Paddy: धान की उन्नत खेती से उगा सकते हैं सोना

Paddy: तमाम कुदरती आपदाओं की वजह से पिछले 1 दशक से मध्य प्रदेश की खास खरीफ की फसल सोयाबीन ने प्रदेश के किसानों की हालत खराब कर दी, नतीजतन किसानों ने धान (Paddy) की खेती शुरू कर दी और रिकार्ड उत्पादन कर के खेती को लाभ का धंधा बना दिया.

पहले छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता था, पर अब मध्य प्रदेश में धान की खेती बड़े पैमाने पर की जाने लगी है. किसान बड़े रकबे में धान की खेती कर के अपने खेतों में सोना उगा सकते हैं.

खेत की तैयारी : गरमी के मौसम में सही समय पर खेत की गहरी जुताई हल या प्लाउ चला कर करें, जिस से मिट्टी उलटपलट जाए. मेंड़ों की सफाई जरूर करें. गोबर की खाद या कंपोस्ट खाद 10 से 12 टन प्रति हेक्टेयर की दर से अंतिम जुताई या बारिश से पहले खेत में फैला कर मिलाएं.

धान की खेती की विधियां

सीधे बीज बोने की विधि : खेत में सीधे बीज बो कर निम्न तरह से धान की खेती की जाती है:

* छिटकवां बोआई.

* नाड़ी हल या दुफन या सीड ड्रिल से कतारों में बोआई.

* बियासी विधि (छिटकवां विधि) से सवा गुना ज्यादा बीज बो कर बोआई के 1 महीने बाद फसल की पानी भरे खेत में हलकी जुताई.

* लेही विधि (धान के बीजों को अंकुरित कर के मचौआ किए गए खेतों में सीधे छिटकवां विधि से बोआई).

रोपा विधि : इस विधि के तहत धान के पौधे सीमित क्षेत्र में तैयार किए जाते हैं. फिर 25 से 30 दिनों के पौधों की खेत में रोपाई की जाती है.

बीजों की मात्रा : अनुविभागीय अधिकारी कृषि केएस रघुवंशी बताते हैं कि धान की बोआई के लिए बीजों की मात्रा बोआई की विधि के मुताबिक अलगअलग रखनी चाहिए.

बीजों का उपचार : बीजों को थायरम या डायथेन एम 45 दवा की 2.5 से 3 ग्राम मात्रा से प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से उपचारित कर के बोआई करें. बैक्टेरियल बीमारियों से बचाव के लिए बीजों को 0.02 फीसदी स्ट्रेप्टोसाइक्लिन के घोल में डुबा कर उपचारित करना फायदेमंद होता है.

बोआई का सही समय : बारिश का मौसम शुरू होते ही धान की बोआई का काम शुरू करें. मध्य जून से जुलाई के पहले हफ्ते तक बोआई का सब से अच्छा समय होता है. रोपाई के बीजों की बोआई रोपणी में जून के पहले हफ्ते में ही सिंचाई की सुविधा वाली जगहों पर कर दें, क्योंकि जून के तीसरे हफ्ते से मध्य जुलाई तक की रोपाई से अच्छी पैदावार मिलती है.

खाद व उर्वरक

गोबर की खाद या कंपोस्ट : धान की फसल में 5 से 10 टन प्रति हेक्टेयर की दर से अच्छी सड़ी गोबर खाद या कंपोस्ट का इस्तेमाल करने से महंगे उर्वरकों के खर्च में बचत की जा सकती है.

हरी खाद : रोपाई वाले धान में हरी खाद के इस्तेमाल में सरलता होती है. इसे मिट्टी में आसानी से मिलाया जा सकता है. हरी खाद के लिए सनई के करीब 25 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर के हिसाब से रोपाई से 1 महीने पहले बोने चाहिए. करीब 1 महीने की खड़ी सनई की फसल को खेत में मचौआ करते समय मिला देना चाहिए. यह 3-4 दिनों में सड़ जाती है. ऐसा करने से करीब 50-60 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर उर्वरकों की बचत होगी.

जैव उर्वरकों का इस्तेमाल : कतारों में बोआई वाले धान में 500 ग्राम एजेटोवेक्टर और 500 ग्राम पीएसबी जीवाणु उर्वरक का प्रति हेक्टेयर के हिसाब से इस्तेमाल करने से 15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन और स्फुर उर्वरक बचाए जा सकते हैं.

इन दोनों जीवाणु उर्वरकों को 50 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर सूखी सड़ी हुई गोबर की खाद में मिला कर बोआई करते समय कूड़ों में डालने से इन का पूरा लाभ मिलता है. सीधी बोआई वाले धान में उगने के 20 दिनों और रोपाई के 20 दिनों की अवस्था में 15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हरीनीली काई का बुरकाव करने से करीब 20 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन उर्वरक की बचत की जा सकती है. ध्यान रहे कि काई का बुरकाव करते समय खेत में सही नमी या हलकी नमी की सतह रहनी चाहिए.

उर्वरकों का इस्तेमाल : धान की फसल में उर्वरकों का इस्तेमाल बोई जाने वाली प्रजाति के मुताबिक करना चाहिए.

उर्वरक देने का समय : नाइट्रोजन की आधी मात्रा और स्फुर व पोटाश की पूरी मात्रा आधार खाद के रूप में रोपाई से पहले खेत तैयार करते समय या कीचड़ मचाते समय बुरक कर मिट्टी में मिलाएं. बची नाइट्रोजन की आधी मात्रा अंकुर फूटने की अवस्था में (रोपाई के 20 दिनों बाद) और आधी मात्रा गंभोट की अवस्था में देनी चाहिए. जस्ते की कमी वाले क्षेत्रों में खेत की तैयारी करते समय जिंक सल्फेट 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 3 साल में 1 बार इस्तेमाल करें. गंधक की कमी वाले क्षेत्रों में गंधक वाले उर्वरकों (जैसे सिंगल सुपर फास्फेट) का इस्तेमाल करें.

सिंचाई : धान की फसल में सिंचाई का बहुत महत्त्व है. रोपाई से अंकुर निकलने की अवस्था तक खेत में पानी की सतह 2-5 सेंटीमीटर रखनी चाहिए. कंसे (अंकुर) निकलने के बाद से गंभोट की अवस्था तक 10-15 सेंटीमीटर पानी की सतह रखें. धान की फसल में जरूरत से ज्यादा पानी भरना अच्छी पैदावार में बाधक होता है.

लेही के लिए बीज अंकुरित करना: लेही विधि से बोआई करने के लिए खेत की तैयारी के तुरंत बाद अंकुरित बीज मौजूद होने चाहिए. लिहाजा लेही बोआई के तय समय के 3-4 दिनों पहले से ही बीज अंकुरित करने का काम शुरू कर दें.

इस के लिए बीजों की तय मात्रा को रात के समय पानी में 8-10 घंटे के लिए भिगोएं. फिर इन भीगे हुए बीजों का पानी निकाल दें. फिर इन बीजों को पक्की सूखी सतह पर रख कर बोरों से ढक दें. ढकने के 24-30 घंटे के अंदर बीज अंकुरित हो जाते हैं. इस के बाद बोरों को हटा कर बीजों को छाया में फैला कर सुखाएं. इन अंकुरित बीजों का इस्तेमाल 6-7 दिनों तक किया जा सकता है.

रोपणी में पौधे तैयार करना : जितने रकबे में धान की रोपाई करनी हो उस के 1/20 भाग में रोपणी बनानी चाहिए. रोपणी में इस प्रकार से बोआई करनी चाहिए कि करीब 3-4 हफ्ते के पौधे रोपाई के लिए समय पर तैयार हो जाएं. रोपणी के लिए 2-3 बार जुताई कर के अच्छी तरह खेत तैयार करें.

इस के बाद खेत में 1.5-2.0 मीटर चौड़ी पट्टियां बना लें, जिन की लंबाई खेत मुताबिक कम या ज्यादा हो सकती है. हर पट्टी के बीच 30 सेंटीमीटर की नाली रखें. इन नालियों की मिट्टी नाली बनाते समय पट्टियों पर डालने से वे ऊंची हो जाती हैं.

ये नालियां जरूरत के मुताबिक सिंचाई व जल निकास के लिए मददगार होती हैं. रोपणी में 8 से 10 सेंटीमीटर के अंतर से कतारों में बोआई करने से रखरखाव और रोपाई के लिए पौधे उखाड़ने में आसानी होती है.

कम पानी में भी हो सकता है धान का उत्पादन : सूखा प्रतिरोधी धान की खेती करना अब मुमकिन हो गया है. गेहूं की तरह अब चावल उगाने के लिए भी नई तकनीक की खोज हो गई है. अब धान के खेत को हमेशा पानी से भरा हुआ रखे बिना भी इस की खेती की जा सकती है. नई तकनीक से धान की फसल के लिए पानी की जरूरत में 40 से 50 फीसदी तक कमी करने में मदद मिलेगी.

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) और फिलीपींस अंतर्राष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (आईआरआरआई) ने संयुक्त रूप से यह तकनीक विकसित की है. इस परियोजना में कटक स्थित केंद्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (सीआरआरआई) की भी भागीदारी है. कटक स्थित संस्थान ने ही धान की वैसी किस्मों की पहचान की है, जिन्हें दूसरी फसलों की तरह कुछ दौर की सिंचाई के जरीए उगाया जा सकता है.

संस्थान ने खेती की ऐसी विधियों की भी खोज की है, जिन के जरीए धान की ऐसी किस्मों से करीबकरीब उतनी उपज हो सकती है, जितनी सामान्य तौर पर ज्यादा पैदावार वाली धान की किस्मों से होती है.

तकनीकी तौर पर यह एरोबिक राइस कल्टीवेशन कहलाता है. इस तकनीक में धान के खेत में स्थिर पानी की जरूरत नहीं होती और न ही धान के छोटे पौधे तैयार करने की जरूरत होती है, जैसा कि आमतौर पर होता है.

इस तकनीक में कुशलता से तैयार किए गए खेतों में सीधे बीज बो दिए जाते हैं और इस तरह मजदूरी की लागत की भी बचत हो जाती है.

लहसुन (Garlic) उखाड़ने की मशीन से काम हुआ आसान

Garlic : राजस्थान के जोधपुर जिले का मथानिया गांव उम्दा खेतीकिसानी के लिए जाना जाता है. मथानिया की लाल मिर्च के नाम से इस गांव के खेतों में उपजी मिर्च की मांग विदेशों तक थी. फिर किसानों द्वारा फसलचक्र को तवज्जुह न देने की वजह से यहां की मिर्ची की खेती तमाम रोगों का शिकार हो गई. लेकिन धीरेधीरे किसान जागरूक हुए हैं और कुदरत के नियमों का पालन कर रहे हैं. अब इस इलाके में मिर्च के अलावा गाजर, पुदीना और लहसुन की खेती भी जोरों पर है.

लहसुन (Garlic) की खेती में यहां के किसानों को शिकायत थी कि जब वे लहसुन (Garlic) को खेत में से उखाड़ने का काम करते हैं, तो उन के हाथ खराब हो जाते हैं. हाथ फटने और नाखूनों में मिट्टी चले जाने के कारण अगले दिन खेत में जा कर मेहनत करना कठिन होता था.

किसान मदन सांखला ने इस समस्या को चैलेंज के रूप में स्वीकारते हुए लहसुन की फसल निकालने के लिए एक मशीन बनाने की सोची. मदन को किसान होने के साथसाथ अपने बड़े भाई अरविंद के लोहे के यंत्र बनाने के कारखाने में मिस्त्री के काम का अनुभव भी था. उस ने अपने अनुभव के आधार पर जो मशीन बनाई, उसे काफी बदलावों के बाद कुली मशीन नाम दिया, चूंकि लहसुन में कई कुलियां होती हैं.

लहसुन (Garlic) की खेती में 1 मजदूर दिन भर में 100 से 200 किलोग्राम लहसुन ही खेत से उखाड़ (निकाल) पाता है. दिन भर की मेहनत के बाद अगले दिन खेत में मजदूरी करना सब के बस की बात नहीं रहती थी. इस तरह से लागत बढ़ने लगी और हम लोग लहसुन को कम महत्त्व देने लगे.

‘समस्या के हल के लिए हम ने लहसुन (Garlic) को लोहे की राड या हलवानी से निकालना शुरू किया. इस से हमें काम में थोड़ीबहुत आसानी जरूर हुई, पर यह समस्या का अंत नहीं था. मुझे अंत तक पहुंचने की जल्दी थी.

‘तब मैं ने एक मशीन बनाई. नालीदार शेप वाले मजबूत ऐंगल से बनी हल जितनी ऊंची यह मशीन खूब लोकप्रिय हो रही है. इसे ट्रैक्टर के पीछे टोचिंग कर के इस्तेमाल किया जाता है. यह एक एडजस्टेबल मशीन है. खेत में मिट्टी के हिसाब से लहसुन की गांठें कम या ज्यादा गहराई तक बैठती हैं, लिहाजा ट्रैक्टर से जोड़ कर इसे हल की तरह मनचाहे एंगल पर खेत में उतारा जा सकता है. जमीन के भीतर रहने वाले हिस्से में एक आड़ी पत्ती (ब्लेड) लगी रहती है, जिसे जमीनतल के समानांतर न रख कर थोड़ा टेढ़ा रखा गया है. यह आड़ी पत्ती मजबूत लोहे की बनी होती है.

मशीन की पत्ती जमीन में 7-8 इंच या 1 फुट तक गहरी जाती है और मिट्टी को नरम कर देती है. इस से फायदा यह होता है कि लहसुन को ढीली पड़ चुकी मिट्टी से बाद में आसानी से इकट्ठा किया जा सकता है. लहसुन रहता मिट्टी के अंदर ही है, बाहर निकलने और धूप में खराब होने का अब डर नहीं है.

पहले हाथ से लहसुन (Garlic) निकालने पर पूरे दिन में 1 लेबर 5 क्यारियों से लहसुन निकाल पाता था. गौरतलब है कि 1 बीघे में 100 क्यारियां होती हैं. इस मशीन के नतीजे चौंकाने वाले हैं. इसे ट्रैक्टर से जोड़ कर 1 बीघे का लहसुन महज 15 मिनट में उखाड़ लिया जाता है.

(Garlic)

हाथ से लहसुन उखाड़ने के दौरान करीब 3 से 4 फीसदी लहसुन जमीन में ही रह जाता था. किसान या मजदूर चाहे कितना भी अनुभवी क्यों न हो, लहसुन टूट कर जमीन में रह ही जाता था. इस के अलावा पत्तों समेत उखाड़े जाने वाले लहसुन की कुलियों (गांठों) को खराब होने से बचाने के लिए तुरंत ही इकट्ठा कर के छाया में सुखाना पड़ता था. इस काम की मजदूरी भी देनी पड़ती थी.

अब 1 लेबर 1 दिन में 1 बीघे यानी 100 क्यारियों में से लहसुन उखाड़ सकता है. इस मशीन से वक्त की बचत हुई है और दाम भी अच्छे मिलने लगे हैं. राजस्थान के कोटा में लहसुन ज्यादा होता है, इसलिए वहां इस मशीन की मांग ज्यादा है.

पहले हाथ से लहसुन निकालने पर उसे खराब होने से बचाने के लिए बोरी से ढक कर रखना पड़ता था. अब यह फायदा है कि लहसुन रहता तो जमीन में ही है, बस मिट्टी नर्म हो जाती है, इसलिए इसे जरूरत के मुताबिक निकाला जा सकता है. इस मशीन की लागत 13000 से 15000 रुपए के बीच आती है.

ज्यादा जानकारी के लिए किसान निम्न पते पर संपर्क कर सकते हैं:

मदन सांखला, मार्फत विजयलक्ष्मी इंजीनियरिंग वर्क्स, राम कुटिया के सामने, नयापुरा, मारवाड़ मथानिया 342305, जिला जोधपुर, राजस्थान. फोन : 09414671300.

Plowing Machine : रोटावेटर- जमीन को दुरुस्त बनाते जुताई यंत्र

Plowing Machine: अच्छी पैदावार लेने के लिए जिस प्रकार से अच्छी प्रजाति के बीज व उर्वरक जरूरी हैं, उसी तरह से खेत की अच्छी जुताई होना भी जरूरी है. हम कितनी भी अच्छी क्वालिटी का खादबीज इस्तेमाल कर लें, लेकिन खेत की तैयारी ठीक नहीं हुई तो हमारी फसल पैदावार पर असर पड़ना लाजिम है.

जमीन की जुताई खेत तैयार करने का सब से पहला और बुनियादी काम भी है. गेहूं की फसल कटने के बाद गरमी के मौसम में तो जुताई का महत्त्व और भी बढ़ जाता है. गरमी के मौसम में खेत की जुताई कर के खेत खुला छोड़ देने पर तमाम तरह के कीटपतंगे मर जाते हैं और खरपतवार भी काफी हद तक खत्म हो जाते हैं. खेत की जुताई करने के लिए अनेक यंत्र आज बाजार में मौजूद हैं. खास तकनीक से बने ये जुताई यंत्र (Plowing Machine) खेत की अच्छी जुताई करने में सक्षम होते हैं, जिन के इस्तेमाल से कम समय में अच्छी जुताई की जाती है.

विराट रोटरी टिलर

माशियो कंपनी का बना यह यंत्र जमीन की जुताई करने के लिए एक मजबूत बहुपयोगी रोटरी टिलर है. यह रोटरी टिलर किसी भी फसल के लिए अच्छी क्यारी बनाने में भी सक्षम है. यह सूखी या गीली मिट्टी में किसी भी हालत में काम करने वाला यंत्र है. यह खेत के पिछली फसल के अवशेषों को जड़ से निकाल कर उन्हें खेत में मिलाने का काम भी करता है.

खास तकनीक से बने इस के मजबूत ब्लेड हर प्रकार की मिट्टी में अच्छी तरह से काम करते हैं और खेत की मिट्टी को भुरभुरा बना कर के उसे एकसार बनाने का काम बखूबी करते हैं. कंपनी का कहना है कि इस यंत्र के खास इटैलियन ब्लैड हैं, जो घिसते कम हैं और लंबे समय तक चलते हैं. इस यंत्र का खास रखरखाव भी नहीं है. विराट रोटरी टिलर के अनेक मौडल कई साइजों में मौजूद हैं, जिन्हें अपनी जरूरत के मुताबिक लिया जा सकता है. जिन्हें 30 एचपी से 60 एचपी तक के सभी ट्रैक्टरों के साथ जोड़ कर चलाया जा सकता है.

खासीयतें : इस में हैवी ड्यूटी पीटीओ शाफ्ट, अच्छी क्वालिटी वाले इटैलियन ब्लैड, टिकाऊ साइड गियर ड्राइव, अधिक ताकतवर मल्टी स्पीड गियर ताकत और मजबूत फ्रेम जैसी अनेक खासीयतें हैं.

अधिक जानकारी के लिए आप कंपनी के मोबाइल नंबर 91-2138612500 पर संपर्क कर सकते हैं. या भारत एग्रो इंडस्ट्रीज के फोन नंबर 01692-230028 पर बात कर जानकारी ले सकते हैं.

फील्ड किंग रोटरी टिलर

बेरी उद्योग प्रा. लि. 4 प्रकार के मौडल फील्डकिंग रोटरी टिलर बना रही है.

Machine

टर्मीनेटर मौडल: अधिक ब्लेड वाला यह टिलर मिट्टी को 7 इंच की गहराई तक में खोदता है और इस यंत्र के खास तरीके से बने ब्लेड ट्रैक्टर पर कम लोड डालते हैं, जिस से ईंधन की बचत होती है. बोरोन स्टील के बने ब्लेड सामान्य ब्लेडों के मुकाबले ज्यादा चलते हैं. इस यंत्र को 35 हार्सपावर से 60 हार्सपावर के ट्रैक्टर के साथ जोड़ कर चलाया जा सकता है.

दबंग मौडल: इस मौडल में वही सब खासीयतें है तो टर्मीनटर मौडल में है. पर इस को 35 हार्स पावर से 90 हार्स पावर तक के ट्र्रैक्टर से जोड़ कर चलाया जा सकता है. इस के अलावा 2 अन्य मौडल मिनी व रेगुलर भी हैं.

अधिक जानकारी के लिए आप कंपनी के फोन नंबर 91-1842221571/72,73 पर संपर्क कर सकते हैं.

हिसार, हरियाणा की लक्ष्मी आटोमोबाइल पर भी ये यंत्र उपलब्ध हैं. चंदा पूनिया के मोबाइल नंबर 98121-49398 पर भी बात कर के यंत्र खरीद जा सकते हैं या कंपनी के ग्राहक सेवा केंद्र 0184-6656666 पर भी जानकारी ले सकते हैं.

प्रकाश रोटावेटर

नवभारत इंडस्ट्रीज का बना प्रकाश रोटावेटर भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त रोटावेटर है और एफएमटीटीआई, हिसार से रजिस्टर्ड है.

यह सूखी, गीली एवं हर तरह की जमीन में अच्छी तरह काम करता है. खेतों की पिछली फसल की जड़ों, खरपतवारों व घासफूस को जमीन में मिला देता है. जिस से खेती की जैविक कूवत बढ़ती है. यह रोटावेटर, गन्ना, केला, कपास, मक्का, धान, गेहूं, आलू से खाली हुए खेतों को बोआई लायक बनाने में कारगर है.

इस रोटावेटर की जानकारी के लिए आप कंपनी के मोबाइल नंबर 09897591803 व फोन नंबर 0562-4042153 पर संपर्क कर सकते हैं.

योद्धा रोटावेटर

साइको एग्रोटेक कंपनी योद्धा के नाम से रोटावेटर बना रही है. 6 अलगअलग साइजों में उपलब्ध रोटावेटरों को 30-35 हार्सपावर से ले कर 60-70 हार्स पावर के टैक्टरों के साथ जोड़ कर चलाया जा सकता है.

खास तकनीक से तैयार हैवी ड्यूटी गेयर बाक्स, सभी नटबोल्ट अच्छी क्वालिटी के स्टील से बने हैं. ट्रेलिंग बोर्ड को एडजैस्ट करने के लिए आटौमेटिक स्प्रिंग लगे हैं और बेयरिंग यंत्र को सील नमी और कीचड़ से बचाती है. पाउडर कोटिंग पेंट (भट्टी पेंट) इस यंत्र को जंग से बचाता है.

अधिक जानकारी के लिए फोन नंबर 01628-284188 या मोबाइल नंबरों 7087222688, 7087222788, 7087222588 पर संपर्क कर सकते हैं

Onion Processing : प्याज की प्रोसैसिंग से होगी ज्यादा कमाई

Onion Processing: प्याज काटने से अकसर आंखों में आंसू आ जाते हैं, लेकिन पिछले दिनों मंडियों में प्याज के दाम गिरने से किसान खून के आंसू रोते रहे. किसान मुनाफा तो दूर, उपज की लागत व मंडी में प्याज लाने का भाड़ा तक नहीं निकाल पाए. लिहाजा बहुत से किसानों ने इस बार प्याज की खेती से तोबा कर ली.

प्याज ही क्या आलू हो या गन्ना, मिर्च हो या टमाटर, जब जिस फसल की पैदावार ज्यादा हो जाती है, तो उस की कीमतें धड़ाम से नीचे गिर जाती हैं. इस से नुकसान किसानों का होता है. अकसर वे बरबाद हो जाते हैं. लिहाजा बेहद जरूरी है कि किसान इस मुसीबत से नजात पाने के लिए कारगर उपाय अपनाएं.

प्याज की प्रोसैसिंग (Onion Processing)

उपज की कीमत बढ़ाने व उसे बरबाद होने से बचाने के लिए उस की प्रोसेसिंग करना एक कारगर तरीका साबित हुआ है. प्याज की भी प्रोसेसिंग यानी डब्बाबंदी की जा सकती है. प्याज उत्पादक तकनीक सीख कर प्याज प्रोसेसिंग इकाई लगा सकते हैं और प्याज से कई तरह के उत्पाद बना सकते हैं.

बाजार में सिरके की प्याज, प्याज का पेस्ट व पाउडर आदि कई उत्पाद मिलते हैं. ज्यादातर किसान नहीं जानते कि अब देशविदेश में प्याज का पेस्ट, क्रीम, भुनी प्याज, करारी प्याज, प्याज के छल्ले, प्याज का तेल, प्याज का अचार, प्याज फ्लेक्स, सूखा प्याज, प्याज का सिरका, प्याज का सास, प्याज का सूप, प्याज का जूस, छिली प्याज व प्याज के बेवरेज पेय आदि की मांग दिनोंदिन तेजी से बढ़ रही है.

दरअसल, ताजे प्याज के मुकाबले प्याज के प्रोसेस्ड उत्पादों को इस्तेमाल करना ज्यादा आसान है. नई तकनीक से प्याज का इस्तेमाल रंग व एसेंस आदि बनाने में भी किया जा सकता है. साथ ही बचे प्याज का कचरा व सड़ी हुई प्याज भी बेकार नहीं जाती. उसे बायोगैस बनाने में इस्तेमाल किया जाता है. लिहाजा सूझबूझ के साथ व चेन बना कर उत्पादन करने से उत्पादों की लागत घटती है, उपज खपती है व मुनाफा बढ़ता है.

भरपूर पैदावार

प्याज की पैदावार के मामले में भारत दुनिया भर में दूसरे नंबर पर है. देश में प्याज का कुल रकबा 11 लाख, 50 हजार हेक्टेयर है, जिस में 187 लाख, 36 हजार टन प्याज की पैदावार होती है. पड़ोसी देश चीन सिर्फ 9 लाख 30 हजार हेक्टेयर जमीन में भी हम से ज्यादा यानी 205 लाख टन प्याज पैदा करता है.

भारत में प्याज को महफूज रखने के लिए भंडारण के सही इंतजाम कम हैं, लिहाजा काफी प्याज हर साल गलसड़ कर खराब हो जाता है. बेहतर भंडारण से ही उसे बचाया जा सकता है. ज्यादातर भारतीय किसानों की माली हालत कमजोर है, लिहाजा अपना खर्च चलाने के लिए उन्हें उपज बेचने की जल्दी रहती है. बड़े व्यापारी प्याज का भंडारण कर के मौके का फायदा उठाते हैं और किसान बेचारे देखते रह जाते हैं.

जागरूकता जरूरी

कुल पैदा होने वाले प्याज के तकरीबन 7 फीसदी हिस्से की ही प्रोसैसिंग होती है, जबकि प्याज उत्पादों के बढ़ रहे निर्यात से इस काम में भारी इजाफा होने की उम्मीद है. बढ़ती मांग को देखते हुए प्याज की प्रोसैसिंग व उस के कारोबार की बड़ी गुंजाइश है. प्याज प्रोसैसिंग की तकनीक सीखना मुश्किल नहीं है.

जरूरत किसानों के जागरूक होने व पहल करने की है. प्याज की प्रोसैसिंग सीखने व उस का तजरबा करने की है. यदि किसान ठान लें, तो वे आपस में मिल कर प्याज प्रसंस्करण की बड़ी इकाई भी लगा सकते हैं. अपनी उपज को कच्चे माल की तरह न बेच कर खुद उसे प्रोसैस करने में इस्तेमाल कर सकते हैं. वे अपने बच्चों को बेहतर रोजगार का जरीया दे सकते हैं.

लागत घटाएं

किसानों के मुताबिक, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्याज की उत्पादन लागत 12 रुपए प्रति किलोग्राम आ रही है, जबकि पिछले दिनों मेरठ की मंडी में प्याज के दाम घट कर 3-4 रुपए प्रति किलोग्राम तक रह गए थे. लिहाजा, प्याज की बोआई से कटाई तक नई तकनीक अपना कर लागत में कमी लाने की जरूरत है.

इस के अलावा कम जमीन में ज्यादा उपज लेना भी लाजिम है, ताकि प्रति हेक्टेयर औसत उपज बढ़े. साथ ही, किसान प्याज को महफूज रखने के लिए भंडारण की कूवत भी जरूर बढ़ाएं. प्याज की पैदावार में महाराष्ट्र सब से आगे है, दूसरे नंबर पर मध्य प्रदेश है व तीसरे पर कर्नाटक है. अब उत्तर प्रदेश में भी प्याज की खेती बहुत तेजी से बढ़ रही है.

प्याज की खेती में नई तकनीक अपना कर व नई किस्में उगा कर प्याज की पैदावार बढ़ाई जा सकती है, लेकिन सिर्फ पैदावार ही नहीं, उस से आमदनी बढ़ाने की भी जरूरत है. जब भी प्याज की पैदावार ज्यादा होती है, उस की कीमतें गिर जाती हैं और खेतों व गोदामों में प्याज सड़ जाता है.

प्याज की प्रोसेसिंग में हम आज भी बहुत पीछे हैं. प्याज की बड़ी मंडियां महाराष्ट्र के नासिक व लासलगांव में हैं. प्याज के जमाखोर किसानों व प्याज की मंडियों को आसानी से काबू कर लेते हैं. ऐसे में किसानों व उपभोक्ताओं को बचाने के लिए जमाखोरों का जाल तोड़ना बेहद जरूरी है.

कमजोर ढांचा

प्याज की मांग व खपत देश में सब से ज्यादा है, लिहाजा भारत सरकार के लघु कृषक कृषि व्यापार संघ ने निगरानी के लिए मार्केट इंटेलीजेंस सिस्टम बना रखा है, लेकिन इस के बावजूद प्याज उत्पादकों को उन की उपज की वाजिब कीमत नहीं मिलती, दूसरी ओर फुटकर ग्राहकों को प्याज खरीदने के लिए मुंहमांगी कीमत चुकानी पड़ती है.

प्याज की प्रोसैसिंग को बढ़ावा दे कर और प्याज की खरीद व बिक्री सहकारिता के जरीए कर के यह मसला काफी हद तक हल हो सकता है, लेकिन राष्ट्रीय सहकारी कृषि विपणन महासंघ, नैफेड जैसी संस्थाएं भी नाकाम हैं. लिहाजा किसान पिस रहे हैं और बिचौलिए चांदी काट रहे हैं.

पुरानी तकनीक

भारत में आज भी ऐसे कई इलाके हैं, जिन में प्याज की प्रति हेक्टेयर औसत उपज 10 टन से भी कम है. दरअसल किसान प्याज की खेती तो करते हैं, लेकिन ज्यादातर किसान प्याज की पुरानी किस्में उगाते हैं और खेती के पुराने तौरतरीके अपनाते हैं. लिहाजा प्याज की खेती में फायदा दूर, लागत भी मुश्किल से निकलती है. लिहाजा प्याज की खेती में सुधार व बदलाव लाना जरूरी है.

खोजबीन

Onion Processing

दरअसल, अभी तक नकदी फसलों पर ज्यादा जोर होने की वजह से प्याज जैसी फसलों पर खास ध्यान नहीं दिया गया. बहुत से किसान यह नहीं जानते कि प्याजलहसुन की खेती को बढ़ावा देने के लिए साल 1994 से पुणे में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का एक अनुसंधान निदेशालय चल रहा है. देशभर में उस के 28 सेंटर हैं.

प्याज निदेशालय के वैज्ञानिकों ने प्याज की पैदावार, क्वालिटी व निर्यात बढ़ाने के लिए काफी खोजबीन की है. उन्होंने प्याज की नई किस्में खोजने के साथसाथ प्याज महफूज रखने की तकनीक व उस की प्रोसैसिंग के तरीके भी निकाले हैं. वहां प्याज की उन्नत खेती करने के लिए किसानों को बीज, सलाह व ट्रेनिंग भी दी जाती है. यह बात अलग है कि तमाम किसानों को ऐसी बातों का पता ही नहीं चलता. लिहाजा, वे इन सहूलियतों का फायदा नहीं उठा पाते.

प्याज परियोजना निदेशालय में खेती व बागबानी महकमों के मुलाजिमों, कारोबारियों व किसानों को प्याज की ज्यादा पैदावार देने वाली नई संकर किस्मों, खेती की नई तकनीक, प्याज फसल का रोगोंकीटों से बचाव, प्याज का बेहतर भंडारण व उस की बिक्री जैसे पहलुओं पर ट्रेनिंग दी जाती है. लिहाजा, वहां के माहिरों से तालमेल बना कर उस का फायदा उठाया जा सकता है.

प्याज निदेशालय ने 5 व 10 टन कूवत के किफायती भंडारघरों के 2 डिजाइन निकाले हैं, जिन में तली व दीवारों से हवा जाने का इंतजाम है. साथ ही बड़ी, छोटी व मझली साइजों की प्याज को छांट कर अलग करने वाली ग्रेडर मशीन भी बनाई है. इस से हाथ से काम करने के मुकाबले 20 गुना ज्यादा व जल्दी प्याज की बेहतर छंटाई होती है.

उम्दा किस्में

देश के अलगअलग इलाकों में लाल प्याज की 45, सफेद प्याज की 10, पीली प्याज की 3 व भूरी प्याज की 1 किस्म सहित कुल 59 किस्में फिलहाल चलन में हैं. इन में से खासतौर पर एन 2-4-1, एन 53, एन 257-9-1, फुले सफेद, पूरा रैड, भीमा सुपर, भीमा रैड, भीमा शक्ति, भीमा शुभ्रा, भीमा श्वेता व भीमा डार्क रैड वगैरह किस्में ही ज्यादा बोई जाती हैं.

आमतौर पर ज्यादातर किसान जल्दी पक कर ज्यादा उपज देने वाली किस्मों की प्याज बोना पसंद करते हैं.

इस लिहाज से करीमनगर, तेलंगाना में डब्ल्यूएम 514 किस्म की 4-6 कंद वाली सफेद गुच्छेदार प्याज पहचानी गई है., जो सिर्फ 110 से 125 दिनों में पक कर 20 टन प्रति हेक्टेयर तक की पैदावार देती है. जरूरत उस का बीज मुहैया कराने की है.

हालांकि प्याज की नई किस्मों की खोजबीन करने पर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के वैज्ञानिकों ने काफी काम किया है, लेकिन वह खोज बेकार है, जो गांवों तक न पहुंचे. पिछले दिनों असम व अरुणाचल प्रदेश से जंगली व बोई जा रही प्याज की 49 किस्में इकट्ठा की गई हैं. साथ ही, जल्दी पकने व ज्यादा उपज देने वाली अमेरिकन प्याज की 40 किस्मों को भी भारत की आबोहवा में बो कर आजमाया जा रहा है.

जल्द ही इस खोजबीन के नतीजे आने की उम्मीद है. जरूरत जागरूकता बढ़ाने व प्याज उत्पादकों को बाजार, बिक्री, वाजिब कीमत व प्रोसैसिंग आदि की सहूलियतें मुहैया कराने की है, ताकि प्याज पैदा करने वालों की आमदनी में इजाफा हो सके. सरकार के भरोसे रह कर कुछ होने वाला नहीं है, लिहाजा किसानों को खुद एकजुट हो कर कोशिशें करनी होगी. प्याज के बारे में और ज्यादा जानकारी के लिए किसान निम्न पते पर संपर्क कर सकते हैं:

निदेशक

प्याज और लहसुन अनुसंधान निदेशालय

राजगुरु नगर, पुणे, महाराष्ट्र. पिन : 410505 फोन : 02135-222026.

प्याज की प्रोसैसिंग से करें कमाई

बीते दिनों देश के कई हिस्सों में किसानों ने अपनी प्याज सड़क पर फेंक कर गुस्से का इजहार किया, लेकिन ओहदेदारों के कानों पर जूं नहीं रेंगी. दिल्ली आदि में प्याज की फुटकर कीमतें भले ही गिरें, लेकिन थोक मंडियों में प्याज की तबाही होने से किसान खून के आंसू रोते हैं. गिरती कीमतों से निबटने का उपाय भंडारण है, लेकिन शीत भंडारों की गिनती व कूवत कम है. किसानों को जरूरतों व कर्ज चुकाने को तुरंत पैसा चाहिए. वे कीमतें बढ़ने तक का इंतजार नहीं कर पाते. इसलिए कम दामों पर ही अपनी  प्याज बेच देते हैं.

प्याजलहसुन अनुसंधान निदेशालय, राजगुरु नगर, पुणे के मुताबिक प्याज को प्रोसैस कर के छिली, सूखी, पाउडर व पेस्ट बना कर बेच सकते हैं. उस का अचार, तेल, सिरका, पेय व सास वगैरह बना सकते हैं. प्याज के कचरे से रेशा, रंग व बायोगैस बनते हैं. लिहाजा निजी, सहकारी व सरकारी क्षेत्र की छोटी, मझोली व बड़ी प्रोसैसिंग इकाइयों को बढ़ाना होगा. इसलिए कृषि, खाद्य प्रसंस्करण महकमे व किसान पहल करें. प्याज उत्पादक प्रसंस्करण की तकनीक सीखें. ताकि प्याज की कीमतें गिरने की मुसीबत से नजात मिले व कमाई में इजाफा हो.

नैस्ले, पैप्सी व आईटीसी वगैरह बहुत सी कंपनियां सूखी प्याज खरीदती हैं. प्याज प्रोसैसिंग की 80 इकाइयों में से 65 अकेले गुजरात में व बाकी महाराष्ट्र वगैरह में हैं. कटाई के बाद की तकनीक का एक केंद्रीय संस्थान, सीफेट, लुधियाना में है, जो किसानों को प्याज सुखाने की ट्रेनिंग देता है. प्याज का पाउडर बनाने की मशीनों की जानकारी अलीबाबा डाट काम से कर सकते हैं. प्याज प्रोसैसिंग यूनिट की लागत, लाभ, मशीनरी, निर्यात, बाजार, नियमकानून व सरकारी स्कीमों वगैरह की जानकारी यहां से भी कर सकते हैं.

Floriculture :फ्लोरीकल्चर- फूलों सा खिलता कारोबार

Floriculture: फूलों की मांग आज के समय में दिनबदिन बढ़ती ही जा रही है. खुशी के हर मौके पर फूलों का इस्तेमाल बहुत ही जरूरी हो गया है. यही वजह है कि सुबह सब से जल्दी और रात में देर तक फूलों की ही दुकानें खुली मिलती हैं. लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए फूलों का करोबार देश से ले कर विदेशों तक में फैला हुआ है.

फूलों के पौधे कम समय में ही तैयार हो जाते हैं, जिस से फूलों का कारोबार मुनाफे का जरीया बन गया है. आने वाले समय में भी फूलों के बढ़ते कारोबार से फूलों की खेती और इस से जुडे़ दूसरे काम बड़े कारोबार के रूप में निखरेंगे. भारत के अलावा कीनिया, इजराइल, कोलबिंया, फ्रांस, जापान और जर्मनी फूलों के सब से बड़े निर्यातक देश हैं.

भारत के कर्नाटक प्रदेश में फूलों की खेती सब से ज्यादा होती है. देश में फूलों की पैदावार का 75 फीसदी हिस्सा कर्नाटक में ही होता है. फूलों के कारोबार की मांग साल दर साल 25 से 30 फीसदी के हिसाब से बढ़ती जा रही है. फूलों के निर्यात में भारत का हिस्सा बहुत ही कम है. भारत में जमीन, जलवायु और कई तरह के फूलों की पैदावार के चलते फूलों के कारोबार की संभावना बहुत है. इसी वजह से फ्लोरीकल्चर नई विधा के रूप में उभर कर सामने आई है.

फ्लोरीकल्चर का संबंध फूलों की खेती से होता है. इस में फूल और फूलदार पेड़ों की खेती और उस के व्यावसायिक इस्तेमाल के बारे में जानकारी मिलती है. फूलों की खपत ताजे फूलों के साथसाथ परफ्यूम, फार्मा और सौंदर्य सामग्री बनाने वाली कंपनियों में होती है. फूलों के

बढ़ते कारोबार ने फ्लोरीकल्चर में कैरियर के नए रास्ते भी खोल दिए हैं. फ्लोरीकल्चर की जानकारी हासिल कर के स्वरोजगार को भी बढ़ाया जा सकता है. फ्लोरीकल्चर में फूलों के कारोबार से जुड़ी हुई हर तरह की जानकारी दी जाती है, जो फूलों से जुड़े हुए कारोबार को बढ़ाने में मदद करती है.

फूलों से रोजगार

Floricultureफूलों के कारोबार से कैरियर को नया आयाम दिया जा सकता है. फ्लोरीकल्चर से जानकारी हासिल करने के बाद अपना छोटा रोजगार चलाया जा सकता है. फूलों के कच्चे माल को बेचने का कारोबार हो सकता है. फ्लोरीकल्चर से डिगरी लेने के बाद सरकारी और प्राइवेट सेक्टर में नौकरी मिलने की ढेर सारी संभावनाएं हो जाती हैं.

इस डिगरी को लेने के बाद लैंडस्कैप डिजाइनर, हार्टिकल्चर थेरेपिस्ट, ग्राउंड कीपर्स और फ्लोरल डिजाइनर के रूप में काम मिलने लगता है. इस के अलावा खेत बागान प्रबंधक, सुपरवाइजर और विशेषज्ञ के रूप में भी नौकरी की जा सकती है.

फूलों की सजावट अलगअलग समय पर अलगअलग तरह से होती है. जिन लोगों को इस की जानकारी होती है, उन की भी अच्छी डिमांड होती है. फूलों की नर्सरी लगाने, खुशबूदार पौधों और लैंडकेपिंग के बारे में जानकारियां देने का काम भी किया जा सकता है. फ्लोरीकल्चर  में फूलों और कलियों का उत्पादन, डिजाइनिंग, बुके बनाना, झालर वाले फूलदार पौधे उगाना जैसी तमाम जानकारियां दी जाती हैं.

इस में फूलों की खेती की पूरी जानकारी दी जाती है. फूलों की चुनाई की जानकारी भी फ्लोरीकल्चर में मिलती है.

बदलते समय में घर व आफिस में हरियाली को अच्छे इंटीरियर के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा है. लोग बागबानी में भी रुचि रखने लगे हैं. इस से बागबानी, आफिस, घर, पार्क और कार्यालय वगैरह की सजावट करने के लिए सलाह देने का काम भी किया जा सकता है. कई बड़ी कंपनियां इस तरह के लोगों को नौकरी पर भी रखती हैं.

फ्लोरीकल्चर की पढ़ाई

Floriculture

फ्लोरीकल्चर के क्षेत्र में कैरियर बनाने के लिए ऐसे मेहनती लोगों की जरूरत होती है, जो नेचर के करीब होते हैं और खेती के काम करना चाहते हैं. फ्लोरीकल्चर विषय में डिगरी की उपलब्धता नहीं है. इस के लिए एग्रीकल्चर में गे्रजुएट या बीएससी इन एग्रीकल्चर का चुनाव किया जा सकता है.

बायोटेक्नोलाजी में भी एग्रीकल्चर का दखल बढ़ गया है. जीव विज्ञान से 12वीं कक्षा की परीक्षा पास करने के बाद बीएसएसी और उस के बाद एमएससी इन हार्टीकल्चर परीक्षा पास की जा सकती है. एमएससी हार्टीकल्चर में फूलों, फलों और सब्जियों के बारे में बताया जाता है. कम समय में जानकारी हासिल करने के लिए अलगअलग स्कूलकालेजों के द्वारा डिप्लोमा कोर्स भी किए जा सकते हैं.

इलाहाबाद एग्रीकल्चरल विश्वविद्यालय, इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश), चंद्रशेखर आजाद एग्रीकल्चर विश्वविद्यालय कानपुर (उत्तर प्रदेश), चौधरी चरण सिंह एग्रीकल्चर विश्वविद्यालय हिसार, इंडियन एग्रीकल्चर रिर्सच इंस्टीट्यूट कृषि अनुसंधान भवन नई दिल्ली, कालेज आफ एग्रीकल्चर पूना और फारेस्टी रिसर्च विश्वविद्यालय देहरादून जैसी तमाम जगहों से एग्रीकल्चर कोर्स कराए जाते

हैं. पालीटेकनिक स्कूल आफ हार्टीकल्चर जूनागढ़, एग्रीकल्चर विश्वविद्यालय जूनागढ़ और डिपार्टमेंट आफ बाटनी हिसलाय कालेज नागपुर जैसी जगहों से डिप्लोमा कोर्स भी किए जा सकते हैं.

40फीसदी बढ़ रहा फूलों का कारोबार

Floricultureशादी का मंडप हो या किसी के स्वागत की तैयारी, फूलों की सजावट सब से जरूरी होती है. रोज के कामकाज में फूलों की सजावट का ज्यादा इस्तेमाल होने से तरहतरह के फूलों की मांग बढ़ गई है. अब सजवाट और लाइट के हिसाब से अलगअलग रंगों के फूलों की मांग बढ़ गई है. इसी वजह से तरहतरह के देशी और विदेशी फूलों की खेती करने वालों की तादाद बढ़ गई है. पहले किसान गेंदा और गुलाब की खेती तक ही अपने को सीमित रखते थे, मगर अब नएनए फूलों की मांग बढ़ने से रंगबिरंगे विदेशी फूलों की खेती भी लाभदायक हो गई है. जो फूल लोकल बाजार में नहीं मिलते हैं, वे बडे़ शहरों और विदेशों तक से मंगाए जाते हैं. अपने देश के भी बहुत सारे किसान विदेशों में फूलों को भेजते हैं.

जनवरी से ले कर दिसंबर तक हर महीने में कोई न कोई खास दिन जरूर होता है, जिस में बहुत सारे लोग एकदूसरे को बधाई देते हैं. बधाई देने के लिए फूलों के बुके से अच्छा दूसरा कुछ नहीं होता है. इस के अलावा जन्मदिन या अन्य मौकों पर शुभकामना संदेश देने के लिए भी फूलों के गुलदस्ते बहुत काम के होते हैं.

जिस तरह से फूलों की बाजार में मांग बढ़ी है,उसी के मुताबिक फूलों की खेती का दायरा भी बढ़ गया है. किसानों के लिए फूलों की खेती चमकते सोने के समान हो गई है. देशी फूलों के साथसाथ अब बहुत सारे विदेशी फूलों की खेती भी भारतीय किसानों ने करनी शुरू कर दी है. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ और आसपास के जिलों की बात करें, तो रायबरेली, हरदोई, कन्नौज, बाराबंकी और कानपुर में गुलाब, गलोडियस, रजनीगंधा और जरबेरा जैसे फूलों की खेती होती है. इस के अलावा उत्तराखंड से बहुत सारे फूल आते हैं. दिल्ली और बेंगलूरू की फूल मंडियों से बहुत सारे देशी और विदेशी फूल मंगवाए जाते हैं.

इन फूलों में तमाम तरह की किस्में होती हैं. फूलों की डिमांड का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि शादीविवाह के सीजन में मंडी से फूल गायब हो जाते हैं. फूलों की खेती करने वाले तमाम किसान महसूस कर रहे हैं कि फूलों का बढ़ता कारोबार उन के लिए सुनहरा भविष्य ले कर आया है.

Thandai : गरमियों में पीजिए कूलकूल ठंडाई

Thandai: गरमी के मौसम में ठंडाई का अपना अलग ही मजा होता है. पहले के समय में शादी समारोहों में ठंडाई (Thandai) का इस्तेमाल होता था. अब बहुत सारे लोग कोल्ड ड्रिंक की जगह ठंडाई पीने लगे हैं. ठंडाई ज्यादातर बादाम के इस्तेमाल से बनती है. बादाम की तासीर गरम होती है, लेकिन उन को पानी में रात भर भिगो दें तो उन की तासीर बदल कर ठंडी हो जाती है. होली के अवसर पर भी लोग ठंडाई पी कर इस का आनंद लेते हैं.

ज्यादातर बनीबनाई ठंडाई को पानी या दूध में डाल कर इस्तेमाल किया जाता है. मिश्रांबू ठंडाई का बहुत मशहूर ब्रांड है. यह वाराणसी से बनाना शुरू हुआ था. साल 1924 में वाराणसी के रहने वाले सच्चिदानंद दुबे ने मिश्रांबू को तैयार किया. यह मेवों के मिश्रण से तैयार किया जाता है. अब पीढ़ी दर पीढ़ी यह कारोबार चल रहा है. अगर खुद ठंडाई बना कर पीना पसंद करें, तो यह काम काफी आसान होता है.

ठंडाई बनाने की सामग्री

बादाम 50 ग्राम, खसखस 30 ग्राम, तरबूज के छिले हुए बीज 20 ग्राम, खरबूजे के छिले हुए बीज 20 ग्राम, ककड़ी के छिले हुए बीज 20 ग्राम, सौंफ 50 ग्राम, काली मिर्च 10 ग्राम, देसी गुलाब की सूखी पंखुडि़यां 20 ग्राम, केसर 5-6 पत्तियां, हरी इलायची 5, बीज निकाले हुए मुनक्का 8, मिश्री 10 ग्राम, दूध 1 लिटर.

ठंडाई बनाने की विधि

बादाम, खसखस, तरबूज के बीज, खरबूजे के बीज, ककड़ी के बीज, सौंफ, गुलाब की पंखुडि़यां, काली मिर्च, इलायची और मुनक्का को पानी में भिगो दें. सभी सामग्री को रात भर (करीब 5-6 घंटे) पानी में भीगने दें. सुबह बादाम के छिलके हटा दें और सारी सामग्री पानी सहित अच्छी तरह बारीक पीस लें. सिलबट्टे पर पीस सकें तो बहुत अच्छा है या ग्राइंडर में जितना हो सके उतना बारीक पीस लें. इस का पानी कतई न फेंके. यह पानी बहुत फायदेमंद होता है. पिसा हुआ तैयार पेस्ट अलग रख लें.

दूध में मिश्री व केसर डाल कर उबालें और ठंडा कर लें. पिसी हुई सामग्री में 1 गिलास पानी डाल कर साफ कपड़े या बारीक छलनी से छान लें. थोड़ाथोड़ा कर के पानी डालते जाएं और छानते जाएं. ये करीब 2 गिलास होना चाहिए. छलनी से निकले पानी में तैयार किया दूध मिला दें. इस तरह आप के पास 6 गिलास स्वादिष्ठ ठंडाई तैयार हो जाएगी. इस स्वादिष्ठ और फायदेमंद ठंडाई का मजा परिवार वालों या दोस्तों के साथ लें.

ठंडाई के फायदे

ठंडाई पीने से गरमी की वजह से शरीर को होने वाले नुकसानों से बचाव होता है. आंखों में जलन व पेशाब में जलन जैसी तकलीफें इस से ठीक हो जाती हैं. ठंडाई पीने से लू से बचाव होता है. बादामों से भरपूर ठंडाई पीने से दिमाग की कूवत में इजाफा होता है. यह दिल के लिए भी फायदेमंद होती है. ठंडाई पीने से पेट साफ रहता है और कफ में आराम मिलता है. ठंडाई में मौजूद तरबूज, खरबूज व ककड़ी के बीज किडनी और पेशाब संबंधी तकलीफों में फायदा पहुंचाते हैं.

सेवपूरी (Sevpuri) कई तरह के स्वाद

एक तरह की चाट है सेवपूरी, जिसे चाट के साथ ही साथ नाश्ते के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है, उत्तर भारत के सभी प्रदेशों में इसे खाया जाता है. कई जगहों पर इसे पपड़ी चाट के नाम से भी जाना जाता है.

रेस्तरां से ले कर सड़क पर लगने वाली चाट की दुकानों तक में यह खूब बिकती है. सेवपूरी की सब से खास बात यह है कि इस में कई तरह के स्वाद मिलते हैं. यह 30 रुपए प्रति प्लेट से ले कर 80 रुपए प्रति प्लेट तक में बिकती है. 1 प्लेट में 6 से ले कर 8 सेवपूरी होती हैं. मुंबई में यह स्ट्रीट फूड की तरह बिकती है. सेवपूरी या पपड़ी चाट को बनाना बहुत ही सरल होता है.

पपड़ी चाट के कारीगर निशांत कुमार बताते हैं कि सब से पहले पूरी या पपड़ी बनानी होती है. यह करारी और छोटे आकार की होती है. इसे मैदे से बनाया जाता है. इसे तेल या घी में फ्राई कर लेते हैं. जब करारी पूरी तैयार हो जाती है, तो उस में डालने के लिए चाट को तैयार करते हैं. इमली और खजूर की चटनी पहले से बना लें. जब चटनी तैयार हो जाए तो पपड़ी चाट को तैयार करने की शुरुआत करें. अगर आप 16 पपड़ी की चाट तैयार करना चाहते हैं, तो निम्न सामग्री की जरूरत होती है.

पपड़ी चाट पर डालने के लिए सामग्री : 16 पपड़ी, 2 कप आलू कटे हुए, चौथाई कप मूंग उबली हुई, आधा कप टमाटर कटा हुआ, आधा कप प्याज कटा हुआ, 6 चम्मच इमलीखजूर की चटनी, 4 चम्मच हरी चटनी, आधा चम्मच चाट मसाला, आधा कप सेव, 1 चम्मच कटा हरा धनिया.

पपड़ी चाट बनाने की विधि : सब से पहले हरी चटनी तैयार करें. इस को लहसुन, खटाई और हरा धनिया डाल कर बनाया जाता है. 1 प्लेट में 4 पपड़ी रखना ठीक रहता है. पपड़ी अलगअलग कर के रखें. अब हर पपड़ी में आधा चम्मच कटा आलू, प्याज, टमाटर, मूंग रख दें. फिर हरी और इमली खजूर की चटनी डाल दें. इस के बाद ऊपर से महीन किस्म के सेव डाल दें. बारीक कटे प्याज और हरी धनिया से इसे सजा दें. चाट बनाने का काम खाने के समय ही करें. इसे पहले से बना कर न रखें. पहले से बनाई गई चाट की पपड़ी में कुरकुरापन नहीं रह जाता है. पपड़ी चाट का मजा तभी आता है, जब चाट में कुरकुरापन रहता है.

मुंबई और कई शहरों में यह चाट एक रोजगार का जरीया भी है. सड़कों के किनारे इसे खूब बेचा जाता है. सेवपूरी मुंबई में भेल पूरी, पाव भाजी और बड़ा पाव जितनी ही मशहूर है. यहां आने वाले समुद्र के किनारे टहलते हुए इसे खूब खाते हैं. सेवपूरी को तैयार करने में सब से अहम रोल इस के साथ परोसी जाने वाली चटनी का होता है. चटनी का स्वाद ही इसे खास बनाता है.

सेवपूरी को बनाने में प्रयोग होने वाले सेव काफी महीन होने चाहिए. सेव बनाने में अच्छी किस्म के बेसन और तेल का इस्तेमाल किया जाना चाहिए. इसी तरह से पपड़ी को भी बनाने के लिए भी अच्छी किस्म के मैदे और तेल का इस्तेमाल करें.

एक बार लोगों की जबान पर सेवपूरी के स्वाद के चढ़ने भर की देर है. इस के बाद दुकान चलने में कोई दिक्कत नहीं होती है. लोगों को चाट में अपने मनपसंद स्वाद का ही इंतजार होता है. कुरकुरा, मीठा और तीखा स्वाद पपड़ी चाट या सेवपूरी को खास बनाता है.

पशुओं के नवजातों (Newborn Animals) में खीस का महत्व

पशुओं के नवजात बच्चों के जन्म से ले कर युवा अवस्था तक अच्छी प्रबंधन व्यवस्था, पशुओं और किसानों दोनों के लिए एक सफल और लाभदायक है. नवजात पशु के अच्छे  स्वास्थ्य के लिए खीस प्रबंधन बहुत महत्वपूर्ण है.

ब्यांने के बाद गाय जो पहला पीला और गाढ़ा दूध देती है, उसे ‘कोलोस्ट्रम’ यानी ‘खीस’ कहा जाता है. नवजात बच्चे के लिए यह दूध बहुत ही गुणकारी है, क्योंकि यह उन्हें संक्रामक रोगों से बचाता है. पोषक तत्वों और एंटीबौडी से यह भरपूर होता है. खीस में मौजूद एंटीबौडीज नवजात बच्चे को उन की शुरुआती सुरक्षा प्रदान करते हैं.

लगभग सौ साल पहले एक शोध से यह पता चला था कि जिन नवजात बछड़ों को दूध पिलाया गया था, उन में से कई की मृत्यु दस्त लगने के कारण हो गई थी, जबकि जिन बछड़ों को जन्म के बाद ही खीस खिलाया गया, वे स्वस्थ रहे. इसलिए यह माना गया कि खीस में कुछ महत्वपूर्ण तत्व होते हैं, जो नवजात पशु को प्रतिरक्षा (बीमारियों से बचाव) प्रदान करते हैं और ब्यांत के बाद मृत्यु दर को काफी कम करते हैं.

जन्म के तुरंत बाद नवजात बछड़े में बीमारी से सुरक्षा का अभाव होता है, क्योंकि एंटीबौडी गाय की नाल से हो कर भ्रूण के संचार तंत्र तक नहीं पहुंच पाती है, इसलिए उन्हें संक्रामक रोग होने का खतरा हमेशा बना रहता है. हालांकि नवजात बछड़े में एंटीबौडी पैदा करने की क्षमता होती है, लेकिन यह क्षमता बहुत कम होती है.

नवजात बछड़े  दस्त और पेट की समस्याओं से पीड़ित रहते हैं. मनुष्यों में यह गर्भावस्था के दौरान मां से नवजात शिशु में मिल जाता है, इसलिए उन में जन्म से पहले ही बीमारियों से लडने की क्षमता होती है, वहीं पशुओं में यह प्रणाली जन्म के समय विकसित नहीं होती है. इसलिए, नवजात पशुओं को संक्रामक रोगों से बचाना बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है.

खीस में मातृ एंटीबौडी या विभिन्न प्रकार की प्रतिरक्षा कोशिकाएं मौजूद होती हैं, जो नवजात को संक्रामक रोगों से बचाती हैं. ये एंटीबौडीज बड़े आकार के प्रोटीन अणुओं से बनते हैं. यदि संक्रामक रोगों के रोगाणु नवजात पर हमला करते हैं, तो ये प्रतिरक्षा कोशिकाएं उन रोगाणुओं से जुड जाती हैं और उन्हें नष्ट कर देती हैं. खीस में मौजूद एंटीबौडीज नवजात बछडों को संक्रामक रोगों से बचाता है.

खीस पिलाने का उचित समय

यदि जन्म के तुरंत बाद खीस नहीं पिलाया जाता है, तो नवजात में प्रतिरक्षा कोशिकाओं को अवशोषित करने की क्षमता कम हो जाती है, इसलिए खीस को एक घंटे के भीतर नवजात को जरूर देना चाहिए.

इसलिए जन्म के बाद नवजात बछड़े को जितनी जल्दी हो सके यानी जन्म के 2 घंटे के भीतर खीस देना चाहिए. नवजात को बीमारी के खिलाफ प्रतिरक्षा प्राप्त करने के लिए अधिमानतः 6 घंटे के भीतर और निश्चित रूप से जन्म के 12 घंटे के भीतर खीस जरूर देना चाहिए.

यदि 12 घंटे के भीतर भी नवजात को खीस न पिलाई गई हो, तो जन्म के 24 से 28 घंटों के भीतर खीस का सेवन करा देना चाहिए. जन्म के 48 घंटों के बाद नवजात को खीस खिलाने का बहुत कम या कोई लाभ नहीं होता है.

खीस की मात्रा

नवजात को उस के शरीर के वजन का 1/10 भाग के बराबर खीस पिलानी चाहिए यानी हर 10 किलोग्राम शरीर के वजन के लिए 1 किलोग्राम खीस दिया जाना चाहिए. उदाहरण के लिए, यदि नवजात का वजन 25 किलोग्राम है, तो इसे पूरे दिन में 2.5 किलोग्राम खीस 3 बराबर भागों में बांट कर दिया जाना चाहिए.

आमतौर पर पशुपालकों के बीच यह गलत सोच रहती है कि खीस पिलाने से नवजात की मृत्यु हो सकती है और खीस निकलने से गाय या भैंस अपना वजन कम कर लेती है, इसलिए  पशुपालक न तो खीस निकालते हैं और न ही नवजात बछडों को खीस पीने देते हैं. यह वजह पशुओं और नवजात दोनों की सेहत के लिए ठीक नहीं है.

यदि गाय ब्यांने के बाद दूध नहीं दे रही है  या ब्यांने के दौरान मर गई है और नवजात को खीस उपलब्ध नहीं हो सका है, तो उन्हें किसी दूसरी गाय का खीस भी दिया जा सकता है. खीस के अभाव की स्थिति में 560 मिलीलिटर दूध, 280 मिलीलिटर पानी, 1/2 चम्मच अरंडी का तेल और एक फेंटा हुआ पूरा अंडा अच्छी तरह मिला लें. यह मिश्रण नवजात को 5 दिनों तक देना चाहिए. इस से नवजात का पाचन तंत्र भी साफ होता है और कार्यक्षमता भी बढ़ती है.

खीस में जरूरी पोषक तत्व, विटामिन, खनिज और जैविक योगिक होते हैं, जो नवजात के अच्छे विकास और वृद्धि के लिए जरूरी है. यह परिपक्व दूध की तुलना में प्रोटीन, वसा, और ऊर्जा के स्तर में परिपूर्ण होता है. खीस में दूध की तुलना में अधिक मात्रा में प्रोटीन (14 फीसदी) होता है, जो बछड़े के विकास में मदद करता है.

दूध की तुलना में खीस में वसा की मात्रा 6-10 फीसदी तक अधिक होती है. यह उच्च वसा जीवन के शुरुआती दिनों के दौरान नवजात शिशु की चयापचय जरूरतों के लिए आवश्यक ऊर्जा प्रदान करती है. खीस में कैल्शियम, फास्फोरस और आयरन भरपूर होता है.

खीस नवजात की कोशिका वृद्धि, ऊतक मरम्मत और पेशियों की वृद्धि और विकास को प्रोत्साहित करता है, जो नवजातों में तेजी से वजन बढ़ाने और पेशियों के विकास को मजबूत बनाता है. इस के अलावा खीस पोषण अवशोषण, आंतों के विकास और अच्छे जीवाणुओं के संवर्धन को बढ़ाते हैं, इसलिए क्रिया विकास को प्रोत्साहित करते हैं और नवजात के विकास के लिए मूल बुनियाद रखते हैं.

पौलीहाउस (Polyhouse) में शिमला मिर्च और बैगन की खेती

पौलीहाउस एक प्रकार की संरक्षित खेती है, जिस में लगने वाली फसलों को बाहरी मौसम, कीड़े व बीमारियों से बचाने के लिए एक घर के आकार का ढांचा तैयार कर उस को प्लास्टिक शीट से ढका जाता है. यह फसलों को उचित तापमान और आवश्यक आर्द्रता को बनाए रखने में मदद करता है.

– पौलीहाउस में खेती करने से खुले खेतों के मुकाबले 4 से 5 गुना ज्यादा पैदावार प्राप्त कर सकते हैं.

– पौलीहाउस फसल को सुरक्षित रखने में मदद करता है.

– किसान पौलीहाउस में खीरा, गाजर, धनिया, टमाटर, पालक, पत्तागोभी, मिर्च, ब्रोकोली, बैगन, भिंडी, शिमला मिर्च आदि सब्जियों, फलों, फूलों और सजावटी पौधों की बेमौसम खेती कर के अच्छी कमाई कर सकते हैं.

– पौलीहाउस में ज्यादातर किसान टमाटर, खीरा और शिमला मिर्च की खेती करते हैं, क्योंकि इन की मांग बाजार में सालभर बनी रहती है.

– अधिक बारिश वाले क्षेत्रों के किसानों के लिए पौलीहाउस बहुत अच्छी तकनीकी है.

– पौलीहाउस में फसलों में रोग और कीट बहुत कम लगते हैं.

– पौलीहाउस में किसान उच्च गुणवत्ता वाली नर्सरी की पौध तैयार कर के अपने लिए एक अच्छा व्यापार शुरू कर सकते हैं.

–  पौलीहाउस में उगाई गई फसलें बहुत चमकदार एवं अच्छी होती हैं, जिन की मंडियों में अच्छी कीमत मिलती है.

– पौलीहाउस को हराभरा, ओला, पाला, आंधीतूफान, तेज बारिश, अधिक तापमान, आर्द्रता, धूप, रोग व कीट आदि से फसल की सुरक्षा करता है.

मैदानी व घाटी वाले क्षेत्रों में शिमला मिर्च बरसात व सर्दियों में और पर्वतीय क्षेत्रों में गरमियों में उगाई जाती है, किंतु शिमला मिर्च की खेती पौलीहाउस में सालभर की जा सकती है.

शिमला मिर्च एक लोकप्रिय सब्जी है. इस के लिए अधिक निवेश की आवश्यकता होती है, किंतु यह अधिक मुनाफा भी देती है. शिमला मिर्च की खेती के लिए पौलीहाउस में तापमान को लगभग 25 से 30 डिगरी सैल्सियस के बीच रखना आवश्यक होता है.

पौलीहाउस में बैगन की खेती करने से पौधों में वानस्पतिक वृद्धि अधिक होती है, जबकि फलत कम होती है. अधिक उत्पादन के लिए बैगन की खेती खुले में करना ही लाभप्रद होता है. कुछ ही कारणों पर बैगन को पौलीहाउस में लगाना लाभदायक होता है. जिस क्षेत्र में वर्षा अधिक होती है, तापमान में उतारचढाव अधिक रहता हो, कीट व बीमारियों का अधिक प्रकोप हो, ऐसे क्षेत्रों में पौलीहाउस में बैगन की खेती करने से फसल की उचित देखभाल व वृद्धि होती है और फसल को कीट एवं बीमारियों से बचाने में सुविधा होती है.

सब्जियों की संरक्षित खेती में शिमला मिर्च का बहुत अधिक महत्व है. वैसे तो शिमला मिर्च खुले खेत में उगाया जा सकता है. लेकिन ऐसे में फलों की गुणवत्ता में कमी आ जाती है, जिस से किसानों को बाजार में फसल का अच्छा दाम नहीं मिलता. किसानों द्वारा अनेक रंगों की शिमला मिर्च व बैगन की खेती सफलतापूर्वक की जा सकती है, जिस में हरी, लाल, पीली, नारंगी, बैंगनी और सफेद रंग की शिमला मिर्च और सफेद, बैंगनी, हरे रंग की गोल व लंबी बैगन की किस्में शामिल हैं. इन सभी रंगों की संकर प्रजातियां भिन्नभिन्न हैं. इन का चुनाव किसानों को ध्यानपूर्वक करना चाहिए. किसानों को किस्मों का चयन करते समय सब्जी विशेषज्ञ से जानकारी प्राप्त करना बेहद जरूरी है. शिमला मिर्च के फल में विटामिन ए, विटामिन सी, कैल्शियम, मैग्नीशियम, फास्फोरस और पोटैशियम, जबकि बैगन में नियासिन, थायमिन, विटामिन सी, विटामिन बी 6, विटामिन ए और विटामिन ई पाया जाता है.

बीजोपचार :  बीज को हमेशा बोआई से पूर्व उपचारित कर के ही बोना चाहिए, जिस से पौधे अच्छी वृद्धि करें, रोगमुक्त और सेहतमंद रहें. इस के लिए बीजामृत लाभदायक होता है. बीजामृत घर पर आसानी से बनाया जा सकता है. बीजों को बोआई से पूर्व 12 से 24 घंटे पानी में भिगो देना चाहिए, जिस से बीज के अंकुरण में वृद्धि होती है.

पौधशाला/नर्सरी : शिमला मिर्च व बैगन की पौध नर्सरी में भी तैयार की जाती है. पौध तैयार करने के लिए पौधशाला वाले क्षेत्र को समतल बनाना चाहिए. इस के लिए खेत की 2 से 3 जुताई करने के बाद खेत में छोटीछोटी क्यारियां बनानी चाहिए. क्यारियां 10 से 15 सैंटीमीटर ऊंची होनी चाहिए और 2 क्यारियों के बीच में एक जल निकास हेतु नाली होनी चाहिए.

मिट्टी की जांच : नर्सरी तैयार होने के बाद जिस पौलीहाउस में पौध रोपण होना है, उस पौलीहाउस में मिट्टी की जांच करवाना आवश्यक है, जिस से हमें ज्ञात रहे कि हमारी मिट्टी में कौनकौन से पोषक तत्व हैं और किनकिन पोषक तत्वों की मिट्टी को आवश्यकता है, जिस से खेत में आवश्यकतानुसार उर्वरकों का संतुलित मात्रा में प्रयोग किया जा सके. इस से अधिक उत्पादन होता है.

प्रो-ट्रे पौधशाला : शिमला मिर्च व बैगन की पौध पौलीहाउस में ही तैयार करनी चाहिए. पौलीहाउस में पौध तैयार करने से समय कम लगता है और पौधे भी स्वस्थ रहते हैं. पौधों में मृदाजनित कीटों और बैक्टीरिया के द्वारा पहुंचाए जाने वाले नुकसान से बचने के लिए प्रो-ट्रे पौधशाला विधि की मदद ली जा सकती है और इस से मृदारहित नर्सरी भी तैयार की जा सकती है. इस विधि में अनुपजाऊ मिट्टी के स्थान पर नारियल का बुरादा, राख, सड़ा गोबर, बालू, परलाइड, पिटमौस का प्रयोग किया जा सकता है.

पौलीहाउस में खेत की तैयारी : जब तक पौध तैयार होती है, तब तक जिस पौलीहाउस में पौध रोपण होना है, उस पौलीहाउस में यदि फसल खड़ी है, तो फसल की कटाई समय पर कर के खेत की तैयारी कर लेनी चाहिए. पौध 25 से 30 दिन में रोपण के लिए तैयार हो जाती है. यदि किसी कारणवश किसान नर्सरी तैयार नहीं कर पाए हैं, तो इस के लिए पौधों को किसी सरकारी रजिस्टर्ड नर्सरी से खरीद लेना चाहिए. पौधे ऐसे खरीदें, जो बिलकुल स्वस्थ हो. इन पौधों की रोपाई को समतल और मेड दोनों तरीके से लगा सकते हैं.

Bangan (Brinjal)

उर्वरक : वर्मी कंपोस्ट और जैविक खाद का प्रयोग फसल की बेहतर वृद्धि के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है. पौलीहाउस में पौध रोपाई से 4 दिन पूर्व नीम की खली, ट्राईकोड्रमा, सूडोमोनास व 150 से 200 किलोग्राम अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद मिट्टी में मिला कर क्यारी तैयार कर लें.

पौध रोपण : रोपण करने के लिए खेत में छोटेछोटे थाले बना कर पौध लगानी चाहिए. थाले बनाने से पौधों को पानी व खाद देने में आसानी होती है और पौध लगाने के तुरंत बाद पौधों की सिंचाई कर देनी चाहिए, जिस से पौधे स्वस्थ रहें. पौधों को निश्चित अंतराल में सिंचाई की आवश्यकता होती है, जिस के लिए बूंदबूंद सिंचाई विधि का प्रयोग भी कर सकते हैं. समय पर खेत से अनावश्यक पौधों को निकालते रहना चाहिए, जिस से पौधे अच्छी वृद्धि कर सकें.

खरपतवार नियंत्रण : पौधों में खरपतवार नियंत्रण के लिए प्राकृतिक विधि का इस्तेमाल कर निराईगुड़ाई करनी चाहिए. इन में 3 से 4 निराईगुड़ाई की आवश्यकता होती है. पहली रोपाई के 20 दिन और बाकी की 15 दिन के अंतराल में की जाती है. शिमला मिर्च को 40 से 45 सैंटीमीटर व बैंगन को 55 से 60 सैंटीमीटर की दूरी पर लगाना चाहिए.

रोपाई का समय : मैदानी भागों में शिमला मिर्च व बैगन की खेती के लिए जूनजुलाई, अगस्तसितंबर और नवंबरदिसंबर, जबकि पर्वतीय क्षेत्रों में मार्च से मई तक का समय पौध तैयार करने से ले कर पौध रोपाई के लिए उचित समय है. बीज के अंकुरण के लिए 16 से 29 और पौधे की अच्छी बढत के लिए 21 से 27 डिगरी सैल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है.

प्रजातियां : व्यवसायिक स्तर पर लगाई जाने वाली शिमला मिर्च में कैलिर्फोनिया वंडर, यलो वंडर, इंद्रा, महाभारत, आशा, नामधारी-280, चौकलेट वंडर और बैंगन में स्वर्ण शक्ति, पूसा हाईब्रिड 5, पूसा हाईब्रिड 6, पूसा परपल लौंग, पूसा परपल राउंड, अर्का नवनीत, पंत ऋतुराज, पंत सम्राट प्रमुख प्रजातियां हैं.

मिट्टी और मिट्टी पीएच मान : शिमला मिर्च व बैगन की खेती किसी भी उपजाऊ भूमि में की जा सकती है, किंतु भूमि उचित जल निकास वाली अवश्य हो. मिट्टी का पीएच माकन शिमला मिर्च की खेती के लिए 6.0 से 6.5 और बैंगन की फसल के लिए 5 से 7 के मध्य होना चाहिए. पौधों को अच्छे से विकास करने के लिए गरम जलवायु की आवश्यकता होती है. सर्दियों के मौसम में गिरने वाला पाला इन के पौधों को नुकसान पहुंचाता है.

पौधों की देखरेख : रोपाई के 20 दिन बाद पौधों को ऊपर से काट देना चाहिए,  जिस से पौधों में अनेक शाखाएं निकलती हैं. अच्छी पैदावार के लिए 2 या 3 शाखाएं ही रखते हैं. शिमला मिर्च व बैगन के उच्च गुणवत्ता वाले फलों का उत्पादन लेने के लिए छोटे, विकृत निम्न गुणवत्ता वाले फलों को निकलना आवश्यक है.

प्रमुख रोग व कीट : पौलीहाउस में रोग व कीटों का प्रकोप कम होता है. शिमला मिर्च की फसल के प्रमुख रोग फल सड़न, चूर्णिल आसिता, मोजेक वायरस और प्रमुख कीटों में माहू, थ्रिप्स, माइट, सफेद मक्खी आदि हैं.

बैगन के प्रमुख रोग फल सड़न, झुलसा रोग, छोटी पत्ती रोग और प्रमुख कीटों में फल बेधक, तना बेधक, माहू, थ्रिप्स, सफेद मक्खी का प्रकोप होता है. यदि इन कीटों व रोगों की रोकथाम समय पर नहीं की जाती है, तो पैदावार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है. इस के लिए जैविक एवं प्राकृतिक विधि से कीटों व रोगों की रोकथाम करनी चाहिए.

Shimla Mirch (Capsicam)

फलों की तुड़ाई का समय : शिमला मिर्च के फलों की तुड़ाई मुख्य रूप से रोपण के 65 से 90 दिनों और बैंगन के फलों की तुड़ाई रोपणके तकरीबन 50 से 70 दिन के बाद शुरू होती है. फलों की तुड़ाई उन की किस्म के आधार पर अलगअलग समय पर की जाती है. फलों की तुड़ाई सुबह या शाम के समय ही करनी चाहिए. इस के लिए चाकू की सहायता से डंठल सहित फलों को पेड़ से हटा दिया जाता है.

फलोंका वर्गीकरण : फलों की तुड़ाई के बाद फलों को उन के आकार और वजन के अनुसार वर्गीकृत करते हैं.

उपज : एक उचित ढंग से प्रबंधित फसल से प्रति पौधा लगभग 5 से 7 किलोग्राम उपज प्राप्त होती है. फल जब 225 से 250 ग्राम के हो जाएं, तो किसानों को उस अवस्था में उसे तोड़ लेना चाहिए.

ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई: फसल और जल संवर्धन दोनों के लिए लाभकारी

इस मौसम में जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करने पर खेत की ऊपर की मिट्टी नीचे और नीचे की मिट्टी ऊपर हो जाती है. इस जुताई से जो ढेले पड़ते हैं, वह धीरेधीरे हवा व बरसात के पानी से टूटते रहते हैं. साथ ही, जुताई से मिट्टी की सतह पर पड़ी फसल अवशेष और  पत्तियां, पौधों की जड़ें एवं खेत में उगे हुए खरपतवार आदि नीचे दब जाते हैं, जो सड़ने के बाद खेत की मिट्टी में जीवाश्म, कार्बनिक खादों की मात्रा में बढ़ोतरी करते हैं, जिस से भूमि की उर्वरता स्तर, मिट्टी की भौतिक दशा और जल धारण करने की क्षमता में वृद्धि होती है.

ग्रीष्मकालीन जुताई करने से खेत के खुलने से प्रकृति की कुछ प्राकृतिक क्रियाएं भी सुचारु रूप से खेत की मिट्टी पर प्रभाव डालती हैं. वायु और सूर्य की किरणों का प्रकाश मिट्टी के खनिज पदार्थों को पौधों के भोजन बनाने में अधिक सहायता करते हैं. इस के अतिरिक्त खेत की मिट्टी के कणों की संरचना (बनावट) भी दानेदार हो जाती है, जिस से भूमि में वायु का संचार एवं जल धारण क्षमता बढ़ जाती है.

इस गहरी जुताई से तेज धूप से खेत के नीचे की सतह पर पनप रहे कीड़ेमकोड़े, बीमारियों के जीवाणु, खरपतवार के बीज आदि मिट्टी के ऊपर आने से खत्म हो जाते हैं. साथ ही, जिन खेतों में गेहूं व जौ की फसल में निमेटोड का प्रयोग होता है, वहां पर इस रोग की गांठें जो मिट्टी के अंदर होती हैं, जो जुताई करने से ऊपर आ कर कड़ी धूप में मर जाती हैं. इसलिए ऐसी जगहों पर ग्रीष्मकालीन जुताई करना बहुत जरूरी होता है.

ग्रीष्मकालीन जुताई के लाभ :

– मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की बढ़ोतरी होती है.

– मिट्टी के पलट जाने से जलवायु का प्रभाव सुचारु रूप से मिट्टी में होने वाली प्रतिक्रियाओं पर पड़ता है. वायु और सूर्य के प्रकाश की सहायता से मिट्टी में मौजूद खनिज अधिक सुगमता से पौधे के भोजन में बदल जाते हैं.

– ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई कीट एवं रोग नियंत्रण में सहायक है. हानिकारक कीड़े व रोगों के रोगकारक भूमि की  सतह पर आ जाते हैं और तेज धूप से नष्ट हो जाते हैं.

– ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई नियंत्रण में भी सहायक है. कांस, मोथा आदि के उखड़े हुए भागों को खेत से बाहर फेंक देते हैं. अन्य खरपतवार उखड़ कर सूख जाते हैं. खरपतवारों के बीज धूप से नष्ट हो जाते हैं.

– कुछ खेती वर्षा पर निर्भर करती है. अनुसंधानों से यह सिद्ध भी हो चुका है कि ग्रीष्मकालीन जुताई करने से 31 फीसदी बरसात का पानी खेत में समा जाता है.

– अनुसंधान के नतीजों में यह पाया गया है कि ग्रीष्मकालीन जुताई करने से भूमि के कटाव में 66.5 फीसदी तक की कमी आती है.

ग्रीष्मकालीन जुताई के लिए मुख्य बातें :

– ग्रीष्मकालीन जुताई हर 3 साल में एक बार जरूर करें.

– जुताई के बाद खेत के चारों ओर एक ऊंची मेंड़ बनाने से वायु और जल द्वारा मिट्टी का क्षरण नहीं होता है और खेत वर्षा जल सोख लेता है.

– ग्रीष्मकालीन जुताई हमेशा मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी करनी चाहिए, जिस से खेत की मिट्टी के बड़ेबड़े ढेले बन सकें, क्योंकि ये मिट्टी के ढेले अधिक पानी सोख कर खेत के अंदर नीचे उतरेगा, जिस से भूमि की जलधारण क्षमता में सुधार होता है.

– यदि किसान अपने खेतों की ग्रीष्मकालीन जुताई करेंगे, तो निश्चित ही आने वाली खरीफ मौसम की फसल न केवल कम पानी में हो सकेगी, बल्कि बरसात कम होने पर भी अच्छी फसल हो सकेगी. साथ ही, खेत से उपज भी अच्छी मिलेगी, लागत भी कम आए‌गी और किसानों की आय भी बढ़ेगी.

उपरोक्त फायदों को ध्यान में रखते हुए किसान को फसल उत्पादन के लिए हमेशा ग्रीष्मकालीन में जुताई अवश्य करनी चाहिए.