नस्ल सुधार के लिए वैज्ञानिक तरीके से भेड़पालन (Sheep Rearing)

अविकानगर : केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान, अविकानगर में मालपुरा भेड़ के सैक्टर मालपुरा परियोजना के एनडब्बूपीएसआई की एससीएसपी उपयोजना के अंतर्गत मालपुरा तहसील के 11 गांवों (सदरपुरा, चौरूपुरा, धोली, खेड़ा, भीपुर, कैरवालिया, लावा, डिग्गी नुक्कड़, लक्ष्मीपूरा, अजमेरी एवं चांदसेन) एवं पीपलू तहसील के ज्वाली गांव आदि के 20 अनुसूचित जाति के किसानों को मालपुरा भेड़ों में नस्ल सुधार हेतु वैज्ञानिक भेड़पालन पर पांचदिवसीय (19 से 23 फरवरी, 2024) प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया.

प्रशिक्षण कार्यक्रम का समापन मुख्य अथिति डा. जीके गौड़, सहायक महानिदेशक, पशु उत्पादन एवं प्रजनन, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली, कार्यक्रम के अध्यक्ष व निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर,प्रधान वैज्ञानिक डा. आरसी शर्मा, विभाग अध्यक्ष डा. एसएस मिश्रा, मुख्य प्रशासनिक अधिकारी इंद्रभूषण कुमार, मुख्य वित्त एवं लेखा अधिकारी राजकुमार एवं मालपुरा परियोजना के पीआई डा. पीके मलिक की मौजूदगी में किया गया.

मुख्य अथिति डा. जीके गौड़ द्वारा अपने संबोधन में सभी किसानों को वैज्ञानिक तरीके से भेड़पालन करने के लिए विभिन्न उदाहरणों से संबोधित किया.

उन्होंने आगे बताया कि भारत सरकार गांवों के किसानों को आधुनिक खेती और पशुपालन के माध्यम से ही विकसित भारत के सपने को पूरा करने के लिए हर रोज नई स्कीमें लागू कर रही है, जिस से गांवों में भी सभी तरह के संसाधनों का विकास हो.

उन्होंने यह भी बताया कि स्वच्छ वातावरण में पाला जाने वाला पशु ही सब से अच्छा मांस और उत्पाद देता है. यह वैज्ञानिक तरीके से पशुपालन करने से ही संभव है.

भेड़पालन (Sheep Rearing)

अंत मे उन्होंने कहा कि आप के उत्थान के लिए ही हम लोग काम कर रहे हैं, इसलिए आप की आर्थिक उन्नति होने पर ही हमारे कामों की सार्थकता है.

निदेशक डा. अरुण कुमार द्वारा किसानों को भेड़पालन पर उन की समस्या को सुनते हुए अपनी टीम के साथ उपयुक्त सुझाव दिया और निवेदन किया कि भेड़पालन के लिए वैज्ञानिक तरीका और मालपुरा भेड़, सिरोही नस्ल के अच्छे पशु ही पालना चाहिए, जिस से आप को अच्छा मुनाफा मिले, क्योंकि इस वातावरण मे ये पशु सर्वोत्तम है. आने वाले समय में आप का क्षेत्र मालपुरा भेड़ के उत्तम पशुओं का अन्य क्षेत्र के किसानों के लिए अच्छा पशु मिलने का केंद्र बनेगा .

उन्होंने बताया कि अभी संस्थान के पास किसानों की बहुत मांग है और आप के सहयोग के बिना मेरा संस्थान पूर्ति नहीं कर सकता.

पशु आनुवांशिकी एवं प्रजनन विभाग के अध्यक्ष डा. एसएस मिश्रा एवं मालपुरा परियोजना एनडब्लूपीएसआई के प्रधान अन्वेषक डा. पीके मलिक द्वारा समापन कार्यक्रम में पधारे अथितियों का स्वागत करते हुए परियोजना और विभाग द्वारा किए जा रहे प्रयास पर प्रकाश डालते हुए किसानों को संस्थान की बातों का प्रसार अन्य को करने का भी निवेदन किया.

कार्यक्रम के अथितियों द्वारा सभी किसानों को प्रशिक्षण प्रमाणपत्र के साथ चारा ट्राफ, लोहे की जाली, पशुपालन से जुड़े आवश्यक सामान का वितरण किया गया.

कार्यक्रम में एजीबी विभाग के वैज्ञानिक डा. नागराजन, डा. राजीव कुमार, डा. एसएमके थिरूमरान, डा. सरवणे, अमर सिंह मीना, योगीराज के साथ परियोजना की फील्ड में काम कर रहे कर्मचारी भी उपस्थित रहे.

शोध कार्य रीव्यू मीटिंग ( Research Work Review Meeting) का आयोजन

अविकानगर: केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान ( Central Sheep and Wool Research Institute), अविकानगर में संस्थान की अनुसंधान सलाहकार समिति (Research Advisory Committee )  द्वारा विभिन्न शोध कार्यों की दिशा एवं परिणाम का विस्तार से आकलन किया जा रहा है.

संस्थान के निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर द्वारा सभी एक्सपर्ट्स को संस्थान के विभिन्न सैक्टर्स भेड़बकरी एवं खरगोश पर पशुओं की उत्पादन क्षमता एवं किसानों को दी जा रही नस्लों के बारे में विस्तार से बताया गया.

संस्थान के निदेशक ने अविकानगर संस्थान द्वारा किए गए शोध, अविकानगर द्वारा किसानों को जागरूकता के लिए स्वास्थ्य शिविर, रात्रि चौपाल एवं उन्नत नस्ल के पशुओं का प्रदर्शन के लिए वितरण को संस्थान के क्षेत्र केंद्र के साथ विस्तार से प्रेजेंटेशन आरएसी टीम को दिया गया.

समिति द्वारा संस्थान की गतिविधियों का मूल्यांकन कर वर्तमान एवं भविष्य के हिसाब से आवश्यक सुझाव दिया गया.

अविकानगर संस्थान के विभिन्न विभागों और क्षेत्रीय केंद्र के विभागाध्यक्ष, प्रभारी आदि द्वारा पिछले सालों में अपने विभाग के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोध और प्रसारप्रचार के कार्यों का प्रेजेंटेशन आरएसी समिति को दिया जा रहा है.

आरएसी समिति के अध्यक्ष डा. विष्णु शर्मा संस्थान के काम को ले कर बेहद खुश नजर आए. संस्थान को भविष्य के हिसाब से भी शोध के नए क्षेत्र पर काम करने के सुझाव और पहलुओं पर निदेशक डा. अरुण कुमार और संस्थान की टीम के साथ विस्तृत चर्चा की. अविकानगर के मीडिया प्रभारी डा. अमर सिंह मीना ने जानकारी दी.

डेयरी एवं खाद्य प्रौद्योगिकी (Dairy and Food Technology) पर ट्रेनिंग

महाविद्यालय के अधिष्ठाता डा. लोकेश गुप्ता ने बताया कि विश्वविद्यालय द्वारा आम फल प्रसंस्करण यानी प्रोसैसिंग एवं खाद्य अनुपूरक के क्षेत्र में किए गए उल्लेखनीय योगदान को किसानों और उद्यमियों तक पहुंचाने के लिए डेयरी एवं खाद्य प्रौद्योगिकी महाविद्यालय और भारत सरकार के सूक्ष्म, लघु एवं मंझले उद्यम मंत्रालय के सयुंक्त तत्वावधान में 5 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया.

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य आम फल प्रसंस्करण एवं खाद्य अनुपूरक पर तकनीकी कौशल का विकास करने के साथ किसानों और उद्यमियों की पारंपरिक कार्य प्रणाली का उन्नयन करना है. साथ ही, उद्यमिता विकास के लिए संपूर्ण तकनीकी सहायता प्रदान की गई.

कौशल विकास कार्यक्रम समन्वयक डा. निकिता वधावन ने बताया कि यह महाविद्यालय का 5वां प्रशिक्षण कार्यक्रम है. इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए 21 प्रतिभागियों ने आवेदन किया था, जिस में से 16 महिलाएं हैं. इस तरह से महाविद्यालय महिला सशक्तीकरण के उद्देश्य के लिए अपना योगदान दे रहा है.

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में देश के विख्यात वैज्ञानिकों ने न केवल सैद्धांतिक, बल्कि महाविद्यालय की विश्व स्तरीय आईएसओ  प्रमाणित प्रयोगशालाओं में मार्गदर्शन प्रदान कराने के साथ ही भारत सरकार के सूक्ष्म, लघु एवं मंझले उद्यम मंत्रालय द्वारा प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र भी प्रदान किए गए, जो कि प्रतिभागियों को अपना उद्यम स्थापित करने में मददगार होगा. महाविद्यालय विगत 42 सालों से गुणवत्तापूर्ण शिक्षण प्रदान कर रहा है.

एक उद्यमी मंजू चैहान ने बताया कि भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI)  के विभिन्न मानकों को बहुत ही सरल तरीके से समझाया गया और निश्चित तौर पर यह व्याख्यान उन के उद्यम को उत्तरोत्तर प्रगतिशील करने के साथसाथ यशोवर्धनकारी साबित होगा.

आत्मविश्वास से लबरेज मीरा डूंगरी का कहना था कि यह प्रशिक्षण कार्यक्रम बेरोजगारों एवं महिलाओं को आत्मसम्मान के साथ उद्यम स्थापित करने का एक स्वर्णिम अवसर है. उन्होंने  बेरोजगारों एवं महिलाओं से ऐसे अवसर का लाभ उठाने की अपील की.

आंवले के विभिन्न उत्पाद बनाने वाले संजीवनी फूड्स की ज्योति सेन का कहना था कि आम के प्रसंस्करण यानी प्रोसैसिंग की कई तकनीकों और विधाओं के बारे में इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में जितनी सरलता से बताया गया, वह सिर्फ इसी महाविद्यालय से उम्मीद थी. उन का कहना था कि ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम हर महीने आयोजित किए जाने चाहिए.

अनुसूचित जाति के किसानों के लिए प्रशिक्षण

अविकानगर : केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान, अविकानगर में मालपुरा परियोजना के एनडब्ल्यूपीएसआई की एससीएसपी उपयोजना के अंतर्गत टोंक जिले की विभिन्न तहसीलों के गांवों के 20 अनुसूचित जाति के किसानों का पांचदिवसीय कौशल विकास हेतु भेड़बकरीपालन पर प्रशिक्षण कार्यक्रम एजीबी विभाग के प्रशिक्षण हाल में आयोजित किया गया.

इस मौके पर संस्थान के निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर, विभागाध्यक्ष डा. एसएस मिश्रा, प्रधान वैज्ञानिक डा. आरसी शर्मा, प्रशिक्षण समन्वयक डा. पीके मलिक, डा. लीला राम गुर्जर, डा. अजय कुमार आदि की उपस्थिति में ट्रेनिंग कार्यक्रम की शुरुआत की गई.

पशु आनुवंशिकी एवं प्रजनन विभाग के अध्यक्ष डा. सिद्धार्थ सारथी मिश्रा एवं डा. पीके मलिक द्वारा मालपुरा परियोजना में स्थानीय क्षेत्र के लोगों के लिए किए जा रहे कामों को विस्तार से किसानों को बताया गया.

संस्थान के निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर द्वारा भी किसानों को इस प्रशिक्षण के माध्यम से अपने पशुपालन से जुड़ी जानकारी दी गई और सभी किसानों को मालपुरा नस्ल के पशुओं के पालन के साथ अच्छी पैदावार के लिए अच्छा पशु प्रबंधन देने के लिए किसानों को उदाहरण के साथ समझाया गया, जिस से भारत सरकार के आत्मनिर्भर गांव की परिकल्पना को साकार किया जा सके.

प्रशिक्षण कार्यक्रम में अविकानगर के मीडिया प्रभारी डा. अमर सिंह मीना सहित एजीबी विभाग के समस्त वैज्ञानिक, तकनीकियों और समस्त संविदा कर्मचारी उपस्थित रहे.

बकरी के दूध से साबुन (Goat Milk Soap) बढ़ाएगा खूबसूरती

‘कोमल त्वचा का राज,’ ‘चेहरे पर ग्लो लाएं’ ‘चेहरे को खूबसूरत बनाएं’ जैसे इश्तिहारों से अखबार व दीवार अटे पड़े हैं, वहीं दूसरी ओर दुकानों पर भी साबुन के कई तरह के प्रोडक्ट देखने को मिलते हैं. पर आजकल बकरी के दूध से तैयार साबुन की मांग काफी बढ़ गई है.

बकरी का दूध केवल सेहत को ही नहीं, बल्कि सौंदर्य को भी कई तरह के फायदा पहुंचाता है. देश के कई जगहों पर तो स्वयं सहायता समूहों का गठन कर बकरी के दूध से साबुन, पनीर व दही जैसी चीजें बना कर बाजार में उतारी हैं.

केंद्रीय बकरी अनुसंधान (सीआईआरजी) ने बकरी के दूध से बने कई उत्पाद प्रदर्शनी में प्रस्तुत किए.

अनुसंधान का कहना है कि सीआईआरजी भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का एक प्रमुख शोध संस्थान है, जो बकरियों पर शोध करता है. यह संस्थान ग्रामीण महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में काम कर रहा है. वर्तमान में देश में रोजाना 50 लाख टन बकरी के दूध का उत्पादन होता है. बकरी के दूध में पाचन तत्व, मध्यम व छोटे फैटी एसिड्स और महिलाओं के दूध के समान घटक होते हैं, इसलिए यह बच्चों के लिए भी फायदेमंद है.

बकरी का दूध प्रीबायोटिक, एंेटीइंफैक्शन और ऐंटीऔक्सीडेंट से भरपूर होता है. इस में लिनोलिक एसिड, सेलेनियम, नियासिन, विटामिन ए, प्रोटीन, कैल्शियम, आयरन, मैग्नीशियम, फास्फोरस, पोटैशियम, सोडियम, जिंक और मिनरल जैसे पोषक तत्व होते हैं. यह दूध कई बीमारियों में लाभदायक होता है.

यही वजह है कि बकरी का दूध जल्दी पच जाता है, क्योंकि इस में मिलने वाला वसा काफी कम होता है. नवजात शिशुओं के लिए भी यह दूध काफी लाभदायक होता है, साथ ही साथ हड्डियों को मजबूत करता है. इस में सूजनरोधी और कैंसररोधी अवयव भी हैं. यह प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत करता है. डेंगू व चिकनगुनिया में कम होती प्लेटलेट्स को बढ़ाने में बकरी के दूध का सेवन फायदेमंद है.

कृषि ऐक्सपर्टों (Agricultural experts) ने दी किसानों को खास जानकारियां

बस्ती: उप कृषि निदेशक, बस्ती की अध्यक्षता में ‘किसान दिवस’ बैठक का आयोजन विकास भवन सभागार में किया गया, जिस में जनपद के विभिन्न विभागों के अधिकारियों एवं उन के प्रतिनिधियों के साथ ही प्रगतिशील किसानों ने प्रतिभाग किया.

किसान दिवस बैठक की कार्यवाही शुरू की गई, जिस में पिछले किसान दिवस में आई दिक्कतों के निस्तारण की स्थिति संबंधित अधिकारियों द्वारा किसानों को विस्तार से बताई गई. कृषि विज्ञान केंद्र, बंजरिया के वैज्ञानिक डा. वीबी सिंह ने बताया कि जो किसान नवाचार कर रहे हैं, उन से चर्चा जारी रहनी चाहिए.

डा. वीबी सिंह ने बताया कि जिन किसानों को केवीके से सरसों बीज प्राप्त कर बोआई की थी, उन की फसल बहुत बढ़िया है और उन के पौधे तकरीबन 6-7 फुट के हुए हैं और प्रत्येक पौधे में 7 से 8 कल्ले लग रहे हैं, जिस का उत्पादन 3 क्विंटल प्रति बीघा से अधिक होने की संभावना है.

गेहूं व सरसों में जल विलेय उर्वरक 18ः18ः18 या 19ः19ः19 प्रति एकड़ में 2 किलोग्राम छिड़काव पानी में मिला कर करें और जब गेहूं में रेड़े या दाने आना शुरू हों, तब 0-0-50-0 डालना चाहिए.

वैज्ञानिक डा. वीबी सिंह ने बताया कि गेहूं में सामान्य मिट्टी में कम से कम 3 बार सिंचाई जरूर करनी चाहिए और सरसों में हर 65 दिन पर सिंचाई करने से पैदावार बढ़ती है.

मुंडेरवा चीनी मिल के मुख्य गन्ना प्रबंधक कुलदीप द्विवेदी ने बताया कि अब तक मिल 30.29 लाख की पेराई कर चुकी है. इस वर्ष का 70 फीसदी गन्ना मूल्य भुगतान 61.86 लाख रुपए कर दिया गया है.

उप कृषि विपणन अधिकारी अजय प्रताप सिंह ने बताया कि अब तक 1.29 लाख मीट्रिक टन धान खरीद लक्ष्य के सापेक्ष 70 फीसदी यानी 9,0287.17 मीट्रिक टन की खरीद की जा चुकी है और 98.12 फीसदी भुगतान 19,320.63 लाख रुपया किसानों को भुगतान किया जा चुका है.

Farmers Day

महेंद्र कुमार मिश्रा, अधिशाषी अभियंता, विद्युत वितरण खंड 3 ने बताया कि सोलर रूफ टौफ योजना बिजली विभाग एवं उत्तर प्रदेश नेडा से संचालित है, जिस के पास विद्युत कनैक्शन है, वह इस योजना का लाभ ले सकते हैं. प्रति किलोवाट सोलर का तकरीबन 55,000 रुपए पर 18,000 रुपए केंद्र सरकार एवं 15,000 रुपए राज्य सरकार देगी. इस प्रकार प्रति किलोवाट 33,000 रुपए का अनुदान सरकार द्वारा दिया जा रहा है.

जिला कृषि रक्षा अधिकारी रतन शंकर ओझा ने किसानो से अपील की कि रसायनों का कम से कम प्रयोग करें. यदि खेती से संबंधित कोई समस्या आती है, तो कृषि विभाग द्वारा संचालित सहभागी फसल निगरानी या निदान प्रणाली जिसे पीसीएसआरएस भी कहते हैं पर फोन, व्हाट्सएप या मैसेज द्वारा समस्या का समाधान 24 से 48 घंटे की अंदर कर दिया जाता है, जिस का नंबर 9452257111 व 9452247111 है.

जिले के प्रगतिशील किसान अवघेश पांडेय ने बताया कि जंगली जानवर और चूहे आदि से बचाव के लिए किसान निम्न उपाय अपनाएं:

यदि नील गाय, सूअर, जंगली जानवर से छुटकार पाना हो, तो 5 लिटर मट्ठे में आधा किलोग्राम लहसुन पीस कर घोल बना लें और किसी एयरटाइट बरतन में 15 दिन रखने के बाद खेत में छिड़क देने से 15 से 20 दिन तक ये जानवर खेतों में नहीं आते.

वहीं अवघेश पांडेय ने बताया कि यदि चूहे फसल बरबाद कर रहे हैं, तो सुर्ती, बेसन एवं घी को आटे में मिला कर गोली बना लें और खेतों रख देने से जो भी चूहा इसे खाएगा, वह भाग जाएगा.

यदि किसान पोटाश बनाना चाहते हैं, तो 3 किलोग्राम पके बेल में 1 किलोग्राम गुड़ को 90 दिन तक एयरटाइट डब्बे में बंद करके रख दें. उस के बाद पोटाश तैयार हो जाएगा, जिस का प्रयोग कम लागत में किया जा सकता है.

अंत में उप कृषि निदेशक द्वारा उपस्थित सदस्यों व किसानों को ‘किसान दिवस’ में प्रतिभाग करने के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया और ‘किसान दिवस’ के समापन की घोषणा की गई.

अफीम (Opium) की नई किस्म ’चेतक’ विकसित

उदयपुर: 15 फरवरी, 2024. महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने परीक्षणों की लंबी प्रक्रिया के बाद अफीम की नई किस्म ’चेतक’ विकसित की है. परीक्षणों में पाया गया कि ’चेतक’ अफीम में न केवल मार्फिन, बल्कि डोडा पोस्त में भी ज्यादा उत्पादन प्राप्त होगा. अफीम की यह खास किस्म राजस्थान सहित मध्य प्रदेश व उŸार प्रदेश की जलवायु के लिए भी अति उत्तम है.

महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के अनुसंधान निदेशक, डा. अरविंद वर्मा ने बताया कि इस किस्म का विकास अखिल भारतीय औषधीय एवं सगंधीय पौध अनुसंधान परियोजना, उदयपुर के तहत डा. अमित दाधीच, पादप प्रजनक एवं परियोजना प्रभारी की टीम ने किया है.

उन के मुताबिक, औषधीय एवं सगंधीय अनुसंधान निदेशालय, बोरीयावी, आणंद, गुजरात, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली द्वारा आयोजित नरेंद्र देव कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कुमारगंज, अयोध्या, उत्तर प्रदेश में 7-9 फरवरी, 2024 को 31वीं वार्षिक समीक्षा बैठक में इस किस्म (चेतक अफीम) की पहचान भारत में अफीम की खेती करने वाले राज्य राजस्थान, मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश के लिए की गई है.

अफीम (Opium)डा. अमित दाधीच ने बताया कि यदि किसान वैज्ञानिक तकनीक को आधार मान कर ‘चेतक’ अफीम की फसल का उत्पादन करता है, तो अफीम की खेती से औसतन 58 किलोग्राम अफीम प्रति हेक्टेयर साथ ही औसत मार्फिन उपज 6.84 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक प्राप्त की जा सकती है, 10-11 क्विंटल औसत अफीम बीज प्रति हेक्टेयर एवं 9-10 क्विंटल औसत डोडा पोस्त प्रति हेक्टेयर तक प्राप्त किया जा सकता है.

इस किस्म की विशेषता है कि इस के फूल सफेद रंग के होते हंै. इस किस्म में अफीम लूना (एकत्रित) करने के लिए बोआई के 100-105 दिन के बाद चीरा लगाना चाहिए. इस किस्म में मार्फिन की मात्रा औसतन 11.99 फीसदी है. इस किस्म के बीज 135-140 दिन में पूरी तरह पक जाते हैं. किसानों के खेतों पर ‘चेतक’ अफीम का प्रथम पंक्ति प्रदर्शन में भी अच्छा प्रदर्शन रहा है.

किसानों का बढे़गा आर्थिक लाभ

महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने बताया कि प्रदेश के चित्तौडगढ़, प्रतापगढ़, उदयपुर, भीलवाड़ा, कोटा, बांरां एवं झालावाड़ जिलों में अफीम की खेती बहुतायत में की जाती है. ऐसे में ‘चेतक’ अफीम की खेती से किसानों का आर्थिक लाभ बढ़ेगा. भारत सरकार के केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो के द्वारा जारी पट््टों (लाइसैंस) के आधार पर किसानों द्वारा इस की खेती की जा रही है.

नई तकनीक व अनुसंधान क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि

महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के अखिल भारतीय औषधीय एवं संगधीय पौध अनुसंधान परियोजना को राष्ट्रीय स्तर पर श्रेष्ठ औषधीय एवं संगधीय पादप परियोजना, अनुसंधान निदेशालय केंद्र का वर्ष 2021-22 अवार्ड मिला है. डा. अरविंद वर्मा, निदेशक अनुसंधान, महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर ने बताया कि अखिल भारतीय औषधीय एवं संगधीय पौध अनुसंधान परियोजना के देश में 26 केंद्र हैं.

महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर को नई अनुसंधान तकनीकों, नए रिसर्च, किसानों को प्रशिक्षण देना एवं तकनीक को किसानों तक पहुंचाने आदि कामों के लिए यह अवार्ड दिया गया है.

श्रीअन्न (Millets) उत्पादक किसानों के लिए खास योजना

सीहोर: रानी दुर्गावती श्रीअन्न प्रोत्साहन योजना (मिलेट्स) उत्पादक किसानों के लिए खासा मददगार साबित होगी. इस से मिलेट्स (Millets) उत्पादक किसानों को अपने उत्पादों का उचित दाम मिलेगा, जिस से अन्य किसानों को मिलेट्स उत्पादन के लिए प्रोत्साहन भी मिलेगा. मुख्यमंत्री डा. मोहन यादव ने मुख्यमंत्री बनने के बाद मिलेट्स उत्पादक किसानों के हित में योजना को लागू करने का ऐतिहासिक फैसला लिया.

रानी दुर्गावती श्रीअन्न प्रोत्साहन योजना में राज्य सरकार, महासंघ द्वारा खरीद की गई कोदो, कुटकी पर किसानों को भुगतान किए गए न्यूनतम खरीद मूल्य के अतिरिक्त सहायता राशि के रूप में किसानों के खातों में 1,000 रुपए प्रति क्विंटल डायरैक्ट बैनीफिट ट्रांसफर (डीबीटी) के तहत देगी.

इस योजना के लागू होने से श्रीअन्न (मिलेट्स) उत्पादक किसानों को अधिक से अधिक लाभान्वित करने के लिए उन की क्षमता संवर्धन, कोदो, कुटकी की विशिष्ट पैकेजिंग एवं ब्रांडिंग गतिविधियों को प्रोत्साहन मिलेगा. इस से किसानों को बेहतर विपणन व्यवस्था उपलब्ध कराते हुए उत्पादों का उचित मूल्य दिलाने में सहायता मिलेगी.

योजना के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए शासन ने पूर्व से संचालित लघु धान्य प्रसंस्करण, विपणन इत्यादि कामों में संलग्न एफपीओ या समूह को महासंघ के रूप में संगठित करने के लिए मार्गदर्शी निर्देश जारी किए हैं.

योजना से श्रीअन्न उत्पादन में संलग्न किसानों, एफपीओ या समूह को राज्य स्तरीय महासंघ के रूप में संगठित कर नवीन तकनीकी के उपयोग से श्रीअन्न, विशेषकर कोदो, कुटकी एवं उस के प्रसंस्कृत उत्पादों को राष्ट्रीयअंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट पहचान स्थापित कराने में मदद मिलेगी.

इस से एफपीओ द्वारा गठित फेडरेशन के माध्यम से श्रीअन्न के लिए वैल्यू चेन विकसित करने और कोदोकुटकी की खेती में लगे किसानों की आय में वृद्धि करने में मदद मिलेगी.

श्रीअन्न कोदोकुटकी के विपणन एवं प्रसंस्करण में कार्यरत एफपीओ महासंघ गठित किया जा रहा है. यह श्रीअन्न के उपार्जन, भंडारण, प्रसंस्करण, ब्रांड बिल्डिंग एवं उत्पाद विकास आदि काम करेगा. कंपनी अधिनियम 2013 के अंतर्गत कंपनी के रूप में महासंघ का गठन होगा.

योजना के लाभार्थी एफपीओ फेडरेशन के सदस्य होंगे. ये ही सामान्य सभा के सदस्य भी होंगे एवं रोटेशन प्रणाली के आधार पर इन के द्वारा संचालक मंडल के संचालकों एवं अध्यक्ष का चुनाव किया जाएगा. नवीन एफपीओ को महासंघ में शामिल करने में बोर्ड का निर्णय अंतिम रहेगा.

योजना के क्रियान्वयन की नोडल संस्था किसान कल्याण एवं कृषि विकास को बनाया गया है. मौनीटरिंग व्यवस्था को पुख्ता करने के लिए विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को जिम्मेदारी सौंपी गई है.

इस से योजना के क्रियान्वयन की उच्चतम स्तर पर बेहतरीन मौनीटरिंग और समीक्षा होगी. इस से योजना के स्टेक होल्डर्स को लाभान्वित करने की प्रक्रिया में आने वाली दिक्कतों का निराकरण किया जाएगा और उन्हें अधिक से अधिक लाभ प्रदान किया जा सकेगा.

सरसों (Mustard) उत्पादन में राजस्थान पहले नंबर पर

जयपुर: राजस्थान कृषि अनुसंधान संस्थान, दुर्गापुरा में कर्ण नरेंद्र कृषि विश्वविद्यालय द्वारा 5वें ब्रासिका सम्मेलन का सरसों अनुसंधान समिति के सहयोग से आयोजन शुरू हुआ. तीनदिवसीय सम्मेलन का आरंभ कृषि मंत्री डा. किरोड़ी लाल मीणा ने किया.

कृषि मंत्री डा. किरोड़ी लाल मीणा ने कहा कि राजस्थान सरसों उत्पादन में प्रथम स्थान पर है और राजस्थान के पूर्वी जिलों में सर्वाधिक सरसों उत्पादन होता है. उन्होंने बताया कि राजस्थान उच्च गुणवत्ता की सरसों का उत्पादक राज्य है, फिर भी इतनी पैदावार होने के बाद भी सरसों का आयात करना पड़ता है, क्योंकि आईसीएआर के अनुसार, पहले तेल की प्रति व्यक्ति उपभोग दर 8 किलोग्राम थी और वर्तमान में उपभोग दर बढ़ कर 19 किलोग्राम हो गई है, इसलिए प्रति व्यक्ति उपभोग दर बढ़ने से कमी का सामना करना पड़ रहा है.

उन्होंने आगे कहा कि प्रधानमंत्री मोदी देश को आत्मनिर्भर बनाने पर जोर दे रहे हैं, इसलिए हमें भी आत्मनिर्भर होने के लिए काम करने की जरूरत है. उन्होंने वैज्ञानिकों से विचारविमर्श करते हुए कहा कि हमें सरसों में प्राकृतिक आपदा और चेंपा जैसी समस्याओं के समाधान के लिए तकनीकी ईजाद करनी चाहिए.

विश्वविद्यालय के कुलपति डा. बलराज सिंह ने बताया कि राजस्थान सरसों उत्पादन का मुख्य राज्य है, जिस में पैदावार की अपार संभावनाएं हैं, जिस पर हमें काम करने की जरूरत है, वहीं एफिड की समस्या के अतिरिक्त वातावरण परिवर्तन की अनेक समस्याओं के साथसाथ बीमारियों की समस्याएं भी सरसों की पैदावार घटाने में अहम हैं, जिस पर हमें ध्यान देूने की जरूरत है. राजस्थान के कई जिले अन्य तिलहन फसलों के उत्पादक हैं. सरसों व तारामीरा तेल उत्पादन के साथसाथ शहद उत्पादन में भी मुख्य भूमिका निभाते हैं.

उन्होंने यह भी कहा कि कृषि अनुसंधान संस्थान, दुर्गापुरा में अखिल भारतीय गेहूं सुधार परियोजना के तहत कई किस्में विकसित की गई हं,ै जिन में राज 3077 सब से पुरानी किस्म है और जौ में माल्टिंग प्रयोग, दोहरे प्रयोग की किस्में और चारे के लिए प्रयोग की किस्में विकसित की गई हैं. साथ ही, खाद्य प्रयोग के लिए प्रयुक्त जौ पर काम किया जा रहा है, जो मधुमेह के मरीजों के लिए लाभदायक होता है.

इस दौरान सारांश पुस्तिका एवं डा. मनोहर राम एवं अन्य वैज्ञानिकों द्वारा लिखी गई सरसों एवं तारामीरा के इतिहास पुस्तिका का विमोचन किया गया. सम्मेलन में देशभर से आए तकरीबन 176 वैज्ञानिकों ने शिरकत की. सम्मेलन के विशिष्ट अतिथि के तौर पर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्व महानिदेशक डा. त्रिलोचन महापात्र भी उपस्थित रहे.

रबी फसल के मिलेंगे सही दाम, करें फसल पंजीयन (Crop Registration)

विदिशा: भारत सरकार की प्राइज सपोर्ट स्कीम के अंतर्गत रबी वर्ष 2023-24 (विपणन वर्ष 2024-25) के लिए ई-उपार्जन पोर्टल पर चना, मसूर, सरसों के लिए पंजीयन कार्यवाही 20 फरवरी से शुरू होगी और 10 मार्च तक जारी रहेगी. कलक्टर उमा शंकर भार्गव ने बताया कि विदिशा जिले में गेहूं का पंजीयन कार्य जिन केंद्रों पर किया जा रहा है, उन केंद्रों पर चना, मसूर, सरसों का भी पंजीयन कार्य किया जाएगा. इस प्रकार जिले में 123 पंजीयन केंद्रों पर गेहूं, चना, सरसांे, मसूर का पंजीयन कार्य निर्धारित तिथियों तक किया जाएगा.

किसान कल्याण एवं कृषि विकास विभाग के उपसंचालक केएस खपडिया ने बताया कि पंजीयन की निःशुल्क व्यवस्था के तहत स्वयं के मोबाइल एमपीकिसान एप के माध्यम से ग्राम पंचायत, जनपद पंचायत, तहसील कार्यालयों में स्थापित सुविधा केंद्रों एवं पूर्व वर्ष की भांति सहकारी समितियों द्वारा (सिकमी, बंटाईदार, कोटवार एवं वन पट्टाधारी किसान के पंजीयन की सुविधा केवल सहकारी समिति एवं विपणन सहकारी संस्था स्तर पर स्थापित पंजीयन केंद्रों पर उपलब्ध होगी) पंजीयन सशुल्क 50 रुपए दे कर एमपी औनलाइन कियोस्क, लोक सेवा केंद्रों, कौमन सर्विस सैंटर कियोस्क पर, निजी व्यक्तियों द्वारा संचालित साइबर कैफे पर भी सशुल्क पंजीयन करा सकेंगे.

कृषि विभाग द्वारा जिले के किसानों से अपील की गई है कि अपनी उपज का पंजीयन कराने से पहले आधारकार्ड नंबर से बैंक खाता एवं मोबाइल नंबर को लिंक अवश्य करा लें. विस्तृत जानकारी के लिए कंट्रोल रूम संचालित किया जा रहा है, जिस का टैलीफोन नंबर 07592-233153 पर संपर्क कर समाधान प्राप्त कर सकते हैं.