Sweets : बेसन के लड्डू , किफायती और मजेदार

Sweets : लड्डू बेसन के हों या बूंदी के, सब से ज्यादा खाए और बेचे जाते हैं. इन्हें किसी भी छोटीबड़ी दुकान से खरीदा जा सकता है. मिठाई कारोबार में बेसन के लड्डुओं की बहुत ज्यादा अहमियत है. इन को कहीं ले जाने में किसी तरह से खराब होने की परेशानी नहीं होती है. खुशी के हर मौके पर लड्डुओं का साथ जरूरी होता है. बेसन और बूंदी से बनने वाले लड्डू सब से खास होते हैं. लड्डू बनाने के तौरतरीकों से इस की अलग पहचान बनती है. मोतीचूर का लड्डू छोटीछोटी बेसन की बूंदियों से तैयार किया जाता है. इस का रंग बेसन या बूंदी के लड्डू से अलग होता है. जहां साधारण लड्डू पीले रंग के होते हैं, वहीं मोतीचूर के लड्डू केसरिया रंग के होते हैं. देशी घी से बनने वाले मोतीचूर के लड्डू खाने में अलग स्वाद देते हैं. रिफाइंड और डालडा से बनने वाले लड्डुओं के मुकाबले देशी घी से तैयार लड्डू कीमत में महंगे जरूर होते हैं, पर इन का स्वाद निराला होता है.

कुछ समय पहले शादी में लड़की की विदाई के समय लड्डुओं को बड़ेबड़े टोकरों में भर कर दिया जाता था. इन टोकरों से लड़की वालों की हैसियत का अंदाजा भी लगाया जाता था. बदलते समय में विवाह की इस परंपरा में दूसरी मिठाइयां भी शामिल हो गई हैं, पर लड्डू की जगह अभी कायम है. शगुन के रूप में लड्डुओं को अभी भी खास माना जाता है. कुछ लोग अपनी खुशियों में 51 और 101 किलोग्राम के स्पेशल लड्डू भी बनवाते हैं.

लड्डू बनाने के कारीगर रमेश गुप्ता कहते हैं, ‘लड्डू बनाने के लिए बेसन, घी, चीनी, काजू, बादाम और इलायची का इस्तेमाल किया जाता है. अगर बूंदी का लड्डू बनाना है, तो बेसन से पहले बूंदी बनाई जाती है, इस के बाद चाशनी में डाल कर उस से लड्डू तैयार किए जाते हैं.’

कैसे बनाते हैं लड्डू

रमेश गुप्ता कहते हैं, ‘बेसन के लड्डू बनाने के लिए 2 कप बेसन के साथ आधा कप घी, 1 कप पिसी चीनी, 5-6 काजूबादाम और इलायची की जरूरत होती है. काजू, बादाम और इलायची को दरादरा पीस लें. बेसन को छान लें. कड़ाही को गरम करें. उस में घी डालें. फिर बेसन और दरदरे पीसे काजू, बादाम व इलायची डाल कर मध्यम आंच पर भूनें. जब बेसन का रंग सुनहरा हो जाए तो उस में चीनी मिला दें. चीनी पिघल कर बेसन में ठीक से मिल जाती है. कड़ाही को आंच से उतार कर बेसन के मिश्रण को ठंडा होने दें. ठंडा होने के बाद थोड़ाथोड़ा मिश्रण हथेली के बीच में ले कर गोलगोल आकार के लड्डू बनाएं.’

बूंदी के लड्डू बनाने के लिए पहले बेसन से बूंदी बनाई जाती है. उस में खाने वाला रंग मिला कर बेसन से अलग रंग के लड्डू भी तैयार किए जा सकते हैं. बूंदी के आकार से ही लड्डू का स्वाद जुड़ा होता है. महीन बूंदी वाले लड्डू को मोतीचूर का लड्डू कहते हैं. तैयार बूंदी को चीनीपानी से तैयार चाशनी में मिलाया जाता है. कुछ ठंडा होने पर लड्डू बना कर तैयार किए जाते हैं. सजावट के लिए मेवों का इस्तेमाल किया जा सकता है.

Machine : किसान ने बनाई खूबियों वाली सस्ती कंबाइन मशीन

Machine : भारत की कृषिजोत छोटी है और खेतों तक जाने वाले रास्ते संकरे व पेड़ों से घिरे होते हैं. ऐसे में इन खेतों तक बड़े कृषि यंत्रों को ले जाना मुश्किल होता है. खेती में काम आने वाले जुताई, बोआई, मड़ाई वगैरह के कृषि यंत्र अलगअलग फसलों के लिए अलगअलग तरह के होते हैं.

मड़ाई के कृषि यंत्र फसल के अनुसार अलगअलग तरह के बने होते हैं, जिन के द्वारा गेहूं, धान, राई वगैरह  की मड़ाई की जाती है. छोटे किसानों के लिए अपनी फसल की मड़ाई के लिए महंगे व बड़े यंत्र खरीदना मुश्किल होता है. ऐसे में कभीकभी मड़ाई में देरी हो जाती है और देरी की वजह से कई बार बारिश या अन्य वजहों से फसल खराब भी हो जाती है.

किसानों की इन्हीं परेशानियों को देखते हुए उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले के विकास खंड कप्तानगंज के गांव खरकादेवरी के रहने वाले 12वीं तक पढ़े नवाचारी किसान आज्ञाराम वर्मा ने एक ऐसी कंबाइन मशीन (Machine)  ईजाद की है, जो कई खूबियों के साथ कम लागत से तैयार की जा सकती है. यह विचार उन के दिमाग में तब आया जब साल 2015 में उन की तैयार गेहूं की फसल बरसात की वजह से कई बार भीग गई और वह अपने गेहूं की फसल की मड़ाई नहीं कर पाए. उन्होंने सोचा क्यों न एक ऐसी गेहूं कटाईमड़ाई की मशीन (Machine) तैयार की जाए जो कटाई व मड़ाई करने के साथसाथ भूसा भी तैयार कर सके.

आज्ञाराम वर्मा ने इन्हीं परेशानियों को ध्यान में रख कर एक ऐसी कंबाइन मशीन (Machine) का खाका तैयार किया, जो गेहूं की मड़ाई करने के साथसाथ भूसा भी तैयार कर सकती थी. इस के बाद वे इस मशीन (Machine) को बनाने में जुट गए. इस के लिए उन्होंने लोहे के तमाम पुर्जे व जरूरी सामान खुले बाजार से खरीद कर अपनी एक वर्कशाप तैयार कर के मशीन (Machine) बनानी शुरू कर दी. 11 नवंबर 2015 को उन्होंने एक ऐसी कंबाइन मशीन (Machine) बना कर तैयार की, जो छोटी होने के साथसाथ किसी भी संकरे रास्ते से खेतों में पहुंचाई जा सकती थी.

उन के द्वारा तैयार की गई इस कंबाइन मशीन (Machine) को बनाने में बहुत ही कम खर्च आया. करीब 2 लाख 75 हजार रुपए में बनी इस कंबाइन मशीन (Machine) का वजन 18 क्विंटल है. यह अन्य कंबाइन मशीनों से करीब 5 गुना सस्ती है. साथ ही इस की खूबियां इसे और भी बेहतर बनाती हैं. इस मशीन को चलाने के लिए किसी तरह की ट्रेनिंग की जरूरत नहीं होती है और मशीन में आने वाली खराबी को किसान खुद ठीक कर सकता है. इस के लिए अधिक पावर के ट्रैक्टर की भी आवश्यकता नहीं होती है. यह कंबाइन मशीन गेहूं की फसल को जड़ के साथ काटती है.

Machine

खूबियां बनाती हैं बेहतर : इस कंबाइन मशीन की खूबियां इसे बेहतर साबित करती हैं. इस मशीन द्वारा 1 घंटे में करीब 1 एकड़ खेत की कटाई की जा सकती है. 7 फुट चौड़े कटर वाली इस मशीन में 9 बेल्टों का प्रयोग किया गया है. इस में इस्तेमाल किए गए सभी कलपुर्जे बाजार में आसानी से मिल जाते हैं और मशीन में किसी तरह की खराबी आ जाने से इस को आसानी से ठीक किया जा सकता है. इस मशीन से एकसाथ गेहूं की कटाई व भूसा बनाने का काम किया जा सकता है. इस के लिए मशीन में अलगअलग 2 भंडारण टैंक लगाए गए हैं. मशीन के बगल में मड़ाई के दौरान गेहूं का भंडारण हो जाता है व मड़ाई से निकलने वाला भूसा मशीन के ऊपर लगे टैंक में चला जाता है.

इस मशीन को ट्रैक्टर के आगे या पीछे जोड़ कर चलाया जा सकता है. ट्रैक्टर के पीछे जोड़ने के लिए 20 हजार रुपए खर्च होते हैं व 20 मिनट का समय लगता है व आगे जोड़ने में 20 हजार रुपए खर्च आता है व 1 घंटे का समय लगता है. फसल की मड़ाई के बाद इस कंबाइन मशीन को ट्रैक्टर से अलग कर के ट्रैक्टर को दूसरे इस्तेमाल में भी लाया जा सकता है.

किसान आज्ञाराम वर्मा द्वारा तैयार की गई मशीन को देखने के लिए दूरदूर से लोग आ रहे हैं और उन के द्वारा तैयार की गई इस मशीन की भारी मांग बनी हुई है. बस्ती जिले के सांसद हरीश द्विवेदी ने किसान आज्ञाराम वर्मा के खेतों में जा कर खुद इस मशीन से गेहूं की मड़ाई कर के इस की खूबियों को जांचापरखा. उन का कहना है कि यह मशीन छोटे किसानों के लिए फायदेमंद साबित होगी.

कृषि विज्ञान केंद्र बस्ती में कृषि अभियंत्रण के वैज्ञानिक इंजीनियर वरुण कुमार का कहना है कि आज भी खेतीकिसानी में काम में आने वाली मशीनें महंगी हैं, जिस की वजह से सभी किसान उन का फायदा नहीं ले पाते हैं. ऐसे में किसान आज्ञाराम वर्मा द्वारा तैयार की गई कंबाइन मशीन छोटे किसानों को आसानी से मिल सकेगी.

इस के पहले भी किसान आज्ञाराम वर्मा ने खेती से जुड़ी कई खोजों की हैं. उन्होंने जहां अधिक चीनी की परते वाली गन्ने की नई प्रजाति कैप्टन बस्ती के नाम से विकसित की है, वहीं गेहूं की नई किस्म एआर 64 भी विकसित की है. वे वर्तमान में खुशबूदार धान की नई किस्म को तैयार करने पर काम कर रहे हैं. आज्ञाराम वर्मा को उन की खोजों की वजह से राष्ट्रीय नव प्रवर्तन संस्थान द्वारा मार्च में 1 हफ्ते के लिए राष्ट्रपति भवन में अपने गन्ने की नई प्रजाति को प्रदर्शित करने का मौका भी दिया गया था. इसी के साथ ही केंद्रीय कृषि मंत्री द्वारा उन्हें नवाचारी किसान के रूप में सम्मानित भी किया गया है.

आज्ञाराम वर्मा का कहना है कि कोई भी किसान चाहे तो खेती में काम आने वाले नए कृषि यंत्रों व बीज वगैरह को ईजाद कर सकता है, क्योंकि वह खेती के दौरान आने वाली तमाम समस्याओं को महसूस करता है. उस दौरान उस के दिमाग में परेशानियों को दूर करने के लिए तमाम ऐसे खयाल आते हैं, जो किसी भी नई मशीन या बीजों को जन्म दे सकते हैं.

आज्ञाराम वर्मा द्वारा तैयार यह मशीन छोटे किसानों के लिए फायदेमंद साबित हो रही है. आज्ञाराम ने अपनी इस कंबाइन मशीन का नाम कैप्टन बस्ती रखा है. इस मशीन के बारे में अधिक जानकारी के लिए आज्ञाराम वर्मा के मोबाइल नंबरों 7398349644 व 9721885878 पर संपर्क किया जा सकता है.

Rice Planter : बड़े काम का धान रोपने का यंत्र

Rice Planter: आमतौर पर धान की खेती करने के लिए धान पौध की रोपाई परंपरागत तरीकों से की जाती है. हाथ से रोपाई करने का काम बहुत थकाने वाला होता है. धान की रोपाई में कई घंटों तक झुक कर रोपाई करनी होती है, जिस से बहुत परेशानी होती है. दूसरी तरफ आजकल मजदूरों की भी काफी कमी है. इन सब परेशानियों से बचने के लिए अब ज्यादातर किसान धान की रोपाई हाथ की जगह मशीनों से कर रहे हैं.

धान की रोपाई के लिए कई तरह के रोपाई यंत्र बाजार में मौजूद हैं. इन में हाथ से ले कर पैट्रोलडीजल से चलने वाले प्लांटर तक मौजूद हैं, जो 4, 6 और 8 कतारों में धान की रोपाई करते हैं. इन से रोपाई करने पर समय की बचत होती है और लागत भी कम आती है. रोपाई यंत्र एक निश्चित दूरी पर पौधों की रोपाई करता है, जिस से पैदावार अच्छी मिलती है.

धान रोपाई की सेल्फ प्रोपैल्ड

मशीन (चीनी डिजाइन)

आज के समय में किसानों में यह यंत्र खास पसंद किया जा रहा है. यह 8 कतारों में धान की बोआई करता है. यह धान की पौध को उठा कर बोआई करता है. इस में 3 एचपी का डीजल इंजन लगा होता है.

इस से कतार से कतार की दूरी 10-12 सेंटीमीटर रखी जा सकती है. साथ ही, मशीन के हैंडल को दाएंबाएं भी घुमाया जा सकता है व पौध रोपने के लिए यंत्र की गहराई को भी बढ़ायाघटाया जा सकता है.

1 दिन में यह 1 हेक्टेयर खेत में धान की रोपाई कर सकता है. इस की कीमत करीब 1,25,000 रुपए के आसपास है.

जापानी पैडी प्लांटर

इस जापानी पैडी प्लांटर से मात्र 1 लीटर पैट्रोल से महज डेढ़ घंटे में 1 एकड़ खेत में धान की रोपाई की जा सकेगी. इस मशीन की खासीयत यह है कि अकेला किसान ही इस मशीन को चला सकता है.

मध्य प्रदेश सरकार ने पैडी प्लांटर मशीन के जरीए धान की रोपाई करने को बढ़ावा देने के लिए खास योजना भी बनाई है. मध्य प्रदेश के कृषि विभाग द्वारा इस मशीन का डेमो भी दिया जा रहा है.

मध्य प्रदेश के कृषि विभाग से मिली जानकारी के अनुसार अभी पैडी प्लांटर की कीमत 2 लाख, 50 हजार रुपए है. सरकार किसानोें को 1 लाख, 44 हजार रुपए तक की अधिकतम सब्सिडी देगी. किसानों को महज 1 लाख, 06 हजार रुपए ही देने होंगे.

पैडी प्लांटर से संबंधित अधिक जानकारी के लिए कुबोटा स्वप्निल से उन के मोबाइल नंबर पर 08754569228 पर बात कर सकते हैं.

महेंद्रा एंड महेंद्रा का पैडी प्लांटर

कृषि यंत्रों को बनाने वाली इस कंपनी की भी धान रोपाई की स्वचालित मशीन मौजूद है. यह मशीन 1 घंटे में 1 एकड़ खेत में धान की रोपाई करती है, जिस में 2 लीटर पैट्रोल की खपत होती है. इस मशीन को चलाने के लिए 2 व्यक्तियों की जरूरत होती है.

आरसी एग्रो का पैडी प्लांटर

इस कंपनी में काम करने वाले आशीष गुप्ता ने बताया कि उन के पास इस धान रोपाई यंत्र के 2 मौडल मौजूद हैं.

पहला मौडल 6 लाइनों में धान की रोपाई करता है. रोपाई करते समय पौधे से पौधे की दूरी घटाईबढ़ाई जा सकती है, जो अधिकतम 12 इंच तक कर सकते हैं. इस मौडल में 4 स्पीड गियर हैं. इस मशीन में 6.5 हार्सपावर का डीजल इंजन लगा होता है. मशीन से काम करने के लिए 3 लोगों की जरूरत होती है. एक मशीन को चलाता है और उस के सहयोगी रोपाई की देखभाल के लिए साथ रहते हैं. तीनों के लिए प्लांटर पर बैठने की जगह भी होती है. मशीन की कीमत 1 लाख, 60 हजार रुपए से ले कर 1 लाख, 80 हजार रुपए तक है.

दूसरा मौडल 8 लाइनों में रोपाई करता है. इस मौडल में भी पौधे से पौधे की दूरी घटाईबढ़ाई जा सकती है. इस मशीन की कीमत 1 लाख, 85 हजार रुपए है. मशीन में हाइड्रोलिक सिस्टम होने के कारण कीमत में उतारचढ़ाव होता है.

आरसी एग्रो कंपनी पारंपरिक खेती को आधुनिक खेती की ओर अग्रसर करने की दिशा में काम कर रही है. यह कंपनी किसानों के लिए कंबाइन हार्वेस्टर, हैंड हार्वेस्टर व बेलर (बंडल बनाने की मशीन) जैसे कृषि यंत्र बनाती है. अधिक जानकारी के लिए किसान कंपनी के फोन नंबरों 91-7714062177, 2582431 व मोबाइल नंबर 9425513061 पर बात कर सकते हैं या कंपनी के कर्मचारी आशीष गुप्ता से उन के मोबाइल नंबर 09827162692 पर संपर्क कर सकते हैं.

Onion : गरमी का कवच है प्याज

Onion : प्याज काटते वक्त अकसर आंखों में आंसू आ जाते हैं, मगर आंखें भर देने वाला प्याज गुणों से भी भरपूर होता है. इस में पाए जाने वाले औषधीय तत्त्व सेहत के लिहाज से लाजवाब होते हैं. गरमी के जालिम मौसम में कच्चे प्याज का असर किसी अमृत से कम नहीं होता.

प्याज को सही मानों में गरमी का कवच कहा जा सकता है. यह हमारे शरीर को गरमी के मौसम में ठंडक पहुंचाता है. इस की असरदार तासीर गरमी की तमाम तकलीफों को दूर करने की कूवत रखती है, खासतौर पर मईजून की भयंकर लू के खिलाफ प्याज का कवच बेहद कारगर साबित होता है. खाने में रोजाना कच्चा प्याज शामिल करने से लू लगने का खतरा जड़ से गायब हो जाता है.

वैसे तो तमाम लोग सलाद में कच्चा प्याज शौक से खाते हैं, पर कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिन्हें कच्चा प्याज खाने से परहेज होता है. दरअसल, ऐसे लोग चाह कर भी कच्चा प्याज नहीं खा पाते. कच्चा प्याज खाने से ऐसे लोगों का जी कच्चाकच्चा सा होने लगता है.

ऐसे नाजुक मिजाज लोग कच्चे प्याज की महक को झेल नहीं पाते. इस में दिक्कत वाली कोई बात नहीं है. ऐसे लोगों के लिए प्याज का लाभ उठाने का दूसरा रास्ता हाजिर है. साबुत प्याज को छिलके सहित थोड़ा सा बेक कर लें. इस के बाद उसे छील कर सलाद के रूप में खाएं. बेक किए गए प्याज का स्वाद काफी अच्छा लगता है.

वैसे प्याज की गंध से हैरानपरेशान होने वाले लोग ज्यादा नहीं होते, लिहाजा यह मसला बहुत कम सामने आता है. आमतौर पर तो खूबियों से भरपूर प्याज को लोग बहुत ही शौक से खाते हैं. एक गोपाल मामा थे. उन का लंच और डिनर देख कर लोग दंग रह जाते थे, क्योंकि दोनों वक्त वे 5-5 प्याज 2-2 टुकड़ों में कर के अपनी प्लेट में रखते थे और दालचावल सब्जीरोटी के साथ सारा प्याज जायका लेले कर चट कर जाते थे. यकीनन गोपाल मामा की सेहत बहुत अच्छी थी और कभी किसी ने उन्हें बीमार पड़ते नहीं देखा.

हकीकत तो यह है कि बगैर प्याज के लजीज नमकीन पकवानों की कल्पना भी नहीं की जाती. मटनचिकन व फिश से जुड़े तमाम पकवानों में भरपूर मात्रा में प्याज का इस्तेमाल किया जाता है. उम्दा किस्म की सभी सब्जियों में प्याज डाला जाता है.

हर तरह के सलाद में जरूरी तौर पर प्याज शामिल रहता है. इसी तरह भीगे मौसम में बनने वाले पकौड़ों में भी प्याज अव्वल नंबर पर पसंद किया जाता है. जब प्याज 100 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बिकता है, तब भी प्याज के कायल उस के बगैर रह नहीं पाते और किसी नशेड़ची की तरह अपनी गाढ़ी कमाई महंगे प्याज पर लुटाते हैं.

झुग्गीझोंपड़ी में रहने वाले लोग भी और चाहे कुछ न खाएं पर मोटीमोटी रोटियों के साथ प्याज खाने से नहीं चूकते. भले ही उन्हें कच्चे प्याज के औषधीय गुणों की जानकारी नहीं होती, पर वे उसे जानेअनजाने में खाते छक कर हैं. अलबत्ता जब प्याज बहुत महंगा हो जाता है, तब उन्हें उसे न खा पाने का बहुत ही ज्यादा मलाल रहता है.

औषधीय गुण

लहसुन की तरह ही प्याज में औषधीय गुण बेहिसाब होते हैं. पुराने जमाने में प्याज का इस्तेमाल प्लेग और कालरा जैसी खतरनाक बीमारियों के इलाज में किया जाता था. यह इलाज खासा कारगर साबित होता था. इतिहास के मुताबिक रोमन सम्राट नेरो सर्दी के मौसम में ठंड से बचाव के लिए प्याज का सेवन करते थे. प्याज की अहमियत से जुड़े ऐसे और भी वाकए इतिहास में दर्ज हैं.

गांवों में आज भी प्याज का तरहतरह से इस्तेमाल किया जाता है. गांव के लोग आमतौर पर डाक्टरी इलाज कम पसंद करते हैं, लिहाजा प्याज जैसी चीजें उन्हें काफी रास आती हैं. खांसी व सर्दीजुकाम जैसी तकलीफों में प्याज को काफी कारगर माना जाता है. वैद्य लोग लू व अस्थमा जैसी तकलीफों के इलाज में भी प्याज का बाकायदा इस्तेमाल करते हैं. गांवों में प्याज को लू के खिलाफ बेहद कारगर माना जाता है. लू से बचने के लिए गांव के लोग अपनी जेब में साबुत प्याज ले कर घर से बाहर निकलते हैं. अगर लू लग जाती है, तो प्याज और पोदीने का अर्क बतौर दवा बेहद कारगर साबित होता है.

वैज्ञानिकों के मुताबिक कच्चा प्याज खाना ज्यादा फायदेमंद होता है. भले ही इस का जायका कुछ तीखा होता है, पर इस का असर कमाल का होता है. कच्चे प्याज में आर्गेनिक सल्फर कंपाउंड और एक किस्म का तेल होता है. ये चीजें सेहत के लिहाज से फायदेमंद होती हैं. ये खूबियां पके प्याज में खत्म हो जाती हैं.

न्यूट्रीशनिस्ट कविता देवगन के मुताबिक आंत की सेहत के लिए प्रोबायोटिक जरूरी है. मगर प्रोबायोटिक को पचाने के लिए प्रीबायोटिक की जरूरत होती है और प्रीबायोटिक का काम करते हैं प्याज, लहसुन, राई और जौ. इसीलिए प्याज की अहमियत और बढ़ जाती है. प्याज में क्रोमियम भी होता है, जो ब्लडशुगर को नियमित करता है और डायबिटीज से हिफाजत करता है. इस में पाया जाने वाला बायोटिन त्वचा, बाल, लीवर व नर्वस सिस्टम के लिए जरूरी होता है. बायोटिन आंखों के लिए भी जरूरी है. लिहाजा ज्यादा से ज्यादा कच्चा प्याज खाना चाहिए. अगर कच्चा प्याज खाना हो, तो उसे काटने के बाद फौरन खा लेना चाहिए, क्योंकि कुछ देर रखा रहने से उस का असर कम हो जाता है.

Sandwich :जम्मू का कल्हाड़ी कुल्चा: पनीर ब्रेड सैंडविच

Sandwich : जम्मू कश्मीर देश का सब से मशहूर पर्यटन क्षेत्र है. पूरी दुनिया के लोग यहां घूमने आते हैं. जम्मू में वैसे तो खाने की बहुत सी चीजें मिलती हैं, पर कल्हाड़ी कुल्चा यहां की सब से खास खाने की डिश है. इसे यहां का स्ट्रीट फूड भी कह सकते हैं. जम्मू से श्रीनगर और पटनी टौप जाने के रास्ते में पड़ने वाली खाने की दुकानों में सब से ज्यादा कल्हाड़ी कुल्चा बिकता है. जब ब्रेड और पाव का चलन कम था, तो यह 2 रोटियों यानी कुल्चों के बीच रख कर तैयार किया जाता था.

अब यह ब्रेड या पाव के साथ रख कर तैयार होता है. यह एक तरह से पनीर ब्रेड सैंडविच होता है. पनीर का इस्तेमाल होने से यह खाने में बहुत टेस्टी और पौष्टिक होता है. इसे खाने के बाद देर तक भूख नहीं लगती है. पर्यटकों द्वारा पसंद किए जाने की वजह से इस की बहुत सारी दुकानें यहां मिलती हैं. यह रोजगार का अच्छा साधन बन गया है.

कल्हाड़ी कुल्चा बनाने के लिए दूध, नीबू का रस, ब्रेड, चाट मसाला, मीठी चटनी और कटे हुए प्याज की जरूरत पड़ती है. इसे बनाने के लिए सब से पहले दूध को गरम कर के ठंडा होने के लिए रख दें. इस में नीबू का रस डाल दें, जिस से दूध पनीर की तरह जम जाएगा और उस का पानी अलग हो जाएगा. दूध को सफेद कपड़े में बांध लें और जब इस का पानी निकल जाए तो तैयार पनीर को नीबू के आकार में गोलगोल कई हिस्सों में बांट लें. इस के बाद हाथ से दबा कर रोटी जैसा बना लें. अब इसे ठंडा होने के लिए फ्रिज या बरफ में रख दें. जब यह पूरी तरह से ठंडा हो जाए तो इस का कल्हाड़ी कुल्चा तैयार किया जा सकता है. खाने के लिए देने से पहले ब्रेड या पाव के बीच में 1 पीस गोल आकार वाले पनीर को रखते हैं. इस के बाद ब्रेड या पाव को फ्राईपैन पर रख कर गरम करते हैं.

गरम होने से पनीर पिघल जाता है. अब ब्रेड के ऊपर चाट मसाला डाल दिया जाता है, जिस से ब्रेड का टेस्ट बढ़ जाता है. इस के साथ खाने के लिए कटे हुए प्याज को मीठी चटनी में डाल कर दिया जाता है. मीठी चटनी और प्याज के साथ कल्हाड़ी कुल्चा खाने में बहुत टेस्टी लगता है.

उधमपुर जिले के बंसा बाजार में कल्हाड़ी कुल्चा की दुकान चलाने वाले सोहनलाल शर्मा कहते हैं कि 4 लीटर दूध में पनीर के 16 पीस तैयार होते हैं. 2 ब्रेड स्लाइसों के बीच पनीर का 1 गोल पीस रख कर फ्राई किया जाता है. इस के ऊपर चटपटा नमक डाल कर खाने के लिए दिया जाता है. साथ में मीठी चटनी और कटे प्याज के टुकड़े कल्हाड़ी कुल्चा के स्वाद को और बढ़ा देते हैं. 1 प्लेट कल्हाड़ी कुल्चा का दाम 30 से 40 रुपए के बीच होता है. इसे स्नैक्स के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. कल्हाड़ी कुल्चा केवल जम्मू और आसपास के शहरों में ही मिलता है.

Farming Machine : मशीन से करें अरवी की धुलाई

Farming Machine : अरवी की खुदाई करने के बाद उस पर काफी मिट्टी लगी होती है, जिस की हाथों से धुलाई करना एक मुश्किल काम है और उस में समय भी ज्यादा लगता है. साथ ही मजदूरी भी ज्यादा लगती है. यही काम अगर मशीन से करें तो कम समय में ज्यादा काम निबटाया जा सकता है.

अरवी की धुलाई करने के लिए हरियाणा के महावीर जांगड़ा ने मशीन बनाई है, जो 2 साइजों में है. पहला साइज 12 फुट लंबाई में और दूसरा साइज 14 फुट लंबाई में है. इस मशीन में 10 हार्स पावर का डीजल इंजन भी लगा होता है.

इस मशीन से 1 घंटे में 40 से 50 क्विंटल तक अरवी की धुलाई की जा सकती है और इस मशीन में एक बार पानी भरने के बाद उस पानी को 4-5 दिनों तक इस्तेमाल में लिया जा सकता है, इसलिए पानी की भी खपत कम होती है.

अरवी के अलावा इस मशीन से गाजर, अदरक व हलदी जैसी अन्य फसलों की भी धुलाई की जाती है. यह मशीन अकसर अन्य मशीन निर्माताओं के पास उपलब्ध नहीं होती है, इसलिए यह मशीन अपनेआप में खास हो जाती है.

इस धुलाई मशीन से किसान अपने काम तो पूरे करता ही है, साथ ही आसपास के किसानों का भी काम कर के अच्छी कमाई कर सकता है. मशीन को किराए पर दे कर भी आमदनी बढ़ाई जा सकती है.

इस मशीन के बारे में यदि आप ज्यादा कुछ जानना चाहते हैं, तो अमन विश्वकर्मा इंजीनियरिंग वर्क्स के फोन नंबरों पर 09896822103, 09813048612, 01693-248612, 09813900312 पर बात कर सकते हैं.

गृहशोभा इंस्पायर अवार्ड्स 2025 में प्रेरणादायक महिलाओं को सम्मानित किया

नई दिल्ली, 21 मार्च 2025गृहशोभा इंस्पायर अवार्ड्स 2025 का आयोजन 20 मार्च 2025 को त्रावणकोर पैलेस, नई दिल्ली में किया गया।  इस कार्यक्रम में उन असाधारण महिलाओं को सम्मानित किया गया जिन्होंने अपने क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इस कार्यक्रम में लोक कला, शासन, सार्वजनिक नीति, सामाजिक कार्य, व्यवसाय, विज्ञान, ऑटोमोटिव और मनोरंजन जैसे क्षेत्रों की प्रभावशाली और उपलब्धि हासिल करने वाली महिलाओं को सम्मानित किया गया। यह पुरस्कार उन लोगों को दिया गया जिन्होंने जिन्होनें अपने सामने आने वाली सभी मुश्किलों को पार कर एक नई राह बनाई।

इस समारोह में, सार्वजनिक स्वास्थ्य और शासन में  परिवर्तनकारी नेतृत्व के लिए केरल की पूर्व स्वास्थ्य मंत्री सुश्री के.के. शैलजा को पुरूस्कृत किया गया। साथ ही प्रसिद्ध अदाकारा  सुश्री शबाना आज़मी को सिनेमा में उनके योगदान और मजबूत एवं मुश्किल किरदारों के प्रदर्शन के लिए मनोरंजन के माध्यम से सशक्तिकरण – आइकन के रूप में सम्मानित किया गया। डॉ. सौम्या स्वामीनाथन को सार्वजनिक स्वास्थ्य और वैज्ञानिक अनुसंधान में उनके अग्रणी नेतृत्व के लिए नेशन बिल्डर – आइकन पुरस्कार मिला। टाइटन वॉचेस की सीईओ सुश्री सुपर्णा मित्रा को कॉर्पोरेट नेतृत्व में नए स्टैंडर्ड स्थापित करने के लिए बिजनेस लीडरशिप – आइकन पुरूस्कार दिया गया।

गृहशोभा इंस्पायर अवार्ड्स 2025 की विडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करें

अन्य प्रतिष्ठित पुरस्कार विजेताओं में सुश्री मंजरी जरूहर शामिल रहीं, जिन्हें पुलिसिंग में उनके अग्रणी करियर के लिए फियरलेस वारियर – आइकन के रूप में सम्मानित किया गया। ग्रामीण कारीगरों को सशक्त बनाने वाली जमीनी स्तर की नेता सुश्री रूमा देवी को ग्रासरूट्स चेंजमेकर – आइकन पुरस्कार मिला, जबकि सुश्री अमला रुइया को जल संरक्षण में उनके अग्रणी कार्य के लिए ग्रासरूट्स चेंजमेकरअचीवर के रूप में सम्मानित किया गया। सुश्री विजी वेंकटेश को कैंसर देखभाल में उनके सरहानीय योगदान के लिए न्यू बिगिनिंगआइकन से सम्मानित किया गया।

बिजनेस इंडस्ट्री में, भारत की पहली कीवी वाइन मैकर सुश्री तागे रीता ताखे को बिजनेस लीडरशिपअचीवर से सम्मानित किया गया, जबकि मेंस्ट्रुपीडिया की फाउंडर सुश्री अदिति गुप्ता को होमप्रेन्योरअचीवर से सम्मानित किया गया। सुश्री कृपा अनंथन को ऑटोमोटिव इंडस्ट्री में चेंजमेकर के रूप में सम्मानित किया गया, और सुश्री किरुबा मुनुसामी को उनकी कानूनी सक्रियता के लिए सोशल इम्पैक्टअचीवर से पुरूस्कृत किया गया। डॉ. मेनका गुरुस्वामी और सुश्री अरुंधति काटजू को लैंगिक समानता और LGBTQ समुदाय के अधिकारों के लिए उनकी ऐतिहासिक कानूनी लड़ाई के लिए संयुक्त रूप से सोशल इम्पैक्टचेंजमेकर से सम्मानित किया गया।

लोक कलाओं के संरक्षण में उनके योगदान के लिए, डॉ. रानी झा को फोल्क हेरिटेज-आइकन से सम्मानित किया गया। डॉ. बुशरा अतीक को STEM में उत्कृष्टता के लिए सम्मानित किया गया।

एंटरनमेंट और डिजिटल इन्फ्लुएंस में, सुश्री तिलोत्तमा शोम और और सुश्री कोंकणा सेन को मनोरंजन के माध्यम से सशक्तिकरण के लिए ऑनस्क्रीन और ऑफस्क्रीन सम्मानित किया गया। सुश्री लीजा मंगलदास को कंटेंट क्रिएटरएम्पावरमेंट, सुश्री श्रुति सेठ को कंटेंट क्रिएटरपेरेंटिंग और डॉ. तनया नरेंद्र को कंटेंट क्रिएटरहेल्थ में उनकी उत्कृष्टता के लिए सम्मानित किया गया।

माननीय अतिथि

सभी पुरस्कार आरटीआई कार्यकर्ता सुश्री अरुणा रॉय, वरिष्ठ अधिवक्ता सुश्री इंदिरा जयसिंह, प्रसिद्ध कथक नृत्यांगना सुश्री शोवना नारायण और महिला अधिकार कार्यकर्ता एवं राजनीतिज्ञ सुश्री सुभाषिनी अली द्वारा प्रदान किए गए। इन विशिष्ट अतिथियों ने अपने प्रेरणादायक शब्दों के साथ विजेताओं की उपलब्धियों के लिए उन्हें प्रोत्साहित किया।

जूरी पैनल

पुरस्कारों का निर्णय प्रतिष्ठित और सम्मानित महिलाओं के एक प्रतिष्ठित जूरी पैनल द्वारा किया गया, जिसमें लेखिका और फेमिना की पूर्व संपादक सुश्री सत्या सरन, लोकप्रिय अभिनेत्री सुश्री पद्मप्रिया जानकीरमन, चंपक की संपादक सुश्री ऋचा शाह, लर्निंग लिंक्स फाउंडेशन की अध्यक्ष सुश्री नूरिया अंसारी, आउटवर्ड बाउंड हिमालय की डायरेक्टर सुश्री दिलशाद मास्टर और कारवां की वेब संपादक सुश्री सुरभि कांगा शामिल थीं।

कार्यक्रम में बोलते हुए, दिल्ली प्रेस के प्रधान संपादक और प्रकाशक श्री परेश नाथ ने कहा: “गृहशोभा इंस्पायर अवार्ड उन लोगों को श्रद्धांजलि है जो आम धारणाओं को चुनौती देते हैं, और बदलाव लाने के लिए और भविष्य को आकार देने के लिए रचनात्मकता और साहस का उपयोग करते हैं। शोर से अभिभूत दुनिया में, ये पुरस्कार विजेता हमें याद दिलाते हैं कि सच्चा नेतृत्व उन लोगों के शांत लेकिन परिवर्तनकारी प्रभाव में निहित है जो सत्ता के सामने सच बोलने और ईमानदारी के साथ नेतृत्व करने का साहस करते हैं।”

गृहशोभा के बारे में:

गृहशोभा, जिसे दिल्ली प्रेस द्वारा प्रकाशित किया जाता है, भारत की सबसे अधिक पढ़ी जाने वाली हिंदी महिला मैगजीन है, जिस के 10 लाख से अधिक रीडर्स हैं| यह मैगजीन 8 भाषाओं (हिंदी, मराठी, गुजराती, कन्नड़, तमिल, मलयालम, तेलुगु और बंगाली) में प्रकाशित होती है और इस में घरगृहस्थी, फैशन, सौंदर्य, कुकिंग, स्वास्थ्य और रिश्तों पर रोचक लेख शामिल होते हैं| पिछले 45 सालों से गृहशोभा महिलाओं के लिए प्रेरणा और मार्गदर्शन का स्रोत बनी हुई है|

दिल्ली प्रेस के बारे में:

दिल्ली प्रेस भारत के सबसे बड़े और विविध पत्रिका प्रकाशनों में से एक है| यह परिवार, राजनीति, सामान्य रुचियों, महिलाओं, बच्चों और ग्रामीण जीवन से जुड़ी 36 पत्रिकाएं 10 भाषाओं में प्रकाशित करता है| इस की पहुंच पूरे देश में फैली हुई है|

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Kisan Samman : भोपाल में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के किसानों का सम्मान

Kisan Samman : दिल्ली प्रेस की कृषि पत्रिका फार्म एन फूड द्वारा 28 फरवरी, 2025 को मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के रवींद्र भवन में राज्य स्तरीय फार्म एन फूड कृषि सम्मान अवार्ड का आयोजन किया गया. इस कार्यक्रम में मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ के 150 से ज्यादा किसान और कृषि वैज्ञानिक शामिल हुए और खेती में नवाचार और तकनीकी के जरिए विभिन्न 17 श्रेणियों में बदलाव लाने वाले तकरीबन 30 किसानों, कृषि वैज्ञानिकों और कृषि विज्ञान केंद्रों को राज्य स्तरीय फार्म एन फूड कृषि सम्मान अवार्ड से सम्मानित किया गया.

दिल्ली प्रेस के कार्यकारी प्रकाशक अनंत नाथ ने कहा, ‘कृषि जगत हमारे देश की रीढ़ की हड्डी है. इसी क्षेत्र में किसानों के योगदान को लोगों को बताने के लिए हम ने फार्म एन फूड पत्रिका को शुरू करने की सोची और यह भी माना कि यह किसान समाज को जोड़ने की कड़ी है. मैं खुद को कृषि का छात्र मानता हूं. कोरोना काल मे घर पर एक किचन गार्डन बनाया था जो अब भी बरकरार है. हमारे जो आज के विजेता हैं वे बहुत मेहनती हैं और वे इस क्षेत्र में बहुत ज्यादा अचीव कर रहे हैं. मेरी अपील है कि किसान इस पत्रिका से जुड़े रहें ताकि हमारी संस्था कृषि जगत में होने वाली हर बात को जनजन तक पहुंचा सकें.

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और मध्य प्रदेश के सहकारिता, खेल एवं युवा कल्याण मंत्री विश्वास सारंग ने कहा, ‘भारत गांव में, खेत में और खलिहान में बसता है. हमें खेती पर और किसान पर ध्यान देना होगा. हमें फूड प्रोसेसिंग पर जोर देना होगा. ‘नदी जोड़ो अभियान’ इस में सहायक है. खेत से ही इस देश को मजबूत करने की इबारत लिखी जा सकती है. सरकार का यही उद्देश्य की खेती मुनाफे का धंधा बने.’

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि और मध्य प्रदेश सरकार में कौशल विकास एवं रोजगार मंत्री गौतम टेटवाल ने कहा, ‘सीखने की कोई उम्र नहीं होती और किसान हमेशा सीखता है. वह नवाचार करता है, नई तकनीक इस्तेमाल करता है. जब किसान के पास पर्याय खाद होगी और दूसरी सुविधाएं मुहैया होंगी, वह इस क्षेत्र में और आगे बढ़ेगा.’

विजेता किसानों में रतलाम के कपिल धाकड़ को बेस्ट यंग फार्मर अवार्ड दिया गया. महासमुंद के मिलन सिंग विश्वकर्मा और भोपाल के मनोहर पाटीदार को बेस्ट मेल फार्मर अवार्ड मिला. ग्वालियर की निशा निरंजन को बेस्ट फीमेल फार्मर अवार्ड से सम्मानित किया गया, जबकि भोपाल के गीता प्रसाद पाटीदार, शाजापुर के जयनारायण पाटीदार और टीकमगढ़ के पूरन लाल कुशवाहा को बेस्ट फार्मर अवार्ड इन इनोवेटिव फार्मिंग अवार्ड दिया गया.

अशोकनगर के खुमान सिंह रघुवंशी, भिंड के रामगोपाल सिंह, दंतेवाड़ा के जयलाल यादव को बेस्ट फार्मर अवार्ड इन आर्गेनिक/नेचुरल फार्मिंग का अवार्ड मिला. उज्जैन के अश्विनी सिंह चौहान, नारायणपुर के सुरेंद्र कुमार नाग को बेस्ट फार्मर अवार्ड इन इंटीग्रेटेड फार्मिंग दिया गया.

नरसिंहपुर के कृष्णपाल लोधी को बेस्ट फार्मर अवार्ड इन शुगरकेन प्रोडक्शन मिला, जबकि अशोकनगर के राजपाल सिंह नरवरिया को बेस्ट फार्मर अवार्ड इन मैकेनाइजेशन अवार्ड हासिल हुआ. इसी तरह बलौदाबाजार के विरेंद्र अग्रवाल को बेस्ट डेयरी/एनिमल कीपर का अवार्ड, तो मुरैना के यशपाल कुशवाह को बेस्ट मधुमक्खीपालक फार्मर अवार्ड दिया गया. शाजापुर के कृष्णपाल सिंह राजपूत को बेस्ट पोल्ट्री/हैचरी फार्मर अवार्ड मिला, तो नरसिंहपुर के राकेश दुबे को बेस्ट फार्मर अवार्ड इन मार्केटिंग दिया गया.

कोंडागांव, छत्तीसगढ़ के डा. राजाराम त्रिपाठी को सस्टेनेबल फार्मिंग टेक्नोलॉजी अवार्ड, तो कोंडागांव की ही डा. अपूर्वा त्रिपाठी को वुमन एग्री-इनोवेटर आफ द ईयर का अवार्ड मिला. रतलाम के डा. सुशील कुमार, भिंड के डा. सत्येंद्र पाल सिंह, दुर्ग की डा. ज्योत्स्ना मिश्रा को बेस्ट रिसर्च अवार्ड इन फार्मिंग सिस्टम से नवाजा गया.

इसी तरह केवीके बड़वानी, जिला बड़वानी, केवीके जावरा, जिला रतलाम, केवीके, रायसेन, जिला रायसेन, केवीके, नारायणपुर, जिला नारायणपुर, केवीके, बालोद, जिला बालोद को बेस्ट कृषि विज्ञान केंद्र अवार्ड मिला. भोपाल के खारपी फार्मर एफपीओ और नरसिंहपुर के शक्तिपूजा एफपीओ को बेस्ट एफपीओ अवार्ड दिया गया.

इन श्रेणियों में मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ से कृषि विज्ञान केंद्रों व कृषि संस्थानों के संस्तुति सहित 200 से भी अधिक नोमिनेशन प्राप्त हुए थे. विभिन्न श्रेणियों में प्राप्त इन नोमिनेशन का 4 सदस्यीय जूरी द्वारा मूल्यांकन किया गया, जिस में सर्वश्रेष्ठ नोमिनेशन को पुरस्कार के लिए चुना गया.

इस सम्मान समारोह में पुरस्कृत किसानों के साथसाथ कृषि विज्ञान केंद्रों, कृषि विश्वविद्यालयों और अन्य कृषि संस्थानों के वैज्ञानिक, अन्य शासकीय और प्रशासनिक अधिकारी भी उपस्थित रहे. इस कार्यक्रम का मंच संचालन विजी श्रीवास्तव ने किया. इस कार्यक्रम में कृभको और जात्रे आइसक्रीम की विशेष रूप से सहभागिता रही. उन्होंने सह प्रायोजक के रूप में किसानों का हौसला बढ़ाया.

बाजरे (Millet) की वैज्ञानिक खेती

सूखे मौसम या कम सिंचाई वाले खेतों के लिए बाजरा बहुत ही उम्दा फसल है. यही वजह है कि बाजरे की खेती राजस्थान के अलावा उत्तर प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, गुजरात, ओडिशा व पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर की जाती है.

बाजरा मोटे अनाजों की कैटीगरी में आता है. इस की खेती गरमियों में भी कर सकते हैं. यह कई रोगों को दूर करने के साथ शरीर को भी फिट रखने में कारगर है. यही वजह है कि शहरों में लोग इस की ऊंची कीमत देने को तैयार रहते हैं.

मिट्टी : बाजरे की खेती के लिए हलकी या बलुई दोमट मिट्टी अच्छी मानी गई है. साथ ही पानी के निकलने का अच्छा बंदोबस्त होना चाहिए.

खेत की तैयारी : पहली बार की जुताई मिट्टी पलटने वाले हल या रोटावेटर से करें और उस के बाद 2-3 बार देशी हल या कल्टीवेटर से जुताई कर के खेत को तैयार करें.

बोआई का समय और विधि : बोआई का सही समय जुलाई से ले कर अगस्त माह तक है. ध्यान रहे कि इस की बोआई लाइन से करने पर ज्यादा फायदा होता है. लाइन से लाइन की दूरी 40 सैंटीमीटर और पौध से पौध की दूरी 10 से 15 सैंटीमीटर रखें. बीज बोने की गहराई तकरीबन 4 सैंटीमीटर तक ठीक रहती है.

बीज दर और उपचार: इस की बोआई के लिए प्रति हेक्टेयर 4-5 किलोग्राम बीजों की जरूरत होती है. बीजों को 2.5 ग्राम थीरम या 2 ग्राम कार्बंडाजिम से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर लेना चाहिए. अरगट के दानों को 20 फीसदी नमक के घोल में डाल कर निकाला जा सकता है.

खरपतवार पर नियंत्रण : बाजरे की फसल में खरपतवार ज्यादा उगते हैं. बेहतर होगा कि खरपतवारों को निराईगुड़ाई कर के निकाल दें. इस से एक ओर जहां मिट्टी में हवा और नमी पहुंच जाती है, वहीं दूसरी ओर खरपतवार भी नहीं पनप पाते हैं.

खरपतवारों की कैमिकल दवाओं से रोकथाम करने के लिए एट्राजीन 0.50 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से 800-1000 लिटर पानी में मिला कर बोआई के बाद व जमाव से पहले एकसमान रूप से छिड़काव कर देना चाहिए.

खाद और उर्वरक : खाद और उर्वरकों का इस्तेमाल खेत की मिट्टी की जांच के आधार पर करना चाहिए. हालांकि मोटेतौर पर संकर प्रजातियों में हाईब्रिड के लिए 80-100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम फास्फोरस और 40 किलोग्राम पोटाश व देशी प्रजातियों के लिए 40-50 किलोग्राम नाइट्रोजन, 25 किलोग्राम फास्फोरस व 25 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए.

फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन की आधी मात्रा बोआई से पहले इस्तेमाल करें. उस के बाद नाइट्रोजन की बची आधी मात्रा टौप ड्रेसिंग के रूप में जब पौधे 25-30 दिन के हो जाएं तो छिटक कर छिड़काव करें.

सिंचाई : बाजरे की फसल बारिश के मौसम में उगाई जाती है. बरसात का पानी ही इस के लिए सही होता है. यदि बरसात का पानी न मिल सके तो फूल आने पर जरूरत के मुताबिक सिंचाई करनी चाहिए.

बाजरे (Millet)

खास रोगों का उपचार

बाजरे का अरगट : यह रोग क्लेविसेप्स माई क्रोसिफैला नामक कवक से फैलता है. यह रोग बालियों या बालियों के कुछ ही दानों पर ही दिखाई देता है. इस में दाने की जगह पर भूरे काले रंग की सींग के आकार की गांठें बन जाती हैं. इसे स्केलेरोशिया कहते हैं. प्रभावित दाने इनसानों और जानवरों के लिए नुकसानदायक होते हैं, क्योंकि उन में जहरीला पदार्थ होता है. इस रोग की वजह से फूलों में से हलके गुलाबी रंग का गाढ़ा और चिपचिपा पदार्थ निकलता है. रोग ग्रसित बालियों पर फफूंद जम जाता है.

रोकथाम : बोने से पहले 20 फीसदी नमक के घोल में बीजों को डुबो कर स्केलेरोशिया अलग किए जा सकते हैं. खड़ी फसल में इस की रोकथाम के लिए फूल आते ही घुलनशील जिरम 80 फीसदी चूर्ण 1.5 किलोग्राम या जिनेब 75 फीसदी चूर्ण 2 किलोग्राम या मैंकोजेब चूर्ण को 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 5-7 दिन के अंतराल पर छिड़कना चाहिए.

कंडुआ : यह रोग टालियोस्पोरियम पेनिसिलेरी कवक से लगता है. इस रोग में दाने आकार में बड़े, गोल अंडाकार व हरे रंग के हो जाते हैं. इन में काला चूर्ण भरा होता है. मंड़ाई करते समय ये दाने फूट जाते हैं, जिस से उन में से काला चूर्ण निकल कर सेहतमंद दानों पर चिपक जाता है.

रोकथाम : इस की रोकथाम के लिए किसी पारायुक्त कैमिकल से बीज उपचारित कर के बोने चाहिए. सावधानी के लिए एक ही खेत में हर साल बाजरे की खेती नहीं करनी चाहिए.

हरित बाली रोग : इसे डाउनी मिल्ड्यू नाम से जाना जाता है. रोगकारक स्केलेरोस्पोरा ग्रैमिनीकोला पत्तियों पर पीलीसफेद धारियां पड़ जाती हैं. इस के नीचे की तरफ रोमिल फफूंदी की बढ़वार दिखाई देती है. बाल निकलने पर बालों में दानों की जगह पर टेढ़ीमेढ़ी हरी पत्तियां बन जाती हैं और बाली गुच्छे या झाड़ू सी दिखाई देती है.

रोकथाम : शोधित बीज ही बोने चाहिए. रोग से ग्रसित पौधे को जला दें और फसल चक्र अपनाएं. शुरुआती अवस्था में जिंक मैगनिज कार्बामेट या जिनेब 0.2 फीसदी को पानी में घोल कर छिड़काव करें.

मुख्य कीट

तनामक्खी कीट : यह कीट बाजरे का दुश्मन है, जो फसल की शुरुआती अवस्था में बहुत नुकसान पहुंचाता है. जब फसल 30 दिन की होती है तब तक कीट से फसल को 80 फीसदी नुकसान हो जाता है.

इस के नियंत्रण के लिए बीज को इमिडाक्लोरोप्रिड गोचो 14 मिलीलिटर प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर के बोआई करनी चाहिए और बोआई के समय बीज की मात्रा 10 से 12 फीसदी ज्यादा रखनी चाहिए.

जरूरी हो तो अंकुरण के 10-12 दिन बाद इमिडाक्लोप्रिड 200 एसएल 5 मिलीलिटर प्रति 10 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए. फसल काटने के बाद खेत में गहरी जुताई करें और फसल के अवशेषों को इकट्ठा कर के जला दें.

तनाभेदक कीट : तनाभेदक कीट का प्रकोप फसल में 10 से 15 दिन से शुरू हो कर फसल के पकने तक रहता है. इस के नियंत्रण के लिए फसल काटने के बाद खेत में गहरी जुताई करें और फसल के अवशेषों को जला दें.

खेत में बोआई के समय कैमिकल खाद के साथ 10 किलोग्राम की दर से फोरेट 10 जी अथवा कार्बोफ्यूरान दवा खेत में अच्छी तरह मिला दें और बोआई 15-20 दिन बाद इमिडाक्लोरोप्रड 200 एसएल 5 मिलीलिटर प्रति 10 लिटर या कार्बोरिल 50 फीसदी घुलनशील पाउडर 2 ग्राम प्रति लिटर पानी में घोल बना कर 10 दिन के अंतराल पर 2 छिड़काव करें.

टिड्डा कीट : यह बाजरे की फसल को छोटी अवस्था से ले कर फसल पकने तक नुकसान पहुंचाता है. यह कीट पत्तों के किनारों को खा कर धीरेधीरे पूरी पत्तियों को खा जाता है. बाद में फसल में केवल मध्य शिराएं और पतला तना ही रह जाता है.

इस के नियंत्रण के लिए फसल में कार्बोरिल 50 फीसदी घुलनशील पाउडर 2 ग्राम प्रति लिटर पानी में घोल बना कर 10 से 15 दिन के अंतराल पर 2 छिड़काव करें.

पक्षियों से बचाव : बाजरा पक्षियों का मुख्य भोजन है. फसल में जब दाने बनने लगते हैं तो सुबहशाम पक्षियों से बचाव करना बहुत ही जरूरी है.

नागौर की कसूरी मेथी (Kasuri Fenugreek) कमाई से छाई बहार

राजस्थान का मारवाड़ इलाका लजीज खाने की वजह से दुनियाभर में अपनी खास पहचान रखता है, चाहे बीकानेर की नमकीन भुजिया हो या रसगुल्ले की बात हो या फिर जोधपुर के मिरची बड़े व कचौरी की, एक खास तसवीर उभर कर सामने आती है. वहीं दूसरी ओर इस इलाके में मसालों की खेती भी की जाती है. प्रदेश का नागौर जिला एक ऐसी ही मसाला खेती के लिए दुनियाभर में जाना जाता है और वह है कसूरी मेथी (Kasuri Fenugreek) की खेती.

डाक्टर और वैज्ञानिक कई तरह की बीमारियों के इलाज के लिए भी कसूरी मेथी (Kasuri Fenugreek) के इस्तेमाल की सलाह देते हैं. कई औषधीय गुणों से भरपूर इस मेथी का इस्तेमाल पुराने जमाने से ही पेट दर्द दूर करने, कब्जी दूर करने और बलवर्धक औषधीय के रूप में होता आया है.

मेथी (Fenugreek) की बहुउपयोगी पत्तियां सेहत के लिए फायदेमंद होने के साथसाथ खाने को लजीज बनाने में भी खास भूमिका निभाती है. खास तरह की खुशबू और स्वाद की वजह से मेथी का इस्तेमाल सब्जियों, परांठे, खाखरे, नान और कई तरह के खानों में होता है.

नागौर की यह मशहूर मेथी (Fenugreek) अंतर्राष्ट्रीय कारोबार जगत में बेहद लजीज मसालों के रूप में अपनी पहचान बना चुकी है. अब तो मेथी (Fenugreek) का इस्तेमाल लोग ब्रांड नेम के साथ करने लगे हैं. सेहत की नजर से देखें तो मेथी (Fenugreek) में प्रचुर मात्रा में विटामिन ए, कैल्शियम, आयरन व प्रोटीन मौजूद है.

किसान सेवा समिति, मेड़ता के बुजुर्ग किसान बलदेवराम जाखड़ बताते हैं कि किसी जमाने में पाकिस्तान के कसूरी इलाके में ही यह मेथी (Fenugreek) पैदा होती थी, जिस के चलते इस का नाम कसूरी पड़ा. धीरेधीरे इस की पैदावार फसल के रूप में सोना उगलने वाली नागौर की धरती पर होने लगी.

आज हाल यह है कि नागौर दुनियाभर में कसूरी मेथी (Kasuri Fenugreek) उपजाने वाला सब से बड़ा जिला बन गया है. यहां की मेथी (Fenugreek) मंडियों ने विश्व व्यापारिक मंच पर अपनी एक अलग जगह बनाई है. न केवल देश में बल्कि विदेशों में भी नागौर की कसूरी मेथी (Kasuri Fenugreek) बिकने के लिए जाती है.

नागौर के ही एक मेथी (Fenugreek) कारोबारी बनवारी लाल अग्रवाल के मुताबिक, कई मसाला कंपनियों ने कसूरी मेथी (Kasuri Fenugreek) को दुनियाभर में पहचान दिलाई है. देश की दर्जनभर मसाला कंपनियां कसूरी मेथी (Kasuri Fenugreek) को खरीद कर देशविदेश में कारोबार करती हैं. इसी वजह से इस मेथी (Fenugreek) का कारोबारीकरण हो गया है.

नागौर जिला मुख्यालय में 40 किलोमीटर की दूरी में फैले इलाके खासतौर से कुचेरा, रेण, मूंडवा, अठियासन, खारड़ा व चेनार गांवों में मेथी (Fenugreek) की सब से ज्यादा पैदावार होती है. मेथी (Fenugreek) की फसल के लिए मीठा पानी सब से अच्छा रहता है. चिकनी व काली मिट्टी इस की खेती के लिए ठीक रहती है.

कसूरी मेथी (Kasuri Fenugreek) की फसल अक्तूबर माह में बोई जाती है. 30 दिन बाद इस की पत्तियां पहली बार तोड़ने लायक हो जाती हैं. इस के बाद फिर हर 15 दिन बाद इस की नई पत्तियां तोड़ी जाती हैं.

मेथी (Fenugreek) के एकएक पौधे की पत्तियां किसान भाई अपने हाथों से तोड़ते हैं. लोकल बोलचाल में मेथी की पत्तियां तोड़ने के काम को लूणना या सूंठना कहते हैं. पहली बार तोड़ी गई पत्तियां स्वाद व क्वालिटी के हिसाब से सब  अच्छी होती है.

वर्तमान में मेथी (Fenugreek) की पैदावार में संकर बीज का इस्तेमाल सब से ज्यादा होता है. यहां के इसे किसान काश्मीरो के नाम से जानते हैं. कसूरी मेथी (Kasuri Fenugreek) उतारने में सब से ज्यादा मेहनत होती है, क्योंकि इस के हरेक पौधे की पत्तियों को हाथ से ही तोड़ना पड़ता है.

कसूरी मेथी (Kasuri Fenugreek)

कैसे करें खेती

भारत में मेथी की कई किस्में पाई जाती हैं. कुछ उन्नत हो रही किस्मों में चंपा, देशी, पूसा अलविंचीरा, राजेंद्र कांति, हिंसार सोनाली, पंत रागिनी, काश्मीरी, आईसी 74, कोयंबूटर 1 व नागौर की कसूरी मेथी (Kasuri Fenugreek) खास हैं. इस की अच्छी खेती के लिए इन बातों पर ध्यान देना जरूरी है:

आबोहवा व जमीन : कसूरी मेथी (Kasuri Fenugreek) की खेती के लिए शीतोष्ण आबोहवा की जरूरत होती है, जिस में बीजों के जमाव के लिए हलकी सी गरमी, पौधों की बढ़वार के लिए थोड़ी ठंडक और पकने के लिए गरम मौसम मिले. वैसे, यह मेथी हर तरह की जमीन में उगाई जा सकती है, लेकिन इस की सब से अच्छी उपज के लिए बलुई या दोमट मिट्टी बेहतर रहती है.

खाद व उर्वरक : अच्छी फसल के लिए 5 से 6 टन गोबर की सड़ी खाद या कंपोस्ट खाद प्रति हेक्टेयर के हिसाब से खेत तैयार करते समय मिला देनी चाहिए. इस के अलावा 50 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40-40 किलो फास्फोरस व पोटाश प्रति हेक्टेयर देने से उपज में बढ़ोतरी होती है. नाइट्रोजन की बाकी बची आधी मात्रा और फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा बोआई से पहले देते हैं. बाकी नाइट्रोजन 2 बार में 15 दिन के अंतराल पर देते हैं.

बोआई : कसूरी मेथी (Kasuri Fenugreek) को अगर बीज के रूप में उगाना है, तो इसे मध्य सितंबर से नवंबर माह तक बोया जाता है. लेकिन अगर इसे हरी सब्जी के लिए उगाना है तो मध्य अक्तूबर से मार्च माह तक भी बो सकते हैं. वैसे, सब से अच्छी उपज लेने के लिए नागौर इलाके में इसे ज्यादातर अक्तूबर से दिसंबर माह के बीच ही बोया जाता है.

इस की बोआई लाइनों में करनी चाहिए. लाइन से लाइन की दूरी 15 से 20 सैंटीमीटर व गहराई 2 से 3 सैंटीमीटर रखनी चाहिए. ज्यादा गहराई पर बीज का जमाव अच्छा नहीं रहता. बीज बोने के बाद पाटा जरूर लगाएं, ताकि बीज मिट्टी से ढक जाए. यह मेथी 8 से 10 दिनों में जम जाती है.

सिंचाई: कसूरी मेथी (Kasuri Fenugreek) के पौधे जब 7-8 पत्तियों के हो जाएं, तब पहली सिंचाई कर देनी चाहिए. यह समय खेत की दशा, मिट्टी की किस्म व मौसमी बारिश वगैरह के मुताबिक घटबढ़ सकता है. हरी पत्तियों की ज्यादा कटाई के लिए सिंचाई की तादाद बढ़ा सकते हैं.

फसल की हिफाजत : कसूरी मेथी (Kasuri Fenugreek) में पत्तियों व तनों के ऊपर सफेद चूर्ण हो जाता है व पत्तियां हलकी पीली पड़ जाती हैं. बचाव के लिए 800 से 1200 ग्राम प्रति हेक्टेयर ब्लाईटाक्स 500-600 लिटर पानी में घोल कर पौधों पर छिड़क दें.

पत्तियां व तनों को खाने वाली गिड़ार से बचाने के लिए 2 मिलीलिटर रोगर 200 लिटर पानी में घोल कर फसल पर छिड़काव करें. छिड़काव कटाई से 5 से 7 दिन पहले करें.

कटाई : हरी सब्जि के लिए बोआई के 3-4 हफ्ते बाद कसूरी मेथी (Kasuri Fenugreek) कटाई के लिए तैयार हो जाती है. बाद में फूल आने तक हर 15 दिन में कटाई करते हैं. बीज उत्पादन के लिए 2 कटाई के बाद कटाई बंद कर देनी चाहिए.

उपज और स्टोरेज : सब्जी के लिए मेथी की औसत उपज 80 से 90 क्विंटल प्रति हेक्टेयर व बीज के लिए 15 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हासिल होती है. हरी सब्जी के लिए मेथी की पत्तियों को अच्छी तरह से सुखा कर एक साल तक स्टोर कर सकते हैं और बीज को 3 साल तक स्टोर किया जा सकता है.

गौरतलब है कि कसूरी मेथी (Kasuri Fenugreek) के बीजों का मसाले के तौर पर भी इस्तेमाल किया जाता है.