‘गायपालन’ (Cow husbandry) विषय पर पांचदिवसीय प्रशिक्षण

भागलपुर : कृषि विज्ञान केंद्र, सबौर के प्रशिक्षण कक्ष में ‘गायपालन’ विषय पर पांचदिवसीय प्रशिक्षण का उद्घाटन केंद्र के वरीय वैज्ञानिक एवं प्रधान, डा. राजेश कुमार द्वारा किया गया. प्रशिक्षण के उद्घाटन के अवसर उन्होंने कहा कि पशुपालन का काम छोटे किसान से ले कर बड़े किसान तक करते हैं. इस प्रशिक्षण के माध्यम से गायपालन की विभिन्न तकनीकी जानकारी उपलब्ध कराई जाएगी, जिस का उपयोग कर के आप एक सफल पशुपालक बन  सकते हैं और इसे स्वरोजगार के रूप में अपना कर आर्थिक लाभ भी प्राप्त कर सकते हैं.

प्रशिक्षण के तकनीकी सत्र में बिहार कृषि महाविद्यालय के सस्य वैज्ञानिक डा. संजीव गुप्ता ने हाइड्रोपोनिक्स के माध्यम से सालभर पौष्टिक चारा उत्पादन संबंधी जानकारी दी

केंद्र के पशु वैज्ञानिक डा. मो. ज्याउल होदा द्वारा गायपालन से संबंधित विभिन्न आयामों की तकनीकी जानकारी जैसे गाय के रहने के लिए जगह का चयन एवं बनावट, उस के खाने के लिए उचित सामग्री एवं मात्रा संबंधी जानकारी उपलब्ध कराई गई. साथ ही, समेकित कृषि प्रणाली, कृषि विज्ञान केंद्र एवं प्रक्षेत्र, बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर का दुग्ध उत्पादन इकाई/बकरीपालन इकाई एवं अन्य इकाई का परिभ्रमण कराया गया.

इस अवसर पर केंद्र के वैज्ञानिक ई. पंकज कुमार, डा. पवन कुमार, डा. मनीष राज, रूबी कुमारी, ईश्वर चंद्र सहित जिले के 25 गायपालक और किसानों ने भाग लिया.

कृषि विज्ञान केंद्रों की स्थापना के शानदार 50 साल

उदयपुर : 19 जुलाई. कृषि विज्ञान केंद्रों की स्थापना के शानदार 50 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में पुडुचेरी से आंरभ हुई मशाल यात्रा (गोल्डन जुबली टौर्च) प्रदेश के विभिन्न केवीके से होती हुई पिछले दिनों केवीके, वल्लभनगर पंहुची. इस मौके पर आयोजित भव्य कार्यक्रम में राजस्थान पशु चिकित्सा और पशु विज्ञान विश्वविद्यालय बीकानेर (राजुवास) के कुलपति डा. एसके गर्ग और वल्लभनगर केंद्र के अधिष्ठाता डा. आरके नागदा ने मशाल महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्ववि़द्यालय को सौंपी. एमपीयूएटी की ओर से निदेशक प्रसार शिक्षा निदेशालय डा. आरए कौशिक एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक और अध्यक्ष, उदयपुर द्वितीय डा. आरएल सोनी ने यह मशाल ग्रहण की.

एमपीयूएटी के कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने बताया कि देश में पहला केवीके 21 मार्च, 1974 को पुडुचेरी (पांडिचेरी) में स्थापित किया गया और विगत 5 दशक में उपादेयता और आवश्यकता के आधार पर आज देश में केवीके की संख्या बढ़ कर 731 हो गई है. केवीके का यह मजबूत नैटवर्क खेती की चुनौतियों के लिए अनुकूल है.

उन्होंने बताया कि केवीके योजना भारत सरकार द्वारा वित्तपोषित है. केवीके कृषि विश्वविद्यालय, आईसीएआर, संस्थानों, संबंधित सरकारी विभागों और कृषि में काम करने वाले गैरसरकारी संगठनों को स्वीकृत किए जाते हैं. केवीके का उद्देश्य प्रौद्योगिकी मूल्यांकन, शोधन और प्रदर्शनों के माध्यम से कृषि व सबद्ध उद्यमों में स्थान विशिष्ट प्रौद्योगिकी मौड्यूल का मूल्यांकन करना है.

डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने कहा कि किसानों को फसल, पशुधन, वानिकी और मत्स्यपालन के क्षेत्रों में प्रौद्योगिकी तक पहुंच की आवश्यकता है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) पूरे भारत में जिला स्तर पर स्थापित केवीके के माध्यम से इस का समाधान करता है. केवीके अनुसंधान और विस्तार प्रणाली के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में काम करते हैं. खेत पर परीक्षण, अग्रिम पंक्ति परीक्षण व किसानों एवं विस्तारकर्मियों के लिए प्रशिक्षण आयोजित करते है.

उन्होंने बताया कि केवीके ने फसलोत्पादन, पशुपालन, कृषि वानिकों और संबद्ध क्षेत्रों में नवीनतम प्रगति के साथ लाखों किसानों को सशक्त बनाया है. केवीके की सब से महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक कृषि उद्यमिता और ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा देने की रही है.

प्रसार शिक्षा निदेशक डा. आरए कौशिक ने बताया कि जम्मूकश्मीर व पंजाब प्रांतों के केवीके से होती हुई यह मशाल यात्रा राजस्थान के बीकानेर पंहुची. अब एमपीयूएटी के अधीन बांसवाड़ा, भीलवाड़ा, प्रथम व द्धितीय, डूंगरपुर, राजसमंद, चित्तौड़गढ, प्रतापगढ़़ सहित समस्त 8 केवीके पर यह मशाल यात्रा जाएगी, जहां से कोटा कृषि विश्वविद्यालय को सौंपी जाएगी.

21 मार्च, 2024 को पुडुचेरी से आंरभ हुई यह मशाल यात्रा संपूर्ण भारत में भ्रमण करते हुए 21 मार्च, 2025 को पुनः पुडुचेरी पहुंचेगी, जहां इस यात्रा का समापन समारोह होगा.

Krishi Vigyan Kendras

केवीके की परिकल्पना के जनक डा. मोहन सिंह मेहता

कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने बताया कि आईसीएआर ने आज पूरे भारत में 731 कृषि विज्ञान केंद्र का मजबूत नैटवर्क बनाया है और भविष्य में देश के हर जिला मुख्यालय पर केवीके की स्थापना की योजना अमल में ली जानी है. हर्ष और गौरवान्वित करने की इस योजना के जनक उदयपुर के शिक्षाविद डा. मोहन सिंह मेहता रहे हैं. डा. मोहन सिंह मेहता ने केवीके की स्थापना से काफी पहले विद्याभवन (बड़गांव) में वे सारी गतिविधियां आंरभ कर दी, जो आज केवीके में देखने को मिल रही हैं.

उन्होंने बताया कि डा. मोहन सिंह मेहता समिति की रिपोर्ट की सिफारि के आधार पर ही 21 मार्च, 1974 को पुडुचेरी में प्रथम कृषि विज्ञान केंद्र की स्थापना संभव हो सकी. किसानों को फसल, पशुपालन, वानिकी और मत्स्यपालन के क्षेत्र में प्रौद्योगिकी व तकनीकी हस्तांतरण का कार्य विद्याभवन में वर्षों  से जारी था, लिहाजा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् (आईसीएआर) ने विद्याभवन के बड़गांव केंद्र को भी हाथोंहाथ कृषि विज्ञान केंद्र का दर्जा दे दिया, जो आज एक आदर्श केवीके के रूप में स्थापित है.

डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने बताया कि केवीके ने किसानों को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और हितधारकों की जरूरतों को पूरा करने में अपनी योग्यता साबित की है. पिछले 5 सालों में केवीके से जुड़े कई किसानों को भारत सरकार द्वारा पद्मश्री पुरस्कार और जीनोम सेवियर पुरस्कार सहित अन्य पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है, जिस में कृषि में उन के असाधारण योगदान को मान्यता दी गई है. यह मान्यता कृषि प्रतिभाओं को प्रेरित करने और कृषक समुदायों के भीतर नवाचार को बढ़ावा देने में केवीके द्वारा निभाई गई महत्वपूर्ण भूमिका को रेखांकित करती है.

उन्होंने बताया कि भारतीय कृषि परिदृश्य में उत्पादकता बढ़ाने, स्थिरता सुनिश्चित करने और किसानों की आजीविका में सुधार लाने के उद्देश्य से केवीके द्वारा की गई विभिन्न पहलों के माध्यम से महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं. औसतन प्रत्येक केवीके 43 गांवों को कवर करता है और लगभग 4,300 किसानों को अपनी सेवा देता है. इन में से लगभग 80 फीसदी गांव इस के परिसर से 10 किलोमीटर से अधिक दूरी पर स्थित हैं. केवीके ने खेती के तरीकों को आधुनिक बनाने और अटल टिंकरिंग लैब्स के माध्यम से छात्रों को जानकारी प्रदान करने के लिए ड्रोन तकनीक को अपनाया.

लुवास करेगा राष्ट्रीय पशु चिकित्सा विज्ञान अकादमी  की मेजबानी

हिसार : लाला लाजपत राय पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, हिसार, हरियाणा राष्ट्रीय पशु चिकित्सा विज्ञान अकादमी के साथ मिल कर 29-30 नवंबर, 2024 को “सतत पशु स्वास्थ्य एवं उत्पादन : चुनौतियों एवं प्राथमिकताओं की खोज” विषय पर 22वें राष्ट्रीय दीक्षांत समारोह एवं वैज्ञानिक सम्मेलन का आयोजन किया जाएगा. इस कार्यक्रम का आयोजन कुलपति प्रो. (डा.) विनोद कुमार वर्मा के संरक्षक नेतृत्व में किया जाएगा.

इस विषय पर कुलपति सचिवालय में एक औपचारिक बैठक का आयोजन किया गया, जिस में  कुलपति प्रो. (डा.) विनोद कुमार वर्मा ने राष्ट्रीय दीक्षांत समारोह एवं वैज्ञानिक सम्मेलन की प्रथम सूचना विवरणिका का औपचारिक रूप से विमोचन किया. विमोचन के बाद उन्होंने कहा कि यह आयोजन देश में पशु चिकित्सा विज्ञान और पशुपालन के विकास में अपनी छाप छोड़ेगा. उन्होंने कहा कि आयोजन के लिए गठित आयोजक टीम समय रहते सारी तैयारी कर लेगी, ताकि इसे योजनाबद्ध तरीके से आयोजित किया जा सके.

सम्मेलन के आयोजन सचिव डा. गुलशन नारंग, अधिष्ठाता, पशु चिकित्सा विज्ञान महाविद्यालय ने बताया कि इस कार्यक्रम में कई जानेमाने पशु चिकित्सा पेशेवर, राष्ट्रीय पशु चिकित्सा विज्ञान अकादमी के सदस्य, विभिन्न विश्वविद्यालयों और देश के विभिन्न हिस्सों से वैज्ञानिक और छात्र भाग लेंगे.

उन्होंने बताया कि सम्मेलन के दौरान पशु स्वास्थ्य एवं उत्पादन के विभिन्न क्षेत्रों में 4 तकनीकी सत्र आयोजित किए जाएंगे. इस मौके पर लुवास के मानव संसाधन एवं प्रबंधन निदेशक डा. राजेश खुराना एवं आयोजक टीम के सदस्य मौजूद रहे.

छोटे और सीमांत किसानों के लिए नया कौम्पैक्ट यूटिलिटी ट्रैक्टर

नई दिल्ली: एक नया विकसित कौम्पैक्ट, किफायती और आसानी से चलने वाला ट्रैक्टर छोटे और सीमांत किसानों को लागत कम रखते हुए कृषि उत्पादकता बढ़ाने में मदद कर सकता है. किसानों को आपूर्ति के लिए ट्रैक्टरों के बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए एक एमएसएमई ने विनिर्माण संयंत्र स्थापित करने की योजना बनाई है.

भारत में 80 फीसदी से ज्यादा सीमांत और छोटे किसान हैं. उन में से एक बड़ी आबादी अभी भी बैलों से खेती करने पर निर्भर है, जिस में परिचालन लागत, रखरखाव और खराब रिटर्न एक चुनौती है. हालांकि पावर टिलर बैलों से चलने वाले हल की जगह ले रहे हैं, लेकिन उन्हें चलाना बोझिल है. दूसरी ओर ट्रैक्टर छोटे किसानों के लिए काफी महंगे हैं.

इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए  सीएसआईआर-केंद्रीय यांत्रिक इंजीनियरिंग अनुसंधान संस्थान (सीएसआईआर-सीएमईआरआई) ने डीएसटी के एसईईडी प्रभाग के सहयोग से सीमांत और छोटे किसानों की आवश्यकता को पूरा करने के लिए कम हौर्सपावर रेंज का एक कौम्पैक्ट, किफायती और आसानी से चलने वाला ट्रैक्टर विकसित किया है.

उन्होंने कई मौजूदा एसएचजी के बीच इस तकनीक को बढ़ावा दिया है और इस तकनीक के लिए विशेष रूप से नए एसएचजी बनाने के प्रयास किए गए हैं. सीएसआईआर-सीएमईआरआई बड़े पैमाने पर निर्माण के लिए स्थानीय कंपनियों को इस का लाइसैंस देने पर भी विचार कर रहा है, ताकि इस का लाभ स्थानीय किसानों तक पहुंच सके.

ट्रैक्टर को 9 एचपी डीजल इंजन के साथ विकसित किया गया है, जिस में 8 फौरवर्ड और 2 रिवर्स स्पीड, 540 आरपीएम पर 6 स्प्लिन के साथ पीटीओ है. ट्रैक्टर का कुल वजन लगभग 450 किलोग्राम है, जिस में आगे और पीछे के पहिए का आकार क्रमशः 4.5-10 और 6-16 है. व्हीलबेस, ग्राउंड क्लीयरेंस और टर्निंग रेडियस क्रमशः 1200 मिमी., 255 मिमी. और 1.75 मीटर है. इस से खेती में तेजी आएगी, बैलगाड़ी से खेती करने में लगने वाले कई दिनों की तुलना में खेती कुछ ही घंटों में हो जाएगी और किसानों की पूंजी और रखरखाव लागत भी कम हो जाएगी. इसलिए, छोटे और सीमांत किसानों के लिए बैल से चलने वाले हल की जगह किफायती कौम्पैक्ट ट्रैक्टर ले सकता है.

इस तकनीक का प्रदर्शन आसपास के गांवों और विभिन्न निर्माताओं के सामने किया गया. रांची स्थित एक एमएसएमई ने ट्रैक्टर के बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए एक संयंत्र स्थापित कर के इस के निर्माण में रुचि दिखाई है. वे विभिन्न राज्य सरकार की निविदाओं के माध्यम से किसानों को सब्सिडी दरों पर विकसित ट्रैक्टर की आपूर्ति करने की योजना बना रहे हैं.

किसानों की बढ़ेगी आमदनी, करें ये काम

सागर : जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए जागरूकता अभियान चलाएं एवं किसानों को उन्नत एवं लाभप्रद खेती के लिए प्रोत्साहित करें. फसलों में विविधता लाएं और ऐसी फसलों को प्राथमिकता दें, जो कम समय में तैयार हो जाती हैं. साथ ही, किसानों को प्रमाणित बीज, संतुलित उर्वरक एवं आधुनिक कृषि यंत्रों के उपयोग के लिए प्रेरित करें, जिस से अधिक उत्पादन हो और किसानों की आमदनी बढ़े.

उक्त निर्देश कृषि उत्पादन आयुक्त एसएन मिश्रा ने संभागीय समीक्षा बैठक में कृषि एवं उस से जुड़े विभागों की गतिविधियों की समीक्षा के दौरान दिए. बैठक के पहले चरण में सागर संभाग में गत रबी मौसम में हुए उत्पादन और खरीफ मौसम की तैयारियों की समीक्षा की गई. दूसरे चरण में पशुपालन, मत्स्यपालन एवं दुग्ध उत्पादन की समीक्षा हुई.

कलक्टर कार्यालय के सभागार में आयोजित

कृषि उत्पादन आयुक्त ने संभाग के सभी जिलों में खाद व बीज भंडारण की समीक्षा की. साथ ही, सभी जिला कलक्टर को निर्देश दिए कि खरीफ के मौसम में किसानों को खादबीज मिलने में दिक्कत न हो. वितरण केंद्रों का लगातार निरीक्षण कर यह सुनिश्चित किया जाए कि किसानों को कोई कठिनाई न हो.

कृषि उत्पादन आयुक्त एसएन मिश्रा ने कहा कि सागर संभाग में उद्यानिकी अर्थात फल, फूल व सब्जियों के उत्पादन को बढ़ावा देने की बड़ी गुंजाइश है. इसलिए संभाग के हर जिले में स्थानीय परिस्थितियों व जलवायु के अनुसार क्लस्टर बना कर उद्यानिकी फसलों से किसानों को जोड़ें. साथ ही, हर जिले में किसानों के एफपीओ (किसान उत्पादक संगठन) बनाने पर भी विशेष बल दिया.

कृषि उत्पादन आयुक्त एसएन मिश्रा ने कम पानी में अधिक सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने वाली पद्धतियों को बढ़ावा देने पर विशेष बल दिया. उन्होंने कहा कि सागर संभाग में स्प्रिंकलर व ड्रिप सिंचाई पद्धति अपनाने के लिए किसानों को प्रेरित करें. साथ ही, खेत तालाब बनाने के लिए भी किसानों को बढ़ावा दें. उन्होंने कहा कि इन सिंचाई पद्धतियों के लिए सरकार द्वारा बड़ा अनुदान दिया जाता है.

मौसम एप का व्यापक प्रचारप्रसार करने पर बैठक में विशेष रूप से निर्देश दिए गए. इस एप पर एक हफ्ते की मौसम की जानकारी उपलब्ध रहती है. यह एप गूगल प्ले स्टोर से आसानी से डाउनलोड किया जा सकता है.

कृषि उत्पादन आयुक्त एवं अतिरिक्त मुख्य सचिव, कृषि ने कहा कि इस एप के माध्यम से किसानों को मौसम की जानकारी समय से मिल सकेगी और वे मौसम को ध्यान में रख कर अपनी खेतीबारी कर पाएंगे. साथ ही, अपनी फसल को भी सुरक्षित कर सकेंगे.

कृषि उपज मंडियों को बनाएं हाईटैक और कैशलेस

कृषि उत्पादन आयुक्त एसएन मिश्रा ने कृषि उपज मंडियों को हाईटैक, कैशलेस व सर्वसुविधायुक्त बनाने पर विशेष बल दिया. उन्होंने कहा कि इस के लिए शासन से आर्थिक मदद दिलाई जाएगी.

उन्होंने समझाया कि हाईटैक से आशय है कि मंडी में किसान की उपज की तुरंत खरीदी हो जाए, उन के बैठने के लिए बेहतर व्यवस्था हो, कैशलेस भुगतान की सुविधा हो और कृषि उपज की आटो पैकेजिंग व्यवस्था हो.

एसएन मिश्रा ने सभी जिला कलक्टर को सहकारी बैंकों की वसूली करा कर बैंकों को मजबूत करने के निर्देश भी बैठक में दिए. उन्होंने किसान क्रेडिटधारी किसानों के साथसाथ गैरऋणी किसानों की फसल का बीमा कराने के लिए भी कहा.

अतिरिक्त मुख्य सचिव, कृषि, अशोक वर्णवाल ने कहा कि कृषि यंत्रों का उपयोग किसानों के लिए हर तरह से लाभप्रद है. उन्होंने कृषि यंत्र एवं उपकरणों का प्रिजेंटेशन दिखाया और निर्देश दिए कि अनुदान के आधार पर हर जिले में किसानों को आधुनिक कृषि यंत्र उपलब्ध कराएं.

उन्होंने सागर संभाग में अरहर की वैरायटी अपनाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित करने के निर्देश दिए. अरहर की पूसा वैरायटी 6 महीने में तैयार हो जाती है और इस फसल के बाद किसान दूसरी फसल भी ले सकते हैं.

अशोक वर्णवाल ने प्रमाणित बीज व उर्वरकों के संतुलित उपयोग व मिट्टी परीक्षण के लिए किसानों को प्रोत्साहित करने पर भी विशेष बल दिया. उन्होंने कहा कि मिट्टी परीक्षण के लिए स्थानीय कृषि स्नातक युवाओं के जरीए चलित लैब स्थापित कराई जा सकती हैं. इस से किसानों की ओर से मिट्टी परीक्षण की मांग बढ़ेगी और किसानों व कृषि स्नातक दोनों को फायदा होगा.

कृषि उत्पादन आयुक्त एसएन मिश्रा ने बैठक के द्वितीय चरण में पशुपालन, मत्स्यपालन एवं डेयरी उत्पादन सहित कृषि से जुड़ी गतिविधियों की समीक्षा की. उन्होंने कहा कि कृषि आधारित अर्थव्यवस्था बगैर पशुपालन के मजबूत नहीं रह सकती. इसलिए किसानों को उन्नत नस्ल के पशुपालन के लिए प्रोत्साहित करें.

एसएन मिश्रा ने पशु नस्ल सुधार पर भी विशेष बल दिया. साथ ही, बरसात से पहले सभी जिलों में मौसमी बीमारियों से बचाव के लिए अभियान बतौर टीकाकरण कराने के निर्देश दिए.

उन्होंने कहा कि हर जिले में गौशालाओं को प्रमुखता दें. अधूरी गौशालाएं जल्द से जल्द पूरी कराई जाएं और किसानों के दुग्ध व्यवसाय को संस्थागत रूप देने पर जोर देते हुए कहा कि उन्हें दुग्ध समितियों से जोड़ें.

बैठक में मत्स्यपालन को बढ़ावा देने और दुग्ध संघ को मजबूत करने के संबंध में उन्होंने जरूरी दिशानिर्देश दिए.

कृषि उत्पादन आयुक्त एसएन मिश्रा ने सभी कलक्टरों को निर्देश दिए कि बैंक अधिक से अधिक शासन की योजनाओं का लाभ हितग्राहियों को दे कर उन को लाभान्वित करें. उन्होंने समस्त किसानों से अपील की कि अधिक मात्रा में उर्वरक का छिड़काव न करें. उन्होंने कहा कि सभी जिलों में पर्याप्त मात्रा में उर्वरक एवं बीज का भंडारण सुनिश्चित किया जाए.

द्वितीय चरण की बैठक में प्रमुख सचिव मत्स्यपालन डा. नवनीत कोठारी सहित पशुपालन, डेयरी व मत्स्यपालन विभाग के राज्य स्तरीय अधिकारी मौजूद रहे.

संभाग आयुक्त डा. वीरेंद्र सिंह रावत ने कहा कि किसानों को जागरूक करने में सोशल मीडिया का उपयोग करें.

उन्होंने प्रगतिशील किसानों द्वारा की जा रही उन्नत खेती की वीडियो क्लीपिंग बना कर सोशल मीडिया प्लेटफार्म के माध्यम से अन्य किसानों को जागरूक करने का सुझाव दिया और किसानों को स्वसहायता समूहों में संगठित करें, जिस से कि वे अधिक लाभ कमा सकें. उन्होंने समय के अनुसार खेती में बदलाव लाने पर भी बल दिया.

सभी जिलों के कलक्टर ने बताई अपनेअपने जिले की कार्ययोजना

खेती को लाभप्रद बनाने के लिए संभाग के सभी जिलों में बनाई गई कार्ययोजना के बारे में सभी कलक्टरों ने अपनेअपने सुझाव दिए. जिले में नैनो यूरिया अपनाने के लिए किसानों को प्रेरित किया जा रहा है. जिले में ज्वार, मक्का व उड़द और उद्यानिकी फसलों का रकबा बढ़ाया जाएगा.

यंत्रदूत ग्राम (Yantradoot Village) में आधुनिक कृषि तकनीक से फसल बोआई

छिंदवाडा : उपसंचालक, कृषि , जितेंद्र कुमार सिंह व सहायक कृषि यंत्री  समीर पटेल एवं कृषि विभाग की टीम द्वारा चयनित यंत्रदूत ग्राम सिल्लेवानी, लास एवं आमाझिरी में किसानों के खेत में उन्नत कृषि तकनीक रेज्डबेड एवं ब्राडबेड फरो पध्दति से मक्का, अरहर, मूंगफल्ली एवं सोयाबीन फसल की बोआई के प्रदर्शनों का पिछले दिनों निरीक्षण किया गया. साथ ही, आत्मा परियोजना द्वारा ब्राडबेड फरो पध्दति से सोयाबीन फसल का फार्म स्कूल प्रदर्शन का निरीक्षण किया गया. इन कृषि तकनीकों को अपनाने से अतिवर्षा एवं अल्पवर्षा दोनों ही स्थिति में फसल की बढ़वार अच्छी होती है एवं निदाईगुड़ाई करने में सुविधा होती है. साथ ही, सामान्य पध्दति से फसल बोआई की तुलना में 10-15 फीसदी अधिक आय प्राप्त होती है.

उपसंचालक, कृषि , जितेंद्र कुमार सिंह द्वारा जिले के सभी किसानों से अपील की गई है कि जिले के अधिक से अधिक किसान उन्नत कृषि तकनीक का उपयोग करें, जिस से उत्पादन में वृध्दि हो सके.

इस कृषि तकनीकी के संबंध में तकनीकी मार्गदर्शन के लिए सहायक कृषि यंत्री छिंदवाडा कार्यालय में संपर्क करने पर सभी आवश्यक तकनीकी मार्गदर्शन एवं यंत्र की उपलब्धता कराई जाएगी.

भ्रमण के दौरान सहायक संचालक, कृषि, दीपक चौरासिया, वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी मोहखेड  डीएस घाघरे, बीटीएम आत्मा  प्रिया कराडे,  पंकज पराडकर, कृषि विस्तार अधिकारी भाग्य,  डीएल धुर्वे एवं प्रगतिशील किसान  संजय पवार एवं ग्राम के किसान उपस्थित थे.

विश्वविद्यालय को मिले 13 वर्षों में 13 पेटेंट (Patents)

भागलपुर : 27वीं शोध परिषद की बैठक 19-20 जून 2024 का उद्घाटन 19 जून, 2024 को बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर के मुख्य प्रेक्षागृह में कुलपति डा. डीआर सिंह ने किया. शोध परिषद की बैठक हर साल 2 बार की जाती है – खरीफ और रबी मौसम की शुरुआत में.

इस बैठक में विश्वविद्यालय में चल रही विभिन्न परियोजनाओं की प्रगति पर चर्चा होती है, किसानों की समस्याओं के निराकरण के लिए नई परियोजनाओं का प्रारूप तय होता है और नएनए प्रभेदों और विकसित तकनीकों को किसानों के लिए रिलीज भी किया जाता है.

ये सारे कार्य मुख्य रूप से कुलपति के दिशानिर्देश में निदेशक शोध के कुशल संचालन में होता है. इस बैठक में निदेशक शोध, डा. अनिल कुमार सिंह ने विश्वविद्यालय में चल रहे शोध कार्यों के बारे में बताया. उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय में कुल 390 परियोजनाएं चल रही हैं, जिन में 270 पूरी हो चुकी हैं और इस वर्ष खरीफ में कुल 210 नए प्रोजैक्ट की स्वीकृति मिलने वाली है.

उन्होंने यह भी बताया कि विश्वविद्यालय के कुशल निर्देशन के परिणामस्वरूप कतरनी धान एवं लीची उत्पादकों को राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत भी किया गया है. शोध निदेशालय किसानों के हित में निरंतर काम कर रहा है और उसी का परिणाम है कि विश्वविद्यालय के 13 वर्ष की अल्पायु में 13 पेटेंट सहित 5 उत्पादों को जीआई प्रमाणपत्र मिले हैं, 69 तकनीकों को रिलीज किया गया है और मक्का, आम, बैगन, लहसुन के प्रभेद भी रिलीज किए गए.

डा. आरएस सिंह ने अपने उद्बोधन में प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण, टाल एवं दियारा क्षेत्रों के विकास पर बल दिया और विश्वविद्यालय के द्वारा उन क्षेत्रों में चल रहे कामों की प्रशंसा की.

डा. सीपी सचान ने सुझाव दिया कि पारंपरिक तकनीकी को साथ में ले कर ही नई तकनीकों का विकास करें और नए प्रभेदों को बढ़ाएं. इस काम में सभी विभागों का सामंजस्य एवं सहयोग होना आवश्यक है.

उन्होंने सीड रिप्लेसमेंट को बढ़ावा देने और कम पानी वाली फसलों को फसल विविधीकरण में शामिल करने की सलाह दी और ऐसी तकनीक को विकसित करने पर जोर दिया, जो किसानों के क्रयशक्ति की सीमा में हो और टिकाऊ उत्पादन के लिए अच्छा भी.

अपने उद्बोधन में कुलपति डा. डीआर सिंह मौसम बदलाव को ध्यान में रख कर प्रभेदों और तकनीकों का विकसित करने की सलाह दी. उन्होंने खरीफ मक्का उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए तकनीकों को विकसित करने का सुझाव भी दिया.

कुलपति ने पारंपरिक फसलों और पारंपरिक तकनीकी अनुभवों के संरक्षण पर भी बल दिया.

अपने उद्बोधन में उन्होंने कहा कि उसी बीज का उत्पादन करें, जो किसानों की मांग हो. जल संसाधन के लिए फर्टीगेशन तकनीक का प्रत्यक्षण बड़े क्षेत्रफल में कराने, पारंपरिक पौधों एवं औषधीय पौधों से कीटनाशी, रोगनाशक दवा बनाने और अंतःवर्ती फसलों को बढ़ावा देने की भी सलाह दी गई.

उन्होंने एमएससी एवं पीएचडी के छात्रों को अपने समय का 10 फीसदी हिस्सा प्रयोगशाला में बिताने का निर्देश भी दिया. अपने अभिभाषण के अंत में उन्होंने सभी नए वैज्ञानिकों को प्रोजैक्ट लीडर/इन्वेस्टिगेटर बन कर अपने वरीय वैज्ञानिक को साथ ले कर काम करने की सलाह दी.

कोंडागांव में खुलेगा नेचुरोपैथी  एवं हर्बल कृषि पर्यटन सेंटर (Agro Tourism Center)

छत्तीसगढ़ राज्य में ईको पर्यटन के विकास एवं संरक्षण में विगत 5 सालों से कार्यरत संस्था ‘वसुंधरा प्रकृति संरक्षण समिति’ यानी विस्कान द्वारा प्रदेश में ईको पर्यटन सहित प्राकृतिक चिकित्सा एवं हर्बल खेती को बढ़ावा देने के लिए ‘मां दंतेश्वरी हर्बल समूह’ के साथ करार किया गया.

इस अवसर पर मां दंतेश्वरी हर्बल के संस्थापक डा. राजाराम त्रिपाठी, डायरेक्टर अनुराग त्रिपाठी, जसमती नेताम,बली चक्रवर्ती, कृष्णा नेताम, व्यवस्थापक रमेशचंद्र पंडा, शंकर नाग, मैंगो नेताम, वसुंधरा प्रकृति संरक्षण समिति (विस्कान )के अध्यक्ष ज्ञानेंद्र पांडेय, विस्कान एग्रो कार्प के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अभिषेक चौधरी विशेष रूप से उपस्थित थे.

कोंडागांव स्थित मां दंतेश्वरी हर्बल एस्टेट में विकसित हो रहे ईको रिसोर्ट में ईको पर्यटन के 4 स्वरूपों का विकास किया जाना सुनिश्चित हुआ है. इन में कृषि पर्यटन, नेचुरोपैथी, ट्राइबल टूरिज्म एवं ग्रामीण पर्यटन शामिल हैं.

कृषि पर्यटन के अंतर्गत दुनियाभर में अपनी काली मिर्च की खेती एवं दुर्लभ औषधीय पौधों के संरक्षक के रूप में विख्यात डा. राजाराम त्रिपाठी के सान्निध्य में रह कर देशविदेश के किसान औषधीय पौधों की खेती का प्रशिक्षण ले सकेंगे. इस में ग्रामीण युवाओं को प्रशिक्षित कर रोजगार दिया जाएगा.

रिसोर्ट के नेचुरोपैथी सेंटर में लाइफस्टाइल से संबंधित बीमारियों के लिए आवश्यक दिनचर्या, जिस में योग, प्राणायाम, ध्यान, आयुर्वेदिक चिकित्सा, नाड़ी शोधन आदि शामिल हैं, के माध्यम से स्वास्थ्य लाभ ले सकेंगे.

रिसोर्ट में पर्यटकों के लिए बस्तर की संस्कृति को देखने और आदिवासी गांवों में भ्रमण की सुविधा रहेगी.

संस्था द्वारा ग्रामीण पर्यटन के विकास के लिए स्थानीय युवकयुवतियों को प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा, जिस से पर्यटन के विकास के साथसाथ प्रकृति एवं संस्कृति का संरक्षण हो सके.

मदार और  हुंदर गांव फिर बने स्मार्ट विलेज (Smart Villages)

उदयपुर : 30 अप्रैल, 2024. एमपीयूएटी के गोद लिए बड़गांव पंचायत समिति के गांव मदार और ब्राह्मणों की हुंदर ने एक बार फिर स्मार्ट विलेज का खिताब अपने नाम कर प्रदेश में अव्वल स्थान प्राप्त किया है. प्रदेश के सभी 27 राजकीय वित्तपोषित विश्वविद्यालयों को यूनिवर्सिटी सोशल रिस्पांसिबिलिटी (यूएसआर) के तहत गांव गोद ले कर उसे स्मार्ट विलेज में रूपांतरित करने की राज्यपाल की पहल को एमपीयूएटी ने पूरी गंभीरता से लिया.

एमपीयूएटी की ओर से उक्त दोनों स्मार्ट विलेज को जनवरी से मार्च, 2024 की त्रैमासिक अवधि में किए गए नवाचार और अन्य गतिविधियों की समीक्षा के बाद राज्यपाल कलराज मिश्र ने एमपीयूएटी के कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक के साथ ही अन्य विश्वविद्यालयों के लिए भी इसे अनुकरणीय पहल के रूप में रेखांकित किया है. इस से पूर्व भी मदार और ब्राह्मणों की हुंदर गांव 2 बार यह खिताब मिल चुका है.

कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने एमपीयूएटी की विभिन्न टीमों ने इन गांवों में जा कर जो गतिविधियां की हैं, उस से न केवल कृषि, बल्कि सामाजिक, आर्थिक व शैक्षणिक क्षेत्रों में आमूलचूल परिवर्तन हुआ है. यहीं नहीं, कोरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (सीएसआर) के तहत 1.5 रुपए करोड़ से ज्यादा के काम संपादित होने की खुशी गांव वालों के चेहरों पर साफ झलकती है.

कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने बताया कि सीएसआर योजना के अंतर्गत नाबार्ड के सहयोग से राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, मदार में 5 केवी क्षमता वाले सोलर ट्री की स्थापना की गई. इस की अनुमानित लागत 9.08 लाख रुपए है. इस से प्रतिदिन 15-20 यूनिट बिजली बन रही है, जिस से स्कूल, पनघट व स्ट्रीट लाइट के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. आईआईएफएल, मुंबई और   ब्लूइनफिनिटी लेब्स प्रा. लि. के सहयोग से कीटनाशक/पेस्टीसाइड/उर्वरक छिड़काव के लिए 25 किलोग्राम क्षमता का ड्रोन विश्वविद्यालय को दिया गया.  इस की अनुमानित लागत 30 लाख रुपए है. इस का उपयोग स्मार्ट गांव में किया गया है. राजस्थान माइंस एवं मिनरल प्राइवेट लिमिटेड के सहयोग से बालिका उच्च प्राथमिक विद्यालय, मदार में 150 बच्चों को टेबल, स्टूल और 4 अलमारी 3.94 लाख रुपए का फर्नीचर उपलब्ध कराया गया.

उन्होंने बताया कि आईआईएफएल, मुंबई के सहयोग से राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, मदार को 50 कंप्यूटर टेबलेट, औक्सीजन कंसन्ट्रेटर और कोविड किट उपलब्ध कराए गए.

इस के अलावा राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, मदार में कन्वेशन हाल को  बनाने में तकरीबन 42 लाख रुपए की लागत आई है. राजकीय बालिका उच्च प्राथमिक विद्यालय के लिए विधायक मद से 10 लाख रुपए की लागत से खेल मैदान की चारदिवारी का काम किया गया.

स्मार्ट गांव मदार एवं ब्राहम्णों की हुंदर में 8 स्वयं सहायता समूह की 120 किसान महिलाएं सदस्य हैं, जो कि सब्जी उत्पादन, सिलाई केंद्र, अनाज भंडारण, दूध उत्पादन, सोलर लाइट, सोलर कुकर, फल एवं सब्जी प्रसंस्करण इत्यादि गतिविधियों से लाभान्वित हो रही हैं.

डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने बताया कि इस विश्वविद्यालय द्वारा मदार एवं ब्राहम्णों की हुंदर गांव पंचायत समिति, बड़गांव (उदयपुर) को सितंबर, 2020 में गोद लिए गए थे. इन गांवों के विकास की कार्ययोजना स्मार्ट गांव क्रियान्वयन कमेटी द्वारा आजीविका अवसर एवं आर्थिक सृदृढ़ीकरण हेतु विभिन्न स्किल ट्रेनिंग एवं इंटीग्रेटेड फार्मिंग के तरीकों से की जा रही है. विश्वविद्यालय के 130 वैज्ञानिकों एवं अन्य अधिकारियों द्वारा 42 बार भ्रमण कर कार्ययोजना के क्रियान्वयन का निरीक्षण किया. विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा 36 एकदिवसीय प्रशिक्षणों के माध्यम से 2311 किसान एवं किसान महिलाएं लाभान्वित हुए.

निदेशक प्रसार डा. आरए कौशिक ने बताया कि विश्वविद्यालय के चयनित स्मार्ट गांव मदार एवं ब्राम्हणों की हुंदर में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली के राष्ट्रीय कृषि प्रसार कार्यक्रम के अंतर्गत 6 किसानों के खेतों पर गेहूं की उन्नत किस्म एचआई 1034 के प्रदर्शन लगाए गए थे. इसी प्रकार सब्जी व फूल प्रदर्शन में प्याज, पालक, गाजर, पूसा साग एवं मैरी गोल्ड आदि के 16 किसानों के खेतों पर प्रदर्शन लगाए गये थे.

उन्होंने बताया कि बंजर भूमि विकास हेतु ग्राम पंचायत एवं वन विभाग के सहयोग से 175 पेड़ नीम, करंज, जामुन, सुबबूल एवं मोरिंगा आदि लगाए गए. पशुपालन विभाग के सहयोग से शिविर आयोजित कर 360 पशुओं और 590 भेड़बकरियों का टीकाकरण व उपचार किया गया. चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के सहयोग से शिविर आयोजित कर 93 रोगियों का उपचार कर निःशुल्क दवाएं दी गईं. इसी क्रम में इफको के सहयोग से गेहूं की फसल पर ड्रोन द्वारा नैनो यूरिया का छिड़काव किया गया.