Sustain Plus Project : एनडीडीबी सस्टेन प्लस परियोजना हुई शुरू

Sustain Plus Project : मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के तहत पशुपालन और डेयरी विभाग ने बीते दिनों 3 मार्च, 2025 को भारत मंडपम, नई दिल्ली में डेयरी क्षेत्र में स्थिरता पर कार्यशाला का सफलतापूर्वक आयोजन किया. केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन, डेयरी और पंचायती राज मंत्री राजीव रंजन सिंह की उपस्थिति में इस कार्यशाला का उद्घाटन किया.

केंद्रीय मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के राज्य मंत्री प्रो. एसपी सिंह बघेल और जौर्ज कुरियन भी इस अवसर पर उपस्थित थे.  डेयरी क्षेत्र के प्रमुख हितधारकों के साथसाथ पशुपालन और डेयरी विभाग, पैट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय, नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय, उर्वरक विभाग, राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी), इंडियन औयल कौर्पोरेशन लिमिटेड और विभिन्न दूध सहकारी समितियों के वरिष्ठ अधिकारियों ने भी इस कार्यशाला में भाग लिया.

कार्यशाला ने तकनीकी, वित्तीय और कार्यान्वयन सहायता का लाभ उठा कर डेयरी क्षेत्र में सतत और समावेशी विकास को बढ़ावा देने के लिए एनडीडीबी और नाबार्ड के बीच समझौता हुआ.  देशभर में बायोगैस संयंत्र स्थापित करने के लिए एनडीडीबी ने 15 राज्यों के 26 दुग्ध संघों के साथ समझौता किया.

इस अवसर पर डेयरी क्षेत्र में स्थिरता के उद्देश्य से दिशानिर्देश जारी किए गए, साथ ही, एनडीडीबी (राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड) के लघु पैमाने पर बायोगैस, बड़े पैमाने पर बायोगैस/संपीड़ित बायोगैस परियोजनाओं और टिकाऊ डेयरी के आर्थिक सहायता के लिए एनडीडीबी ‘सस्टेन प्लस परियोजना’ के तहत वित्तपोषण पहलों की शुरुआत की गई.

इन पहलों से डेयरी फार्मिंग में चक्रीय प्रथाओं को अपनाने में तेजी आने, कुशल खाद प्रबंधन, ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा मिलने और पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने की उम्मीद है.  इस राष्ट्रीय कार्यशाला ने नीति बनाने वालों, उद्योग जगत के नेताओं और विशेषज्ञों को स्थिरता बढ़ाने, कार्बन उत्सर्जन को कम करने और छोटे व सीमांत डेयरी किसानों के लिए आर्थिक सहायता सुनिश्चित करने और विकसित करने के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान किया.

Sustain Plus Project

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कहा कि आज जब हम श्वेत क्रांति 2.0 की ओर बढ़ रहे हैं, तो स्थिरता और चक्रीयता का महत्व और भी बढ़ गया है. उन्होंने कहा कि पहली श्वेत क्रांति की मदद से हम ने अब तक जो हासिल किया है, उस के अलावा डेयरी क्षेत्र में स्थिरता और चक्रीयता को अभी पूरी तरह हासिल किया जाना बाकी है.

उन्होंने आगे यह भी कहा कि भारत की कृषि व्यवस्था छोटे किसानों पर आधारित है और गांवों से शहरों की ओर उन का पलायन उन की समृद्धि से जुड़ा है. उन्होंने कहा कि ग्रामीण पलायन की समस्या पर काबू पाने के साथसाथ छोटे किसानों को समृद्ध बनाने के लिए डेयरी एक महत्वपूर्ण विकल्प है.

केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह ने कहा कि डेयरी क्षेत्र में चक्रीयता और स्थिरता पर ध्यान देने के साथ, ईंधन के उत्पादन के लिए गाय के गोबर का उपयोग किसानों की आय बढ़ाने में काफी मदद करेगा.

उन्होंने आगे कहा कि देश में 53 करोड़ से अधिक के विशाल पशुधन संसाधन में से लगभग 30 करोड़ गाय और भैंसें हैं, इसलिए बड़ी मात्रा में गाय का गोबर उपलब्ध है, जिस का उपयोग जैविक खाद, जैव ईंधन आदि के लिए किया जा सकता है, जिस से उत्पादकता बढ़ेगी और साथ ही किसानों की आय भी बढ़ेगी.

मंत्री राजीव रंजन सिंह ने आगे कहा कि आज सरकार के प्रयासों के कारण डेयरी क्षेत्र काफी हद तक असंगठित से संगठित क्षेत्र में बदल गया है. उन्होंने देश में हरित विकास और किसान कल्याण को बढ़ावा देने के लिए चक्रीय अर्थव्यवस्था प्रथाओं, नवीकरणीय ऊर्जा पहलों और सार्वजनिक निजी भागीदारी के महत्व का भी जिक्र किया.

हितधारकों से बात करते हुए उन्होंने कहा कि पर्यावरण के अनुकूल प्रथाओं को नवाचार के साथ एकीकृत करने से न केवल हरित विकास को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि लाखों किसानों का भला भी होगा.

पशुपालन एवं डेयरी विभाग की सचिव अलका उपाध्याय ने डेयरी क्षेत्र में टिकाऊ प्रथाओं की आवश्यकता और सर्कुलर अर्थव्यवस्था सिद्धांतों को एक करने के सरकार के दृष्टिकोण पर जोर दिया और कहा कि भारत “विश्व की डेयरी” है और डेयरी क्षेत्र, कृषि जीवीए में 30 फीसदी का योगदान देता है. इन टिकाऊ प्रथाओं को लागू करने के लिए एनडीडीबी ने 1,000 करोड़ रुपए के आवंटन के साथ एक नई वित्तपोषण योजना शुरू की है, जिस का उद्देश्य छोटे बायोगैस, बड़े पैमाने के बायोगैस संयंत्रों और संपीड़ित बायोगैस (सीबीजी) परियोजनाओं के लिए लोन सहायता के माध्यम से आर्थिक सहायता प्रदान करना है, जिस से आने वाले 10 सालों में विभिन्न खाद प्रबंधन मौडलों को बढ़ाने में सुविधा होगी.

कार्यशाला के विचारविमर्श के प्रमुख विषयों में सफल चक्रीय अर्थव्यवस्था मौडल, छोटे डेयरी किसानों के लिए कार्बन क्रैडिट के अवसर और टिकाऊ प्रथाओं को बढ़ावा देने में कार्बन ट्रेडिंग की भूमिका शामिल थी. भारत सरकार द्वारा समर्थित और एनडीडीबी के नेतृत्व में डेयरी क्षेत्र ने स्थिरता और चक्रीयता को बढ़ाने के लिए प्रमुख खाद प्रबंधन पहलों की शुरुआत की है.

3 उल्लेखनीय मौडलों में जकारियापुरा मौडल, बनास मौडल और वाराणसी मौडल शामिल हैं, जो दूध के साथसाथ गोबर की एक मूल्यवान वस्तु के रूप में क्षमता को उजागर करते हैं, जो एक अधिक टिकाऊ और चक्रीय डेयरी पारिस्थितिकी तंत्र में योगदान देता है, साथ ही पशुपालकों की आय में वृद्धि का भी काम करता है.

खेती में पशुपालन फायदेमंद, गौ संरक्षण भी जरूरी

उदयपुर : रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध इस्तेमाल से जमीन की सेहत और पौलीथिन व अन्य डिस्पोजेबल के इस्तेमाल से गायों की सेहत इतनी बिगड़ चुकी है कि वह एक दिन स्वच्छ दूध देना भी बंद कर देंगी. ये बात स्कूल शिक्षा एवं पंचायती राज मंत्री मदन दिलावर ने कही.

मंत्री मदन दिलावर राजस्थान कृषि महाविद्यालय के नूतन सभागार में ’कृषि दक्षता और पशु कल्याण को सुदृढ़ बनाने की दिशा में सटीक पशुधन प्रबंधन तकनीक’ विषयक तीनदिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे.

सम्मेलन में देशभर के 29 प्रांतों के लगभग 400 वैज्ञानिक, पशुधन के जानकार व किसानों ने भाग लिया. उन्होंने गिर, साहीवाल, थारपारकर गायों का जिक्र करते हुए कहा कि जिन का कंधा ऊंचा हो, सही मायने में उन्हीं गायों का दूध लाभप्रद है.

उन्होंने विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों का आह्वान किया कि वे इस रणनीति पर काम करें कि हमारी पारंपरिक देसी गायों का संरक्षण किया जा सके. पुराने समय से हमारे पूर्वजों ने खेती करना शुरू किया होगा तो कितने संकट आए होंगे. खुदाई कर मिट्टी तैयार करना, खेत का आकार देना. तब खेती में बैलों का ही इस्तेमाल होता था. हल के माध्यम से खेतीकिसानी का काम होता था. आज के तकनीकी दौर में मशीनीकरण का बोलबाला है. हमें बैलों की महत्ता को भी नहीं भूलना चाहिए.

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने बताया कि उन के दो वर्ष तीन माह के कार्यकाल में एमपीयूएटी ने 44 पेटेंट हासिल किए. इस तरह कुल 55 पेटेंट विश्वविद्यालय के नाम हैं.

उन्होंने विश्वविद्यालय के पशुधन वैज्ञानिकों आह्वान किया कि मंत्री मदन दिलावर की मंशा के अनुसार अपनी गायों की ब्रीड को संरक्षित करने की दिशा में सारगर्भित शोध करने की जरूरत है. देश को ऐसी कृषि प्रणाली की जरूरत है, जो न केवल पशु हितैषी हो, बल्कि वातावरण और पर्यावरण को बचाने वाली भी हो. 21वीं पशुगणना के परिणाम भी इस में मददगार साबित होंगे.

विशिष्ट अतिथि अमूल आणंद (गुजरात) के महाप्रबंधक डा. अमित व्यास ने कहा कि विश्व में 240 मीट्रिक टन दूध उत्पादन में हमारे देश की भागीदारी 23 फीसदी है. देश में सर्वाधिक दूध उत्पादन में उत्तर प्रदेश के बाद दूसरा स्थान राजस्थान का है.

डा. अमित व्यास ने कहा कि गाय का दूध कैसे बढ़े और खर्च कम कैसे हो. इस पर अमूल बड़े पैमाने पर काम कर रहा है और सफलता भी मिली है. अमूल प्रतिष्ठान में 400 पशु चिकित्सकों की टीम में नित्य गायों की देखभाल में लगी है और लक्षण दिखाई देते ही इलाज आरंभ कर दिया जाता है. खास बात यह है कि आयुर्वेदिक व होमियोपैथिक दवाओं से गायों का इलाज किया जा रहा है. ऐसी तकनीक किसानों तक भी पहुंचनी चाहिए. साथ ही, अमूल बायोगैस, गायों की खुराक, कृत्रिम गर्माधान, ड्रोन तकनीक पर भी लगातार काम कर रहा है.

कार्यक्रम में राज्यसभा चुन्नी लाल गरासिया, एमबीएस विश्वविद्यालय जोधपुर के कुलपति डा. अजय शर्मा, भारतीय पशु उत्पादन एवं प्रबंधन सोसायटी सरदार कृषि नगर दांतीवाड़ा (गुजरात) के अध्यक्ष डा. एपी चौधरी ने भी संबोधित किया.

आयोजन सचिव सिद्धार्थ मिश्रा ने बताया कि राजस्थान कृषि महाविद्यालय के पशु उत्पादन विभाग और भारतीय पशु उत्पादन एवं प्रबंधन सोसायटी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित तीनदिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन में कुल 7 तकनीकी सत्रों में वैज्ञानिकों ने उपरोक्त विषय पर गहन मंथन किया. आरंभ में सम्मेलन समन्वयक डा. जेएल चौधरी ने स्वागत भाषण दिया. संचालन डा. गायत्री तिवारी ने किया.

लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड व सम्मान

समारोह में लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड तमिलनाडु के डा. त्यागराज शिवकुमार को दिया गया, जबकि पशु उत्पादन के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने पर डा. बालूस्वामी (तमिलनाडु), डा. बीएस खद्दा (मोहली), डा. बी. सतीशचंद्र (कर्नाटक), डा. बी. रमेश (तमिलनाडु) को शील्ड व सम्मानपत्र दे कर सम्मानित किया गया. साथ ही, इफको के प्रबंधक सुधीर मान व शिक्षा मंत्री के विशेषाधिकारी डा. सुनील दाधीच को भी स्मृति चिन्ह दे कर सम्मानित किया गया.

गाय का दूध पिलाओ – बच्चा चंचल व तेज दिमाग का होगा
‘पाडा तो पाडा ही रहेगा’

शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने कहा कि गाय का दूध पीने वाला बच्चा सदैव चंचल, तेज दिमाग वाला होता है, जबकि भैंस का दूध पीने वाला बच्चा ऊंगणिया (आलसी) होता है. गाय के बछड़े को छोड़ते ही वह उछलताकूदता सीधे अपनी मां के पास पंहुच जाता है.

उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा कि गाय का बछड़ा थोड़ा बड़ा होने पर केरड़ा, नारकिया और अंत में बैल बनता है, जबकि भैंस का बच्चा जन्म से अंत तक पाडा ही रहता है.

कृषि दक्षता व पशु कल्याण विषयक राष्ट्रीय सम्मेलन में मंत्री मदन दिलावर ने स्पष्ट किया कि हर पशु का अपना महत्व है. यदि चेतक घोड़ा नहीं होता तो महाराणा प्रताप का नाम इतना आगे नहीं होता.

उन्होंने आगे कहा कि ऊंट को राज्य पशु का दर्जा दिया गया है. यह प्रजाति भी विलुप्त होने के कगार पर है. वैज्ञानिकों को इसे बचाने के उपाय ईजाद करने होंगे. सीमा सुरक्षा मामले में भी ऊंट की अपनी अहमियत है. ‘रेगिस्तान के जहाज’ के नाम से परिचित ऊंट बीएसएफ के लिए वरदान है, जो बिना पानी पीए 8-10 दिन निकाल लेता है. लेकिन गाय की अपनी विशेष महत्ता है. गाय का गोबर व मूत्र से कई बीमारियां स्वतः भाग जाती हैं. कोई भी पवित्र कार्य करने से पूर्व गोबर से लिपाई का चलन है, ताकि शुद्धता बरकरार रहे.

उन्होंने यह भी कहा कि राजस्थान में कितना भी संकट आए, यहां का किसान आत्महत्या नहीं करता है. अकेली गाय ही अपने दूध से किसान का पेट भर सकती है. हमें दूध, पनीर, मिठाई, चाय तो भाती है, लेकिन गाय नहीं सुहाती. इसलिए हम ने उसे निकाल दिया और वह सड़कों पर, खेतों में या फिर बूचड़खाने ही उन के लिए बचे हैं.

बकरीपालन है रोजगार का आसान जरीया – प्रो. अरविंद वर्मा


जयपुर: राष्ट्रीय कृषि विकास योजना एवं अखिल भारतीय कृषिरत महिला अनुसंधान परियोजना के संयुक्त तत्वावधान में झाड़ोल व फलासिया के स्वयं सहायता समूह की 30 महिलाओं एवं गुडली के 2 स्वंय सहायता समूहों की 40 महिलाओं के लिए बकरीपालन व्यवसाय का दोदिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम 24 व 25 फरवरी, 2025 को राजस्थान कृषि महाविद्यालय में आयोजित किया गया था.

प्रशिक्षण में प्रो. अरविंद वर्मा, निदेशक अनुसंधान ने कहा कि राष्ट्रीय कृषि विकास जैसी योजनाओं द्वारा किसान परिवारों को लाभान्वित किया जाता है. इस साल लगभग 6 से 7 करोड़ की परियोजनाएं स्वीकृत हुई हैं, जिन से उदयपुर एवं आसपास के किसानों को लाभ मिलेगा. इस प्रशिक्षण द्वारा महिलाएं स्वावलंबन की दिशा में अपने कदम बढ़ाएंगी.

राष्ट्रीय कृषि विकास परियोजना प्रभारी डा. विशाखा बंसल ने बताया कि इन 2 दिनों में महिलाओं को बकरीपालन व्यवसाय के साथ ही राष्ट्रीय कृषि विकास परियोजना के अंतर्गत गठित महिला स्वयं सहायता समूहों की कार्य विधि समझाते हुए कहा कि सभी समूहों को कृषि से संबंधित व्यवसायों में प्रशिक्षित किया जाएगा. इस के लिए झाड़ोल व फलासिया में 10 स्वयं सहायता समूहों का गठन किया गया है.

इस प्रशिक्षण में बकरियों की नस्लें, बकरियों से संबंधित रोगों व उन के उपचार के बारे में विस्तार से बताया गया. सरकार से मिलने वाली सहायता, मुख्य बीमारी जैसे अफरा चढ़ जाने पर इंजैक्शन बांई तरफ लगाया जाना आदि तकनीकी जानकारी से अवगत कराया गया.

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में डा. जेएल चौधरी, एमिरेट्स वैज्ञानिक, डा. ओपी पाटोदिया, रिटायर्ड प्रोफैसर, संदीप गिल एवं अनीता कुमारी मीणा आदि ने बकरीपालन की विस्तृत जानकारी दी. बकरी को गरीब की गाय एवं चलताफिरता एटीएम कहा गया, क्योंकि बकरीपालन व्यवसाय से पालनकर्ता आसानी से आय अर्जित कर सकते हैं और जरूरत पड़ने पर बकरी को बेच भी सकते हैं.

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में स्वयं सहायता समूह को आय संवर्धन से जोड़ कर स्वावलंबी बनाने पर विशेष जोर दिया गया. प्रशिक्षण कार्यक्रम में कार्तिक सालवी, डा. कुसुम शर्मा व अनुष्का तिवारी ने महिलाओं को पशुपालन इकाई का भ्रमण करवाया.

Kisan Samman : भोपाल में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के किसानों का सम्मान

Kisan Samman : दिल्ली प्रेस की कृषि पत्रिका फार्म एन फूड द्वारा 28 फरवरी, 2025 को मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के रवींद्र भवन में राज्य स्तरीय फार्म एन फूड कृषि सम्मान अवार्ड का आयोजन किया गया. इस कार्यक्रम में मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ के 150 से ज्यादा किसान और कृषि वैज्ञानिक शामिल हुए और खेती में नवाचार और तकनीकी के जरिए विभिन्न 17 श्रेणियों में बदलाव लाने वाले तकरीबन 30 किसानों, कृषि वैज्ञानिकों और कृषि विज्ञान केंद्रों को राज्य स्तरीय फार्म एन फूड कृषि सम्मान अवार्ड से सम्मानित किया गया.

दिल्ली प्रेस के कार्यकारी प्रकाशक अनंत नाथ ने कहा, ‘कृषि जगत हमारे देश की रीढ़ की हड्डी है. इसी क्षेत्र में किसानों के योगदान को लोगों को बताने के लिए हम ने फार्म एन फूड पत्रिका को शुरू करने की सोची और यह भी माना कि यह किसान समाज को जोड़ने की कड़ी है. मैं खुद को कृषि का छात्र मानता हूं. कोरोना काल मे घर पर एक किचन गार्डन बनाया था जो अब भी बरकरार है. हमारे जो आज के विजेता हैं वे बहुत मेहनती हैं और वे इस क्षेत्र में बहुत ज्यादा अचीव कर रहे हैं. मेरी अपील है कि किसान इस पत्रिका से जुड़े रहें ताकि हमारी संस्था कृषि जगत में होने वाली हर बात को जनजन तक पहुंचा सकें.

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि और मध्य प्रदेश के सहकारिता, खेल एवं युवा कल्याण मंत्री विश्वास सारंग ने कहा, ‘भारत गांव में, खेत में और खलिहान में बसता है. हमें खेती पर और किसान पर ध्यान देना होगा. हमें फूड प्रोसेसिंग पर जोर देना होगा. ‘नदी जोड़ो अभियान’ इस में सहायक है. खेत से ही इस देश को मजबूत करने की इबारत लिखी जा सकती है. सरकार का यही उद्देश्य की खेती मुनाफे का धंधा बने.’

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि और मध्य प्रदेश सरकार में कौशल विकास एवं रोजगार मंत्री गौतम टेटवाल ने कहा, ‘सीखने की कोई उम्र नहीं होती और किसान हमेशा सीखता है. वह नवाचार करता है, नई तकनीक इस्तेमाल करता है. जब किसान के पास पर्याय खाद होगी और दूसरी सुविधाएं मुहैया होंगी, वह इस क्षेत्र में और आगे बढ़ेगा.’

विजेता किसानों में रतलाम के कपिल धाकड़ को बेस्ट यंग फार्मर अवार्ड दिया गया. महासमुंद के मिलन सिंग विश्वकर्मा और भोपाल के मनोहर पाटीदार को बेस्ट मेल फार्मर अवार्ड मिला. ग्वालियर की निशा निरंजन को बेस्ट फीमेल फार्मर अवार्ड से सम्मानित किया गया, जबकि भोपाल के गीता प्रसाद पाटीदार, शाजापुर के जयनारायण पाटीदार और टीकमगढ़ के पूरन लाल कुशवाहा को बेस्ट फार्मर अवार्ड इन इनोवेटिव फार्मिंग अवार्ड दिया गया.

अशोकनगर के खुमान सिंह रघुवंशी, भिंड के रामगोपाल सिंह, दंतेवाड़ा के जयलाल यादव को बेस्ट फार्मर अवार्ड इन आर्गेनिक/नेचुरल फार्मिंग का अवार्ड मिला. उज्जैन के अश्विनी सिंह चौहान, नारायणपुर के सुरेंद्र कुमार नाग को बेस्ट फार्मर अवार्ड इन इंटीग्रेटेड फार्मिंग दिया गया.

नरसिंहपुर के कृष्णपाल लोधी को बेस्ट फार्मर अवार्ड इन शुगरकेन प्रोडक्शन मिला, जबकि अशोकनगर के राजपाल सिंह नरवरिया को बेस्ट फार्मर अवार्ड इन मैकेनाइजेशन अवार्ड हासिल हुआ. इसी तरह बलौदाबाजार के विरेंद्र अग्रवाल को बेस्ट डेयरी/एनिमल कीपर का अवार्ड, तो मुरैना के यशपाल कुशवाह को बेस्ट मधुमक्खीपालक फार्मर अवार्ड दिया गया. शाजापुर के कृष्णपाल सिंह राजपूत को बेस्ट पोल्ट्री/हैचरी फार्मर अवार्ड मिला, तो नरसिंहपुर के राकेश दुबे को बेस्ट फार्मर अवार्ड इन मार्केटिंग दिया गया.

कोंडागांव, छत्तीसगढ़ के डा. राजाराम त्रिपाठी को सस्टेनेबल फार्मिंग टेक्नोलॉजी अवार्ड, तो कोंडागांव की ही डा. अपूर्वा त्रिपाठी को वुमन एग्री-इनोवेटर आफ द ईयर का अवार्ड मिला. रतलाम के डा. सुशील कुमार, भिंड के डा. सत्येंद्र पाल सिंह, दुर्ग की डा. ज्योत्स्ना मिश्रा को बेस्ट रिसर्च अवार्ड इन फार्मिंग सिस्टम से नवाजा गया.

इसी तरह केवीके बड़वानी, जिला बड़वानी, केवीके जावरा, जिला रतलाम, केवीके, रायसेन, जिला रायसेन, केवीके, नारायणपुर, जिला नारायणपुर, केवीके, बालोद, जिला बालोद को बेस्ट कृषि विज्ञान केंद्र अवार्ड मिला. भोपाल के खारपी फार्मर एफपीओ और नरसिंहपुर के शक्तिपूजा एफपीओ को बेस्ट एफपीओ अवार्ड दिया गया.

इन श्रेणियों में मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ़ से कृषि विज्ञान केंद्रों व कृषि संस्थानों के संस्तुति सहित 200 से भी अधिक नोमिनेशन प्राप्त हुए थे. विभिन्न श्रेणियों में प्राप्त इन नोमिनेशन का 4 सदस्यीय जूरी द्वारा मूल्यांकन किया गया, जिस में सर्वश्रेष्ठ नोमिनेशन को पुरस्कार के लिए चुना गया.

इस सम्मान समारोह में पुरस्कृत किसानों के साथसाथ कृषि विज्ञान केंद्रों, कृषि विश्वविद्यालयों और अन्य कृषि संस्थानों के वैज्ञानिक, अन्य शासकीय और प्रशासनिक अधिकारी भी उपस्थित रहे. इस कार्यक्रम का मंच संचालन विजी श्रीवास्तव ने किया. इस कार्यक्रम में कृभको और जात्रे आइसक्रीम की विशेष रूप से सहभागिता रही. उन्होंने सह प्रायोजक के रूप में किसानों का हौसला बढ़ाया.

Diarrhea in Calf: बछड़े को डायरिया से ऐसे बचाएं

गाय के बछड़े बचपन से ही स्वस्थ हों, तो भविष्य में उन का दूध उत्पादन बेहतर होता है. लेकिन उन के जीवन के पहले 3 हफ्ते में दस्त (डायरिया) एक सामान्य और गंभीर समस्या बन कर सामने आ सकती है.

यदि इस समस्या पर समय रहते ध्यान न दिया जाए, तो यही उन के मरने का कारण बन सकता है. साल 2007 में यूएस डेयरी की एक रिपोर्ट में पाया गया है कि 57 फीसदी वीनिंग गोवत्सों की मृत्यु दस्त के कारण हुई, जिन में अधिकांश बछड़े 1 माह से छोटे थे.

दस्त लगने की कई वजहें हो सकती हैं. सही समय पर दूध न पिलाना, दूध का अत्यधिक ठंडा होना या ज्यादा मात्रा में देना, रहने की जगह का साफसुथरा न होना या फिर फफूंद लगा चारा खिलाना आदि. इस के अलावा बछड़ों में दस्त अकसर एंटरोपैथोजेनिक ई कोलाई नामक जीवाणु के कारण होता है. यह जीवाणु आंत से चिपक कर घाव पैदा करता है, जिस से आंत के एंजाइम की गतिविधि घट जाती है. इस वजह से भोजन का पाचन प्रभावित होता है और खनिज पदार्थ अवशोषित होने के बजाय मल के माध्यम से बाहर निकल जाते हैं.

कुछ ई कोलाई वेरोटौक्सिन का उत्पादन करते हैं, जिस से अधिक गंभीर स्थिति जैसे खूनी दस्त हो सकते हैं.आमतौर पर 2 सप्ताह से 12 सप्ताह के बछड़ों में साल्मोनेला प्रजाति के जीवाणुओं के कारण दस्त के लक्षण देखे जाते हैं. इस के अलावा कोरोना वायरस, रोटा वायरस जैसे वायरस और जियार्डिया, क्रिप्टोस्पोरिडियम पार्वम जैसे प्रोटोजोआ भी दस्त के सामान्य कारण हैं.

दस्त के लक्षणों को पहचानना बहुत महत्त्वपूर्ण है. बछड़े की धंसी हुई आंखें, तरल पदार्थों का सेवन कम होना, लेटना, हलका बुखार, ठंडी त्वचा और सुस्ती इस समस्या के संकेत हैं.

यदि बछड़ा बारबार लेट रहा हो, खुद से खड़ा नहीं हो पा रहा हो और खींचने पर आंखों के पास की त्वचा वापस आने में 6 सेकंड से अधिक समय ले रही हो, तो तुरंत पशु डाक्टर से सलाह लें.

दस्त से बचाव के लिए गर्भावस्था के अंतिम 3 महीनों में गाय के पोषण का विशेष ध्यान रखना चाहिए, ताकि बछड़ा स्वस्थ हो और मजबूत रोग प्रतिरोधक क्षमता के साथ जन्म ले.

बछड़े को जन्म के 2 घंटे से ले कर 6 घंटे के भीतर खीस पिलाना आवश्यक है. यदि बछड़ा डिस्टोकिया (कठिन प्रसव) से पैदा हुआ हो, तो उस के सिर और जीभ पर सूजन के कारण खीस को वह ठीक से नहीं पी पाएगा. ऐसे में बछड़े की विशेष देखभाल करनी चाहिए.

इस के अलावा बछड़े को बाहरी तनाव जैसे अधिक ठंड, बारिश, नमी, गरमी और प्रदूषण से बचाना चाहिए. साथ ही सही समय पर टीका भी लगवाना आवश्यक है, ताकि बछड़ा स्वस्थ रह सके.

यदि बछड़े को दस्त हो जाए, तो सब से पहले शरीर में पानी और इलैक्ट्रोलाइट्स की कमी को पूरा करना जरूरी है. इस के लिए हर दिन 2-4 लिटर इलैक्ट्रोलाइट घोल पिलाएं. घर पर ही इलैक्ट्रोलाइट घोल बनाने के लिए :

1 लिटर गरम पानी में 5 चम्मच ग्लूकोज, 1 चम्मच सोडा बाईकार्बोनेट और 1 चम्मच नमक मिलाएं यानी एक चम्मच = 5 ग्राम लगभग.

नेबलोन आयुर्वेदिक पाउडर (10-20 ग्राम) को सादा पानी या चावल के मांड में मिला कर दिन में 2-3 बार पिलाएं. यदि स्थिति गंभीर हो, तो हर 6 घंटे पर यह घोल दें. दस्त करने वाले आंतरिक परजीवियों से बचाव के लिए एल्बेंडाजोल, औक्सीक्लोजानाइड और लेवामिसोल जैसे डीवार्मर्स समयसमय पर देने चाहिए. यदि आवश्यक हो, तो पशु डाक्टर की सलाह से एंटीबायोटिक्स का उपयोग करें.

बछड़ों में दस्त की समस्या को सही समय पर पहचान कर उचित देखभाल और उपचार से नियंत्रित किया जा सकता है.

Cowpea: पशुओं के लिए पौष्टिकता से भरपूर लोबिया

पशुओं के लिए लोबिया (Cowpea)  दलहन चारा है. अधिक पौष्टिक व पाचकता से भरपूर होने के कारण इसे घास के साथ मिला कर बोने से इस की पोषकता बढ़ जाती है.

इस की फसल उगाने से किसानों को कई फायदे होते हैं. पहला तो यह कि इस से पशुओं के लिए हरा चारा मिलता है, वहीं दूसरी ओर खेत के खरपतवार को खत्म कर के मिट्टी की उर्वरताशक्ति भी बढ़ाने का काम करती है.

लोबिया (Cowpea) की फसल को किसान खरीफ और जायद मौसम में उगा सकते हैं.

भूमि और खेत की तैयारी

लोबिया (Cowpea)  की खेती आमतौर पर अच्छे जल निकास वाली सभी तरह की जमीनों में की जा सकती है, लेकिन दोमट मिट्टी पैदावार के हिसाब से अच्छी मानी गई है. अच्छे उत्पादन के लिए खेत को हैरो या कल्टीवेटर से 2-3 जुताई करनी चाहिए, इस से बीज में अंकुरण जल्दी होता है और फसल अच्छी होती है.

बोआई का समय

लोबिया (Cowpea)  की फसल साल में 2 बार की जाती है. गरमियों की फसल के लिए बोआई का सही समय मार्च होता है, खरीफ मौसम में लोबिया (Cowpea) की बोआई बारिश शुरू होने के बाद जुलाई महीने में करनी चाहिए.

उन्नत किस्में

किसी भी फसल के ज्यादा उत्पादन के लिए कई कारक जिम्मेदार होते हैं, उन में से एक उन्नत किस्म का बीज भी है. अगर आप अच्छे किस्म का बीज बोएंगे तो अधिक पैदावार मिलेगी. इसलिए जब भी बोआई करें, अच्छे बीज ही इस्तेमाल करें. आप की जानकारी के लिए कुछ उन्नत बीजों के नाम इस प्रकार हैं:

कोहिनूर, बुंदेल लोबिया-2, बुंदेल लोबिया-3, यूपीसी-5287, आईएफसी-8503, ईसी- 4216, यूपीसी- 5286, 618 वगैरह.

बीज की मात्रा व बोआई

किसान पशुओं के चारे के लिए एक ही खेत में कई तरह के बीज मिला कर बोआई करते हैं. ऐसे में अगर सिर्फ लोबिया (Cowpea)  की फसल लेनी है, तब 40 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर सही होता है. अगर ज्वार या मक्का आदि के साथ बोना है तो 15 से 20 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर ठीक होता है.

सिंचाई

गरमियों के मौसम में 8-10 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए. पूरे सीजन में लगभग 6-7 सिंचाई करनी पड़ती है, जबकि खरीफ मौसम में आमतौर पर सिंचाई की जरूरत नहीं होती है, लेकिन लंबे समय तक बारिश न होने पर 10-12 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए.

खरपतवार नियंत्रण

गरमी में ज्यादा खरपतवार की दिक्कत नहीं होती, लेकिन 20-25 दिनों में खुरपी या फावड़े से गुड़ाई कर के खरपतवार पर काबू पाया जा सकता है. बीज बोने से पहले ट्रीफ्लूरानिन (0.75 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर) का छिड़काव करने से खरपतवार की बढ़वार कम होती है.

फसल कटाई

खरीफ मौसम की फसल 50-60 दिनों में और गरमियों की फसल 70-75 दिनों में कटाई (50 प्रतिशत फूल आने पर) के लिए तैयार हो जाती है. लोबिया (Cowpea)  की फसल की कटाई तब भी शुरू की जा सकती है, जब पौधे बड़े हो जाएं और चारे के लिए इस्तेमाल किए जाने लगें.

राष्ट्रीय गोकुल मिशन (Rashtriya Gokul Mission)

‘राष्ट्रीय गोकुल मिशन’ योजना दूध उत्पादन और बोवाइन पशुओं की उत्पादकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है. इस योजना के कार्यान्वयन और पशुपालन एवं डेयरी विभाग द्वारा किए गए अन्य उपायों से देश में दूध उत्पादन साल 2014-15 में 146.31 मिलियन टन से बढ़ कर साल 2023-24 में 239.30 मिलियन टन हो गया है.

पिछले 10 सालों के दौरान 63.55 फीसदी की वृद्धि हुई है. देश में बोवाइन पशुओं की कुल उत्पादकता साल 2014-15 में प्रति पशु प्रति वर्ष 1,640 किलोग्राम से बढ़ कर साल 2023-24 में प्रति पशु प्रति वर्ष 2,072 किलोग्राम हो गई है. यह 26.34 फीसदी की वृद्धि है, जो विश्व में किसी भी देश द्वारा बोवाइन पशुओं की उत्पादकता में हुई सब से अधिक बढ़ोतरी है.

देशी और नौनडिस्क्रिप्ट गोपशुओं की उत्पादकता वर्ष 2014-15 में प्रति पशु प्रति वर्ष 927 किलोग्राम से बढ़ कर साल 2023-24 में प्रति पशु प्रति वर्ष 1,292 किलोग्राम हो गई है, जो 39.37 फीसदी  की वृद्धि है.

भैंसों की उत्पादकता साल 2014-15 में प्रति पशु प्रति वर्ष 1,880 किलोग्राम से बढ़ कर साल 2023-24 में प्रति पशु प्रति वर्ष 2,161 किलोग्राम हो गई है, जो 14.94 फीसदी  की वृद्धि है.

राष्ट्रीय गोकुल मिशन के अंतर्गत दूध उत्पादन और बोवाइन पशुओं की उत्पादकता को बढ़ाने के लिए कई सफलतापूर्वक योजनाओं का कार्यान्वयन किया जा रहा है.

राष्ट्रव्यापी कृत्रिम गर्भाधान कार्यक्रम: राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत पशुपालन और डेयरी विभाग दूध उत्पादन और देशी नस्लों सहित बोवाइन पशुओं की उत्पादकता को बढ़ावा देने के लिए कृत्रिम गर्भाधान कवरेज का विस्तार कर रहा है. अब तक 8.32 करोड़ पशुओं को कवर किया गया है, 12.20 करोड़ कृत्रिम गर्भाधान किए गए हैं, जिस से 5.19 करोड़ किसान लाभान्वित हुए हैं.

संतति परीक्षण और नस्ल चयन: इस कार्यक्रम का उद्देश्य देशी नस्लों के सांडों सहित उच्च आनुवंशिक गुणवत्ता वाले सांडों का उत्पादन करना है. संतति परीक्षण को गोपशु की गिर, साहीवाल नस्लों और भैंसों की मुर्राह, मेहसाणा की नस्लों के लिए चलाया जा रहा है.

नस्ल चयन कार्यक्रम के अंतर्गत गोपशु की राठी, थारपारकर, हरियाणा, कांकरेज की नस्ल और भैंस की जाफराबादी, नीली रवि, पंढारपुरी और बन्नी नस्लों को शामिल किया गया है. अब तक 3,988 उच्च आनुवंशिक गुणवत्ता वाले सांडों का उत्पादन किया गया है और उन्हें वीर्य उत्पादन के लिए शामिल किया गया है.

इनविट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) तकनीक का कार्यान्वयन : देशी नस्लों के उत्कृष्ट पशुओं का प्रसार करने के लिए विभाग ने 22 आईवीएफ प्रयोगशालाएं स्थापित की हैं. आईवीएफ तकनीक की आनुवंशिक उन्‍नयन में महत्‍वपूर्ण भूमिका है और यह कार्य एक ही पीढ़ी में संभव है. इस के अतिरिक्‍त किसानों को उचित दरों पर तकनीक उपलब्ध कराने के लिए सरकार ने आईवीएफ मीडिया शुरू किया है.

सेक्ससौर्टेड वीर्य उत्पादन : विभाग ने गुजरात, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में स्थित 5 सरकारी वीर्य स्टेशनों पर सैक्स सौर्टेड वीर्य उत्पादन सुविधाएं स्थापित की हैं. 3 निजी वीर्य स्टेशन भी सैक्ससौर्टेड वीर्य खुराक का उत्पादन कर रहे हैं. अब तक उच्च आनुवंशिक गुणवत्ता वाले सांडों से 1.15 करोड़ सैक्ससौर्टेड वीर्य खुराकों का उत्पादन किया गया है और उसे कृत्रिम गर्भाधान के लिए उपलब्ध कराया गया है.

जीनोमिक चयन : गोपशु और भैंसों के आनुवंशिक सुधार में तेजी लाने के लिए विभाग ने देश में जीनोमिक चयन शुरू करने के लिए विशेष रूप से तैयार की गई एकीकृत जीनोमिक चिप विकसित की है – देशी गोपशुओं के लिए गौ चिप और भैंसों के लिए महिष चिप.

ग्रामीण भारत में बहुद्देश्यीय कृत्रिम गर्भाधान तकनीशियन (मैत्री): इस योजना के तहत मैत्री को किसानों के द्वार पर गुणवत्तापूर्ण कृत्रिम गर्भाधान सेवाएं प्रदान करने के लिए प्रशिक्षित और सुसज्जित किया जाता है. पिछले 3 सालों के दौरान राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत 38,736 मैत्री को प्रशिक्षित और सुसज्जित किया गया है.

सैक्ससौर्टेड वीर्य का उपयोग कर के त्वरित नस्ल सुधार कार्यक्रम : इस कार्यक्रम का उद्देश्य 90 फीसदी सटीकता के साथ बछियों का उत्पादन करना है, जिस से नस्ल सुधार और किसानों की आय में वृद्धि हो. किसानों को सुनिश्चित गर्भधारण के लिए सैक्ससौर्टेड वीर्य की लागत के 50 फीसदी तक सहायता मिलती है.

इस कार्यक्रम से अब तक 341,998 किसान लाभान्वित हो चुके हैं. सरकार ने किसानों को उचित दरों पर सैक्ससौर्टेड वीर्य उपलब्ध कराने के लिए देशी रूप से विकसित सैक्ससौर्टेड वीर्य तकनीक शुरू की है.

इनविट्रो फर्टिलाइजेश तकनीक का उपयोग कर त्वरित नस्ल सुधार कार्यक्रम : इस तकनीक का उपयोग बोवाइन पशुओं के तीव्र आनुवंशिक उन्नयन के लिए किया जाता है और आईवीएफ तकनीक अपनाने में रुचि रखने वाले किसानों को प्रत्येक सुनिश्चित गर्भावस्था पर 5,000 रुपए की प्रोत्साहन राशि उपलब्ध कराई जाती है.

देशी बोवाइन नस्लों के विकास और संरक्षण के लिए साल 2014-15 और साल 2024-25 (दिसंबर, 2024 तक) के बीच कार्यान्वयन एजेंसियों को 4,442.87 करोड़ रुपए की वित्तीय सहायता जारी की गई और इस के मुकाबले साल 2004-05 और साल 2013-14 के बीच गोपशु और भैंस विकास के लिए 983.43 करोड़ रुपए की राशि जारी की गई. इस योजना का लाभ दूध उत्पादन और बोवाइन पशुओं की उत्पादकता में वृद्धि के रूप में डेयरी से जुड़े किसानों को मिल रहा है.

ये उपाय अपनाएं उम्दा दूध (Milk) पाएं

भारत का दूध (Milk) उत्पादन दुनिया में कुल दूध उत्पादन का 18.43 फीसदी है. दूध (Milk) में प्रोटीन, वसा व लैक्टोज पाया जाता है जो सेहत के लिए अच्छा होता है. लेकिन इसे खराब होने से बचाए रखना बहुत ही मुश्किल काम है.

ज्यादा दूध (Milk) उत्पादन के लिए अच्छी नस्ल के पशुओं को पाला जाता है, पर स्वच्छ दूध उत्पादन के बिना ज्यादा दूध देने वाले पशुओं को रखना भी बेकार है.

स्वच्छ दूध (Milk) हासिल करने के लिए अच्छी नस्ल के पशुओं को रखने के साथसाथ उन को बीमारियों से बचाने और टीकाकरण कराने की जरूरत होती है, जिस से सभी पोषक तत्त्वों वाला दूध (Milk) मिल सके.

अकसर देखा जाता है कि कच्चा दूध (Milk) जल्दी खराब होता है. खराब दूध (Milk) अनेक तरह की बीमारियां पैदा कर सकता है, इसलिए दूध के उत्पादन, भंडारण व परिवहन में खास सावधानी बरतने की जरूरत होती है.

कच्चे दूध (Milk)  में हवा, दूध दुहने वाले गंदे उपकरणों, खराब चारा, पानी, मिट्टी व घास से पैदा होने वाले कीटाणुओं से खराबी आ सकती है. इस वजह से कम अच्छी क्वालिटी के दूध (Milk) बाहरी देशों को नहीं बेच पाते हैं जबकि पश्चिमी देशों में इस की मांग बढ़ रही है.

वैसे, दूध (Milk) में जीवाणुओं की तादाद 50,000 प्रति इक्रोलिटर या उस से कम होने पर दूध (Milk) को अच्छी क्वालिटी का माना जाता है. दूध इन वजहों से खराब हो सकता है:

* थनों में इंफैक्शन का होना.

* पशुओं का बीमार होना.

* पशुओं में दूध (Milk)  के उत्पादन से संबंधित कोई कमी होना.

* हार्मोंस की समस्या.

* पशुओं की साफसफाई न होना.

* दूध (Milk) दुहने का गलत तरीका.

* दूध (Milk) दुहने का बरतन और उसे धोने का गलत तरीका होना.

* दूध (Milk) जमा करने वाले बरतन का गंदा होना.

* चारे व पानी का खराब होना.

* दूध (Milk) दुहने वाला बीमार हो या साफसफाई न रखता हो.

* थनों का साफ न होना.

दूध (Milk)

स्वच्छ दूध (Milk) उत्पादन के लिए ये सावधानियां बरतना जरूरी हैं:

* पशुओं का बाड़ा या पशुशाला और पशुओं के दुहने की जगह साफ हो. वहां मक्खियां, कीड़े, धूल न हो.

* बीड़ीसिगरेट पीना सख्त मना हो. शेड पक्के फर्श वाले हों. टूटफूट नहीं होनी चाहिए. गोबर व मूत्र निकासी के लिए सही इंतजाम होना चाहिए. पशुओं को दुहने से पहले शेड को साफ और सूखा रखना चाहिए. शेड में साइलेज और गीली फसल नहीं रखनी चाहिए. इस से दूध (Milk) में बदबू आ सकती है.

* पशु को दुहने से पहले उस के थन और आसपास की गंदगी को अच्छी तरह साफ कर लेना चाहिए.

* शेड में शांत माहौल होना चाहिए. सुबह और शाम गायभैंस के दुहने का तय समय होना चाहिए.

* दूध (Milk) दुहने वाला सेहतमंद व साफसुथरा होना चाहिए. दुहने वाले को अपने हाथ में दस्ताने पहनने की सलाह दी जानी चाहिए. दस्ताने न होने पर हाथों को अच्छी तरह जीवाणुनाशक घोल से साफ करना चाहिए. उस के नाखून व बाल बड़े नहीं होने चाहिए.

* दूध (Milk) रखने वाले बरतन एल्युमिनियम, जस्ते या लोहे के बने होने चाहिए. दुधारू पशुओं के थनों को दूध दुहने से पहले व बाद में पोटैशियम परमैगनेट या सोडियम हाइपोक्लोराइड की एक चुटकी को कुनकुने पानी में डाल कर धोया जाना चाहिए और अच्छी तरह सुखाया जाना चाहिए.

* दूध (Milk) दूहने से पहले और बाद में दूध की केन को साफ कर लेना चाहिए. इन बरतनों को साफ करने के लिए मिट्टी या राख का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए.

* दूध (Milk) दुहने से पहले थन से दूध (Milk) की 2-4 बूंदों को बाहर गिरा देना चाहिए क्योंकि इस में बैक्टीरिया की तादाद ज्यादा होती है, जिस से पूरे दूध (Milk) में इंफैक्शन हो सकता है.

* दूध (Milk) दुहते समय हाथ की विधि का इस्तेमाल करना चाहिए. अंगूठा मोड़ कर दूध दुहने की कोशिश नहीं करनी चाहिए. इस से थन को नुकसान हो सकता है और उन में सूजन आ सकती है.

* एक पशु का दूध (Milk) 5-8 मिनट में दुह लेना चाहिए, क्योंकि दूध का स्राव औक्सीटोसिन नामक हार्मोन के असर पर निर्भर करता है. अगर दूध थन में छोड़ दिया जाता है तो यह इंफैक्शन की वजह बन सकता है.

* दूध दुहने के 2 घंटे के भीतर दूध (Milk) को घर के रेफ्रिजरेटर, वाटर कूलर या बल्क मिल्क कूलर का इस्तेमाल कर के 5 डिगरी सैल्सियस या इस से नीचे के तापमान में रखना चाहिए.

* दूध (Milk) के परिवहन के समय कोल्ड चेन में गिरावट को रोकने के लिए तय तापमान बनाए रखा जाना चाहिए.

* स्वास्थ्य केंद्रों पर पशुओं की नियमित जांच करा कर उन्हें बीमारी से मुक्त रखना चाहिए, वरना पशु के इस दूध (Milk) से इनसान भी इंफैक्शन का शिकार हो सकता है.

* पानी को साफ करने के लिए हाइपोक्लोराइड 50 पीपीएम की दर से इस्तेमाल किया जाना चाहिए. फर्श और दीवारों की सतह पर जमे दूध व गंदगी को साफ करते रहना चाहिए.

* दूध दुहते समय पशुओं को न तो डराएं और न ही उसे गुस्सा दिलाएं.

* दूध दुहते समय ग्वालों को दूध (Milk) या पानी न लगाने दें. सूखे हाथों से दूध दुहना चाहिए.

* एक ही आदमी दूध निकाले. उसे बदलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए.

* दूध (Milk) की मात्रा बढ़ाने या ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए इस में गैरकानूनी रूप से बैन की गई चीजों को मिलाना व इस की क्वालिटी के साथ छेड़छाड़ करना ही मिलावट कहलाता है. यह मिलावटी दूध सब के लिए नुकसानदायक होता है. पानी, नमक, चीनी, गेहूं, स्टार्च, वाशिंग सोड़ा, यूरिया, हाइड्रोजन पेराक्साइड वगैरह का इस्तेमाल दूध की मात्रा बढ़ाने व उसे खराब होने से बचाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जो गलत है.

दूध (Milk) की मिलावट का कुछ सामान्य तरीकों से पता किया जा सकता है. जैसे दूध (Milk) का खोया बना कर, दूध में हाथ डाल कर, जमीन पर गिरा कर, छान कर व चख कर. इस के अलावा वैज्ञानिक तरीके से भी दूध की मिलावट की जांच की जा सकती है.

पशुपालन में मशीनीकरण (Mechanization) को बढ़ावा

उदयपुर : 28 जनवरी, 2025. अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना के अंतर्गत ‘पशुपालन के लिए मशीनीकरण’ (Mechanization) विषय पर 2 दिवसीय 24वीं वार्षिक राष्ट्रीय कार्यशाला अनुसंधान निदेशालय सभागार में हुई.

महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय की मेजबानी में आयोजित इस कार्यशाला में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली सहित देशभर के 100 से ज्यादा कृषि वैज्ञानिक, अभियंता और अनुसंधानकर्ताओं ने हिस्सा लिया.

उद्घाटन सत्र में आयुक्त पशुपालन, भारत सरकार, नई दिल्ली डा. अभिजीत मित्रा ने कहा कि कृषि पशुपालन के 3 प्रमुख घटक उत्पादन, रखरखाव एवं फूड सेफ्टी में मैकेनाइजेशन की अपार संभावनाएं  हैं. डेयरी पोल्ट्री के क्षेत्र में भी मशीनीकरण (Mechanization) को तरजीह दी जानी चाहिए, तभी हम दुनिया के साथ कदम से कदम मिला कर चल पाएंगे.

उन्होंने आगे कहा कि पशुपालकों में आज 70 फीसदी महिलाएं काम कर रही हैं. पशुपालन के क्षेत्र में केवल एक छोटे से घटक गोबर उठाना, पोल्ट्री मल व अन्य अपशिष्ट की साफसफाई के लिए भी मशीन तैयार कर ली जाए, तो मानव श्रम की काफी बचत होगी और यह श्रम अन्य कार्यों के उपयोग में आ जाएगा.

डा. अभिजीत मित्रा ने आगे कहा कि पशुपालन विभाग, नई दिल्ली भविष्य में पंचायत राज, उद्यान, कृषि विपणन और अन्य संबद्ध विभागों को साथ ले कर पशुपालन में मशीनीकरण (Mechanization) पर कुछ इस तरह का रोल मौडल तैयार करेगा, जो देशभर में ब्लौक व पंचायत लैवल पर उपयोगी साबित हो. भारत में वर्तमान में 192 मिलियन गौवंश है. इन में से 27 फीसदी क्रौस ब्रीड हैं, जबकि 10 फीसदी ही दूध उत्पादन में शामिल है.

इस बीच उन्होंने राजस्थान की गाय की नस्ल ‘थारपारकर’ का भी जिक्र किया और कहा कि ‘थारपारकर’ वह नस्लीय गाय है, जो विपरीत परिस्थितियों में थार रेगिस्तान को पार करने की क्षमता रखती है और भरपूर दूध भी देती है.

उपमहानिदेशक, आईसीएआर, नई दिल्ली डा. एसएन झा ने कहा कि मौजूदा परिवेश में पशुपालन ही नहीं, बल्कि ‘संपूर्ण मशीनीकरण’ (Mechanization) की दिशा में भी काम करना होगा. विकास के मामले में दुनिया की गति काफी तेज है और ज्ञान के बल पर ही हम इस गति का मुकाबला कर पाएंगे. उन्होंने कृषि वैज्ञानिकों को हर समय अपडेट रहने को कहा.

पशुपालन के साथसाथ फार्म मैकेनाइजेशन पर जोर देते हुए डा. एसएन झा ने कहा कि केवल जलवायु, साफसफाई व आर्द्रता को नियंत्रण करने मात्र से हम दूध उत्पादन में 10 फीसदी की और भी अधिक वृद्धि कर सकते हैं.

उन्होंने कहा कि हमें स्वीकार करना होगा कि ‘जब तक सूरज चांद रहेगा, इस धरा पर पशुधन रहेगा’ पुरानी परंपराओं का त्याग करते हुए पशुधन के रखरखाव, दूध व मांस उत्पादन में वृद्धि के लिए नए तौरतरीकों को अमल में लाना होगा.

कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने बेबाकी से तर्क रखा कि जल, जंगल, जलवायु और जमीन अकेले मनुष्य की बपौती नहीं हैं, वरन इस चराचर जगत में विचरण करने वाले हर जीव का इस पर अधिकार है. गलती यहां हुई कि प्रकृति की इस देन को आदमी ने अपनी बपौती मान लिया. ऐसे में जलचर, नभचर और थलचर प्राणी कहां जाएंगे भलाई इसी में है कि पशुपक्षियों को भी पर्याप्त दानापानी मिलना चाहिए, ताकि प्राकृतिक संतुलन बना रहे.

उन्होंने पशु आहार बनाने, दूध निकालने, अपशिष्ट प्रबंधन और पानी देने की व्यवस्था के लिए भी उपकरण व मशीनरी विकसित करने पर जोर दिया. साथ ही, पशुधन के लिए बेहतर आवास, स्वच्छता व स्वास्थ्य नियंत्रण की भी आवश्यकता है.

आईसीएआर, नई दिल्ली के सहायक महानिदेशक डा. अमरीश त्यागी ने कहा कि आने वाला समय क्षमता निर्माण व कौशल विकास का है. पशुपालन के लिए मशीनीकरण (Mechanization) इसी सोच का हिस्सा है. हर क्षेत्र में गहन अध्ययन, सर्वे तकनीक व प्रौद्योगिकी हस्तांतरण से ही हम उपकरण और मशीन की कल्पना कर उसे साकार रूप में धरातल पर उतर पाएंगे.

परियोजना समन्वयक डा. एसपी सिंह, निदेशक, सीआईएई, भोपाल, डा. सीआर मेहता ने पशु प्रबंधन की आधुनिक तकनीकियों का जिक्र किया. आरंभ में सीटीएई डीन डा. अनुपम भटनागर ने अभियांत्रिकी महावि़द्यालय में होने वाली गतिविधियों पर प्रकाश डाला.

पुस्तक एवं पैम्फलेट का विमोचन

आरंभ में अतिथियों ने अधिष्ठाता सीडीएफडी डा. लोकेश गुप्ता द्वारा लिखित पुस्तक ‘आधुनिक पशुपालन एवं प्रबंधन’ एवं पैम्फलेट समुचित पशु आहार प्रबंधन, पशुचलित उन्नत कृषि यंत्र का विमोचन किया.

कार्यशाला में इन का रहा प्रतिनिधित्व

आईसीएआर-सीआईएई, भोपाल (मध्य प्रदेश), एमपीयूएटी, उदयपुर (राजस्थान), जीबीपीयूएटी, पंतनगर (उत्तराखंड), यूएएस, रायचूर (कर्नाटक), वीएनएमयू, परभणी (महाराष्ट्र), आईजीकेवी, रायपुर (छत्तीसगढ़), ओयूएटी, भुवनेश्वर (ओडिशा), आईसीएआर-एनडीआरआई, करनाल (हरियाणा) और सीएयू-सीएईपीएचटी, गंगटोक (सिक्किम).

दुधारू पशुओं (Milch Animals) को दें हरा चारा

पशुओं से अगर ज्यादा दूध लेना है तो यह जरूरी है कि वे सेहतमंद रहें. अगर पशुपालक दुधारू पशुओं को हरा चारा दें और सही प्रबंध करें तो वे अपने पशुओं को ठीक से रख सकते हैं.

दुधारू पशुओं की देखभाल करना बहुत ही जरूरी है, क्योंकि इन से ज्यादा दूध लेने से ज्यादा पैसा मिलता है. मानव शरीर के लिए पशुजनित प्रोटीन भी जरूरी है, जो शाकाहारी इनसान को केवल दूध से ही मिल सकता है.

दुधारू पशुओं से ज्यादा दूध लेने के लिए ज्यादा पोषक तत्त्वों की जरूरत पड़ती है. ये पोषक तत्त्व हैं चिकनाई, कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, विटामिन, खनिज पदार्थ, लवण और पानी. इस के लिए दुधारू पशुओं को संतुलित आहार देना चाहिए, जो उन के स्वास्थ्य से संबंधित सभी तरह की जरूरतों को पूरा कर सके और उन्हें सेहतमंद रखने के लिए उसे पोषक तत्त्व ठीक अनुपात और सही मात्रा में मुहैया करा सके.

संतुलित आहार है जरूरी

दूध का उत्पादन 2 बातों पर ज्यादा निर्भर करता है:

* पशु के दूध देने की कूवत.

* पशु का रखरखाव, देखभाल और आहार.

आहार की मात्रा पशु द्वारा दिए गए दूध की मात्रा और उस में चिकनाई और प्रतिशत पर निर्भर है. दूध अयन में बनता है. दुधारू पशु को ऐसे पोषक तत्त्व और ज्यादा खिलाने चाहिए, जो दूध में निकले हुए तत्त्वों की कमी को पूरा कर सकें. साथ ही, उन तत्त्वों को भी पूरा करें, जो इस क्रिया के पूरा होने में खत्म हुए हों.

दुधारू पशुओं (Milch Animals)

ऊर्जा भी है जरूरी

दुधारू पशुओं के शरीर से दूध के साथ कार्बोहाइड्रेट और चिकनाई बाहर निकलती है. इस नुकसान को पूरा करने के लिए पशु को 5 फीसदी चिकनाई और अच्छे कार्बोहाइड्रेट वाले हरे चारे जैसे ज्वार, मक्का, लोबिया, ग्वार, बरसीम, जई वगैरह खिलाने चाहिए. इन्हें खिलाने से दूध में निकले जरूरी तत्त्वों की कमी पूरी हो जाती है.

प्रोटीन भी जरूर दें

दूध बनने में कार्बोहाइड्रेट अहम भूमिका निभाता है और उसे शरीर से बाहर निकलने में प्रोटीन का नुकसान होता है. इस कमी को पूरा करने के लिए हम आमतौर पर पशु को एक किलोग्राम टाइप 1 दाना या पैलेट खिलाते हैं, लेकिन यदि हमारे पास फलीदार हरा चारा हो तो 12 किलोग्राम हरे चारे से उस की यह जरूरत पूरी की जा सकती है. हरे फलीदार चारे को हमेशा सूखे भूसे के साथ मिला कर देना चाहिए वरना पेट में गैस बन सकती है.

खनिज लवणों की जरूरत

दूध में कैल्शियम और फास्फोरस की मात्रा शरीर से काफी निकलती है. इन की भरपाई के लिए फलीदार हरा चारा जैसे लूसर्न, बरसीम, ग्वार, लोबिया वगैरह में कैल्शियम और गेहूं के चोकर में फास्फोरस काफी मात्रा में होने के चलते दुधारू पशुओं को आहार में खिलाना चाहिए.

वहीं दूसरी ओर दूध में तमाम तरह के विटामिन पाए जाते हैं. इन का दूध के बनने और शरीर से बाहर निकलने में बहुत अधिक महत्त्व हैं. खासतौर से चिकनाई में घुलनशील विटामिन ए और विटामिन डी, जो शरीर में नहीं बनते, उन्हें चारे द्वारा पशुओं को खिलाने चाहिए.

पशुओं को हरा चारा खिलाने से विटामिन ए मिलता है, वहीं धूप में पशु को खड़ा कर के अथवा चारागाहों में चराने से चमड़ी पर सूरज की किरणों के प्रभाव से विटामिन डी मिलता है. खिलाए जाने वाले दानों से काफी मात्रा में पशु को विटामिन ई मिल जाता है. बी श्रेणी के विटामिन और विटामिन सी पशु के शरीर के अंदर भोजन प्रणाली में जीवाणुओं द्वारा हरे चारे पर प्रतिक्रिया हो कर खुद ही बन जाते हैं और इस तरह उन की जरूरत पूरी हो जाती है.

हरे चारे की उपयोगिता

दुधारू पशुओं (Milch Animals)* हरा चारा स्वादिष्ठ, रुचिकर, पौष्टिक और जल्दी पचने वाला होता है.

* हरे चारे से पशुओं को सभी पोषक तत्त्व मिल जाते हैं, खासकर विटामिन ए, प्रोटीन, पानी और खनिज पदार्थ. दुधारू पशुओं को इन की जरूरत बहुत ज्यादा होती है.

* पशुओं को हरा चारा खिलाने से दाने की बचत होती है.

* हरे चारे द्वारा पालनेपोसने में खर्च की कमी से उत्पादन की लागत भी कम हो जाती है.

* किसान एक साल में इन हरे चारों की कई फसलें ले सकता है. इस से उसे सालभर में प्रति हेक्टेयर अच्छी आमदनी हो जाती है.

* अधिक रेशेदार होने की वजह से ये चारे राशन की मात्रा बढ़ाते हैं, जो भोजन प्रणाली के तनाव के लिए जरूरी है. इस तरह तनाव पा कर ही भोजन प्रणाली अपना पूरा काम करने में समर्थ होती है.

* ये चारे भोजन प्रणाली के अंदर अधिक पानी सोख कर के मृदुरेचक प्रभाव पैदा करते हैं.

* ये चारे ज्यादा सस्ते और शक्तिदायक होते हैं.

* जुगाली करने वाले पशुओं में इन का और भी ज्यादा महत्त्व है. रूमेन (प्रथम अमाशय) में मौजूद जीवाणुओं के लिए ये चारे अनुकूल अवस्थाएं प्रदान करते हैं:

* चारे के रेशे या न पचने वाले तंतुओं को तोड़ कर ये जीवाणु उन से उड़नशील चिकने अम्ल पैदा करते हैं जो कि शरीर के लिए ताकत देते हैं.

* ये जीवाणु इन चारे से कुछ जरूरी अमीनो एसिड और विटामिन भी तैयार करते हैं.

* ये चारे भोजन प्रणाली की दीवारों में संकुचन और विमोचन क्रियाओं के पूरा होने में भी जरूरी भूमिका निभाते हैं.

* ये चारे पाचक रसों की क्रिया के लिए अधिक बड़ी सतह बनाते हैं, जिस से उन का असर भोजन पर अच्छी तरह हो सके.

* पशुओं को उन की शुष्क पदार्थ की पूरी जरूरत का दोतिहाई हिस्सा इन्हीं चारों से दिया जाता है.

साफ पानी का हो इंतजाम

दुधारू पशुओं को भरपूर मात्रा में हर समय साफ ताजा रंगहीन, गंधहीन, कीटाणुरहित पानी देना चाहिए. पशु के शरीर में तकरीबन 70 फीसदी भाग और उस के दूध में तकरीबन 87 फीसदी भाग में पानी होता है.

बता दें, शरीर में पानी की 10 फीसदी कमी होने पर पशुओं में बेचैनी होने, कांपने अथवा कमजोरी आने के लक्षण पैदा हो जाते हैं और 20 फीसदी कमी होने पर पशु मर जाता है. हरे चारे में तकरीबन 70-80 फीसदी भाग पानी या नमी का होता है, जो पशु के पोषण में बहुत उपयोगी होता है.