बिचौलियों के बीच पिसते किसान

अदना सा प्याज केवल काटने पर ही आंसू बहाने पर मजबूर नहीं करता है, खरीदने पर भी ग्राहकों के आंसू निकाल देता है. कई सरकारें प्याज के बढ़ते दामों की भेंट चढ़ चुकी हैं. केंद्र की मोदी सरकार के समय प्याज की कीमतों ने पुराने सभी रिकौर्ड तोड़ दिए हैं. देश में पहली बार प्याज की कीमत ने सैंचुरी लगाई और 150 रुपए प्रति किलोग्राम से भी ज्यादा हो गई थी.

प्याज की बढ़ती कीमत पर कांग्रेस की संप्रग सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करने वाली भाजपा अपने कार्यकाल में प्याज की बढ़ती कीमतों पर खामोश थी. लोकसभा में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने तो यहां तक कह दिया था, ‘मैं प्याज नहीं खाती हूं.’

वित्त मंत्री के इस बयान की निंदा भी हुई. मोदी सरकार ने प्याज की बढ़ती कीमतों को कम करने के लिए अफगानिस्तान से प्याज का आयात किया. इस के बाद भी प्याज की कीमतें 80 रुपए से ले कर 100 रुपए के बीच ही हैं.

प्याज की कीमतों ने पहले भी तमाम सरकारों का भविष्य तय किया है. साल 1998 में प्याज के बढ़ते दामों ने दिल्ली में सुषमा स्वराज और राजस्थान में भैरों सिंह शेखावत सरकार को विधानसभा चुनावों में हार का मुंह देखने को मजबूर कर दिया था. उस समय प्याज की कीमत 60 रुपए प्रति किलोग्राम ही बढ़ी थी.

जानेमाने अर्थशास्त्री और देश के पूर्व प्रधानमंत्री डाक्टर मनमोहन सिंह की सरकार के समय में प्याज की कीमत 80 रुपए के ऊपर तक चली गई थी.

प्याज के तेवर देख केंद्र सरकार ने इस की कीमतों को नीचे लाने का काम शुरू किया, पर तब तक खाने वाले आंसू बहाने लगे थे. ऐसे में 2014 के लोकसभा चुनाव में मनमोहन सिंह सरकार को हार का सामना करना पड़ा था.

ऐसा केवल प्याज के साथ ही नहीं होता है. अरहर, आलू, गन्ना जैसी तमाम पैदावारों के साथ भी ऐसा ही होता है. जब किसान के यहां पैदावार होती है, तब वह सस्ती रहती है, पर बिचौलियों के पास पहुंचते ही कीमतें ग्राहकों की पहुंच से बाहर होती जाती हैं. महंगी सब्जियों के बिकने के बाद भी किसानों को कोई फायदा नहीं मिल रहा है.

इस की वजह किसान के खेत से निकलने के बाद ग्राहक की रसोई तक पहुंचने के रास्ते में सब्जी कम से कम 3 हाथों से हो कर गुजरती है. इन 3 हाथों से हो कर गुजरने वाले रास्ते में ही सब्जी का भाव बढ़ता जाता है.

पहले किसान और ग्राहक के बीच केवल थोक कारोबारी होता था. तब इस से कीमतें इतनी नहीं बढ़ती थीं. अब बिचौलियों के बढ़ने से कीमतें तो बढ़ जाती हैं, पर इस का फायदा किसान को नहीं मिल पाता है और ग्राहक भी बेहाल रहता है.

Onionआलू, प्याज और लहसुन जैसी स्टोर कर रखी जाने वाली चीजों को किसान सीजन में सस्ते दामों पर बेच देते हैं. बिचौलिए इन चीजों को स्टोर कर के रख लेते हैं. इस के बाद बाजार में भाव चढ़ाने के लिए पहले सप्लाई कम की जाती है. जब ये सामान महंगे हो जाते हैं, तो सस्ते में खरीदे गए सामान महंगे दामों पर बाजार में बेचे जाते हैं.

गेहूं, चावल और दाल के साथ भी यही खेल खूब खेला जाता है. जिस समय धान और गेहूं की फसल कटती है, बाजार में इन चीजों के दाम घट जाते हैं, जिस से घटे दामों पर बिचौलिए किसानों से यह सामान खरीद लेते हैं. कुछ दिनों के बाद सस्ते में खरीदा गया यही सामान महंगे दामों पर बेच लिया जाता है. इस से किसान की मेहनत की कमाई को बिचौलिए मलाई समझ कर उड़ा रहे हैं.

किसानों के लिए परेशानी वाली बात यह होती है कि इन सरकारी खरीद केंद्रों पर किसानों के माल को सही तरीके से खरीदा ही नहीं जाता है, जिस से परेशान हो कर किसान धान और गेहूं बिचौलियों को बेचने पर मजबूर हो जाता है. बाद में यही बिचौलिए सरकारी नौकरों की मिलीभगत से अपना गेहूं और धान क्रय केंद्रों पर बेच लेते हैं. इस से सरकारी नौकरों और बिचौलियों दोनों का फायदा हो जाता है. साथ ही, सरकारी खरीद का टारगेट भी पूरा हो जाता है.

धान और गेहूं की ही तरह गन्ने का मूल्य भी राजनीति का शिकार हो गया है. बहुत सारी चीनी मिलें किसानों का पैसा सालोंसाल अपने पास रखे रहती हैं. किसानों को अपना गन्ना खुले बाजार में बेचने दिया जाए, तो गन्ने की अच्छी कीमत मिलने लगेगी.र इस का फायदा किसानों को नहीं मिला.

बिजली के इस्तेमाल में न बरतें लापरवाही

अब वो रहट, चरसा, ढेकली के दिन किस्सेकहानियों में ही रह गए हैं. आज का किसान बिजली का खटका दबा कर ही अपनी फसल की सिंचाई कर रहा है. कहने को तो आराम ही आराम है, लेकिन बिजली ने किसानों की नींद उड़ा कर रख दी है.

आज पहले के मुकाबले में सैकड़ों गुना ज्यादा तकनीकी तरक्की हो चुकी है. अच्छे फायदे और भरपूर पैदावार की होड़ में किसान बड़े पैमाने पर फसलों की बोआई करते हैं, लेकिन पूरे दिन बिजली नहीं आने से फसलों को समय पर पानी देना ही मुहाल होता जा रहा है.

बिजली की बेहिसाब कटौती के चलते किसान के लाख जतन करने पर भी सूखती फसल को बचाना मुश्किल हो जाता है. कई बार तो किसानों को बिजली के उपकरणों में खराबी के चलते दुर्घटना का शिकार भी होना पड़ता है.

बिजली से आएदिन दुर्घटनाएं होने के बाद भी किसान रोजाना खेतों की मेंड़ से पंप तक बिजली के तारों पर नाचती मौत के साए तले काम करते हैं. करें भी तो क्या? पापी पेट का सवाल जो ठहरा. यही नहीं, कई बार तो आसमान से गाज गिरती है तो वह भी किसान पर और राजकाज के बजट की बढ़ी महंगाई की मार भी किसान पर ही गिरती है.

बिजली आज किसान की जिंदगी में अहम चीज बन चुकी है, चाहे बीज सुखाना हो, बीजोपचार हो, हर काम में बिजली की जरूरत रहती है. पशुओं के बाड़े और खलिहान में भी बिजली की जरूरत पड़ती ही है. डेरी उद्योग में भी मशीन चाहिए तो उन्हें भी चलाने के लिए बिजली की जरूरत होती है. आजकल निराईगुड़ाई में भी बैटरी से चलने वाले उपकरण बनने लगे हैं. यही नहीं, दूरदराज के खेतों में रात की निगरानी के लिए भी बैटरियों का इस्तेमाल किया जाता है. इन की बैटरी बिजली से चार्ज होती है.

बिजली के ढेरों सुख उस दिन काफूर हो जाते हैं, जब हाथ में बिजली का भारीभरकम बिल आता है. बिल की रकम को देख कर ही किसानों के तोते उड़ जाते हैं. पहले तो बिजली की कटौती से बरबाद फसल, साथ ही भारी बिल की राशि किसान को जबरदस्त झटका देती है.

सूखती फसलों के साथ आंखमिचौली करने वाली बिजली कई बार किसानों के प्राणों के साथ भी खेल जाती है. किसान पुराने टूटेफूटे उपकरणों पर गीले हाथ, गीली मिट्टी, घटिया सामान के साथ मजबूरी में बिजली के तारों को जोड़ने का काम करते हैं. तब यही रोशनी देने वाली बिजली उन की जिंदगी के तार तोड़ कर घरों का चिराग गुल कर देती है.

इन दर्दनाक हादसों से सबक लेना चाहिए. लेकिन पेट की आग के मारे ज्यादातर किसान इतना सबकुछ देखनेसुनने और पढ़ने पर भी कुछ खास सावधानियां नहीं बरतते.

गांवों, खेतों में कुछ खौफनाक नजारे निश्चित तौर पर दुर्घटना को खुली दावत देते हैं.

* नलकूप के पास ही जमीन पर बिछी पड़ी केबल यानी तार सूखी लकड़ी के तख्तों पर होनी चाहिए.

* छप्पर के बने पंपरूम बिजली की आग को पकड़ लेते हैं.

* बिजली मीटर और स्विच बोर्ड बरसाती बौछार के सीधे संपर्क में देखे जा सकते हैं.

* पुराने टायर, कूड़ाकरकट, बिजली उपकरण वगैरह स्विच बोर्ड के पास नहीं रखें.

* बिजली उपकरण, टैस्टर, पलास, तोता पलास वगैरह के प्लास्टिक हैंडल टूटने पर भी उन को काम में ले लेते हैं.

* गीले जूते पहन कर बिना डर के बिजली का खटका दबाते हैं.

* बिजली के खंभे के सहारे ही पशुओं को बांध देते हैं.

* तारों के खुले, कटे, फटे प्लास्टिक कवर वाली जगह पर मजबूत बिजली की टेप नहीं होने पर पौलिथीन की थैलियों की पट्टी बांध देते हैं.

* खेतों में गुजरते बिजली खंभों के सहारे पनपने वाले पौधों की समय पर छंटाई नहीं करते, जिन की टहनियां ऊंची बढ़ कर तारों को छू जाती हैं.

* नलकूप के पास रखे बिजली ट्रांसफार्मर व डीपी के नीचे खाली जगह पर घासफूस और झाडि़यां बिलकुल साफ रखनी चाहिए.

* कई बार खेतों, बाड़ों में उगी हुई बेल पसर कर खंभों के सहारे लिपट कर बिजली के तारों को छू जाती हैं. ये बेलें एक दिन में ही बड़ी नहीं होती हैं, लेकिन दुर्घटना होने तक लापरवाह किसान इन की तरफ ध्यान ही नहीं देते.

* चारे से ऊंचाई तक भरी ट्रैक्टरट्रौली या ट्रक सड़क से गुजरते तारों के नीचे से निकालने की जोखिम उठाने वाले कुछ अनाड़ी या हठी ड्राइवर जानबूझ कर उतावलेपन में मौत को बुलावा दे बैठते हैं.

* बिजली कटौती होने पर कुछ किसान नंगे हाथ काम करते हैं, लेकिन पता नहीं कब बिजली झपट कर झटका मार दे.

राजस्थानी कहावतों के मुताबिक राजा, आग, पानी और योगी इन चारों की वृत्ति का सही पता नहीं लगा सकते. बिजली में पानी और आग दोनों का ही समावेश है. यह किसी भी लापरवाही को नहीं बख्शती. बचाव ही एकमात्र उपाय है.

दुर्घटना से देर भली कहावत के मुताबिक किसानों को समझना चाहिए कि खटारा उपकरणों के साथ या बिना सही बचाव के बिजली के खटकों से छेड़खानी करना मूर्खता से ज्यादा कुछ भी नहीं है.

करंट कुछ भी नहीं छोड़ता, फिर भी हलके करंट से पीडि़त इनसान को प्राथमिक उपचार के साथ ही फौरन नजदीकी अस्पताल ले जाएं.

अपने खेत, बाड़े या घर में किसी भी तरह की बिजली की गड़बड़ी होने पर सही मिस्त्री या विद्युत कर्मचारी को सूचना दें. उन के पास बिजली से बचाव के साधन और जरूरत के औजार होते हैं.

अच्छे औजारों के बिना कोई भी होशियार इनसान बिजली से नहीं बच सकता. याद रखें कि बिजली बहुत ही खतरनाक चीज है. समझदार इनसान इस से सावधानी बरत कर ही महफूज रह पाता है.

घर, खेत या बाड़ा, कहीं पर भी बिजली के तारों का कनैक्शन बढ़ाने के लिए बेतुके जोड़तोड़, खुले जोड़ छोड़ना, टेप के बजाय कपड़े, चिथड़े या पौलीथिन ले कर काम चलाना और किसी भी तरह की अस्थाई व्यवस्था कर के बिजली का फायदा नहीं मिलता, लिहाजा किसी भी समय दुर्घटना घट सकती है.

हर सिक्के के 2 पहलू होते हैं. बिजली भी इस से परे नहीं है. समझदारी रख कर भरपूर पैदावार लें तो दिलों में बिजलियां जलेंगी, लापरवाह रहेंगे तो परिवार पर बिजली गिरेगी.

टमाटर की नई किस्म से दोगुनी पैदावार

आमतौर पर सामान्य प्रजाति के टमाटरों का उत्पादन 400 से 600 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होता है, लेकिन अब टमाटर की खेती करने वाले किसानों के लिए कानपुर के चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय ने एक ऐसी नई किस्म तैयार की है, जिस से प्रति हेक्टेयर उत्पादकता 1,200 से 1,400 क्विंटल तक ली जा सकती है. टमाटर की इस किस्म को नामधारी 4266 का नाम दिया गया है, जो अब किसानों के लिए उपलब्ध है.

चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के संयुक्त निदेशक प्रोफैसर डीपी सिंह ने बताया कि आमतौर पर टमाटर की खेती में निराई, गुड़ाई, बोआई, सिंचाई और खाद वगैरह के खर्च में तकरीबन 50,000 रुपए प्रति हेक्टेयर का खर्च आता है.

उन्होंने बताया कि हम पौलीहाउस में नामधारी 4266 प्रजाति के टमाटर की खेती कर सकते हैं. इस किस्म की खूबी यह है कि इस में रोग व कीट नहीं लगते हैं और टमाटर की फसल लगभग 45 दिनों में तैयार हो जाती है.

उन्होंने आगे बताया कि सितंबर व अक्तूबर माह में इस की नर्सरी लगाई जाती है और दिसंबर से फरवरी माह के बीच फसल तैयार हो जाती है. प्लास्टिक ट्रे में पौध तैयार करने के लिए कोकोपिट यानी नारियल के छिलके का बुरादा वर्मीकुलाइट व परलाइट को 3:1:1 के अनुपात में मिला कर बनाया जाता है. इसे पौध तैयार करने वाली प्लास्टिक ट्रे में डाल कर बीज द्वारा पौध तैयार की जाती है. इस से मिट्टी में मौजूद पोषक तत्त्व पौधों को मिलता है. इस की सिंचाई के लिए भी ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती.

इस किस्म के टमाटर का वजन सामान्य से ज्यादा : जानकारी में बताया गया कि इस का परीक्षण कामयाबीपूर्वक हो गया है और आसपास के जिलों से किसानों को पौलीहाउस में टमाटर की फसल को देखने को बुलाया गया है. बाहर के किसान भी इस की नर्सरी ले जा सकते हैं.

यह प्रजाति बेलटाइप की है. पौलीहाउस में इस की खेती इसलिए करते हैं कि इस में तापमान लता के हिसाब से होता है. एक गुच्छे में 4 से 5 औैर पूरे पौधे में 50 से 60 ही होते हैं. टमाटर का वजन भी 100 से 150 ग्राम है, जबकि सामान्य टमाटर का वजन 50 से 80 ग्राम का ही होता है. यह किसानों के लिए बहुत लाभकारी है.

इस प्रजाति को उद्योग के रूप में अपना सकते हैं

प्रोफैसर डीपी सिंह ने बताया कि आने वाले दिनों में दूसरे विश्वविद्यालयों व कालेजों के छात्रों को इस प्रजाति की खेती का प्रशिक्षण दिया जाएगा. इस के अलावा उद्यमिता में रुचि रखने वाले नौैजवान भी इस का प्रशिक्षण हासिल कर इसे उद्योग के रूप में अपना सकेंगे.

उन्होंने कहा कि हम अपने यहां से प्रशिक्षित छात्रों को दूसरी जगह इस विधि को सिखाने के लिए भेजेंगे, जिस से आगे चल कर वे किसी पर आश्रित न रहें.

Tomatoकैसे लें टमाटर की अधिक पैदावार

टमाटर के पौधों की रोपाई समय पर की जानी चाहिए, वरना पैदावार पर बुरा असर होता है. अच्छी किस्म के बीजों की बोआई समय पर करें. साथ ही, पौधों को लाइनों में उचित दूरी पर लगाना चाहिए. रोपाईर् सुबह या शाम के समय करनी चाहिए. पौध रोपण के साथ हलकी सिंचाई करनी चाहिए, ताकि पौधों की भलीभांति जमीन में पकड़ बन जाए.

टमाटर के प्रमुख तनों पर कल्ले निकल आने पर उन्हें ऊपर से हटा दें. ऐसा करने से पौधों में अच्छा फुटाव होता है और अनेक नई शाखाएं बनती हैं जिन पर अधिक फल लगेंगे.

टमाटर की फसल में अनेक खरपतवार उग आते हैं, उन की रोकथाम जरूरी है अन्यथा पौधों की बढ़वार रोक कर खुद खेत में हावी हो जाते हैं और खेत की जमीन से नमी, पोषक तत्त्वों की कमी हो जाती है. कीट और रोगों की रोकथाम के लिए निराईगुड़ाई जरूर करनी चाहिए. निराईगुड़ाई करने से खरपतवारों की रोकथाम तो होती ही है, साथ ही, जमीन में हवा का आनाजाना बना रहता है जो पौधों व जड़ों का विकास करते हैं.

सही समय पर सिंचाई करनी चाहिए. यदि बारिश के मौसम में टमाटर के खेत में अधिक पानी जमा हो जाए तो उसे निकालना चाहिए, वरना फसल पीली पड़ कर मर जाएगी.

टमाटर की फसल में अनेक प्रकार के कीट व बीमारी का प्रकोप भी होता है. इस के लिए जैविक तरीकों से रोकथाम करें. अगर फिर भी बात नहीं बन रही है तो विशेषज्ञ को पीडि़त फसल दिखा कर उचित मात्रा में उचित रसायन का प्रयोग करें.

कम खर्च में तैयार होती नाडेप खाद

आज देश के अनेक किसान खेती में जैविक तरीके अपना रहे हैं. जैविक खाद बनाने के अनेक तरीके हैं, जिन्हें हमारे देश में अपनाया जाता है.

इन सब तरीकों में जैविक खाद बनाने की नाडेप विधि भी खास है. जैविक कंपोस्ट बनाने की इस नापेड विधि को महाराष्ट्र के किसान नारायण देवराव पंढरी ने विकसित किया.

उन्हीं के नाम पर इस कंपोस्ट का नाम नाडेप रखा गया.

नाडेप कंपोस्ट की खूबी है कि इसे बनाने के लिए कम गोबर का इस्तेमाल होता है. शेष खेती का कूड़ाकरकट, कचरा, पत्ते व मिट्टी पशुमूत्र आदि ही इसे बनाने के काम में लाया जाता है.

यह खाद 90 से 120 दिन में तैयार हो जाती है. इस कंपोस्ट में जैविक रूप से नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश के अलावा अनेक सूक्ष्म पोषक तत्त्व पाए जाते हैं जो हमारी खेती में अच्छी पैदावार के लिए बहुत उपजाऊ होते हैं.

नाडेप कंपोस्ट बनाने के लिए औसतन 12 फुट लंबाई, 5 फुट चौड़ाई और 3 फुट गहराई का टांका यानी ईंटों से बनाया गया चारदीवारी वाला टैंक, जिस में जगहजगह हवा के आनेजाने के लिए छेद छोडे़ जाते हैं, बनाया जाता है. इस में लगभग 3 से 4 माह की अवधि में उम्दा किस्म का कंपोस्ट तैयार हो जाता है.

नाडेप बनाने के लिए सामान

खेती का बचाखुचा कचरा, जिस में पत्तियां, घासफूस, फसल अवशेष, सागसब्जियों के छिलके वगैरह लगभग 1,500 किलोग्राम, पशु का गोबर लगभग 300-400 किलोग्राम, छनी हुई खेत की मिट्टी लगभग 10-12 टोकरे, इस के अलावा पशु का मूत्र 2-3 बालटी और जरूरत के मुताबिक पानी. अगर खेती के अवशेष गीले और हरे हैं तो कम पानी की जरूरत होगी. सूखे अवशेष होने पर लगभग 400 से 500 लिटर पानी चाहिए.

नाडेप कंपोस्ट बनाने का तरीका

किसी छायादार जगह का चुनाव करें और उस जगह को एकसार कर के  इस के ऊपर ईंटों से तय आकार का एक आयताकार व हवादार ढांचा बनाएं. इस से खाद जल्दी पकेगी, क्योंकि जीवाणुओं को हवा से औक्सीजन भरपूर मात्रा में मिल जाती है और कई प्रकार की बेकार गैसें बाहर निकल जाती हैं.

आयताकार ढांचे के अंदरबाहर की दीवारों को गोबर से लीप कर सुखा लें. इस के बाद टांके के अंदर सतह पर सब से पहले पहली तह 6 इंच तक हरे व सूखे पदार्थों जैसे घास, पत्ती, छिलकों, डंठल, खरपतवार वगैरह की बिछाएं. अगर नीम पत्तियां उपलब्ध हों तो इस में मिलाना फायदेमंद रहता है. नीम का इस्तेमाल अनेक जैविक कीटनाशकों में होता है.

दूसरी तह में 4-5 किलोग्राम गोबर को 100 लिटर पानी व 5 लिटर गौमूत्र में घोल बना कर पहली परत के ऊपर इस तरह छिड़कें कि पूरे घासपत्ते वगैरह भीग जाएं. इस के बाद गोबर की एक इंच की परत लगाएं.

तीसरी परत 1 इंच ऊंचाई की सूखी छनी हुई मिट्टी की लगाएं, फिर उस मिट्टी को पानी छिड़क कर अच्छी तरह गीला कर दें.

इस प्रकार क्रम को दोहराते हुए आयताकार ढांचे को उस की ऊंचाई से 1-2 फुट ऊपर तक झोपड़ीनुमा आकार की तरह भर दें. तकरीबन 7-8 परतों में यह भर जाता है. अब इसे मिट्टी व गोबर की पतली 2 इंच की तह से लीप दें.

7 से 15 दिनों में आयताकार ढांचे में डाली हुई सामग्री ठसक कर 1-1.5 फुट तक नीचे आ जाती है. तब पहली भराई के क्रम की तरह ही फिर से इसे इस की ऊंचाई से डेढ़ फुट तक भर कर गोबर व मिट्टी के घोल से लीप दें.

100-120 दिनों में हवा के छिद्रों में देखने पर अगर खाद का रंग गहरा भूरा हो जाता है तो नाडेप खाद तैयार है. इसे मोटे छेद वाली छलनी से छान कर उपयोग में लाया जा सकता है.

लाभ : इस तरीके में कम गोबर से अच्छी जीवाणुयुक्त, पोषक तत्त्वों से भरपूर खाद बनाई जा सकती है.

कम खर्च में ही उत्तम नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश व दूसरे पोषक तत्त्वों से भरपूर खाद बड़ी मात्रा में तैयार हो सकती है.

जगहजगह पर बिखरा हुआ कूड़ाकचरा व खरपतवार को एक जगह इकट्ठा कर के खाद में बदला जा सकता है इस से प्रदूषण भी नहीं होता है.

नाडेप खाद बनाने का यह सब से सरल तरीका है, जिसे किसान थोडे़ समय में ही अपना कर लाभ कमा सकते हैं

इस प्रकार की खाद जमीन में जीवों की तादाद में बढ़वार कर के कार्बन की मात्रा को बढ़ाती है.

इस प्रकार की खाद को ईंटों की जगह पर लकडि़यों से भी तैयार कर सकते हैं.

इस से किसान रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक दवाओं के जाल से बाहर निकल सकता है.

उपरोक्त बताया गया तरीका पक्का नाडेप तरीका है. ढांचा बनाने के लिए ईंटों का इस्तेमाल होता है. कम खर्च में यह काम लकडि़यों द्वारा भी किया जा सकता है.

लकड़ी से बनाया जाने वाला नाडेप

यह नाडेप जमीन पर बनाए गए पक्के नाडेप की तरह ही बनाते हैं, किंतु इस में पक्की ईंटों की जगह बांस या लकड़ी का प्रयोग किया जाता है. लकड़ी से इस को बनाते समय हवा के लिए स्थान इस में अपनेआप ही रहता है, फिर इस में पक्के नाडेप की तरह घासफूस से भराई करते हैं. खाद का पूरा निर्माण काम व इस को निकालने वगैरह का काम पक्के नाडेप की तरह ही होता है. यह नाडेप से बहुत ही सस्ता बनता है.

सावधानियां

* नाडेप खाद के लिए ढांचे को छायादार जगह पर बनाएं.

* ढांचा बनाते समय छेद जरूर रखें, क्योंकि सूक्ष्म जीवाणुओं के लिए हवा का आनाजाना जरूरी होता है और कार्बन डाई औक्साइड व दूसरी गैसों के निकलने के लिए रास्ता चाहिए.

* नमी का खास खयाल रखें. पानी का छिड़काव समयसमय पर करते रहें.

* आयताकार ढांचे के ऊपरी भाग में दरारें आने पर समयसमय पर मिट्टी या गोबर से लिपाई कर दें.

* तैयार कंपोस्ट का भंडारण छायादार जगह पर बोरियों में करें. नमी के लिए बीच में कभीकभार हलके पानी का छिड़काव कर सकते हैं.

केले के पौधों से रेशा उत्पादन

इनसानी जाति के लिए ग्लोबल वार्मिंग एक बड़ा खतरा है. ग्लोबल वार्मिंग के असर को रोकने के लिए इस के प्रभाव को बदलने की जरूरत है. यह बदलाव लाने के लिए सब से अच्छा तरीका कृषि अपशिष्ट के लिए नएनए तरीकों का इस्तेमाल करना या उन्हें ढूंढ़ना है.

भारत में कटाई के बाद हर साल कचरे के रूप में तकरीबन 5 लाख टन केले के तने को बरबाद कर दिया जाता है, जबकि आधुनिक तकनीक से आसानी से केले के तनेसे फाइबर निकाल सकते हैं. इस का कपड़ा, कागज और उद्योगों में बडे़ पैमाने पर उपयोग हो सकता है. सिंथैटिक फाइबर के लिए केला फाइबर एक बहुत अच्छा प्रतिस्थापन है.

तने से फाइबर निकालना

केला फाइबर पौधे के छद्म स्टैम शीथ से निकाला जाता है. केला फाइबर निकालने के लिए मुख्य रूप से 3 तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है : मैनुअल, रासायनिक और मेकैनिकल अर्थात मशीन द्वारा.

मशीन द्वारा पर्यावरण अनुकूल तरीके से अच्छी गुणवत्ता और मात्रा दोनों के फाइबर को प्राप्त करने का सब से अच्छा तरीका है.

इस प्रक्रिया में छद्म स्टैम शीथ को एक रास्पडोर मशीन में डालने से फाइबर निकाला जाता है. रास्पडोर मशीन शीथ में मौजूद फाइबर बंडल से गैररेशेदार ऊतकों और सुसंगत

सामग्री (जिसे सौक्टर के रूप में जाना जाता है) हटा देता है और आउटपुट के रूप में फाइबर देता है.

मशीन से निकालने के बाद फाइबर एक दिन के लिए छाया में सुखाया जाता है और एचडीपीई बैग में पैक किया जाता है. फिर इसे नमी और रोशनी से दूर रखा जाता है, ताकि इसे तब तक अच्छी हालत में रखा जा सके, जब तक इस का इस्तेमाल नहीं किया जाता है.

केला फाइबर का उपयोग

ऐसे प्रयोजनों के लिए केले फाइबर का उपयोग किया जाता है :

* मुद्राएं, बौंड पेपर और विशेषता पत्र बनाने के लिए, जो 100 सालों तक चल सकते हैं.

* कागज उद्योग में लकड़ी कीलुगदी के लिए बहुत अच्छे प्रतिस्थापन के रूप में, क्योंकि इस में उच्च सैलूलोज सामग्री है. इस प्रकार वनों की कटाई के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करता है.

* फाइबर ग्लास के प्रतिस्थापन के रूप में समग्र सामग्री बनाने में.

* फर्नीचर उद्योग में गद्दे, तकिए और कुशन बनाने के लिए.

* बैग, पर्स, मोबाइल फोन कवर, दरवाजे मैट, परदे और योग मैट वगैरह बनाने के लिए बड़े पैमाने पर हस्तशिल्प में.

* वस्त्रों के बनाने में.

तने से रेशा ऐसे बनाएं

केला स्टैम से बाहरी म्यान को पहले छील दिया जाता है, जिस से अंदर कीपरतें चपटी हो जाती हैं और फाइबर मैन्युअल रूप से या मशीनों के माध्यम से अलग हो जाता है. केले की उपज के ढेर से प्रसंस्करण इकाई के पास ढेर लग जाते हैं और मजदूर केले की उपजाऊ पतली तारों को इकट्ठा कर लेते हैं.

इस कटे हुए स्टैम टुकड़ों को मशीन के माध्यम से निश्चित मंच पर पारित किया जाता  है जो ताप बढ़ने पर लिग्निन और पानी की सामग्री को अलग करती है. कटा हुआ फाइबर सूखे में साफ किया जाता है और सूरज की रोशनी में सूख जाता है, जो नोट पैड, स्टेशनरी सामान, दीपक और हस्तशिल्प बनाता है.

ईको ग्रीन यूनिट ने जरमन तकनीक का इस्तेमाल कर के इस मशीनरी को तैयार किया है, जो इसे शक्ति देने के लिए 1 एचपी एकल चरण मोटर का उपयोग करता है. मशीनों को आसानी से अर्द्धकुशल महिलाओं द्वारा संचालित किया जा सकता है. यह प्रक्रिया कम रखरखाव और संचालित करने के लिए सुरक्षित है और उन की गुणवत्ता और पानी की मात्रा के आधार पर 1 किलोग्राम फाइबर निकालने के लिए तकरीबन 5-6 उपभेदों की जरूरत होती है.

रेशे का उत्पादन

केला उत्पादन के मामले में भारत दुनिया का नेतृत्व करता है, जो 13.9 मिलियन मीट्रिक टन (साल 2012) की विश्वव्यापी फसल का तकरीबन 18 फीसदी उत्पादन करता है. महाराष्ट्र और तमिलनाडु अग्रणी केला उत्पादक राज्य हैं. हालांकि तकरीबन 5,00,000 हेक्टेयर क्षेत्र केले की खेती के तहत हैं. केले के स्टैम का केवल 10 फीसदी ही फाइबर में संसाधित होता है.

अगर किसान इन फाइबर प्रसंस्करण इकाइयों को केले की उपज की आपूर्ति करने का फैसला करते हैं, तो वे बिना किसी लागत के कचरे को साफकरेंगे, बल्कि उन की कमाई से भी फायदा होगा. वे 1,10,000 रुपए की लागत से किसान छोटीछोटी इकाई लगा सकते हैं, जो अर्द्धकुशल मजदूरों को रोजगार देगा.

महाराष्ट्र में खेती की जाने वाली केला उपज की गुणवत्ता फाइबर निकालने के लिए आदर्श पाई गई है. तमिलनाडु और गुजरात के तंतुओं की तुलना में वे बेहतर क्वालिटी वाले हैं और ज्यादा चमकते हैं.

Banana fiberफाइबर की विशेषताएं

*           केला फाइबर की अपनी भौतिक और रासायनिक विशेषताओं और कई अन्य गुण हैं, जो इसे एक अच्छा गुणवत्ता वाला फाइबर बनाते हैं.

*           केला फाइबर की उपस्थिति बांस फाइबर और रैमी फाइबर के समान है, लेकिन इस की सुंदरता और स्पिनिबिलिटी दोनों की तुलना में बेहतर है.

*           केला फाइबर की रासायनिक संरचना सैलूलोज, हैमिसैलूलोज और लिग्निन है.

*           यह अत्यधिक मजबूत फाइबर है.

*           इस की लंबाई छोटी होती है.

*           मशीन द्वारा निकालने और कताई प्रक्रिया के आधार पर इस में कुछ चमक होती है.

*           इस का वजन दूसरे फाइबर से हलका होता है.

*           केला फाइबर में मजबूत नमी अवशोषण क्वालिटी है. यह अवशोषण के साथ ही नमी बहुत तेजी से जारी करता है.

*           यह जैव गिरावट योग्य है और इस का पर्यावरण पर कोई बुरा असर नहीं पड़ता है. इस प्रकार पर्यावरण अनुकूल फाइबर के रूप में बांटा जा सकता है.

*           बास्ट फाइबर कताई और दूसरों के बीच अर्द्धबुरी कताई सहित यह कताई के तकरीबन सभी तरीकों से इस्तेमाल में लाया जा सकता है.

नकदी फसल है गन्ना

की वर्ड : फार्म एन फूड आर्टिकल, गन्ना नकदी  का प्रमुख स्रोत है, क्योंकि दुनियाभर में 80 फीसदी चीनी गन्ने से ही बनती है. गन्ना उत्पादन में दुनियाभर में भारत का दूसरा स्थान है.

यदि पूरे देश में गन्ने की खेती में उत्तर भारत की हिस्सेदारी देखी जाए, तो यह कुल क्षेत्रफल का 55 फीसदी है. उत्तर प्रदेश की बात की जाए, तो वहां 40 से 45 दिनों में गन्ने की खेती होती है. तकरीबन 40,00,000 किसान सीधेतौर पर गन्ने की खेती से जुड़े हुए हैं.

गन्ने के साथ लें अंत:फसल

शरदकालीन में फसली खेती के लिए गेहूं, मटर, आलू, लाही, राई, प्याज, मसूर, धनिया, लहसुन, मूली, गोभी, शलजम, चुकंदर की खेती आज भी की जा सकती है. अब स्थिति ऐसी आ गई है कि नई किस्मों से उपज दक्षिण भारत की तरह और चीनी की रिकवरी महाराष्ट्र की तरह हो रही है.

किसानों को बेहतर ट्रेनिंग देने के साथसाथ बेहतर किस्म के बीज के उपयोग से गन्ने की पैदावार में बढ़ोतरी नहीं होती. इस के लिए कुछ और बातों का भी ध्यान रखना पड़ता है, जैसे उस की बोआई कैसे की जाए, पौधों से पौधों की दूरी कितनी होनी चाहिए, खादपानी, निराईगुड़ाई, खरपतवार नियंत्रण, गन्ने की बधाई वगैरह की जानकारी होना भी बेहद जरूरी है. इस के लिए जिला एवं कृषि विज्ञान केंद्रों के कृषि वैज्ञानिकों की मदद से किसानों को ट्रेनिंग दी जाती है.

किसानों को ट्रेनिंग देने के साथसाथ उन की देखरेख में कृषि विश्वविद्यालय भी काम कर रहा है.

गन्ने के साथ सहफसल खेती के लिए कम समय में पकने वाली फसलों को चुना जाना चाहिए, जो इलाके की जलवायु, मिट्टी की उपजाऊ कूवत और स्थानीय मौसम भी अनुकूल हो, जिन में बढ़वार प्रतिस्पर्धा न हो और जिस की छाया से गन्न्ना फसल पर उलटा असर न पड़े.

बसंतकालीन गन्ने की खेती के साथ सहफसल खेती करनी है, तो उस के साथ उड़द, मूंग, भिंडी, लोबिया व हरी खाद वाली फसलों को लिया जा सकता है.

नर्सरी में तैयार गन्ने से बढ़ेगी कमाई

गन्ने की एक आंख की गोटी काट लें. गन्ना बीज को शोधित करने के लिए थायो सीनेट मिथाइल अथवा विश टीन की निर्धारित मात्रा के घोल में गन्ने के इन टुकड़ों को बरतनों में डुबो दिया जाता है. आधे घंटे तक डुबोने के बाद इन गन्ने के टुकड़ों को बाहर निकाल लिया जाता है. 18 से 20 वर्गमीटर समतल जमीन पर उर्वरक की बोरियां या प्लास्टिक शीट बिछा कर गोबर की सड़ी खाद एक से डेढ़ सैंटीमीटर मोटी बिछा दें. इस मिट्टी के ऊपर गन्ने के टुकड़ों को सीधी कतार में रख कर कम मात्रा में मिट्टी उन के ऊपर डाल दें.

जरूरत पड़ने पर पानी का छिड़काव कर दें. 20 से 30 दिन में पौधे निकलने शुरू हो जाएंगे. इन पौधों को सीधे खेत में लगाया जा सकेगा. इस से खेत में पौधों की तादाद समान रूप से होगी, जिस से उत्पादन भी अच्छा मिलेगा.

दक्षिण भारत के किसान गन्ने की प्रति हेक्टेयर 80 से 85 टन पैदावार करते हैं, जबकि उत्तर भारत के किसानों की प्रति हेक्टेयर औसत पैदावार महज 70 टन ही होती है. यही नहीं, गन्ने से चीनी की रिकवरी में उत्तर भारत के किसान महाराष्ट्र के किसानों से पिछड़ जाते हैं. महाराष्ट्र में उपज करने की चीनी की रिकवरी जहां  12 से 13 फीसदी है, वहीं उत्तर भारत में काफी कम थी, लेकिन प्रजाति 238 आने के बाद यहां की रिकवरी भी तकरीबन 13 फीसदी के करीब पहुंच गई है. इस प्रजाति ने किसानों के बीच गन्ने की खेती को और अधिक करने की ओर आकर्षित किया है.

लेकिन अब उत्तर भारत के किसानों के हालात में सुधार आने वाला है, क्योंकि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने ऐसे उन्नत बीजों का विकास किया है, जो न केवल भरपूर फसल देने में सक्षम है, बल्कि इस से चीनी की रिकवरी भी पहले की तुलना में ज्यादा हो सकेगी.

इन बीजों की उपलब्धता सभी किसानों को मुहैया कराने व खेती की तकनीकी और तरीकों से किसानों को अवगत कराने के लिए कृषि विश्वविद्यालय के टिशू कल्चर लैब के वैज्ञानिकों द्वारा किसानों को ट्रेंड किया जा रहा है.

डाक्टर आरएस सेंगर की अगुआई में उत्तर भारत के लिए विशेष रूप से विकसित कुछ किस्मों में सुधार का काम लगातार चल रहा है. सालों के अनुसंधान के बाद ऐसी किस्में तैयार की गई हैं, जिस से न केवल बेहतर उत्पादन मिल सकेगा, बल्कि इस में चीनी की रिकवरी भी काफी अच्छी हो सकेगी.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रजाति 238 से अधिक पैदावार लेने के लिए सब से पहले नर्सरी तैयार की जा रही है.

गन्ने की खेती में ध्यान रखने योग्य बातें

* जहां पानी रुकता हो, वहां पानी के निकलने का पुख्ता इंतजाम होना चाहिए.

* खाली जगहोंमें पहले से अंकुरित गन्ने के पेड़ों से गैस फिलिंग करनी चाहिए.

* अंत:फसल काटने के बाद जल्दी ही गन्ने में सिंचाई व नाइट्रोजन की टौप ड्रैसिंग कर के गुड़ाई कर देनी चाहिए.

* अंत:फसल के लिए अलग से संस्तुत की गई मात्रा के मुताबिक उर्वरकों को दिया जाना चाहिए.

किसान बदलाव को गले लगाएं, टैक्नोलौजी अपनाएं

जोधपुर/भोपाल/नई दिल्ली : 6 अक्तूबर, 2023. उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के अंतर्गत आने वाले केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी), जोधपुर में किसानों व वैज्ञानिकों से संवाद किया. केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर कार्यक्रम से वर्चुअल जुड़े, वहीं उपराष्ट्रपति की पत्नी डा. सुदेश धनखड़, केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत, कृषि राज्य मंत्री कैलाश चौधरी व सांसद राजेंद्र गेहलोत विशेष रूप से उपस्थित थे.

इस अवसर पर उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कहा कि किसानों के बिना देश में बदलाव संभव नहीं है. वे अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, बदलाव किसानों को लाना है और उस के अनुरूप बदलना भी है.

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कहा कि कृषि उत्पाद आज सब से बड़ा व्यापार है. उन्होंने आह्वान किया कि युवाओं को कृषि व्यापार में लगाया जाए, जो किसानों का एरिया है, लेकिन इस पर उन का ध्यान केंद्रित नहीं हुआ. आज कई उच्च शिक्षित युवा उन कृषि उत्पादों का व्यापार कर रहे हैं, जो किसानों की कड़ी मेहनत से उपजते हैं. किसानों द्वारा कृषि उत्पादों के व्यापार को अपने दायरे में लेने पर बहुत बड़ा बदलाव आएगा.

उन्होंने आगे यह भी कहा कि किसान परिवारों के लिए जरूरी है, वह है एक आर्थिक कारिडोर- भारत, मिडिल र्ईस्ट और यूरोप. हजारों साल पहले यह कारिडोर था, जिस की दोबारा शुरुआत हो रही है. किसान बदलाव को गले लगाएं, टैक्नोलौजी अपनाएं. किसान अपने उत्पादों को सीधे न दे कर उस में कुछ न कुछ वैल्यू एडिशन करें, तो इस से क्रांतिकारी बदलाव आएगा. यह आसान है, संभव भी है, क्योंकि सरकार की नीतियां सकारात्मक हैं व दूरगामी परिणाम देने वाली हैं. इस से किसानों की आर्थिक स्थिति काफी बेहतर होगी. निर्यात के लिए भी किसानों के बेटेबेटियां आगे आएं, क्योंकि वे ही इसे पैदा करते हैं. दूर की सोच कर अपनी भागीदारी निभाएं. कृषि के साथ कृषि व्यापार एवं कृषि निर्यात भी किसानों द्वारा करने से बड़ा अवसर कोई हो नहीं सकता.

किसानों की कड़ी मेहनत के कारण आज शुष्क क्षेत्र में भी अनार, खजूर, अंजीर, जीरा जैसे उत्पाद उगाए जा रहे हैं, जिस का और ज्यादा फायदा किसानों को स्वयं व्यापार व निर्यात करने से मिलेगा.

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उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने अपने स्तर पर किसानों के लिए हर सकारात्मक सहयोग का भरोसा दिलाया. उन्होंने कहा कि वर्ष 2047 तक देश को विकसित बनाने में हमारे किसानों का बहुत बड़ा योगदान होगा.

कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि कृषि क्षेत्र हमारे देश के लिए आज बहुत महत्वपूर्ण है. यह कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी कि जैसे जल ही जीवन है, वैसे कृषि ही जीवन है.

उन्होंने आगे कहा कि काजरी संस्थान के कार्यों को देख कर गौरव का अनुभव होता है, जहां के वैज्ञानिकों ने इस पूरे रेतीले इलाके में कृषि क्षेत्र में खास काम किया है, वहीं आईसीएआर के वैज्ञानिकों ने खाद्यान्न, बागबानी, पशुपालन व मत्स्यपालन की दृष्टि से जो बेहतर काम किया है, उस के कारण हमारा देश आज अग्रणी अवस्था में खड़ा हुआ है.

कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि आज हमारे सामने चुनौतियां भी हैं कि खेती में लागत कैसे कम करें, इस के लिए टैक्नोलौजी का उपयोग करें एवं स्वाइल हेल्थ कार्ड का उपयोग किसानों की आदत में आएं. सामूहिक रूप से पोषक तत्व, कीट प्रबंधन आदि से खेती की लागत कम होगी एवं फसलों की गुणवत्ता भी बढ़ेगी.

कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने बताया कि जैविक व प्राकृतिक खेती वर्तमान समय की आवश्यकता बनती जा रही है, जिसे बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार ने अनेक उपाय किए हैं, योजनाएं बनाई हैं, जिन्हें हमारे किसानों को अपनाना चाहिए और इस खेती को प्रोत्साहित करना चाहिए.

उन्होंने आगे यह भी कहा कि राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में मिलेट्स (श्री अन्न) की खेती हो रही है. श्री अन्न का उपयोग बढ़े, इस के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूरी दुनिया को एक सूत्र में पिरोया है, जैसेजैसे इस का उपभोग बढ़ेगा, तो मांग वृद्धि के साथ छोटे किसानों की उपयोगिता व इन की आय भी बढ़ेगी. इस दिशा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आह्वान असरकारक हो रहा है, पूरी दूनिया के देश मिलेट्स मांग रहे हैं, जिस के लिए हिंदुस्तान के किसानों को उत्पादन भी बढ़ाना पड़ेगा, उन्हें इस दिशा में प्रवृत्त होना पड़ेगा.

कार्यक्रम में केंद्रीय जल शक्ति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत व कृषि राज्य मंत्री कैलाश चौधरी ने भी संबोधित किया. काजरी के निदेशक डा. ओपी यादव ने संस्थान की गतिविधियों एवं उपलब्धियों के बारे में जानकारी देते हुए स्वागत भाषण दिया. कार्यक्रम में कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान (अटारी), जोधपुर के निदेशक डा. जेएस मिश्रा, जनप्रतिनिधि और क्षेत्र के किसान, वैज्ञानिक व अधिकारी उपस्थित थे

सरसों की समय पर बोआई करें किसान

रबी की फसलों में सरसों का महत्वपूर्ण स्थान है. देश के कई राज्य जैसे राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश में मुख्यता से की जाती है, लेकिन राजस्थान में प्रमुख रूप से भरतपुर, सवाई माधोपुर, अलवर, करौली, कोटा, जयपुर, धौलपुर आदि जिलों में सरसों की खेती की जाती है.

सरसों के बीज में तेल की मात्रा 30 से 48 फीसदी तक पाई जाती है.

जलवायु

सरसों की खेती शरद ऋतु में की जाती है. अच्छे उत्पादन के लिए 15 से 25 सैल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है.

मिट्टी

वैसे तो इस की खेती सभी मिट्टियों में की जा सकती है, लेकिन बलुई दोमट मिट्टी सर्वाधिक उपयुक्त होती है. यह फसल हलकी क्षारीयता को सहन कर सकती है. लेकिन मृदा अम्लीय नहीं होनी चाहिए.

सरसों की उन्नत किस्में

किसानों को हर साल बीज खरीदने की जरूरत नहीं है, क्योंकि बीज काफी महंगे आते हैं, इसलिए जो बीज किसानों ने पिछले साल बोया था, यदि उस का उत्पादन या आप के किसी किसान साथी का उत्पादन बेहतरीन रहा हो, तो आप उस बीज की सफाई और ग्रेडिंग कर के उस में से रोगमुक्त ओर मोटे दानों को अलग करें और उस को बीजोपचार कर के बोएं, तो भी अच्छे परिणाम प्राप्त होंगे, लेकिन जिन किसानों के पास ऐसा बीज नहीं है, वो निम्न किस्मों का बीज बो सकते हैं. जैसे :

राधिका : यह किस्म डीआरएमआर, भरतपुर द्वारा विकसित की गई है. वैज्ञानिकों का कहना कि इस का उत्पादन सभी जगह अच्छा मिला है.

1. आरएच-30 : सिंचित व असिंचित दोनों ही स्थितियों में गेहूं, चना एवं जौ के साथ खेती के लिए उपयुक्त है.

2. टी.- 59 (वरुणा) : इस की उपज असिंचित 15 से 18 दिन प्रति हेक्टेयर होती है. इस में तेल की मात्रा 36 फीसदी होती है.

3. पूसा बोल्ड आशीर्वाद (आरके 01से 03) : यह किस्म देरी से बोआई के लिए (25 अक्तूबर से 15 नवंबर तक) उपयुक्त पाई गई है.

4. अरावली (आरएन 393) : सफेद रोली के लिए मध्यम प्रतिरोधी है.

5. एनआरसी एचबी 101 : सेवर, भरतपुर से यह विकसित उन्नत किस्म है. इस का उत्पादन बहुत शानदार रहा है. सिंचित क्षेत्र के लिए बेहद उपयोगी किस्म है. 20-22 क्विंटल उत्पादन प्रति हेक्टेयर तक दर्ज किया गया है.

7. एनआरसी डीआर 2 : इस का उत्पादन अपेक्षाकृत अच्छा है. इस का उत्पादन 22 – 26 क्विंटल तक दर्ज किया गया है.

8. आरएच – 749 : इस का उत्पादन 24-26 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक दर्ज किया गया है.

9. आरएच 1975 : चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय ने सरसों की एक और उन्नत किस्म, जो सिंचित क्षेत्रों में समय पर बिजाई के लिए एक उत्तम है, जो कि मौजूदा किस्म आरएच 749 से लगभग 12 फीसदी अधिक पैदावार देगी.

आरएच 10 : यह वर्ष 2018 में विकसित की गई सरसों की किस्म आरएच 725 आज के दिन किसानों के बीच सब से अधिक प्रचलित व लोकप्रिय बन चुकी है, जो कि हरियाणा के अलावा उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश में लगभग 20 से 25 फीसदी क्षेत्रों में अकेली उगाई जाने वाली किस्म है. यह किस्म औसतन 10-12 क्विंटल प्रति एकड़ पैदावार आराम से दे रही है व इस की उत्पादन क्षमता भी 14-15 क्विंटल प्रति एकड़ तक है.

खेत की तैयारी

सरसों के लिए भुरभुरी मिट्टी की जरूरत होती है. इसलिए खरीफ की कटाई के बाद एक गहरी जुताई प्लाऊ से करनी चाहिए और इस के बाद 3-4 बार देशी हल से जुताई करना लाभप्रद होता है. नमी संरक्षण के लिए पाटा लगाना चाहिए.

खेत में दीमक, चितकबरा एवं अन्य कीटों का प्रकोप अधिक हो, तो नियंत्रण के लिए आखिरी जुताई के समय क्विनालफास 1.5 फीसदी चूर्ण 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से अंतिम जुताई के साथ खेत मे मिलना चाहिए. साथ ही, उत्पादन बढ़ाने के लिए 2 से 3 किलोग्राम एजोटो बेक्टर एवं पीएसबी कल्चर की 50 किलोग्राम सड़ी हुई गोबर की खाद या वर्मी कल्चर में मिला कर अंतिम जुताई से पूर्व मिला दें.

सरसों की बोआई का उचित समय

सरसों की बोआई के लिए उपयुक्त तापमान 25 से 26 डिगरी सैल्सियस तक रहता है. बारानी क्षेत्रों में सरसों की बोआई 05 अक्तूबर से 25 अक्तूबर तक कर देनी चाहिए.

सरसों की बोआई कतारों में करनी चाहिए. कतार से कतार की दूरी 45 सैंटीमीटर और पौधों से पौधे की दूरी 20 सैंटीमीटर रखनी चाहिए. इस के लिए सीडड्रिल मशीन का उपयोग करना चाहिए,

सिंचित क्षैत्र में बीज की गहराई 5 सैंटीमीटर तक रखी जाती है.

बीज की दर

बोआई के लिए शुष्‍क क्षैत्र में 4 से 5 किलोग्राम और सिंचित क्षेत्र में 3- 4 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त रहता है.

बीजोपचार

1. जड़ सड़न रोग से बचाव के लिए बीज को बोआई के पूर्व फफूंदनाशक बाबस्टीन वीटावैक्स, कैप्टान, थिरम, प्रोवेक्स में से कोई एक 3 से 5 ग्राम दवा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें.

2. कीटो से बचाव के लिए इमिडाक्लोप्रिड 70 डब्लूपी, 10 मिलीलिटर प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें.

3. कीटनाशक उपचार के बाद मे एजेटोबैक्टर और फास्फोरस घोलक जीवाणु खाद दोनों की 5 ग्राम मात्रा से प्रति किलोग्राम बीजों को उपचारित कर के बोएं.

खाद व उर्वरक प्रबंधन

सिंचित फसल के लिए 7 से 12 टन सड़ी गोबर, 175 किलोग्राम यूरिया, 250 सिंगल सुपर फास्फेट, 50 किलो म्यूरेट औफ पोटाश और 200 किलोग्राम जिप्सम बोने से पूर्व खेत में मिलानी है, यूरिया की आधी मात्रा बोते समय और बाकी बची आधी मात्रा पहली सिंचाई के बाद खेत में छिटकनी चाहिए.

असिंचित क्षेत्र में वर्षा से पूर्व 4 से 5 टन सड़ी गोबर खाद, 87 किलोग्राम यूरिया, 125 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट, 33 किलोग्राम म्यूरेट औफ पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से बोते समय खेत में डाल देवें.

सिंचाई : प्रथम सिंचाई बोने के 35 से 40 दिन बाद एवं द्वितीय सिंचाई दाने बनने की अवस्था में करें.

खरपतवार नियंत्रण

सरसों के साथ अनेक प्रकार के खरपतवार उग आते हैं, इन के नियंत्रण के लिए निराईगुड़ाई और बोआई के तीसरे सप्ताह के बाद से नियमित अंतराल पर 2 से 3 निराई करनी आवश्यक होती हैं.

रासायनिक नियंत्रण के लिए अंकुरण से पूर्व बोआई के तुरंत बाद खरपतवारनाशी पेंडीमेथालीन 30 ईसी रसायन की 3.3 लिटर मात्रा को प्रति हेक्टेयर की दर से 800 से 1,000 लिटर पानी में घोल कर छिडकाव करना चाहिए.

उत्पादन : यदि जलवायु अच्छी हो, फसल रोगकीट व खरपतवारमुक्त रहे और पूरी तरह से वैज्ञानिक दिशानिर्देशों के साथ खेती करें, तो 25-30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन लिया जा सकता है.

अधिक जानकारी के लिए नजदीकी कृषि विभाग में संपर्क करें

औषधीय गुणों से भरपूर दुर्लभ पौध पनियाला

देश में ऐसे तमाम फलफूल और पौध हैं, जो अपने औषधीय गुणों और लजीज स्वाद के लिए जाने जाते हैं. लेकिन इन में से कुछ ऐसे पौधे भी हैं, जो क्षेत्र विशेष में उगने या पाए जाने के चलते आज विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गए हैं. इन्हीं में एक विलुप्त होने के कगार पर पहुंच चुके फलदार औषधीय पौध पनियाला के फल का स्वाद लोगों की जबान पर चढ़ कर बोलता है.

पूर्वी उत्तर प्रदेश के गोरखपुर क्षेत्र में पाया जाने वाला पनियाला का फल अपनी विशेषता और स्वाद के चलते खूब जाना जाता है. कभी यह गोरखपुर, महराजगंज और कुशीनगर के जंगलों के अलावा सिद्धार्थनगर, बस्ती और संतकबीर नगर जिलों में बहुतायत में पाया जाता था. लेकिन बीते दशकों में पौधों की कटाई ने इसे विलुप्त होने के स्थिति में ला कर खड़ा कर दिया है.

बचाने की शुरू हुई पहल

जामुन की तरह दिखने वाले और खट्टेमीठे स्वाद वाले पूर्वी उत्तर प्रदेश में कभी इस फल के कई बगीचे हुआ करते थे, लेकिन समय के साथ बढ़ी आबादी ने अपने रहने के लिए घर बनवाने के चक्कर में पनियाला के पेड़ को काट दिया और वहां अपना घर बना लिया.

ऐसे में इस की पौधे अब केवल गोरखपुर क्षेत्र के जंगली इलाके में ही सिमट कर रह गए हैं. दुर्लभ पौध को बचाने के लिए योगी सरकार ने खास पहल करते हुए इस के जीआई टैगिंग यानी जियोग्राफिकल इंडिकेशन कराने का काम किया है. इस से इस पौधे और इस के फल को विशेष पहचान और दर्जा मिलने से एक एग्रोक्लाईमेट जोन वाले गोरखपुर सहित महराजगंज, देवरिया, कुशीनगर, सिद्धार्थनगर, बस्ती, संतकबीर नगर, बहराइच, गोंडा और श्रावस्ती के लाखों किसानों और बागबानों को लाभ भी मिलेगा. साथ ही, इस पौध को संरक्षित कर इस के व्यावसायिक उत्पादन को बढ़ावा भी मिलेगा.

क्या है जीआई टैग

भौगोलिक संकेत यानी जीआई टैग एक प्रतीक है, जो मुख्य रूप से किसी उत्पाद को उस के मूल क्षेत्र से जोड़ने के लिए दिया जाता है. जीआई टैग बताता है कि विशेष उत्पाद किस जगह पैदा होता है. जीआई टैग उन उत्पादों को ही दिया जाता है, जो अपने क्षेत्र की विशेषता रखते हैं, पनियाला उन्हीं में से एक है.

भारत द्वारा संसद में साल 1999 में रजिस्ट्रेशन एंड प्रोटैक्शन ऐक्ट के तहत ‘जियोग्राफिकल इंडिकेशंस औफ गुड्स’ लागू किया था. इस के तहत ही जीआई टैगिंग की जाती है.

औषधीय गुणों से भरपूर है पनियाला

पनियाला पर किए गए शोध में यह बात निकल कर आई कि इस के पत्तों, जड़, छाल, और फलों में एंटीबैक्टिरियल गुणों की प्रचुरता होती है, जिस से यह सेहत के लिहाज से काफी मुफीद माना जाता है.

गोरखपुर विश्वविद्यालय में साल 2011 से 2018 के बीच बौटनी विभाग में शोध करने पर पता चला कि पनियाला का फल गुणों से भरा हुआ है.

शोध के अनुसार, इस के पत्ते, छाल, जड़ों और फलों में बैक्टीरिया से लड़ने की प्रतिरोधात्मक क्षमता होती है. पेट से जुड़े रोगों में पनियाला काफी लाभकारी होता है, लेकिन आज गोरखपुर का यह पनियाला कम होता नजर आ रहा है.

इस के औषधीय गुणों को ले कर साल 2010 में अमेरिकन यूरेशियन जर्नल औफ साइंटिफिक रिसर्च में में एक शोध प्रकाशित हुआ था, जिस में यह बताया गया था कि पनियाला के पत्तों में बड़ी मात्रा में एंटीऔक्सिडेंट मौजूद है, जो बुढ़ापे की निशानी को कम करने के साथ ही तनाव को भी कम करता है.

एक और जर्नल औफ एथनोफारमाकोलोजी में प्रकाशित एक शोध के अनुसार, पनियाला के पत्तों में मलेरिया रोधी तत्व पाए जाते हैं. साल 2011 में इंटरनेशनल जर्नल औफ ड्रग डेवलपमेंट एंड रिसर्च में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया कि पनियाला के पत्तों में सूक्ष्म जीवरोधी और बैक्टीरियारोधी गुण भी पाए जाते हैं.

अफ्रीकन जर्नल औफ बेसिक एंड अप्लाइड साइंसेस में प्रकाशित एक शोध पनियाला के दमारोधी होने की भी पुष्टि करता है.

इस के फल का उपयोग पेट के कई रोगों, दांतों एवं मसूढ़ों में दर्द, इन से खून आने, कफ, निमोनिया और खरास आदि से बचाव में भी किया जाता है. इस के फलों को लिवर के रोगों में भी उपयोगी पाया गया है. इस के फलों को जैम, जैली और जूस के रूप में संरक्षित कर लंबे समय तक रखा जा सकता है.

कैसे करें पनियाला की पहचान

पनियाला का वैज्ञानिक नाम ‘फ्लाकोर्टिया इंडिका’ है. इस का फल जामुनी रंग का खट्टेमीठे स्वाद वाला होता है. इस पेड़ की औसत ऊंचाई लगभग 20-30 फुट तक होती है और इस में सफेद रंग का फूल आता है. इस में मईजून माह में फूल आता है और इस के फल सितंबरअक्तूबर में पक कर तैयार होते हैं. इस के नए पौधे बीज, कटिंग और कलम विधि से तैयार किए जा सकते हैं. लेकिन उद्यान से जुड़े माहिरों का मानना है कि पनियाला के बीज से तैयार पौधों की तुलना में कलम या कटिंग से तैयार पौधों में मूल गुण ज्यादा सुरक्षित रहते हैं.

रोपाई का मुफीद समय

भारत में ज्यादातर पौधों की रोपाई मानसून सीजन में की जाती है. पनियाला भी उन्हीं में से एक है. इस के पौधों की रोपाई का मुफीद समय जुलाई से अक्तूबर महीने तक का होता है.

पनियाला के पौध विलुप्त होने कगार पर भले ही हों, लेकिन इस के पौधे आज भी गोरखपुर क्षेत्र से सटे पीपीगंज और उस के आसपास के जंगली इलाकों में स्थानीय लेवल पर ग्रामीणों ने संरक्षित कर रखा है.

ऐसे में अगर आप इस बेहद लजीज स्वाद वाले विलुप्तप्राय औषधीय पौधे को रोप कर अपनी बगिया की शोभा बढ़ाना चाहते हैं, तो आप गोरखपुर इलाके में स्थानीय लेवल पर संपर्क कर पौधे प्राप्त कर सकते हैं.

किसानों की बढ़ाएगा आमदनी

पहले पनियाला के फलों की डिमांड जानकारी न होने से स्थानीय लेवल पर ही हुआ करती थी, लेकिन इस को जीआई टैग मिल जाने से इस की मांग और कीमत में उछाल देखा गया है. कुछ साल पहले गोरखपुर जिले के करमहिया गांव सभा के करमहा गांव में पारस निषाद के घर यूपी स्टेट बायोडायवरसिटी बोर्ड के आर. दूबे गए थे. उस समय उन के पास पनियाला के 9 पेड़ थे. उस समय अक्तूबर में पकने वाले पनियाला के फल का दाम 60-90 रुपया प्रति किलोग्राम हुआ करता था, जो इस समय 200 से 300 रुपया प्रति किलोग्राम तक हो गया है.