International Women’s Day : कृषि महिला सशक्तीकरण के लिए प्रशिक्षण

International Women’s Day| भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR-IARI), नई दिल्ली ने उन्नत भारत अभियान और नई विस्तार पद्धतियों और दृष्टिकोण परियोजनाओं के तहत बीते 8 मार्च, 2025 को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने और कृषि महिला सशक्तीकरण में तेजी लाने के लिए कृषि महिलाओं के लिए प्रशिक्षण सहप्रायोगिक खेत में क्षेत्र भ्रमण आयोजित किया.

इस कार्यक्रम में कृषि में महिलाओं के योगदान और टिकाऊ खेती के तरीकों में उन की भागीदारी बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा करने के लिए प्रतिष्ठित वैज्ञानिक, विशेषज्ञ और हितधारक एकसाथ आए.

इस कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले और उत्तराखंड के रुद्रपयाग जिले की महिला किसानों के साथसाथ आईएआरआई के वैज्ञानिकों और छात्रों सहित 75 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लिया.

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के महत्व के साथसाथ नेमा, उन्नत भारत अभियान, फार्मर्स फर्स्ट, मौडल विलेज और आईएआरआई स्वैच्छिक संगठन आधारित साझेदारी कार्यक्रम जैसी विभिन्न परियोजनाओं के माध्यम से महिला सशक्तीकरण की दिशा में आईएआरआई के प्रयासों पर प्रकाश डाला गया.

वाणिज्यिक फूलों की खेती, एकीकृत फार्मिंग प्रणाली, संरक्षित खेती, पोषण और महिला सशक्तीकरण, पोषण हस्तक्षेप के साथसाथ फसल विविधीकरण के माध्यम से आय और रोजगार सृजन के प्रमुख मुद्दों पर भी चर्चा की गई. महिला किसानों और प्रतिनिधियों ने कृषि क्षेत्र में अपने अनुभव और योगदान साझा किए.

संयुक्त निदेशक (प्रसार) डा. आरएन पडारिया ने प्रौद्योगिकी और संस्थागत नवाचारों के माध्यम से महिला सशक्तीकरण पर विचार रखे और कृषि में लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए क्षमता निर्माण, नैटवर्किंग, नवाचारों के अनुप्रयोग और बालिका शिक्षा पर जोर दिया.

डा. मनजीत सिंह नैन, डा. मार्कंडेय सिंह, डा. सुभाश्री साहू, डा. सुकन्या बरुआ, डा. नफीस अहमद, डा. हेमलता, डा. अलका जोशी, डा. एनवी कुंभारे, डा. पुनीता, डा. मीशा माधवन ने महिला उद्यमियों की सफलता की कहानियों के माध्यम से प्रतिभागियों को शिक्षित किया. बाद में महिलाओं को वाटिका बागबानी और पोषण सुरक्षा के लिए पूसा सब्जी बीज किट प्रदान की गई. मथुरा के परियोजना गांवों की महिला किसानों को सीधी बीजाई और श्रीविधि द्वारा धान की खेती को बढ़ावा देने के लिए धान की गुणवत्ता वाले बीज दिए गए.

Spice Crops : खेती और प्रोसैसिंग से मिलेगी अधिक आमदनी

Spice Crops| प्रसार शिक्षा निदेशालय, महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर द्वारा पांचदिवसीय किसान प्रशिक्षण “मसाला फसलों की खेती एवं प्रसंस्करण” विषय पर बीते 3 मार्च से 7 मार्च, 2025 को आयोजित किया गया.

प्रशिक्षण के समापन समारोह के मुख्य अतिथि डा. आरएल सोनी, निदेशक, प्रसार शिक्षा निदेशालय, उदयपुर ने अपने उद्बोधन में प्रशिक्षणार्थियों को मसाला फसलों की खेती एवं प्रसंस्करण के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि मसाला फसलों की खेती की लोकप्रियता के पीछे महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि इन के उत्पादन में कई अन्य कृषि फसलों की तुलना में कम सिंचाई जल एवं पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है. साथ ही, यह किसानों के लिए अधिक आय अर्जित करने का एक अच्छा विकल्प है. मसाला फसलों के साथसाथ फल एवं सब्जियों का उत्पादन कर अतिरिक्त आमदनी भी ले सकते हैं.

समारोह के विशिष्ट अतिथि डा. एसके इंटोदिया, प्राध्यापक ने किसानों से आह्वान किया कि वे प्रशिक्षण के बाद एफपीओ का गठन करे और इस के माध्यम से अधिक आय प्राप्त करें. फसल को कटाई के बाद बेचने के मुकाबले ग्रेडिंग, क्लीनिंग, पैकेजिंग एवं प्रोसैसिंग से ज्यादा मुनाफा ले पाएंगे.

डा. लतिका व्यास, प्रशिक्षण प्रभारी ने बताया कि उक्त प्रशिक्षण कृषि विभाग आत्मा, मंदसौर (मध्य प्रदेश) द्वारा प्रायोजित था, जिस में मंदसौर जिले के विभिन्न गांवों से 60 किसानों ने भाग लिया. इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के विभिन्न वैज्ञानिकों द्वारा कृषि विषयों पर तकनीकी जानकारी दी गई.

प्रशिक्षणार्थियों को विश्वविद्यालय की विभिन्न सजीव इकाइयों जैसे जैविक इकाई, पौलीहाउस, मुरगीपालन, डेयरी एवं मत्स्यपालन आदि के साथसाथ संग्रहालय भ्रमण एवं फिल्म शो कराया गया और तकनीकी जानकारी दी गई.

प्रशिक्षण समापन के दौरान प्रशिक्षणार्थियों से प्रश्नोत्तरी की गई, जिस में प्रथम, द्वितीय व तृतीय को पुरस्कार एवं सभी प्रतिभागियों को सांत्वना पुरस्कार एवं प्रमाणपत्र मुख्य अतिथि द्वारा दिए गए.

International Women’s Day : जल प्रौद्योगिकी केंद्र द्वारा कार्यशाला

International Women’s Day| कृषि क्षेत्र की महिलाओं को अधिक कार्यभार (घरेलू और कृषि कार्य दोनों), कुपोषण, निर्णय लेने के अवसर की कमी, दूरदराज के स्थानों से पानी इकट्ठा करने में कठिनाई, मैनुअल फील्ड औपरेशन जैसे निराई, इंटरकल्चरल औपरेशन, कटाई आदि में भाग लेने के दौरान लंबे समय तक काम करने में बहुमुखी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. जलवायु परिवर्तन से ये चुनौतियां और अधिक बढ़ रही हैं.

बीते 8 मार्च, 2025 को ‘अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस’ (International Women’s Day) के अवसर पर भारत में ग्रामीण महिलाओं की वर्तमान स्थिति और सामान्य रूप से कृषि क्षेत्र और विशेष रूप से जल प्रबंधन में उन के सामने आने वाली चुनौतियों का आलोचनात्मक विश्लेषण करना प्रासंगिक है. इस के अलावा अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस-2025 पर केंद्रीय विषय के दर्शन को समझते हुए कार्यवाही में तेजी लाने के लिए हमें सतत और जलवायु अनुकूल जल प्रबंधन प्रौद्योगिकियों और नीतियों के माध्यम से महिलाओं के सशक्तीकरण को तेज करने के अपने प्रयासों को मजबूत करना चाहिए.

जल प्रौद्योगिकी केंद्र, भाकृअनुप- भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली और डा. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (आरपीसीएयू), बिहार द्वारा जलवायु अनुकूल जल प्रबंधन पर विकसित विश्वसनीय प्रौद्योगिकियां इस संदर्भ में कृषि महिलाओं को लाभान्वित करने में अधिक सहायक होगी.

8 मार्च 2025 को ‘अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस’ के अवसर पर जल प्रौद्योगिकी केंद्र, भाकृअनुप- भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली और डा. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर, बिहार द्वारा संयुक्त रूप से जल प्रौद्योगिकी केंद्र के सभागार में “सतत और जलवायु अनुकूल जल प्रबंधन प्रौद्योगिकियों और नीतियों के माध्यम से महिलाओं का त्वरित सशक्तीकरण” पर विचारमंथन कार्यशाला का आयोजन किया गया था.

कार्यशाला के मुख्य उद्देश्य (क) जलवायु परिवर्तन की पृष्ठभूमि में कृषि जल प्रबंधन में ग्रामीण महिलाओं के सामने आने वाली वर्तमान चुनौतियों का विश्लेषण करना, (ख) सतत और जलवायु अनुकूल जल प्रबंधन प्रौद्योगिकियों और नीतियों के एकीकरण के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं के सशक्तीकरण में तेजी लाना था.

कृषि क्षेत्र में सतत और जलवायु अनुकूल जल प्रबंधन के लिए तकनीकी और नीति विकल्पों के रूप में कार्यशाला के अपेक्षित परिणाम संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) 6 (सभी के लिए पानी और स्वच्छता की उपलब्धता और सतत प्रबंधन सुनिश्चित करना) है.

इस कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग नियोजन ब्यूरो (एनबीएसएस व एलयूपी) के क्षेत्रीय केंद्र, नई दिल्ली की प्रमुख डा. जया एन. सूर्या, भाकृअनुप- भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली के संयुक्त निदेशक (अनुसंधान) डा. सी. विश्वनाथन, नई दिल्ली, जल प्रौद्योगिकी केंद्र के परियोजना निदेशक डा. पीएस ब्रह्मानंद और आरपीसीएयू के अनुसंधान निदेशक डा. एके सिंह ने भाग लिया.

 

उन्होंने ग्रामीण महिला सशक्तीकरण की समृद्धि के लिए सतत और जलवायु अनुकूल जल प्रबंधन के लिए अनुसंधान और नीति समर्थन के महत्व पर प्रकाश डाला और सतत जल प्रबंधन सुनिश्चित करने के लिए पारंपरिक जल संचयन संरचनाओं के पुनर्निर्माण पर जोर दिया.

तकनीकी सत्र के दौरान डा. पीएस. ब्रह्मानंद, परियोजना निदेशक, जल प्रौद्योगिकी केंद्र, डा. सुशमा सुधीश्री, प्रधान वैज्ञानिक, जल प्रौद्योगिकी केंद्र और डा. रत्नेश झा, परियोजना निदेशक, आरपीसीएयू ने जलवायु अनुकूल जल प्रबंधन और इस की सफलता की कहानियों और महिला सशक्तीकरण के लिए जल निकायों के पुनर्निर्माण पर जानकारी दी.

सत्र की अध्यक्षता डा. सीमा जग्गी, एडीजी (एचआरडी), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली और सहअध्यक्षता डा. डीएस गुर्जर, वरिष्ठ वैज्ञानिक, जल प्रौद्योगिकी केंद्र ने की. डा. सीमा जग्गी ने जलवायु अनुकूल प्रौद्योगिकियों के संभावित सकारात्मक प्रभाव की सराहना की और जल संसाधन प्रबंधन में महिलाओं के अनुपात में सुधार के लिए आवश्यक प्रयासों पर बल दिया.

इस के बाद “महिला सशक्तीकरण में तेजी लाने के लिए जलवायु अनुकूल जल प्रबंधन प्रौद्योगिकियों और नीतियों को एकीकृत करने” जैसे विषय पर पैनल चर्चा आयोजित की, जिस का संचालन भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली के कृषि भौतिकी विभाग के प्रमुख डा. एन. सुभाष ने किया.

भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली के संयुक्त निदेशक (प्रसार) डा. आरएन पदारिया, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के एडीजी (प्रोसैसिंग इंजीनियरिंग) डा. के. नरसैया, एनबीएसएस व एलयूपी, नई दिल्ली के क्षेत्रीय केंद्र की प्रमुख डा. जया एन. सूर्या, आरपीसीएयू के बेसिक साइंसेज एंड ह्यूमैनिटीज कालेज के डीन डा. अमरेश चंद्रा, आरपीसीएयू के मत्स्यपालन कालेज के डीन डा. पीपी श्रीवास्तव और आरपीसीएयू के शिक्षा निदेशक डा. यूके बेहरा ने पैनलिस्ट के रूप में भाग लिया.

उन्होंने एकीकृत कार्ययोजना के लिए सुझाव दिया, जिस में जल प्रबंधन प्रौद्योगिकियों को तेजी से अपनाने के लिए प्रभावी विस्तार विधियां, महिला किसान अनुकूल उपकरणों का विकास, कम लागत वाली वर्षा जल संचयन तकनीक, एकीकृत कृषि प्रणाली, अमृत सरोवर योजना को मजबूत करना, जल जीवन मिशन आदि शामिल हैं.

कार्यशाला में विचारविमर्श के आधार पर महिला सशक्तीकरण के लिए जलवायु अनुकूल जल प्रबंधन पर संक्षिप्त नीति तैयार की जाएगी. कुलमिला कर इस कार्यशाला में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली, एनबीएसएस व एलयूपी, नई दिल्ली, एनबीपीजीआर, नई दिल्ली और आरपीसीएयू, बिहार में स्थित अन्य संस्थानों के शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों, कर्मचारियों और छात्रों सहित लगभग 70 प्रतिनिधियों ने इस में भाग लिया.

छत्तीसगढ़ बजट 2025-26 : बस्तर के किसान हितों की अनदेखी

छत्तीसगढ़ सरकार के 2025-26 के बजट को हम एक माने में निश्चित रूप से अनूठा कह सकते हैं कि एआई और डिजिटलाइजेशन के युग में यह बजट हाथ से लिखा गया. कुछ नया कर दिखाने के चक्कर में पूर्व तेजतर्रार आईएएस वित्त मंत्री शायद मोदी के डिजिटलाइजेशन के नारे को भूल गए.

पहली नजर में बजट में कई लोकलुभावनी बातें नजर में आती हैं, पर जब हम गहराई से बजट की पड़ताल करते हैं, तो हमें प्रदेश के किसानों के उत्थान और बस्तर के समग्र विकास के लिए कोई ठोस दृष्टिकोण नजर नहीं आता. अकसर बजट आंकड़ों की बाजीगरी और खोखली घोषणाओं के पुलिंदे ही होते हैं, यह बजट भी इस से कुछ ज्यादा अलग हट कर नहीं है. इस बजट की सब से बड़ी विडंबना यह रही कि बस्तर, जो प्रदेश व देश के लिए सब से अधिक प्राकृतिक संसाधन उपलब्ध कराता है, उसे एक बार फिर नजरअंदाज कर दिया गया है.

हंसें या रोएं- जैविक खेती के लिए 20 करोड़, प्रमाणीकरण के लिए 24 करोड़

सरकार सालभर जैविक खेती के सैमिनार व वर्कशौप करती है. दिनरात जैविक खेती की बातें होती हैं, पर जब बजट में राशि देने की बात आती है, तो जैविक खेती के साथ कैसा मजाक किया जाता है, उस की बानगी देखिए, इस बजट में जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए मात्र 20 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है और जैविक प्रमाणन के लिए 24 करोड़ रुपए देंगे.

प्रदेश के 40 लाख किसानों को जैविक खेती के लिए प्रति किसान सालाना केवल 50 रुपए मात्र. ऐसे में जैविक भारत मिशन-2047: मियोनप (MIONP) और सतत विकास के ‘संयुक्त राष्ट्र संघ’ के सस्टेनेबल डेवलपमेंट के ‘SDGs’ के संयुक्त वैश्विक लक्ष्यों को भारत कैसे पूरा कर पाएगा. इस बिंदु को हलके में बिलकुल नहीं लिया जाना चाहिए.

इसी से जुड़ी दूसरी गंभीर बात यह कि सरकार को जैविक खेती करवाने से ज्यादा चिंता जैविक प्रमाणीकरण की है. यह बिलकुल वैसा ही है, जैसे किसी को खेती के लिए 20 रुपए दिए जाएं और उस की फसल की गुणवत्ता जांचने के लिए 24 रुपए.

सचाई यह है कि जैविक प्रमाणीकरण की मौजूदा व्यवस्था किसान हितैषी नहीं, बल्कि पूरी तरह से बिचौलियों और सर्टिफिकेशन एजेंसियों के फायदे के लिए बनी हुई है. किसान जैविक खेती करने में हजारों रुपए लगाता है, लेकिन प्रमाणपत्र हासिल करने में उसे और ज्यादा खर्च करना पड़ता है. फिर भी उसे बाजार में उचित दाम नहीं मिलता. सरकार को यह समझना चाहिए कि जब जैविक खेती को सही तरीके से बढ़ावा ही नहीं दिया गया, तो प्रमाणीकरण करवा कर क्या फायदा?

अगर सरकार वास्तव में जैविक खेती के प्रति गंभीर होती, तो उसे प्रमाणीकरण की तुलना में जैविक खेती के विस्तार और किसानों की सहायता पर ज्यादा फोकस करना चाहिए था. लेकिन यहां फिर वही पुरानी नीति अपनाई गई. किसानों को कम पैसा दो और अफसरों व एजेंसियों को ज्यादा.

ऋण कृत्वा घृतं पिवामि यानी किसानों को कर्ज में डालने की नीति असली समस्या पर ध्यान नहीं

बजट में किसानों के लिए 8,500 करोड़ रुपए के ब्याजमुक्त लोन की घोषणा की गई है. देखने में यह अच्छा लग सकता है, लेकिन असल में यह किसानों की समस्याओं का हल नहीं कर रही,  बल्कि उन्हें एक और कर्ज के जाल में फंसाने की रणनीति है. कर्ज का मकड़जाल किसानों की सब से बड़ी समस्या है.

किसानों की असली समस्या का हल ‘कर्ज’ नहीं, बल्कि उन की उपज का वाजिब दाम न मिलना है. अगर किसान को उस की फसल का सही दाम मिले, तो उसे बारबार कर्ज लेने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. कर्ज पर ध्यान देने के बजाय सरकार को यह देखना चाहिए कि:
– किसानों को उन की उपज का लाभकारी मूल्य मिले.
– सभी फसलों पर एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) सुनिश्चित किया जाए.
– खेत में उत्पादन के उपरांत भी फसल का एक बड़ा हिस्सा 25 से 30 फीसदी तक समुचित भंडारण, प्रसंस्करण, परिवहन, विपणन की कमी और अन्य विभिन्न कारणों से नष्ट हो जाता है, यह राष्ट्रीय क्षति है. इन पोस्ट हार्वेस्ट हानि को नियंत्रित किया जाए.
– कृषि उत्पादों के लिए कृषकोन्मुखी प्रभावी बाजार व्यवस्था विकसित की जाए.

हम आखिर कब समझेंगे कि ब्याज मुक्त लोन देना सिर्फ तात्कालिक राहत है, लेकिन यह किसानों की समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं है. इस से किसान लगातार कर्ज के जाल में फंसते जाते हैं और उन की वित्तीय स्वतंत्रता कभी नहीं आती. समस्या कर्ज की नहीं, बल्कि आय बढ़ाने की है और इस पर सरकार का कोई ध्यान नहीं है.

बस्तर से हर घंटे खनिज की अनवरत लूट, लेकिन बस्तर को कुछ नहीं?

बस्तर सिर्फ छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए खनिजों का सब से बड़ा भंडार है. यहां से रोजाना 24 ट्रेन भर कर सिर्फ लौह अयस्क निकाला जाता है, जो भारत के कई प्रमुख इस्पात संयंत्रों और उद्योगों के लिए जीवनरेखा है. इस के अलावा बौक्साइट, टिन, सोना, मैग्नीज, कोयला और कई अन्य कीमती खनिज भी यहां से निकाले जाते हैं.

लेकिन क्या बस्तर को इन खनिजों से होने वाली कमाई का उचित हिस्सा मिलता है? अगर सिर्फ लौह अयस्क की रौयल्टी का पूरा हिस्सा बस्तर के लोगों को मिल जाए, तो वे अरब के शेखों की तरह और भी अमीर हो सकते हैं. लेकिन सचाई यह है कि खनिजों की लूट हो रही है और इस का लाभ बस्तर को नहीं मिलता है.

बस्तर के विकास के लिए जो थोड़ीबहुत राशि चिड़िया के चुग्गे की तरह ‘डीएमएफ’ के नाम पर मिलती भी है, तो वह भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती है. यह पैसा कलक्टरों और नेताओं की पौकेटमनी की तरह खर्च होता है और आम जनता तक कुछ नहीं पहुंचता. यह घोर अन्याय है और वर्तमान वित्त मंत्री इस कड़वी सचाई से अच्छी तरह परिचित हैं, क्योंकि वे खुद बस्तर के कलक्टर रह चुके हैं.

बस्तर की अकूत वन संपदा, वनोपज का दोहन, पर बदले में सिर्फ ठेंगा

बस्तर संभाग में लगभग 70 फीसदी क्षेत्र वनों से आच्छादित माना जाता है. सरकारें यहां की बहुमूल्य लकड़ी और तरहतरह के वनोपजों का लगातार दोहन करती रही हैं. कहा जाता है कि वन विभाग के ठीकठाक रेंज के रेंजर साहब की आमदनी जिले के कलक्टर से भी ज्यादा होती है या थी (डीएमएफ फंड के प्रावधान के पूर्व). और यह विभागीय बंदरबांट तो मात्र खुरचन की है, असल मलाई तो सरकार के खाते में जाती है. किंतु इस के बदले में बस्तर को क्या मिलता है, यह भी अपनेआप में सोचने का विषय है.

बस्तर में पर्यटन और रोजगार के अपार अवसरों की अनदेखी

बस्तर पर्यटन की दृष्टि से अपार संभावनाओं वाला क्षेत्र है, लेकिन बजट में इकोटूरिज्म और फार्मटूरिज्म के लिए सिर्फ 10 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है. इतने कम बजट में कोई अंतर्राष्ट्रीय स्तर का पर्यटन ढांचा विकसित नहीं किया जा सकता.

हवाई कनैक्टिविटी का संकट : बस्तर से रायपुर के लिए साल 1991 में हवाई सेवा शुरू हुई थी. सरकारों द्वारा बस्तर की अनदेखी के कारण यह कभी नियमित नहीं चल पाई. ‌इस सरकारी उदासीनता और पक्षपात के कारण पिछले 4-5 महीनों से यह सेवा एक बार फिर से बंद पड़ी है.

यह हास्यास्पद है कि जहां देशविदेश में नए एयरपोर्ट बन रहे हैं, वहीं बस्तर संभाग जो कि विश्व के कई देशों से क्षेत्रफल में ज्यादा बड़ा है, इसे प्रदेश की राजधानी रायपुर से जोड़ने वाली एकमात्र हवाई सेवा भी बंद कर दी गई है. अगर यह घोर पक्षपात और अपेक्षा नहीं है तो और क्या है?

अन्य राज्य अपने दुर्गम क्षेत्रों को हवाई सेवा से जोड़ने के लिए शुरुआती फ्लाइट्स में घाटा होने पर कैपिंग के आधार पर हवाई कंपनियों को जरूरी अनुदान दे कर भी नियमित हवाई सेवाएं चलवा रहे हैं, तो बस्तर के लिए यह व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती थी?

दरअसल, राजनीतिक इच्छाशक्ति और विजन का घोर संकट है और बस्तर में यह संकट सब से ज्यादा है. सड़क मार्ग से बस्तर के कोंटा से रायपुर तक की यात्रा आज भी कम से कम 12 घंटे की होती है, जो बाहर इलाज के लिए जाने वाले मरीजों, उच्च शिक्षा के लिए बाहर जाने वाले छात्रों और बस्तर में नए उद्यम लगाने में रुचि लेने वाले उद्यमियों के लिए बेहद कष्टदायक है. इन के लिए हवाई सेवा एक लग्जरी या विलासिता नहीं, बल्कि अनिवार्य आवश्यकता है.

आदिवासियों के लिए घोषणाएं, हकीकत में कितनी कारगर?

सरकार ने तेंदूपत्ता संग्राहकों को 5,500 रुपए प्रति बोरा भुगतान की घोषणा की है, लेकिन महत्वपूर्ण यह है कि क्या यह राशि वास्तविक संग्राहकों तक पहुंचेगी?

पहले भी ऐसे दावे किए गए थे, लेकिन पैसा बिचौलियों के हाथों में चला जाता था.

‘चरण पादुका योजना’ के लिए 50 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है, लेकिन यह सिर्फ एक सांकेतिक योजना बन कर रह जाती है.

हालांकि, ‘भूमिहीन कृषि मजदूर कल्याण योजना’ के तहत 5.65 लाख मजदूरों को सालाना 10,000 रुपए की आर्थिक सहायता देने का प्रावधान किया गया है, जो एक अच्छा कदम कहा जा सकता है. यदि यह राशि सीधे मजदूरों के खातों में पारदर्शी तरीके से पहुंचती है, तो इस से काफी राहत मिलेगी.

कृषि व वनोपज आधारित उद्योगों के लिए कोई ठोस नीति और क्रियान्वयन का रोड मैप नहीं

छत्तीसगढ़ में खाद्य प्रसंस्करण और कृषि व वनोपजों पर आधारित उद्योगों की अपार संभावनाएं हैं. लेकिन अभी इस दिशा में कोई ठोस व्यावहारिक नीति नहीं है.

डेयरी समग्र विकास परियोजना के लिए मात्र 50 करोड़ रुपए रखे गए हैं, जो ऊंट के मुंह में जीरा है. मत्स्यपालन, पोल्ट्री, बकरीपालन के लिए मात्र 200 करोड़ रुपए का प्रावधान है, जब कि ये क्षेत्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था को काफी मजबूत कर सकते हैं.

यह भी उल्लेखनीय है कि बस्तर में काजू, कौफी और मसालों की खेती के अलावा जड़ीबूटियों की खेती और प्रसंस्करण की जबरदस्त संभावनाएं हैं, लेकिन इस बजट में इन के लिए कोई विशेष प्रोत्साहन नहीं दिया गया. यदि सरकार इस क्षेत्र में ठोस नीतियां बनाती, तो बस्तर का आर्थिक परिदृश्य बदल सकता था.

अंत में यह भी उल्लेखनीय है कि वर्तमान वित्त मंत्री ओपी चौधरी पूर्व में बस्तर के संवेदनशील लोकप्रिय कलक्टर रह चुके हैं. उन्हें इस क्षेत्र की चुनौतियों की गहरी समझ थी और उम्मीद थी कि उन के वित्त मंत्री के कार्यकाल में बस्तर को अधिक प्राथमिकता मिलेगी. लेकिन चाहे वजह जो भी हो, पर हुआ एकदम उलटा. मुख्यमंत्री और वित्त मंत्री ने अपनेअपने क्षेत्रों पर ज्यादा ध्यान दिया, जब कि बस्तर के लिए बहुत कम ध्यान दिया गया. गजब है कि हमारी लगभग सभी समस्याओं की जड़ में राजनीति है और सभी समस्याओं का समाधान भी राजनीति में ही निहित है. इस राजनीति की माया भी अजब है, जहां राजनीति के हमाम में उतरते ही सब नंगे हो जाते हैं.

(लेखक ग्रामीण अर्थशास्त्र एवं कृषि मामलों के विशेषज्ञ और राष्ट्रीय संयोजक, अखिल भारतीय किसान महासंघ ‘आईफा’)

अब टीवी, रेडियो पर प्रसारित होंगे मेवाड़ मौडल आधारित कृषि कार्यक्रम

उदयपुर :  प्रसार भारती कृषि से जुड़े लोगों और खासकर किसानों के लिए ‘मेवाड़ मौडल’ को रेखांकित करते हुए ऐसे कार्यक्रम तैयार कर प्रसारण करेगा, ताकि किसान आत्महत्या के लिए मजबूर न हों. उन का जीवन और आजीविका दोनों सुरक्षित रहें. यही नहीं, झाबुआ (मध्य प्रदेश) में कड़कनाथ और एमपीयूएटी द्वारा विकसित प्रतापधन मुरगीपालन को भी देशभर में परिचित कराने संबंधी कार्यक्रम तैयार किए जाएंगे.

इस के अलावा संरक्षित खेती, जैविक खेती, प्राकृतिक खेती को भी देशभर में प्रचारित किए जाने की जरूरत है. कुलमिला कर प्रसार भारती से सबद्ध आकाशवाणी और दूरदर्शन एक सशक्त विस्तार कार्यकर्ता की भूमिका निभाते हुए देश के किसानों की भलाई के काम करेंगे.

प्रसार शिक्षा निदेशालय में ‘कृषि में संकट और तनाव’ विषयक पांचदिवसीय कार्यशाला में शिरकत करने वाले 12 राज्यों से रेडियो व दूरदर्शन के अधिकारियों ने अपने अनुभव साझा किए और इस नतीजे पर पहुंचे कि कृषि क्षेत्र में हो रहे शोध और शिक्षण पर भरपूर काम हो रहा है, लेकिन विस्तार कार्यकर्ताओं की कमी के कारण तकनीक सही माने में किसानों तक नहीं पहुंच रही है.

कार्यशाला में यह बात भी उभर कर सामने आई कि हर साल सरकार 500 करोड़ रुपए विस्तार पर खर्च कर रही है. 180 करोड़ रुपए कृषि दर्शन और कृषि वाणी पर, जब कि करोड़ों रुपए कृषि संबंधी लघु कार्यक्रमों व मास मीडिया पर खर्च कर रही है, लेकिन फील्ड में किसानों तक सीधी पहुंच रखने वाले विस्तार कार्यकर्ताओं की बेहद कमी है.

ऐसे में प्रसार भारती की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है. कार्यशाला में इस बात पर भी सर्वसम्मति बनी कि राजस्थान खासकर मेवाड़ संभाग में जलवायु परिवर्तन या बाजार में उतारचढ़ाव के बावजूद यहां का किसान आत्महत्या नहीं करता, क्योंकि वह खेती के साथसाथ पशुपालन और एकाधिक फसलों की खेती करता है.

रेडियो व टैलीविजन के लिए ‘कृषि में संकट और तनाव’ विषयक कार्यक्रमों की अवधारणा और डिजाइन तैयार करने और प्रसारण के लिए पांचदिवसीय कार्यशाला पिछले दिनों 3 मार्च को संपन्न हो गई. भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली (आईसीएआर) के अधीन कृषि तकनीकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान (अटारी) जोन द्वितीय, जोधपुर और राष्ट्रीय प्रसारण एवं मल्टीमीडिया प्रसार भारती, नई दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस कार्यशाला की मेजबानी प्रसार शिक्षा निदेशालय, एमपीयूएटी ने की.

कार्यशाला के समापन समारोह के मुख्य अतिथि एमपीयूएटी के पूर्व कुलपति डा. उमाशंकर शर्मा ने कहा कि कृषि में संकट और तनाव को राजस्थान खासकर मेवाड़ और मारवाड़ का किसान बखूबी जानता है. मारवाड़ में कम वर्षा होने के बावजूद यहां का किसान हार नहीं मानता. यही नहीं, सीमावर्ती जिलों के युवा सेना में बड़ी संख्या में भरती होते हैं. ऐसे युवा देश के लिए जान तक न्योछावर कर देता है, लेकिन यहां का किसान ऐसे संकट और तनाव को भी सहन कर जाता है.

जलवायु परिवर्तन की बात करें, तो बांसवाड़ा में माही डेम बनने के बाद पाला कम पड़ने लगा है. ऐसे में बांसवाड़ा में किसान रबी में मक्का की फसल भी लेने लगे, जो एक हेक्टेयर में 80 क्विंटल तक उत्पादन देती है. इस के अलावा प्रतापधन मुरगीपालन भी किसानों को खूब संबल देती है. महज 2 महीने में ही इस में 6 किलोग्राम मांस हो जाता है. इस का अंडा भी 25 रुपए प्रति नग बिकता है.

प्रसार भारती की अतिरिक्त महानिदेशक अनुराधा अग्रवाल ने कहा कि आकाशवाणी व दूरदर्शन केंद्र रेतीली फसल एपीसोड तैयार करेंगे. कार्यशाला में कृषि उत्पादों में क्याकुछ नया हो रहा है, किसान को इस के बारे में विस्तार से सीखने को मिला. देश के दूसरे राज्यों में भी इस तरह के कार्यक्रमों के प्रसारण से किसानों के मार्गदर्शन का काम प्रसार भारती करेगा.

अटारी, जोधपुर के निदेशक डा. जेपी मिश्रा ने कहा कि संकट को संकट ही बना रहने देंगे, तो समाधान संभव नहीं है. बदलाव एकाएक किसी को रास नहीं आता है, लेकिन बदलाव जरूरी है, तभी संकट का समाधान हो पाएगा.

खेती में पशुपालन फायदेमंद, गौ संरक्षण भी जरूरी

उदयपुर : रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध इस्तेमाल से जमीन की सेहत और पौलीथिन व अन्य डिस्पोजेबल के इस्तेमाल से गायों की सेहत इतनी बिगड़ चुकी है कि वह एक दिन स्वच्छ दूध देना भी बंद कर देंगी. ये बात स्कूल शिक्षा एवं पंचायती राज मंत्री मदन दिलावर ने कही.

मंत्री मदन दिलावर राजस्थान कृषि महाविद्यालय के नूतन सभागार में ’कृषि दक्षता और पशु कल्याण को सुदृढ़ बनाने की दिशा में सटीक पशुधन प्रबंधन तकनीक’ विषयक तीनदिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे.

सम्मेलन में देशभर के 29 प्रांतों के लगभग 400 वैज्ञानिक, पशुधन के जानकार व किसानों ने भाग लिया. उन्होंने गिर, साहीवाल, थारपारकर गायों का जिक्र करते हुए कहा कि जिन का कंधा ऊंचा हो, सही मायने में उन्हीं गायों का दूध लाभप्रद है.

उन्होंने विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों का आह्वान किया कि वे इस रणनीति पर काम करें कि हमारी पारंपरिक देसी गायों का संरक्षण किया जा सके. पुराने समय से हमारे पूर्वजों ने खेती करना शुरू किया होगा तो कितने संकट आए होंगे. खुदाई कर मिट्टी तैयार करना, खेत का आकार देना. तब खेती में बैलों का ही इस्तेमाल होता था. हल के माध्यम से खेतीकिसानी का काम होता था. आज के तकनीकी दौर में मशीनीकरण का बोलबाला है. हमें बैलों की महत्ता को भी नहीं भूलना चाहिए.

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने बताया कि उन के दो वर्ष तीन माह के कार्यकाल में एमपीयूएटी ने 44 पेटेंट हासिल किए. इस तरह कुल 55 पेटेंट विश्वविद्यालय के नाम हैं.

उन्होंने विश्वविद्यालय के पशुधन वैज्ञानिकों आह्वान किया कि मंत्री मदन दिलावर की मंशा के अनुसार अपनी गायों की ब्रीड को संरक्षित करने की दिशा में सारगर्भित शोध करने की जरूरत है. देश को ऐसी कृषि प्रणाली की जरूरत है, जो न केवल पशु हितैषी हो, बल्कि वातावरण और पर्यावरण को बचाने वाली भी हो. 21वीं पशुगणना के परिणाम भी इस में मददगार साबित होंगे.

विशिष्ट अतिथि अमूल आणंद (गुजरात) के महाप्रबंधक डा. अमित व्यास ने कहा कि विश्व में 240 मीट्रिक टन दूध उत्पादन में हमारे देश की भागीदारी 23 फीसदी है. देश में सर्वाधिक दूध उत्पादन में उत्तर प्रदेश के बाद दूसरा स्थान राजस्थान का है.

डा. अमित व्यास ने कहा कि गाय का दूध कैसे बढ़े और खर्च कम कैसे हो. इस पर अमूल बड़े पैमाने पर काम कर रहा है और सफलता भी मिली है. अमूल प्रतिष्ठान में 400 पशु चिकित्सकों की टीम में नित्य गायों की देखभाल में लगी है और लक्षण दिखाई देते ही इलाज आरंभ कर दिया जाता है. खास बात यह है कि आयुर्वेदिक व होमियोपैथिक दवाओं से गायों का इलाज किया जा रहा है. ऐसी तकनीक किसानों तक भी पहुंचनी चाहिए. साथ ही, अमूल बायोगैस, गायों की खुराक, कृत्रिम गर्माधान, ड्रोन तकनीक पर भी लगातार काम कर रहा है.

कार्यक्रम में राज्यसभा चुन्नी लाल गरासिया, एमबीएस विश्वविद्यालय जोधपुर के कुलपति डा. अजय शर्मा, भारतीय पशु उत्पादन एवं प्रबंधन सोसायटी सरदार कृषि नगर दांतीवाड़ा (गुजरात) के अध्यक्ष डा. एपी चौधरी ने भी संबोधित किया.

आयोजन सचिव सिद्धार्थ मिश्रा ने बताया कि राजस्थान कृषि महाविद्यालय के पशु उत्पादन विभाग और भारतीय पशु उत्पादन एवं प्रबंधन सोसायटी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित तीनदिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में कुल 7 तकनीकी सत्रों में वैज्ञानिकों ने उपरोक्त विषय पर गहन मंथन किया. आरंभ में सम्मेलन समन्वयक डा. जेएल चौधरी ने स्वागत भाषण दिया. संचालन डा. गायत्री तिवारी ने किया.

लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड व सम्मान

समारोह में लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड तमिलनाडु के डा. त्यागराज शिवकुमार को दिया गया, जबकि पशु उत्पादन के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने पर डा. बालूस्वामी (तमिलनाडु), डा. बीएस खद्दा (मोहली), डा. बी. सतीशचंद्र (कर्नाटक), डा. बी. रमेश (तमिलनाडु) को शील्ड व सम्मानपत्र दे कर सम्मानित किया गया. साथ ही, इफको के प्रबंधक सुधीर मान व शिक्षा मंत्री के विशेषाधिकारी डा. सुनील दाधीच को भी स्मृति चिन्ह दे कर सम्मानित किया गया.

गाय का दूध पिलाओ – बच्चा चंचल व तेज दिमाग का होगा
‘पाडा तो पाडा ही रहेगा’

शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने कहा कि गाय का दूध पीने वाला बच्चा सदैव चंचल, तेज दिमाग वाला होता है, जबकि भैंस का दूध पीने वाला बच्चा ऊंगणिया (आलसी) होता है. गाय के बछड़े को छोड़ते ही वह उछलताकूदता सीधे अपनी मां के पास पंहुच जाता है.

उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि गाय का बछड़ा थोड़ा बड़ा होने पर केरड़ा, नारकिया और अंत में बैल बनता है, जबकि भैंस का बच्चा जन्म से अंत तक पाडा ही रहता है.

कृषि दक्षता व पशु कल्याण विषयक राष्ट्रीय सम्मेलन में मंत्री मदन दिलावर ने स्पष्ट किया कि हर पशु का अपना महत्व है. यदि चेतक घोड़ा नहीं होता तो महाराणा प्रताप का नाम इतना आगे नहीं होता.

उन्होंने आगे कहा कि ऊंट को राज्य पशु का दर्जा दिया गया है. यह प्रजाति भी विलुप्त होने के कगार पर है. वैज्ञानिकों को इसे बचाने के उपाय ईजाद करने होंगे. सीमा सुरक्षा मामले में भी ऊंट की अपनी अहमियत है. ‘रेगिस्तान के जहाज’ के नाम से परिचित ऊंट बीएसएफ के लिए वरदान है, जो बिना पानी पीए 8-10 दिन निकाल लेता है. लेकिन गाय की अपनी विशेष महत्ता है. गाय का गोबर व मूत्र से कई बीमारियां स्वतः भाग जाती हैं. कोई भी पवित्र कार्य करने से पूर्व गोबर से लिपाई का चलन है, ताकि शुद्धता बरकरार रहे.

उन्होंने यह भी कहा कि राजस्थान में कितना भी संकट आए, यहां का किसान आत्महत्या नहीं करता है. अकेली गाय ही अपने दूध से किसान का पेट भर सकती है. हमें दूध, पनीर, मिठाई, चाय तो भाती है, लेकिन गाय नहीं सुहाती. इसलिए हम ने उसे निकाल दिया और वह सड़कों पर, खेतों में या फिर बूचड़खाने ही उन के लिए बचे हैं.

गरीबों का भोजन अब अमीरों की थाली में

उदयपुर : 28 फरवरी, 2025 को ‘खाद्य एवं पोषण सुरक्षा व पौष्टिक अनाज’ विषय पर आयोजित एकदिवसीय कार्यशाला में महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (एमपीयूएटी) के अनुसंधान निदेशक डा. अरविंद वर्मा ने कहा कि आजादी के समय हमारे देश की आबादी 33 करोड़ थी और पेट भरने के लिए केवल मोटे अनाज जैसे कांगणी, रागी, सांवा, कुटकी, बाजरा, ज्वार आदि ही थे. विगत 70 सालों में भारत की आबादी 150 करोड़ पंहुच गई है. तब अनाज की कमी को पूरा करने के लिए विदेशों से गेहूंधान मंगाना पड़ा था. आज कृषि वैज्ञानिकों की मेहनत के बल पर अनाज के भंडार भरे हुए हैं. खाद्यान्न के मामले में भारत आत्मनिर्भर है.

इस कार्यशाला में गिर्वा, कुराबड़, सायरा, गोगुंदा व कोटड़ा के 100 किसानों ने भाग लिया. डा. अरविंद वर्मा ने कहा कि एक किलो धान पैदा करने में 3,500 लिटर पानी खर्च होता है, जबकि मोटे अनाज, जिन्हें ‘श्री अन्न’ के नाम से पुकारा जाता है, एक या दो पिलाई में ही पक जाते हैं.

उन्होंने किसानों को शपथ दिलाई कि गेहूंमक्का करें, लेकिन कम से कम 20 फीसदी भूमि पर मोटे अनाज की बोआई जरूर करें. मोटा अनाज कभी गरीबों का भोजन था, लेकिन अब इसे अमीर लोगों का भोजन माना जाता है.

कीट विज्ञानी डा. आर. स्वामीनाथन ने बताया कि मोटे अनाज वाली फसलों में कीड़ाबीमारी नहीं के बराबर आती है. फिर भी मोटे अनाज की फसलों के आसपास हजारे के फूल के पौधे लगा देने मात्र से मित्र कीटों की भरमार रहेगी, जो शत्रु कीट का खात्मा कर देंगे.

आनुवंशिकी विभागाध्यक्ष डा. हेमलता शर्मा ने ‘श्री अन्न’ यानी मोटा अनाज को खाद्य, पोषण, स्वास्थ्य, पर्यावरण और गृह सुरक्षा में कारगर बताया और कहा कि मोटा अनाज प्रयोग में लाने से हम कई प्रकार की बीमारियों से बच सकते हैं. उन्होंने मोटे अनाज को खेतों में उगाने की विधि और बीज की उपलब्धता के बारे में बताया. मोटा अनाज पर कड़क छिलका होता है, जिसे हुलर (चक्की) से हटा कर हम रोटी, इडली, हलवा आदि कई चीजें बना सकते हैं.

उन्होंने किसानों से कहा कि पोषक तत्वों से भरपूर बाजरा कोई भी बाजार से न खरीदे. एमपीयूएटी की ओर से कार्यशाला के संभागी किसानों को बाजारा व अन्य ‘श्री अन्न’ के बीज सुलभ कराए जाएंगे. इस मौके पर ‘श्री अन्न’ की लाइव स्टाल भी लगाई गई, ताकि किसान मोटे अनाज को बारीकी से समझ सकें.

इस कार्यशाला में पूर्व संयुक्त निदेशक, कृषि, बंसत कुमार धूपिया ने कहा कि सब से पहले खेत की सेहत सुधारी जानी चाहिए. रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशियों का सीमित मात्रा में प्रयोग करने की सीख दी.

होम साइंस कालेज में खाद्य एवं पोषण विभाग सहप्राध्यापक डा. विशाखा सिंह ने मोटे अनाज की कटाई के बाद उन से बनने वाले विभिन्न व्यंजनों जैसे केक, बिसकुट, कुकीज, ब्रेड आदि के बारे में बताया.

आरंभ में संयुक्त निदेशक सुधीर कुमार वर्मा, सहायक निदेशक श्याम लाल सालवी, डा. डीपी सिंह, रामेश्वर लाल सालवी, हरीश टांक आदि ने भी अपने विचार रखे. कार्यक्रम का संचालन महेश व्यास ने किया.

कृषि विस्तार योजना (Agricultural Extension Scheme) से किसानों को लाभ

विस्तार परियोजना (वर्चुअली इंटीग्रेटेड सिस्टम टू एक्सेस एग्रीकल्चरल रिसोर्सेज) का उद्देश्य प्लेटफार्मों पर विश्वसनीय, सत्यापित और नए संसाधनों को एकीकृत कर के कृषि के लिए एक एकीकृत, संघीय डिजिटल ईकोसिस्टम विकसित करना है.

यह किसान फीडबैक को शामिल करने के लिए दोतरफा संचार को सक्षम करते हुए डिजिटल समाधानों की मापनीयता, पहुंच और समावेशिता को बढ़ाने पर केंद्रित है. यह केंद्रराज्य सम्मलेन को बढ़ावा देने, हितधारकों के साथ साझेदारी को बढ़ावा देने और आईसीएआर संस्थानों और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के प्रयासों के साथ मिलकर के,  कृषि विस्तार के लिए मजबूत डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के विकास को बढ़ावा देता है.

इस का लक्ष्य किसानों को कार्यवाही योग्य जानकारी के साथ सशक्त बनाना, सहयोग को सुव्यवस्थित करना और डिजिटल कृषि विस्तार पहलों को लंबे समय तक सस्टेनेबल बनाए रखना हैं.

मौजूदा कृषि विस्तार प्रणाली का डिजिटीकरण और इस का दायरा काफी हद तक बढ़ाने और हर किसान को फसल उत्पादन, विपणन, मूल्य और आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन और जलवायु स्मार्ट कृषि प्रथाओं, मौसम सलाह आदि पर उच्च गुणवत्ता वाली सलाहकार सेवाओं तक पहुंचाने का काम करता है. साथ ही, ये सलाहकार सेवाएं कृषि और उस से संबंधित क्षेत्रों से जुड़ी सभी सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी प्रदान करती हैं जिस से किसानों को लाभ होता है.

कृषि एवं किसान कल्याण विभाग ने ओडिशा, बिहार, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान राज्यों के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं ताकि उन की तकनीकी और सामग्री समीक्षा समितियों को नेटवर्क पर लाया जा सके और छोटे पायलटों पर काम शुरू किया जा सके.वर्तमान में कृषि एवं किसान कल्याण विभाग मौजूदा ‘विस्तार  परियोजना’ का  कार्यान्वयन कर रहा है.

विस्तार परियोजना  का उद्देश्य किसानों को नईनई जानकारी तक पहुंच प्रदान करने के लिए नेटवर्क के जरिए सभी पहलों और समाधानों के साथ एकीकरण करना है. इस में जमीनी स्तर पर तैनात एआई  सक्षम चैटबौट का लाभ उठाना और बाद में एग्रीस्टैक  के साथ एकीकरण शामिल है.

विस्तार परियोजना के प्रयासों में डिजिटल बौट्स पर एक्सटेंशन कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण शामिल है. इसे वीडियो तैयार करने के कौशल को बढ़ाने और किसानों को चरणबद्ध तरीके से आगे प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए, जमीनी स्तर पर आवश्यक जानकारी तक पहुंचने के लिए, उन्नत आईटी  उपकरणों को संभालने के लिए, फ्रंट लाइन एक्सटेंशन वर्कर्स को प्रशिक्षण आयोजित करने के लिए, मौजूदा भागीदारी और नेटवर्क स्वयंसेवकों के माध्यम से और सरल बनाया जा सकता है.

उन्नत फसल विविधीकरण (Crop Diversification) पर प्रशिक्षण

उदयपुर : 6 फरवरी, 2025 को महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के अनुसंधान निदेशालय के अंतर्गत फसल विविधीकरण परियोजना के तहत “सतत कृषि की क्षमता को बढ़ाने हेतु उन्नत फसल विविधीकरण रणनीतियों” पर दो दिवसीय विस्तार अधिकारियों के प्रशिक्षण कार्यक्रम की शुरुआत हुई.

कार्यक्रम में कृषि अधिकारियों, शोधकर्ताओं और विशेषज्ञों ने सतत कृषि और फसल विविधीकरण के नवीन दृष्टिकोणों पर विचारविमर्श किया जाएगा. यह प्रशिक्षण कार्यक्रम जलवायु परिवर्तन, मृदा क्षरण और खाद्य सुरक्षा जैसी बढ़ती चुनौतियों का समाधान करने के उद्देश्य से आयोजित किया गया है. इस का मुख्य उद्देश्य अधिकारियों को उन्नत ज्ञान और रणनीतियों से सुसज्जित करना है, ताकि वे फसल विविधीकरण को बढ़ावा देकर कृषि उत्पादकता बढ़ाने और पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित करने में योगदान कर सकें.

कार्यक्रम में डा.अरविंद वर्मा, निदेशक अनुसंधान ने प्रशिक्षण के उद्देश्यों की जानकारी दी. उन्होंने विविधीकृत फसल प्रणालियों को अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया, जिस से मृदा स्वास्थ्य में सुधार होगा, एकल फसल पर निर्भरता कम होगी और किसानों की आय में वृद्धि होगी. साथ ही, उन्होंने फसल विविधीकरण में खरपतवार प्रबंधन की उन्नत तकनीकों पर भी विस्तार से चर्चा करी.

इस कार्यक्रम में परियोजना प्रभारी डा. हरि सिंह ने सतत कृषि पद्धतियों को अपनाने में फसल विविधीकरण की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला. उन्होंने पारंपरिक कृषि ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों के समावेश से कृषि प्रणालियों को अधिक सक्षम और लचीला बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया.

डा. एचएल बैरवा, ने पर्यावरण अनुकूल और लाभकारी विविधीकृत उद्यानिकी में फसल विविधीकरण पर चर्चा करी. डा. एचएल बैरवा ने किसानों को विभिन्न फसलों को उद्यानिकी फसलों के साथ एकीकृत करने के आर्थिक और पारिस्थितिक लाभों के बारे में बताया. उन्होंने फलोत्पादन के 10 आयाम बताए जिस से किसानों की आय व रोजगार में वृद्धि हो सके.

फसल विविधीकरण (Crop Diversification)

डा. लतिका व्यास, ने फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने में कृषि विज्ञान केंद्रों की महत्वपूर्ण भूमिका पर चर्चा करी. उन्होंने अधिकारियों को उन्नत कृषि तकनीकों के प्रभावी स्थानांतरण की विभिन्न विधियों का प्रायोगिक प्रशिक्षण प्रदान किया, जिस से वे किसानों को नवाचारों और सतत कृषि पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रेरित कर सकें.

कार्यक्रम में उपस्थित मृदा वैज्ञानिक डा. सुभाष मीणा, ने कहा कि लगातार एक ही फसल उगाने से मृदा में पोषक तत्वों की कमी हो जाती है, जिस से उत्पादकता प्रभावित होती है. साथ ही, उन्होंने फसल चक्र, मिश्रित फसल प्रणाली और जैविक खादों के उपयोग पर भी जोर दिया.

इस दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान प्रतिष्ठित कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों द्वारा विभिन्न तकनीकी सत्र आयोजित किए जाएगें, जिन में विस्तार अधिकारियों को जलवायु अनुकूलन,  मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, समेकित कृषि प्रणाली, नीतिगत ढांचे और सरकारी पहल व्याख्यान व व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाएगा.

मिट्टी की सेहत को सुधारने पर चर्चा करेंगे देशभर के मृदा वैज्ञानिक

उदयपुर : 5 फरवरी, 2025  को मृदा संसाधन मानचित्रण और प्रबंधन की नवीनतम तकनीक पर आधारित 21 दिवसीय शीतकालीन प्रशिक्षण उदयपुर व नागपुर केंद्रों पर आरंभ हुआ. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा घोषित राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग नियोजन ब्यूरो क्षेत्रीय केंद्र, उदयपुर व नागपुर में आयोजित इस प्रशिक्षण में देशभर के 50 से ज्यादा मृदा वैज्ञानिक हिस्सा ले रहे हैं.

क्षेत्रीय केंद्र, उदयपुर में आयोजित उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक थे, जबकि नागपुर केंद्र के समारोह में मुख्य अतिथि परिमल सिंह, परियोजना निदेशक, नानाजी देशमुख कृषि संजीवनी प्रकल्प (पोकरा) महाराष्ट्र थे. इस समारोह में नागपुर केंद्र औनलाइन जुड़ा.

कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने कहा कि देश को आजाद हुए 78 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन किसान आज भी पारंपरिक विधियों से कृषि व इस के मूलाधार मिट्टी को संरक्षित किए हुए है. आजादी के बाद हाल के वर्षों में तकनीक के मामले में भारत ने अद्वितीय सफलता हासिल की है. इन में एआई, रिमोट सेंसिंग, भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस), डिजिटल मृदा मानचित्रण (डीएसएम) जैसे उपकरण एवं मृदा संसाधन प्रबंधन की जटिलताओं से निबटने के लिए स्थानिक डाटा का उपयोग करते हैं.

ये प्रौद्योगिकियों मिट्टी के गुणों के विस्तृत विश्लेषण, मिट्टी की प्रक्रियाओं की मौडलिंग और स्थाई भूमि प्रबंधन के लिए रणनीतियों के विकास की सुविधा प्रदान करती हैं. उन्होंने कहा कि मैन्युअल से उच्च तकनीक के जरीए खेती करना किसान के लिए चुनौतीपूर्ण काम है, लेकिन हमारे देश के युवा वैज्ञानिकों की टीम दोनों में तालमेल बिठाने में सक्षम है. इस से किसान व कृषि क्षेत्र में तरक्की सुनिश्चित है.

विशिष्ट अतिथि, पूर्व प्रधान वैज्ञानिक एवं क्षेत्रीय केंद्र, नई दिल्ली के प्रमुख डा. जेपी शर्मा ने कहा कि यह कार्यक्रम मृदा सर्वेक्षण, भूआकृति पहचान और भूस्थानिक उपकरणों के बारे में व्यावहारिक जानकारी देगा.

जल संसाधन एवं पर्यावरण इंजीनियरिंग, भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु के प्रो. शेखरमुद्दू ने कहा कि इस प्रशिक्षण में प्रतिभागियों को मृदा संसाधन मानचित्रण और प्रबंधन में मूल्यवान कौशल प्राप्त होगा. इस से वे मृदा आधारित विकास कार्यक्रमों और टिकाऊ भूमि प्रबंधन में प्रभावी रूप से योगदान करने में सक्षम होंगे.

निदेशक, नागपुर, डा. एनजी पाटिल ने कहा कि मृदा या मिट्टी एक बेहद महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधन है, जो स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र को आधार प्रदान करता है. साथ ही कृषि, वानिकी और पर्यावरणीय स्थिरता की आधारशिला के रूप में काम करता है.

प्रधान वैज्ञानिक एवं पाठ्यक्रम प्रमुख क्षेत्रीय केंद्र, उदयपुर के डा. आरपी शर्मा ने बताया कि इस  दीर्घकालिक प्रशिक्षण में न केवल राजस्थान, बल्कि पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश और ओड़िसा से मृदा वैज्ञानिक अपनेअपने क्षेत्र की मिट्टी की संरचना व संरक्षण की दिशा में अपनाई जा रही तकनीक पर गहन विचारविमर्श करेंगे, ताकि किसानों के लिए तैयार की जाने वाली पौलिसी को नई दिशा दी जा सके.

राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग नियोजन ब्यूरो क्षेत्रीय केंद्र, उदयपुर के प्रमुख एवं  प्रधान वैज्ञानिक डा. बीएल मीना ने अतिथियों का स्वागत किया, जबकि डा. बृजेश यादव, वैज्ञानिक ने धन्यवाद ज्ञापित किया.

प्रशिक्षण में इन पर रहेगा फोकस

मृदा-भूमि रूप संबंधों और मृदा निर्माण पर उन के प्रभाव को समझना, आधुनिक मृदा सर्वेक्षण तकनीकों और भूमि संसाधन सूची विधियों की खोज, रिमोट सेंसिंग (आरएस), जीआईएस और डिजिटल मृदा मानचित्रण (डीएसएम) में जानकारी बढ़ाना, गूगल अर्थ इंजन और भूसांख्यिकी में व्यावहारिक प्रशिक्षण, मिट्टी और जल संरक्षण, भूमि उपयोग नियोजन और टिकाऊ प्रबंधन में भूस्थानिक तकनीकों का प्रयोग आदि.

इस के अलावा मृदा निर्माण के कारक एवं प्रक्रियाओं को समझना, क्षेत्र भ्रमण, मिट्टी की प्रोफाइल का अध्ययन व गुणों का अवलोकन, मृदा संसाधन प्रबंधन में उपग्रह डाटा और उन का अनुप्रयोग, मृदा सर्वेक्षण डेटा व्याख्या.

भूमि संसाधन सूची के लिए मृदा सर्वेक्षण तकनीक को समझना, मृदा एवं जल संरक्षण और भूमि उपयोगनियोजन आदि.