कच्ची उपज को टिकाऊ बनाएं प्रोसेसिंग (Processing) से लाभ कमाएं

भारत में बड़े पैमाने पर खेती की जाती है. जमीन उपजाऊ व किसान मेहनती हैं. पैदावार भी भरपूर होती है. बावजूद इस के ज्यादातर किसानों की माली हालत खराब है. दरअसल, जब मौसमी फसलें पक कर बाजार में आती हैं, तो आवक बढ़ने से उपज की कीमतें गिर जाती हैं. ऐसे में फायदा तो दूर, लागत भी मुश्किल से निकल पाती है. इस से नजात पाने के लिए खेती से कमाई के नए तरीके खोजने जरूरी हैं.

किसान नई तकनीक सीख कर फल, सब्जी, दलहन, तिलहन व अनाज की फसलों में से ज्यादातर की प्रोसेसिंग व डब्बाबंदी गांव में रह कर ही कर सकते हैं. कुछ किसान बजाय मंडी में अपनी उपज बेचने के सीधे बड़ी मिलों को बेच देते हैं, ताकि उन्हें ज्यादा कीमत मिले. बेशक यह तरीका कारगर है, लेकिन अब दाल, तेल व चावल आदि प्रोसेसिंग की मिनी मिलें आ गई हैं. किसान उन्हें लगा कर खुद भी आसानी से प्रोसेसिंग कर सकते हैं.

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद, सीएसआईआर दिल्ली के रिसर्च सैंटरों से मिनी मिलों व मशीनों की जानकारी हासिल की जा सकती है. रही बात तैयार माल को बेचने की, तो जब किसान अपनी उपज को कच्चे माल की तरह बेच लेते हैं, तो तैयार माल को भी बेचा जा सकता है. जिला उद्योग केंद्र, ग्रामोद्योग बोर्ड व खादी आयोग आदि भी प्रचार, नुमाइश करने व माल बिकवाने में काफी मदद करते हैं, लिहाजा उन से तालमेल बनाने की जरूरत है.

उत्पाद अनेक

आटा, मैदा, सूजी, दलिया, खील, बिस्कुट, ब्रेड, तेल, अचार, चटनी, मुरब्बा, जैम, जैली, टौफी, जूस, शरबत, चिप्स, बडि़यां, पापड़, नमकीन, पिसे मसाले, क्रीम, दही, पनीर, खोया, घी, मक्खन, कैचप व सास, आदि तमाम पैकेटबंद चीजें हमारे देश में बन और बिक रही हैं. अपनी कूवत व काबलीयत के मुताबिक उत्पाद बनाए व बेचे जा सकते हैं. जो भी उपज ज्यादा हो और बाजार में उस की कीमत वाजिब न मिल रही हो, तो उसी की प्रोसेसिंग की जा सकती है.

कीमत बढ़ाएं

सदियों से खेती बोआई से कटाई तक की हद में रही है, लेकिन अब खेती की लगातार बढ़ती लागत व घटते मुनाफे ने किसानों को खेती के सहायक धंधे करने के लिए सोचने पर मजबूर कर दिया है. साथ ही बेवजह के नुकसान घटाने की गरज से खेती के माहिर वैज्ञानिकों ने पोस्ट हारवेस्ट टैक्नोलौजी यानी कटाई के बाद की तकनीक अपनाने और वैल्यू एडीशन करने यानी उपज की कीमत बढ़ाने पर जोर दिया है.

उपज की कीमत बढ़ाने के लिए उसे बेहतर बनाया जाता है. उपज कोई भी हो कटाई के कुछ समय बाद ही वह नमी, फफूंदी, चूहे व कीड़ों आदि के कारण खराब होने लगती है. लिहाजा, धुआं दे कर या कीट व फफूंदनाशक दवाएं रख कर उसे महफूज किया जाता है. ठीक इसी तरह फूड प्रासेसिंग में भी होता है. खानेपीने की चीजों को लंबे समय तक महफूज बनाए रखने के लिए उन में प्रिजरविंग एजेंट यानी परिरक्षक डाले जाते हैं.

फलसब्जियों को सुखा कर या उन का अचार आदि डाल कर टिकाऊ बनाने का काम सदियों से घरों में औरतें बखूबी करती रही हैं. यह बात अलग है कि उन के तौरतरीके अलग होते थे. गौरतलब है कि पुराने जमाने में खानेपीने की चीजों को सड़ने से बचाने के लिए रासायनिक प्रिजर्वेटिव नहीं थे. लिहाजा मेवों, मसालों, फलों व सब्जियों को धूप, हवा या छाया में सुखा कर, जमा व बोतलबंदी कर टिकाऊ बनाया जाता था.

टिकाऊ बनाना

फलों व सब्जियों से बनी खानेपीने की चीजों को लंबे वक्त तक टिकाऊ बनाने के लिए कुदरती तरीकों का इस्तेमाल हमारे देश में सदियों से होता रहा है. पुराने जमाने में खानेपीने की चीजों को लंबे समय तक महफूज रखने के लिए नमक, शक्कर, शहद, लौंग, नीबू, अजवायन, दालचीनी व सिरका आदि का इस्तेमाल कुदरती प्रिजर्वेटिव्स के तौर पर किया जाता था, ताकि फफूंदी न लगे.

इन घरेलू नुसखों के इस्तेमाल से सामान व सेहत दोनों के खराब होने की आशंका नहीं होती. दादीनानी अपने घरेलू नुसखों के बलबूते ही अचार, चटनी, मुरब्बे, बड़ी व पापड़ आदि बहुत सी चीजों को टिकाऊ बना कर लंबे वक्त तक खाने लायक बनाए रखती थीं.

प्रोसेसिंग (Processing)

प्रिजर्वेटिव्स

फूड प्रोसेसिंग के काम में प्रिजर्वेटिव्स यानी टिकाऊ बनाए रखने वाले कैमिकल्स का इस्तेमाल बहुत अहम होता है. तुरंत व तेज असरकारी नए रासायनिक प्रिजर्वेटिव्स खानेपीने की चीजों को खराब होने से बचाने में कारगर हैं, लेकिन इन के इस्तेमाल में सावधानी बरतना बहुत जरूरी है.

यही वजह है कि दुनिया भर के मुल्कों में इन के इस्तेमाल के मानक तय किए गए हैं. जागरूक ग्राहक कैमिकल रहित खाद्य उत्पाद खरीदने को तरजीह देते हैं. लिहाजा, औरगैनिक फार्मिंग की तरह जल्द ही प्रिजर्वेटिव्स रहित खाद्य उत्पादों का बाजार भी बहुत तेजी से बढ़ेगा.

अब खानपान में जागरूकता बहुत तेजी से बढ़ रही है. ज्यादातर ग्राहक हैल्दी फूड्स की तलाश में रहते हैं. वे इस बात पर भी गौर करते हैं कि माल की क्वालिटी कैसी है? उस के अंदर क्याक्या चीजें शामिल हैं. बहुत सी नामी कंपनियां रंग व रसायन के बगैर टमाटर सास व फलों के जूस आदि उत्पाद बना कर ऊंची कीमतों पर बेच रही हैं. आगे ऐसे उत्पादों की मांग और बढ़ेगी, लिहाजा, किसान इस से फायदा उठा सकते हैं.

फूड प्रोसेसिंग के लिए प्रिजर्वेटिव्स यानी परिरक्षकों की पूरी जानकारी होना बेहद जरूरी है. प्रिजर्वेटिव्स खानेपीने की चीजों को टिकाऊ बना कर खराब होने से रोकते हैं. सोडियम बैंजोएट, बैंजोइक एसिड व लैक्टिक एसिड आदि कई तरह के प्रिजर्वेटिव्स अब आसानी से बाजार में मिलते हैं व धड़ल्ले से इस्तेमाल होते हैं.

तालीम

राज्यों के उद्यान एवं फल सरंक्षण विभाग, ग्रामोद्योग बोर्ड, खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग, कृषि विश्वविद्यालयों के प्रसार विभाग या फूड प्रोसेसिंग की किसी निजी इकाई में काम कर के खाद्य प्रसंस्करण का काम सीखा जा सकता है. सीखने के बाद गांव में ही अपनी इकाई लगाई जा सकती है.

फूड प्रोसेसिंग इकाई लगाने व चलाने से पहले लाइसैंस व छूट आदि की जानकारी जिला उद्योग केंद्र या ग्रामोद्योग के दफ्तर से हासिल कर सकते हैं. तैयार उत्पादों की क्वालिटी को हमेशा उम्दा और कीमतें वाजिब बनाए रखने का ध्यान जरूर रखें, ताकि बाजार में दिग्गजों के बीच ठहरा जा सके व ग्राहकों के दिलों में आसानी से जगह बनाई जा सके. पहले छोटे पैमाने पर काम शुरू कर के बाद में उसे बढ़ाया जा सकता है.

मेरठ में अचार, चटनी व मुरब्बे जैसे करीब 50 उत्पाद बना रहे गृहउद्योग तृप्ति फूड्स की शुरुआत में नीबू का सिर्फ 12 बोतल स्क्ैवश बना कर बेचा गया था. उस की क्वालिटी व वाजिब कीमत का असर यह हुआ कि खूब मांग बढ़ी व काम बहुत तेजी से बढ़ा. इस उद्यमी का मानना है कि इस काम में ईमानदारी ही तरक्की की बुनियाद है. मसलन, अनानास की चटनी में वे कभी भी कच्चे पपीते व एसेंस की मिलावट नहीं करते.

प्रोसेसिंग के काम में पैकेजिंग की भी बहुत अहमियत होती है. आजकल पैकिंग की दुनिया में बहुत तेजी से बदलाव हुए हैं. मसलन, टीन के डब्बों व कांच की बोतलों जैसी पुरानी पैकिंगों में माल तैयार करने वाले निर्माता अब बहुत कम रह गए हैं. अब पौलीपैक, पाउचपैक, अल्यूमिनियम पैक, प्लास्टिक पैक व टैट्रा पैक ज्यादा दिखाई देते हैं. प्रोसेसिंग का काम शुरू करने से पहले यह तय करना बेहद जरूरी है कि तैयार माल की पैकिंग कैसी होगी? अब हर तरह की पैकिंग की छोटीबड़ी, मैनुअल व आटोमैटिक मशीनें देश में असानी से मिलने लगी हैं. जरूरत हिचक छोड़ कर मन बनाने व आगे आ कर पहल करने की है.

आलू बीज (Potato Seed) के दाम हुए कम

लखनऊ : प्रदेश के उद्यान, कृषि विपणन, कृषि विदेश व्यापार एवं कृषि निर्यात राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) दिनेश प्रताप सिंह ने बताया कि योगी सरकार में किसान हित के दृष्टिगत विभिन्न योजनाओं के माध्यम से अनुदान देने की व्यवस्था की गई है. प्रदेश के किसानों एवं आलू उत्पादकों के हित को देखते हुए वर्ष 2024-25 के लिए आलू बीज (Potato Seed) वितरण व विक्रय की दरें निर्धारित करने में महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया है.

उन्होंने बताया कि वर्तमान वित्तीय वर्ष में राजकीय आलू बीज की उपलब्धता किसानों को सुगम बनाए जाने के उद्देश्य से प्रदेश के किसानों को बीजोत्पादन के लिए विक्रय हेतु विभागीय दरों में 500 रुपए प्रति क्विंटल दर में कमी कर के विक्रय दर (शोध संस्थाओं एवं सरकारी संस्थाओं को छोड़कर) निर्धारित कर दी गई है.

उद्यान मंत्री दिनेश प्रताप सिंह ने बताया कि निर्धारित दरों के अनुसार अब आधारित प्रथम आलू 2,995 रुपए प्रति क्विंटल, आधारित द्वितीय आलू 2,595 रुपए प्रति क्विंटल, ओवर साइज (आधारित प्रथम) 2,270 रुपए प्रति क्विंटल, ओवर साइज (आधारित द्वितीय) 2,210 रुपए प्रति क्विंटल और आधारित प्रथम आलू ट्रूथफूल 2,180 रुपए प्रति क्विंटल बीज हो गया है. सफेद एवं लाल आलू प्रजातियों के बीज की विक्रय दरें एकसमान हैं. इन दरों पर प्रदेश के किसान अपने जनपदीय उद्यान अधिकारी से नकद मूल्य पर बीज प्राप्त कर आलू बीज का उत्पादन कर सकते हैं.

उन्होंने बताया कि उद्यान एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग द्वारा प्रदेश के किसानों को नकद मूल्य पर आधारित प्रथम, द्वितीय और प्रमाणित आलू बीज उपलब्ध कराया जा रहा है. इस से पहले आलू बीज की विक्रय दर आधारित प्रथम 3,495, आधारित द्वितीय 3,095, ओवर साइज (आधारित प्रथम) 2,770, ओवर साइज (आधारित द्वितीय) 2,710 और आधारित प्रथम ट्रुथफूल 2,680 रुपए प्रति क्विंटल निर्धारित की गई थी.

उद्यान मंत्री दिनेश प्रताप सिंह ने बताया कि प्रदेश में लगभग 6.96 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में आलू की बोआई का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, जिस के लिए लगभग 24- 25 लाख मीट्रिक टन आलू बीज की आवश्यकता होगी. उद्यान विभाग लगभग 40- 45 हजार क्विंटल आधारित श्रेणी का आलू बीज किसानों में बीज उत्पादन के लिए वितरित करेगा, जिस से किसानों द्वारा अग्रेतर श्रेणी का बीज उत्पादन कर प्रदेश में गुणवत्तायुक्त बीज की कमी को पूरा करने में सहभागी हो सकते हैं. गुणवत्तायुक्त प्रमाणित आलू बीज से प्रदेश के आलू उत्पादन में वृद्धि होगी.

निदेशक उद्यान डा, विजय बहादुर द्विवेदी ने बताया कि मार्च, 2023 में प्रदेश के राजकीय प्रक्षेत्रों पर उत्पादन के लिए सीपीआरआई, भारत सरकार से 9214.94 क्विंटल जनक (ब्रीडर) आलू बीज प्राप्त कर राजकीय प्रदेश के 21 राजकीय प्रक्षेत्रों पर कुल 224.83 हेक्टेयर क्षेत्रफल में आलू बीज का उत्पादन कराया गया, जिस से 45168.50 क्विंटल आधारीय एवं टीएल श्रेणी के आलू बीज (कुफरी बहार, कुफरी चिप्सोना-1 एवं 3, कुफरी आनंद, कुफरी पुखराज, कुफरी सूर्या, कुफरी ख्याति, कुफरी सिंदूरी, कुफरी फ्राईसोना, कुफरी मोहन, कुफरी गंगा, कुफरी नीलकंठ, कुफरी लवकार एवं कुफरी बादशाह) का उत्पादन प्राप्त हुआ, जिसे राजकीय शीतगृह अलीगंज, लखनऊ व मोदीपुरम, मेरठ में भंडारित किया गया. भंडारित आलू बीज का प्रदेश के समस्त जनपदों को आवंटित कर किसानों के मध्य नकद मूल्य पर वितरण किया जाएगा.

उन्होंने बताया कि प्रसंस्कृत प्रजातियों के लिए उत्तर प्रदेश राज्य बीज प्रमाणीकरण संस्था से पंजीकरण के बाद आलू बीज उत्पादन की बैगिंग, टैगिंग कराने पर किसानों को 25,000 रुपए प्रति हेक्टेयर की दर से अनुदान की व्यवस्था है. आलू बीज की प्रसंस्कृत प्रजातियां कुफरी चिप्सोना-1 एवं 3, कुफरी फ्राईसोना और कुफरी सूर्या हैं.

मेघालय बढ़ रहा है खाद्य प्रसंस्करण की ओर

नई दिल्ली : 21 सितंबर2024. खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री चिराग पासवान ने पिछले दिनों नई दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित वर्ल्ड फूड इंडिया 2024 में मेघालय पवेलियन का दौरा किया. उन के साथ मेघालय सरकार के कृषि और किसान कल्याण विभाग के संयुक्त सचिव गुनंका डीबी, आईएफएस भी थे.
अपनी यात्रा के दौरान चिराग पासवान ने खाद्य प्रसंस्करण और जैविक खेती में मेघालय सरकार द्वारा की गई पहल की प्रशंसा की. उन्होंने विशेष रूप से मेघालय कलेक्टिव्स की सराहना की, जो किसान उत्पादक संगठनों, ग्रामीण उद्यमिता और टिकाऊ कृषि प्रथाओं को बढ़ावा देने के लिए एक अभिनव दृष्टिकोण है.

मंत्री चिराग पासवान ने कहा कि केंद्र हमेशा आप की सभी पहलों में मदद करने के लिए मौजूद है. जिस तरह से मेघालय बढ़ रहा है, खासकर खाद्य प्रसंस्करण के क्षेत्र में, हम मेघालय सरकार को केंद्र की ओर से पूरे समर्थन का आश्वासन देते हैं.

मेघालय मंडप में 21 खाद्य प्रसंस्करण ब्रांडों और किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) के साथ मेघालय कलेक्टिव्स शामिल हैं. इन ब्रांडों में प्रसिद्ध लाकाडोंग हलदी, खासी मंदारिन, केव अनानास, स्थानीय अदरक, काजू और कई अन्य स्वदेशी उपज से बने मूल्यवर्धित उत्पाद शामिल हैं. मेघालय कलेक्टिव्स एफपीओ, ग्रामीण उद्यमिता विकास, सतत कृषि प्रथाओं, बाजार संपर्कों के माध्यम से ग्रामीण समुदायों को सशक्त बनाने के लिए मेघालय सरकार की एक पहल है. इस सामूहिक दृष्टिकोण का उद्देश्य किसानों की आय बढ़ाना, कृषि उत्पादकता में सुधार करना और मेघालय के अद्वितीय उत्पादों को बढ़ावा देना है.

औषधीय खेती (Medicinal Farming) के लिए प्रोत्साहन, बढ़ेगी आमदनी

भोपाल : औषधीय पौधों की खेती के रकबे को बढ़ाने के लिए देवारण्य योजना पर काम किया जा रहा है. योजना में योजना का मकसद किसानों विशेषकर जनजाति क्षेत्र के किसानों की कृषि आय में बढ़ोतरी करना है. योजना का क्रियान्वयन आयुष विभाग द्वारा किया जा रहा है. जिले के वनों में बड़ी मात्रा में दुर्लभ औषधि पौधे पाए जाते हैं.

देवारण्य योजना के द्वारा प्राकृतिक रूप से उपलब्ध प्रत्येक प्रकार के औषधीय पौधों के संरक्षण और वैज्ञानिक रूप से दोहन और संग्रहण की प्रणाली का विकास किया जा रहा है. योजना में सरकार के विभिन्न विभागों के साथ सामंजस्य स्थापित कर विभिन्न औषधीय पौधों की पैदावार बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं.

योजना का क्रियान्वयन आयुष, जनजातीय कार्य, पंचायत एवं ग्रामीण विकास, वन, उद्यानिकी एवं खाद्य प्रसंस्करण और किसान कल्याण एवं कृषि विभाग संयुक्त रूप से कर रहे हैं. औषधीय पौधों खेती का बढ़ावा देने के लिए किसान को 51 प्रकार की औषधीय पौधों की खेती करने के लिए मनरेगा से मदद दी जा रही है.

राज्य औषधीय पादप बोर्ड का गठन किया गया है. जनजातीय क्षेत्रों के किसानों ने योजना का लाभ लेते हुए औषधीय पौधे लगाए हैं. राज्य औषधीय पादप बोर्ड द्वारा औषधीय पौधों के भंडारण और विपणन के लिए आयुष औषधि उत्पादन करने वाली कंपनियों के साथ एमओयू करने के प्रयास किए जा रहे हैं.

खाद्य प्रसंस्करण (Food Processing) में है असीमित संभावनाए

सबौर : बिहार कृषि विश्वविद्यालय के अनुसंधान निदेशालय के सम्मेलन कक्ष में संगरिया, पंजाब के संत लौंगोवाल विश्वविद्यालय के डीन डा. कमलेश प्रसाद और लुधियाना स्थित एग्रो-इंडस्ट्रियलिस्ट गगन मेहता एवं खाद्य प्रसंसकरण पोस्ट हारवेस्ट के वैज्ञानिकों के साथ एक बैठक आयोजित की गई. बैठक के प्रारंभ में डा. अनिल कुमार सिंह, निदेशक अनुसंधान ने परिचर्चा में उपस्थित सभी सदस्यों का स्वागत किया.

निदेशक अनुसंधान डा. अनिल कुमार सिंह ने बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर में खाद्य प्रौद्योगिकी और फसल के बाद की तकनीक की वर्तमान स्थिति प्रस्तुत की. उन्होंने यह भी कहा कि बिहार में कृषि उत्पादों का जीडीपी योगदान 0.80 फीसदी है, जो राष्ट्रीय औसत जीडीपी योगदान से अधिक है.

उन्होंने कहा कि बिहार ही केवल ऐसा राज्य है, जिस ने कृषि और संबंधित क्षेत्र में विकास को प्रोत्साहित करने के लिए ‘चौथा कृषि रोडमैप’ तैयार किया है. खाद्य प्रसंस्करण यानी फूड प्रोसैसिंग और फसल के बाद की तकनीक राजस्व सृजन के लिए एक प्रमुख बाजार उन्मुख शाखा है.

बिहार में मूल्य संवर्धन की अपार संभावनाएं हैं. बिहार में 8 उत्पादों को भौगोलिक संकेत टैग (GI Tag) मिला है, जिन में से 5 कृषि उत्पादों को बीएयू, सबौर के वैज्ञानिकों की सहायता से भौगोलिक संकेत प्राप्त हुए हैं. चूंकि कई बागबानी और कृषि उत्पाद स्वाभाविक रूप से नष्ट हो जाते हैं, ऐसे में इन से मूल्य संवर्धित उत्पाद बनाने की आवश्यकता है.

डा. शमशेर अहमद, सहायक प्रोफैसर और खाद्य विकास केंद्र के नोडल अधिकारी ने एफडीसी, बीएयू, सबौर के अंतर्गत विकसित प्रयोगशालाओं, प्रशिक्षण केंद्रों और प्रसंस्करण इकाइयों की जानकारी दी.

बीएयू, सबौर के वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में काहलगांव में एक कोल्ड स्टोरेज सुविधा स्थापित की गई है. विभाग के अन्य वैज्ञानिकों ने विशेषज्ञों से आगे की सुझाव प्राप्त करने के लिए अपने प्रस्तावित अनुसंधान कार्य प्रस्तुत किए.

डा. कमलेश प्रसाद ने वैज्ञानिकों के प्रस्तुतीकरण के दौरान कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए. सत्तू के पोषण संवर्धन और कैप्सिकम में कैप्साइसिन सामग्री बढ़ाने के सुझाव दिए. डा. गगन मेहता ने फसल के बाद के उत्पादों को विपणन स्तर पर ले जाने में रुचि व्यक्त की.

निदेशक अनुसंधान ने वैज्ञानिकों को उत्पाद विकसित करने और बिहार के किसानों के लाभ के लिए उन्हें जमीनी स्तर पर ले जाने के लिए प्रोत्साहित किया.

प्रोबायोटिक्स उत्पादों, मिलेट उत्पादों और न्यूनतम प्रसंस्कृत उत्पादों के विकास पर विश्वविद्यालय में हो रहा है काम, जीआई उत्पादों को और मूल्य संवर्धित किया जा सकता है, ताकि वे अंतर्राष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच सकें. डा. डीआर सिंह, कुलपति, बीएयू, सबौर, डा. एमए अफताब ने समूह चर्चा में सक्रिय रूप से भाग लिया और अंत में धन्यवाद ज्ञापन किया.

राइस मिल (Rice Mill) से दीपेंद्र तिवारी का सपना हुआ साकार

अनूपपुर : ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ के तहत युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए शासन की महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना है. यह योजना स्वयं का उद्योग स्थापित कर लोगों में नई जीवन जीने की प्रेरणा भी देती है.

अनूपपुर जिले के गांव लतार के बाशिंदे दीपेंद्र प्रसाद तिवारी पिता गजेंद्र प्रसाद तिवारी, जिन का राइस मिल खोलने का सपना था, परंतु आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण वे यह सपना पूरा नहीं कर पा रहे थे.

उन्होंने बताया कि वे रोजगार के लिए दूसरों के यहां छोटीमोटी नौकरी करते थे और अपने परिवार का पालनपोषण करते थे. नौकरी से उन के परिवार की आवश्यकताएं एवं जरूरतें पूरी नहीं हो पाती थीं. वे अत्यंत परेशान रहते थे. तब उन के एक दोस्त ने उद्यानिकी एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग के जनहितकारी योजना प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उद्योग उन्नयन योजना की जानकारी दी और उद्यानिकी विभाग के अधिकारियों से मिल कर योजना का लाभ लेने की सलाह दी.

उस के बाद उन्होंने उद्यानिकी एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग के अधिकारियों से संपर्क कर मिनी राइस मिल खोलने के लिए फार्म भरा और उन्हें बैंक द्वारा योजना के माध्यम से 2 लाख रुपए का लोन प्राप्त हुआ. योजना के तहत उन्हें 70,000 रुपए की अनुदान राशि भी मुहैया कराई गई.

उन्होंने बताया कि उन्हीं पैसों से अपना सपना साकार कर मिनी राइस मिल लगाया और अब हर महीने वे 30 से 40 हजार रुपए की आमदनी ले रहे हैं. उन्होंने 3 लोगों को श्रमिक के रूप में रोजगार भी मुहैया कराया है.

कृषि संकाय चुनने पर बेटियों को मिल रही प्रोत्साहन राशि

जयपुर : कृषि क्षेत्र में बोआई से ले कर रोपण, सिंचाई और कटाई जैसे कामों में महिलाएं अग्रणी भूमिका निभाती हैं. इस क्षेत्र में उन के सशक्तीकरण के लिए राज्य सरकार द्वारा अभूतपूर्व फैसले किए गए हैं. ’कृषि विषय में अध्ययनरत छात्राओं को देय प्रोत्साहन राशि योजना’ भी बालिकाओं की कृषि क्षेत्र में प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने की ऐसी ही एक योजना है.

राज्य सरकार का उद्देश्य है कि बालिकाएं कृषि के क्षेत्र की नवीनतम विधाओं का अध्ययन करें और औपचारिक शिक्षणप्रशिक्षण प्राप्त करें, जिस से न केवल उन के परिवार की आय बढ़ेगी, बल्कि वे राज्य और देश की समृद्धि में भी योगदान देंगी.

योजना के तहत, कृषि संकाय से अध्ययन के लिए 11वीं कक्षा से ले कर पीएचडी कर रही छात्राओं को 15,000 से 40,000 की राशि प्रतिवर्ष दी जा रही है.

कृषि संकाय चुनने पर प्रोत्साहन

कृषि आयुक्त कन्हैया लाल स्वामी ने बताया कि योजना के तहत राज्य में कृषि विषय ले कर अध्ययन करने वाली 11वीं एवं 12वीं कक्षा की छात्राओं को प्रतिवर्ष 15,000 की राशि प्रदान की जाती है.

उन्होंने आगे बताया कि कृषि विज्ञान से स्नातक के विषयों जैसे कि उद्यानिकी, डेयरी, कृषि अभियांत्रिकी, खाद्य प्रसंस्करण के साथ ही स्नातकोत्तर (एमएससी कृषि) में अध्ययन करने वाली छात्राओं को 25,000 रुपए हर साल दिए जाते हैं. इसी प्रकार कृषि विषय में पीएचडी करने वाली छात्राओं को 40,000 रुपए प्रतिवर्ष (अधिकतम 3 वर्ष) प्रोत्साहन राशि दिए जाने का प्रावधान किया गया है.

19,662 छात्राओं को मिला 35 करोड़ की राशि का प्रोत्साहन

कृषि आयुक्त कन्हैया लाल स्वामी ने बताया कि योजना के तहत 21 दिसंबर, 2023 से जुलाई, 2024 तक अध्ययनरत 19,662 छात्राओं को 35 करोड़, 62 लाख रुपए का आर्थिक संबल दे कर कृषि संकाय लेने के लिए प्रोत्साहित किया गया है.

कृषि संकाय में अनामिका और विभा को मिला संबल

कृषि संकाय में स्नातक की शिक्षा प्राप्त कर रही अनामिका शर्मा, उदयपुर के जनार्दन राय नागर विश्वविद्यालय में बीएससी द्वितीय वर्ष की छात्रा हैं. वे बताती हैं कि योजना के तहत बीएससी के प्रथम वर्ष में राज्य सरकार द्वारा 25,000 रुपए की प्रोत्साहन राशि दी गई थी. वे बताती हैं कि उन्हें शुरू से ही कृषि के क्षेत्र में अपना भविष्य बनाने की इच्छा थी. वे चाहती थीं कि वे कृषि के क्षेत्र में उन्नत तकनीकों के बारे में जानें और अपने परिवार की आय बढ़ाने में सहयोग करें.

अनामिका शर्मा कहती हैं कि वे स्वयं तो सक्षम हुई हीं हैं और अब वे पढ़ाई के साथसाथ किसानों को खेती करने की उन्नत तकनीकों, बीज, उर्वरक जैसी सहायक सामग्रियों के बारे में उचित जानकारी भी देती हैं.
इसी विश्वविद्यालय में अध्ययनरत बीएससी तृतीय वर्ष की छात्रा विभा प्रजापत भी इस योजना के लिए मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा का आभार जताते हुए नहीं थकतीं. वे कहती हैं कि इस योजना के कारण उन्हें कृषि विषय पढ़ने के लिए प्रोत्साहन मिला है. वे चाहती हैं कि वे कृषि की नवीनतम तकनीकों के बारे में ज्यादा से ज्यादा सीखें और इस क्षेत्र में कोई नवाचार करें, जिस से किसानों का कृषि कार्य में परिश्रम कम हो और उन की आय में इजाफा हो सके.

आंवला लड्डू (Amla Laddus) से मेहमानों का स्वागत

उत्तर प्रदेश के सुलतानपुर, प्रतापगढ़,  इलाहाबाद, जौनपुर, फैजाबाद जैसे जिलों में आंवला ज्यादा होता है. वहां के गांवों में जब कोई मेहमान घर आता है तो उस का स्वागत आंवले के लड्डू और मुरब्बा से किया जाता है.

आंवले का लड्डू बनाने के लिए अच्छी किस्म के आंवले को ले कर कद्दूकस से उस का गूदा निकाल लिया जाता  है. इस को चूने के पानी में डाल कर साफ कर लिया जाता है.

इस के बाद आंवले के गूदे को हलका उबाला जाता है. इस के बाद इस में बराबर मात्रा में चीनी मिलाई जाती है. इस के बाद देशी घी, छोटी इलायची और शहद मिला कर इस को लोहे की कड़ाही में मिलाते हैं. गरम होने पर इस को भूना जाता है.

लड्डू खराब न हों, इस के लिए सोडियम बैंजोएट मिलाया जाता है. जब लड्डू बनाने के लायक आंवला हो जाए तो उस को ठंडा कर के गोलगोल आकार के लड्डू तैयार किए जाते हैं.

आंवला लड्डू (Amla Laddus)

आंवले का मुरब्बा

आंवले का मुरब्बा तैयार करने के लिए अच्छी किस्म के आंवले लिए जाते हैं. बड़ेबड़े आंवले देखने में अच्छे लगते हैं, जिस से इस की कीमत अच्छी मिलती है.

आंवले का मुरब्बा तैयार करने के लिए आंवले की गोदाई सूजा (लंबी सी सूई) से की जाती है. यह काम मजदूरों के सहारे किया जाता है.

आंवले की गोदाई करने के बाद उस को चूने के पानी में डाल दिया जाता है. 2 दिन बाद इस को निकाल कर चीनी के घोल (चाशनी) में डाल दिया जाता है. आंवला पानी छोड़ता है. 7 दिन बाद आंवले को निकाल लिया जाता है.

इस के बाद दोबारा इस को चीनी के घोल में डाला जाता है. इस प्रोसैस में 25 दिन लग जाते हैं. हर 7 दिन बाद आंवले को चीनी के घोल में डाला जाता है.

शुरुआत में जब आंवले को चीनी के घोल में डाला जाता है तो उस का रंग बादामी गाढ़ा सा दिखता है. इस कलर को साफ करने के लिए ही आंवले को कई बार साफ चीनी के घोल में डाला जाता है.

25 दिन बाद चीनी का घोल कुछ इस तरह का हो जाता है जिस के अंदर आंवला साफतौर पर नजर आता है. ग्राहक साफ रंग देख कर ही मुरब्बे को पसंद करता है. 1 किलोग्राम आंवले के मुरब्बे में तकरीबन 12 पीस आते हैं.

लागत कम मुनाफा ज्यादा

आंवले का मुरब्बा बनाने के लिए बहुत बड़ी पूंजी की जरूरत नहीं होती है. 25,000 से ले कर 30,000 रुपए की लागत से इस को शुरू किया जा सकता है.

मुरब्बा बनाने के लिए आंवले को गोदने के लिए सूजा, रखने के लिए बरतन, चाशनी बनाने के लिए भट्ठी वगैरह की जरूरत होती है. इस के अलावा पैकिंग के लिए मशीन भी जरूरी होती है.

जब काम आगे बढ़ जाए तो आटोमैटिक मशीनों का सहारा लेना पड़ता है. बाजार में मुरब्बा 100 से 125 रुपए प्रति किलोग्राम बिकता है.

आंवले का मुरब्बा बनाने का काम तब सफल होगा जब उस की मार्केटिंग ठीक ढंग से की जाए. अच्छे किस्म का मुरब्बा तैयार करने पर सही तरह से बिक्री हो जाए तो 1 किलोग्राम आंवला मुरब्बा को बेचने पर 25 से 30 रुपए तक का मुनाफा हो जाता है.

गृह उद्योग (Home Industry) के रूप में आलू चिप्स

आलू की कीमत 400 रुपए प्रति किलोग्राम… यकीन नहीं होता न… लेकिन यह बिलकुल सच है.

जी हां, बाजार में 10-12 रुपए प्रति किलोग्राम के भाव वाले आलू की आप को भी यह आकर्षक कीमत मिल सकती है. कैसे आइए जानते हैं:

उत्पाद : आलू चिप्स. वजन : 50 ग्राम. कीमत : 20 रुपए यानी आलू की कीमत तकरीबन 400 रुपए प्रति किलोग्राम.

आलू के चिप्स बच्चों से ले कर बड़ों तक सभी को पसंद आते हैं. चायकौफी के साथ चटपटा खाने वालों के लिए आलू चिप्स पहली पसंद हैं. वहीं छोटेछोटे बच्चों को भी चिप्स के लिए मचलते हुए देखा जा सकता है.

व्रत और त्योहारी सीजन पर इन की मांग काफी बढ़ जाती है क्योंकि बिना आलू चिप्स के फलाहार तो पूरा ही नहीं माना जाता. इन्हें छोटे पैमाने पर घर में बना कर भी बेचा जा सकता है और बड़े लैवल पर बनाना हो तो मौडर्न तकनीक का इस्तेमाल कर रोजगार के रूप में अपनाया जा सकता है.

घरेलू स्तर पर 4-5 औरतों द्वारा मिल कर आलू चिप्स को बेहतर रोजगार के रूप में अपनाया जा सकता है.

आलू चिप्स का गृह उद्योग से ले कर बड़े पैमाने पर कारोबारी उत्पादन किया जा सकता है. इस कारोबार से जुड़ी कुछ खास जानकारियां यहां साझा की जा रही हैं:

आलू चिप्स बनाने के लिए कच्ची सामग्री : चिप्स यानी साधारण वैफर्स बनाने के लिए आलू के अलावा तेल और नमक की जरूरत होती है. आलू भी 2 तरह के लिए जाते हैं. साधारण और मीठा आलू. इन की कीमत में फर्क होता है, वहीं यह फर्क मुनाफे में भी नजर आता है.

घर पर आलू चिप्स बनाने की विधि : नानीदादी के समय से ही घरों में आलू चिप्स बनाने का चलन रहा है. घर पर आलू चिप्स 2 तरीके से बनाए जाते हैं. पहला, आलू को उबाल कर जो कि परंपरागत तरीका है और दूसरा है बिना उबले आलू से. पहले हम बिना उबले आलू के चिप्स बनाने की विधि के बारे में बात करते हैं.

सब से पहले एक बड़े से बरतन में पानी ले कर उस में फिटकरी घोल लीजिए. अब चिप्स कटर की मदद से बराबर मोटाई के चिप्स काट कर उन्हें पानी में डाल दीजिए. तकरीबन 15 मिनट बाद उन्हें निकाल कर अलग रख दीजिए और फिर साफ पानी से धो कर उन्हें किसी साफ सूती कपड़े पर फैला दीजिए. थोड़ा सा सूखने पर कड़ाही में तेल डाल कर गरम कर के तल लीजिए. ठंडा होने के बाद इन्हें पैक कर लें.

उबले आलू के चिप्स बनाने का तरीका भी तकरीबन यही है. बस, इस में आलू चिप्स को कटिंग के बाद फिटकरी मिले खौलते हुए पानी में डाला जाता है और हलका सा उबलने के बाद चिप्स को पानी से बाहर निकाल कर सूती कपड़े पर फैला कर धूप में सुखा लिया जाता है. अच्छी तरह से सूखे चिप्स को पैक कर के रख लिया जाता है और जरूरत के मुताबिक गरम तेल में तल कर इस्तेमाल किया जाता है.

मशीनरी

यदि एक बार यह कारोबार चल निकले तो इसे बड़ा रूप दिया जा सकता है. इस के लिए आप को 2 मशीनरी की जरूरत होगी. एक चिप्स बनाने के लिए आलू कटिंग करने की और दूसरी चिप्स को पैक करने वाली मशीन की. साथ ही, वजन करने वाली छोटी मशीन की भी जरूरत पड़ेगी.

ये सभी मशीनें लोकल मार्केट के अलावा औनलाइन भी मंगाई जा सकती हैं. इन को इस्तेमाल करने के लिए किसी लंबी ट्रेनिंग की जरूरत नहीं होती क्योंकि आजकल हर मशीन आटोमैटिक होती है. इन मशीनों की लागत 2 से 3 लाख रुपए तक हो सकती है.

गृह उद्योग (Home Industry)

कहां बेचे जाएं

चिप्स बनाने के बाद उन की मार्केटिंग की बात करते हैं. आप इन्हें अपने आसपास के किराने की दुकानों पर बेच सकती हैं. पड़ोसियों और रिश्तेदारों को भी अपना ग्राहक बनाया जा सकता है. मांग निकलने पर बड़ी नमकीन वगैरह की दुकानों से संपर्क किया जा सकता है. त्योहारों पर लगने वाले मेलों वगैरह में भी प्रदर्शन कर प्रचार किया जा सकता है.

इस तरह से 10-12 रुपए प्रति किलोग्राम बिकने वाले आलू के चिप्स बना कर बेहतर कीमत पाई जा सकती है.

प्रधानमंत्री योजना के अंतर्गत युवा बनें उद्यमी

छिंदवाडा : उपसंचालक, उद्यान, छिंदवाड़ा ने बताया कि प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य उन्नयन योजना के अंतर्गत इच्छुक आवेदकों से आवेदन आमंत्रित किए गए हैं. 18  साल से अधिक उम्र का कोई भी शिक्षित बेरोजगार युवा उद्यमी योजना का लाभ ले कर स्वयं का काम शुरू कर सकते हैं.

इस योजना में बैंक से मिलने वाले लोन में उद्यानिकी विभाग द्वारा स्वीकृत परियोजना लागत राशि का 35 फीसदी अनुदान या अधिकतम 10 लाख रुपए जो भी कम हो, स्वीकृत किया जाता है.

उन्होंने आगे बताया कि स्वरोजगार के इच्छुक उद्यमी योजना का लाभ प्राप्त कर दाल मिल, आटा मिल, चावल मिल, बड़ी, पापड़, अचार, मुरब्बा, जैम, जेली, कैचप, सिरका,  औयल मिल, बेकरी प्रोडक्ट, कुरकुरे, गुड़धाना, पनीर उद्योग, पशु आहार, पोल्ट्री आहार आदि किसी भी प्रकार की इकाई लगा  सकते हैं.

योजना की अधिक जानकारी के लिए उद्यानिकी विभाग के जिला कार्यालय अथवा विकासखंड में स्थापित कार्यालय/रोपणी में संपर्क किया जा सकता है. अतिरिक्त उद्यमी को बैंक लोन दिलाने में सहयोग के लिए जिला स्तर पर जिला रिसोर्स पर्सन से संपर्क किया जा सकता है. इस के लिए आवश्यक दस्तावेज आधारकार्ड, पेनकार्ड, मूल निवास का प्रमाणपत्र, बिजली का बिल, गैस कार्ड आदि और 6 महीने की खाता का स्टेटमेंट एवं मार्कशीट.

अधिक जानकारी के लिए डीआरपी के मोबाइल नंबर-7869163254 व दूरभाष नंबर-07162-247011 पर संपर्क किया जा सकता है.