मिलेट्स मिशन के तहत मोटे अनाजों को बढ़ावा

बालाघाट: कलक्‍टर मृणाल मीना ने पिछले दिनों खरीफ 2024-25 की प्रगति एवं जिला स्‍तरीय कृषि उत्‍पादन समीक्षा बैठक की. समीक्षा बैठक में कलक्‍टर मृणाल मीना ने विभाग में संचालित समस्‍त योजनाओं की प्रगति की समीक्षा करते हुए खरीफ 2024 में बोई गई फसलवार व विकासखंडवार रकबे की जानकारी ली. साथ ही, जिले की 09 विकासखंडों में नवनिर्मित मिट्टी परीक्षण प्रयोगशाला में लैब चालू करने के लिए समिति का गठन करने के निर्देश दिए गए.

फसल विविधीकरण को बढ़ावा दिए जाने के संबंध में विभागीय अधिकारियों को निर्देशित करते हुए राज्‍य मिलेट्स मिशन के अंतर्गत कोदो, कुटकी, रागी एवं मोटे अनाज वाली फसलों का अधिक उत्‍पादन लिए जाने के लिए कार्ययोजना तैयार करने व किसानों को जागरूक करने के लिए निर्देशित किया गया.

उपसंचालक, कृषि, राजेश खोबरागढ़े ने बताया कि वर्तमान खरीफ सीजन में नवाचार के अंतर्गत सोलर लाइट ट्रैप एवं रागी बीज वितरण कार्यक्रम लिया गया है. जिले में नवाचार के अंतर्गत रागी फसल के उत्‍पादन के लिए 1500 हेक्‍टेयर का लक्ष्‍य रखा गया है.

30 अगस्‍त को ग्राम नेवरगांव कला विकासखंड किरनापुर में आयोजित कार्यशाला में ग्रामीण किसानों को लगभग 50 सोलर लाइट ट्रैप वितरण किए गए, जिस में कृषि वैज्ञानिकों द्वारा बताया गया कि वर्तमान में खरीफ सीजन में धान की फसलों में तनाछेदक, चने की इल्‍ली, माहू, जैसिड, माइट, बीटल, ग्रासहौपर, ब्राउन हायर, मांथकीट आदि बहुतायत मात्रा में इन का प्रकोप होता है, जिस में उन के द्वारा धान की फसल व अन्‍य फसलों के कीटों के नियत्रंण के लिए सौर ऊर्जा पर आधारित नियत्रंण तकनीक सोलर लाइट ट्रैप का उपयोग लाभकारी सिद्ध हो रहा है. जिले में कृषि विभाग की नई पहल राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के अंतर्गत समन्वित कीट प्रबधंन घटक के तहत सोलर लाइट ट्रैप का उपयोग किसानों के द्वारा कराया जा रहा है.

परंपरागत कृषि, मिट्टी नमूना परिणाम, जैविक खेती, कृषि यंत्रों पर अनुदान, भूमि उपयोग स्थिति, फसल क्षेत्राच्‍छादन कार्यक्रम, खरीफ फसलवार क्षेत्रफल की प्रगति, उर्वरकवार लक्ष्‍य उपलब्‍धता, उर्वरक व्‍यवस्‍था, राष्‍ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन योजना, बीज ग्राम योजना, राज्‍य मिलेट मिशन, प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्‍यम से संचालित गतिविधियों एवं लक्ष्‍य पूर्ति की जानकारी की कलक्‍टर मृणाल मीना के द्वारा समीक्षा की गई.

कृषि विभाग के माध्‍यम से जिले के किसानों को अधिक से अधिक संख्‍या में विभिन्‍न योजनांतर्गत लाभांवित करने के संबंध में कलक्‍टर मृणाल मीना द्वारा आवश्‍यक सुझाव दिए गए.

बैठक में परियोजना संचालक आत्‍मा अर्चना डोंगरे व समिति, अधिष्‍ठाता कृषि महाविद्यालय वारासिवनी बिसेन, वरिष्‍ठ वैज्ञानिक एवं प्रमुख कृषि विज्ञान केंद्र के आरएल राउत, प्राचार्य कृषि विस्‍तार एवं प्रशिक्षण केंद्र वारासिवनी, सचिव कृषि उपज मंडी बालाघाट, सहायक कृषि अभियांत्रिकी, सहायक मिट्टी परीक्षण अधिकारी, सहायक भूमि संरक्षण अधिकारी, अनुविभागीय कृषि अधिकारी, वरिष्‍ठ कृषि विकास अधिकारी, प्रक्षेत्र अधीक्षक शासकीय कृषि प्रक्षेत्र पिपरझरी, गढ़ी, किन्‍ही, एमपी एग्रो. बालाघाट एवं बीज निगम बालाघाट के साथसाथ कृषि विभाग के अन्‍य अधिकारी व कर्मचारी उपस्थित रहे.

मां दंतेश्वरी हर्बल फार्म के नैचुरल ग्रीनहाउस को देख ‘कृभको’ के अधिकारी हुए मुरीद

पिछले दिनों ‘मां दंतेश्वरी हर्बल फार्म एवं रिसर्च सैंटर’ पर नई दिल्ली से भारत सरकार की सहकारी खाद समिति ‘कृभको’ के उच्च अधिकारियों एवं विशेषज्ञों का एक उच्च स्तरीय दल ने दौरा किया. यह तीनदिवसीय भ्रमण निरीक्षण का कार्यक्रम डा. राजाराम त्रिपाठी द्वारा किए गए जैविक खेती के प्रयासों और टिकाऊ कृषि में नवाचारों को गहराई से जानने के लिए था.

‘मां दंतेश्वरी हर्बल फार्म एवं रिसर्च सैंटर, कोडागांव, छत्तीसगढ़ के बारे में शंकर नाग ने बताया कि कृभको की इस उच्च स्तरीय टीम के सभी सदस्यों ने डा. राजाराम त्रिपाठी के जैविक फार्म पर हो रही खेती की जम कर प्रशंसा की और कहा, “पूरे भारत में कम लागत पर इतना ज्यादा फायदा खेती से लेने का ऐसा उदाहरण मिलना संभव नहीं है.” विशेष रूप से उन्होंने उस नैचुरल ग्रीनहाउस को सब से ज्यादा पसंद किया, जो डा. राजाराम त्रिपाठी ने केवल डेढ़ लाख रुपए में एक एकड़ में तैयार किया है, जबकि प्लास्टिक और लोहे से तैयार होने वाला परंपरागत ग्रीनहाउस का एक एकड़ की लागत लगभग 40 लाख रुपए आती है. उन्होंने यह भी जाना कि कैसे डा. राजाराम त्रिपाठी का ग्रीनहाउस न केवल बेहद टिकाऊ है, बल्कि परंपरागत ग्रीनहाउस की तुलना में बहुत अधिक लाभदायक भी है.

यह जान कर सभी सदस्य हैरान रह गए कि 40 लाख रुपए वाला ग्रीनहाउस 7-8 साल में नष्ट हो जाता है और उस की कोई कीमत नहीं रहती, जबकि डा. राजाराम त्रिपाठी का पेड़पौधों से तैयार नैचुरल ग्रीनहाउस हर साल अच्छी आमदनी देने के साथ ही 10 साल में लगभग 3 करोड़ की बहुमूल्य लकड़ी भी देता है. ये अपनेआप में एक अजूबा ही है.

कृभको की टीम ने कम खर्च में संपन्न होने वाली अनूठी जैविक खेती की पद्धतियों और नैचुरल ग्रीनहाउस मौडल का निरीक्षण और परीक्षण किया. उन्होंने वहां अपनाई जा रही विधियों को भी समझा और कैमरे में वहां के नजारे को भी कैद किया, ताकि वे प्रभावी तरीकों को अनेक कृषि से जुड़े लोगों तक पहुंचा सकें.

डा. राजाराम त्रिपाठी ने बताया कि इतने प्रतिष्ठित मेहमानों के साथ अपने अनुभव और नवाचार साझा करना हमारे लिए अविस्मरणीय रहा. उन के द्वारा मिली प्रशंसा और सुझावों ने हमें और अधिक प्रोत्साहित किया है कि हम अपने पर्यावरण मित्रता और टिकाऊ खेती के मिशन को आगे बढ़ाएं.

कृभको के इस दल का स्वागत डा. राजाराम त्रिपाठी ने खुद किया, तत्पश्चात अनुराग कुमार, जसमती नेताम, शंकर नाग, कृष्णा नेताम, रमेश पंडा एवं मां दंतेश्वरी हर्बल समूह के अन्य सदस्यों द्वारा अंगवस्त्र, बस्तर की उपजाई हुई पेड़ों पर पकी बेहतरीन गुणवत्ता की काली मिर्च और जनजातीय सरोकारों की मासिक पत्रिका ‘ककसाड़’ का नया अंक भेंट कर के किया गया.

कार्यक्रम के अंत में आभार व्यक्त करते हुए डा. राजाराम त्रिपाठी ने कहा, “मां दंतेश्वरी हर्बल फार्म एवं रिसर्च सैंटर पिछले 30 वर्षों से इस क्षेत्र के आदिवासियों के उत्थान के लिए निरंतर प्रयासरत है. हमारे फार्म पर अंतर्राष्ट्रीय मापदंडों के अनुरूप शतप्रतिशत जैविक खेती, जड़ीबूटी व मसाले उगाने और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने के साथसाथ आदिवासी समुदायों के लिए शिक्षा और रोजगार के अवसर भी प्रदान किए जाते हैं. हम अपने अनुसंधान और नवाचार के माध्यम से पर्यावरण संवेदनशील और जनजातीय समुदायों को माली रूप से लाभकारी समाधान प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

घर की छत पर उगाएं सब्जियां

छत पर खेती करने की बात सुनने में जरूर अजीब लगती है लेकिन आजकल अनेक लोग इस तरह की खेती कर रहे हैं. इस के लिए कुछ जरूरी एहतियात बरतना जरूरी होता है. इस तरह की खेती में मिट्टी की जरूरत नहीं होती और पानी भी कम लगता है.

छत पर खेती करने के लिए ऐसी क्यारी बनाई जाती है जो वाटर प्रूफ होती है और उस से पानी का छत पर टपकने का खतरा नहीं रहता है.

इन क्यारियों में भिंडी, टमाटर, बैगन, मेथी, पालक, चौलाई, पोई, मिर्च वगैरह उगाई जाती है. इस में नारियल का खोल (सूखा छिलका) मुख्य रूप से डाला जाता है.

छत पर ज्यादा वजन न पड़े और पानी रिसने की समस्या न हो, इस के लिए मिट्टी का इस्तेमाल नहीं होता है. इस बस्ते में नारियल के खोल के अलावा कुछ जैविक खाद भी मिलाई जाती है, जिस से उन पौधों से बेहतर गुणवत्ता वाली पैदावार मिलती है.

आने वाले समय में इस तरह की खेती की मांग बढ़ेगी क्योंकि अब खेती की जमीन भी कम होती जा रही है और लोग बाहर की चीजों पर भरोसा भी कम करते हैं. घर पर पैदा की गई सब्जी पूरी तरह सुरक्षित व सेहतमंद भी होगी. 4×4 फुट की 4 क्यारियां लगाने पर एक परिवार अपने महीनेभर की जरूरत की सब्जी उगा सकता है. इन क्यारियों में एक घंटा समय लगाने से मनपसंद सब्जियां उगाई जा सकती हैं.

एक तरीका ऐसा भी है

खेतों के घटने और आर्गेनिक फूड प्रोडक्ट की मांग बढ़ने से अब खेती में नई और कारगर तकनीकों का चलन बढ़ता जा रहा है. मांग पूरी करने के लिए कारोबारी और शहरी किसान छतों पर, पार्किंग में या फिर कहीं भी मौजूद कम जगह का इस्तेमाल अपनी पैदावार के लिए कर रहे हैं.

Rooftop Garden

हाइड्रोपौनिक तकनीक से सब्जियां : इस तकनीक की खास बात यह है कि इस में मिट्टी का इस्तेमाल जरा भी नहीं होता. इस में लकड़ी का बुरादा वगैरह डाला जाता है. इस के अलावा इस में बालू, बजरी भी डाली जाती है जिस से पौधों को सहारा मिलता है. इस तकनीक से पौधों को जरूरी पोषक तत्त्व पानी के जरीए सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है.

पौधों को उगाने का यह बिलकुल ही नया तरीका है और इसे किसान या कारोबारी अलगअलग तरह से इस्तेमाल में ला सकते हैं. वहीं इस क्षेत्र में काम कर रही कई कंपनियां भी आप को शौकिया गार्डन से ले कर कमर्शियल फार्म तक बनाने में मदद कर सकती हैं.

आजकल कई कंपनियां हाइड्रोपौनिक्स किट औनलाइन बेच रही हैं. इस में सागसब्जी उगाई जा सकती हैं. 2 मीटर ऊंचे टावर में 40 पौधे लगाने की जगह होती है और तकरीबन 400 पौधे वाले 10 टावर की लागत तकरीबन 1 लाख रुपए के करीब होती है. इस कीमत में टावर, सिस्टम और जरूरी पोषक तत्त्व शामिल होते हैं.

युवा किसान (Young Farmer) की पहल : औषधीय खेती, आमदनी बढ़ाने में मददगार

आजकल देश के किसान जिन हालात से दोचार हो रहे हैं, ऐसे में अब हर कोई नौकरियों की तरफ भागने लगा है. इस की वजह सरकार की खेती को ले कर ढुलमुल नीतियां, कृषि उत्पादों के सही दाम न मिलना और बाजार की समस्या खास है. यही वजह है कि किसान सरकार के ऊपर खुल कर अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं.

यही वजह है कि किसान खेतों से निकल कर सड़कों पर उतर खेती को उद्योग की तरह सहूलियतें देने की मांग भी करने लगे हैं, क्योंकि किसान के लिए खेत में अनाज, सब्जियां, फल, फूल, औषधियां उगाना आसान है लेकिन उस की कीमत तय होने से ले कर मार्केटिंग तक के लिए सरकार और बिचौलियों के भरोसे पर निर्भर रहना पड़ता है. यही वजह है कि किसान अकसर खेती में घाटा सहने के लिए मजबूर हो जाते हैं.

किसानों की इन्हीं समस्याओं को देख कर उत्तर प्रदेश के गोरखपुर शहर के पादरी बाजार के रहने वाले अविनाश कुमार ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महकमे की नौकरी छोड़ कर औषधीय खेती की राह पकड़ी तो फिर कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. इस के चलते उन्होंने उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड के हजारों किसानों की आमदनी में इजाफा करने में भी कामयाबी पाई है.

ऐसे बढ़ा रुझान 

अविनाश कुमार ने पुलिस की नौकरी के दौरान कई बार गांवों में जाने पर यह देखा कि किसान पारंपरिक खेती के चलते और उत्पाद का सही दाम न मिलने के चलते गरीबी, तंगहाली से अकसर जूझते रहते हैं. ऐसे में खेती में घाटे और कर्ज के दबाव के चलते वे खुदकुशी करने जैसा कदम उठाने से भी नहीं हिचकते हैं.

इसी बात ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया और उन्होंने पुलिस महकमे की नौकरी से इस्तीफा दे कर किसानों की माली हालत सुधारने की कोशिश शुरू कर दी. इस दौरान उन्होंने किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए जानकारियां इकट्ठा की तो पता चला कि बदहाली की खास वजह उन की फसल का वाजिब दाम न मिलना और बिचौलयों का दबदबा है.

इस के बाद अविनाश कुमार ने पारंपरिक खेती से हट कर औषधीय पौधों की जैविक व प्राकृतिक विधि से खेती सीखने के लिए देश के विभिन्न राज्यों के कृषि विश्वविद्यालयों, कृषि विज्ञान केंद्रों और दूसरी संस्थाओं का दौरा किया और विश्वविद्यालयों द्वारा आयोजित विभिन्न कार्यशालाओं में भाग लिया जहां उन्हें न केवल औषधीय खेती से जुड़ी तकनीकी जानकारी हासिल हुई, बल्कि वहीं से उन्होंने अनुबंधित खेती के बारे में जाना और तमाम जानकारियां जुटाई.

उन्होंने तमाम आयुर्वेदिक उत्पाद बनाने वाली कंपनियों से बात कर किसानों की औषधीय फसलों को खरीदे जाने का अनुबंध किया और साल 2016 में सब से पहले अपने 2 एकड़ खेत से ब्रह्मी और कौंच के औषधीय पौधों की जैविक विधि से खेती की शुरुआत की. इस की फसल तैयार होने के बाद उन्होंने कंपनियों से अनुबंध करने के चलते फसल को अच्छे दामों पर बेचा. यहीं से उन्होंने किसानों से अनुबंधित औषधीय खेती किए जाने के लिए संपर्क करना शुरू किया.

अविनाश कुमार से जो भी किसान जुड़े, उन्हें औषधीय खेती से अच्छी आमदनी होनी शुरू हो गई, जिस का नतीजा यह रहा कि आज पूरे देश से इन के साथ तकरीबन 2,000 से ज्यादा किसान जुड़ कर 800 एकड़ खेत में औषधीय फसल ले रहे हैं और उस का सीधा फायदा पा रहे हैं.

जमीनों को बनाया उपजाऊ 

अविनाश कुमार ने औषधीय खेती के जरीए न केवल किसानों की माली हालत सुधारी, बल्कि उन्होंने बंजर, ऊसर और बेकार पड़ी जमीनों को भी खेती लायक बना कर उस पर औषधीय खेती की शुरुआत कराई. इस के लिए उन्होंने जैव उर्वरकों, जैविक खादों व जैविक कीटनाशकों का सहारा लिया.

औषधीय पौधों की खेती 

अविनाश कुमार से जुड़ कर किसान कम लागत में ज्यादा मुनाफे की विधि पर खेती करते हैं. जिन औषधीय पौधों की खेती वे कराते हैं, वे बारिश पर आधारित होती हैं और पारंपरिक फसलों की तुलना में कम सिंचाई और कम लागत वाली होती हैं. वे ऐसे औषधीय फसलों को बढ़ावा देते हैं जिन से पारंपरिक फसलों की तुलना में ज्यादा मुनाफा होता है.

आज इस विधि से अविनाश कुमार की संस्था के साथ बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ के तकरीबन 2,000 किसान प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ कर औषधीय पौधों की जैविक विधि से खेती कर रहे हैं.

जिन औषधीय फसलों को किसान ले रहे हैं उन में ब्रह्मी, मंडूकपर्णी, वच, तुलसी, कालमेघ, कौंच, भुई आंवला, कुठ, कुठकी, कपूर, कचरी, चियां, अर्जुन जैसी फसलें शामिल हैं.

किसानों की करते हैं मदद

अविनाश कुमार किसानों की माली हालत सुधारने के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं. इस से किसानों को गुणवत्ता वाली औषधीय फसलों का ज्यादा उत्पादन मिल सके.

इस के लिए किसानों को मुफ्त बीज के साथ ही जरूरी तकनीकी और व्यावहारिक ट्रेनिंग देने का काम करते हैं. वे किसानों को नर्सरी तैयार करने से ले कर, खेत की तैयारी, उन्नतशील बीजों का चयन, सिंचाई, मड़ाई, भंडारण वगैरह की जानकारी भी मुहैया करा रहे हैं.

तैयार फसल बेचने के लिए किसान को भटकना नहीं पड़ता है क्योंकि अनुबंधित खेती के चलते अविनाश कुमार की संस्था ‘सबला सेवा संस्थान’ किसानों के औषधीय फसल की सुनिश्चित खरीदारी भी करती है.

बिचौलियों का दबदबा खत्म

किसानों की बदहाली की अहम वजह है उन की खेती का लागत के मुताबिक दाम न मिल पाना. सरकार द्वारा किसानों के फसल का जो न्यूनतम मूल्य तय भी किया जाता है, उस में बिचौलियों और अधिकारियों के गठजोड़ के चलते उन की फसल मंडियों और सरकार के खरीद केंद्रों पर बिक नहीं पाती है. ऐसे किसान अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए औनेपौने दाम पर अपनी फसल बेचने को मजबूर हो जाता है.

अविनाश कुमार ने किसानों को ऐसे हालात से उबारने के लिए किसानों और कंपनियों के साथ अनुबंधित खेती की शुरुआत की है, जिस से किसान सीधे अपनी औषधीय फसल को आयुर्वेदिक दवाओं को बनाने वाली कंपनियों को बेच पाते हैं. इस वजह से किसान को अपनी फसल को बेचने के लिए परेशान होना पड़ता है. बिचौलियों का दबदबा खत्म होने से फसल के वाजिब दाम भी किसानों को मिलने लगा है, जिस से किसानों की आमदनी में इजाफा भी हुआ है.

जैविक विधि से होती खेती

औषधीय फसलों में रासायनिक खादों और कीटनाशकों के इस्तेमाल से न केवल उस की गुणवत्ता प्रभावित होती है, बल्कि उस के औषधीय गुणों में कमी आ जाती है, इसलिए औषधियों को बनाने वाली कंपनियां ऐसे औषधीय फसलों की खरीदारी नहीं करतीं तभी तो अविनाश कुमार किसानों के साथ अनुबंधित खेती करा रहे हैं.

अनुबंधित किसानों द्वारा की जाने वाली औषधीय खेती में जैविक खादों और जैविक कीटनाशकों का इस्तेमाल करते हैं जिस से औषधीय कंपनियां किसानों की फसल की अच्छी कीमत देती हैं.

अविनाश कुमार ने झारखंड के खूंटी इलाके में आदिवासियों के साथ अनुबंधित खेती कर के उन की माली और सामाजिक हालत में सुधार करने में भी कामयाबी पाई है.

उन्होंने बताया कि आने वाले साल में वे किसानों द्वारा औषधीय फसल की प्रौसैसिंग पर भी काम करने वाले हैं. उत्पादित फसल को विदेशों में निर्यात किए जाने पर भी वे काम कर रहे हैं, ताकि उन के साथ जुड़ कर खेती करने वाले किसानों को और ज्यादा फायदा मिल सकेगा.

अविनाश कुमार ने बताया कि अनुबंधित खेती के जरीए किसान लागत के मुकाबले 80 फीसदी ज्यादा मुनाफा ले रहे हैं. उन का कहना है कि अगर खेती से दूरी बना चुके नौजवान पारंपरिक खेती की जगह उन के नक्शेकदम पर खेती करें तो उन्हें नौकरियों से ज्यादा पैसे की कमाई हो पाएगी.

अविनाश कुमार से जुड़ कर कोई भी किसान औषधीय फसलों की अनुबंधित खेती करना चाहता है तो उन के मोबाइल फोन नंबर 9430502802 पर संपर्क कर सकता है.

प्राकृतिक खेती करने वाले किसान को मिलेगी सब्सिडी (Subsidy)

लखनऊ : राजधानी लखनऊ में ‘प्राकृतिक खेती के विज्ञान पर क्षेत्रीय परामर्श कार्यक्रम’ को संबोधित करते हुए केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि प्रधानमंत्री के ‘धरती मां को रसायनों से बचाने’ के सपने को पूरा करते हुए हम कोशिश करेंगे कि आने वाले समय में किसान रसायनमुक्त खेती करें, ताकि आने वाली पीढ़ी स्वस्थ रहे.

उन्होंने किसानों का आह्वान किया कि वे अपने खेत के एक हिस्से पर प्राकृतिक खेती करें. शुरुआती 3 सालों में जब किसान प्राकृतिक खेती करेंगे, तो पैदावार कम होगी और ऐसी स्थिति में सरकार किसानों को सब्सिडी देगी. प्राकृतिक खेती से उगाए हुए अनाजों, फलों और सब्जियों की बिक्री से किसानों को डेढ़ गुना से ज्यादा दाम मिल जाएंगे.

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि देश के कृषि विश्वविद्यालयों में प्राकृतिक खेती के अध्ययन व खोज के लिए प्रयोगशालाओं को स्थापित किया जाएगा, जिन की मदद से देश में प्राकृतिक खेती को मदद मिलेगी और अनाज के भंडार भी भरेंगे.

उन्होंने कहा कि देश के एक करोड़ किसानों को प्राकृतिक खेती के बारे में जागरूक किया जाएगा, ताकि वे देश के हर कोने में जा कर इस का प्रचार कर सकें. केंद्र सरकार सभी हितधारकों से परामर्श कर के प्राकृतिक खेती के लिए राष्ट्रीय स्तर पर जागरूकता अभियान चलाएगी.

गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने अपने संबोधन में कहा कि प्राकृतिक खेती और जैविक खेती 2 अलगअलग चीजें हैं और इस अंतर को समझना जरूरी है.

उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती में पानी की कम जरूरत होती है और यह किसानों के लिए काफी फायदेमंद है. यह अच्छी बात है कि अब सरकार प्राकृतिक खेती के महत्व को समझ गई है.

इस अवसर पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि उत्तर प्रदेश में प्राकृतिक खेती के उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं. सभी 6 कृषि विश्वविद्यालयों को प्रमाणन प्रयोगशालाओं को बेहतर बनाने के निर्देश दिए गए हैं.

सीएम योगी आदित्यनाथ ने बताया कि उत्तर प्रदेश में 4 कृषि विश्वविद्यालय, 89 कृषि विज्ञान केंद्र और 2 केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय स्थापित किए गए हैं.

कम खेती (Farming) में कैसे करें अधिक कमाई

शहडोल : कमिश्नर, शहडोल संभाग, बीएस जामोद ने कहा है कि कम खेती में अधिक पैदावार लेने के लिए किसानों को कृषि की नई तकनीक सीखनी होगी. कमिश्नर ने कहा कि किसान उन्नत बीजों का उपयोग करें, खेती में कृषि यंत्रों का उपयोग करते हुए उर्वरकों का संतुलित मात्रा में उपयोग कर खेती से अच्छी पैदावार ले सकते हैं. उन्होंने माना है कि शहडोल संभाग के किसान रासायनिक खादों का कम उपयोग करते हैं.

उन्होंने आगे यह भी कहा कि किसानों को रासायनिक खादों का उपयोग भी संतुलित तरीके से करना चाहिए, वहीं जैविक खाद के उपयोग को भी बढ़ावा देने का प्रयास करना चाहिए.

कमिश्नर बीएस जामोद ने किसानों को समझाइश देते हुए कहा कि किसान पशुपालन, मत्स्यपालन, मुरगीपालन कर अतिरिक्त आय अर्जित करने के प्रसास भी करें. वे शहडोल जिले के सोहागपुर तहसील के ग्राम चटहा में आयोजित कृषक प्रशिक्षण एवं खरीफ फसलों के बीज वितरण एवं किसान संगोष्ठी कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे.

कमिश्नर बीएस जामोद ने कहा कि कृषि की लागत को कम करने के लिए किसान आधुनिक कृषि यंत्रों का उपयोग करें, सही समय पर फसलों की बोआई करें और दवाओं का छिड़काव भी समय पर करें.

उन्होंने कहा कि किसानों को कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए और कृषि के अलावा अन्य अतिरिक्त आय अर्जित करने के लिए अपनी मानसिकता में बदलाव लाना होगा. खेती के अलावा किसानेां को उद्यानिक फसलों की ओर भी ध्यान देना होगा.

किसान संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कलक्टर तरुण भटनागर ने कहा कि शहडोल जिले में पिछले वर्ष से इस वर्ष अच्छी बारिश हो रही है और फसलों की बोआई का लक्ष्य भी ज्यादा है.

उन्होंने किसानों से कहा कि किसान फसलों की बोआई समय पर करें. शहडोल जिले में धान की खेती ज्यादा होती है. कलक्टर ने किसानो को समझाइश देते हुए कहा कि धान की फसल को पानी की ज्यादा आवश्यकता होती है. उन्होंने सुझाव दिया कि जहां पानी कम है, ऐसे खेतों में धान की बोआई न करते हुए किसान मोटे अनाज जैसे कोदो, कुटकी भी लगा सकते हैं.

कलक्टर बीएस जामोद ने कहा कि शहडोल जिले में जैविक खाद के उपयोग पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है. शहडोल जिल में जल गंगा संवर्धन में लगभग 2,000 से ज्यादा जल संरचनाओं का निर्माण किया गया है, इन जनसंरचनाओं का उपयोग किसान मछलीपालन के लिए करें.

उन्होंने कहा कि शहडोल जिले में मछलीपालन की विपुल संभावनाएं हैं. किसान मत्स्यपालन कर अतिरिक्त आय अर्जित कर सकता है.

कलक्टर ने किसानों को बताया कि शहडोल जिले में कटक से सीआर 310 धान के बीज मंगाए गए हैं. किसान धान की इस किस्म का भी उपयोग कर सकते हैं. कलक्टर ने अरहर की पूसा -16 किस्म की जानकारी किसानों को देते हुए बताया कि शहडोल जिले के किसानों के लिए यह बीज फायदेमंद साबित होगा, पूसा -16 अरहर की बीज कम समय में पकने वाली है. इसे लगा कर किसान अरहर की अच्छी फसल ले सकते हैं.

किसान संगोष्ठी को संबोधित करते हुए जिला पंचायत सदस्य महीलाल कोल ने कहा कि किसान खेती में पैदावार बढाने के लिए मिट्टी का परीक्षण भी कराएं और संतुलित खाद का भी उपयोग करें.

किसान संगोष्ठी को संबोधित करते हुए संयुक्त संचालक, कृषि, शहडोल संभाग जेएस पेंद्राम ने कहा कि किसान खेती के साथसाथ पशुपालन, मत्स्यपालन, मुरगीपालन भी करें, इस से उन की आय में वृद्धि होगी.
उन्होंने आगे यह भी कहा कि निरंतर सोयाबीन की फसल लेने से जमीन की उर्वरता में कमी आती है. उन्होंने किसानों को सुझाव दिया कि वह मक्के और ज्वार की खेती कर खेती की उर्वरता बढ़ा सकते हैं.
जेएस पेन्द्राम ने कहा कि किसान गोबर खाद का भी उपयेाग करें और समन्वित खेती करने का प्रयास करें.

किसान संगोष्ठी में सहायक संचालक, मत्स्य, राजेश वास्तव, पशु चिकित्सा अधिकारी डा. दिलीप प्रजापति, उपयंत्री कृषि अभियांत्रिकी रितेश पयासी एवं सहायक संचालक उद्यानिकी ने किसानों को शासन द्वारा संचालित योजनाओं की जानकारी विस्तारपूर्वक दी.

इस अवसर पर जनपद उपाध्यक्ष शक्ति सिंह, जनपद सदस्य विक्रम सिंह, एसडीएम अरविंद शाह, उपसंचालक, कृषि, आरपी झारिया, तहसीलदार दिव्या सिंह, मुख्य कार्यपालन अधिकारी ममता मिश्रा एवं किसान उपस्थित रहे.

किसान संगोष्ठी में कमिश्नर, कलक्टर एवं जनप्रतिनिधियों द्वारा किसानों को खरीफ सीजन में बोने वाली फसलों के बीजों के मिनी किट्स भी निःशुल्क दिए गए. इस अवसर पर किसानों को पौध रोपण के लिए उद्यानिकी विभाग द्वारा निःशुल्क आंवले के पौधे मुहैया कराए गए.

किसानों की आमदनी बढ़ाने पर विशेष जोर

सागर : जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए जागरूकता अभियान चलाएं एवं किसानों को उन्नत एवं लाभप्रद खेती के लिए प्रोत्साहित करें. फसलों में विविधता लाएं और ऐसी फसलों को प्राथमिकता दें, जो कम समय में तैयार हो जाती हैं. साथ ही, किसानों को प्रमाणित बीज, संतुलित उर्वरक एवं आधुनकि कृषि यंत्रों के उपयोग के लिए प्रेरित करें, जिस से अधिक उत्पादन हो और किसानों की आमदनी बढ़े.

उक्त निर्देश कृषि उत्पादन आयुक्त  एसएन मिश्रा ने संभागीय समीक्षा बैठक में कृषि एवं उस से जुड़े विभागों की गतिविधियों की समीक्षा के दौरान दिए.

बैठक के पहले चरण में सागर संभाग में गत रबी मौसम में हुए उत्पादन और खरीफ मौसम की तैयारियों की समीक्षा की गई. वहीं दूसरे चरण में पशुपालन, मत्स्यपालन एवं दुग्ध उत्पादन की समीक्षा हुई.

कलक्टर कार्यालय के सभागार में आयोजित हुई बैठक में अतिरिक्त मुख्य सचिव किसान कल्याण एवं कृषि विकास विभाग  अशोक वर्णवाल, प्रमुख सचिव  गुलशन बामरा, प्रमुख सचिव उद्यानिकी  सुखवीर सिंह, संभागीय कमिश्नर डा. वीरेंद्र सिंह रावत, सागर कलक्टर  दीपक आर्य, दमोह कलक्टर  सुधीर कोचर,  सुरेश कुमार,  संदीप जीआर,  अरुण विश्वकर्मा,  अवधेश शर्मा सहित संभाग के सभी जिला उद्यानिकी, सहकारिता, बीज विकास निगम, विपणन संघ, बीज प्रमाणीकरण एवं कृषि से जुड़े अन्य विभागों के राज्य स्तरीय अधिकारी और दोनों संभागों के जिला पंचायतों के मुख्य कार्यपालन अधिकारी व संबंधित विभागों के संभागीय अधिकारी मौजूद थे.

कृषि उत्पादन आयुक्त एसएन मिश्रा ने संभाग के सभी जिलों में खाद व बीज भंडारण की समीक्षा की. साथ ही, सभी जिला कलक्टर को निर्देश दिए कि खरीफ के मौसम में किसानों को खादबीज मिलने में दिक्कत न हो. वितरण केंद्रों का लगातार निरीक्षण कर यह सुनश्चित किया जाए कि किसानों को कोई कठिनाई न हो.

कृषि उत्पादन आयुक्त  एसएन मिश्रा ने कहा कि सागर संभाग में उद्यानिकी अर्थात फल, फूल व सब्जियों के उत्पादन को बढ़ावा देने की बड़ी गुंजाइश है. इसलिए संभाग के हर जिले में स्थानीय परिस्थितियों व जलवायु के अनुसार क्लस्टर बना कर उद्यानिकी फसलों से किसानों को जोड़ें. साथ ही, हर जिले में किसानों के एफपीओ (किसान उत्पादक संगठन) बनाने पर भी बल दिया. उन्होंने कहा कि इस से किसानों की आमदनी बढ़ेगी.

कृषि उत्पादन आयुक्त  एसएन मिश्रा ने कम पानी में अधिक सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराने वाली पद्धतियों को बढ़ावा देने पर विशेष बल दिया. उन्होंने कहा कि सागर संभाग में स्प्रिंकलर व ड्रिप सिंचाई पद्धति अपनाने के लिए किसानों को प्रेरित करें. साथ ही, खेत तालाब बनाने के लिए भी किसानों को बढ़ावा दें.

उन्होंने कहा कि इन सिंचाई पद्धतियों के लिए सरकार द्वारा बड़ा अनुदान दिया जाता है.

मौसम एप का व्यापक प्रचारप्रसार करने पर बैठक में विशेष रूप से निर्देश दिए गए. इस एप पर एक हफ्ते की मौसम की जानकारी उपलब्ध रहती है. यह एप गूगल प्ले स्टोर से आसानी से डाउनलोड किया जा सकता है.

कृषि उत्पादन आयुक्त एवं अतिरिक्त मुख्य सचिव, कृषि, ने कहा कि इस एप के माध्यम से किसानों को मौसम की जानकारी समय से मिल सकेगी और वे मौसम को ध्यान में रख कर अपनी खेती कर पाएंगे. साथ ही, अपनी फसल को भी सुरक्षित कर सकेंगे.

कृषि उपज मंडियों को बनाएं हाईटैक और कैशलेस

कृषि उत्पादन आयुक्त  एसएन मिश्रा ने कृषि उपज मंडियों को हाईटैक, कैशलेस व सर्वसुविधायुक्त बनाने पर विशेष बल दिया. उन्होंने कहा कि इस के लिए शासन से माली मदद दिलाई जाएगी. साथ ही यह भी कहा कि हाईटैक से मतलब यह है कि मंडी में किसान की उपज की तुरंत खरीदी हो जाए, उन के बैठने के लिए बेहतर व्यवस्था हो, कैशलेस भुगतान की सुविधा हो और कृषि उपज की आटो पैकेजिंग व्यवस्था हो.

एसएन मिश्रा ने सभी जिला कलक्टर को सहकारी बैंकों की वसूली करा कर बैंकों को मजबूत करने के निर्देश भी बैठक में दिए. उन्होंने किसान क्रेडिटधारी किसानों के साथसाथ गैरऋणी किसानों की फसल का बीमा कराने के लिए भी कहा.

अतिरिक्त मुख्य सचिव कृषि  अशोक वर्णवाल ने कहा कि कृषि यंत्रों का उपयोग किसानों के लिए हर तरह से लाभप्रद है. उन्होंने कृषि यंत्र एवं उपकरणों का प्रजेंटेशन दिखाया और निर्देश दिए कि अनुदान के आधार पर हर जिले में किसानों को आधुनिक कृषि यंत्र उपलब्ध कराएं.

उन्होंने सागर संभाग में अरहर की वैरायटी अपनाने के लिए किसानों को प्रोत्साहित करने के निर्देश दिए. अरहर की पूसा वैरायटी 6 महीने में तैयार हो जाती है और इस फसल के बाद किसान दूसरी फसल भी ले सकते हैं.

अशोक वर्णवाल ने प्रमाणित बीज व उर्वरकों के संतुलित उपयोग व मिट्टी परीक्षण के लिए किसानों को प्रोत्साहित करने पर भी विशेष बल दिया. उन्होंने कहा कि मिट्टी परीक्षण के लिए स्थानीय कृषि स्नातक युवाओं के जरीए चलित लैब स्थापित कराई जा सकती है. इस से किसानों की ओर से मिट्टी परीक्षण की मांग बढ़ेगी और किसानों व कृषि स्नातक दोनों को फायदा होगा.

कृषि उत्पादन आयुक्त  एसएन मिश्रा ने बैठक के दूसरे चरण में पशुपालन, मत्स्यपालन एवं डेयरी उत्पादन सहित कृषि से जुड़ी गतिविधियों की समीक्षा की. उन्होंने कहा कि कृषि आधारित अर्थव्यवस्था बगैर पशुपालन के मजबूत नहीं रह सकती. इसलिए किसानों को उन्नत नस्ल के पशुपालन के लिए प्रोत्साहित करें.

एसएन मिश्रा ने पशु नस्ल सुधार पर विशेष बल दिया. साथ ही, बरसात से पहले सभी जिलों में मौसमी बीमारियों से बचाव के लिए अभियान बतौर टीकाकरण कराने के निर्देश दिए.

उन्होंने कहा कि हर जिले में गौशालाओं को प्रमुखता दें. अधूरी गौशालाएं जल्द से जल्द पूरी कराई जाएं.  किसानों के दुग्ध व्यवसाय को संस्थागत रूप देने पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि उन्हें दुग्ध समितियों से जोड़ें. बैठक में मत्स्यपालन को बढ़ावा देने और दुग्ध संघ को मजबूत करने के संबंध में आवश्यक दिशानिर्देश दिए गए.

एसएन मिश्रा ने सभी कलक्टरों को निर्देश दिए कि बैंक  अधिक से अधिक शासन की योजनाओं का लाभ हितग्राहियों को दे कर उन को लाभान्वित करें. उन्होंने समस्त किसानों से अपील की कि अधिक मात्रा में उर्वरक का छिड़काव न करें. सभी जिलों में पर्याप्त मात्रा में उर्वरक एवं बीज का भंडारण सुनिश्चित किया जाए.

दूसरे चरण की बैठक में प्रमुख सचिव मत्स्यपालन डा. नवनीत कोठारी सहित पशुपालन, डेयरी व मत्स्यपालन विभाग के राज्य स्तरीय अधिकारी मौजूद रहे.

संभाग आयुक्त डा. वीरेंद्र सिंह रावत ने कहा किसानों को जागरूक करने में सोशल मीडिया का उपयोग करें.

संभाग के आयुक्त डा. वीरेंद्र सिंह रावत ने प्रगतिशील किसानों द्वारा की जा रही उन्नत खेती की वीडियो क्लीपिंग बना कर सोशल मीडिया प्लेटफार्म के माध्यम से अन्य किसानों को जागरूक करने का सुझाव दिया. साथ ही कहा कि किसानों को स्वसहायता समूहों में संगठित करें, जिस से वे अधिक लाभ कमा सकें. उन्होंने समय के अनुसार खेती में बदलाव लाने पर भी बल दिया.

सभी जिलों के कलक्टर ने बताई अपनेअपने जिले की कार्ययोजना

खेती को लाभप्रद बनाने के लिए संभाग के सभी जिलों में बनाई गई कार्ययोजना के बारे में सभी कलक्टरों ने अपनेअपने सुझाव दिए. जिले में नैनो यूरिया अपनाने के लिए किसानों को प्रेरित किया जा रहा है. जिले में ज्वार, मक्का व उड़द और उद्यानिकी फसलों का रकबा बढ़ाया जाएगा.

जैविक तरीके से मक्का (Maize) की खेती

अपने पोषण के लिए मक्का जमीन से बहुत ज्यादा तत्त्व लेती है. जैविक खेती के लिए खेत में जीवाणुओं के लिए खास हालात का होना बहुत जरूरी है. मुख्य फसल से पहले दाल वाली फसल या हरी खाद जैसे ढैंचा, मूंग आदि लेनी चाहिए और बाद में इन फसलों को खेत में अच्छी तरह मिला दें.

खेत तैयार करने के लिए 12 सैंटीमीटर से 15 सैंटीमीटर गहराई तक खूब जुताई करें, ताकि सतह के जीवांश, पहली फसल के अवशेष, पत्तियां आदि और हरी खाद कंपोस्ट नीचे दब जाएं.

इस के लिए मिट्टी पलटने वाले हल से एक गहरी जुताई करनी चाहिए. इस के बाद 4-5 जुताई कर के 2 बार सुहागा लगाना चाहिए. ऐसा करने से उस में घासफूस नष्ट हो जाते हैं और मिट्टी भुरभुरी हो जाती है. आखिरी जुताई से पहले खेत में 100 किलोग्राम घन जीवामृत खाद डालें व अच्छी तरह से मिला दें.

बीज की मात्रा व बिजाई का तरीका

समतल भूमि पर बिजाई के बजाय मेंड़ों पर बिजाई करना फायदेमंद रहता है. मेंड़ों पर बिजाई करने से फसल का सर्दी से बचाव रहता है व अंकुरण भी जल्दी होता है.

मेंड़ पूर्व से पश्चिम दिशा में बनाएं. बीज मेंड़ पर दक्षिण दिशा की ओर 5-6 सैंटीमीटर गहरा बोएं और समतल बिजाई में 3-4 सैंटीमीटर गहरा बोएं. ऐसा करने से जमाव ज्यादा और जल्दी होगा.

आमतौर पर साधारण मक्का व उच्च गुणवत्ता मक्का के लिए 8 किलोग्राम, शिशु मक्का के लिए 12 किलोग्राम व मधु मक्का के लिए 3-5 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ काफी होता है. बिजाई के लिए प्लांटर का इस्तेमाल करना चाहिए.

बीजोपचार

जैविक प्रबंधन में केवल समस्याग्रस्त क्षेत्रों/अवस्था में बचाव के उपाय किए जाते हैं. रोगरहित बीज व प्रतिरोधी प्रजातियों का प्रयोग सब से बढि़या विकल्प है. बीजजनित रोगों से बचाव के लिए बीजामृत से बीजोपचार बहुत जरूरी है. शाम को 8 किलोग्राम बीज को किसी ड्रम में लें या तिरपाल पर बिछा कर उस में 800 मिलीलिटर बीजामृत मिलाएं. बीज को हथेलियों के बीच लें व अच्छी तरह दबा कर उपचारित करें. रातभर सूखने दें व सुबह बिजाई करें.

अगर बीजामृत न हो, तो ट्राइकोडर्मा विरडी 4 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज या फिर स्यूडोमोनास 100 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज व जैव उर्वरक राइजोबियम/एजोटोबैक्टर/ पीएसबी से बीजोपचार कर सकते हैं.

बिरला करना

बैड प्लांटर से बीज की मात्रा ज्यादा होने से पौधों की संख्या सिफारिश की गई संख्या से ज्यादा हो सकती है, तो बिजाई के 15 दिन बाद गैरजरूरी पौधों को निकाल दें, ताकि पौधों की आपसी दूरी 20 सैंटीमीटर रह जाए.

बीजामृत उपचार के फायदे

* बीज जल्दी व ज्यादा मात्रा में उगते हैं.

* बीजों की जड़ें शीघ्रता से बढ़ती हैं, जो पौधे के जल्दी जमने में मददगार होती हैं. ऐसे पौधे जल्दी बढ़ते हैं.

* भूमिजनित रोगों का पौधों पर प्रकोप कम होता है. जीवामृत में मौजूद गोबर फफूंदीनाशक व गौमूत्र जंतुरोधक का काम करते हैं, जिस से बीज की सतह पर फफूंदी व दूसरे रोगाणुओं के बीजांडय कोश नष्ट हो जाते है. इस वजह से मक्का के बीज का अंकुरण बढ़ जाता है.

खाद

खेत में घन जीवामृत को आखिरी जुताई पर खेत में पूरी तरह मिलाएं. जैविक खेती के लिए देशी गाय की 100 किलोग्राम प्रति एकड़ अच्छी तरह से गलीसड़ी खाद लें व उसे समान रूप से जामन के रूप में 100 किलोग्राम जीवामृत अच्छी तरह मिलाएं. इसे 7 दिनों तक छाया में रखें व रोजाना फावड़े से अच्छी तरह मिलाएं.

बिजाई करते समय खेत में पिछली फसल के अवशेष शामिल करें. खेत तैयार करने से पूर्व हरी खाद के लिए ढैंचा की बिजाई करें व गुंफावस्था आने पर इसे खेत में ही मिला दें. इस से खेत की उर्वरता बढ़ती है.

जीवामृत का इस्तेमाल

200 लिटर जीवामृत प्रति एकड़ के हिसाब से सिंचाई पानी के साथ कीजिए. इस से मक्का फसल में खाद की पूर्ति होगी. जीवामृत वाले ड्रम में कटऔफ नोजल लगाएं. ड्रम को नाके पर रख नोजल से जीवामृत के वेग को इस तरह सैट करें कि इस की पूरी मात्रा सिंचाई के पानी के साथ पूरे खेत में चली जाए.

हर सिंचाई के साथ जीवामृत का प्रयोग करें. खरीफकालीन मक्का में जीवामृत के केवल 2 छिड़काव होंगे. पहला छिड़काव बिजाई के 21 दिन बाद 5 फीसदी घोल से व दूसरा 42 दिन बाद 7.5 फीसदी घोल से.

जीवामृत के 5 फीसदी घोल बनाने के लिए 5 लिटर जीवामृत को 100 लिटर पानी में मिलाएं व 7.5 फीसदी घोल के लिए 10 लिटर जीवामृत को 150 लिटर पानी में मिलाएं.

शरदकालीन मक्का की अवधि लंबी होने के चलते इस में जीवामृत के 4 छिड़काव होंगे. पहले 2 छिड़काव तो खरीफ मक्का की तरह ही होंगे. तीसरा व चौथा छिड़काव 10 फीसदी घोल से बिजाई के 93 व 114 दिन बाद करें, जिसे बनाने के लिए 20 लिटर जीवामृत को तकरीबन 200 लिटर पानी में मिला कर छिड़कें.

खरपतवार नियंत्रण

मक्का (Maize)

अगर खेत से घासफूस न निकाला जाए, तो पैदावार में 50 फीसदी या इस से भी ज्यादा की कमी हो सकती है. घासफूस को चारा लेने की दृष्टि से भी खेत में खरपतवार न उगने दिया जाए. इन्हें कल्टीवेटर, ह्वील हैंड या खुरपे द्वारा निराई कर के या लाइनों के बीच में डाल कर कंट्रोल किया जा सकता है.

फसल के सूखे अवशेषों से मल्चिंग

उत्तरी भारत में धान की पराली एक बहुत ज्यादा गंभीर समस्या है. नासमझी के चलते किसान इन्हें जला देते हैं. किसान द्वारा इन्हें काट कर दोबारा भूमि में डालने से खरपतवारों का प्रभावी नियंत्रण किया जा सकता है.

फसल अवशेषों द्वारा मल्चिंग करने से न केवल पोषक तत्त्वों की पूर्ति होती है, बल्कि यह नमी संरक्षण के अतिरिक्त भूमि की उर्वराशक्ति व जैविक कार्बन को भी बढ़ाते हैं.

फसलों की कटाई व दाने निकालने के बाद बचे हुए अवशेषों को काट कर अगर मक्का फसल की लाइनों के बीच मल्चिंग की जाए, तो वे इस सूक्ष्म जलवायु को बनाने में बहुत कारगर सिद्ध होते हैं.

इस के अलावा मल्चिंग के लिए किसी भी फसल के अवशेषों का इस्तेमाल किया जा सकता है.

मिट्टी चढ़ाना

यह काम फसल को खाद की दूसरी मात्रा डालने के बाद करना चाहिए.

सिंचाई और जल निकास

मक्का की अच्छी पैदावार लेने के लिए उसे समय पर पानी देना चाहिए. यह आमतौर पर पौधावस्था, फूल आने, दूधिया अवस्था व गुंफावस्था में करनी चाहिए.

शरदकालीन मक्का में सिंचाई 20-25 दिन के अंतराल पर करें, ताकि फसल को सर्दी व पाले से बचाया जा सके.

खूंड़ों में पानी केवल आधी डोल तक ही भरें. अधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में, जहां पानी के निकलने का ठीक इतंजाम न हो, वहां नालियों से सिंचाई करनी चाहिए. इस से पानी की बचत तो होती ही है, साथ ही मानसून से ज्यादा वर्षा के चलते पानी खड़ा रहने पर भी फसल को नुकसान नहीं होता है.

वंदना कुमारी को मिला नवोन्मेषी कृषक पुरस्कार

भागलपुर: भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के तत्वावधान में आयोजित भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान – नवोन्मेषी कृषक सम्मेलन-2024 के अवसर पर बिहार के बांका जिले के भेड़ा गांव की प्रगतिशील महिला किसान वंदना कुमारी को नवोन्मेषी कृषक पुरस्कार से नवाजा गया. यह पुरस्कार पूर्व निदेशक आईएआरआई, नई दिल्ली ने दिया गया.

कृषि गतिविधियों में प्राकृतिक संसाधन संरक्षण के माध्यम से यह काम भेड़ा गांव में किया गया. निकरा परियोजना के तहत सूखा/वर्षाधीत क्षेत्र में संकलित अंगीकृत गांव भेड़ा में वंदना कुमारी ने फसल उत्पादन में सूखारोधी प्रभेद सबौर दीप और सबौर अर्धजल का क्षैतिज हस्तांतरण करने के साथसाथ सघन बागबानी अमरूद, डेयरी, सालभर हरा चारा उपलब्धता, सामुदायिक बीज बैंक, टी सामुदायिक पशु स्वास्थ्य चिकित्सा केंद्र, पोषक वाटिका जैसी अनेक नवोन्मेषी कृषि काम को अंजाम दिया है, जिस का परिणाम भेड़ा गांव एवं आसपास के गांवों में देखने को मिलता है.

वंदना कुमारी ने बड़े पैमाने पर अपने गांव एवं आसपास के गांवो में इकाई विकसित कराई है. इन्होंने कृषि विज्ञान केंद्र, बांका से प्रशिक्षण प्राप्त कर के अभी कई विषयों पर मास्टर ट्रेनर बन कर प्रगतिशील किसानों एवं महिला किसानों के बिहार के अलावा दूसरे प्रदेशों में प्रशिक्षित करने का काम करती हैं. कृषि एवं पशुपालन के साथसाथ समाजिक काम जैसे छोटे बच्चों का पढ़ाना, सिलाई, कटाई में ग्रामीण युवतियों को प्रशिक्षण देना आदि जैसे काम भी उन के द्वारा किए जाते हैं.

इस पुरस्कार के पूर्व वंदना कुमारी को बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर, राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय, पूसा, आत्मा, बिहार सरकार आदि जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से कई पुरस्कार प्राप्त किए हैं. वंदना कुमारी ने कृषि मशीनीकरण, यंत्रीकरण को बढ़ावा देने के लिए प्रत्यक्षण के तौर पर निकरा परियोजना के माध्यम से लोगों से जागरूक करने का काम भी किया है. इसी कार्यक्रम में बिहार के एक प्रगतिशील किसान महादेव सैनी, मधुबनी को भी इसी पुरस्कार से उन के उत्कृष्ट कार्यों के लिए नवाजा गया है.

खेत में डालें हरी खाद (Green Manure)

हरी खाद की ये फसलें दलहनी व अदलहनी दोनों तरह की होती हैं पर ज्यादातर दलहनी फसलों को शामिल करते हैं क्योंकि इन फसलों में नाइट्रोजन बनाए रखने की कूवत होती है. खेती में हरी खाद उस सहायक फसल को कहते हैं जिस की खेती मुख्यत: जमीन में पोषक तत्त्वों को बढ़ाने और जैविक पदार्थों की भरपाई करने के मकसद से की जाती है.

अकसर इस तरह की फसल में ही हल चला कर मिट्टी में मिला दिया जाता है जो सड़गल कर जमीन की उपजाऊ कूवत को बढ़ाती है और लाभदायक जीवों की तादाद में इजाफा कर जमीन के उपजाऊपन को बनाए रखती है.

मुख्य खरीफ और रबी में उगाई जाने वाली विभिन्न फसलों की बोआई या रोपाई के पहले विभिन्न हरी खाद की फसलों को बो कर इन को हरी अवस्था में ही मिट्टी पलटने वाले हल से चला कर मिट्टी में मिला कर हरी खाद दी जाती है.

कुछ इलाकों में अदलहनीय फसलों का इस्तेमाल स्थानीय उपलब्धता, सूखा सहन करने की कूवत, तेजी से बढ़ोतरी व प्रतिकूल हालात में भी अनुकूलन के चलते किया जाता है. इन फसलों का ब्योरा इस तरह है:

हरी खाद में इस्तेमाल होने वाली फसलों के गुण

* दलहनी फसल हो, जो कम समय में ज्यादा नाइट्रोजन जमीन को दे सके.

* फसल में पानी की मांग कम हो ताकि कम सिंचाई की सुविधा वाले इलाकों में आसानी से उगाई जा सके.

* गहरी जड़ वाली फसल हो जो गहराई से पोषक तत्त्वों को हासिल कर सके और निचली सतहों को मुलायम बना सके.

* जल्दी उगने व तेजी से बढ़ने वाली फसलें सही होती हैं.

* काष्ठवत पौधे न हों, जिस से जल्दी सड़ाव हो सके.

* कीट और रोगों के प्रति प्रतिरोधी हो.

* परोक्ष और प्रत्यक्ष रूप से ये बाद वाली फसल को किसी तरह से खराब न करे.

* इन फसलों को ज्यादा क्रियाओं की जरूरत न हो जैसे खरपतवार नियंत्रण, पोषक तत्त्व प्रबंधन, खेत की तैयारी, सिंचाई वगैरह.

हरी खाद के फायदे

* इस से जमीन को जीवांश पदार्थ भरपूर मिलता है, जो मिट्टी में सूक्ष्म जीवों की सक्रियता को बढ़ा कर जमीन की भौतिक व रासायनिक दशा को सुधारता है.

* हरी खाद डालने से जमीन की निचली सतहों से अवशोषित हो कर पोषक तत्त्व जमीन की ऊपरी सतह पर आ जाते हैं. इस से उथली जड़ वाली फसलें भी ली जा सकती हैं.

* यह खादपानी के बहाव को रोक कर जमीन में पानी सोखती है. साथ ही, जमीन के कटाव को भी रोकती है. इस तरह यह पानी व मिट्टी संरक्षण में सहायक है. साथ ही, जमीन की संरचना को भी यह सुधारती है और क्षारीय और लवणीय जमीन का सुधार करती है.

* हरी खाद पोषक तत्त्वों को अपने अंदर रोकती है और धीरेधीरे पौधों को देती है व पोषक तत्त्वों का नुकसान भी नहीं होने पाता है.

* दलहनी पौधों की जड़ों में वातावरण की स्वतंत्रता नाइट्रोजन को बनाए रखने वाले जीवाणु पाए जाते हैं जो आबोहवा से नाइट्रोजन को बनाए रख कर इस की उपलब्धता बढ़ाते हैं.

* यह फास्फोरस, कैल्शियम, पोटेशियम, मैगनीशियम, आयरन वगैरह की उपलब्धता को बढ़ाती है.

* यह खरपतवार नियंत्रण में भी मददगार है.

* यह रासायनिक उर्वरकों की घुलनशीलता बढ़ाती है जिस से उर्वरक पौधों को आसानी से मुहैया हो जाते हैं.

हरी खाद वाली फसलों की सस्य क्रियाएं : वैसे तो इन फसलों को ज्यादा सस्य क्रियाओं की जरूरत नहीं होती है, पर ज्यादा जीवांश पदार्थ हासिल करने के लिए सस्य क्रियाएं जरूर करनी चाहिए.

बोआई का समय : इन की बोआई पानी की उपलब्धता व मुख्य फसल की बोआई पर निर्भर करती है. बारिश पर आधारित इलाकों में खरीफ में मानसून शुरू होते ही बोआई कर देनी चाहिए जबकि सिंचाई वाले इलाकों में इस की बोआई अप्रैलमई माह तक कर देनी चाहिए.

जमीन की तैयारी : जमीन की 1 व 2 जुताई कर बोआई करनी चाहिए.

फास्फोरस का इस्तेमाल : अगर जमीन में फास्फोरस कम हो तो फास्फोरस उर्वरक देना चाहिए ताकि ज्यादा जड़ ग्रंथियां बनें और नाइट्रोजन बना रह सके.

बोआई की विधि : छिड़काव विधि से बीज को बराबर बिखेर कर ढकना चाहिए.

बीज दर : मुख्य फसल की तुलना में बीज दर अधिक रखनी चाहिए. जैसे सनई 30 किलोग्राम, ग्वार 25 किलोग्राम, ढैंचा 35 किलोग्राम, लोबिया 125 किलोग्राम, उड़द व मूंग 30-35 किलोग्राम वगैरह.

सिंचाई : गरमी व सर्दी के दिनों में क्रमश: 10 और 15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए.

जमीन में मिलाने की सही अवस्था : फसल की एक विशेष अवस्था पर पलटाई करने से जमीन को सब से ज्यादा नाइट्रोजन व जीवांश पदार्थ हासिल होते हैं.

इस अवस्था के पहले या बाद में पलटाई करना फायदेमंद नहीं होता है. जब फसल में 50 फीसदी फूल आ गए हों तो मिट्टी पलटने वाले हल से जमीन में दबा देना चाहिए. दबाने से पहले पाटा चला कर पौधों को गिरा देना चाहिए.

सनई की फसल में तकरीबन 50 दिन बाद व ढैंचा में 40 दिन बाद यह अवस्था आती है. बरसीम वगैरह की फसलों में 2-3 कटाई लेने के बाद फसल को खेत में दबा सकते हैं.

आगामी फसल की बोआई का अंतराल : खरीफ में धान की रोपाई तो दबाने के तुरंत बाद की जा सकती है, पर रबी फसलों जैसे गेहूं, गन्ना, आलू, सब्जियां वगैरह को हरी खाद देने के 30-35 दिन बाद बोना चाहिए.

पलटने की विधि और गहराई : खड़ी फसल को पहले पाटा चला कर खेत में गिरा देते हैं यानी मिट्टी पलटने वाले हल से इसे खेत में दबा देते हैं. फसल को खेत में दबाने की गहराई कई वजहों से प्रभावित होती है.

जमीन का प्रकार : बलुई जमीनों में गहराई और चिकनी जमीनों में ऊपरी सतह पर फसल का फुटाव जल्दी होता है, क्योंकि इन सतहों में नमी और हवा का बहना विच्छेदन की क्रियाओं के लिए सही होता है.

फसल की अवस्था : अपरिपक्व यानी अधपकी फसल किसी भी गहराई पर सड़ सकती है, पर परिपक्व यानी पकी हुई फसल कम गहराई पर ही दबानी चाहिए. जिन फसलों की शाखाएं व पत्तियां सख्त हों, उन्हें ऊपर की सतह में ही दबाना चाहिए.

मौसम : शुष्क मौसम में निचली सतह पर और नम मौसम में फसल को ऊपरी सतह पर ही दबाना चाहिए. फसल को खेत में दबा कर पाटा चलाना जरूरी है जिस से मिट्टी में अच्छी तरह से फसल दब जाए और फसल का सड़ना ठीक तरह से हो.

पूर्व सड़ाव के लिए अगर मिट्टी में नमी की कमी है तो खेत की सिंचाई करना जरूरी है. हरी खाद की पलटाई और आगामी फसल बोने के बीच के समय का अंतर भी खेत में करना चाहिए. मिट्टी में दबाने के 30-40 दिन के अंदर ही पूरी तरह सड़ाव हो पाता है.

हरी खाद देने की विधि : यह जरूरी है कि हरी खाद डालने की तकनीक की सही जानकारी हो क्योंकि इस के ऊपर ही हरी खाद की सफलता निर्भर करती है.

हरी खाद वाली फसलों की बोआई का समय इस तरह निश्चित करना चाहिए कि मिट्टी में उन पौधों को उस समय दबाया जा सके, जब ज्यादा से ज्यादा पोषक तत्त्व खेत में मौजूद हों.

पौधों के दबाने और अगली फसल के बोने के बीच इतना अंतर होना चाहिए कि हरी खाद

द्वारा मिले पोषक तत्त्व अगली फसल के लिए मिट्टी किस प्रकार की अवस्था में सब से

ज्यादा सही रहती है, इस का भी सही अंदाजा रहना चाहिए.

हरी खाद की सीमाएं : हमारे देश में हरी खाद के चलन में कुछ बाधाएं हैं. इस की वजह से हरी खाद की फसलें उगाना किसानों के लिए आसान नहीं है जैसे: कम बारिश वाले इलाकों में हरी खाद की फसल इस वजह से नहीं उगाते क्योंकि मिट्टी में नमी के चलते हरी खाद खेत में दबाने से वे अच्छी तरह सड़ती नहीं है. साथ ही, दगली बोई जाने वाली फसल के बीजों का अंकुरण यानी फुटाव भी नमी की कमी में नहीं हो पाता.

जिन इलाकों में मिट्टी में नमी की कमी नहीं हो पाती है यानी सिंचित या ज्यादा बारिश वाले इलाकों में, जिस मौसम में हरी खाद की फसल उगाते हैं, उस मौसम में किसान की दूसरी जरूरत की कोई फसल नहीं ली जा सकती. इसलिए हरी खाद की फसल की अपेक्षा किसान दूसरी फसल लेना ज्यादा पसंद करता है.

किसान को हरी खाद को खेत में दबाने के यंत्र भी मुहैया नहीं हैं और ज्यादातर किसान हरी खाद को मिट्टी में दबाने की तकनीक से वाकिफ नहीं हैं.

विशेष रूप से खरीफ मौसम में फसल की सही बढ़वार के लिए बारिश न होने पर सिंचाई का भी सही इंतजाम नहीं हो पाता.

तमाम तरह की मिट्टियों, खासतौर से विकारग्रस्त यानी लवणीय, क्षारीय, जलमगन यानी पानी में डूबी हुई, पथरीली वगैरह के लिए सही हरी खाद की फसल का मिलना मुश्किल होता है.