Apple Farming : अब मैदानी इलाकों में भी मुमकिन सेब की खेती

Apple Farming : हमें सेब (Apple) का नाम लेते ही बर्फीली वादियों से घिरा हिमाचल प्रदेश का किन्नौर जिला याद आ जाता है जहां के किन्नौरी सेब दुनियाभर में मशहूर हैं. यह बात सही भी है कि सेब (Apple) के पेड़ उगाने के लिए ऐसी आबोहवा की जरूरत होती है जो पहाड़ी इलाकों में ही पाई जाती है. इस के बावजूद वैज्ञानिक ऐसी तकनीक विकसित करने में लगे रहते हैं जिस से सेब (Apple) को किसी तरह मैदानी इलाकों में भी उगाया जा सके.

कुछ प्रगतिशील किसान भी कोशिश कर रहे हैं कि वे सेब (Apple) को मैदानी इलाकों का भी सिरमौर बना दें. इसी कड़ी में हम उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के एक कर्मठ किसान अरविंद कुमार का जिक्र कर सकते हैं. उन्हीं की कोशिशों से अब उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश से आने वाला ‘अन्ना’ प्रजाति का हरा सेब अब गोरखपुर की बंजर जमीन पर पैदा होने जा रहा है.

Apple Farming‘शबला सेवा संस्थान’ के संस्थापक अविनाश कुमार ने 3 पहले सेब (Apple) का पौधा लगाया था और अब इस पेड़ में पहली बार फल आने लगे हैं. अविनाश कुमार को उम्मीद है कि इस बार भले ही 15 से 20 किलोग्राम सेब (Apple) ही बच पाएं, लेकिन आने वाले समय में इस इलाके की बंजर जमीन पर सेब (Apple) के बगीचे नजर आएंगे.

उत्तर प्रदेश पुलिस की सरकारी नौकरी छोड़ कर खेतीकिसानी में रम चुके अविनाश कुमार पादरी बाजार, गोरखपुर में रहते हैं. उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में किसानों को औषधीय खेती के लिए प्रेरित कर उन की जिंदगी बदलने वाले अविनाश कुमार ने पूर्वांचल ही नहीं, बल्कि मैदानी इलाकों में भी सेब (Apple) की पैदावार बढ़ाने का बीड़ा उठाया है. अपने खेत (Apple) में लगाने के साथ ही उन्होंने इस की पौधशाला भी तैयार की है. 3 साल पहले लगाए गए पेड़ पर इस बार न केवल फूल आए हैं बल्कि वे फल भी बन गए हैं. फलों की क्वालिटी को देख कर अविनाश कुमार अब सेब (Apple) का बाग लगाने की तैयारी में हैं.

Apple Farming

अविनाश कुमार बताते हैं कि 3 साल पहले वे उत्तराखंड से सेब का पौधा लाए थे. उन का मानना है कि अगर वहां की पथरीली जमीन पर सेब के पेड़ फल देते हैं तो गोरखपुर समेत मैदानी क्षेत्र के कई इलाकों में बंजर पड़ी सैकड़ों एकड़ जमीन पर सेब का बाग लहलहा सकता है. प्रयोग के लिए उन्होंने अपनी पौधशाला में सेब का पेड़ लगाया जो इस बार फल देने को तैयार है.

अविनाश कुमार कहते हैं कि अगर इस इलाके में सेब की पैदावार होने लगे तो उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश से सेब मंगाने की जरूरत नहीं होगी. आम लोगों को जहां सस्ते में यह पौष्टिक फल मिल सकेगा, वहीं किसान अपनी बेकार पड़ी बंजर जमीन से भी हर साल अच्छी कमाई कर सकेंगे. इतना ही नहीं, अगर पौलीहाउस के जरीए तापमान को कंट्रोल करने का इंतजाम कर लिया जाए तो सेब का रंग लाल भी हो सकता है.

Apple Farming

अरविंद कुमार के मुताबिक, कोई भी किसान एक एकड़ जमीन में 50,000 रुपए खर्च के सेब की खेती शुरू कर सकता है. पहली फसल में उसे तकरीबन ढाई लाख रुपए की कमाई हो सकती है. एक एकड़ जमीन में सेब की 227 पौध लगाई जा सकती हैं. इन पौधों पर अगर समयसमय पर आर्गेनिक खाद का छिड़काव किया जाए तो पेड़ अच्छे से फलताफूलता है.

उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में किसानों को तुलसी, ब्रह्मी जैसे औषधीय पौधों की खेती के लिए प्रोत्साहित करने के साथ उन की फसल खरीद कर जीवनशैली बदलने वाले अविनाश कुमार ने अगले साल गोरखपुर और मैदानी क्षेत्रों में बंजर जमीन पर सेब (Apple) के बाग लगाने के लिए दूसरे किसानों से संपर्क करना शुरू कर दिया है.

‘शबला सेवा संस्थान’ के अध्यक्ष किरण यादव का कहना है कि हरे सेब (Apple) की व्यावसायिक खेती कर के किसान अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं.

Cowpea Cultivation – लोबिया की खेती

Cowpea Cultivation : दलहनी खेती के तहत लोबिया की फसल  आती है. यह प्रोटीन, शर्करा, वसा, विटामिन व खनिज से भरपूर होती है.

इस की 2 तरह की किस्में होती हैं. पहली झाड़ीयुक्त बौनी प्रजाति व दूसरी लतायुक्त यानी फैल कर फली देने वाली प्रजाति. लतायुक्त प्रजाति की खेती मचान विधि से ही की जाती है.

उन्नतशील प्रजातियां

काशी कंचन : सब्जी के लिहाज से यह प्रजाति ज्यादा मशहूर है. बोआई के 40-45 दिनों बाद इस की फलियां तोड़ने के लिए तैयार हो जाती हैं. इस की फलियों की लंबाई 30 सैंटीमीटर तक होती है. यह रोग प्रतिरोधी प्रजाति है. इस की औसत उपज 150-200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

काशी श्यामल : इस प्रजाति की बोआई के 50 दिन बाद फलियां तोड़ने लायक हो जाती हैं, जिन की औसत लंबाई 25-30 सैंटीमीटर होती है. इस की उपज तकरीबन 75-100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

काशी गौरी : इस प्रजाति की बोआई के 45-50 दिन बाद फलियां तोड़ने लायक हो जाती हैं, जिन की औसत लंबाई 25 सैंटीमीटर होती है. इस की उपज 100-125 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

टा. 5269 : यह प्रजाति कम उत्पादन वाली है, जो बोआई के 50-60 दिन बाद फलियां देने लगती है. इस की औसत उपज 50-60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

पूसा कोमल : इस की खेती खरीफ के लिए ज्यादा सही होती है. इस की फलियों की लंबाई 15-20 सैंटीमीटर होती है. इस की औसत उपज 70 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

काशी उन्नति : बोआई के 40-45 दिन बाद इस की फलियां तोड़ने लायक हो जाती हैं. इस की औसत उपज 125-150 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

आईआईएमआर 16 : लोबिया की अगेती प्रजातियों में यह खास मानी जाती है.

इस की फलियों की लंबाई 15-18 सैंटीमीटर और औसत उपज 100-125 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

लोबिया : इस की खेती गरमी व बारिश दोनों मौसमों में की जाती है. इस की फलियां तकरीबन 20 सैंटीमीटर तक लंबी होती हैं. इस की उपज 120 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

अर्का गरिमा :  यह एक फैलने वाली प्रजाति है. इस की फलियों की लंबाई 25 सैंटीमीटर तक होती है. यह विषाणु रोग प्रतिरोधी किस्म है. हरी फलियों की उपज 80-85 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

मिट्टी का चयन व खेत की तैयारी : लोबिया की खेती के लिए दोमट या बलुई दोमट मिट्टी सब से अच्छी मानी जाती है. बोआई से पहले खेत की जुताई कर के मिट्टी को भुरभुरी कर लेते हैं.

बोआई का सही समय : बारिश के मौसम वाली फसल के लिए बोआई का सही समय जून से अगस्त तक होता है. गरमी के मौसम की फसल के लिए बोआई का सही समय फरवरी से मार्च तक होता है.

बीज की मात्रा : लोबिया की बौनी किस्म के लिए प्रति हेक्टेयर 20  किलोग्राम व लता वाली किस्म के लिए प्रति हेक्टेयर 15 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है.

लोबिया की बोआई हमेशा मेंड़ों पर करनी चाहिए. बोआई में लाइन से लाइन की दूरी 60 सैंटीमीटर व बीज से बीज की दूरी 10 सैंटीमीटर रखें.

खाद व उर्वरक : दलहनी फसल  होने के कारण इस में खाद की बहुत कम जरूरत होती है. अच्छी उपज के लिए बोआई से 15 दिन पहले 8-10 टन गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में मिला देनी चाहिए.

इस के अलावा 25 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस और 60 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई से पहले मिट्टी में मिला देनी चाहिए.

लोबिया की फसल जब एक महीने की हो जाए तो फसल की निराईगुड़ाई कर के तमाम खरपतवार निकाल देने चाहिए और पौधों पर मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए.

सिंचाई : लोबिया के बीजों को बोते वक्त खेत में ठीकठाक नमी होना जरूरी है. बारिश के मौसम में फसल की सिंचाई की जरूरत नहीं होती है. गरमी में 5-7 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए.

Lobiya

कीट व बीमारियों का इलाज : कृषि विज्ञान केंद्र, बंजरिया (बस्ती) के डाक्टर प्रेमशंकर का कहना है कि लोबिया में माहू कीट का प्रकोप ज्यादा होता है. यह कीट पत्तियों व शाखाओं का रस चूसता है, जिस से फसल की बढ़वार रुक जाती है. इस से बचाव के लिए डाईमिथोएट 30 ईसी या मिथाइल डेमेटान का छिड़काव करना चाहिए.

फलीछेदक : यह कीट लोबिया की फलियों में छेद कर बीजों को खा जाता है. इस से बचाव के लिए इंडोसल्फान या थायोडान का छिड़काव करना चाहिए. इस में नीम गिरी का अर्क भी असरकारक होता है.

हरा फुदका या लीफ माइनर : हरा फुदका पत्तियों की निचली सतह का रस चूस लेता है, जिस से पौधे की बढ़वार रुक जाती है. इस की रोकथाम के लिए मैलाथियान के घोल का छिड़काव करना चाहिए.

लीफ माइनर कीट पत्तियों के बीच सुरंग बनाता है, जिस से फसल की बढ़वार व पैदावार दोनों पर बुरा असर पड़ता है. इस की रोकथाम के लिए इंडोसल्फान या नीम गोल्ड का छिड़काव करना चाहिए.

प्रमुख रोग : लोबिया में स्वर्णपीत रोग का प्रकोप देखा गया है, जो माहू द्वारा विषाणु से फैलाया जाता है. इस रोग के असर से पत्तियां पीली पड़ जाती हैं और कलियों की बढ़वार रुक जाती है. इस रोग से बचाव के लिए रोग प्रतिरोधी किस्मों का चयन करना चाहिए. अगर रोग का असर दिखाई दे तो रोगग्रस्त पौधों को उखाड़ कर जमीन में दबा देना चाहिए.

लोबिया की तोड़ाई व लाभ : कृषि विज्ञान केंद्र, बंजरिया के माहिर राघवेंद्र सिंह का कहना है कि लोबिया की अगेती किस्मों की फलियां 40-45 दिनों में तोड़ाई लायक हो जाती हैं.

उपज : लोबिया की अच्छी प्रजातियों से तकरीबन 150-200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज मिलती है, जबकि प्रति हेक्टेयर 50,000 से 60,000 रुपए लागत आती है. इस प्रकार किसान लोबिया की खेती से 3-4 महीने में ही अच्छी आमदनी हासिल कर सकते हैं.

Carrot Grass : जब खेतों में हो गाजरघास कैसे पाएं नजात

Carrot Grass : तमाम तरह के खरपतवार हमेशा किसानों के लिए परेशानी का सबब बनते रहे हैं. खेती की जमीन के आसपास उगी गाजरघास नाम की खरपतवार फसलों के साथसाथ किसानों और उन के पालतू पशुओं को भी नुकसान पहुंचाती है.

बरसात में गाजर की पत्तियों की तरह दिखने वाली यह घास बहुत तेजी से बढ़ती है. इसे चटक चांदनी, गंधी बूटी और पंधारी फूल के नाम से भी जाना जाता है. गाजरघास की वजह से फसलों की पैदावार में कमी आती है, इसलिए इस की रोकथाम करना जरूरी हो जाता है.

कृषि मंत्रालय और भारतीय वन संरक्षण संस्थान के वैज्ञानिक बताते हैं कि भारत में गाजरघास का वजूद पहले नहीं था. ऐसा माना जाता है कि इस के बीज साल 1950 से 1955 के बीच अमेरिका और कनाडा से आने वाले गेहूं पीएल 480 के साथ भारत में आए थे. आज यह गाजर घास मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे उन्नत कृषि उत्पादक राज्यों में हजारों एकड़ खेतों में फेल चुकी है. गाजरघास में पाए जाने वाला जहरीलापन फसलों की पैदावार पर बुरा असर डालता है.

तेजी से फैलती घास

बरसात के मौसम के अलावा भी गाजरघास के पौधे कभी भी उग आते हैं और बहुत जल्दी इन पौधों की बढ़वार होती है. 3 से 4 फुट तक लंबी इस घास का तना मजबूत होता है. इस घास पर छोटेछोटे सफेद फूल 4 से 6 महीने तक रहते हैं. कम पानी और कैसी भी जमीन हो, उस पर उगने वाली इस घास के बीजों का फैलाव भी बड़ी तेजी से होता है.

गाजरघास के एक पौधे में औसतन 650 अंकुरण योग्य बीज होते हैं. जब यह एक जगह पर जड़ें जमा लेती है तो दूसरे किसी पौधे को जमने नहीं देती. यही वजह है कि यह घास खेत, मैदान या चारागाह को जल्दी ही अपना निशाना बना लेती है.

देवरी गांव के किसान माधव गूजर खेत में घास की समस्या से खासा परेशान हैं. उन का कहना है कि खेत में उग आई गाजर घास की वजह से पहले तुअर और अब गेहूं की पैदावार में कमी आई है. इस घास की एक खूबी यह भी है कि यह अपने आसपास किसी दूसरे पौधे को पनपने नहीं देती. यदि खेत में गाजरघास ज्यादा हो तो यह फसल पैदावार पर सीधा असर डालती है.

सेहत के लिए नुकसानदेह

फसलों के अलावा गाजरघास पालतू जानवरों और किसानों के लिए नुकसानदायक है. पालतू जानवर इस की हरियाली के प्रति आकर्षित होते हैं, पर इसे सूंघ कर निराश हो कर लौट आते हैं. कभीकभी घास और चारे की कमी में कुछ दुधारू पशु इसे खा लेते हैं, जिस से उन का दूध कड़वा और मात्रा में कम हो जाता है. इसे खाने से पशुओं में कई तरह के रोग हो जाते हैं. अगर गाय या भैंस इसे खा लेती हैं तो उन के थनों में सूजन भी आ जाती है.

आमगांव के किसान गणेश वर्मा अपने खेत में ही मकान बना कर रहते हैं. मकान के आसपास उगी गाजरघास के पौधों की वजह से वे त्वचा की एलर्जी से पीडि़त हैं. गाजर घास के पौधे छूने पर त्वचा में खुजली होने लगती है.

गाजरघास फसलों और पशुओं के अलावा इनसानों के लिए भी काफी गंभीर समस्या है. गाजरघास की पत्तियों के काले छोटेछोटे रोमों में ‘पार्थीनम’ नाम का कैमिकल पदार्थ पाया जाता है, जो दमा, एग्जिमा, बुखार, सर्दीखांसी, एलर्जी जैसे रोगों को पैदा करता है. किसान गाजर घास को उखाड़ते हैं तो गाजरघास के पराग कण सांस की नली से शरीर के अंदर जा कर विभिन्न प्रकार के त्वचा रोगों का कारण बन जाते हैं. गाजरघास की जड़ों से निकलने वाला तरल पदार्थ ‘एक्यूडेर’ जमीन की मिट्टी को खराब करता है और रोग प्रतिरोधक क्षमता को कम करता है.

Carrot Grass

रोकथाम जरूरी

अनुविभागीय कृषि अधिकारी केएस रघुवंशी ने इस बारे में बताया कि गाजरघास अगर जमीन में बहुतायत में उग आई है तो इस की रोकथाम का प्रभावी तरीका यही है कि इसे फूल आने से पहले जड़ समेत उखाड़ कर एक जगह पर ढेर लगा दें और 2-3 दिन बाद सूखने पर आग लगा दें. इस से गाजर घास के बीज नष्ट हो जाते हैं. इस के अलावा गाजर घास के ऊपर 100 लिटर पानी में 20 किलो साधारण नमक का घोल बना कर छिड़काव करने से भी इस के पौधे, फूल और बीज सभी नष्ट हो जाते हैं.

उन्होंने आगे कहा कि गाजरघास को उखाड़ते समय हाथों में रबड़ के दस्ताने पहनें, सुरक्षात्मक कपड़ों का उपयोग जरूर करें, जिस से त्वचा पर किसी भी तरह के संक्रमण का खतरा न हो.

गोविंद वल्लभपंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्विविद्यालय, पंतनगर से जुड़े सचिन दुबे के मुताबिक, गाजरघास की रोकथाम के लिए विभिन्न फसलों में कैमिकलों का इस्तेमाल किया जा सकता है.

शुरुआती अवस्था में जब गाजरघास के पौधे 2-3 पत्तियों के हों, इस खरपतवार को विभिन्न शाकनाशियों जैसे 2, 4-डी 0.5 किलो या मेट्रीब्यूजीन 0.35-0.4 किलो या खरपतवारनाशक दवा ग्लाइफोसेट 1-1.25 किलो सक्रिय अवयव को 600-800 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव कर के इस को खत्म किया जा सकता है. छिड़काव करते समय पौधों को घोल में अच्छी तरह भिगोना जरूरी होता है.

वरिष्ठ कृषि विस्तार अधिकारी अशोक त्रिपाठी बताते हैं कि गाजरघास को फूल आने से पहले जड़ समेत उखाड़ कर गड्ढे में डाल कर मिट्टी से ढक दें. गाजरघास जहां भी हो, उस जगह की गरमी में गहरी जुताई करें ताकि बाकी बची जड़ें भी नष्ट हो जाएं, उस के बाद बरसात में खरपतवारों के निकलने पर भी निगरानी रखें. खेत व मेंड़ पर यदाकदा गाजरघास दिखे तो उसे नष्ट करते रहें.

गैरकृषि भूमि में इस की रोकथाम के लिए सामुदायिक रूप से कोशिश करनी होगी. इस में यांत्रिक विधि, जैविक विधि और कैमिकलों का इस्तेमाल किया जा सकता है. इस के अलावा प्रतिस्पर्धात्मक पौधों द्वारा इस की बढ़वार और विकास को रोका जा सकता है. घर के आसपास और संरक्षित इलाकों में गेंदे के पौधे लगाने चाहिए.

खेतों में जल्दी बढ़ने वाली फसलें जैसे ढैंचा, ज्वार, बाजरा वगैरह की फसलें ले कर इस खरपतवार को काफी हद तक काबू में किया जा सकता है.

चूहों (Rats) की ऐसे करें रोकथाम

घरआंगन हो या खेतखलिहान, हर जगह चूहों (Rats) का आतंक है. हर कोई इन के तांडव से परेशान जरूर होता है. ऐसे में चूहों (Rats) का प्रभावी नियंत्रण हम सभी को जरूर करना चाहिए.

घरआंगन के अलावा चूहे (Rats) खेतखलिहानों में सब से ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं. इस के अलावा भारी मात्रा में मल त्याग करने व काटने, कुतरने की आदत के चलते बहुत सी बीमारियों के वाहक भी बनते हैं.

एक अनुमान के मुताबिक, देश में पैदा होने वाले कुल खाद्यान्न का तकरीबन 10 फीसदी सिर्फ चूहे ही हजम कर जाते हैं. इन की आबादी भी काफी तेजी से बढ़ती है. चूहे मात्र 5 हफ्ते में ही मैथुन के योग्य हो जाते हैं. एक मादा चूहा सालभर में 6-10 बार बच्चा देती है व एक बार में 6-12 बच्चे दे सकती है.

एक जोड़ी चूहे को अगर नियंत्रित न किया जा सके तो सालभर में ये 1,000-1,200 तक तादाद बढ़ा सकते हैं.

चूहे प्रमुखत: 4 प्रकार के पाए जाते हैं. पहला, घरेलू चूहा, जो सिर्फ घरों में ही पाया जाता है. दूसरा, खेत में चूहे, जो खेत और खलिहान दोनों में पाए जाते हैं. तीसरा, खेत और घर दोनों जगह के चूहे और चौथा, जंगली चूहे, जो जंगलों व रेगिस्तानों में रह कर घासफूल, फलफूल वगैरह खा कर अपना पेट भरते हैं.

चूहे भले ही अलगअलग प्रकार के हैं, मगर इन सब का नियंत्रण इन तरीकों से होता है:

गैररसायनिक तरीका

प्राकृतिक शत्रुओं द्वारा : गैररसायनिक तरीके में चूहों के प्राकृतिक शत्रुओं जैसे बिल्ली, सियार, कुत्ता, उल्लू, चमगादड़, लोमड़ी, चील जैसे जीवों को रख कर नियंत्रित कर सकते हैं. ये सभी जीव चूहों को खा जाते हैं.

चूहेदानी द्वारा : चूहेदानी में चूहों की पसंद की चीजें जैसे रोटी, डबलरोटी, बिसकुट, अमरूद वगैरह रख कर फंसा लिया जाता है. बाद में उन्हें बाहर छोड़ दिया जाता है या मार दिया जाता है.

चूहा अवरोधी भंडारण द्वारा : भंडारण पक्के कंक्रीट के फर्श पर या धातुओं जैसे जस्ता, लोहा, तांबा, वगैरह से बने पात्र में करना चाहिए.

साफसफाई द्वारा : चूहों का स्थायी घर झाडि़यों, कूंड़ों, मेंड़ों वगैरह में होता है, जिस की बेहतर ढंग से साफसफाई कर के चूहों की आबादी घटाई जा सकती है.

रासायनिक तरीका

5 दिवसीय योजना बना कर : चूहे बड़े चालाक होते हैं. मुमकिन है कि अचानक से कोई दवा रखने पर उसे न खाएं और चूहों का खात्मा रासायनिक दवा देने पर भी न हो सके, इसलिए एक 5 दिवसीय योजना बनानी चाहिए.

पहले दिन बिलों का निरीक्षण कर उन्हें मिट्टी से बंद कर देना चाहिए. दूसरे दिन खुले हुए बिल के पास सादा चारा रखना चाहिए. तीसरे दिन दोबारा बिलों के पास सादा चारा रखना चाहिए और चौथे दिन जहरीला चारा बना कर रखना चाहिए. इस के लिए 48 भाग चारा जैसे गुड़, चना, चावल, डबलरोटी वगैरह में 1 भाग जिंक फास्फाइड नामक दवा और एक भाग सरसों का तेल मिला कर देना चाहिए. 5वें दिन बिलों में धूम्रण के लिए 1-2 टैबलेट सल्फास एल्यूमिनियम फास्फाइड 15 फीसदी की गोली रख कर बिल को बंद कर दें.

बांझ करने वाले रसायनों द्वारा : चूहों के नियंत्रण का एक बेहतर उपाय यह भी है कि उन की आबादी बढ़ने ही न पाए, इस के लिए बाजार में अनेक तरह के रसायन आते हैं. चूहे इन्हें खा कर नपुंसक बन जाते हैं.

प्रमुख रसायनों में फुराडेंटीन नाम की दवा की एक गोली (0.2 ग्राम प्रति चूहा) व कोल्चीसीन की एक टैबलेट का 5वां हिस्सा खाने की चीजों में मिला कर चूहों को खिलाने से नपुंसक हो जाते हैं.

धूम्रण के द्वारा : साइमेग या साइनो गैस पाउडर, एल्यूमिनियम फास्फाइड वगैरह दवाओं की 3-4 ग्राम मात्रा हर एक बिल में डाल कर बिल बंद कर देने से चूहे मर जाते हैं.

जिंक फास्फाइड द्वारा : चूहों को खत्म करने के लिए यह सब से असरकारक रसायन है. इस के लिए जहरीला आहार बनाना पड़ता है.

आहार बनाने के लिए 48 भाग चारा जैसे गुड़, चना, चावल, डबलरोटी वगैरह में एक भाग जिंक फास्फाइड नाम की दवा व एक भाग सरसों का तेल लकड़ी के टुकड़े की मदद से मिला कर 10-15 ग्राम हरेक बिल में रखने से चूहे इन को खा कर मर जाते हैं.

वारफेरिन द्वारा : यह रसायन स्टारफेरिन या रेटाफेरिन नाम से आता है. इस की 25 ग्राम मात्रा और 450 ग्राम टूटा हुआ अनाज व 15 ग्राम चीनी और 10 ग्राम खाने वाला तेल इन सब को अच्छी तरह लकड़ी से मिला कर मिट्टी के बरतन में चूहों के बिल के पास रखने से चूहे खा कर बाद में मर जाते हैं.

घरेलू उपाय : गुड़ की चाशनी बना लीजिए. कौटन यानी रुई के छोटेछोटे टुकड़ों को चाशनी में इस तरह डुबोएं कि पूरी तरह से रुई में गुड़ सोख जाए. हवा के सहारे चाशनी में डूबी हुई रुई को सुखा लीजिए. सूखने के बाद जहांजहां चूहों से प्रभावित जगह हों, वहांवहां इन टुकड़ों को रख दीजिए. चूहे इसे खाएंगे, गुड़ तो पच जाएगा, मगर रुई नहीं पचा पाएगा. इस से चूहों को बारबार प्यास लगेगी और पानी न मिलने पर चूहे दम तोड़ देंगे.

हालांकि इस का असर बहुत धीरेधीरे होता है, मगर लंबे समय तक सब्र रख कर इस को किया जाए तो फायदा जरूर मिलता है.

Quinoa : भविष्य की फसल किनोआ

Quinoa : अपने नए शोध कामों के लिए स्वामी केशवानंद कृषि विश्वविद्यालय, बीकानेर, राजस्थान देशभर में जाना जाता है. पिछले दिनों यहां कृषि अनुसंधान केंद्र के एक बड़े भूभाग में खड़ी रंगबिरंगी फसल ने बरबस ही ध्यान खींच लिया. जिज्ञासावश हम ने यहां के रिसर्च डायरैक्टर पीएस शेखावत से बात की. पेश हैं उसी बातचीत के खास अंश:

ये इतनी खूबसूरत रंगबिरंगी कोई नई फसल है क्या?

जी हां, इसे किनोआ (Quinoa) कहते हैं. यह बथुआ प्रजाति का पौधा है. यह एक ओर्नामैंटल प्लांट है. जब यह कच्चा होता है तो ग्रीन, कुछ पकने पर लाल और कटाई के समय यह पूरी तरह से सफेद हो जाता है, जो देखने में बहुत ही सुंदर लगता है. कुछकुछ हमारे देशी प्रोडक्ट बाजरा एमएच 17 प्रजाति की तरह. इसे दक्षिणी अमेरिका में उगाया जाता है. हमारे देश में इसे हम भविष्य की फसल भी कह सकते हैं. इस के बीजों को पीस कर अनाज की तरह से इस्तेमाल किया जाता है.

क्या आप को लगता है कि यह विदेशी पौधा हमारे यहां की आबोहवा में पनप सकेगा?

बिलकुल पनप सकेगा. यह बहुत हार्डी पौधा है यानी किसी भी तरह की प्रतिकूल आबोहवा में यह अपनेआप को जिंदा रखने की क्षमता वाला पौधा है. यह रबी की फसल है. इसे बोने का सही समय नवंबर माह है और कटाई अप्रैल माह में होती है. इसे समय से पहले काश्त भी किया जा सकता है. इस की बोआई दोमट मिट्टी में होती है. इस पर सर्दी या पाले का कोई असर नहीं होता. इसे ज्यादा पानी की भी जरूरत नहीं होती. यह एक तरह से खरपतवार है. कहने का मतलब यह है कि इस पौधे के लिए यहां की आबोहवा पूरी तरह से माकूल है.

इस पर शोध की कोई खास वजह?

इस पौधे की खूबी ही इस पर शोध की वजह है. यह अनाज वाली फसल है. यह लगने, पकने और सिंचाई में तकरीबन गेहूं जैसा ही है लेकिन इस की बढ़वार गेहूं से कई गुना बेहतर है. इसे मेंटेनैंस फ्री फसल भी कहा जा सकता है यानी वे किसान जिन के पास मैन पावर कम हो, वे भी इसे काश्त कर सकते हैं. इसे खाने में अकेला या दूसरे अनाज के साथ मिला कर भी उपयोग में लाया जा सकता है.

क्या यह सचमुच किसानों के लिए फायदे का सौदा हो सकता है?

देखिए, हम पिछले 3 सालों से इस पर शोध का काम कर रहे हैं और यह बात सामने आई है कि इस की खेती से किसानों को बहुत फायदा हो सकता है. हमारे रिसर्च सैंटर में हम ने 22 क्विंटल प्रति हेक्टेयर इस की पैदावार ली है, लेकिन हमारे प्रोत्साहन से यहां पास ही में रायसर गांव में एक खेत में लगी फसल से 60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की पैदावार भी ली गई है.

हमारे देश में फिलहाल इस का ज्यादा प्रचारप्रसार नहीं हुआ है लेकिन विदेशों में इस की कीमत 500-1,000 रुपए प्रति किलोग्राम तक है. वैसे, हम ने अपने यहां उगाए गए किनोआ को 60 रुपए प्रति किलोग्राम के हिसाब से बेचा है.

Quinoa

क्या आप को यह लगता है कि इतना महंगा अनाज आम आदमी की पहुंच में हो सकता है?

यह आमतौर पर मैडिसिनल प्लांट है इसलिए औषधि के रूप में ज्यादा कारगर साबित हो सकता है. इसे वैल्यू एडेड प्रोडक्ट यानी दूसरे अनाजों के साथ मिला कर इस्तेमाल में लाया जाता है. इस में मैगनीज होता है जो दिल को मजबूती देता है. इस में एंटीऔक्सिडेंट है जो रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है.

इस के अलावा इस में चावल की तरह कार्बोहाइड्रेट भी होता है लेकिन इस में फाइबर की मात्रा ज्यादा होने से यह डायबिटीज के मरीजों के लिए विशेष रूप से फायदेमंद है.

अभी आप ने बताया कि किनोआ का प्रचारप्रसार ज्यादा नहीं हुआ है तो आप इस के लिए क्या कोशिश कर रहे हैं?

आप जैसे लोग ही हमारी बात दूर तक पहुंचाएंगे. हम किसानों के लिए पैकेज तैयार कर रहे हैं. पैकेज यानी एक तरह की बुकलैट. इस बुकलैट में किनोआ से संबंधित जानकारी होगी, जैसे कितना बीज, कैसी मिट्टी, मिट्टी का कितना पीएच मान, कितना फर्टिलाइजर, कितनी सिंचाई, क्या बीमारी और उस का उपचार वगैरह. हम इच्छुक किसानों को अपने यहां विजिट करवा कर उन की जिज्ञासा का समाधान भी करते हैं.

आप ने इसे भविष्य की फसल क्यों कहा?

क्योंकि इस फसल को हम आने वाले समय में एक विकल्प के तौर पर इस्तेमाल करेंगे. अभी मैं ने बताया था कि यह डायबिटीज और दिल के मरीजों के लिए ज्यादा फायदेमंद है. हम देख रहे हैं कि इन मरीजों की तादाद में निरंतर बढ़ोतरी हो रही है. ऐसे में हम इसे दूसरे विकल्प के तौर पर अनाज की तरह इस्तेमाल करेंगे.

दूसरी बात यह भी है कि अब आबोहवा में बदलाव हो रहा है. इस वजह से आने वाले समय में हमारी कुछ फसलें ज्यादा पैदावार देंगी तो कुछ का उत्पादन बहुत कम हो जाएगा.

अब सोचिए कि किसी एक ऐसे समय में जब हमारी क्रौप डाउन हो गई और हमारे पास सीरियल के रूप में कुछ न हो, तब यह फसल किनोआ अनाज के रूप में उभरेगी.

राजस्थान के अलावा इसे देश के किस भूभाग में लगाया जा सकता है?

जैसा कि मैं ने बताया था कि यह एक हार्डी पौधा है और यह किसी भी हालात में उग सकता है. इसे पानी और बेहतर मिट्टी व माकूल आबोहवा के मुताबिक कहीं भी लगाया जा सकता है.

किनोआ विदेशी फसल है. आप हमारे यहां इस का क्या भविष्य देखते हैं?

मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि यह आने वाले समय में अनाज के एक बेहतरीन विकल्प के रूप में सामने आएगा. जैसेजैसे लोगों में इस के बारे में जागरूकता बढ़ेगी, वैसेवैसे लोग इस की मांग करेंगे और किसानों में इसे उगाने के प्रति रुझान बढ़ेगा.

अब आप बताइए कि कुछ साल पहले तक ओट्स के बारे में कितने लोग जानते थे, लेकिन आज उस के प्रचारप्रसार के चलते यह लोगों की जबान पर चढ़ा हुआ है. है तो वह भी एक फोडर क्रौप ही न. उसी तरह से सही प्रचारप्रसार से किनोआ भी जल्दी ही आम लोगों की जिंदगी में शामिल हो जाएगा क्योंकि यह कम मात्रा में अधिक पोषण देने वाला अनाज है.

मेरा दावा है कि यह किसानों के लिए किसी भी तरह से घाटे का सौदा नहीं है क्योंकि किसी मेंटेनैंस फ्री फसल का 60 रुपए प्रति किलोग्राम भी हो तो नुकसान नहीं है.

यदि किसान इसे उगाएं तो इस का मार्केट क्या है?

किनोआ लगाने की किसानों में काफी दिलचस्पी है लेकिन फिलहाल परेशानी मार्केट की है क्योंकि लोगों को इस के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है. अभी तो इसे हमारे विभाग ने ही बीज के तौर पर खरीदा है लेकिन इस के पक्ष में मार्केट बनने में ज्यादा समय नहीं लगेगा. इस पर होने वाले शोध के काम और सैमिनार जैसेजैसे आम लोगों के बीच आएंगे, इस का भी अच्छाखासा मार्केट बन जाएगा.

क्या इसे प्रोसैस कर अनाज की तरह दूसरे उत्पाद भी बनाए जा सकते हैं?

सीधे खाने पर इस का स्वाद हलका सा कसैला होता है लेकिन कड़वा होने पर करेला भी तो खाया जाता है न. वैसे, किसी भी दूसरे सीरियल की तरह से इस से भी खीर, बिसकुट, दलिया, सूप वगैरह बनाए जा सकते हैं.

Farming Tasks : मई माह में खेती के ज़रूरी काम

Farming Tasks : मई माह में गरमी चरम पर होती है. लिहाजा हमेशा तो एसी में बैठना मुमकिन नहीं होता. इसलिए गरमी का कहर तो झेलना ही पड़ता है. जब बात किसानों की हो, तब तो आराम हराम होता है. किसान गरमी की लपट झेलते हुए बदस्तूर अपना काम करते रहते हैं और अनाज व अन्य फसलें उगाते रहते हैं.

पेश है, मई महीने के दौरान किए जाने वाले खेती के कामों का एक खुलासा:

* गेहूं की कटाई खत्म होने के बाद खाली खेतों को अगली फसल के लिहाज से तैयार कर लें.

* गेहूं के साथसाथ जई व जौ वगैरह फसलें दे चुके खेतों की मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई करें ताकि पिछली फसल के अवशेष खेत की मिट्टी में अच्छी तरह मिल जाएं और मिट्टी भुरभुरी हो जाए. पिछली फसल का मोटामोटा कचरा बटोर कर खेत से दूर फेंक देना चाहिए.

* मई की गरमी का खास फायदा यह होता है कि इस से तमाम कीड़ेमकोड़े झुलस कर खत्म हो जाते हैं. इसीलिए करीब 2 हफ्ते के अंतराल से खेतों की लगातार जुताई करते रहना चाहिए. ऐसा करने से गरमी व लू का असर मिट्टी में अंदर तक जाता है और वहां मौजूद खतरनाक बैक्टीरिया व फफूंदी नष्ट हो जाते हैं.

* मिट्टी को भरपूर धूप का सेवन कराना काफी फायदेमंद होता है. इस से मिट्टी का अच्छाखास इलाज हो जाता है और मिट्टी अगली फसल के लिए बढि़या तरीके से तैयार हो जाती है.

* अपने ईख के खेतों का खास खयाल रखें और 2 हफ्ते के अंतर से सिंचाई करते रहें, ताकि खेतों में भरपूर नमी बनी रहे.

* गन्ने के खेतों में सिंचाई के साथसाथ निराईगुड़ाई भी करते रहें ताकि खरपतवार न पनप सकें.

* गन्ने की फसल में कीड़ों व रोगों का खतरा बराबर बना रहता है, लिहाजा उन के मामले में सतर्क रहें. जरा भी जरूरत महसूस हो तो कृषि वैज्ञानिक से सलाह ले कर कीटों व रोगों का इलाज कराएं.

* अगर धान की अगेती किस्म की नर्सरी डालनी हो तो मई के आखिर तक डाल सकते हैं. नर्सरी में कंपोस्ट खाद या गोबर की सड़ी खाद का इस्तेमाल जरूर करें. इस के अलावा फास्फोरस व नाइट्रोजन का भी सही मात्रा में इस्तेमाल करें.

* धान की नर्सरी डालने में ध्यान रखें कि हर बार जगह बदल कर ही नर्सरी डालें. धान की नर्सरी से अच्छा नतीजा पाने के लिए सिंचाई में कमी न करें.

* अगर सिंचाई का इंतजाम हो तो चारे के लिहाज से ज्वार, बाजरा व मक्के की बोआई करें. पानी की दिक्कत होने पर इन फसलों की बोआई न करें, क्योंकि इन फसलों को ज्यादा पानी की जरूरत होती है.

* बरसीम, लोबिया व जई की बीज वाली फसलें इसी माह तैयार हो जाती हैं. ऐसे में उन की कटाई का काम खत्म करें.

* आखिरी हफ्ते में अरहर की अगेती किस्मों की बोआई करें, मगर बोआई से पहले जुताई कर के व खाद वगैरह मिला कर खेत को सही तरीके से तैयार करना जरूरी है.

* सूरजमुखी के खेतों की सिंचाई करें, क्योंकि गरम मौसम में खेत में नमी रहना जरूरी है.

* सूरजमुखी की सिंचाई के वक्त इस बात का खयाल रखें कि पौधों की जड़ें न खुलने पाएं. अगर पानी से जड़ें खुल जाएं, तो उन पर मिट्टी चढ़ाना न भूलें. मिट्टी चढ़ाने से पौधों को मजबूती मिलती है और वे तेज हवाओं को भी झेल लेते हैं.

* सूरजमुखी के खेत में मधुमक्खियों के बक्से छायादार जगह पर रखें. बक्सों के आसपास टबों में पानी भर कर रखें ताकि मधुमक्खियों को पानी की खोज में भटकना न पड़े. मधुमक्खियों से दोहरा फायदा होता है यानी शहद उत्पादन के साथसाथ परागण भी अच्छा होता है.

* सूरजमुखी की फसल को बालदार सूंड़ी व जैसिड रोग का काफी खतरा रहता है. ऐसा होने पर कृषि वैज्ञानिकों से सलाह ले कर दवा छिड़कें.

* गाजर, मूली, मेथी, पालक, शलजम, पत्तागोभी, गांठगोभी व फूलगोभी की बीज वाली फसलें अमूमन इस माह तक तैयार हो जाती हैं. ऐसे में उन की कटाई का काम निबटाएं. बीजों को निकालने के बाद सुखा कर उन का भंडारण करें.

* पहले डाली गई तुरई की नर्सरी के पौधे तैयार हो चुके होंगे, लिहाजा उन की रोपाई निबटाएं.

* तुरई की नई नर्सरी डालने का इरादा हो, तो यह काम फौरन खत्म करें. ज्यादा देर करने पर नर्सरी डालने का समय बीत जाएगा.

* खेत को अच्छी तरह तैयार करने के बाद बारिश के मौसम वाली भिंडी की बोआई करें. बोआई से पहले निराईगुड़ाई कर के खेत के तमाम खरपतवार निकालना न भूलें.

* अगर प्याज के खेतों में नमी कम लगे तो तुरंत हलकी सिंचाई करें. मई के अंत तक प्याज की पत्तियों को खेत पर झुका दें, ऐसा करने से प्याज की गांठें बेहतरीन होंगी.

* मई में लहसुन की फसल तैयार हो जाती है, लिहाजा उस की खुदाई करें. खुदाई के बाद फसल को 3 दिनों तक खेत में सूखने दें. 3 दिन बाद लहसुनों को उठा कर साफ व सूखी जगह पर रखें.

* मई में अकसर लीची के फलों के फटने की शिकायत सामने आती है. इस की रोकथाम के लिए लीची के गुच्छों व पेड़ों पर पानी का अच्छी तरह छिड़काव करना फायदेमंद रहता है.

* आम, अमरूद, नाशपाती, आलूबुखारा, पपीता, लीची व आंवला के बगीचों की 10-15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करते रहें. इस दौरान सिंचाई में लापरवाही बरतना ठीक नहीं है, क्योंकि गरमी से बागों का पानी बहुत तेजी से सूखता है.

* अगर औषधीय फसल तुलसी की बोआई करनी हो तो इस के लिए मई का महीना सही रहता है.

* मई में ही औषधीय फसल सफेद मूसली भी बो दें. यह बहुत ज्यादा फायदे वाली फसल होती है.

* औषधीय फसल सर्पगंधा की नर्सरी डालने के लिहाज से भी मई का महीना बेहद खास होता है.

* मई के तीसरे हफ्ते में पहाड़ी इलाकों में रामदाना की बोआई करें. बोआई से पहले बीजों को फफूंदीनाशक से उपचारित करें.

* मई में अकसर मछली पालने वाले तालाब सूखने लगते हैं, लिहाजा उन की मरम्मत कराएं ताकि उन का पानी बाहर न निकल सके. तालाब की सफाई का भी खयाल रखें. इस बात का खयाल रखें कि कोई भी तालाब में कचरा न डालने पाए.

* मई में मवेशियों को लू लगने का खतरा बढ़ जाता है, लिहाजा उन्हें बारबार साफ व ताजा पानी पिलाएं. लू लगने पर पशु के सिर पर बर्फ की पोटली रखें व पशु डाक्टर से इलाज कराएं.

* गरमी की वजह से गायभैंस के छोटे बच्चों को अकसर दस्त की बीमारी हो जाती है, ऐसे में उन्हें दूध कम पीने दें. बीमार बच्चे को दूसरे बच्चों से अलग रखें. जरूरी लगे तो डाक्टर को बुलाएं.

* मुरगियों को गरमी से बचाने के लिए उन के शेडों के अंदर कूलरों का इंतजाम करें या शेड की जालियों पर जूट के परदे लगा कर उन्हें पानी से भिगोते रहें. चूंकि मुरगियां नाजुक होती हैं, लिहाजा उन का खास खयाल रखना पड़ता है.

* मवेशियों के खाने का भी पूरा खयाल रखें. उन्हें बासी व खराब चारा न दें, वरना हैजा होने का खतरा रहता है. ऐसे में पशु को बचाना कठिन हो जाता है.

Farming Task

* आम के नए बाग लगाने के लिए 12×12 मीटर पर गड्ढों की खुदाई करें. नर्सरी में बीजू पौधों की सिंचाई करें और खरपतवार निकालें. फलों का चिडि़यों से बचाव करें. अगेती किस्मों के फलों की तोड़ाई करें और उन्हें बाजार में भेजने का इंतजाम करें.

* केले के पौधों में 50-60 ग्राम यूरिया प्रति पौधे की दर से मिलाएं. कीटों की रोकथाम के लिए कार्बोफ्यूरान 3 जी या फोरेट 10 जी 1 चाय चम्मच भर गोफे में डालें. फलों और डंठलों पर कालेभूरे धब्बे दिखाई देने पर कौपर औक्सीक्लोराइड 0.3 फीसदी के घोल का छिड़काव करें. इस के अलावा 5-7 दिनों के अंतर पर सिंचाई करें और नया बाग लगाने के लिए खेत की तैयारी और गड्ढ़ों की खुदाई करें.

* नीबूवर्गीय फलों के बाग की सिंचाई करें. कैंकर व्याधि और सफेद मक्खी का नियंत्रण संस्तुत विधियों के मुताबिक करें. नए बाग लगाने के लिए 6×6 मीटर पर गड्ढों की खुदाई करें.

* अमरूद के बागों में हलकी जुताई करने के बाद सिंचाई करें. सूखी टहनियों को निकाल दें.

* लीची के फलों को फटने से बचाने के लिए जमीन में सिंचाई द्वारा सही नमी बनाए रखें. नए बाग के लिए 10×10 मीटर की दूरी पर गड्ढों की खुदाई करें.

* अंगूर में 7 से 10 दिनों के अंतर पर सिंचाई करें. फल पकने की स्थिति से 1 हफ्ते पहले सिंचाई बंद कर दें. फल के गुणों में बढ़ोत्तरी के लिए इथ्रेल 1 मिलीलिटर प्रति 4 लिटर पानी की दर से या जिब्रेलिक एसिड की संस्तुत मात्रा का पौधों पर पर्णीय छिड़काव करें. फसल सुरक्षा के लिए जाल का इस्तेमाल करें.

* आंवले के नए बाग रोपने के लिए 8-10 मीटर की दूरी पर गड्ढों की खुदाई करें और नए रोपे गए बागों की 10-15 दिनों के अंतर पर सिंचाई करें.

* पपीते की फसल में लिंग भेद साफ होने पर नर पौधों को निकालें और जरूरत के मुताबिक सिंचाई का काम करें.

सब्जी और मसाले

* गरमियों में पैदा होने वाली सब्जियों की सिंचाई, तोड़ाई और उन्हें बाजार भेजने का काम करें.

* टमाटर, बैगन, मिर्च की फसलों में जरूरत के मुताबिक सिंचाई करें. फलों की तोड़ाई और बाजार का काम करें. टमाटर और बैगन के फलों से बीज निकालें. मिर्च के पके फलों को तोड़ कर सुखाने और बीज निकालने का काम करें.

* भिंडी की फसल में सिंचाई करें.

* फलों की तोड़ाई और बाजार ले जाने का इंतजाम करें. पकी फलियों को तोड़ने के बाद सुखा कर बीज निकालने का काम करें. बीमार और बेकार पौधों को उखाड़ कर जमीन में दबा दें.

* लहसुन और प्याज की खुदाई और उन्हें छाया में सुखाने का काम करें. छंटाई कर के उन्हें हवादार कमरों में रखें. लहसुन में पत्तियों सहित बंडल बना कर रखने से नुकसान कम होता है.

फूल और सुगंधित फसलें

* गुलाब की फसल में जरूरत के मुताबिक सिंचाई करें.

* रजनीगंधा में 15 दिनों के अंतराल पर दिए गए पोषक तत्त्व के मिश्रण को 400 लटर पानी में मिला कर प्रति एकड़ की दर से पर्णीय छिड़काव (फसल अवधि में कुल 16 छिड़काव) करें.

यूरिया 1.108 किलोग्राम, डीएपी 1.308 किलोग्राम, पोटैशियम नाइट्रेट 0.875 किलोग्राम, टी पाल 0.1 फीसदी.

* मेंथा में 10-12 दिनों के अंतर पर सिंचाई और निराईगुड़ाई करें. नाइट्रोजन की बची एकतिहाई मात्रा (40-50 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर) की टौप ड्रेसिंग का काम करें.

Spicy Chaat : दहीबड़ा (Dahi Vada) चटपटी चाट और लजीज व्यंजन

Spicy Chaat : दहीबड़ा (Dahi Vada) ऐसा खाने का सामान है जिस को चाट और खाना दोनों के साथ इस्तेमाल किया जाता है. वैसे तो दहीबड़ा (Dahi Vada) एक ही व्यंजन माना जाता है. प्रमुख रूप से यह दही और बड़ा 2 अलगअलग खाने की चीजों से मिल कर बनता है. बड़ा उड़द और मूंग दाल दोनों से बनता है. उत्तर भारत के अवध क्षेत्र में यह उड़द दाल से अधिक तैयार किया जाता है. छोटी से बड़ी कोई दावत हो, दहीबड़ा (Dahi Vada) के बिना पूरी नहीं होती है. चाट की कोई ऐसी दुकान नहीं होती है जहां दहीबड़ा(Dahi Vada) न मिलता हो.

स्ट्रीट फूड से ले कर रैस्टोरैंट तक में हर जगह दहीबड़ा (Dahi Vada) मिलता है. उत्तर भारत में खाने और चाट दोनों के साथ इस का इस्तेमाल किया जाता है. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में केवल दहीबड़ा (Dahi Vada) बेचने वाली कई मशहूर दुकानें भी हैं जो केवल मीठे दहीबड़े (Dahi Vada) ही बेचती हैं. लोगों की पसंद को देखते हुए चाट की दुकानों में भी दहीबड़ा (Dahi Vada) बनने लगे हैं. बड़ी दुकानों में एक प्लेट दहीबड़ा की कीमत 80 रुपए तक पहुंच गई है.

दहीबड़ा बनाने में बहुत ही आसान और खाने में मजेदार होता है. दहीबड़ा हर दिल को भाता है. बच्चों को बहुत पसंद है, साथ में सेहत से भरपूर है. इस वजह से यह गांव से ले कर शहर तक हर जगह पर इस का इस्तेमाल होता है. शादीविवाह की दावत में इस का खासतौर पर इस्तेमाल किया जाता है. उड़द दाल की सब से ज्यादा खपत दहीबड़ा बनाने में ही होती है.

उत्तर भारत में उड़द दाल की खेती की सब से बड़ी वजह यही है कि यहां दहीबड़ा का इस्तेमाल खूब होता है. शायद ही चाट की कोई ऐसी दुकान हो, शादी की कोई ऐसी दावत हो, जिस में दहीबड़ा न बनता हो.

उड़द दाल से बड़ा बनाने के लिए सामान : 250 ग्राम उड़द दाल, आधा कड़ाही तेल तलने के लिए, नमक स्वादानुसार, आधी चम्मच हींग, मिक्सर ग्राइंडर, बड़ा बनाने वाला सांचा, जिस में कम समय में ज्यादा बड़ा बन जाते हैं.

दहीबड़ा बनाने के लिए सामग्री : एक चम्मच भुना जीरा पाउडर, आधा चम्मच लाल मिर्च पाउडर, 2 कटोरी दही, एक छोटी कटोरी मीठी चटनी, एक छोटा चम्मच नमक मिला लें. इन को आपस में मिला कर दही तैयार हो जाता है.

जब दहीबड़ा परोसना हो, तब धीमे से बड़ा निकालें. इसे पहले से तैयार दही में डाल दें और परोस दें.

बबिता श्रीवास्तव कहती हैं कि दहीबड़ा को ऊपर से गार्निश करने के लिए हरा धनिया और मीठी चटनी के साथ चाट मसाला डाल सकते हैं. दहीबड़ा चाट की तरह और खाने के साथ भी इस्तेमाल कर सकते हैं.

उड़द दाल का बड़ा बनाने की विधि

उड़द दाल को अच्छे से धो कर पानी में 5 घंटे के लिए भिगो दें. अब पानी हटा दीजिए. दाल मिक्सी में डालिए और साथ में नमक व हींग डालिए. इसे पीस लें, जब तक चिकना पेस्ट न बन जाए.

अब कड़ाही लीजिए और तेज आंच पर रखिए. गरम होने के लिए तेल डालिए. बड़ा बनाने वाले सांचे से बड़े तैयार कीजिए. जब तेल गरम हो जाए, तब कड़ाही में बड़ा संभाल कर डालें. एक मिनट बाद इन को पलट दें. ऐसे ही पलटते रहें, जब तक कि सुनहरा न हो जाए. अब उन्हें बाहर निकालिए.

उड़द दाल के बड़े आप सूखे भी खा सकते हैं, ये खाने में बहुत स्वादिष्ठ लगते हैं. दहीबड़ा बनाने के लिए एक बड़े कटोरे में पानी लीजिए और आधा चम्मच नमक डालिए. अब उस में बड़ा डाल दें. आधा घंटे तक भीगने दें. जब आप को दहीबड़ा परोसना हो तब धीमे से बड़ा निकालें और पानी निचोड़ लें.

अब इस को पहले से तैयार दही में डाल दीजिए. अगर चाहें तो पानी में भीगे हुए ये बड़े 2 से 4 दिन तक महफूज रख सकते हैं. यह खराब नहीं होते हैं. ऐसे में जब खाने का समय हो तो दही में डाल कर इस को ताजा कर लें.

दहीबड़ा में सब से जरूरी होता है कि इस का दही कभी खट्टा न हो. खट्टा होने पर दहीबड़ा का स्वाद खराब हो जाता है.

Agricultural Equipment: कृषि यंत्रों से करें खरपतवार नियंत्रण

Agricultural Equipment : खेतीबारी में अब किसानों की मेहनत को कम करने के लिए मशीन बनाने वालों ने ऐसेऐसे यंत्र बना दिए हैं, जो बड़े काम के साबित हो रहे हैं. खरीफ की फसल में कुछ यंत्र बड़े उपयोगी होते हैं, जो किसानों को खरपतवार हटाने में मददगार बनते हैं.

ऐसे ही कुछ कृषि यंत्रों की जानकारी का लाभ उठाइए.

खरीफ के मौसम में मक्का, ज्वार, बाजरा जैसी फसलों को किसान उगाते हैं जो अनाज के अलावा पशुओं के चारे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. इस के अलावा दलहनी फसलों में अरहर, मूंग, उड़द, ज्वार आदि की भी खेती की जाती है.

इन फसलों से अच्छी उपज लेने के लिए किसान उन्नत किस्म के बीज बोने के साथ समयसमय पर फसल में खादपानी भी देते रहें. इस के बावजूद भी फसल में कुछ समय बाद अनेक तरह के खरपतवार उग आते हैं जो खेत में बोई गई फसल की बढ़वार में रुकावट पैदा करते हैं.

खरपतवार खासकर बोआई के 15 दिन बाद ही पनपने लगते हैं इसलिए किसानों को चाहिए कि वे इन खरपतवारों की रोकथाम पर खासा ध्यान दें जिस से फसल से बेहतर उपज ले सकें.

खरपतवार रोकने के लिए समयसमय पर निराईगुड़ाई करना बहुत जरूरी है. निराईगुड़ाई के लिए आज देश में अनेक कृषि यंत्र मौजूद हैं जो इस काम को आसान बनाते हैं. हाथ से चलाने वाले यंत्रों के अलावा पावरचालित यंत्र भी हैं. अनेक छोटेबड़े कृषि यंत्र निर्माता इन्हें बना रहे हैं.

निराईगुड़ाई में कृषि यंत्रों का इस्तेमाल :ध्यान रखें कि ये कृषि यंत्र लाइन में बोई गई फसलों के लिए बेहतर नतीजे देते हैं इसलिए फसल की बोआई लाइनों में ही करनी चाहिए, जबकि बिखेर कर बोई गई फसल में ये यंत्र कारगर नहीं हैं और इस तरह से बोई फसल में पैदावार भी कम ही मिलती है.

पावर वीडर यंत्र

यह मध्यम आकार का यंत्र है. पावर वीडर यंत्र ऐसे किसानों के लिए फायदेमंद है जो बड़ी मशीनें नहीं खरीद पाते हैं. छोटे साइज से ले कर बड़े साइज तक में यह यंत्र आता है. अपनी सुविधानुसार इस का इस्तेमाल किया व खरीदा जा सकता है.

यह यंत्र लाइन में बोई गई सब्जियों, गन्ना, कपास, फूलों की फसल, दलहनी फसलें वगैरह सभी के लिए फायदेमंद है. पहाड़ी इलाकों के लिए भी यह यंत्र सुविधाजनक होता है क्योंकि ऐसे इलाकों में छोटेछोटे खेत होते हैं जहां बड़े यंत्रों का पहुंचना कठिन होता है.

पावर वीडर यंत्र को चलाना बहुत ही आसान है. इस में एक इंजन लगा होता है जो यंत्र के हिसाब से कम या ज्यादा शक्ति का हो सकता है. ‘फार्म एन फूड’ पत्रिका के पिछले कई अंक में इस प्रकार के अनेक यंत्रों की जानकारी दी गई है.

देश में अनेक प्रगतिशील किसान और कृषि यंत्र निर्माता हैं जो ऐसे यंत्रों को बना रहे हैं जिस से किसान फायदा उठा सकते हैं.

सरकार की तरफ से इन कृषि यंत्रों की खरीद पर सरकारी अनुदान भी दिया जाता है जो राज्य और जाति के अनुसार कम या ज्यादा हो सकती है.

पावर वीडर यंत्र खरीदते समय सरकारी अनुदान का फायदा लेने के लिए जिला कृषि अधिकारी या जिला उद्यान या बागबानी कार्यालय में मिलें. जरूरी कागजात जमा कराने के बाद वरीयता के आधार पर इन यंत्रों पर अनुदान उपलब्ध कराया जाता है.

ट्रैकऔन कल्टीवेटर कम वीडर

ट्रैकऔन कंपनी के इस निराईगुड़ाई यंत्र से गन्ना, कपास, मैंथा, फूल, पपीता, केला, सब्जियां व दूसरी लाइनों में बोई गई फसलों की निराईगुड़ाई की जाती है. साथ ही, इस यंत्र से खेत में डाली गई खाद को भी आसानी से मिलाया जा सकता है.

इस यंत्र से निराईगुड़ाई का खर्चा बहुत कम आता है. इस यंत्र को कहीं भी ले जाना आसान है. इस यंत्र को धकेलना नहीं पड़ता. यह चलाने में बहुत ही आसान है और जरूरत के मुताबिक रोटर की चौड़ाई 12 से 18 इंच व गहराई घटाईबढ़ाई जा सकती है इसलिए इस यंत्र से खेत की जुताई की जा सकती है.

पैट्रोल और डीजल से चलने वाले इस के 2 मौडल बाजार में मुहैया हैं. इन दोनों मौडलों में एयरकूल्ड 4 स्टोक इंजन लगा है. मशीन का कुल वजन तकरीबन 80 किलोग्राम है.

ज्यादा जानकारी के लिए आप मोबाइल फोन नंबर 9412703140 या वैबसाइट से जानकारी ले सकते हैं.

Agricultural Equipment

बीसीएस का इटैलियन पावर वीडर

‘पावर वीडर कई यंत्रों का लीडर’ जी हां, इस यंत्र पर यह बात सटीक बैठती है. पावर वीडर से निराईगुड़ाई के अलावा अनेक काम किए जा सकते हैं. बीसीएस ने पावर वीडर के साथ ऐसे यंत्रों को पेश किया है जिन्हें इस वीडर के साथ जोड़ कर चलाया जाता है:

लौन मूवर : इस यंत्र को पावर वीडर से जोड़ कर लौन, बागबगीचे की घास को आसानी से काटा जाता है.

सीड ड्रिल : इस यंत्र को पावर वीडर से जोड़ कर खेत की बोआई कर सकते हैं.

स्प्रे पंप : पावर वीडर के साथ स्प्रे पंप जोड़ कर आटोमैटिक तरीके से खेत में कृषि रसायनों का छिड़काव या अन्य तरल पदार्थ का भी छिड़काव कर सकते हैं.

ग्रास कटर: यह घास काटने का कृषि यंत्र है. इसे पावर वीडर के आगे जोड़ कर चलाया जाता है. यह बड़ी ही सफाई के साथ घास काटता है.

बीसीएस के कृषि यंत्रों के बारे में ज्यादा जानकारी हासिल करने के लिए मोबाइल फोन नंबर 09758577305, 09416668485 पर संपर्क कर सकते हैं.

अशोका पावर वीडर

डीजल व पैट्रोल दोनों से चलने वाले इस यंत्र से कपास, गन्ना, लाइन में बोई गई सब्जियां वगैरह की निराईगुड़ाई की जाती है.

ज्यादा जानकारी के लिए आप कंपनी के फोन नंबर 91-5924-273176 या मोबाइल नंबर 09412636370 पर बात कर सकते हैं.

फाल्कन पावर वीडर

यह कंपनी पावर वीडर के अलावा अनेक प्रकार के बागबानी में काम आने वाले यंत्र बनाती है. इन के यंत्र के बारे में ज्यादा जानकारी हासिल करने के लिए कंपनी की वैबसाइट  या उन के फोन नंबर 91-161-2811899 पर संपर्क कर सकते हैं.

Spinach Farming : पालक खेती से लें भरपूर फायदा

Spinach Farming: पालक विटामिनों और खनिज पदार्थों से भरपूर फसल है. इसे सेहत का खजाना भी कहा जाता है. इस की पत्तियों का प्रयोग सब्जी के अलावा नमकीन पकोड़े, आलू के साथ मिला कर और भुजिया बना कर किया जाता है.

पालक (Spinach) खाने से शरीर को पोषक तत्त्व हासिल होते हैं. ज्यादा मात्रा में प्रोटीन, कैलोरी, खनिज पदार्थ, कैल्शियम और विटामिन ए, विटामिन सी का यह एक मुख्य साधन है जो दैनिक जीवन के लिए बहुत जरूरी है.

भूमि व जलवायु

पालक (Spinach) की खेती ठंडे मौसम में किए जाने की जरूरत होती है. इस की खेती के लिए ज्यादा तापमान की जरूरत नहीं होती, लेकिन कुछ जगह पर वसंत मौसम में भी इसे पैदा करते हैं यानी जायद की फसल के साथ पैदा करते हैं.

खेत की तैयारी

पालक (Spinach) की खेती सभी तरह की मिट्टी में की जा सकती है लेकिन सब से उत्तम बलुई दोमट होती है. पालक को हलकी अम्लीय जमीन में भी उगाया जा सकता है. उर्वरा शक्ति वाली जमीन में बहुत ज्यादा उत्पादन किया जा सकता है.

पालक के खेत में पानी के निकलने का सही बंदोबस्त होना चाहिए. जमीन का पीएच मान 6.0 से 6.7 के बीच ही अच्छा होता है.

3-4 बार खेत की जुताई कर खेत को तैयार करना चाहिए. जुताई के समय हरी या सूखी घास, खरपतवार वगैरह को खेत से बाहर निकाल कर जला देना चाहिए.

गोबर की खाद और रासायनिक खादों का इस्तेमाल : पालक (Spinach) की फसल के लिए 18-20 ट्रौली गोबर की सड़ी खाद और 100 किलोग्राम डीएपी प्रति हेक्टेयर की दर से बोने से पहले खेत तैयार करते समय मिट्टी में मिला देनी चाहिए व पहली और दूसरी कटाई के बाद 20-25 किलोग्राम यूरिया प्रति हेक्टेयर देने  से फसल की पैदावार अच्छी मिलती है.

घर के बगीचे के लिए भी यह एक मुख्य फसल है. क्यारी तैयार करते समय 4-5 टोकरी गोबर की सड़ी खाद या डाई अमोनियम फास्फेट 500 ग्राम 8-10 वर्गमीटर के लिए मिट्टी में बोआई से पहले मिला देते हैं. बाद में फसल को बढ़ने के बाद काटते हैं तो हर कटाई के बाद 100 ग्राम यूरिया उपरोक्त क्षेत्र में छिड़कना चाहिए, जिस से पत्तियों की बढ़वार जल्दी होती है और सब्जी के लिए पत्तियां जल्दीजल्दी मिलती रहती हैं.

उन्नतशील प्रजातियां

पालक (Spinach) की कुछ मुख्य प्रजातियां हैं जिन को भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा बोने की सिफारिश की जाती है, वे निम्नलिखित हैं:

पालक आल ग्रीन : इस प्रजाति को बोने से एकसाथ हरी पत्तियां हासिल होती हैं. पत्तियां 40 दिन में कटने के लिए तैयार हो जाती हैं. पत्तियां छोटीबड़ी न हो कर एकजैसी होती हैं. वृद्धि काल अंतिम सितंबर से जनवरी माह में शुरू का समय होता है. इसे 5-6 बार काटा जा सकता है.

पालक पूसा ज्योति : यह प्रजाति ज्यादा पैदावार देती है. पत्तियां समान, मुलायम होती हैं और गहरे हरे रंग की होती हैं. पहली कटाई 40-45 दिनों में शुरू हो जाती है. सितंबर से फरवरी माह के अंत तक पत्तियों की बढ़वार ज्यादा होती है.

फसल की 8-10 बार कटाई की जाती है.

यह फसल 45,000 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से पैदावार देती है.

पालक पूसा हरित : इस प्रजाति के पौधे ऊंचे, एकसमान और अच्छी बढ़वार वाले होते हैं. यह ज्यादा पैदा देने वाली प्रजाति है जो सितंबर माह से मार्च माह तक अच्छी बढ़वार करती है.

तय दूरी पर करें बोआई

पालक (Spinach) की बोआई का उचित समय सितंबर से नवंबर माह का है. देरी से बोई जाने वाली फसल फरवरी माह में भी बोई जाती है जो देर तक सब्जी देती है. इस तरह से नवंबर माह से अप्रैल माह तक पालक की सब्जी मिलती रहती है.

पालक (Spinach) को कतारों में भी बोया जाता है जो कि आगे सुविधाजनक रहता है. कतार से कतार की दूरी 20-35 सैंटीमीटर और पौधों से पौधों की दूरी 5-10 सैंटीमीटर रखते हैं. बीज की गहराई 1-2 सैंटीमीटर रखनी चाहिए.

Spinach Farming

बोने का तरीका

पालक (Spinach) की बोआई 2 तरीकों से की जाती है. पहली विधि में बीज को खेत में छिटक कर बोते हैं. इसे छिटकवां विधि कहते हैं. दूसरी विधि में बीज को समान दूरी पर कतारों में बोते हैं. कतारों की विधि सब से अच्छी रहती है. इस में निराई, गुड़ाई और कटाई आसानी से हो जाती है.

पालक (Spinach) के खेत के लिए बीज की 40 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर मात्रा की जरूरत होती है. अच्छे अंकुरण के लिए खेत में नमी का होना जरूरी है. बोने के बाद बीज को जमीन की ऊपरी सतह में मिला देना चाहिए.

बगीचे के लिए बीज की मात्रा 100-125 ग्राम 8-10 वर्गमीटर क्षेत्र के लिए सही होती है. पालक (Spinach) को गमलों में भी लगाया जा सकता है. एक गमले में 4-5 बीज बोने चाहिए. गमलों से भी समयसमय पर अच्छी पैदावार मिलती है. बोने के बाद बीज को हाथ से मिट्टी में मिला देना चाहिए और पानी अंकुरण के दौरान देना चाहिए.

सिंचाई और निराईगुड़ाई : पालक (Spinach) की फसल के लिए पहली सिंचाई अंकुरण के 6-7 दिन बाद करनी चाहिए. बीज की बोआई जमीन में पर्याप्त नमी होने पर करनी चाहिए. इस तरह से सर्दियों में 12-15 दिन के अंतराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए.

जायद या देर से बोने वाली फसल के लिए सिंचाई की ज्यादा जरूरत पड़ती है. इस तरह से पालक की फसल के लिए सिंचाई व नमी को लगातार बनाए रखना बहुत ही जरूरी है.

बगीचे की फसल के लिए भी नमी के लिए जरूरत के मुताबिक सिंचाई करते रहना चाहिए. गमलों में नमी के मुताबिक 2-3 दिन के बाद और जायद की फसल के लिए रोज शाम के समय ध्यान से पानी देते रहना चाहिए. पानी देते समय यह ध्यान रहे कि गमलों में लगे पौधे टूटे नहीं और फव्वारे से पानी ज्यादा ऊपर से नहीं देना चाहिए.

पालक (Spinach) की फसल में रबी फसल के खरपतवार ज्यादा हो जाते हैं. इन को पहली, दूसरी सिंचाई के तुरंत बाद खेत में निराईगुड़ाई करते समय उखाड़ या निकाल देना चाहिए. इस प्रकार से 2-3 निराइयां फसल में करना जरूरी है. ऐसा करने से फसल की उपज ज्यादा अच्छी मिलती है.

पालक की कटाई : पालक (Spinach) की कटाई डेढ़दो महीने के बाद शुरू हो जाती है. पालक की शाखाओं को कुछ ऊपर से काटना चाहिए, जिस से अगला फुटाव जल्दी हो जाए. नाइट्रोजन की मात्रा देने से और भी जल्दी शाखाएं तैयार हो जाती हैं. इस तरह से एक फसल से 4-5 कटाइयां मिल जाती हैं. बाद में कटाई न कर के बीज के लिए छोड़ा जा सकता है. कटाइयां 8-10 दिन के अंतराल पर करते रहनी चाहिए. कटाई दरांती या हंसिया से करनी चाहिए.

रोगों से पौधों का बचाव : पालक (Spinach) की फसल में 2 बीमारियां ज्यादा लगती हैं, जो फसल को नुकसान पहुंचाती हैं. पहली है, डंपिंग औफ और दूसरी है पाउडरी मिल्ड्यू.

डंपिंग औफ बीमारी में छोटा पौधा पिचक जाता है और मर जाता है. यह बीमारी पायथीयम अल्टीयम कवक द्वारा लगती है. इस पर नियंत्रण के लिए सैरासन या सीडैक्स कवकनाशक से बीजों को उपचारित कर के बोना चाहिए.

पाउडरी मिल्ड्यू बीमारी से पालक (Spinach) की फसल को ज्यादा नुकसान होता है. इस बीमारी में पौधों की पत्तियों पर छोटेछोटे पीले रंग के धब्बे बन जाते हैं जो आगे चल कर बड़ा रूप ले लेते हैं और पूरा पौधा ही खराब हो जाता है. नियंत्रण के लिए सल्फर का धूल भी फायदेमंद होता है. ऐसे रोगी पौधों को उखाड़ कर जला देना चाहिए.

पालक (Spinach) की फसल में कुछ कीट भी नुकसान पहुंचाते हैं. कैटरपिलर व ग्रासहोपर मुख्य कीट हैं जो फसल पर लगते हैं. इन पर नियंत्रण के लिए बीएचसी या डीडीटी पाउडर का छिड़काव करना चाहिए. पालक को छिड़काव से 10 दिन बाद तक इस्तेमाल में नहीं लाना चाहिए.

उपज : पालक (Spinach) की उपज प्रत्येक किस्म या प्रजाति के ऊपर निर्भर करती है. पूसा आल ग्रीन 30,000 किलोग्राम और पूसा ज्योति की उपज 45,000 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर उपज हासिल होती है. औसतन प्रत्येक प्रजाति की उपज 25-35 हजार किलोग्राम प्रति हेक्टेयर पैदावार मुहैया हो जाती है. बगीचे में भी 20-25 किलोग्राम पत्तियां हासिल हो जाती हैं जो समयसमय पर मिलती रहती हैं.

समेकित खेती (Integrated Farming) समय की जरूरत

Integrated Farming : नालंदा जिले की रहने वाली अनिता देवी ने कभी सोचा भी नहीं था कि समेकित खेती से उन की और उन के परिवार की दशा और दिशा ही बदल जाएगी. साल 2008 तक वे परंपरागत खेती करती रहीं और कई तरह की कठिनाइयों से जूझती रहीं. एक दिन उन्होंने कुछ अलग करने की ठानी और मशरूम की खेती करने का मन बनाया. उन्होंने इस के लिए बाकायदा ट्रेनिंग ली और मशरूम का उत्पादन चालू कर दिया. मशरूम बीज उत्पादन, मछलीपालन, मुरगीपालन और मधुमक्खीपालन भी शुरू कर दिया.

समेकित खेती करने पर अनिता को भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने जगजीवन राम अभिनव किसान पुरस्कार दिया था. इस के अलावा साबौर के बिहार कृषि विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें नवाचार कृषक पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है.

छोटे से खेत से भी समेकित खेती कर के किसान अपने परिवार का बेहतर तरीके से लालनपालन कर सकते हैं. परंपरागत खेती के साथ मुरगीपालन, मछलीपालन, मधुमक्खीपालन व बीज उत्पादन आदि कर के किसान अपनी आमदनी को कई गुना ज्यादा बढ़ा सकते हैं.

भारतीय कृषि अनुसंधान केंद्र पिछले 5 सालों से उत्तर बिहार के मखाना किसानों को मखाने के साथसाथ सिंघाड़े की समेकित खेती करने के गुर सिखाने में लगा हुआ है. इस दौरान केंद्र ने इस प्रयोग पर करीब 25 लाख रुपए खर्च कर दिए, पर महज 23 हेक्टेयर जलक्षेत्र में ही समेकित खेती करने में कामयाबी मिल सकी है.

कृषि वैज्ञानिकों का दावा है कि अगर बिहार के सभी मखाना किसान एकसाथ समेकित खेती करें, तो उन की आमदनी में 2 गुना इजाफा हो सकता है.

फिलहाल प्रयोग के तौर पर दरभंगा जिले और उस के आसपास के 23 हेक्टेयर जलक्षेत्रों में मखाने के साथ मछली और सिंघाड़े की खेती की गई है. उत्तर बिहार के 13000 हेक्टेयर जलक्षेत्र में मखाने की खेती की जाती है. इन सभी तालाबों और पोखरों में समेकित खेती करने के लिए किसानों को जागरूक बनाया जा रहा है.

बिहार में कुल जलक्षेत्र 3 लाख 61 हजार हेक्टेयर में फैला हुआ है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पटना सेंटर और दरभंगा के मखाना अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों के ताजा शोध में यह बात उभर कर सामने आई है कि 1 हेक्टेयर जलक्षेत्र में अगर केवल मखाने की खेती की जाती है, तो प्रति हेक्टेयर 40000 रुपए की आमदनी होती है.

अगर इतने ही जलक्षेत्र में मखाने के साथ मछली और सिंघाड़े की खेती भी की जाए, तो आमदनी की रकम 80000 रुपए तक हो सकती है. यह आमदनी कुल लागत को निकालने के बाद होती है. प्रति हेक्टेयर जलक्षेत्र में मखाने की खेती करने के बाद अगर उस में मछलीपालन किया जाए तो 11000 रुपए और सिंघाड़ा लगाने पर 17000 रुपए का अतिरिक्त खर्च आता है.

बिहार सरकार ने समेकित खेती को राष्ट्रीय कृषि विकास योजना में शामिल कर रखा है. सरकारी दावा है कि समेकित खेती के जरीए 1 एकड़ खेत का मालिक भी खेती कर के अपने समूचे परिवार का पेट भर सकेगा और अपनी सुखसुविधाओं पर भी रकम खर्च कर सकेगा. जलजमाव वाले इलाकों में मछलीपालन के साथ बकरीपालन और मुरगीपालन भी किया जा सकता है.