकावद व भुरा डाबरा के किसानों का चयन कर उन्हें उन्नत किस्म कलकत्ती गेंदे के पौधे किसानों दिए गए.

गेंदे के पौध की कीमत 2.00 रुपए प्रति पौध थी, जिस में से 1.00 रुपए प्रति पौध किसानों के द्वारा व बाकी शेष राशि 1.00 रुपए प्रति पौध विकासखंड अधिकारी मानु चौबे के द्वारा दिए गए. उन्हें बतलाया गया कि विकासखंड रामा में पारंपरिक खेती को छोड़ फूलों की खेती का रकबा बढ़ाने के उदेश्य से किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए मेरे द्वारा प्रति पौधा 1.00 रुपए का सहयोग किया गया. इन किसानों को तकनीकी सहयोग कर गेंदे की खेती करवाई जाएगी और उपज प्राप्त होने पर किसानों से उक्त राशि प्राप्त की जाएगी.

जमीन और जल संरक्षण (Land and water conservation) : किसान अपनाएं अच्छी उपज पाएं

जमीन से अच्छी पैदावार लेने के लिए किसान आज अनेक उम्दा बीज और खाद के साथसाथ अपनी मेहनत में कोई कसर नहीं छोड़ते लेकिन इस के बाद भी कई बार किसानों को वह नतीजा नहीं मिल पाता जिस की उन्हें उम्मीद थी. कभीकभी तो फसल की लागत भी नहीं निकल पाती.

अच्छे खादबीज के साथसाथ ऐसी अनेक बातें भी हैं जिन का ध्यान किसानों को रखना जरूरी है तभी फसल से सही पैदावार मिलेगी.

हमारे देश में अलगअलग इलाकों में अलगअलग जलवायु परिवर्तन होता है. हमें उसी के अनुसार अपने काम को अंजाम देना होगा. कहीं बरसात अधिक है तो कहीं कम. कहीं गरमीसर्दी अधिक है तो कहीं कम. इस के अलावा अनेक किसानों के पास खेती के पूरे संसाधन भी नहीं हैं जिन के इस्तेमाल से वह पार पा सके.

जिन किसानों के पास खेत में पानी देने के लिए सही साधन नहीं हैं तो वे कम पानी वाली और कम समय में तैयार होने वाली फसलें बोएं या बरसात पर आधारित फसलें बोएं. खेत की मेंड़बंदी अच्छी तरह से करें जिस से बरसात के पानी का सही इस्तेमाल हो सके.

संभव हो तो खेत में हर साल सड़ी गोबर की खाद जरूर डालें. जरूरत होने पर ही रासायनिक खाद या रासायनिक कीटनाशक का इस्तेमाल करें. देशी खाद से हमारे खेत की पैदावार बढ़ती है और खेत की मिट्टी को कम पानी की जरूरत होती है.

इस के अलावा हरी खाद खेत के लिए बहुत ही फायदेमंद है. हरी खाद तैयार करने वाली फसलें जैसे ढैंचा, ग्वार वगैरह को खेत में उगाएं और 40-45 दिन की फसल होने पर उसे खेत में जोत कर मिला दें और पानी भर दें जिस से वह सड़गल कर खाद बन जाएगी.

जिन इलाकों में सिंचाई की खास सुविधा नहीं है या कम पानी मिलता है वहां पर सिंचाई के आधुनिक तरीके अपनाएं, जैसे फव्वारा या टपक सिंचाई से खेती करें. इन तरीकों से सब्जी की अच्छी फसल ली जा सकती है.

खेत में पानी लगाने के लिए कच्ची नाली के बजाय प्लास्टिक के पाइपों का इस्तेमाल करें. इस में पानी बरबाद नहीं होगा. बरसात के दिनों में खेतों को खाली न छोड़ें. खेत खाली रहने पर खेत की मिट्टी के कटने का डर बना रहता है. इन दिनों खेतों में दलहन फसल, मक्का वगैरह बोई जाती है.

मिल कर करें काम

बारिश का पानी ज्यादातर ढलानों से बहता हुआ नदीनालियों में जाता है. उस के बाद आखिर में समुद्र में मिल जाता है. बरसात के पानी को अनेक वैज्ञानिक और परंपरागत तरीकों से स्टोर किया जा सकता है. इस बरसात के पानी को अगर इकट्ठा करें तो आड़े वक्त में यह हमारे काम आता है.

वर्षा जल संरक्षण के लिए सरकार की तमाम योजनाएं हैं. अनेक संस्थाएं भी इस दिशा में काम कर रही हैं. आप भी इस तरह की तकनीकी जानकारी ले कर आगे बढ़ सकते हैं. ऐसे काम अकेले करना कठिन होता है. अगर आप समूह बना कर काम करेंगे तो आसानी होगी और अच्छे नतीजे भी मिलेंगे.

सब लोग आपस में मिल कर गांव में सामुदायिक जमीन पर तालाब बनाएं जिस में बरसात का पानी इकट्ठा किया जा सके और जब पानी की कमी हो उस समय पंप लगा कर खेतों की सिंचाई की जा सके.

पहाड़ी इलाकों में गांव के आसपास बरसाती पानी इकट्ठा करने के लिए चकडैम लगवाएं. इस से जमीन के जलस्तर में भी बढ़ोतरी होगी. ये कुछ ऐसी बातें हैं जिन्हें अपना कर आने वाले समय में आप फायदा उठा सकते हैं और पर्यावरण की बेहतरी के लिए भी एक अच्छा कदम है.

अधिक जानकारी के लिए आप अपने नजदीकी केंद्रीय मृदा एवं जल संरक्षण अनुसंधान एवं प्राथमिक संस्थान से संपर्क कर सकते हैं.

होने वाले फायदे

* पानी की रोकथाम और बचत करने के अनेक तरीकों से हम पानी का जलस्तर बढ़ा सकते हैं जिस से हमें हमेशा पानी मिलता रहेगा.

* बरसात में जमीन कटाव की रोकथाम करें जिस से उपजाऊ मिट्टी बह कर नहीं जाएगी और कृषि योग्य जमीन में पोषक तत्त्वों का संरक्षण होगा.

* फसल और पेड़पौधे अधिक होने पर उम्दा पैदावार मिलेगी और पर्यावरण में भी सुधार होगा.

* किसान और पशुओं के लिए भरपूर मात्रा में चारा और खाद्यान्न मिलेंगे.

पहले हम खुशहाल थे

‘जय जवान, जय किसान’ का नारा देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने दिया था. आजादी के बाद कई पंचवर्षीय योजनाओं में किसानों को काफी तवज्जुह दी गई. इन 7 दशकों में देश के अंदर काफी बदलाव आया, लेकिन इतना लंबा अरसा बीत जाने के बाद भी किसानों के हालात नहीं बदले हैं.

यह बात और है कि पहले के मुकाबले खेती के कामों में भी तकनीक का सहारा ज्यादा से ज्यादा लिया जाने लगा है. यहां तक तो ठीक है, लेकिन जो सब से अहम मुद्दा है, वह उन की मेहनत के मुताबिक आमदनी है जो आज तक नहीं मिल पा रही.

पहले के समय में और अब खेतीकिसानी करने में क्या अहम फर्क आया है, इस बारे में हम ने उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से तकरीबन 200 किलोमीटर दूर गांव खैरई के बुजुर्ग किसान मुश्ताक हुसैन से बात की.

उन्होंने बताया कि आज के दौर में जिस तरह से खेती की जा रही है, पहले के दौर में ऐसा नहीं था. अब खेतों की जुताई चंद मिनटों में हो जाती है, जबकि पहले कई घंटे का समय लगता था.

पहले भी सरकार की तरफ से किसी तरह की कोई मदद नहीं मिलती थी और अब भी नहीं मिलती है, लेकिन अब गाहेबगाहे अखबारों से यह जरूर सुनने को मिल जाता है कि इस बार की सरकार किसानों के लिए काफी अच्छे काम करेगी, लेकिन कुरसी मिलते ही हमें भुला दिया जाता है. न तो हमें अच्छे किस्म के बीज मिल पाते हैं और न ही खाद.

इस से अच्छा तो पहले का समय था, जब इन सब के लिए किसानों को किसी का मुंह नहीं देखना पड़ता था. जो भी काम करना होता था, हम सब मिल कर करते थे.

मुश्ताक हुसैन से जब यह पूछा गया कि पहले और अब में  क्या फर्क है, इस के जवाब में उन्होंने कहा, ‘‘बेटा, बहुत फर्क है. तुम सोच भी नहीं सकते. पहले के जमाने में इतने संसाधन भले ही न रहे हों, लेकिन सभी गांव के किसानों में बड़ा लगाव होता था, अपनापन होता था. अब की तरह ट्रैक्टर नहीं थे, लेकिन सभी के घरों के बाहर अच्छी नस्ल के एक जोड़ी बैल जरूर बंधे होते थे. अब बहुत कम लोग एकदूसरे की मदद करते हैं, लेकिन पहले कई किसान मिल कर बारीबारी से सभी किसानों का खेत जुतवाते थे.

‘‘अब मशीनों का जमाना आ गया है, इसलिए हर काम जल्दी होने लगा है. पहले के वक्त में अप्रैल से मई तक गेहूं की फसल काटी जाती थी, बदले में हम उन्हें अनाज देते थे.

‘‘गांव के लोग इस में दलित, कुम्हार, नाई, लोहार, दर्जी वगैरह को अपनी फसल से कुछ हिस्सा हमेशा दिया करते थे, बदले में वे लोग सालभर हमारा काम करते थे.

‘‘इसे गांव की बोली में जेउरा कहा जाता है. इस के बाद आसपड़ोस के बच्चों को खलियान (खुशी से किलो 2 किलो अनाज देना) देते थे, लेकिन अब सबकुछ धीरेधीरे खत्म सा हो गया है.

क्या पहले ज्यादा लागत लगती थी? इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि पहले हर चीज सस्ती थी. सभी किसान अपने खेत से पैदा होने वाले अनाज को अगले साल बीज के लिए रख लेते थे.

आप यकीन मानिए, उस में भी अच्छी पैदावार होती थी, लेकिन मौजूदा समय में तो हर सीजन के लिए हाईब्रिड बीज खरीदना जैसे मजबूरी हो गई है.

यह बीज महंगा तो होता ही है, लेकिन इस बात का डर भी लगा रहता है कि कहीं नकली तो नहीं है. कहीं हमारा पैसा न डूब जाए.

दूसरी बात यह है कि सभी किसान बैल, भैंस पालते थे, जिस से खेतों में देशी खाद का इस्तेमाल किया जाता था. देशी खाद से फायदा यह होता था कि खेत की मिट्टी खराब नहीं होती थी. अब तरहतरह की खादों ने एक तरफ किसानों की कमर तोड़ दी है, तो वहीं दूसरी तरफ खेतों को बंजर कर दिया है.

अपना दुख बयां करते हुए उन्होंने कहा कि अब किसानों के लिए मौसम भी बेईमान हो गया है. पहले समय पर बारिश होती थी. इस वजह से सिंचाई में परेशानी नहीं होती थी. अगर कभी वक्त पर बारिश नहीं भी होती थी तो हम लोग मिल कर तालाब से दुगला (एक बड़ी सी डलिया, जिसे 2 लोग रस्सी से पकड़ कर पानी तालाब से खेतों में डालते थे) के जरीए सिंचाई करते थे.

अब हाल यह है कि सारे तालाबों में कब्जा हो गया. जो बचे भी हैं, उन में पानी नहीं बचा. सरकार किसानों को बिजली देने का वादा करती है, लेकिन बमुश्किल 5-6 घंटे ही आती है. अगर बिजली 2-4 दिन नहीं आई तो पूरी फसल ही सूखने लगती है.

बुजुर्ग किसान मुश्ताक हुसैन ने आगे बताया कि अब मजदूरी बहुत ज्यादा हो गई है. पहले कुछ रुपए में मजदूर आसानी से मिल जाते थे, पर अब तो चिराग ले कर ढूंढ़ना पड़ता है. ऊपर से उन की भी बड़ी शर्तें होती हैं.

मजदूरों के न मिलने की एक वजह यह भी है कि उन्हें इस से आमदनी नहीं होती थी, जिस वजह से गांव के मजदूरों ने शहरों की ओर रुख कर लिया.

जब से मशीनों का दखल खेती में बढ़ा है, तब से मजदूरों के सामने रोजीरोटी के लाले पड़ने लगे हैं. मजबूरी में ही सही, इन लोगों ने इस काम से तोबा कर ली.

पिछली यादों को ताजा करते हुए उन्होंने बताया कि पहले का जमाना अब के जमाने से लाख गुना बेहतर था. अब हर चीजों में आग लग गई है. हर जगह पैसा ही पैसा लोगों को नजर आता है, इनसानियत तो है ही नहीं.

पहले के किसानों में जो अपनेपन का लगाव था, वह अब के किसानों में बहुत कम देखने को मिलता है. एक तरफ तो महंगाई बढ़ती जा रही है, लेकिन सरकार आज तक किसानों की भलाई के लिए कोई पुख्ता इंतजाम नहीं कर पाई. सालभर हमें खेती की पैदाइश से ही उम्मीद रहती है, लेकिन पिछले कुछ सालों से यह उम्मीद भी टूटती जा रही है.

सरकार न तो खाद, बीज, कीटनाशक सस्ता कर रही है और न ही किसानों की फसल की वाजिब कीमत ही दिला पा रही है. हमारे लिए तो एक तरफ कुआं है तो दूसरी तरफ खाई. हम करें भी तो क्या करें? बड़ी मुश्किल है हमारे सामने.

अब हमारी उम्र तकरीबन 70 साल की है, लेकिन आज भी किसानी कर रहे हैं. समय के साथ इनसान का जिस्म कमजोर हो जाता है, लेकिन हमारे लिए किसी तरह की मदद सरकार से नहीं मिलती, जो हमारे जैसे किसानों के बुढ़ापे का सहारा हो.

सरकारी नौकरी वालों को एक उम्र के बाद पेंशन मिलती है, लेकिन क्या हम इस देश के लिए कुछ नहीं कर रहे जो हमें लावारिस की तरह नजरअंदाज किया जा रहा है. जिंदगी है तो जीना ही है वरना इस काम में कोई फायदा नहीं.