विदेश में ट्रेनिंग करेंगे छात्र

हिसार: चैधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के 10 विद्यार्थियों का पौलेंड के वारसा विश्वविद्यालय में प्रशिक्षण के लिए चयन हुआ है. ये विद्यार्थी उपरोक्त विश्वविद्यालय में कृषि, गृह विज्ञान और मत्स्य विज्ञान के क्षेत्रों में नवीन प्रौद्योगिकियों, नवाचारों आदि बारे व्यावहारिक जानकारी प्राप्त करेंगे.

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बीार काम्बोज ने पौलेंड में प्रशिक्षण के लिए चयनित विद्यार्थियों को बधाई दी. उन्होंने कहा कि यह विश्वविद्यालय में शिक्षा व शोध में अपनाए जा रहे उच्च मानकों का परिणाम है. अब तक इस विश्वविद्यालय के अनेक विद्यार्थी उच्च शिक्षा व प्रशिक्षणों के लिए विश्व प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों में जा चुके हैं.

कृषि महाविद्यालय के अधिष्ठाता डा. एसके पाहुजा ने बताया कि विद्यार्थियों का चयन राष्ट्रीय कृषि उच्च शिक्षा परियोजना (एनएएचईपी-आईडीपी) के तहत अंतर्राष्ट्रीय संगठन में छात्र विकास कार्यक्रम की प्रक्रिया के अंतर्गत परीक्षा और साक्षात्कार के आधार पर हुआ है.

उन्होंने आगे यह भी बताया कि हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय की ओर से प्रशिक्षण अवधि के दौरान वीजा, आनेजाने का किराया, मैडिकल इंश्योरेंस आदि के लिए भत्ता दिया जाएगा. उन्होंने जानकारी देते हुए बताया कि इन चयनित विद्यार्थियों में कृषि महाविद्यालय, हिसार के तृतीय वर्ष के छात्र सुशांत नागपाल, चतुर्थ वर्ष की छात्रा निधि व विशाल, कृषि महाविद्यालय, बावल से मुनीश व नैनसी, कृषि महाविद्यालय कौल से हरितिमा व अंजू, सामुदायिक विज्ञान महाविद्यालय से ममता व मुस्कान और मत्स्य विज्ञान महाविद्यालय से अमित शामिल हैं.

इस अवसर पर चयनित विद्यार्थियों ने कुलपति प्रो. बीआर काम्बोज के मार्गदर्शन में चलाई जा रही आईडीपी परियोजना के प्रमुख अन्वेषक व स्नातकोत्तर शिक्षा अधिष्ठाता डा. केडी शर्मा व अंतर्राष्ट्रीय मामलों के संयोजक डा. अनुज राणा का आभार जताया.

इस अवसर पर मानव संसाधन प्रबंधन निदेशालय की निदेशक डा. मंजु मेहता, अंतर्राष्ट्रीय सेल की प्रभारी डा. आशा कवात्रा व मीडिया एडवाइजर डा. संदीप आर्य उपस्थित रहे.

सरसों नई किस्म आरएच 1975 विकसित

हिसार : विश्वविद्यालय द्वारा विकसित सरसों की यह किस्म सिंचित क्षेत्रों में समय पर बिजाई के लिए एक उत्तम किस्म है, जो कि मौजूदा किस्म आरएच 749 से लगभग 12 फीसदी अधिक पैदावार देगी.

यह किस्म हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय ने वर्ष 2013 में विकसित की थी. अब 10 साल बाद सिंचित क्षेत्रों के लिए इस किस्म से बेहतर किस्म आरएच 1975 ईजाद की गई है, जो कि अधिक उत्पादन के कारण किसानों के लिए बहुत लाभदायक सिद्ध होगी.

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बीआर कंबोज ने बताया कि जम्मू में आयोजित 30वीं वार्षिक सरसों व राई कार्यशाला में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के उपमहानिदेशक (फसल) डा. टीआर शर्मा की अध्यक्षता में गठित पहचान कमेटी द्वारा हाल में आरएच 1975 किस्म को सिंचित परिस्थिति में समय पर बिजाई के लिए चिन्हित किया गया है.

पैदावार के साथ तेल की मात्रा भी अधिक

कुलपति प्रो. बीआर कंबोज ने कहा कि 11-12 क्विंटल प्रति एकड़ औसत उत्पादन और 14-15 क्विंटल प्रति एकड़ उत्पादन क्षमता रखने वाली आरएच 1975 किस्म में लगभग 39.5 फीसदी तेल की मात्रा है, जिस के कारण यह किस्म अन्य किस्मों की अपेक्षा किसानों के बीच अधिक लोकप्रिय होगी. इस से तिलहन उत्पादन में वृद्धि के साथ किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूती मिलेगी.

इन राज्यों के किसानों को होगा लाभ

कुलपति प्रो. बीआर कंबोज ने बताया कि आरएच 1975 किस्म हरियाणा सहित पंजाब, दिल्ली, जम्मू व उत्तरी राजस्थान के सिंचित क्षेत्रों में बिजाई के लिए चिन्हित की गई है. इसलिए इन राज्यों के किसानों को इस किस्म का लाभ मिलेगा. साथ ही, उन्होंने जानकारी देते हुए कहा कि किसानों को इस किस्म का बीज अगले साल तक उपलब्ध करवा दिया जाएगा.

बीते वर्ष भी की थी 2 उन्नत किस्में

अनुसंधान निदेशक डा. जीतराम शर्मा के अनुसार, इस किस्म को हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के सरसों वैज्ञानिकों डा. राम अवतार, डा. नीरज, डा. मंजीत व डा. अशोक कुमार की टीम ने डा. राकेश पूनिया, डा. निशा कुमारी, डा. विनोद गोयल, डा. महावीर एवं डा. राजबीर सिंह के सहयोग से तैयार किया है.

उन्होंने आगे बताया कि इस टीम ने गत वर्ष भी सरसों की 2 किस्में आरएच 1424 व आरएच 1706 विकसित की हैं. ये किस्में भी सरसों की उत्पादकता बढ़ाने में मील का पत्थर साबित होंगी.

उन्होंने यह भी बताया कि सरसों अनुसंधान में उत्कृष्ट काम करने के लिए इस टीम को हाल ही में जम्मू में आयोजित कार्यशाला में सर्वश्रेष्ठ केंद्र अवार्ड से भी नवाजा गया है.

सर्वश्रेष्ठ अनुसंधान केंद्रों में शामिल हकृवि सरसों केंद्र

कृषि महाविद्यालय के अधिष्ठाता डा. एसके पाहुजा ने बताया कि हकृवि के सरसों केंद्र की देश के सर्वश्रेष्ठ अनुसंधान केंद्रों में गिनती होती है. उपरोक्त किस्मों से पहले वर्ष 2018 में विकसित की गई सरसों की किस्म आरएच 725 आज के दिन किसानों के बीच सब से अधिक प्रचलित व लोकप्रिय बन चुकी है, जो कि हरियाणा के अलावा उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश में लगभग 20 से 25 फीसदी क्षेत्रों में अकेली उगाई जाने वाली किस्म है. यह किस्म औसतन 10-12 क्विंटल प्रति एकड़ पैदावार आराम से दे रही है व इस की उत्पादन क्षमता भी 14-15 क्विंटल प्रति एकड़ तक है.

मशरूम उत्पादन तकनीक पर प्रशिक्षण

– भानु प्रकाश राणा

हिसार : 21 सितंबर.
चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार के सायना नेहवाल कृषि प्रौद्योगिकी, प्रशिक्षण एवं शिक्षा संस्थान में मशरूम उत्पादन तकनीक पर 3 दिवसीय प्रशिक्षण संपन्न हुआ.

इस प्रशिक्षण में हरियाणा के झज्जर, जींद, फतेहाबाद, हिसार, भिवानी, चरखी दादरी व सोनीपत जिलों से प्रशिक्षणार्थियों ने भाग लिया.

इस अवसर पर उपरोक्त संस्थान के सहनिदेशक (प्रशिक्षण) डा. अशोक कुमार गोदारा ने कहा कि मशरूम उत्पादन एक ऐसा व्यवसाय है, जिसे कम से कम लागत में शुरू किया जा सकता है और भूमिहीन, शिक्षित एवं अशिक्षित, युवक व युवतियां इसे स्वरोजगार के रूप में अपना कर स्वावलंबी बन सकते हैं. मशरूम उत्पादन के लिए कृषि अवशेषों का इस्तेमाल किया जाता है, जिस से खाद्य सुरक्षा की सुनिश्चितता के साथसाथ वायु प्रदूषण से भी नजात मिलेगी.

उन्होंने आगे बताया कि खासकर भूमिहीन, शिक्षित एवं अशिक्षित युवक व युवतियां इसे स्वरोजगार के रूप में अपना सकते हैं और पूरे साल मशरूम की विभिन्न प्रजातियों, जिन में सफेद बटन मशरूम, ओयस्टर या ढींगरी, मिल्की या दूधिया मशरूम, धान के पुवाल की मशरूम इत्यादि उगा कर पूरे साल मौसम के हिसाब से इस का उत्पादन किया जा सकता है.

प्रशिक्षण के संयोजक डा. सतीश कुमार मेहता ने बताया कि मशरूम की विभिन्न प्रजातियां उगा कर पूरे साल इस का उत्पादन किया जा सकता है. देश व प्रदेश सरकार द्वारा भी किसानों और बेरोजगार युवाओं को मशरूम उत्पादन को एक व्यवसाय के रूप में अपनाने के लिए प्रोत्साहन दिया जा रहा है.

इस प्रशिक्षण दौरान डा. संदीप भाकर, डा. जगदीप सिंह, डा. विकास कंबोज, डा. डीके शर्मा, डा. राकेश चुघ, डा. अमोघवर्षा, डा. सरदूल मान, डा. भूपेंद्र सिंह, डा. पवित्रा पुनिया व डा. विकाश हुड्डा ने मशरूम उत्पादन से संबंधित विषयों पर व्याख्यान दिए.