Water Management : विकसित भारत के लिए सतत जल प्रबंधन

Water Management: भारत की प्राथमिक क्षेत्र ‘कृषि’ को रीढ़’ कहा जाता है, क्योंकि यह खाद्य और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करता है और किसानों व कृषि मजदूरों के रूप में लगभग 54 फीसदी कार्यबल प्रदान करता है. यह जान कर खुशी होती है कि भारतीय कृषि ने अपनी स्वतंत्रता के बाद से पिछले 78 सालों के दौरान पोषक तत्वों, जल उपयोग दक्षता व फसल उत्पादकता के बारे में महत्वपूर्ण परिवर्तन किया है, जिस का श्रेय भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों के शोधकर्ताओं द्वारा विकसित वैज्ञानिक उन्नत प्रबंधन प्रौद्योगिकियों को दिया जा सकता है.

यद्यपि, इस क्षेत्र को जलवायु संबंधित प्राकृतिक आपदाओं, मृदा और जल संसाधनों के घटते आधार, छोटी भूमि क्षेत्रों, मृदा और जल प्रदूषण आदि के रूप में अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. इसलिए हमें अमृत काल 1947 तक विकसित भारत के लिए प्रस्तावित उद्देश्यों को पूरा करने के लिए जलवायु अनुकूल और सतत जल प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है.

इस अवधि के दौरान भारत 550 मिलियन टन खाद्यान्न उत्पादन हासिल करने का लक्ष्य ले कर चल रहा है. इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हमें कुशल जल संसाधन प्रबंधन और जल उपयोग दक्षता बढ़ाने के दोहरे उद्देश्यों के साथ बहुआयामी प्रबंधन योजना पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है.

‘ग्लेशियर संरक्षण : विश्व जल दिवस-2025 का विषय जैसा कि हम 22 मार्च, 2025 को ‘विश्व जल दिवस’ मना रहे हैं, हम अपना ध्यान इस के केंद्रीय विषय यानी ग्लेशियर संरक्षण पर केंद्रित करेंगे.

भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वे की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय हिमालय में लगभग 9,575 ग्लेशियर मौजूद हैं. ग्लेशियर काफी मात्रा में मीठे पानी का भंडारण करते हैं और उन्हें धीरेधीरे छोड़ते हैं, जो मानव जाति के लिए बहुपयोगी है. वे पृथ्वी की जलवायु को संतुलित और विनियमित करने, जैव विविधता को बनाए रखने, कृषि, पीने के लिए साफ पानी और बिजली उत्पादन के लिए जल संसाधन प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

यद्यपि, इन ग्लेशियरों को जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के रूप में गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. परिणामस्वरूप, भारत के हिमालयी क्षेत्र सहित पूरे विश्व में इन के गलने की उच्च दर देखी जा रही है. इस से हिमनद झीलों का विस्तार होगा, जिस से नीचे की ओर विनाशकारी बाढ़ आ सकती है.

इस के अलावा ग्लेशियर की मात्रा में कमी के चलते कृषि क्षेत्र को जल संसाधनों में गिरावट का सामना करना पड़ेगा. इसलिए, हमें इस मूल्यवान प्राकृतिक संसाधन को संरक्षित करने की जरूरत है.

सतत जल प्रबंधन एक उपाय

फसल उत्पादन के लिए जल जरूरी है. सिंचाई के लिए बढ़ते जल संसाधनों ने खाद्यान्न उत्पादन में तेजी लाने में काफी योगदान दिया है. देश में शुद्ध बोआई क्षेत्र के 141 मिलियन हेक्टेयर में से शुद्ध सिंचित क्षेत्र लगभग 78 मिलियन हेक्टेयर (55 फीसदी) है और शेष 63 मिलियन हेक्टेयर (45 फीसदी ) वर्षा सिंचित क्षेत्र के अंतर्गत है.

वर्तमान में भारत में 112.2 मिलियन हेक्टेयर सकल सिंचित क्षेत्र है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (साल 2015) के विजन 2050 दस्तावेज के अनुसार, 1498 (बीसीएम) की अनुमानित कुल जल मांग की तुलना में उपलब्ध आपूर्ति केवल 1121 बिलियन क्यूबिक मीटर (बीसीएम) है.

ग्लेशियर पिघलने के कारण कृषि के लिए पानी की उपलब्धता में कमी की पृष्ठभूमि में एकीकृत जल प्रबंधन कार्य योजना पर ध्यान देने की जरूरत है. घरेलू, औद्योगिक और ऊर्जा क्षेत्रों में अतिरिक्त जल की मांग के लिए साल 2050 तक अतिरिक्त 222 बीसीएम पानी की जरूरत होगी. नतीजतन, भारत में कृषि में सिंचाई क्षेत्र में उपयोग किए जाने वाला पानी वर्तमान में 80 फीसदी से घट कर साल 2050 तक 74 फीसदी होने की उम्मीद है.

उभरते परिदृश्यों को देखते हुए अब चुनौती जल की प्रति इकाई मात्रा में अधिक फसल का उत्पादन करना है. भाकृअनुप-राष्ट्रीय कृषि अर्थशास्त्र और नीति अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2050 तक कृषि के लिए संसाधनों की उपलब्धता, खाद्य मांग में वृद्धि की तुलना में धीमी दर से बढ़ेगी और इसलिए कृषि उत्पादों की भविष्य की मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बनाने के लिए हमें साल 2050 तक जल उत्पादकता में दोगुना वृद्धि करने की जरूरत है.

साल 2047 तक विकसित भारत के उद्देश्य को पूरा करने की दिशा में कम होते जल संसाधनों से 550 मिलियन टन खाद्यान्न उत्पादन के परिदृश्य के तहत हमें अमृत काल (2047) तक कृषि में अपनी सिंचाई दक्षता को 38 फीसदी से 65 फीसदी तक सुधारने के लिए सतत और जलवायु अनुकूल जल प्रबंधन कार्ययोजना निष्पादित करनी होगी.

जल निकायों के पुनरुद्धार के माध्यम से प्रति व्यक्ति जल भंडारण में वृद्धि 2050 तक भारत की आबादी 1.67 बिलियन होने की संभावना है, जिस के परिणामस्वरूप जल, भोजन और ऊर्जा की मांग में वृद्धि होगी. व्यापक बांध निर्माण गतिविधियों के रूप में भारत सरकार द्वारा की गई पहलों के कारण, भारत में बड़े बांधों (जलाशयों) की कुल संख्या 5264 के आंकड़े को पार कर चुकी है. इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता 171.1 बीसीएम है, जो इन जलाशयों की कुल संग्रहण क्षमता का लगभग 66.36 फीसदी यानी 257.8 बीसीएम है. यद्यपि, भारत के प्रति व्यक्ति भंडारण को 190 क्यूबिक मीटर प्रति व्यक्ति के वर्तमान स्तर से सुधारने की आवश्यकता है.

एक प्रमुख चिंता जलाशयों में अवसादन है, जो भंडारण क्षमता को काफी कम कर देता है. भंडारण क्षमता बढ़ाने के लिए, अपस्ट्रीम और डाउनस्ट्रीम दोनों क्षेत्रों की आवश्यकताओं पर विचार करते हुए जलाशय नियंत्रण प्रणाली को मजबूत किया जाना चाहिए. वर्षा जल संचयन संरचनाओं के माध्यम से जल भंडारण बुनियादी ढांचे का निर्माण महत्वपूर्ण है और भारत सरकार का अमृत सरोवर मिशन जिसे वर्ष 2022 में शुरू किया गया था, उस के द्वारा 68,000 से अधिक जल निकायों का निर्माण या नवीनीकरण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

हमें उच्च जल उपयोग दक्षता प्राप्त करने के लिए उपलब्ध जल संसाधनों से मेल खाते हुए उपयुक्त फसल पैटर्न तैयार करने की आवश्यकता है. चावल और गन्ने जैसी जल गहन फसलों से दलहन और तिलहन जैसी कम जल मांग वाली फसलों को चरणबद्ध तरीके से फसल विविधीकरण कर बड़े क्षेत्र में फसलों की खेती करने की आवश्यकता है, जिस से कि अधिक से अधिक संख्या में छोटे और सीमांत किसान लाभान्वित होंगे.

हालांकि, फसल विविधीकरण योजना वर्षा, मिट्टी के प्रकार, जल के अंतर, मौजूदा फसल उत्पादकता और किसानों की शुद्ध आय पर विचार करते हुए एक सूचकांक पर आधारित होनी चाहिए.

सूक्ष्म सिंचाई और सुनियोजित जल प्रबंधन की जरूरत

भारत में सूक्ष्म सिंचाई के तहत 3.1 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र (साल 1992) से बढ़ कर 16.7 मिलियन हेक्टेयर (साल 2023) हो गया है. यद्यपि, सूक्ष्म सिंचाई की सांद्रता कुछ ही राज्यों में है और हमें इसे अन्य राज्यों में भी बढ़ावा देने की आवश्यकता है, जहां संभावनाएं मौजूद हैं. भारत के 5 राज्य कर्नाटक (2.42 मिलियन हेक्टेयर), राजस्थान (2.09 मिलियन हेक्टेयर), महाराष्ट्र (2.03 मिलियन हेक्टेयर), आंध्र प्रदेश (1.92 मिलियन हेक्टेयर) और गुजरात (1.70 मिलियन हेक्टेयर) मिल कर सूक्ष्म सिंचाई में लगभग 70 फीसदी  (10.16 मिलियन हेक्टेयर) का योगदान करते हैं. अमृत काल 2047 तक सूक्ष्म सिंचाई के तहत इष्टतम क्षेत्र प्राप्त करने के लिए, विभिन्न समितियों द्वारा सुझाए गए सभी संभावित राज्यों में सिंचाई के बुनियादी ढांचे का विस्तार करने के प्रयास किए जाने चाहिए.

हमें सुनियोजित/सटीक सिंचाई प्रणाली पर भी ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है, जो सही समय पर और सही तरीके से पौधे को इष्टतम मात्रा में जल आपूर्ति को सुनिश्चित करता है. यह परिवर्तनीय दर सिंचाई के माध्यम से जल तनाव के संदर्भ में भूमि के विषमता कारक को भी संबोधित करता है. सूचना प्रौद्योगिकी, मशीन लर्निंग, भौगोलिक स्थिति प्रणाली (जीपीएस), भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस), ड्रोन आधारित निगरानी और स्वचालन में आधुनिक विकास के आगमन के साथ, आईओटी सक्षम सटीक सिंचाई प्रणाली अब और अधिक मजबूत हो गई है.

हाल की प्रगति ने सतह और भूजल सिंचाई दोनों में स्वचालन के अनुप्रयोग की सुविधा प्रदान की है, जो अधिकतम जल उपयोग दक्षता के लक्ष्य को प्राप्त करने में सहायता करता है. जल प्रौद्योगिकी केंद्र, भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित मृदा नमी सैंसर आधारित स्वचालित बेसिन सिंचाई प्रणाली में 3 मुख्य इकाइयां शामिल हैं : एक संवेदन इकाई, एक संचार इकाई और एक नियंत्रण इकाई है और यह गेहूं में पारंपरिक मैन्युअल रूप से नियंत्रित प्रणाली की तुलना में 25 फीसदी पानी की बचत में मदद करता है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा प्रदान की गई तकनीकी सहायता से राष्ट्रीय जल मिशन द्वारा विकसित राज्य विशिष्ट जल प्रबंधन कार्ययोजनाओं को भारतीय कृषि की जीत सुनिश्चित करने के लिए कार्यान्वित किए जाने की आवश्यकता है. ये योजनाएं संबंधित राज्यों में कृषि पारिस्थितिक स्थितियों और जल संसाधन उपलब्धता और फसल जल की मांग को देखते हुए तैयार की गई हैं.

कुलमिला कर, सभी हितधारकों की सक्रिय भागीदारी के साथ सतत और जलवायु अनुकूल जल प्रबंधन को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है. समय की मांग है कि संस्थागत और तकनीकी दोनों हस्तक्षेपों को एकीकृत किया जाए और जल और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के उद्देश्य को पूरा करने के लिए किसानों के खेतों में अच्छी तरह से सिद्ध औन फार्म जल प्रबंधन प्रौद्योगिकियों को बढ़ाया जाए, जिस से अमृत काल 2047 तक विकसित भारत के उद्देश्य को पूरा किया जा सके.

Training : किसानों ने लिया बीज उत्पादन प्रशिक्षण

Training |  मधेपुरा, बिहार से आए 40 किसानों ने भाकृअनुप-राष्ट्रीय बीज विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान, कुशमौर, मऊ में आयोजित 18 मार्च से 22 मार्च, 2025 तक चलने वाले 5 दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम में भाग लिया. डा. संजय कुमार, निदेशक के मार्गदर्शन में ‘खेतीय फसलों और सब्जियों में गुणवत्तायुक्त बीज उत्पादन’ विषय पर आधारित इस कार्यक्रम की शुरुआत 18 मार्च, 2025 को हुई.

इस कार्यक्रम का संचालन संस्थान के प्रधान वैज्ञानिक डा. अंजनी कुमार सिंह की अध्यक्षता में हुआ. कार्यक्रम में भाग ले रहे किसानों ने अपना परिचय देते हुए बताया कि मधेपुरा, बिहार में विभिन्न खाद्यान्न फसलों के साथ मक्का, केला, पपीता और सब्जियों की खेती भी की जाती है.

प्रधान वैज्ञानिक डा. अंजनी कुमार सिंह ने  मधेपुरा से आए किसानों से कहा कि किसानों को फसलों की नई किस्मों की खेती करनी चाहिए, न कि पुराने किस्मों पर ही निर्भर रहना चाहिए. बीज बाजार में बीजों की अत्यधिक मांग के अनुपात में अपेक्षाकृत कम आपूर्ति को देखते हुए यह जरूरी है कि  किसान को स्वयं बीज उत्पादित करना चाहिए.

उन्होंने संस्थान की उपलब्धियों के बारे में जानकारी देते हुए किसानों को प्रशिक्षण कार्यक्रम के लिए शुभकामनाएं दीं. इस  कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. कल्याणी कुमारी  ने बीज प्रमाणीकरण में शामिल प्रक्रियाएं, महत्वपूर्ण फसलों के प्रक्षेत्र और बीज मानक से संबंधित जानकारी किसानों को दी. साथ ही, बीज प्रयोगशाला में उस विषय पर व्यावहारिक सत्र भी आयोजित किया.

वैज्ञानिक डा. विनेश बनोथ ने किसानों को प्रमुख फसलों में संकर बीज उत्पादन प्रौद्योगिकी के बारे में बताया. प्रशिक्षण कार्यक्रम का समन्वयन डा. अंजनी कुमार सिंह, डा. आलोक कुमार, डा. पवित्रा वी. एवं पी. शिवम्मा कर रहे थे.

Mobile App : मत्स्यपालन मोबाइल ऐप शुरू, मत्स्यपालकों को होगा फायदा

Mobile App|  मत्स्यपालन विभाग, मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय ने मत्स्यपालन क्षेत्र में नवाचार और विकास को बढ़ावा देने के लिए हैदराबाद, तेलंगाना में बीते दिनों 8 मार्च, 2025 को मत्स्यपालन स्टार्टअप कौन्क्लेव 2.0 का आयोजन किया.

इस कार्यक्रम में राजीव रंजन सिंह, केंद्रीय मंत्री, मत्स्यपालन, पशुपालन, डेयरी और पंचायती राज मंत्रालय, प्रोफैसर एसपी सिंह बघेल, राज्य मंत्री, मत्स्यपालन, पशुपालन, डेयरी और पंचायती राज मंत्रालय भी शामिल हुए.

कार्यक्रम में भारत सरकार के मत्स्यपालन विभाग के सचिव डा. अभिलक्ष लिखी के साथसाथ प्रो. रमेश चंद, सदस्य, नीति आयोग, भारत सरकार और श्याम सिंह राणा, मत्स्यपालन मंत्री, हरियाणा भी शामिल हुए.

कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने राष्ट्रीय मत्स्यपालन डिजिटल प्लेटफौर्म मोबाइल ऐप्लीकेशन लौंच किया. गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध यह ऐप स्टार्टअप्स को विभिन्न मौड्यूल और योजना के लाभों तक पहुंचने के लिए एक सहज इंटरफेस प्रदान करेगा.

इस के अलावा केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने मत्स्यपालन और संबद्ध क्षेत्रों में तकनीकी प्रगति को बढ़ावा देने के लिए 1 करोड़ रुपए की निर्धारित निधि के साथ मत्स्यपालन स्टार्टअप ग्रैंड चैलेंज 2.0 का भी अनावरण किया. 10 विजेता स्टार्टअप को मत्स्यपालन और जलीय कृषि में उत्पादन दक्षता और स्थिरता बढ़ाने के लिए अभिनव समाधान विकसित करने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन सहायता प्राप्त होगी.

मंत्री राजीव रंजन सिंह ने कहा कि मत्स्यपालन क्षेत्र के विकास और भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए स्टार्टअप की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है. स्टार्टअप विशेष रूप से युवाओं के लिए रोजगार में मददगार होते हैं, इसलिए भारत सरकार हर संभव तरीके से स्टार्टअप का समर्थन करने के लिए प्रतिबद्ध है.

इस अवसर पर उन्होंने स्टार्टअप से आगे बढ़ कर निर्यात बढ़ाने के लिए मूल्य संवर्धन, उन्नत प्रौद्योगिकी समाधान, टूना क्षमता का उपयोग करने के लिए अंडमान एवं निकोबार और लक्षद्वीप के द्वीप विकास, औनबोर्ड प्रसंस्करण इकाइयों के साथ उच्च समुद्र और गहरे समुद्र में मछली पकड़ने के लिए जहाजों के उन्नयन आदि के क्षेत्रों में योगदान देने का आग्रह किया.

केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने स्टार्टअप्स को मत्स्यपालन स्टार्टअप ग्रैंड चैलेंज 2.0 में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया, जिस का उद्देश्य स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देना और इस क्षेत्र में तकनीकी नवाचारों को बढ़ावा देना है.

Mobile App

उन्होंने स्टार्टअप्स से मत्स्यपालन अवसंरचना विकास कोष और प्रधानमंत्री मत्स्य किसान समृद्धि सहयोजना जैसी सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने का भी आग्रह किया, ताकि उन की वृद्धि और विकास को समर्थन मिल सके.

इस कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने जलीय कृषि, मूल्य श्रृंखला आधुनिकीकरण और टिकाऊ मत्स्यपालन में उन की परियोजनाओं को मान्यता देने के लिए 33.46 करोड़ रुपए की कुल परियोजना लागत के साथ 8 चयनित मत्स्यपालन स्टार्टअप/ उद्यमी/ एफएफपीओ को पीएमएमएसवाई के तहत उद्यमी मौडल स्वीकृति मिली.

पुरस्कार विजेताओं में मध्य प्रदेश के संतोख सिंह व अवतार सिंह को मीठे पानी की मछली की खेती के लिए, नए ग्रोआउट तालाब और बायोफ्लोक टैंक बनाने के लिए, ओडिशा के एमआर एक्वाटैक को एफआरपी कार्प हैचरी, पानी की टंकी, नाव और मछलीघर टैंकों के बनाने के लिए, उत्तर प्रदेश की पीवीआर एक्वा प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड को कार्प मछली की खेती और जीवित मछली की बिक्री के लिए, गुजरात के कृष्ण नरेशभाई धिम्मर को एकीकृत मत्स्य प्रवाह के लिए, छत्तीसगढ़ के मैसर्स मंडल मनीत एक्वा जेनेटिक्स टैक्नोलौजी रिसर्च प्राइवेट लिमिटेड को तिलापिया (ओरियोक्रोमिस निलोटिकस) के लिए आनुवंशिक सुधार केंद्र की स्थापना के लिए, गुजरात के मेसर्स औस्को इंडिया मरीन प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड को पारंपरिक झींगापालन को एक टिकाऊ सुपर गहन परिशुद्धता खेती मौडल में बदलने के लिए, आंध्र प्रदेश की विनीशा वलसराज को रोगजनक मुक्त रेत के कीड़ों के उत्पादन के लिए और महाराष्ट्र के मैसर्स संजीवनी मत्स्य विकास सोसाइटी शामिल हैं.

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी और पंचायती राज राज्य मंत्री प्रो. एसपी सिंह बघेल ने सभी महिला उद्यमियों को आगे आने और 300 से अधिक मत्स्यपालन स्टार्टअप इकोसिस्टम का एक अभिन्न अंग बनने के लिए प्रोत्साहित किया.

इस कार्यक्रम में नीति आयोग के सदस्य प्रो. रमेश चंद ने स्टार्टअप को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि आने वाला भविष्य विचारों और प्रौद्योगिकी व्यवधानों से प्रेरित होगा. उन्होंने स्टार्टअप से प्रसंस्कृत मछली के निर्यात को बढ़ावा देने, आपूर्ति श्रृंखला को सही करने, उपभोक्ताओं के लिए लागत कम करने और उत्पादक राजस्व बढ़ाने के लिए मूल्य संवर्धन पर ध्यान केंद्रित करने का आग्रह किया.

मत्स्य विभाग के सचिव डा. अभिलक्ष लिखी ने मत्स्यपालन स्टार्टअप को बढ़ावा देने के लिए सरकार के प्रयासों पर जोर दिया. उन्होंने उभरती प्रौद्योगिकियों के बारे में जागरूकता लाने के लिए मत्स्य मंथन श्रृंखला में स्टार्टअप की भागीदारी की तारीफ की.

उन्होंने शोध संस्थानों से आग्रह किया कि वे नवाचारों का व्यवसायीकरण करें और सभी स्टार्टअप्स को बढ़ावा दें, जिन में प्रारंभिक चरण में या अप्रमाणित स्टार्टअप्स भी शामिल हैं. आईसीएआर सीआईएफटी के निदेशक जौर्ज निनान ने अपने 8 शोध संस्थानों के माध्यम से लाइसैंसिंग, इनक्यूबेशन, प्रोटोटाइपिंग और व्यावसायीकरण में स्टार्टअप के लिए आईसीएआर के समर्थन पर प्रकाश डाला.

मुख्य केंद्र बिंदु वाले क्षेत्रों में मछली प्रसंस्करण उपकरण, सौर ऊर्जा से चलने वाली नावें, मूल्य संवर्धन, मछली पकड़ने का सामान, जलवायु स्मार्ट जलीय कृषि, पोषक तत्वों से भरपूर फीड और नैनो प्रौद्योगिकी उपयोग शामिल हैं.

Water Productivity : खेती में पानी की उत्पादकता बढ़ाने पर प्रशिक्षण

Water Productivity| पानी की कमी को ले कर बीते 3 मार्च, 2025 को महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के अनुसंधान निदेशालय द्वारा संचालित अखिल भारतीय समन्वित सिंचाई जल प्रबंधन अनुसंधान परियोजना के अंतर्गत कृषि अनुसंधान उपकेंद्र, वल्लभनगर पर खेती में पानी की उत्पादकता बढ़ाने के लिए 2 दिवसीय किसान प्रशिक्षण का शुभारंभ केंद्र के प्रभारी अधिकारी एवं परियोजना अधिकारी प्रोफैसर केके यादव ने किया.

प्रोफैसर केके यादव ने ‘फव्वारा पद्वति से सिंचाई’ विषय पर किसानों को सिंचाई जल की बचत करते हुए फसलों की पैदावर बढ़ाने के तरीकों पर विस्तृत जानकारी दी. कृषि महाविद्यालय, उदयपुर के उद्यानिकी प्रोफैसर श्रीधर सिंह लखावत ने ‘फलदार पौधों में ड्रिप पद्यति से सिंचाई’ विषय पर किसानों को जानकारी दी एवं गरमी के मौसम में फलदार पौधो में सिंचाई जल की आवश्यकता एवं उन के रखरखाव पर प्रकाश डाला.

प्रौद्योगिकी एवं अभियांत्रिकी महाविद्यालय, उदयपुर के तकनीकी सहायक दामिनी आर्य ने सिंचाई जल की प्रयोगशाला जांच करवाने पर अपने विचार व्यक्त किए. कार्यक्रम के अंत में केंद्र के फार्म मैनेजर धनपाल कोठारी, मनीश उज्ज्वल, सेवानिवृत्त कृषि अधिकारी नाथुलाल कुम्हार ने भी सिंचाई जल प्रबंधन पर अपने विचार रखे.

Jiji Bai : बाड़मेर की ‘जीजी बाई’ ने बनाई ग्लोबल पहचान

Jiji Bai| : थार रेगिस्तान को दुनिया के औयल मैप पर लाने वाले बाड़मेर के तेल क्षेत्रों के नाम अब एक और उपलब्धि जुड़ गई है. यहां के औयल फील्ड्स के सुदूर गांवों में बसी महिलाएं अपने कौशल से देशविदेश में जानी जा रही हैं. इसी कड़ी में अब जीजी बाई स्वयं सहायता समूह का नाम जुड़ गया है. उन के द्वारा बाड़मेर में तैयार मिलेट कुकीज यानी बाजरे के बिसकुट्स अब लंदन तक प्रसिद्ध हो चुके हैं.

‘विश्व महिला दिवस’ की पूर्व संध्या पर जीजी बाई कुकीज को ग्लोबल मार्केट से जोड़ने के लिए क्यूआर कोड मार्केटिंग की शुरुआत मंगला प्रोसैसिंग टर्मिनल के ली कैफे से की गई.

जीजी बाई के उत्पादों की सफलता को देखते हुए उन्हें हाल में दिल्ली में आयोजित इंडिया एनर्जी वीक में केयर्न, वेदांता के प्रदर्शनी स्थल में शामिल किया गया था. वहां उन के कौशल की तारीफ हुई और लोगों ने उन के बनाए उत्पादों को खूब पसंद किया. उन की सफलता की कहानियां अब देश के दूसरे क्षेत्रों में लोगों के लिए प्रेरणा बन रही हैं.

भारत की डायरेक्टर जनरल हाइड्रोकार्बन डा. पल्लवी जैन गोविल ने जीजी बाई के कार्यों की तारीफ करते हुए उन्हें दिल्ली भ्रमण का न्योता दिया.

इस से पूर्व जयपुर में हुए जयगढ़ फैस्टिवल और जयपुर लिटरेचर फैस्टिवल में भी जीजी बाई स्वयं समूह ने विदेशी मेहमानों की भरपूर प्रशंसा बटोरी. उन्हें अब लंदन स्थित प्रशंसकों से और्डर मिलने शुरू हो गए हैं.

बाड़मेर की इन महिलाओं का कौशल सिर्फ मिलेट कुकीज तक ही सीमित नहीं है, बल्कि डेयरी और कृषि क्षेत्र में भी उन्होंने अपनी अलग जगह बनाई है. ब्रह्माणी सेल्फ हेल्प ग्रुप के अंतर्गत बनी डेयरी प्रोडक्ट्स और हस्तशिल्प वस्तुएं लोगों को खूब पसंद आ रही हैं. केयर्न एंटरप्राइज सैंटर से बैंकिंग, ब्यूटीशियन, ग्रूमिंग आदि स्किल्स निखार कर वे आत्मनिर्भर बनी हैं और अपने कौशल से गांव का नाम रोशन कर रही हैं.

International Women’s Day : कृषि महिला सशक्तीकरण के लिए प्रशिक्षण

International Women’s Day| भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR-IARI), नई दिल्ली ने उन्नत भारत अभियान और नई विस्तार पद्धतियों और दृष्टिकोण परियोजनाओं के तहत बीते 8 मार्च, 2025 को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने और कृषि महिला सशक्तीकरण में तेजी लाने के लिए कृषि महिलाओं के लिए प्रशिक्षण सहप्रायोगिक खेत में क्षेत्र भ्रमण आयोजित किया.

इस कार्यक्रम में कृषि में महिलाओं के योगदान और टिकाऊ खेती के तरीकों में उन की भागीदारी बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा करने के लिए प्रतिष्ठित वैज्ञानिक, विशेषज्ञ और हितधारक एकसाथ आए.

इस कार्यक्रम में उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले और उत्तराखंड के रुद्रपयाग जिले की महिला किसानों के साथसाथ आईएआरआई के वैज्ञानिकों और छात्रों सहित 75 से अधिक प्रतिभागियों ने भाग लिया.

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के महत्व के साथसाथ नेमा, उन्नत भारत अभियान, फार्मर्स फर्स्ट, मौडल विलेज और आईएआरआई स्वैच्छिक संगठन आधारित साझेदारी कार्यक्रम जैसी विभिन्न परियोजनाओं के माध्यम से महिला सशक्तीकरण की दिशा में आईएआरआई के प्रयासों पर प्रकाश डाला गया.

वाणिज्यिक फूलों की खेती, एकीकृत फार्मिंग प्रणाली, संरक्षित खेती, पोषण और महिला सशक्तीकरण, पोषण हस्तक्षेप के साथसाथ फसल विविधीकरण के माध्यम से आय और रोजगार सृजन के प्रमुख मुद्दों पर भी चर्चा की गई. महिला किसानों और प्रतिनिधियों ने कृषि क्षेत्र में अपने अनुभव और योगदान साझा किए.

संयुक्त निदेशक (प्रसार) डा. आरएन पडारिया ने प्रौद्योगिकी और संस्थागत नवाचारों के माध्यम से महिला सशक्तीकरण पर विचार रखे और कृषि में लैंगिक समानता को बढ़ावा देने के लिए क्षमता निर्माण, नैटवर्किंग, नवाचारों के अनुप्रयोग और बालिका शिक्षा पर जोर दिया.

डा. मनजीत सिंह नैन, डा. मार्कंडेय सिंह, डा. सुभाश्री साहू, डा. सुकन्या बरुआ, डा. नफीस अहमद, डा. हेमलता, डा. अलका जोशी, डा. एनवी कुंभारे, डा. पुनीता, डा. मीशा माधवन ने महिला उद्यमियों की सफलता की कहानियों के माध्यम से प्रतिभागियों को शिक्षित किया. बाद में महिलाओं को वाटिका बागबानी और पोषण सुरक्षा के लिए पूसा सब्जी बीज किट प्रदान की गई. मथुरा के परियोजना गांवों की महिला किसानों को सीधी बीजाई और श्रीविधि द्वारा धान की खेती को बढ़ावा देने के लिए धान की गुणवत्ता वाले बीज दिए गए.

Spice Crops : खेती और प्रोसैसिंग से मिलेगी अधिक आमदनी

Spice Crops| प्रसार शिक्षा निदेशालय, महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर द्वारा पांचदिवसीय किसान प्रशिक्षण “मसाला फसलों की खेती एवं प्रसंस्करण” विषय पर बीते 3 मार्च से 7 मार्च, 2025 को आयोजित किया गया.

प्रशिक्षण के समापन समारोह के मुख्य अतिथि डा. आरएल सोनी, निदेशक, प्रसार शिक्षा निदेशालय, उदयपुर ने अपने उद्बोधन में प्रशिक्षणार्थियों को मसाला फसलों की खेती एवं प्रसंस्करण के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि मसाला फसलों की खेती की लोकप्रियता के पीछे महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि इन के उत्पादन में कई अन्य कृषि फसलों की तुलना में कम सिंचाई जल एवं पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है. साथ ही, यह किसानों के लिए अधिक आय अर्जित करने का एक अच्छा विकल्प है. मसाला फसलों के साथसाथ फल एवं सब्जियों का उत्पादन कर अतिरिक्त आमदनी भी ले सकते हैं.

समारोह के विशिष्ट अतिथि डा. एसके इंटोदिया, प्राध्यापक ने किसानों से आह्वान किया कि वे प्रशिक्षण के बाद एफपीओ का गठन करे और इस के माध्यम से अधिक आय प्राप्त करें. फसल को कटाई के बाद बेचने के मुकाबले ग्रेडिंग, क्लीनिंग, पैकेजिंग एवं प्रोसैसिंग से ज्यादा मुनाफा ले पाएंगे.

डा. लतिका व्यास, प्रशिक्षण प्रभारी ने बताया कि उक्त प्रशिक्षण कृषि विभाग आत्मा, मंदसौर (मध्य प्रदेश) द्वारा प्रायोजित था, जिस में मंदसौर जिले के विभिन्न गांवों से 60 किसानों ने भाग लिया. इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के विभिन्न वैज्ञानिकों द्वारा कृषि विषयों पर तकनीकी जानकारी दी गई.

प्रशिक्षणार्थियों को विश्वविद्यालय की विभिन्न सजीव इकाइयों जैसे जैविक इकाई, पौलीहाउस, मुरगीपालन, डेयरी एवं मत्स्यपालन आदि के साथसाथ संग्रहालय भ्रमण एवं फिल्म शो कराया गया और तकनीकी जानकारी दी गई.

प्रशिक्षण समापन के दौरान प्रशिक्षणार्थियों से प्रश्नोत्तरी की गई, जिस में प्रथम, द्वितीय व तृतीय को पुरस्कार एवं सभी प्रतिभागियों को सांत्वना पुरस्कार एवं प्रमाणपत्र मुख्य अतिथि द्वारा दिए गए.

International Women’s Day : जल प्रौद्योगिकी केंद्र द्वारा कार्यशाला

International Women’s Day| कृषि क्षेत्र की महिलाओं को अधिक कार्यभार (घरेलू और कृषि कार्य दोनों), कुपोषण, निर्णय लेने के अवसर की कमी, दूरदराज के स्थानों से पानी इकट्ठा करने में कठिनाई, मैनुअल फील्ड औपरेशन जैसे निराई, इंटरकल्चरल औपरेशन, कटाई आदि में भाग लेने के दौरान लंबे समय तक काम करने में बहुमुखी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. जलवायु परिवर्तन से ये चुनौतियां और अधिक बढ़ रही हैं.

बीते 8 मार्च, 2025 को ‘अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस’ (International Women’s Day) के अवसर पर भारत में ग्रामीण महिलाओं की वर्तमान स्थिति और सामान्य रूप से कृषि क्षेत्र और विशेष रूप से जल प्रबंधन में उन के सामने आने वाली चुनौतियों का आलोचनात्मक विश्लेषण करना प्रासंगिक है. इस के अलावा अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस-2025 पर केंद्रीय विषय के दर्शन को समझते हुए कार्यवाही में तेजी लाने के लिए हमें सतत और जलवायु अनुकूल जल प्रबंधन प्रौद्योगिकियों और नीतियों के माध्यम से महिलाओं के सशक्तीकरण को तेज करने के अपने प्रयासों को मजबूत करना चाहिए.

जल प्रौद्योगिकी केंद्र, भाकृअनुप- भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली और डा. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (आरपीसीएयू), बिहार द्वारा जलवायु अनुकूल जल प्रबंधन पर विकसित विश्वसनीय प्रौद्योगिकियां इस संदर्भ में कृषि महिलाओं को लाभान्वित करने में अधिक सहायक होगी.

8 मार्च 2025 को ‘अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस’ के अवसर पर जल प्रौद्योगिकी केंद्र, भाकृअनुप- भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली और डा. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, समस्तीपुर, बिहार द्वारा संयुक्त रूप से जल प्रौद्योगिकी केंद्र के सभागार में “सतत और जलवायु अनुकूल जल प्रबंधन प्रौद्योगिकियों और नीतियों के माध्यम से महिलाओं का त्वरित सशक्तीकरण” पर विचारमंथन कार्यशाला का आयोजन किया गया था.

कार्यशाला के मुख्य उद्देश्य (क) जलवायु परिवर्तन की पृष्ठभूमि में कृषि जल प्रबंधन में ग्रामीण महिलाओं के सामने आने वाली वर्तमान चुनौतियों का विश्लेषण करना, (ख) सतत और जलवायु अनुकूल जल प्रबंधन प्रौद्योगिकियों और नीतियों के एकीकरण के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं के सशक्तीकरण में तेजी लाना था.

कृषि क्षेत्र में सतत और जलवायु अनुकूल जल प्रबंधन के लिए तकनीकी और नीति विकल्पों के रूप में कार्यशाला के अपेक्षित परिणाम संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) 6 (सभी के लिए पानी और स्वच्छता की उपलब्धता और सतत प्रबंधन सुनिश्चित करना) है.

इस कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग नियोजन ब्यूरो (एनबीएसएस व एलयूपी) के क्षेत्रीय केंद्र, नई दिल्ली की प्रमुख डा. जया एन. सूर्या, भाकृअनुप- भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली के संयुक्त निदेशक (अनुसंधान) डा. सी. विश्वनाथन, नई दिल्ली, जल प्रौद्योगिकी केंद्र के परियोजना निदेशक डा. पीएस ब्रह्मानंद और आरपीसीएयू के अनुसंधान निदेशक डा. एके सिंह ने भाग लिया.

 

उन्होंने ग्रामीण महिला सशक्तीकरण की समृद्धि के लिए सतत और जलवायु अनुकूल जल प्रबंधन के लिए अनुसंधान और नीति समर्थन के महत्व पर प्रकाश डाला और सतत जल प्रबंधन सुनिश्चित करने के लिए पारंपरिक जल संचयन संरचनाओं के पुनर्निर्माण पर जोर दिया.

तकनीकी सत्र के दौरान डा. पीएस. ब्रह्मानंद, परियोजना निदेशक, जल प्रौद्योगिकी केंद्र, डा. सुशमा सुधीश्री, प्रधान वैज्ञानिक, जल प्रौद्योगिकी केंद्र और डा. रत्नेश झा, परियोजना निदेशक, आरपीसीएयू ने जलवायु अनुकूल जल प्रबंधन और इस की सफलता की कहानियों और महिला सशक्तीकरण के लिए जल निकायों के पुनर्निर्माण पर जानकारी दी.

सत्र की अध्यक्षता डा. सीमा जग्गी, एडीजी (एचआरडी), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली और सहअध्यक्षता डा. डीएस गुर्जर, वरिष्ठ वैज्ञानिक, जल प्रौद्योगिकी केंद्र ने की. डा. सीमा जग्गी ने जलवायु अनुकूल प्रौद्योगिकियों के संभावित सकारात्मक प्रभाव की सराहना की और जल संसाधन प्रबंधन में महिलाओं के अनुपात में सुधार के लिए आवश्यक प्रयासों पर बल दिया.

इस के बाद “महिला सशक्तीकरण में तेजी लाने के लिए जलवायु अनुकूल जल प्रबंधन प्रौद्योगिकियों और नीतियों को एकीकृत करने” जैसे विषय पर पैनल चर्चा आयोजित की, जिस का संचालन भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली के कृषि भौतिकी विभाग के प्रमुख डा. एन. सुभाष ने किया.

भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली के संयुक्त निदेशक (प्रसार) डा. आरएन पदारिया, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के एडीजी (प्रोसैसिंग इंजीनियरिंग) डा. के. नरसैया, एनबीएसएस व एलयूपी, नई दिल्ली के क्षेत्रीय केंद्र की प्रमुख डा. जया एन. सूर्या, आरपीसीएयू के बेसिक साइंसेज एंड ह्यूमैनिटीज कालेज के डीन डा. अमरेश चंद्रा, आरपीसीएयू के मत्स्यपालन कालेज के डीन डा. पीपी श्रीवास्तव और आरपीसीएयू के शिक्षा निदेशक डा. यूके बेहरा ने पैनलिस्ट के रूप में भाग लिया.

उन्होंने एकीकृत कार्ययोजना के लिए सुझाव दिया, जिस में जल प्रबंधन प्रौद्योगिकियों को तेजी से अपनाने के लिए प्रभावी विस्तार विधियां, महिला किसान अनुकूल उपकरणों का विकास, कम लागत वाली वर्षा जल संचयन तकनीक, एकीकृत कृषि प्रणाली, अमृत सरोवर योजना को मजबूत करना, जल जीवन मिशन आदि शामिल हैं.

कार्यशाला में विचारविमर्श के आधार पर महिला सशक्तीकरण के लिए जलवायु अनुकूल जल प्रबंधन पर संक्षिप्त नीति तैयार की जाएगी. कुलमिला कर इस कार्यशाला में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद भाकृअनुप-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली, एनबीएसएस व एलयूपी, नई दिल्ली, एनबीपीजीआर, नई दिल्ली और आरपीसीएयू, बिहार में स्थित अन्य संस्थानों के शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों, कर्मचारियों और छात्रों सहित लगभग 70 प्रतिनिधियों ने इस में भाग लिया.

Brinjal : बैगन की आधुनिक खेती

गरमी के मौसम की खास सब्जियों में बैगन, टमाटर, भिंडी व कद्दू वर्गीय सब्जियां शामिल हैं. बैगन (Brinjal) का आमतौर पर सब्जी के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. इस के अलावा इस का इस्तेमाल भरता, पकौड़े, अचार कलौंजी बनाने में भी किया जाता है. इस में कुछ औषधीय गुण भी पाए जाते हैं. यह भूख बढ़ाने वाला और कफ के लिए फायदेमंद बताया गया है. सफेद बैगन की सब्जी डाइबिटीज के रोगियों के लिए फायदेमंद पाई गई है.

बैगन (Brinjal) का जन्म मध्य अमेरिका में माना जाता है. यह भारत में 4000 सालों से बोया जा रहा है. बैगन में सब से जयादा नुकसान चोटी व फल छेदक कीट के द्वारा होता है.

इस कीट के कारण करीब 60-70 फीसदी पौधों को नर्सरी से ले कर फलों की तोड़ाई तक नुकसान उठाना पड़ जाता है. यह कीट बढ़ते पौधों की नईनई कलियों को खाता है और फलों में सुराख कर के उन को नुकसान पहुंचाता है. बैगन की अच्छी उपज व ज्यादा आमदनी के लिए उन्नतशील किस्मों की वैज्ञानिक तरीकों से खेती करना आवश्यक है.

भूमि का चुनाव और तैयारी

बैगन की अच्छी उपज के लिए गहरी दोमट भूमि जिस में जल निकास का सही इंतजाम हो, सब से अच्छी समझी जाती है. भूमि की तैयारी के लिए पहली जुताई डिस्क हैरो से और 3 से 4 जुताइयां कल्टीवेटर से कर के पाटा लगा दें. खेत की तैयारी के समय पुरानी फसल के बचे भागों को इकट्ठा कर के जला दें जिस से कीटों व बीमारियों का प्रकोप कम हो.

खाद व उर्वरक

बैगन में खाद व उर्वरक  की मात्रा इस की किस्म, स्थानीय जलवायु व मिट्टी की किस्म पर निर्भर करती है. अच्छी फसल के लिए 8 से 10 टन सड़ी गोबर की खाद खेत को तैयार करते समय प्रति हेक्टेयर की दर से डालें.

80 किलोग्राम नाइट्रोजन की एक तिहाई मात्रा और फास्फोरस व पोटाश की पूरी तय मात्रा खेत की आखिरी जुताई के समय डालें. बची नाइट्रोजन को 2 भागों में बांट कर 30 व 45 दिनों बाद खरपतवार नियंत्रण के बाद खड़ी फसल में छिड़क दें.

बीज की मात्रा

1 हेक्टेयर में फसल की रोपाई के लिए 250 से 300 ग्राम बीजों की जरूरत होती है. बीजों को  पौधशाला में बो कर पौधे तैयार किए जाते हैं.

बोआई व रोपाई

उत्तर भारत में बैगन लगाने का सही समय जूनजुलाई है. अच्छी तरह से तैयार खेत में सिंचाई के साधन के अनुसार क्यारियां बना लें. क्यारियों में लंबे फल वाली प्रजातियों के लिए 70 से 75 सेंटीमीटर और गोल फल वाली किस्मों के लिए 90 सेंटीमीटर की दूरी पर पौधों की रोपाई करें. रोपाई के समय यह ध्यान रखें कि पौधे कीट व रोग रहित हों. वर्षा के अनुसार रोपाई मेंड़ों या समतल क्यारियों में करें.

सिंचाई

रोपाई के बाद फुहारे की सहायता से पौधों के थालों में 2 से 3 दिनों तक सुबह और शाम के वक्त हलका पानी दें. इस के बाद हलकी सिंचाई करें ताकि पौधे जमीन में अच्छी तरह जड़ पकड़ लें. बाद में जरूरतानुसार सिंचाई करते रहें. साधारणतया गरमी के मौसम में 10 से 15 दिनों और सर्दी के मौसम में 15 से 20 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करें. यदि पौधे मेड़ों पर लगाए गए हैं, तो सिंचाई आधी मेड़ तक करें और सिंचाई का अंतर कम रखें. बारिश के मौसम में यदि बारिश अधिक हो रही हो, तो खेत से पानी निकालने के लिए निकास नाली की सही व्यवस्था होनी चाहिए.

Mango Orchards : आम के बागों में कीड़ों व रोगों की रोकथाम जरूरी

Mango Orchards : आम की बागबानी में स्वस्थ्य और अच्छी उपज लेने के लिए कीटरोगों की रोकथाम समय रहते कर देनी चाहिए अन्यथा आम की मिठास कड़वाहट में बदलने में समय नहीं लगेगा.

कीड़ों की रोकथाम

भुनगा: इस कीट के बच्चे व वयस्क दोनों ही मुलायम टहनियों, पत्तियों व फूलों का रस चूसते हैं. इस की वजह से फूल सूख कर गिर जाते हैं. यह कीट एक प्रकार का मीठा पदार्थ निकालता है, जो पेड़ों की पत्तियों, टहनियों आदि पर लग जाता है. इस मीठे पदार्थ पर काली फफूंदी पनपती है, जो पत्तियों पर काली परत के रूप में फैल कर पेड़ों के प्रकाश संश्लेषण पर खराब असर डालती है.

इलाज : बाग से खरपतवार हटा कर उसे साफसुथरा रखें. घने बाग की कटाईछंटाई दिसंबर में करें. बौर फूटने के बाद बागों की बराबर देखभाल करें. पुष्पगुच्छ की लंबाई 8-10 सेंटीमीटर होने पर भुनगे का प्रकोप होता है. इस की रोकथाम के लिए 0.005 फीसदी इमिडा क्लोप्रिड का पहली बार छिड़काव करें. 0.005 फीसदी थायामेथोक्लाज या 0.05 फीसदी प्रोफेनोफास का दूसरा छिड़ाकाव फल लगने के बाद करें.

गुजिया: इस के बच्चे और वयस्क पत्तियों व फूलों का रस चूसते हैं. जब इन की तादाद ज्यादा हो जाती है, तो इन के द्वारा रस चूसे जाने के कारण पेड़ों की पत्तियां व बौर सूख जाते हैं और फल नहीं लगते हैं. इस कीट का हमला दिसंबर से मई महीने तक देखा जाता है.

इलाज : खरपतवारों और अन्य घासों को नवंबर में जुताई द्वारा बाग से निकालने से सुप्तावस्था में रहने वाले अंडे धूप, गरमी व चीटियों द्वारा नष्ट हो जाते हैं. दिसंबर के तीसरे हफ्ते में पेड़ के तने के आसपास 250 ग्राम क्लोरपाइरीफास चूर्ण 1.5 फीसदी प्रति पेड़ की दर से मिट्टी में मिला देने से अंडों से निकलने वाले निम्फ मर जाते हैं. पालीथीन की 30 सेंटीमीटर चौड़ी पट्टी पेड़ के तने के चारों ओर जमीन की सतह से 30 सेंटीमीटर ऊंचाई पर दिसंबर के दूसरेतीसरे हफ्ते में गुजिया के निकलने से पहले लपेटने से निम्फों का पेड़ों पर ऊपर चढ़ना रुक जाता है. पट्टी के दोनों सिरों को सुतली से बांधना चाहिए. इस के बाद थोड़ी ग्रीस पट्टी के निचले घेरे पर लगाने से गुजिया को पट्टी पर चढ़ने से रोका जा सकता है. यह पट्टी बाग में मौजूद सभी आम के पेड़ों व अन्य पेड़ों पर भी बांधनी चाहिए. अगर किसी वजह से यह विधि नहीं अपनाई गई और गुजिया पेड़ पर चढ़ गई, तो ऐसी हालत में 0.05 फीसदी कार्बोसल्फान 0.2 मिलीलीटर प्रति लीटर या 0.06 फीसदी डायमेथोएट 2.0 मिलीलीटर प्रति लीटर का छिड़काव करें.

Mango Orchards

पुष्प गुच्छ मिज : आम के पेड़ों पर मिज के प्रकोप से 3 चरणों में हानि होती है. इस का पहला प्रकोप कली के खिलने की अवस्था में होता है. नए विकसित बौर में अंडे दिए जाने व लार्वा द्वारा बौर के मुलायम डंठल में घुसने से बौर पूरी तरह से नष्ट हो जाते हैं. इस का दूसरा प्रकोप फलों के बनने की अवस्था में होता है. फलों में अंडे देने व लार्वा के घुसने की वजह से फल पीले हो कर गिर जाते हैं. तीसरा प्रकोप बौर को घेरती हुई पत्तियों पर होता है.

इलाज : अक्तूबर व नवंबर में बाग में की गई जुताई से मिज की सूंडि़यों के साथ सोए पड़े प्यूपे भी नष्ट हो जाते हैं. जिन बागों में इस कीट का हमला होता रहा है, वहां बौर फूटने पर 0.06 फीसदी डायमेथोएट का छिड़काव करना चाहिए. अप्रैलमई में 250 ग्राम क्लोरपाइरीफास चूर्ण प्रति पेड़ के हिसाब से छिड़काव करने पर पेड़ के नीचे सूंडि़यां नष्ट हो जाती हैं. फरवरी में भुनगे के लिए किए जाने वाले कीटनाशी के छिड़काव से इस कीट की भी अपनेआम रोकथाम हो जाती है.

डासी मक्खी : वयस्क मक्खियां अप्रैल में जमीन से निकल कर पके फलों पर अंडे देती हैं. 1 मक्खी 150 से 200 तक अंडे देती है. 2-3 दिनों के बाद सूंडि़यां अंडों से निकल कर गूदे को खाना शुरू कर देती हैं.

इलाज : इस कीट के असर को कम करने के लिए सभी गिरे हुए व मक्खी के प्रकोप से ग्रसित फलों को इकट्ठा कर के नष्ट कर देना चाहिए. पेड़ों के आसपास सर्दी के मौसम में जुताई करने से जमीन के अंदर के प्यूपों को नष्ट किया जा सकता है. काठ से बने यौनगंध ट्रैप को पेड़ पर लगाना इस की रोकथाम में बहुत कारगर है. इस ट्रैप के लिए प्लाईवुड के 5×5×1 सेंटीमीटर आकार के गुटके को 48 घंटे तक 6:4:1 के अनुपात में अल्कोहल, मिथाइल यूजिनाल, मैलाथियान के घोल में भिगो कर लगाना चाहिए. यौनगंध ट्रैप को 2 महीने के अंतर पर बदलना चाहिए. 10 ट्रैप प्रति हेक्टेयर लटकाने चाहिए.

रोगों की रोकथाम

पाउडरी मिल्ड्यू (खर्रा, दहिया) : इस रोग के लक्षण बौरों, पत्तियों व नए फलों पर देखे जा सकते हैं. इस रोग का खास लक्षण सफेद कवक या चूर्ण के रूप में जाहिर होता है. नई पत्तियों पर यह रोग आसानी से दिखता है, जब पत्तियों का रंग भूरे से हलके हरे रंग में बदलता है. नई पत्तियों पर ऊपरी और निचली सतह पर छोटे सलेटी रंग के धब्बे दिखाई देते हैं, जो निचली सतह पर ज्यादा होते हैं. बौरों पर यह रोग सफेद चूर्ण की तरह दिखाई पड़ता है और बौरों में लगे फूलों के झड़ने की वजह बनता है. इस रोग की वजह से फूल नहीं खिलते हैं और समय से पहले ही झड़ जाते हैं. नए फलों पर पूरी तरह सफेद चूर्ण फैल जाता है और मटर के दाने के बराबर हो जाने के बाद फल पेड़ से झड़ जाते हैं.

इलाज : पहला छिड़काव 0.2 फीसदी घुलनशील गंधक का घोल बना कर उस समय करना चाहिए, जब बौर 3-4 इंच का होता है. दूसरा छिड़काव 0.1 फीसदी डिनोकोप का होना चाहिए, जो पहले छिड़काव के 15-20 दिनों के बाद हो. दूसरे छिड़काव के 15-20 दिनों के बाद तीसरा छिड़काव 0.1 फीसदी ट्राईडीमार्फ का होना चाहिए.

एंथ्रेकनोज : यह रोग पत्तियों, टहनियों और फलों पर देखा जा सकता है. पत्तियों की सतह पर पहले गोल या अनियमित भूरे या गहरे भूरे रंग के धब्बे बनते हैं. प्रभावित टहनियों पर पहले काले धब्बे बनते हैं और फिर पूरी टहनी सलेटी रंग की हो जाती है. पत्तियां नीचे की ओर झुक कर सूखने लगती हैं और बाद में गिर जाती हैं. बौर पर सब से पहले पाए जाने वाले लक्षण हैं, गहरे भूरे रंग के धब्बे, जो कि फूलों पर जाहिर होते हैं. बौर व खिले फूलों पर छोटे काले धब्बे उभरते हैं, जो धीरेधीरे फैलते हैं और आपस में जुड़ कर फूलों को सुखा देते हैं. ज्यादा नमी होने पर यह रोग तेजी से फैलता है.

इलाज : सभी रोगग्रसित टहनियों की छंटाई कर देनी चाहिए और बाग में गिरी हुई पत्तियों, टहनियों और फलों को इकट्ठा कर के जला देना चाहिए. मंजरी संक्रमण को रोकने केलिए 0.1 फीसदी कार्बेंडाजिम का 15 दिनों के अंतराल पर 2 बार छिड़काव करना चाहिए. संक्रमण को रोकने के लिए 0.3 फीसदी कापर आक्सीक्लोराइड का छिड़काव भी लाभकारी है. 0.1 फीसदी थायोफनेट मिथाइल या 0.1 फीसदी कार्बेंडाजिम का बाग में फल तोड़ाई से पहले छिड़काव करने से गुप्त संक्रमण को कम किया जा सकता है.

उल्टा सूखा रोग : टहनियों का ऊपर से नीचे की ओर सूखना इस रोग का मुख्य लक्षण है. विशेष तौर पर पुराने पेड़ों में बाद के पत्ते सूख जाते हैं, जो आग से झुलसे हुए से मालूम पड़ते हैं. शुरू में नई हरी टहनियों पर गहरे रंग के धब्बे पड़ जाते हैं. जब ये धब्बे बढ़ते हैं, तब नई टहनियां सूख जाती हैं. ऊपर की पत्तियां अपना हरा रंग खो देती हैं और धीरेधीरे सूख जाती हैं. इस रोग का ज्यादा असर अक्तूबरनवंबर में दिखाई पड़ता है.

इलाज : छंटाई के बाद गाय का गोबर व चिकनी मिट्टी मिला कर कटे भाग पर लगाना फायदेमंद होता है. संक्रमित भाग में 3 इंच नीचे से छंटाई के बाद बोर्डो मिक्चर 5:5:50 या 0.2 फीसदी कापर आक्सीक्लोराइड का छिड़काव रोग की रोकथाम में बेहद कारगर होता है.