Grain Storage : वैज्ञानिक विधि से अनाज का भंडारण व कीटों की रोकथाम

Grain Storage: उत्पादन के मुकाबले अनाज का सुरक्षित भंडारण (Storage) करना ज्यादा महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि भंडारण के दौरान अनेक भौतिक व जैविक शत्रुओं जैसे नमी, कीटों, फफूंद, जीवाणु, चूहों व चिडि़यों आदि के द्वारा 10 से 12 फीसदी अनाज बरबाद कर दिया जाता है.

इस बरबादी को रोकने में किसान तभी सक्षम होंगे, जब उन को भंडारण की सही जानकारी होगी.

विभिन्न प्रकार के भंडारघर

अनाज भंडारण का सब से अच्छा तरीका यह है, जिस में किसी कमरे के अंदर एक ऊंचा फर्श बना कर नमी से बचाने के लिए बांस की चटाई या लकड़ी के तख्ते या पौलीथीन शीट पर बोरे की छल्ली लगाई जाती है. यह छल्ली दीवारों से 2.5 फुट दूर रखें, ताकि दीवारों से सीलन अनाज के बोरों में न आ सके, साथ ही आनेजाने का रास्ता भी खुला रहे. छल्लियों की आपसी दूरी भी इस तरह रखनी चाहिए कि गोदाम के अंदर अनाज की देखरेख आसानी से की जा सके. यह कम खर्च पर ज्यादा अनाज रखने का अच्छा तरीका है.

पक्की कोठी : मध्यमवर्गीय किसान अपने अनाज का भंडारण करने के लिए इस विधि का इस्तेमाल करते हैं. 1.6 घनमीटर की पक्की कोठी में 2 मीट्रिक टन अनाज भरा जा सकता है. कमरे के एक कोने में यह पक्की बखारी ईंट, सीमेंट, बालू, मौरंग आदि से बना कर दीवारों व नीचे की सतह पर पौलीथीन शीट लगा कर इसे नमी अवरोधक बना दिया जाता है. अनाज भरने और निकालने के लिए स्टील के बने इनलेट और आउटलेट बनाए जाते हैं.

धातुटीन की बखारी : आधे टन या 1 टन की कूवत वाली बखारी जरूरत के मुताबिक बनाई जाती है, जो छोटे किसानों या घरेलू इस्तेमाल के लिए मुनासिब होती है. इसे आसानी से इधरउधर हटा भी सकते हैं. इस में नमी नहीं जा सकती है. चूहे भी इसे काट नहीं सकते हैं.

भंडारण में इन सावधानियों का ध्यान रखें:

* अनाज सुखाने व छानने के अलावा भंडारघर की सफाई व पुताई का भी खयाल रखें. कीटों से बचाव के लिए मैलाथियान 50 ईसी, 5 फीसदी घोल का 3 लीटर प्रति 100 वर्गमीटर की दर से छिड़काव करें.

* जहां तक मुमकिन हो नए बोरे इस्तेमाल करें. पुराने बोरों को मैलाथियान 50 ईसी, 5 फीसदी घोल में भिगो कर उन का शोधन कर लें.

* धूनीकरण का काम कम से कम 2 बार करना चाहिए. पहले अनाज भरते समय और दोबारा 1 महीने बाद.

* रोशनदान, दरवाजे व खिड़की आदि को धूनीकरण करने के बाद बंद कर के गीली मिट्टी से दरारें बंद कर देनी चाहिए, जिस से अंदर की जहरीली गैस बाहर न आ सके.

देशी विधि से अन्न का भंडारण करना : नीम की सूखी पत्तियों, निबौली का पाउडर, सूखी हलदी, सूखी प्याज व लहसुन से भी अन्न का भंडारण कर सकते हैं. 1 क्विंटल अन्न भंडारण के लिए 1 किलोग्राम नीम की सूखी पत्तियां, 250 ग्राम निबौली का पाउडर, आधा किलोग्राम सूखी हलदी, 1 किलोग्राम सूखी प्याज व 1 किलोग्राम लहसुन रख कर भंडारण किया जा सकता है.

भंडारित अनाजों के कीट

अनाज का पतंगा : यह कीट धान, ज्वार व मक्का में ज्यादा लगता है, पर कभीकभी जौ और गेहूं को भी नुकसान पहुंचाता है. इस की लंबाई 6 से 9 मिलीमीटर व पंखों का फैलाव करीब 16 मिलीमीटर होता है. ऊपरी पंख का रंग पीलाभूरा होता है. पंख की निचली तरफ शल्कीय बाल होते हैं, जो पिछले पंख में ज्यादा बड़े होते हैं. पिछले पंख नुकीले होते हैं, जो छोर पर कुछ मुड़े होते हैं. इस कीट का लारवा (इल्ली) 4 से 7 मिलीमीटर लंबा, सफेद रंग का होता है. इस का सिर पीले रंग का होता है. लारवा बीज के अंदर ही रहता है. इस कीट का लारवा ही नुकसान पहुंचाता है. कीड़ा लगे बीज में केवल 1 छेद होता है, जो वयस्क के निकलने का रास्ता बनता है. यह कीट खेत व भंडारघर दोनों जगह आक्रमण करता है.

गेहूं का खपड़ा : यह कीट ज्यादातर गेहूं, चावल, ज्वार, बाजरा व मक्का आदि में पाया जाता है. यह कीट ढेर में ऊपर ही करीब 1 फुट की गहराई तक नुकसान पहुंचाता है. यह ढेर के अंदर ज्यादा गहराई तक घुस कर नहीं खा सकता, क्योंकि इस के विकास के लिए आक्सीजन की काफी जरूरत पड़ती है. इस कीट के ग्रब ही ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं. इस कीट से जुलाई से अक्तूबर के दौरान ज्यादा नुकसान होता है. यह दानों के भ्रूण वाले भागों को खाना पसंद करता है, जिस से बीज के उगने की कूवत नष्ट हो जाती है और उस की पौष्टिकता में भी कमी आ जाती है.

दालों का घुन : यह कीट ज्यादातर अरहर, उड़द, मटर, चना, मसूर, मोेठ, लोबिया व सेम वगैरह दलहन फसलों को नुकसान पहुंचाता है. इस कीट का हमला खेत व भंडारघरों दोनों जगह पर होता है. यह भंडारघरों में ज्यादा नुकसान पहुंचाता है. इस के ग्रब व प्रौढ़ दोनों ही नुकसान पहुंचाते हैं, पर ज्यादा नुकसान ग्रब के द्वारा ही होता है. खेतों में इस कीट का हमला फरवरी के महीने से ही (जिस समय पौधों में हरी फलियां लगती हैं शुरू हो जाता है. यह दानों को खाता है. दाने के अंदर ग्रब जिस जगह से घुसता है, वह जगह बंद हो जाती है और दाने के अंदर ही कीट भंडाररघरों में पहुंच जाता है. यह भंडारघरों में रखी दालों पर प्रजनन कर के दालों को नुकसान पहुंचाता है.

चावल का घुन : यह कीट भंडारित अनाजों का खास शत्रु है. यह सभी अनाजों को नुकसान पहुंचाता है. इस के प्रौढ़ व ग्रब (सूंड़ी) दोनों ही नुकसान पहुंचाते हैं. मादा कीट दाने में छोटा सा छेद बना कर घुस जाती है और अंदर के पूरे हिस्से को खा लेती है. इस प्रकार दाने खोखले हो जाते हैं और खाने व बोने के लायक नहीं रहते हैं. इस कीट से ज्यादा नुकसान जुलाई से नवंबर तक होता है.

लालसुरी (सुरसाली) : यह कीट आटा, मैदा, सूजी, मूंगफली, कपास, सेम के बीज व अन्य रखे अनाजों व मेवों को नुकसान पहुंचाता है. यह केवल कटे दानों या अन्य कीटों के द्वारा प्रभावित दानों को ही हानि पहुंचाता है. इस कीट के द्वारा आटा, मैदा, सूजी आदि को नुकसान होता है. इस की संख्या ज्यादा हो जाने के कारण आटा पीला पड़ जाता है और उस में कवक विकसित हो जाती है और खास किस्म की बदबू आने लगती है. इस कीट के ग्रब व प्रौढ़ नुकसान पहुंचाते हैं. इस के द्वारा ज्यादा नुकसान बरसात के दिनों में होता है.

आटे का कीट : यह कीट टूटे बीजों व अनाज को हानि पहुंचाता है. गेहूं, जौ व चावल के अलावा यह तिलहन, मसाले वाली फसलों व सब्जियों के बीजों को भी भंडारघर में नुकसान पहुंचाता है. यह आटा व उस से बने उत्पादों को ज्यादा नुकसान पहुंचाता है. इस का लारवा व वयस्क दोनों की हानिकारक होते हैं.

दालों का ढोरा : इस कीट का आकार गोलाकार होता है. यह 4 से 5 मिलीमीटर लंबा होता है. यह कीट भूरेधूसर रंग का होता है. इस का लारवा या ग्रब मोटा, टेढ़ा, बिना पैर का और पीलेसफेद रंग का होता है, जिस का सिर काले रंग का होता है. यह मूंग, लोबिया, मटर व चना वगैरह को नुकसान पहुंचाता है. इस कीट के वयस्क हानि नहीं पहुंचाते, केवल लारवा ही हानिकारक होता है. इस की मादा बीज के ऊपर 1-1 कर के कई अंडे देती है, उन में से केवल 1 लारवा ही बीज के अंदर विकसित होता है, जो उसे अंदर से पूरा खोखला कर के एक बड़े छेद के द्वारा बाहर निकलता है.

Grain Storage

भंडारण व कीटों की रोकथाम

भौतिक निरीक्षण : भौतिक तरीके जैसे तापमान, नमी व आक्सीजन में बदलाव कर के भंडारित कीटों की रोकथाम की जा सकती है. भंडारण करते समय खाद्यान्नों की नमी 8-10 फीसदी रखनी चाहिए. नाइट्रोजन या कार्बन डाईआक्साइड को कृत्रिम रूप से बढ़ा कर गोदाम का गैसीय वातावरण इस तरह बदल दिया जाता है कि सभी कीट मर जाते हैं. 9-9.5 फीसदी कार्बन डाईआक्साइड कीटों के लिए घातक होती है. कुछ किसान मिट्टी या बालू मिला कर अनाज रखते हैं. इस से कीटों को अनाज में आनेजाने में दिक्कत होती है और उन का शरीर घायल हो जाता है. लिहाजा उन का हमला कम होता है. दालों को कीटों से सुरक्षित रखने के लिए नारियल, मूंगफली या सरसों के तेल का इस्तेमाल करना लाभकारी रहता है. दालों को यदि दल कर रखा जाए तो दली हुई दालों पर कीट कम आक्रमण करते हैं.

यांत्रिक तरीके : अनाज की छंटाई जरूर करें. टूटे, कटे, चटके अनाज संक्रमण को बढ़ावा देते हैं. कीटों से संक्रमित अनाज की छनाई नियमित रूप से करें और छनाई के बाद बचे अवशेष को नष्ट कर दें, वरना कीड़े रेंग कर दोबारा भंडारघर तक पहुंच जाएंगे. इस काम को भंडारघर से दूर ही करें.

खाद्यान्नों की छनाई : कीट नियंत्रण के यांत्रिक उपायों में छनाई का स्थान खास है. भंडारित खाद्यान्नों की छनाई करना बहुत प्रभावकारी व व्यावहारिक होता है. छनाई से कीटग्रस्त खद्यान्नों को अलग किया जाना चाहिए. आमतौर पर छनाई का काम भंडारघर से दूर किया जाना चाहिए.

धूमन : भंडारघर में कीटनाशी रसायनों को गैस के रूप में इस्तेमाल करने की क्रिया को धूमन कहा जाता है. धूमन करने में बहुत सावधानी व तकनीकी जानकारी की जरूरत होती है. लिहाजा विशेषज्ञों की मौजूदगी में ही धूमन किया जाना चाहिए.

धूमन के लिए बहुत से कीटनाशी बाजार में मौजूद हैं. इथलीन डाईब्रोमाइट एंपुल, एथलीन डाईक्लोराइड और कार्बन टेट्रा क्लोराइड मिक्सचर व इथलीन डाईब्रोमाइड फार्म स्तर पर काम में लिया जा सकता है. एल्यूमिनियम फास्फाइड का इस्तेमाल वेयर हाउस व गोदामों में किया जा सकता है. ईडीबी एंपुल की दर 3 मिलीलीटर प्रति क्विंटल व एल्यूमिनियम फास्फाइड की दर 1 गोली प्रति 1 टन की रहती है. भंडारघर को 7 दिनों तक बंद रखना चाहिए.

अन्य तरीके

अनाज को सुखाना : अनाज में यदि नमी की मात्रा 10 फीसदी से कम होती है, तो उस में कीटों की बढ़ोतरी नहीं हो पाती है या वे मर जाते हैं. लिहाजा हलकी पर्त में अनाज को फैला कर धूप में सुखाते हैं, किंतु यह बात विशेष ध्यान देने की है कि अनाज को कभी जरूरत से ज्यादा नहीं सुखाना चाहिए, वरना ज्यादा गरमी से बीज नष्ट हो जाते हैं या उन में झुर्रियां पड़ सकती हैं.

ऊपर बताए तमाम तरीकों को अपनाते हुए अनाज को भंडारघरों में रखने की वैज्ञानिक विधि अपनानी चाहिए. अनाज जब वायु अवरुद्ध (एयर टाइट) गोदामों में रखा जाता है, तो गोदामों की आक्सीजन अनाजों द्वारा सोख ली जाती है और बदले में कार्बन डाईआक्साइड बाहर निकाली जाती है. इस से वातावरण जहरीला हो जाता है. 9-9.5 फीसदी कार्बन डाईआक्साइड की मौजूदगी में कीट मर जाते हैं.

भंडारघर में अपनाएं ये सुरक्षात्मक तरीके :

* खलिहान गांव व भंडारघर से दूर होने चाहिए, क्योंकि भंडारघरों से कीट खेतों व खलिहानों में पहुंच कर आगामी फसल की बालयों पर अपना ठिकाना बनाते हैं.

* कटाई की मशीनों को अच्छी तरह साफ कर लें वरना थ्रेशर आदि में पहले से इन कीटों की किसी न किसी रूप में मौजूदगी बनी रहती है, जो अनाज को संक्रमित कर देती है.

* अनाज की ढुलाई के साधनों ट्रैक्टर या बैलगाड़ी आदि को कीटरहित कर लें.

* भंडारण से पहले गोदामों को साफ करें. दरारों की विशेष सफाई करें. मिट्टी से बने भंडारघरों में पहले से बने छेदों को मिट्टी या सीमेंट से बंद कर दें. जाले आदि की सफाई कर दें.

* चूहों के बिलों को शीशे के बारीक टुकड़े मिट्टी के घोल में मिला कर बंद कर दें.

* भंडारघरों की चूने से पुताई कराएं.

* मैलाथियान 50 फीसदी 3 लीटर मात्रा प्रति 100 वर्गमीटर की दर से ले कर भंडारघरों में छिड़काव करें. अनाज भरने के बोरों का भी कीटनाशकों से उपचार करें.

* ऐसे बीज जिन की बोआई अगली फसल में करनी हो, उन को कीटनाशी जैसे 6 मिलीलीटर मैलाथियान या 4 मिलीलीटर डेल्टामेथ्रिन को 500 मिलीलीटर पानी में घोल कर 1 क्विंटल बीज की दर से उपचारित करें व छाया में सुखा कर भंडारण करें.

* कीटनाशी द्वारा उपचारित इस प्रकार के बीजों को किसी रंग द्वारा रंग कर भंडार पात्र के ऊपर उपचारित लिख देते हैं. इस तरह का उपचार कम से कम 6 महीने तक प्रभावी होता है. पर ऐसा उपचार खाने वाले अनाजों में नहीं करना चाहिए.

* बीज भरी बोरियों या थैलों को लकड़ी की चौकियों, फट्टों या 1000 गेज की पौलीथीन चादर या बांस की चटाई पर रखना चाहिए ताकि उन में नमी का असर न हो सके.

पारद की टिकड़ी द्वारा अन्न का भंडारण : 1 क्विंटल अनाज के लिए 5-6 टेबलेट काफी होती हैं. यह एक आयुर्वेदिक दवा है. इस दवा से भंडारित अनाज किसी भी तरह स्वास्थ्य के प्रति नुकसानदायक नहीं होता है. इस टिकड़ी से कोई भी अन्न भंडारित किया जा सकता है.

अनाज भंडारण के लिए रसायनों का इस्तेमाल

एल्युमिनियम फास्फाइड : घुन व चूहे वगैरह को मारने के लिए इस रसायन का इस्तेमाल किया जाता है. बड़ेबड़े भंडारघर जो घरों से दूर होते हैं या व्यापारिक भंडारघरों में इस रसायन का इस्तेमाल 1 या 2 टिकिया प्रति मीट्रिक टन के हिसाब से किया जाता है. जैसे ही इस की टिकिया खोल कर हवा में बाहर निकाली जाती है, तो हवा के संपर्क में आते ही इस में से फास्फीन गैस तैयार होने लगती है, जो बेहद जहरीली होती है.

थोड़ी सी असावधानी से यह गैस जानलेवा हो सकती है. इसी कारण घरों में इस का इस्तेमाल नहीं किया जाता है. इन टिकियों को अनाज की मात्रा के हिसाब से गोदाम में बिखेर दिया जाता है. दवा डालने के बाद वायु अवरोधी गोदाम बंद कर देना चाहिए.

जिंक फास्फाइड : घर से दूर बने गोदामों में चूहे से सुरक्षा के लिए जिंक फास्फाइड को 1:39 के अनुपात में भुने दानों या आटे के साथ मिला कर चारा तैयार कर लेना चाहिए. इस में थोड़ा सा मीठा तेल अच्छी गंध के लिए मिला देना चाहिए. इस तरह बने चारे को 15 ग्राम की पुडि़या बना कर गोदामों में इधरउधर चूहों के चलनेफिरने के रास्ते में रख देना चाहिए और बिलों में भी पुडि़या रख कर बिल गीली मिट्टी से बंद कर देने चाहिए.

वारफैरिन, क्यूमैरिन : यह एक धीमा जहर है. इसे खा कर चूहे कई दिनों बाद मरते हैं, लिहाजा चूहों का पूरा परिवार धीरेधीरे इस के प्रभाव में आ जाता है. यह इनसानों और पालतू पशुओं के लिए काफी सुरक्षित है. इस दवा को भी 1:39 के अनुपात में दानों या आटे के साथ मिला कर थोड़ी चीनी भी मिलाते हैं. इस में थोड़ा मीठा तेल भी मिलाया जाता है.

Grain Storageभंडारण के खास निर्देश

अनाज के दानों को अच्छी तरह से सुखा दें, ताकि भंडारण करने के बाद अनाज खराब न हो. वैज्ञानिकों ने अनाज के भंडारण से पहले भंडारघर की सफाई पर भी जोर दिया है. सफाई के बाद ही अनाज का भंडारण करें. लोग घरों में अनाज का भंडारण तो करते हैं, लेकिन उन्हें भंडारण की विधि की ठीक जानकारी नहीं होती. ऐसे में अनाज ज्यादा दिनों तक ठीक नहीं रह पाता है, इसलिए जरूरी है कि भंडारघर में अनाज रखने से पहले  उस की अच्छी तरह से सफाई कर लें. सब से पहले बीज भंडारण के लिए इस्तेमाल होने वाले कमरे, गोदाम या पात्र जैसे कुठला आदि के छेदों व दरारों को गीली मिट्टी या सीमेंट से भर दें.

यदि भंडारण कमरे या गोदाम में करना है, तो उसे अच्छी तरह साफ करने के बाद 4 लीटर मैलाथियान या डीडीवीपी को 100 लीटर पानी में (40 मिलीलिटर कीटनाशी 1 लीटर पानी में) घोल कर हर जगह छिड़काव करें. बीज रखने के लिए नई बोरियों का इस्तेमाल करें. यदि बोरियां पुरानी हैं, तो उन्हें गरम पानी में 50 सेंटीग्रेड पर 15 मिनट तक भिगोएं या फिर उन्हें 40 मिलीलीटर मैलाथियान 50 ईसी या 40 ग्राम डेल्टामेथ्रिन 2.5 डब्ल्यूपी (डेल्टामेथ्रिन 2.8 ईसी की 38.0 मिलीलीटर मात्रा) प्रति लीटर पानी के घोल में 10 से 15 मिनट तक भिगो कर छाया में सुखा लें. इस के बाद उन में बीज या अनाज भरें.

यदि मटके में भंडारण करना है, तो पात्र में जरूरत के हिसाब से उपले डालें और उस के ऊपर 500 ग्राम सूखी नीम की पत्तियां डाल कर धुआं करें व ऊपर से बंद कर के वायु अवरोधी कर दें. उस पात्र को 4 से 5 घंटे बाद खोल कर ठंडा करने के बाद साफ कर के बीज या अनाज का भंडारण करें. यदि मटका अंदर व बाहर से एक्रीलिक (एनेमल) पेंट से पुता हो तो 20 मिलीलीटर मैलाथियान 50 ईसी को 1 लीटर पानी में मिला कर बाहर छिड़काव करें व छाया में सुखा कर इस्तेमाल करें.

बीज या अनाज भरने के बाद पात्र का मुंह बंद कर के उसे वायु अवरोधी कर दें. किसी भी जगह या पात्र में बीज रखने से पहले बीजों को अच्छी तरह सुखा लेना चाहिए, जिस से नमी की मात्रा 10 फीसदी या उस से कम रह जाए. कम नमी वाले बीजों को ज्यादातर कीट नुकसान नहीं पहुंचा पाते हैं.

यदि भंडारण गोदाम में कर रहे हैं, तो कभी भी पुराने बीज या अनाज के साथ नए बीज या अनाज को नहीं रखना चाहिए. भंडारण करने से पहले यह जांच कर लेनी चाहिए कि बीज में कीड़े लगे हैं या नहीं. यदि लगे हों, तो भंडारघर में रखने से पहले उन्हें एल्युमिनियम फास्फाइड द्वारा शोधित कर लेना चाहिए.

भंडारघर को 15 दिनों में 1 बार जरूर देखना चाहिए. बीजों में कीटों की मौजूदगी और फर्श व दीवारों पर जीवित कीट दिखाई देने पर जरूरत के मुताबिक कीटनाशी का छिड़काव करना चाहिए. यदि कीटों का प्रकोप शुरुआती है, तो 40 मिलीलीटर डीडीवीपी प्रति लीटर पानी के हिसाब से मिला कर बोरियों के ऊपर व हर जगह छिड़काव करें.

कीट नियंत्रण हो जाने के बाद हर 15 दिनों बाद कीटनाशकों को अदलबदल कर छिड़काव करते रहना चाहिए. भंडारघर के कचरे को जला दें या दबा कर नष्ट कर दें. भंडारघर की छत, दीवार व फर्श पर 1 भाग मैलाथियान 50 ईसी को 100 भाग पानी में मिला कर छिड़काव करें. यदि पुरानी बोरियों का इस्तेमाल करना पड़े, तो उन्हें 1 भाग मैलाथियान व 100 भाग पानी के घोल में 10 मिनट तक भिगो कर छाया में सुखा लें. उस के बाद अनाज का भंडारण करें. इस से अनाज ज्यादा दिनों तक ठीक रहता है.

बाजरे (Millet) की खेती

Millet : अगर कहा जाए कि सूखे मौसम या कम सिंचाई वाले खेतों के लिए बाजरा (Millet) बहुत ही उम्दा फसल है, तो यह बिलकुल सही बात होगी. बाजरा (Millet) फसल है, जो सूखा सहन करने वाली सभी तरह के अनाज वाली फसलों में सब से आगे है. यही वजह है कि बाजरे (Millet) की खेती राजस्थान के साथसाथ उत्तर प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, गुजरात, ओडिशा व पश्चिम बंगाल के सूखाग्रस्त इलाकों में भी बड़े पैमाने पर की जाती है.

सूखा सहनशील फसल होने के कारण ही बाजरे की खेती बहुत आसानी से गरमियों के मौसम में भी कर सकते हैं. बाजरा मोटे अनाजों की श्रेणी में आता है. यह कई रोगों को दूर करने के साथ ही साथ शरीर को फिट रखने में भी कारगर है. यही वजह है कि शहरों में लोग इस की ऊंची कीमत भी अदा करने को तैयार रहते हैं.

मिट्टी : बाजरे की खेती के लिए अच्छी जल निकास वाली हलकी दोमट या बलुई दोमट मिट्टी अच्छी होती है.

खेत की तैयारी : पहली बार की जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें और उस के बाद 2-3 बार देशी हल या कल्टीवेटर से जुताई कर के खेत को तैयार करें.

बोआई का समय और विधि: बोआई का सही समय मध्य जुलाई से ले कर मध्य अगस्त तक का है. ध्यान रहे कि इस की बोआई लाइन से करने पर ज्यादा फायदा होता है. लाइन से लाइन की दूरी 45 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 10 से 15 सेंटीमीटर रखें. बीज बोने की गहराई तकरीबन 4 सेंटीमीटर तक ठीक रहती है.

बीज दर और उपचार : इस की बोआई के लिए प्रति हेक्टेयर 4-5 किलोग्राम बीजों की जरूरत होती है. बीजों को 2.5 ग्राम थीरम या 2 ग्राम कार्बेंडाजिम से प्रति किलोग्राम बीज की दर से शोधित कर लेना चाहिए.

खरपतवार नियंत्रण : अच्छा होगा कि खरपतवारों को निराईगुड़ाई कर के निकाल दें. इस से एक ओर जहां मिट्टी में हवा और नमी पहुंच जाती है, वहीं दूसरी ओर खरपतवार भी नहीं पनप पाते हैं. खरपतवारों की रासायनिक दवाओं से रोकथाम करने के लिए एट्राजीन 50 फीसदी नामक रसायन की 1.5-2 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से ले कर 700-800 लीटर पानी में मिला कर बोआई के बाद व जमाव से पहले एक समान रूप से छिड़काव कर देना चाहिए.

Millet

खाद और उर्वरक : खाद और उर्वरकों का इस्तेमाल खेत की मिट्टी की जांच के आधार पर मिली सलाह के मुताबिक करना चाहिए. हालांकि मोटे तौर पर संकर प्रजातियों (हाईब्रिड) के लिए 80-100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम फास्फोरस और 40 किलोग्राम पोटाश व देशी प्रजातियों के लिए 40-50 किलोग्राम नाइट्रोजन, 25 किलोग्राम फास्फोरस व 25 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए. फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन की आधी मात्रा बोआई से पहले इस्तेमाल करें. नाइट्रोजन की बची हुई आधी मात्रा टापड्रेसिंग के रूप में जब पौधे 25-30 दिनों के हो जाएं तो छिटक कर दें.

सिंचाई : ज्यादातर देखने में आता है कि बरसात का पानी ही इस के लिए सही होता है. यदि बरसात का पानी न मिल सके, तो 1-2 बार फूल आने पर जरूरत के मुताबिक सिंचाई करनी चाहिए.

रोग प्रबंधन : बाजरे में खासतौर पर कंडुआ, अरगट और बाजरे का हरित बाल (डाउनी मिल्ड्यू) रोग लगते हैं, जिन के बारे में विस्तार से जानकारी निम्न प्रकार है:

अरगट : यह रोग भुट्टों या बालियों के कुछ दानों पर ही दिखाई देता है. इस में दाने के स्थान पर भूरे काले रंग की सींग के आकार की गांठे बन जाती हैं, जिन्हें स्कलेरोशिया कहते हैं. प्रभावित दाने इनसानों और जानवरों के लिए नुकसानदायक होते हैं, क्योंकि उन में विषैला पदार्थ होता है. इस रोग की वजह से फूलों में से हलके गुलाबी रंग का गाढ़ा और चिपचिपा पदार्थ निकलता है, जो सूखने पर कड़ा हो जाता है.

इस की रोकथाम के लिए बोने से पहले 20 फीसदी नमक के घोल में बीजों को डुबो कर स्कलेरोशिया अलग किए जा सकते हैं. खड़ी फसल में इस की रोकथाम के लिए फूल आते ही घुलनशील मैंकोजेब चूर्ण को 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 5-7 दिनों के अंतराल पर छिड़कना करना चाहिए.

कंडुआ : इस रोग में दाने आकार में बड़े, गोल, अंडाकार व हरे रंग के हो जाते हैं, जिन में काला चूर्ण भरा होता है. मंड़ाई के समय ये दाने फूट जाते हैं, जिस से उन में से काला चूर्ण निकल कर, स्वस्थ दानों पर चिपक जाता है.

इस की रोकथाम के लिए किसी पारायुक्त रसायन से बीज शोधित कर के बोने चाहिए. सावधानी के लिए एक ही खेत में हर साल बाजरे की खेती नहीं करनी चाहिए.

हरित बाली रोग : इसे अंगरेजी में डाउनी मिल्ड्यू नाम से जाना जाता है. यह एक फफूंद जनक रोग है. इस रोग में बाजरे की बालियों के स्थान पर टेढ़ीमेढ़ी हरी पत्तियां सी बन जाती हैं, जिस से पूरी की पूरी बाली झाड़ू के समान नजर आती है और पौधे बौने रह जाते हैं.

इस रोग से बचाव के लिए अरगट रोग की तरह रासायनिक दवा का छिड़काव करें और बोआई से पहले बीजों का शोधन करें. रोगग्रसित पौधों को काट कर जला दें.

कीट प्रबंधन : बाजरे में दीमक, तना मक्खी, तना छेदक और मिज कीट का प्रकोप कभीकभी देखने को मिलता है. इन कीटों की रोकथाम के लिए किसी स्थानीय विशेषज्ञ से मिली सलाह के मुताबिक किसी असरकारक रासायनिक दवा का छिड़काव करना चाहिए.

Millet

कुछ और ध्यान रखने वाली बातें

* इलाके की अनुकूलता के हिसाब से बताई गई प्रजातियों के बीज प्रयोग करें.

* यदि बरसात नहीं हो पा रही है, तो सिंचाई जरूर करें. ध्यान रहे कि फूल आने पर सिंचाई ज्यादा जरूरी होती है.

* बोआई के 15 दिनों बाद कमजोर पौधों को खेत से उखाड़ कर पौधे से पौधे की दूरी 10-15 सेंटीमीटर कर देनी चाहिए. इस के अलावा ज्यादा नजदीक जमे पौधों को उखाड़ कर खाली जगहों पर लगा देना चाहिए.

Nursery : प्रो ट्रे में सब्जियों की नर्सरी उत्पादन की नई तकनीक

Nursery: नए जमाने के किसानों ने सब्जी उत्पादन बढ़ाने के लिए नई तकनीकों का इस्तेमाल किया है, जिस से उन की माली हालत में सुधार हुआ है. इन नई तकनीकों में प्रो ट्रे में सब्जियों की पौध उगाना खास है.

उच्च तकनीक से सब्जियों की पौध तैयार करने से पौधों को वानस्पतिक तरीकों से संरक्षित वातावरण में विकसित किया जा सकता है, जिस से रोगरहित उच्च गुणवता वाली पौध तैयार की जा सकती है.

उच्च तकनीकी नर्सरी लगाने के लाभ

* बीज अंकुरण अच्छा होता है.

* ट्रे में पौधों के लिए काफी जगह होने से सभी पौधों का एकसमान विकास होता है.

* महंगे व हाइब्रीड बीजों का अच्छा इस्तेमाल.

* नर्सरी में कीट, बीमारी व खरपतवार की समस्या कम रहती है.

* पौली हाउस में सही वातावरण होने की वजह से बीज का जमाव व पौधों का विकास बहुत अच्छा होता है.

* प्रो ट्रे में पौधों को रोपाई के लिए आसानी से कैविटी से निकाल कर मिट्टी में लगा देते हैं. पौधों की जड़ें आसानी से मिट्टी में लग जाती हैं.

* प्रो ट्रे विधि से तैयार पौधे लगाने से फसल की बढ़वार समान होती है.

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प्रो ट्रे में नर्सरी तैयार करना

मिट्टी रहित नर्सरी तैयार करने के लिए निम्नलिखित चीजों की जरूरत होती है:

प्रो ट्रे  : पौलीप्रोपेलीन से बनी हुई विभिन्न कैविटी वाली ट्रे बाजार में मिलती हैं, पर आमतौर पर सब्जी की नर्सरी लगाने के लिए 98 कैविटी युक्त ट्रे का इस्तेमाल किया जाता है. 1 प्रो ट्रे को 4-5 बार इस्तेमाल किया जा सकता है.

कोकोपीट : यह पूर्ण विघटित धुला हुआ निर्जीमिक्रत कोयर इंडस्ट्री का बाई प्रोडक्ट है.

परलाइट : यह हलकी एल्यूमिनियम सिलिकेट चट्टानों का ज्यादा तापमान पर गरम किया हुआ पौपकार्न की तरह फूला हुआ पदार्थ है. इस का इस्तेमाल वायु संचार व जलधारण कूवत को बढ़ाता है.

वेर्मीकुलाइट : यह एक माइका है, इस में कैल्शियम व मैग्नीशियम तत्त्व भी पाए जाते हैं.

नर्सरी उगाने की विधि

* कोकोपीट नर्सरी लगाने से करीब 12 घंटे पहले पानी में भिगो लेना चाहिए और फालतू पानी को निकलने देना चाहिए.

* आयतन के हिसाब से 3:1:1 के अनुपात में कोकोपीट, परलाइट, वेर्मीकुलाइट को ले कर अच्छी तरह मिला देना चाहिए. इन चीजों को कभी ग्राम या किलोग्राम में न लें. इन्हें केवल आयतन (जैसे 3 बाल्टी कोकोपीट, 1 बाल्टी परलाइट व 1 बाल्टी वर्मीकुलाइट) के मुताबिक लें.

* मिश्रण को अच्छी तरह प्रो ट्रे की कैविटी में भर देना चाहिए.

* मिश्रण से भरी ट्रे को फुहारे से थोड़ा सा सींचना चाहिए.

* इस के बाद हर एक कैविटी में बीज के आकार के आधार पर गड्ढे बना कर उपचारित बीजों की बोआई करनी चाहिए.

* 1 कैविटी में 1 ही बीज लगाया जाता है. बड़े क्षेत्र में व्यावसायिक पौध तैयार करने के लिए कई तरह की आटोमैटिक बोआई मशीनें मौजूद हैं.

* बोआई के तुरंत बाद कैविटी की ऊपरी परत (जिस में बीज बोया गया है) को वर्मीकुलाइट की परत से (करीब आधा सेंटीमीटर) ढक देना चाहिए. इस से हरी शैवाल की बढ़वार नहीं होती है व वायु संचार भी अच्छी तरह होता है.

* फिर एक के ऊपर एक ट्रे को रख कर उन्हें पौलीथीन की शीट से ढक देना चाहिए ताकि प्रो ट्रे में 100 फीसदी नमी बनी रहे, जिस से कि बीजों का जमाव अच्छा हो.

* बीजों का अंकुरण होने पर ट्रे को अलगअलग कर देना चाहिए.

* करीब 4-7 दिनों में बीजों का जमाव हो जाता है. बीज के जमाव में लगने वाला समय फसल के प्रकार पर निर्भर करता है.

* अंकुरण होने पर प्रो ट्रे को अलगअलग कर के 15 सेंटीमीटर ऊंची क्यारियों पर 50 फीसदी छायाघर में या वातावरण नियंत्रित पौलीहाउस में रख देना चाहिए.

* जड़ सड़न व उकटा के प्रकोप से बचने के लिए फफूंदनाशी दवा (कापर आक्सीक्लोराइड 3 ग्राम प्रति लीटर या कार्बेंडाजिम 1 ग्राम प्रति लीटर) का इस्तेमाल करें.

* नर्सरी का एक चरण पूरा होने के बाद जब प्रो ट्रे खाली हो जाती हैं, तब उन को अच्छी तरह से साफ पानी से धो देना चाहिए. फिर प्रो ट्रे को रोगाणु रहित करने के लिए कपास के छोटे से टुकड़े को फोर्मेलीन घोल में डुबो कर हर कैविटी को अच्छी तरह साफ करना चाहिए. अच्छी तरह सूखने के बाद इन्हें एक के ऊपर एक रख कर पौलीथीन शीट से अच्छी तरह पैक कर के अगली बोआई के लिए रख देना चाहिए.

प्रो ट्रे नर्सरी के लिए उर्वरक

जब पौधों  में 2 पत्तियां आ जाएं तब 5 ग्राम एनपीके 19:19:19 उर्वरक प्रति 10 लीटर पानी के हिसाब से घोल बना कर रोजाना सिंचाई के साथ देना चाहिए. सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की खुराक के लिए भिन्नभिन्न प्रकार के मल्टी सूक्ष्म पोषक तत्त्व मिश्रण मिलते हैं, जैसे मैक्स व टेकनोवा 2 वगैरह. इन का 1 ग्राम प्रति लीटर पानी में घोल बना कर हफ्ते में 2 बार छिड़काव करना चाहिए. इस से पौधों को अच्छा पोषण मिलता है व पौधों का विकास अच्छा होता है, जिस से ज्यादा पैदावार होती है.

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सिंचाई

सर्दी के मौसम में दिन में 2 बार व गरमी में 3 बार सिंचाई करनी चाहिए. सिंचाई के पानी की गुणवत्ता जानने के लिए निम्नलिखित 3 मापक हैं:

पीएच : सिंचाई के पानी का पीएच 6.4-7 तक होना चाहिए. पीएच का सुधार नाइट्रिक एसिड, फास्फोरिक एसिड या एचसीएल जैसे रसायनों से सिंचाई के पानी को उपचारित कर के किया जाता है.

टीडीएस : टीडीएस पानी में पाए जाने वाले घुलनशील पदार्थों का मापक होता है.

नमक की मात्रा : नमक की मात्रा 1-2 डेसी साइमन होनी चाहिए. साफ पानी से सिंचाई करने से पौधों का विकास अच्छा होता है और अधिक पैदावार हासिल होती है.

पौधों में तनाव देना

प्रो ट्रे  नर्सरी उत्पादन में कृत्रिम रूप से तनाव देना बहुत खास काम है. पौधों की खेत में रोपाई से पहले उन्हें तनाव देने से पौधे खेत में आसानी से पनपते हैं. तनाव के लिए पौधों की 3-4 दिनों तक थोड़ाथोड़ा मुरझाने पर रोकरोक कर सिंचाई की जाती है, जिस से पौधे मजबूत हो जाते हैं.

Goat Farming : बकरीपालन के लिए नई मशीनें

Goat Farming : बकरी फार्म की सफलता इस बात पर बहुत ज्यादा निर्भर करती है कि फार्म में बकरी के बच्चों द्वारा मां का दूध छोड़ने से पहले बकरी के बच्चों की मृत्यु दर कितनी है. ऐसा देखा गया है कि दूध छुड़वाने की उम्र से पहले मृत्यु दर करीब 7 से 51 फीसदी तक होती है. इसलिए यह माना जा सकता है कि फार्म में जितनी कम मृत्यु दर हो, उतना अच्छा और लाभकारी फार्म होगा. यह भी पाया गया है कि सब से ज्यादा बकरी के बच्चों की मृत्यु उन के जन्म के पहले व दूसरे दिन होती है.

निम्न वजहों से बकरी अपने बच्चों को छोड़ सकती है:

* कभीकभी ऐसा होता है कि बकरी अपने नवजात बच्चे को जन्म के 24 घंटे के भीतर ही छोड़ देती है. ऐसा इस कारण से भी हो सकता है कि बकरी ने पहली बार बच्चा दिया हो और उसे बच्चों को दूध पिलाने का कोई तजरबा न हो.

* कभीकभी बकरी बच्चों को इसलिए भी दूध पिलाना छोड़ देती है, क्योंकि दूध पिलाते समय उसे गुदगुदी होती है.

* कभी ऐसा भी होता है कि बकरी के थन में किसी प्रकार की चोट होती है, जिस के कारण वह दूध नहीं पिलाना चाहती है.

* एक कारण यह भी हो सकता है कि बकरी के थनों में दूध का उत्पादन ही नहीं हो रहा हो.

* यह भी पाया गया है कि जब बकरी में दूध के उत्पादन की ताकत कम हो और वह 2 या ज्यादा बच्चों को जन्म दे, तो वह कुछ बच्चों को दूध पिलाना छोड़ देती है.

* कभीकभी बच्चे बहुत कमजोर पैदा होते हैं और उन का जन्म के समय वजन 1 किलोग्राम से भी कम होता है, लिहाजा उन की मौत हो जाती है.

* यही नहीं वे बच्चे भी मर जाते हैं, जिन की मां की मौत किसी वजह से हो गई हो.

* थनों की बीमारी जिसे मेस्टाइटिस या थनैला रोग कहते हैं की वजह से भी बकरी के दूध का उत्पादन कम हो सकता है. ऐसे में बच्चों को दूध नहीं मिल पाता है.

अब कारण कोई भी हो, यदि बच्चों को उन की मां का दूध नहीं मिलता है, तो वे लाचार हो जाते हैं. इन बच्चों के लिए यह बहुत जरूरी है कि उन को कृत्रिम रूप से दूध पिलाया जाए ताकि उन के जीवन की रक्षा की जा सके. यदि 1 या 2 ही ऐसे लाचार बकरी के ही बच्चे हों, तो उन को दूध पिलाने के लिए इनसानी बच्चों की दूध की बोतल इस्तेमाल की जा सकती है.

व्यावसायिक रूप से चलने वाले बकरी के फार्म में ऐसे बच्चों की संख्या ज्यादा हो सकती है, जिन को उन की मां दूध नहीं पिला पाती. ऐसे बच्चों के लिए दूध पिलाने वाली मशीन का इस्तेमाल किया जा सकता है.

Goat Farming

इस मशीन की मदद से एकसाथ 6 बच्चों को दूध पिला सकते हैं. इस मशीन के बीच में एक घेरा बना हुआ होता है, जो 6 अलगअलग खानों से जुड़ा होता है. जब हम दूध की एक तय मात्रा को मशीन के केंद्र पर स्थित खाने में उड़ेलते हैं, तो वह दूध स्वतंत्र रूप से 6 बराबर हिस्सों में बंट जाता है. इन 6 खानों से निप्पलें जुड़ी होती हैं और जब बकरी का बच्चा उन को चूसता है, तो उस खाने में पहुंचा हुआ दूध उस के हिस्से में आ जाता है. इस तरह बहुत ही कम समय में 6 बच्चों के ग्रुप को दूध पिलाया जा सकता है.

बकरी के बच्चों को शुरुआत में इस मशीन के पास ले जाना पड़ता है, जिस के बाद उन की ट्रेनिंग हो जाती है और वे खुद ही दूध पीने के लिए मशीन के पास चले आते हैं.

यह एक बहुत ही साधारण मशीन है, जिस का इस्तेमाल बकरी फार्म में करना बहुत ही आसान है. इस की मदद से बहुत ही कम मेहनत से बकरी के बच्चों को दूध पिलाया जा सकता है और उन की जान को बचाया जा सकता है. इस्तेमाल के बाद मशीन व निप्पलों की सफाई का खयाल रखना जरूरी है.

इस के अलावा बकरियों को चारा खिलाने की एक बेलनाकार मशीन भी होती है. इस में हरे चारे को या भूसे को आसानी से भरा जा सकता है. इस की बनावट ऐसी है कि जो भी चारा बकरियों द्वारा खा लिया जाता है, उस की जगह ऊपरी भाग में मौजूद चारा ले लेता है.

बकरियों का समूह जिस में छोटी या बड़ी सभी प्रकार की बकरियां हो सकती हैं, बेहद आसानी से मशीन के चारों ओर खड़ी हो कर चारे को खा सकती हैं. इस मशीन का खास फायदा यह है कि बहुत कम जगह पर ज्यादा बकरियों को आसानी से चारा या दाना खिलाया जा सकता है. पूरा चारा इस मशीन के अंदर ही भरा होता है, बकरियों या उन के बच्चों के पैरों के नीचे दब कर चारा बर्बाद नहीं हो पाता है. इस प्रकार कीमती चारे को खराब होने से बचाया जा सकता है.

Goat Farming

बकरियां चारे को नोचनोच कर खाना पसंद करती हैं. यह इस मशीन की बनावट के कारण आराम से मुमकिन है. जब बकरियां चारा मशीन के ऊपरी भाग से चारा खींचती हैं, तो उस में से नीचे गिरने वाला चारे का हिस्सा मशीन के निचले भाग में बनी हुई गोलाकार ट्रे में ही गिर जाता है. वहां से छोटी बकरियां आसानी से उसे उठा लेती हैं. इस प्रकार अच्छाखासा चारा बरबाद होने से बच जाता है. इस गोलाकार ट्रे में हम बकरियों का दाना भी डाल सकते हैं, जिसे बकरियां आसानी से खा सकती हैं.

अगर इन मशीनों को बकरियों के पालन में इस्तेमाल किया जाए तो एक तरफ बकरियों के बच्चों की मृत्यु दर को घटाया जा सकता है और दूसरी ओर कम जगह में ज्यादा बकरियों का आसानी से पालन किया जा सकता है.

Vermicompost : घर में बनाएं वर्मी कंपोस्ट

वर्मी कंपोस्ट (Vermicompost) को टैंक, क्यारी और ढेर विधि से तैयार किया जा सकता है. कचरों के ढेर को काटपीट कर 10 फुट लंबे, 3 फुट चौड़े और ढाई फुट गहरे टैंक या गड्ढे में डाल दिया जाता है. इस से केंचुओं को कचरों को खाने और पचाने में आसानी हो जाती है.

टैंक में कचरा बिछाने के बाद उस पर पानी मिला गोबर डाल दिया जाता है. हर टैंक में 5000 या 5 किलोग्राम केंचुओं को डाल दिया जाता है.

कचरे में सही नमी बनाए रखने के लिए गरमी के मौसम में रोज 2 बार और ठंड के मौसम में रोज 1 बार पानी का छिड़काव किया जाना जरूरी है, ताकि 30 फीसदी नमी बनी रहे. वर्मी कंपोस्ट बनाने वाली जगह को ऊपर से जूट के भीगे बोरे से ढक देने पर नमी और अंधेरे में केंचुए ज्यादा तेजी से काम करते हैं.

केंचुए ऊपर से खाना शुरू करते हैं और धीरेधीरे नीचे जाते हैं, इस से ऊपर का कचरा पहले वर्मी कंपोस्ट में बदलता है. 35-40 दिनों के बाद से कचरे की ऊपरी सतह पर केंचुओं द्वारा छोड़ा गया मल दिखने लगता है. करीब 70 से 75 दिनों में वर्मी कंपोस्ट तैयार हो जाता है.

वर्मी कंपोस्ट बनाने वाले मोकामा के किसान रामअवतार बताते हैं कि तैयार होने पर वर्मी कंपोस्ट बगैर बदबू का बारीक, दानेदार और गहरा लाल रंग लिए चाय की पत्ती की तरह दिखता है. वर्मी कंपोस्ट को इकट्ठा कर के 2 एमएम की छलनी से छान कर पैकेटों में भरना चाहिए.

कृषि वैज्ञानिक बजेंद्र मणि बताते हैं कि वर्मी कंपोस्ट मिट्टी को उपजाऊ बनाने के अलावा उस की जलधारण कूवत को भी बढ़ाता है. इस का पीएच 7 से 7.5 के बीच होता है. इस से मिट्टी में ज्यादा समय तक नमी बनी रहती है, लिहाजा सिंचाई का खर्च कम हो जाता है. इस में नाइट्रोजन, फास्फेट और पोटाश के साथसाथ सभी पोषक और सूक्ष्म तत्त्व मौजूद रहते हैं.

खेत की तैयारी के समय प्रति हेक्टेयर 25-30 क्विंटल वर्मी कंपोस्ट का इस्तेमाल करना चाहिए. पौधे लगाने के 15 दिनों बाद प्रति हेक्टेयर 12 से 15 क्विंटल वर्मी कंपोस्ट डालना होता है. खाद्यान्न फसलों में प्रति हेक्टेयर 50 से 60 क्विंटल और सब्जियों में प्रति हेक्टेयर 100 से 120 क्विंटल वर्मी कंपोस्ट डालना चाहिए. फलदार पेड़ों में प्रति पेड़ 1 से 5 किलोग्राम, सजावटी पौधों में प्रति गमला 100 ग्राम वर्मी कंपोस्ट डालने की जरूरत होती है.

कैमिकल खादों की जगह वर्मी कंपोस्ट यानी केंचुआ खाद का इस्तेमाल कर के मिट्टी और फसलों को बचाया जा सकता है. फसलों के कचरों, घासफूस, कूड़ा, गोबर, सड़ेगले फल और सब्जियों को केंचुए वर्मी कंपोस्ट में बदल देते हैं. अमूमन, हर केंचुआ 1 ग्राम का होता है और वह 24 घंटे में 1 ग्राम बीट निकालता है. 1 वर्गमीटर में बनी क्यारी में करीब 1000 केंचुए डालने पर रोज 1 किलोग्राम वर्मी कंपोस्ट तैयार हो जाता है.

Vermicompostइपीजीइक केंचुए मेन्योर वर्म या कंपोस्ट वर्म के नाम से जाने जाते हैं. ये कूड़ाकरकट के ढेर या जमीन की सतह पर सड़ते हुए किसी भी जैविक पदार्थ की परत तक सीमित रहते हैं. ये सड़ती हुई कार्बनिक चीजों को हजम कर जाते हैं. ये काफी कम समय तक जीवित रहेते हैं, पर इन की प्रजनन दर काफी ज्यादा होती है. एंडोजीइक केंचुए जमीन की निचली खनिजयुक्त परतों में रहते हैं और कार्बनिक चीजों के बजाय मिट्टी खाने में इन की ज्यादा दिलचस्पी होती है. एनेसिक केंचुआ बहुत जटिल और गहरी सुरंग बना कर रहते हैं. ये पत्ते ज्यादा खाते हैं.

वर्मी कंपोस्ट बनाने में बरती जाने वाली सावधानियां

* विधिवत ट्रेनिंग ले कर ही वर्मी कंपोस्ट बनाना शुरू करें.

* गोबर और कूड़ा कम से कम 20 दिन पुराना जरूर हो, क्योंकि ताजा गोबर में केंचुए मर जाते हैं.

* केंचुओं को सूरज की रोशनी, ज्यादा पानी, ज्यादा गरमी, चीटियों, मेंढकों, सांपों और चिडि़यों से बचाने के उपाय करना जरूरी है.

* नमी बनाए रखने के लिए जरूरत के मुताबिक पानी का छिड़काव करते रहें.

* वर्मी कंपोस्ट बनाने से ले कर पैकिंग करने तक का काम छायादार जगह पर ही करें.

Biogas Plant : आधुनिक गोबर गैस प्लांट आय बढ़ाने का तकनीकी संयंत्र

Biogas Plant : आज भी कई किसान खेतीबारी के साथसाथ पशुपालन भी करते हैं, इस से उन की आय में बढ़ोतरी भी होती है. कुछ लोग गोबर के उपले बनाते हैं या फिर गोबर को इकट्ठा करते रहते हैं, जिसे बाद में खाद के रूप में इस्तेमाल करते हैं. तो क्यों न इस आमदनी को और ज्यादा बढ़ाने की दिशा में काम किया जाए. क्यों न हम गोबर गैस प्लांट (Biogas Plant) लगाएं, जिस से हमें ऊर्जा के साथ उन्नत किस्म की गोबर की खाद भी मिलेगी.

चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय हिसार के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा संशोधित गोबर गैस प्लांट (Biogas Plant) तैयार किया है, जिस में काफी में ऊर्जा पैदा होती है और इस गोबर गैस प्लांट (Biogas Plant) की सहायता से गैस का चूल्हा जलाया जा सकता है, रोशनी के लिए बल्ब जलाए जा सकते हैं और कम हार्स पावर का इंजन भी चला सकते हैं. गोबर गैस प्लांट (Biogas Plant) से बेकार निकला गोबर जो पूरी तरह से सड़ जाता है, वह एक बढि़या खाद का काम करता है, जिस के इस्तेमाल से खेती की जमीन की पैदावार कूवत बढ़ती है. इस से रासायनिक खादों का भी इस्तेमाल कम करना पड़ता है.

आज हरियाणा में 1 करोड़ टन गोबर का 69 फीसदी भाग गोबर की खाद बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है. 28.5 फीसदी गोबर उपले बनाने के काम आता है और मात्र 2.5 फीसदी गोबर बायोगैस प्लांट में इस्तेमाल करते हैं.

कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर हम सारे गोबर का इस्तेमाल गोबर गैस प्लांट के लिए करें तो 40 करोड़ घन मीटर गैस हर साल पैदा की जा सकती है, इस में इस्तेमाल किए गए गोबर से 50 लाख टन जैविक खाद भी बनेगी, जिस खाद में खेती के लिए फायदेमंद नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश जैसे सूक्ष्म तत्त्व भी मौजूद होंगे.

हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिकों ने गोबर द्वारा चलने वाले जनता मौडल के बायोगैस प्लांट को संशोधित कर  के यह नया डिजाइन तैयार किया है, जो ताजे गोबर से चलता है. इस नए डिजाइन के प्लांट में गोबर डालने का पाइप 12 इंच चौड़ा होता है ताकि गोबर बिना पानी के सीधे ही डाला जा सके. गोबर के निकलने की जगह को भी चौड़ा रखा गया है, जिस से गोबर गैस के दबाव से खुद बाहर आ सके. निकलने वाला गोबर काफी गाढ़ा होता है, जिसे कस्सी की सहायता से खेत में डाला जा सकता है.

शुरूशुरू में गोबर गैस प्लांट बनाने के बाद उस में गोबर व पानी का घोल बराबर मात्रा में डाल दिया जाता है. इस के बाद गैस की निकासी का पाइप बंद कर के 10-15 दिनों के लिए छोड़ दिया जाता है.

जब गोबर की निकासी वाली जगह से गोबर आना शुरू हो जाता है, तो प्लांट में ताजा गोबर बिना पानी के प्लांट के आकार के मुताबिक सही मात्रा में हर रोज एक बार डालना शुरू कर दिया जाता है और उस से बनने वाली गोबर गैस को जरूरत के मुताबिक इस्तेमाल किया जा सकता है, साथ ही निकलने वाले गोबर को खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. यह गोबर की खाद खेती के लिए बहुत फायदेमंद होती है.

गोबर गैस प्लांट से जुड़ी ज्यादा जानकारी के लिए अध्यक्ष, सूक्ष्मजीव विज्ञान विभाग, चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार, फोन नंबर 01662-285292 से संपर्क कर सकते हैं.

इस प्लांट की खासीयत

* इस प्लांट को लगाने में जगह व पैसे की लागत दूसरे डिजाइन के मुकाबले कम आती है. इसे घर के आंगन में भी लगा सकते हैं. इस के आसपास की जगह साफसुथरी रहती है और बदबू नहीं आती.

* 3-4 पशुओं के गोबर से चलने वाले 2 घन मीटर का प्लांट लगाने का खर्चा तकरीबन 20000 रुपए है. इस से बनने वाली गैस से 4-5 सदस्यों का 3 वक्त का खाना आसानी से बन सकता है.

* इस में ताजा गोबर डाला जाता है. गोबर को पानी में घोल कर डालने की जरूरत नहीं होती, जिस से समय और मेहनत दोनों की बचत होती है. अगर आप मुरगीपालन भी करते हैं, तो गोबर के साथ मुरगी की खाद (10 फीसदी) भी मिला कर डाल सकते हैं, जिस से 10 से 15 फीसदी गैस ज्यादा बनती है और खाद की गुणवत्ता भी बढ़ती है.

* गोबर गैस प्लांट को लैट्रीन से साथ जोड़ कर भी गैस की मात्रा व खाद की गुणवत्ता बढ़ाई जा सकती है.

* बाहर निकलने वाला गोबर (सलरी) गाढ़ा होता है. इसलिए इसे इकट्ठा करने के लिए गड्ढे की जरूरत नहीं पड़ती, इसे आसानी से इकट्ठा किया जा सकता है और खेत में डाला जा सकता है.

* निकली गोबर खाद में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश की मात्रा गोबर के मुकाबले ज्यादा होती है और इस का इस्तेमाल करने से जमीन की गुणवत्ता बढ़ती है. इस में नीम, आक या धतूरे के पत्ते मिला कर डालने से खेत में कीड़ों व बीमारियों का हमला नहीं होता.

* सही तरह से बना हुआ बायोगैस प्लांट कई सालों तक बिना कठिनाई के चलता रहता है.

* गोबर गैस प्लांट लगवाने के लिए भारत सरकार समयसमय पर किसानों को अनुदान भी देती है. इस के लिए किसान अपने नजदीकी कृषि अधिकारी से संपर्क कर सकते हैं.

बगीचे (Garden) लगाने से पहले करें जरूरी काम

फलों के बाग (Garden) लगाना आमदनी का अच्छाखासा जरीया साबित हो रहा है. मगर बगैर पूरी जानकारी के बाग (Garden) लगाना घाटे का सौदा साबित होता है. इसलिए वैज्ञानिक तरीके से बाग (Garden) लगाने में ही भलाई है.

बगीचा (Garden) लगाने से पहले निम्न जरूरी बातों का ध्यान रखना चाहिए:

फलों के बाग की योजना : ज्यादातर फलों के पेड़ लंबे समय के लिए होते हैं, इसलिए बाग इस तरह लगाए जाएं, ताकि उन से फायदा मिलता रहे, देखने में अच्छा लगे, देखभाल में कम खर्च हो, पेड़ स्वस्थ रहें और बाग में मौजूद साधनों का पूरा इस्तेमाल हो सके. उद्यान यानी बाग की योजना इस तरह की होनी चाहिए कि हर फल वाले पेड़ को फैलने के लिए सही जगह मिल सके व फालतू जगह नहीं रहे और हर पेड़ तक सभी सुविधाएं आसानी से पहुंच सकें.

फलों के उत्पादन के लिए सिंचाई का इंतजाम, मिट्टी व जलवायु वगैरह ठीक होनी चाहिए. बाग में काम करने के लिए मजदूर व तकनीकी कर्मचारी भी होने चाहिए.

जमीन का चयन : प्रधानमंत्री मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के तहत आप अपने नजदीकी कृषि पर्यवेक्षक के माध्यम से मिट्टी की जांच सकते हैं. फल उद्यानों यानी फलों के बगीचों के लिए गहरी, दोमट या बलुई दोमट मिट्टी अच्छी रहती है. जमीन में ज्यादा गहराई तक कोई भी सख्त परत नहीं होनी चाहिए. जमीन में भरपूर मात्रा में खाद होनी चाहिए व जल निकासी का सही इंतजाम होना चाहिए. लवणीय व क्षारीय जमीन में बेर, आंवला, लसोड़ा, खजूर व बेलपत्र वगैरह फल लगाने चाहिए.

पौधों का चयन : राजस्थान की जलवायु में खासतौर से अनार, आम, पपीता, करौंदा, आंवला, नीबू, मौसमी, माल्टा, संतरा, अनार, बेल, बेर व लसोड़ा आदि फलों की खेती आसानी से की जा सकती है. जिन भागों में पाले का ज्यादा असर रहता है, उन इलाकों में आम, पपीता व अंगूर के बाग नहीं लगाने चाहिए. ज्यादा गरमी व लू वाले इलाकों में लसोड़ा व बेर के पेड़ लगाने चाहिए. अधिक नमी वाले इलाकों में मौसमी, संतरा व किन्नू के पेड़ लगाने चाहिए.

Garden

वायुरोधी पेड़ लगाना : गरम व ठंडी हवाओं और अन्य कुदरती दुश्मनों से रक्षा करने के लिए खेत के चारों ओर देशी आम, जामुन, बेल, शहतूत, खिरनी, देशी आंवला, कैथा, शरीफा, करौंदा, इमली आदि फलों के पेड़ लगाने चाहिए. इन से खेत गरम रहेगा व सर्द हवाओं से बचा रहेगा. अगर बाग का इलाका कम हो तो केवल उत्तर व पश्चिम दिशा में 1 या 2 लाइनों में इन पेड़ों को लगा सकते हैं.

ध्यान रहे कि इन पेड़ों की जड़ें बाग में घुस कर पोषक तत्त्वों का इस्तेमाल करने लग जाती हैं, जिस का नतीजा यह होता है कि उद्यान की उपज में कमी आने लगती है. इस से बचने के लिए उद्यान व बाड़ के बीच में 3 साल में 1 बार 3 फुट गहरी खाई खोद कर जड़ों को काट देना चाहिए.

सिंचाई : बगीचा लगाने से पहले सिंचाई कैसे होगी, इस पर ध्यान देना जरूरी है. पानी की कमी वाले इलाकों में बूंदबूंद सिंचाई विधि का इस्तेमाल करना चाहिए, जिस से पानी व मेहनत दोनों की बचत होगी और पौधों को जरूरत के हिसाब से पानी मिलने के कारण पैदावार में बढ़ोतरी होगी.

सिंचाई की नालियां पौधों की कतारों के बीच से निकाल कर दोनों ओर पौधों की जरूरत के हिसाब से थाले बना कर पानी दिया जाना चाहिए. पौधों की कतार में सीधी सिंचाई करने से पौधों में रोग फैलने की संभावना बढ़ जाती है और नाली का पहला पौधा काफी कमजोर हो जाता है. लवणीय व क्षारीय पानी सभी फलों के पेड़ों के लिए सही नहीं होता है.

इन इलाकों में आंवला, बेर, खजूर, कैर, लसोड़ा आदि फलों के पेड़ लगाने चाहिए. पानी के भराव वाले इलाकों में पानी निकलने का सही इंतजाम होना चाहिए.

फल के पेड़ों का सही दूरी पर रेखांकन करना :  उद्यान का रेखांकन करने के लिए सब से पहले खेत के किसी एक किनारे से जरूरी दूरी की आधी दूरी रखते हुए पहली लाइन का रेखांकन करते हैं. इस के बाद हर लाइन के लिए जरूरी दूरी रखते हुए पूरे खेत में दोनों किनारे से इसी विधि द्वारा रेखांकन कर लेते हैं व निशान लगी जगहों पर पौधे रोपते हैं. बगीचों को वर्गाकार विधि से ही लगाना चाहिए, क्योंकि यह सब से आसान तरीका है. इस में सभी प्रकार के काम आसानी से किए जा सकते हैं. पौधे लगाने से 1 महीने पहले मईजून में गड्ढे खोद कर 20 से 25 दिनों तक उन्हें खुला छोड़ देना चाहिए, ताकि तेज धूप से कीटाणु खत्म हो जाएं. गड्ढे खोदते समय ऊपर की आधी उपजाऊ मिट्टी एक तरफ रख देनी चाहिए और आधी मिट्टी दूसरी तरफ डालनी चाहिए.

गड्ढों की भराई : खुदाई के 1 महीने बाद गड्ढों को गोबर की सड़ी हुई खाद 25 किलोग्राम, सुपर फास्फेट 250 ग्राम, क्यूनाल्फास 1.5 फीसदी 50 ग्राम, नीम की खली 2 किलोग्राम, क्षारीय जमीन हो तो 250 ग्राम जिप्सम और गड्ढे की मिट्टी डाल कर भर देना चाहिए. मिश्रण में खेत की ऊपरी मिट्टी को मिलाना चाहिए.

बरसात शुरू होने से पहले मिश्रण से गड्ढे को खेत की सतह से कुछ ऊंचाई तक दबा कर भर देना चाहिए व काफी मात्रा में पानी डाल देना चाहिए, ताकि गड्ढे की मिट्टी अच्छी तरह से बैठ जाए. पौधों की रोपाई जहां तक मुमकिन हो, 2 से 3 बार अच्छी बारिश होने के बाद ही करनी चाहिए.

Garden

पौधों की रोपाई : सरकारी व अच्छी नर्सरी से खरीदे गए पौधों को तैयार गड्ढों में रोप देना चाहिए. रोपाई जुलाईअगस्त में शाम के समय करनी चाहिए. पौधे को रोपने से 2 घंटे पहले लिपटी हुई घास पिंड व पालिथीन थैली को थोड़े समय के लिए पानी में रख कर उस में भरी हवा को बाहर निकालें, जिस से पौधा लगाते समय पिंड की मिट्टी बिखरे नहीं.

पौधा लगाने से पहले लिपटी हुई घास व पालीथीन थैली को मिट्टी के पिंड से हलके से हटा देना चाहिए और जड़ों को पूरी तरह बचा कर रखना चाहिए.

पौधों पर लगी पैबंद वाली जगह व शाखा के जुड़ाव वाले बिंदु को जमीन के तल से 25 सेंटीमीटर ऊपर रखना चाहिए. जरूरत हो तो पौधे को सहारा दें, ताकि पौधा झुके नहीं.

पौधा लगाने के बाद सिंचाई करें व जरूरत के हिसाब से पानी देते रहें. पैबंद के नीचे से निकलने वाली शाखाओं व रोग लगी शाखाओं को हटाते रहें.

सिंचाई : शुरू के 2 महीने तक पौधों को पानी की ज्यादा जरूरत होती है. इस समय 2-3 दिनों के अंतर पर पानी देना चाहिए. 2 सिंचाइयों के बीच का समय जगह, मौसम, जमीन, फलों की किस्म, फलन का समय व वहां की जलवायु आदि पर निर्भर करता है.

* अगर बारिश के मौसम में बारिश होती रहे तो पानी देने की जरूरत नहीं होती.

* सर्दी के मौसम में 10 से 15 दिनों के अंतर पर सिंचाई करनी चाहिए.

* गरमी के मौसम में 7 से 10 दिनों के अंतर पर सिंचाई करनी चाहिए.

जल निकास जरूरत के मुताबिक हो, क्योंकि बाग को उस की जरूरत से कम पानी देने से पेड़ों की बढ़वार कम होती है, जबकि जरूरत से अधिक पानी देने से भी नुकसान होता है. पानी की अधिक मात्रा देने से जमीन पर पानी भर जाता है और पेड़ों के खाद्य पदार्थ जमीन की निचली सतह में चले जाते हैं. फलों में पानी की अधिक मात्रा होने के कारण मिठास कम हो जाती है और स्वाद खराब हो जाता है. इसलिए ज्यादा पानी को तुरंत खेत से निकाल देना चाहिए. उद्यान क्षेत्र का जलस्तर 2 से 3 मीटर नीचे रहना चाहिए.

Sweets : केसरिया बरफी – खुशबू और जायके से भरपूर

बरफी का जायका और खुशबू बढ़ाने के लिए अब उस में केसर का इस्तेमाल किया जाने लगा है. इस से खोए से बनने वाली बरफी देखने में और भी ज्यादा सुंदर लगती है. केसर पहाड़ी इलाकों में पाया जाता है. दूध में केसर डाल कर पीने का चलन पुराना है. अब बरफी में केसर पड़ने से इस का आकर्षण बढ़ गया है.

कीमत में भी केसरिया बरफी बहुत किफायती है. केसरिया बरफी को चांदी के वर्क, काजू के पतले टुकड़ों और पिस्ते से सजाया जाता है.

मेवा बरफी की तरह दिखने के कारण ग्राहकों को केसरिया बरफी बहुत पसंद आती है. इसे बनाने और सजाने का तरीका साधारण बरफी से अलग होता है. ऐसे में यह सब को पसंद आती है.

केसरिया बरफी बनाने वाले कारीगर सेवक गुप्ता कहते हैं, ‘इस बरफी का जायका लोगों को पसंद आता है. इस की कीमत ग्राहकों को लुभाती है. पिस्ता, बादाम और चांदी के वर्क के कारण इस की ताजगी लंबे समय तक बरकरार रहती है. केसरिया बरफी बनाने के लिए गाय के दूध का इस्तेमाल किया जाता है. इसे सीधे दूध से बनाया जाता है.’

केसरिया बरफी बनाने की विधि

अच्छी किस्म की केसरिया बरफी बनाने के लिए सब से पहले गाय का दूध ले कर उसे आंच पर चढ़ा कर धीरेधीरे गरम करते हैं. दूध पर आने वाली मलाई को बाहर नहीं निकालते हैं. इस से तैयार खोए में भरपूर मात्रा में चिकनाई रहती है. यह बरफी के स्वाद को बढ़ाती है. धीरेधीरे दूध गरम हो कर गाढ़ा होने लगता है. ध्यान रहे कि दूध को बराबर चलाते रहें, जिस से वह जलने न पाए. कुछ देर के बाद दूध का खोया सा बनने लगता है. तब उस में थोड़ी सी मात्रा में केसर मिला दें. केसर गरम दूध के साथ मिल कर उस के रंग को बदल देती है, जिस से सफेद दिखने वाला खोया केसरिया रंग का दिखने लगता है. तैयार खोए में बहुत थोड़ी सी चीनी मिलाते हैं. जब खोया पूरी तरह से सूख जाए तो उसे आंच से उतार लेते हैं.

तैयार सामग्री को एक बड़े से थाल में पलट कर पूरी तरह से एक जैसा फैला देते हैं. जब यह हलकाहलका गरम रह जाता है, तो इस के ऊपर कटे हुए काजू और पिस्ते को डाल देते हैं. इस के ऊपर चांदी का वर्क फैला कर दबा देते हैं. थोड़ा गरम होने के कारण चांदी का वर्क ठीक से दब जाता है. ठंडा हो जाने पर उसे मनचाहे आकार में काट लेते हैं. चांदी का वर्क लगा होने के कारण यह बरफी आपस में चिपकती नहीं है.

कई लोगों को खोए की बरफी पसंद नहीं आती. ऐसे लोग केसरिया बरफी का स्वाद ले सकते हैं. यह स्वाद और महक दोनों में खोए की बरफी से अलग होती है.

खानपान की शौकीन मेघना मलिक कहती हैं, ‘बरफी सब से ज्यादा बिकने वाली मिठाई होती है. हर जगह पर मिलने के कारण लगता है कि हम कोई साधारण मिठाई खा रहे हैं. ऐसे में केसरिया बरफी कुछ अलग सा एहसास कराती है. यह देखने में ही नहीं, खाने में भी खोए की बरफी से पूरी तरह से अलग है. यह मुझे बहुत पसंद है. अपने रंग के कारण यह बच्चों को भी पसंद आती है.’

Sweets : परवल स्वीट (Parwal) : सब्जी का नाम मिठाई का स्वाद

Sweets : कम लोगों को पता होगा कि परवल (Parwal) से मिठाई भी तैयार होती है. गरमी के दिनों में यह लोगों को खूब पसंद आती है. जिन लोगों को सब्जियों से बनी मिठाइयां अच्छी लगती हैं, वे इसे बहुत पसंद करते हैं.

लखनऊ की मशहूर मिठाई (Sweet) की दुकान छप्पनभोग में परवल की मिठाई को खास तरह से बनाते हैं. छप्पनभोग वाले परवल स्वीट को कोरियर से भेजने का काम भी करते हैं. परवल स्वीट को कोरियर से मंगाने के लिए छप्पनभोग डाटकाम पर जा कर अपना आर्डर दिया जा सकता है. आप इस का पेमेंट भी नेटबैंकिंग के जरीए कर सकते हैं. छप्पनभोग वाले ब्लूडार्ट कोरियर के जरीए आप तक यह परवल स्वीट पहुंचाने का इंतजाम करते हैं.

छप्पनभोग के रवींद्र गुप्ता बताते हैं, ‘हमारे यहां 56 से ज्यादा किस्मों की मिठाइयां बनती हैं. इन में परवल स्वीट भी एक खास मिठाई है. कई लोग इस तरह की मिठाई खाना सेहत के लिए सही मानते हैं.’

फिल्म अभिनेत्री अर्चना सिंह कहती हैं, ‘मेरी यूएसए में रह रही फ्रेंड को यह मिठाई बहुत पसंद है. हम सीजन में एक बार उसे यह जरूर भेजते हैं. फेस्टिवल में होने वाली पार्टियों में भी इस मिठाई का आकर्षण सब से अलग होता है. विदेशों में रहने वाले यह जान कर हैरान होते हैं कि भारतीय लोग सब्जियों से भी मजेदार मिठाई बना लेते हैं.’

पहले परवल स्वीट गांवों में शादियों के समय बनाई जाती थी. आमतौर पर पहले शादियां गरमी के मौसम में ही होती थीं. केवल खोए या छेने की मिठाई बनवाने का काम महंगा होता था. ऐसे में बचत के लिए परवल स्वीट की शुरुआत की गई. कुछ ही दिनों में इस मिठाई का स्वाद लोगों की जबान पर ऐसा चढ़ा कि लोग इस के दीवाने हो गए.

रवींद्र गुप्ता कहते हैं, ‘परवल स्वीट दूसरी मिठाइयों से बिल्कुल अलग होती है. यह खाने में रसदार होने का एहसास जरूर कराती है, पर असल में सूखी मिठाई होती है. इसे कहीं लाने ले जाने में भी दिक्कत नहीं होती है.’

परवल स्वीट केवल लखनऊ में ही नहीं बनती. दूसरे शहरों की खास मिठाई की दुकानों में भी यह मिठाई मिल जाती है. इस का हराभरा मीठा स्वाद खाने का अलग मजा देता है. दूसरी मिठाइयों के मुकाबले इस में कैलोरी की मात्रा कम होती है. इसलिए भी परवल स्वीट ज्यादा पसंद की जाती है. जिन लोगों को परवल की सब्जी उस के बीजों की वजह से अच्छी नहीं लगती, वे परवल स्वीट का मजा ले सकते हैं.

कैसे बनाएं परवल स्वीट

परवल स्वीट को बनाना मुश्किल नहीं होता है. इसे बनाने के लिए सब से पहले अच्छे किस्म के एक साइज के ताजे परवल लेने चाहिए. एक साइज के परवल देखने में अच्छे लगते हैं. परवलों को सही तरह से धोने के बाद उन का छिलका उतार दें. चाकू से परवलों के बीच में चीरा लगाएं. इस के बाद परवलों के बीज निकाल दें. अब पानी और चीनी को मिला कर चाशनी बना लें. चाशनी में परवलों को डाल कर धीमी आंच पर चढ़ा दें और 10-15 मिनट तक पकने दें. खयाल रखें कि परवल जलने न पाएं.

परवलों में भरने के लिए मिल्क बरफी का इस्तेमाल किया जाता है. बरफी बनाने के लिए दूध के साथ चीनी, काजू, किशइमिश और इलायची का इस्तेमाल किया जाता है. बरफी बनाने के बाद परवलों के अंदर खाली जगह में उसे भरें. फिर परवलों को बाहर से चांदी के वरक से लपेट दें और 20 मिनट के लिए फ्रीजर में रखें. फिर तैयार परवल स्वीट का आनंद लें. ऐसा स्वाद आप को किसी दूसरी मिठाई से नहीं मिलेगा. लौकी की बरफी और मूंग की बरफी की तरह आजकल परवल स्वीट की मांग भी तेजी से बढ़ रही है.

हलदी (Turmeric) की खेती

हलदी (Turmeric) खास मसाला फसल है. भारत में तमाम व्यंजनों में मसाले के तौर पर इस का इस्तेमाल होता है. हलदी (Turmeric) का इस्तेमाल तमाम औषधियों में भी किया जाता है. हलदी (Turmeric) एक उष्ण कटिबंधीय फसल है. इस की खेती के लिए नमी वाली जलवायु अच्छी मानी जाती है.

जमीन : खेती के लिए जमीन समतल, अच्छे पानी के निकास वाली, बलुई दोमट मिट्टी, जिस का पीएच मान 7-7.5 हो, सही मानी जाती है. अम्लीय, क्षारीय, लवणीय और पानी खड़ा रहने वाली जमीन इस के लिए ठीक नहीं है.

खेत की तैयारी : मिट्टी पलटने वाले हल से या ट्रैक्टर हैरो से 2-3 बार अच्छी जुताई करें व सुहागा लगा कर खेत को खरपतवार व ढेले रहित तैयार करें. अन्य घासफूल को अच्छी तरह से निकाल दें. इस के बाद 3 मीटर चौड़ी व 20 मीटर लंबी क्यारियां बना लें. 2 क्यारियों के बीच 20 सेंटीमीटर की जगह छोड़नी चाहिए, जिस से फसल की अच्छी देखभाल हो सके और हलदी के फुटाव के लिए भी सही जगह मिल सके.

हलदी की खास किस्में : रश्मि, सुरमा, रोमा व सोनाली के अलावा हलदी की अन्य लोकप्रिय किस्में लाकाडाग, डुग्गीगली, टेकुटपेटो, कस्तूरी पुष्पा, पीटीएस 10, पीटीएस 24, टी सुंदर, अल्लेटंपी, लोखड़ी, फुलबनी लोकल, मद्रास मगल, राजा बोट, कटहड़ी सुवर्णा, रजतरेखा, प्रतिभा, नूरी प्रभा वगैरह हैं.

बोने का समय : हलदी की अच्छी फसल लेने के लिए बिजाई अप्रैल के आखिरी हफ्ते में करें. जहां सिंचाई की सहूलियत नहीं है, वहां जुलाई के पहले हफ्ते में बिजाई की जाती है. देर से बिजाई करने पर पौधों की बढ़वार व उपज कम होती है.

बीज की मात्रा व बोने का तरीका : हलदी की बोआई कंदों से की जाती है. इस के लिए 6-8 क्विंटल स्वस्थ व एक साइज के कंद प्रति एकड़ बिजाई के लिए सही रहते हैं.

कंदों के आकार का उत्पादन पर बहुत गहरा असर पड़ता है. ज्यादा वजन वाले कंद जल्दी स्थापित हो जाते हैं. बीज के लिए कंदों का वजन 30-40 ग्राम होना चाहिए. हलदी की बोआई लाइन से लाइन की दूरी 30 सेंटीमीटर व पौधे से पौधे की दूरी 20 सेंटीमीटर रख कर करनी चाहिए. इस के बाद कंद जमने तक खेत में नमी बनाए रखनी चाहिए. बोआई से पहले कंदों को डाइथेन एम 45 की 3 ग्राम मात्रा प्रति लीटर पानी में घोल कर उस में 30 मिनट तक डुबो कर रखें.

खाद व उर्वरक : खेत की तैयारी के समय 10-12 टन गोबर की अच्छी गलीसड़ी व सूखी खाद प्रति एकड़ की दर से खेत में मिलाएं.

सिंचाई : हलदी जमने में लंबा समय लेती है, जिस के लिए खेत में नमी बनी रहनी चाहिए. अप्रैल से जून में 8-10 दिनों के अंतर से और सर्दियों में 20-25 दिनों के अंतर से हलकी सिंचाई करें. बारिश हो जाने पर इस फसल को अलग से पानी लगाने की जरूरत नहीं पड़ती.

निराईगुड़ाई : फसल में उगने वाले खरपतवारों को समयसमय पर निकालते रहें. आजकल निराईगुड़ाई के लिए साइकिलनुमा तमाम यंत्र सस्ते दामों पर मौजूद हैं.

खुदाई व पत्तियों से मुनाफा : हलदी को किस्मों के आधार पर 7-10 महीने के बाद जब पत्तियां सूख कर पीली पड़ जाएं, तब पत्तियों को काट कर उन का वाष्प आसवन विधि से तेल निकालें. पत्तियों में 1 फीसदी तेल होता है. इस के तेल से अतिरिक्त आमदनी होती है. जमीन को खोद कर या जुताई कर के कंदों को निकाल लिया जाता है. बीज के लिए रखी जाने वाली हलदी को छांट कर बिना साफ किए छायादार जगह पर ढेर बना कर हलदी की पत्तियों से ढक कर ऊपर मिट्टी डाल दी जाती है.

प्रसंस्करण : बेची जाने वाली हलदी की जड़ों से मिट्टी को साफ किया जाता है और 1 हफ्ते तक छाया में सुखाने के बाद हलदी को 100 लीटर पानी में 100 ग्राम सोडियम बाईकार्बोनेट या सोडियम कार्बोनेट घोल कर तांबे, गेल्बनाइज्ड लोहे या मिट्टी के बरतन में भर कर 1-2 घंटे तक उबालते हैं.

पीला रंग लाने के लिए 50 ग्राम सोडियम बाइसल्फेट और 50 ग्राम हाइड्रोक्लोरिक अम्ल भी डाल देते हैं. जब पानी से सफेद धुआं आने लगे, हलदी दबाने पर मुलायम हो जाए, तब उबालना बंद कर देते हैं. इन कंदों को जमीन पर फैला कर 10-15 दिनों तक सुखाया जाता है. जब पलटने पर धात्विक ध्वनि आने लगे, तब पालिश करने वाले ड्रम में भर कर घुमा कर चमकाते हैं. पालिश करने के बाद इस की सतह पर चमकदार पीला रंग चढ़ाया जाता है.

उपज : हलदी की उपज (गीली) 100-120 क्विंटल प्रति एकड़ होती है, जो सूखने पर 10-12 क्विंटल बचती है और पत्तियों के आसवन से 8-12 किलोग्राम तेल प्रति एकड़ हासिल हो सकता है.