पशुओं में गर्भाधान

गोवंशीय पशुओं का बारबार गरमी में आना और स्वस्थ व प्रजनन योग्य नर पशु से गर्भाधान या फिर कृत्रिम गर्भाधान सही समय पर कराने पर भी मादा पशु द्वारा गर्भधारण न करने की अवस्था को ‘रिपीट ब्रीडिंग’ कहते हैं.

ऐसे पशुओं का आमतौर पर नियमित मदचक्र 18-22 दिन होता है और अंग से कोई मवाद या गंदा स्राव आदि नहीं आता है, फिर भी पशु को 3 या इस से अधिक बार गर्भाधान कराने पर भी बच्चा नहीं ठहरता है.

पशुओं में ब्रीडिंग की दर 10-20 फीसदी है, जो कि खराब प्रबंधन व कुपोषण की स्थिति में और ज्यादा हो सकती है. अगर भू्रण की मृत्यु पुश के गाभिन होने के 8-16 दिनों के भीतर होती है, तो पशु के मदचक्र पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ता है, परंतु उस के बाद भ्रूण की मृत्यु होने की दशा में गरमी में आने का अंतराल बढ़ जाता है.

कारण

* निषेचन प्रक्रिया का न होना.

* अंडोत्सर्ग न होना या अंडोत्सर्ग के बिना गरमी में आना.

* अंडोत्सर्ग में देरी.

* अंडवाहिका मार्ग में अवरोध या फिर संक्रमण का होना.

* शुक्राणुओं और अंडाणुओं की बनावट व वंशानुगत/प्राप्त त्रुटियां या उन की अधिक उम्र.

* जननांगों में जन्मजात संरचनात्मक संबंधी त्रुटियां.

* भ्रूण की मृत्यु हो जाना.

* भ्रूण की प्रारंभिक अवस्था में मृत्यु.

* निषेचित अंडों के प्रत्यारोपण या फिर निषेचन में बाधा.

* विभिन्न प्रकार के हार्मोंस में कमी  जैसे प्रोजैस्ट्रोन में कमी व एस्ट्रोजन की अधिकता इत्यादि.

* अत्यधिक वातावरणीय ताप और आर्द्रता होना.

* गर्भाशय में संक्रमण, भू्रूणीय विसंगतियां और विभिन्न जननांगों का संक्रमण.

* प्रतिरक्षा संबंधित बीमारियां.

समाधान

* रिपीट ब्रीडिंग (बारबार गरमी में आना) वाले पशुओं को उचित मात्रा में संतुलित आहार और पर्याप्त हरा चारा यानी चारा मिश्रण अवश्य दें.

* विभिन्न प्रकार के जीवाणुओं और विषाणुजनित बीमारियों के विरुद्ध टीकाकरण और परजीवी रोगों की रोकथाम के लिए प्रबंधन करना चाहिए.

* उचित आवास व्यवस्था का प्रबंध और नियमित साफसफाई रखनी चाहिए.

* स्वच्छ व पारदर्शी योनि स्राव होने पर गर्भाधान कराना चाहिए.

* पशु को सही समय से गाभिन करवाने की सफलता की दर अधिकतम रहती है.

* ध्यान देने वाली बात यह है कि अगर पशु शाम को गरमी में आए, तो अगले दिन सुबह और यदि गरमी के लक्षण सुबह दिखाई पड़ें, तो उसी दिन शाम तक गाभिन कराने के लिए अवश्य ले जाना चाहिए.

* पशुओं में गरमी के लक्षण दिन में 2 बार (सुबह या शाम) अवश्य देखने चाहिए, जिस से गर्भाधान के उचित समय की जानकारी हासिल की जा सके.

* गर्भाधान से पहले वीर्य की जांच अवश्य करनी चाहिए. साथ ही, यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इन में प्रयुक्त सांड़ में कोई संक्रमण न हो या वीर्य में अग्र दिशा में गतिशील शुक्राणुओं की उचित संख्या (5-10 मिलियन) होनी चाहिए. इस के अलावा हिमीकृत वीर्य का तरलीकरण प्रबंधन बहुत ही सावधानी से करना चाहिए.

* यह काम कृत्रिम गर्भाधान विशेषज्ञों द्वारा ही किया जाना चाहिए और वीर्य को गर्भाशय ग्रीवा से गर्भाधान की स्थिति में सांड़ों को समयसमय पर बदलते रहना चाहिए.

* समयसमय पर ऐसे पशुओं के अंगों की जांच पशु विशेषज्ञों द्वारा कराई जानी चाहिए.

* जननांगों की संक्रमित अवस्था में गर्भाधान नहीं कराना चाहिए.

* ब्याने के तुरंत बाद जननांगों का संक्रमण रोकने के लिए उचित उपचार व रोकथाम करनी चाहिए. साथ ही, माहिर पशु चिकित्सक की सलाह से उन की देखरेख में काम करना चाहिए.

अधिक जानकारी के लिए पशुपालक अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ वैज्ञानिकों से संपर्क करें.

नई तकनीक से चारा उत्पादन

भारत में किसानों की आमदनी का मुख्य जरीया खेती के अलावा दूध उत्पादन भी है. भारत दूध के उत्पादन में दुनिया में पहले स्थान पर है. किसान दूध पैदा करने के लिए गाय, भैंस और बकरियां पालते हैं. इन से उन्हें भरपूर लाभ होता है.

पशुपालन के लिए सरकार किसानों को प्रोत्साहित कर रही है. इतना सब होने के बावजूद देश में पशुओं के लिए पौष्टिक चारा मुहैया नहीं हो पा रहा है, जिस से उन की दूध देने की कूवत पर असर पड़ रहा है. जनसंख्या के मुकाबले खेतों का दायरा कम होता जा रहा है, जिस की वजह से पशुओं के लिए हरा चारा मिलना काफी कठिन हो गया है.

किसानों के पास इतनी जमीन नहीं है कि वे खेतों में पशुओं के लिए चारा उगा सकें. इस समस्या से किसान परेशान हैं. कुछ ऐसी ही कहानी मध्य प्रदेश के होशंगाबाद रोड स्थित दीपड़ी गांव के आकाश पाटीदार की है, जिन का डेरी का कारोबार  है.

आकाश कहते हैं कि उन्हें पशुओं को हरा चारा खिलाना काफी महंगा पड़ रहा था, इसलिए वे परेशान रहते थे. लेकिन एक दिन उन्होंने यूट्यूब पर एक वीडियो देखा, जिस में कम लागत से हरा चारा उगाने की जानकारी थी. इस तकनीक का नाम हाइड्रोपोनिक्स ग्रास ट्रे है.

क्या है हाइड्रोपोनिक्स तकनीक : पानी, बालू या कंकड़ों के बीच बिना मिट्टी के चारा उगाए जाने की तकनीक को हाइड्रोपोनिक तकनीक कहते हैं.

इस विधि से चारे वाली फसल को 15 से 30 डिगरी सेंटीग्रेड तापमान पर करीब 80 से 85 फीसदी नमी में उगाया जाता है और 8 से 10 दिनों में चारा तैयार हो जाता है. यह तकनीक काफी सस्ती भी पड़ती है. इस तकनीक से किसान चारे की समस्या पर काबू पा सकते हैं.

घर में कैसे तैयार करें हाइड्रोपोनिक्स चारा : हाइड्रोपोनिक्स ट्रे बनाने के लिए 8×2 फुट की टीन की चादर या प्लास्टिक ट्रे का इस्तेमाल किया जा सकता है. हाइड्रोपोनिक्स चारा 10 दिनों में पशुओं को खिलाने लायक हो जाता है, इसलिए आप को कम से कम 10 ट्रे की जरूरत होगी.

इस से आप को रोजाना हरा चारा हासिल होगा. एक ट्रे में करीब 10 किलोग्राम चारा हो जाता है.

बीज : हाइड्रोपोनिक्स ग्रास ट्रे के लिए करीब 1किलोग्राम मक्के के बीज लें. उन बीजों को 10 से 12 घंटे तक किसी बालटी में भीगने के लिए रख दें. अब इन भीगे हुए बीजों को 24 घंटे के लिए जूट के बोरे में लपेट कर रख दें. अगले दिन बीज अंकुरित हो जाएंगे, फिर इन अंकुरित बीजों को किसी ट्रे में रख दें.

पशुओं को रोजाना ताजा हरा चारा मिले, इस के लिए रोजाना बीजों को 12 घंटे के लिए भिगाएं और फिर उन्हें अगले 24 घंटे तक जूट के बोरे में लपेट कर रखें, जिस से बीजों में अंकुर आ जाएं. इस बात पर खास ध्यान दें कि हर दिन इसी तरह काम करना होगा. आप मक्के के बीजों के अलावा ज्वार, बाजरा और बरसीम के बीजों से भी पशुओं के लिए हरा चारा उगा सकते हैं.

मिट्टीपानी की जरूरत नहीं : हाइड्रोपोनिक्स तकनीक से चारा उगाने के लिए पानी और मिट्टी की जरूरत नहीं पड़ती, लेकिन गरमियों में 10 दिनों में 1 या 2 बार पानी का हलका सा छिड़काव किया जा सकता है, क्योंकि अंकुरित बीजों में पहले से ही नमी रहती है.

हाइड्रोपोनिक्स तकनीक से लाभ : इस तकनीक का सब से बड़ा लाभ यह है कि इस से काफी कम जगह में पोषणयुक्त हरा चारा आसानी से मुहैया हो जाता है.

हाइड्रोपोनिक्स तकनीक से आम किसान सालभर दुधारू पशुओं के लिए कम जगह में हरा चारा उगा सकते हैं, जिन्हें आमतौर पर कई एकड़ में चारा उगाना पड़ता है. इस विधि से लागत भी काफी कम आती है और मिट्टी के उपजाऊ न होने का फर्क भी नहीं पड़ता.

* रिसर्च में पाया गया कि परंपरागत हरे चारे में क्रूड प्रोटीन 10.7 फीसदी होता है, जबकि मक्के से तैयार हाइड्रोपोनिक्स चारे में कू्रड प्रोटीन 13.6 फीसदी होता है, परंपरागत हरे चारे में कू्रड फाइबर भी कम होता है. हाइड्रोपोनिक्स चारे में अधिक ऊर्जा और विटामिन होते हैं. इस से पशुओं में दूध का उत्पादन अधिक होने लगता है.

* हाइड्रोपोनिक्स तकनीक में मिट्टी की जरा भी जरूरत नहीं होती और पानी भी बहुत कम देना पड़ता है.

इस वजह से पौधों के साथ न तो अनावश्यक खरपतवार उगते हैं और न ही इन पर कीड़ेमकोड़े लगने का डर रहता है. इसलिए कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं होता और न ही खाद का. इस तकनीक से हरा चारा उगाने में मौसम का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ता. इसे किसी भी मौसम में उगाया जा सकता है.

* हाइड्रोपोनिक्स तकनीक से हरा चारा 8 से 10 दिनों में पशुओं को खिलाने के लायक हो जाता है. परंपरागत तकनीक में चारा तैयार होने में 40 से 45 दिन लगते हैं. 100 पशुओं के लिए परंपरागत विधि से चारा उगाने के लिए करीब 15 एकड़ जमीन की जरूरत पड़ती है, लेकिन हाइड्रोपोनिक्स तकनीक से 1000 वर्गफुट में 15 एकड़ के बराबर चारा आसानी से कम लागत में उगाया जा सकता है.

इस चारे को मशीन से काट कर खिलाया जाता है और चारे की जड़ को भी पशुओं को खिलाया जाता है, क्योंकि उस में मिट्टी नहीं होती है.

Fodder production

हाइड्रोपोनिक्स तकनीक से दूध उत्पादन में बढ़ोतरी : इस तकनीक से उगाया गया चारा अंकुरित होने के कारण अधिक प्रोटीन और मिनरल से भरपूर होता है. इस से दूध में फैट की मात्रा बढ़ जाती है.

दूध देने वाले पशुओं को अतिरिक्त प्रोटीन व मिनिरल्स की जरूरत होती है, जिसे पूरा करने के लिए बाजार से अधिक कीमत में खरीद कर तरल प्रोटीन दिया जाता है.

बाजार से खरीदा गया प्रोटीन काफी मंहगा पड़ता है. इस की पूर्ति के लिए डेरी वाले ग्राहकों से ज्यादा कीमत वसूलते हैं.

प्रति पशु 40 रुपए की बचत : आकाश पाटीदार बताते हैं कि यूट्यूब पर सीखी गई इस तकनीक ने उन की हरे चारे की दिक्कत दूर कर दी है. आकाश बताते हैं कि उन्होंने पहले एक रैक में चारा उगाया और फिर इस की सफलता के बाद 1000 वर्गफुट में 100 पशुओं के लिए प्रोटीनयुक्त हरा चारा उगा रहे हैं.

पहले 1 पशु को दोनों समय मिला कर 8 किलोग्राम पशुआहार देना होता था, जिस के लिए बाजार से 20 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से पशुआहार खरीदना पड़ता था. वे अब सिर्फ 6 किलोग्राम चारा दे रहे हैं. हाइड्रोपोनिक्स तकनीक से प्रति पशु 40 रुपए की बचत होने लगी.

डाक्टर एसआर नागर कहते हैं कि मिट्टी जनित चारे के मुकाबले अंकुरित चारा हर लिहाज से बेहतर है.

इस में विटामिन ‘ए’ समेत भरपूर मात्रा में प्रोटीन पाया जाता है. इस से दूध का उत्पादन बढ़ेगा, साथ में उस की गुणवत्ता भी बेहतर होगी.

खेती में भरपूर काम फिर भी महिला किसान होने का नहीं सम्मान

सदियों से खेतीकिसानी के काम को पुरुषों का ही काम माना जाता रहा है, जबकि खेतों में काम करते हुए लोगों को अगर देखें, तो उस में सब से ज्यादा तादाद महिलाओं की ही होती है. खरीफ सीजन में खेतों में काम करने वाले किसानों की तादाद में और भी इजाफा हो जाता है, क्योंकि खरीफ सीजन में धान रोपाई से ले कर कटाई, हार्वेस्टिंग और भंडारण तक में महिलाएं ही भूमिका निभाती हैं. फिर भी घर की इन महिलाओं को किसान होने का दर्जा इसलिए नहीं मिल पाता है, क्योंकि जमीन का मालिकाना हक घर के पुरुष सदस्य के पास ही होता है.

हम किसानों के लिए संबोधन किए जाने वाले सरकारी या गैरसरकारी लैवल पर भाषाई स्तर पर नजर डालें, तो किसान के रूप में अन्नदाताओं के लिए सिर्फ ‘किसान भाई’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता है, जबकि खेती में अहम भूमिका निभाने वाली महिलाओं को आज तक ‘किसान बहनों’ के नाम से संबोधित करते नहीं देखा गया. महिला किसानों के लिए यह असमानता मीडिया लैवल पर भी दिखाई देता रहा है.

खेती के करती हैं सभी काम, फिर भी नहीं मिलता दाम

महिलाएं घरपरिवार की देखभाल के साथसाथ पशुपालन, दूध निकालना, रोपाई, निराई, गुड़ाई, हार्वेस्टिंग और भंडारण तक का काम संभालती हैं, लेकिन जब कृषि उपज को बेचने की बात आती है, तो उस का निर्णय किसान कहलाने वाला घर का पुरुष सदस्य लेता है और उपज को बेच कर की हुई कमाई को भी अपने पास ही रखता है.

महिला किसानों के हक पर काम करने वाली माधुरी का कहना है कि जब महिलाएं दिनभर धान के पानी से भरे खेत में खड़ी हो कर पुरुषों की तरह ही निंदाईगुड़ाई कर सकती हैं, तो फिर मंडी में उसी फसल को बेचने के लिए उन्हें जाने क्यों नहीं दिया जाता बीज खरीदने, फसल बेचने, उस फसल से प्राप्त रकम के उपयोग में उस की भूमिका कहां चली जाती है, जबकि वह घर में सब से पहले उठने और सब से बाद में सोने वाली इकाई होती है?

किसान आंदोलन में खेती का पूरा काम महिलाओं के हवाले

देश के किसान जब खेतीबारी के मसलों पर नीति बनाने को ले कर दिल्ली और दिल्ली से सटे बौर्डर पर आंदोलन कर रहे थे, तो खेती से जुड़े 100 फीसदी कामों की जिम्मेदारियों को घर की महिलाओं ने ही संभाला था, लेकिन इस आंदोलन में चर्चा केवल पुरुष किसानों की ही हुई, जबकि अगर घर की महिलाएं खेती से जुड़े काम न संभालतीं तो खेती तो बरबाद ही होती. साथ ही, धरने पर बैठने वाले किसानों को आंदोलन में जीत भी नहीं मिलती.

महिलाओं ने इस दौरान न केवल खेती के काम बखूबी संभाले, बल्कि घर के बड़ेबुजुर्गों की देखभाल से ले कर बच्चों को स्कूल जाने के लिए तैयार करना, खाना पकाने जैसे काम को भी अंजाम दिया. किसान आंदोलन के दौरान हजारों की तादाद में महिला किसान भी धरने पर नजर आईं.

महिला किसानों के हक पर काम करने वाली माधुरी का कहना है कि पुरुषों के नाम खेती की जमीन होने मात्र से हम किसान होने का मानक तय नहीं कर सकते हैं, बल्कि हमें खेती में 80 फीसदी तक योगदान देने वाली घर की महिलाओं को भी ‘महिला किसान’ के रूप में सम्मान देना सीखना होगा.

महिला किसानों ने बढ़ाया महिलाओं का हौसला

बिहार में ‘किसान चाची’ के नाम से जानी जाने वाली एक महिला किसान हम सभी के लिए बड़ा उदाहरण हैं. उन्होंने कई जिलों में मीलों दूर साइकिल चला कर किसानी के प्रति गांव की महिलाओं में अलख जगाई.

उन्होंने देखा कि किसानों के पास खेती के लिए कम जमीनें थीं. घरपरिवार का गुजारा मुश्किल से होता था, परिवार की स्थिति ठीक नहीं थी. ऐसे में किसान चाची ने पुरुषों को शहरों में जा कर नौकरी करने और महिलाओं को खेती करने का रामबाण नुसखा दिया.

महिलाओं ने उन ‘चाची’ की सलाह मानी. नतीजा यह निकला कि उन के घरों में महिलापुरुष दोनों कमाने के लिए सशक्त हुए. बिहार में किसान चाची के प्रयास से आज कई जिलों की महिलाएं खेती के काम करती हैं. महिलाओं में खेती के प्रति जगाए सशक्तीकरण को देखते हुए 2 साल पहले भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्म विभूषण’ सम्मान से भी नवाजा.

महिला किसान (Woman Farmer)

ये सारे काम महिला किसानों के हवाले

हाल ही में ‘फार्म एन फूड’ पत्रिका द्वारा ‘फार्म एन फूड किसान सम्मान’ का आयोजन किया था, जिस में भारी तादाद में महिलाओं ने विभिन्न कैटीगिरियों में आवेदन किए थे. इस में खेतीकिसानी से जुड़े ऐसे काम भी रहे, जिस पर यह माना जाता है कि इन कामों को करने की कूवत केवल पुरुष किसानों में ही है. यह काम खेतीकिसानी से जुड़े बड़े कृषि यंत्रों के चलाने से जुड़ा है, जिसे महिला किसान बड़ी ही आसानी से संचालित कर रही हैं.

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के कोठडी बहलोलपुर गांव की रहने वाली बेहद कम उम्र की शुभावरी चौहान न सिर्फ एक सफल किसान हैं, बल्कि वे अपने पिता के साथ मिल कर ट्रैक्टर से खेतों की जुताई भी करती हैं और कालेज जाने के लिए मोटरसाइकिल का इस्तेमाल करती हैं.

वर्तमान में शुभावरी चौहान अपने गांव से तकरीबन 45 किलोमीटर दूर सहारनपुर में ‘मुन्ना लाल गर्ल्स डिगरी कालेज’ में अपने बीए फाइनल ईयर की पढ़ाई कर रही हैं. उन का सालाना टर्नओवर 25 लाख रुपए है और वे 25-30 लोगों को रोजगार प्रदान करती हैं.

इसी तरह गांव कोटी अठूरवाला, जिला देहरादून, उत्तराखंड की रहने वाली पशुपालक पुष्पा नेगी पशुपालन के क्षेत्र में नवीनतम तकनीक अपना कर स्थानीय किसानों को भी जागरूक करती हैं.

पशुपालक पुष्पा नेगी के द्वारा साल 2016 से गोपालन किया जा रहा है. इस समय उन के पास लगभग 30 गाय हैं, जिन में होल्सटीन फ्रीजियन और साहीवाल दोनों नस्ल की गाय शामिल हैं.

पुष्पा नेगी गाय के दूध से घी, छाछ, मक्खन आदि बना कर बाजार में अच्छे दामों पर बेचती हैं और प्रकृति संरक्षण को ध्यान में रखते हुए उन के यहां गाय के गोबर से दीया, दीपक, मूर्ति, समरानी कप, गौ काष्ठ एवं वर्मी कंपोस्ट आदि चीजें तैयार की जाती हैं. इस काम में उन्होंने अनेक लोगों को जोड़ रखा है, जिस से उन्हें भी रोजगार मिल रहा है.

गोंडा जनपद की रहने वाली साधना सिंह साल 2012 से कृषि क्षेत्र से जुड़ी हुई हैं. इस समय वे कृषि आधारित कई व्यवसाय भी कर रही हैं. उन्होंने 2 भैंसों के साथ पशुपालन का काम शुरू किया था और इस समय उन के पास 35 दुधारू भैंसें हैं. उन के दूध से पारंपरिक बिलोना विधि से भैंस का देशी घी तैयार किया जाता है, जो ‘अवध गोल्ड’ के नाम से बिकता है.

साधना सिंह के पास 2 पोल्ट्री फार्म हैं, जिस से उन्हें सालाना 7 से 8 लाख रुपए का मुनाफा होता है. इस के अलावा वे मछलीपालन व्यवसाय से भी जुड़ी हैं, जिस से उन्हें सालाना 10 लाख का लाभ प्राप्त होता है.

साधना सिंह का कहना है कि हम पंगास मछली का उत्पादन करते हैं. यह हाईडैंसिटी में उत्पादन होने वाली मछली है, जिस से ज्यादा मुनाफा होता है. मछलीपालन में फायदा होते देख कई महिला किसानों ने मछलीपालन शुरू किया है, जिस से गांव में अनेक महिला किसान मछलीपालन से फायदा उठा रही हैं. इस के अलावा वे 40 एकड़ में गन्ने की खेती और 20 एकड़ में धान की खेती करती हैं. 2 एकड़ में वे जैविक खेती से धान और गेहूं उत्पादन करती हैं.

बस्ती जिले के बिहराखास गांव की रहने वाली पुष्पा गौतम कृषि उत्पादों जैसे मल्टीग्रेन आटा, चावल, चना, अचारमुरब्बा आदि की प्रोसैसिंग कर बाजार से कई गुना अधिक मुनाफा कमाने के साथसाथ अनेक लोगों को ट्रेनिंग व रोजगार भी दे रही हैं.

महिला किसानों को मिलेगी सही पहचान

महिला किसान अधिकारों पर काम करने वाली और एक सफल किसान माधुरी का कहना है कि खेतीकिसानी से जुड़ी ट्रेनिंग और अन्य क्षमतावर्धन गतिविधियों में महिला किसानों को कम तवज्जुह दी जाती है. अगर सरकारी और गैरसरकारी लैवल पर आयोजित होने वाले इन कार्यक्रमों में महिला किसानों की भागीदारी बढ़ाई जाए, तो उन्हें असल पहचान मिल पाएगी.

वे कहती हैं कि परंपरागत रूप से महिलाओं को खेती में निराई, बोआई, रोपाई और कटाई जैसे काम सौंपे जाते थे. उत्पाद बेचना घर के पुरुष सदस्य का अधिकार होता था. वे पशुपालन जैसी सहायक गतिविधियों की देखभाल में भी शामिल थे. लेकिन अब यह सब बदल रहा है.

आज सरकार से इतर देश की कई गैरसरकारी संस्थाएं गांव की महिलाओं को कृषि व्यवसाय मौडल पर शिक्षित कर के उन की प्रबंधन क्षमताओं को निखार रही हैं और नई आजीविकाओं में प्रशिक्षित कर रही हैं, जिस में खेती के अलावा ग्रेडिंग, सौर्टिंग, तौल, भंडारण, लोडिंग, अनलोडिंग, चालान और समन्वय रसद को प्रसंस्करण मिलों तक उत्पाद भेजने पर महिलाओं की क्षमता बढ़ाई जा रही है.

माधुरी बताती हैं कि एक अनुमान के मुताबिक भारत में तकरीबन 10 करोड़ महिलाएं खेती से जुड़ी हैं. लेकिन इन्हें महिला किसान न मान कर खेतिहर मजदूर माना जाता है.

वे कहती हैं कि छोटे और मझोले किसान घरों की तकरीबन 75 फीसदी महिलाएं खेती के कामों से तो जुड़ी हैं, किंतु आमतौर पर उन्हें उन के कामों का श्रेय नहीं दिया जाता है, न ही उन के हाथों में सीधी मजदूरी पहुंचती है और कई बार वे खेती से जुड़ी निर्णय प्रक्रिया से बाहर रहती हैं. वे खेती और परिवार से जुड़ी अपनी जिम्मेदारी एकसाथ निभाती हैं. लेकिन इन सब के बावजूद उन के योगदान का मूल्यांकन कहीं नहीं होता है.

बढ़ाया महिला किसानों के नाम खेती का रकबा

खेती की जमीन के मालिकाना हक के मामले में पुरुषों का दबदबा रहा है, लेकिन जब से ‘पीएम किसान सम्मान निधि’ योजना की शुरुआत हुई है, तब से घर के पुरुषों ने साल में मिलने वाले 6,000 रुपए के लालच में अपने घर की महिलाओं के नाम जमीन ट्रांसफर करना शुरू कर दिया.

अगर हम ‘पीएम किसान सम्मान निधि’ योजना के आंकड़ों पर गौर करें, तो 12.13 करोड़ पंजीकृत किसानों में 25 फीसदी हिस्सेदारी महिलाओं की है. पीएम किसान सम्मान निधि पोर्टल पर पंजीकृत महिला किसानों का यह आंकड़ा बहुत कम था, जो इस योजना के आने के बाद बढ़ा है.

इस के अलावा उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने जमीन नामांतरण प्रक्रिया में बड़ी सहूलियत दी है. इस के तहत उत्तर प्रदेश में अब कोई भी व्यक्ति 5,000 रुपए का स्टांप शुल्क दे कर अपने परिजनों के नाम जमीन का बैनामा कर सकता है. इस स्कीम के चलते उत्तर प्रदेश में महिलाओं के नाम खेती योग्य जमीन के रकबे में बढ़ोतरी दर्ज की गई है.

महिला किसान (Woman Farmer)खेतीबारी से जुड़े आंकड़ों में भी महिलाएं

‘पीएम किसान’ पोर्टल पर महिला किसानों के जो आंकड़े प्रदर्शित हैं, भारत की जनगणना 2011 से बेहद कम है, क्योंकि साल 2011 की जनगणना के हिसाब से देश में तकरीबन 6 करोड़ महिला किसान हैं, वहीं आवधिक श्रमबल सर्वे 2018-19 का डेटा बताता है कि ग्रामीण क्षेत्रों में 71.1 फीसदी महिलाएं कृषि क्षेत्र में काम करती हैं.

माधुरी कहती हैं कि 73.2 फीसदी ग्रामीण महिला श्रमिक किसान हैं, लेकिन उन के पास 12.8 फीसदी जमीन स्वामित्व है. महाराष्ट्र में 88.46 फीसदी ग्रामीण महिलाएं कृषि में लगी हैं, जो देश में सब से ज्यादा है.

साल 2015 की कृषि जनगणना के अनुसार, पश्चिमी महाराष्ट्र के नासिक जिले में महिलाओं के पास केवल 15.6 फीसदी कृषि भूमि का स्वामित्व है यानी कुल खेती वाले क्षेत्र में 14 फीसदी की हिस्सेदारी है.

वे बताती हैं कि संयुक्त राष्ट्र की साल 2013 की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि जबरन बेदखली या गरीबी के खतरे को कम कर के, प्रत्यक्ष और सुरक्षित भूमि अधिकार महिलाओं की घर में सौदेबाजी की शक्ति को बढ़ाते हैं और उन की सार्वजनिक भागीदारी के स्तर में सुधार करते हैं.

माधुरी के अनुसार, महिलाओं को ‘महिला किसान’ के रूप में बनाई गई नीतियां नाकाफी हैं, इसलिए सरकार को इन नीतियों की समीक्षा कर उस में जरूरी सुधार कर के उस की सख्ती से पालन सुनिश्चित कराने की जरूरत है.

3 लाख लिटर दूध प्रतिदिन की क्षमता का नया संयंत्र (New Milk Plant) लगेगा

जयपुर : दूध उत्पादक सहकारी संघ गोवर्धन परिसर, उदयपुर में पंजाब के राज्यपाल एवं प्रशासक चंडीगढ़ गुलाबचंद कटारिया के मुख्य आतिथ्य में विशाल ‘किसान सहकार सम्मेलन’ कार्यक्रम आयोजित किया गया.

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए संघ के अध्यक्ष डालचंद डांगी ने संघ का संयंत्र अत्यंत पुराना होने के मद्देनजर राज्यपाल पंजाब एवं गोपालन मंत्री जोराराम कुमावत से उदयपुर में 3 लाख लिटर दूध प्रतिदिन की क्षमता का नया संयंत्र स्थापित कराने एवं 150 टन प्रतिदिन की क्षमता का पशु आहार संयंत्र लगाने का अनुरोध करते हुए विस्तृत परियोजना प्रस्ताव प्रस्तुत किया.

कार्यक्रम में पंजाब के राज्यपाल एवं प्रशासक चंडीगढ़ गुलाबचंद कटारिया ने अपने उदबोधन में पशुपालकों की माली हालत को मजबूत करने और कीमत अंतर राशि दूध समितियों के बजाय सीधे दूध उत्पादकों के बैंक खातों में भेजने का सुझाव दिया. साथ ही, बाजार की होड़ के मद्देनजर दूध एवं दूध से बने उत्पादों की गुणवत्ता बनाए रखने पर भी जोर दिया.

पशुपालन, गोपालन एवं देवस्थान मंत्री जोराराम कुमावत ने अपने उद्बोधन में दूध उत्पादकों को दर अंतर दिए जाने पर ख़ुशी जाहिर करते हुए दुग्ध संघ, उदयपुर के अध्यक्ष एवं प्रबंध संचालक के प्रयासों की सराहना की एवं भविष्य में दर अंतर राशि डीबीटी के माध्यम से सीधे दूध उत्पादकों के बैंक खाते मे भेजने का सुझाव दिया.

उन्होंने आगे कहा कि दूध उत्पादकों को दूध पर दी जाने वाली सब्सिडी जारी रखी जाएगी. इस से दूध उत्पादकों की माली हालत और भी मजबूत होगी. उन्होंने सभी से अपना पूरा दूध दुग्ध उत्पादक सहकारी समिति पर ही देने के लिए कहा, ताकि उन को सहकारी डेयरी से मिलने वाली सभी सुविधाओं का लाभ मिल सके.

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार द्वारा पशुपालकों के कल्याण के लिए चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं जैसे दुधारू पशु बीमा योजना, गोपालक कार्ड योजना, किसान क्रेडिट कार्ड योजना, पशु मोबाइल चिकित्सा योजना की विस्तृत जानकारी देते हुए इन का लाभ उठाने को कहा. उन्होंने यह भी कहा कि राज्य सरकार दूध में मिलावट करने वालों के खिलाफ सख्त कार्यवाही कर रही है.

उदयपुर डेयरी परिसर में स्थित पार्लर को सरस संकुल पार्लर, जयपुर की तर्ज पर विकसित करने पर भी उन्होंने जोर दिया और कहा कि आगामी बजट मे उदयपुर में 3 लाख लिटर का नया संयंत्र एवं 150 टन प्रतिदिन की क्षमता का पशु आहार संयंत्र स्थापित लगाने का प्रयास किया जाएगा.

कार्यक्रम को संबोधित करते हुए जनजाति विकास एवं गृह रक्षा मंत्री बाबूलाल खराड़ी ने आज के समय में ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन एवं डेयरी व्यवसाय को रोजगार एवं आजीविका का सशक्त माध्यम बताया एवं ज्यादा से ज्यादा किसानों एवं पशुपालकों से सहकारी डेयरी से जुड़ कर आमदनी बढाने का आह्वान किया.

उदयपुर डेयरी के प्रबंध संचालक विपिन शर्मा ने किसान सहकार सम्मेलन कार्यक्रम में पधारे सभी अतिथियों का आभार एवं धन्यवाद ज्ञापित किया.

चल कृत्रिम गर्भाधान प्रयोगशाला (अवि मेल) : भारत में भेड़ प्रजनन के क्षेत्र में एक गेमचेंजर

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्रीय भेड़ और ऊन अनुसंधान संस्थान, अविकानगर ने भेड़ प्रजनन के क्षेत्र में एक अभूतपूर्व नवाचार शुरू किया है. भेड़ों के लिए चल कृत्रिम गर्भाधान प्रयोगशाला, जिसे अवि मेल नाम दिया गया है. पहली बार डिज़ाइन की गई इस अत्याधुनिक सुविधा का उद्देश्य मद समाकलन और कृत्रिम गर्भाधान सेवाओं को सीधे किसानों के दरवाजे पर पहुंचा कर भेड़ प्रजनन के क्षेत्र में क्रांति लाना है.

कई चुनौतियों के चलते भेड़ों में कृत्रिम गर्भाधान लोकप्रिय नहीं रहा है और इस का कम उपयोग किया गया है. भेड़ की सर्विक्स (बच्चेदानी का मुंह) की जटिल शारीरिक रचना के कारण कृत्रिम गर्भाधान के लिए भेड़ यानी मेढ़े के क्रायोप्रिजर्व्ड  सीमेन को, जिसे कई सालों तक महफूज  रखा जा सकता है, उस का सफलतापूर्वक उपयोग नहीं किया जा सकता.

तरल शीतित सीमेन के साथ कृत्रिम गर्भाधान काफी सफल होता है और 50 से 60 फीसदी गर्भधारण दर प्राप्त होती है. हालांकि, उसे बहुत कम समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है और इसे संग्रह के बाद 8 से 10 घंटे में उपयोग करने पर ही वांछित सफलता मिलती है.

इस वजह से कृत्रिम गर्भाधान तकनीक सीमेन स्टेशन के 25 से 30 किलोमीटर के दायरे में किसानों के लिए पहुंच पाती है और देश में भेड़ों के लिए स्थापित सीमेन लैबोरेट्रीज की संख्या न के बराबर है.

इन चुनौतियों को पहचानते हुए भेड़ों में नस्ल सुधार कार्यक्रमों के लिए कृत्रिम गर्भाधान के सफल कार्यान्वयन को सक्षम बनाने के लिए इस प्रौद्योगिकी और किसानों के बीच की खाई को पाटने के लिए ‘अवि मेल’ की अवधारणा लाई गई थी.

भारत सरकार के पशुपालन एवं डेयरी विभाग के राष्ट्रीय पशुधन मिशन द्वारा वित्तीय रूप से समर्थित अवि  मेल, पहियों पर पूरी तरह से सुसज्जित मोबाइल सीमेन प्रयोगशाला है, जिसे दूरदराज के क्षेत्रों में भी फील्ड स्थितियों में संचालित करने के लिए डिजाइन किया गया है.

यह एक रोगाणुहीन वातावरण में उच्चतम मेंड़ों से  स्वच्छ सीमेन संग्रह, मूल्यांकन और प्रसंस्करण की सुविधाएं प्रदान करता है, जिसे भेड़ों के अलावा बकरियों, सूअरों और घोड़ों सहित अन्य पशुओं की प्रजातियों में भी उपयोग किया जा सकता है.

अवि मेल को कृषि एवं पशुपालन क्षेत्रों के प्रमुख व्यक्तियों और विशेषज्ञों से काफी तारीफ मिली है. विभिन्न दौरों के दौरान इस नवाचार की कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान, मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ लल्लन सिंह, मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के राज्य मंत्री प्रो. एसपीएस बघेल, डेयर सचिव और आईसीएआर के महानिदेशक डा. हिमांशु पाठक, कृषि वैज्ञानिक भरती बोर्ड के अध्यक्ष डा. संजय कुमार, एग्रीनोवेट के सीईओ डा. प्रवीण मलिक, डीएएचडी के पूर्व संयुक्त सचिव (एनएलएम) डा. ओपी चौधरी के साथसाथ अन्य मंत्री, वरिष्ठ अधिकारी और विभिन्न राज्यों के अनुसंधान संस्थानों, विश्वविद्यालयों और पशुपालन विभागों के विशेषज्ञों ने प्रशंसा की और इसे बड़े स्तर पर प्रयोग करने की अनुशंसा की.

एक प्रायोगिक परीक्षण में राजस्थान के टोंक और जयपुर जिलों के 5 गांवों के 10 किसानों की 450 भेड़ों में कृत्रिम गर्भाधान के लिए अवि मेल का इस्तेमाल किया गया, जिस से 58 फीसदी भेड़ों में एक समय पर उन्नत नस्ल के मेमने प्राप्त हुए.

यह सफलता भेड़ उत्पादकता में सुधार लाने और छोटे किसानों के माली उत्थान में योगदान देने के लिए अवि  मेल की क्षमता को उजागर करती है.

garbhadhan prayogshala

केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान, अविकानगर के निदेशक डा. अरुण तोमर ने ‘अवि  मेल’ की परिवर्तनकारी क्षमता पर जोर देते हुए कहा, “यह नवाचार उन्नत प्रजनन तकनीकों को किसानों के लिए सुलभ बनाने में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है, खासकर दूरदराज के क्षेत्रों में और प्रवासी भ्रमणकारी भेड़पालकों के लिए. अवि मेल में कुशल नस्ल सुधार कार्यक्रमों को सक्षम बनाने की क्षमता है, जिस से पशुधन क्षेत्र में भेड़ उत्पादकता और आर्थिक विकास में वृद्धि का मार्ग प्रशस्त किया जा सकता है.”

अवि  मेल को संस्थान के निदेशक डा. अरुण तोमर के मार्गदर्शन में एनएलएम द्वारा वित्तपोषित परियोजना के प्रधान अन्वेषक डा. अजीत सिंह महला और उन की टीम द्वारा बनाया गया है.

डा. अरुण महला ने इस बात पर प्रकाश डाला कि भारत में दुनिया की दूसरी सब से बड़ी भेड़ आबादी होने और पशुओं में कृत्रिम गर्भाधान के 7 दशकों के सफल प्रयोग के बावजूद देश अभी तक भेड़ों में एक वांछनीय कृत्रिम गर्भाधान कवरेज हासिल नहीं कर पाया है. यहां तक कि देशभर में कुल गर्भाधानों की संख्या 4 अंकों तक पहुंचाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है.

उन्होंने बताया कि नीति बनाने वाले इस तकनीक का बड़े स्तर पर प्रयोग सुनिश्चित करने के लिए देशभर में भेड़, बकरी और सूअर जैसी प्रजातियों के लिए वीर्य स्टेशनों या कृत्रिम गर्भाधान प्रयोगशालाओं के लिए बुनियादी ढांचे को बढ़ाने की सिफारिश करते हैं.

संस्थान द्वारा विकसित की गई यह चल कृत्रिम गर्भाधान प्रयोगशाला कम लागत में बुनियादी ढांचे को मजबूत कर प्रजनन तकनीकों को भेड़पालकों तक पहुंचा कर भेड़ प्रजनन के क्षेत्र में  क्रांति लाने की संभावनाएं रखती है.

अवि मेल को राज्य पशुपालन विभागों, शोध संस्थानों, नस्ल सुधार कार्यक्रमों में लगे गैरसरकारी संगठनों और उद्यमियों द्वारा अपनाया जा सकता है. हाल ही में एनएलएम सब्सिडी योजना की शुरूआत ने देशभर में व्यावसायिक भेड़पालन में उल्लेखनीय वृद्धि की है, जिस से इस क्षेत्र का असंगठित से संगठित सैक्टर में परिवर्तन हो रहा है.

इस बदलाव के साथ भेड़ों में कृत्रिम गर्भाधान की खासकर प्रगतिशील किसानों और उद्यमियों के बीच बढ़ती मांग देखी गई है. इस के अलावा अविकानगर जैसी शोध संस्थाओं द्वारा विकसित उच्च मांग वाली भेड़ की नस्लों, जिन की मांग और उपलब्धता में उल्लेखनीय अंतर है , जैसे अविशान जो 2 से 4 मेमने देने के लिए जानी जाती है और अविदुम्बा जो असाधारण वजन और वृद्धि के लिए जानी जाती है, के बेहतर जर्म प्लाज्म के प्रसार के लिए कृत्रिम गर्भाधान  का उपयोग कर भारतीय भेड़ों की उत्पादकता बढ़ाई जा सकती है.

अविकानगर संस्थान ‘अवि मेल’ जैसी तकनीकों के सफल विकास के साथ नवीन तकनीकों के माध्यम से पशुधन उत्पादकता को आगे बढ़ाने में अपनी अहम भूमिका निभा रहा है  और आधुनिक प्रजनन पद्धतियों को पशुपालकों के दरवाजे तक ला कर संस्थान भारत के भेड़ उद्योग के लिए अधिक टिकाऊ और समृद्ध भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर रहा है.

आवारा पशुओं (Stray Animals) का आतंक

उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले के निवासी दिनेश छोटे किसान हैं. 8000 रुपए मासिक की प्राइवेट नौकरी करने वाले दिनेश के पास खेती के नाम पर महज 1 एकड़ सिंचित जमीन है. इस जमीन पर वे धान और गेहूं पैदा कर के अपने 6 सदस्यों के परिवार को खाना मुहैया कराते हैं. इस जमीन से उन्हें साल भर के लिए खाने का अनाज मिल जाता है. बाकी खर्चे वे बमुश्किल अपनी प्राइवेट नौकरी से पूरे करते हैं.

वह इन दिनों काफी परेशान हैं, क्योंकि जिस खेत में उन्होंने धान की फसल रोपी थी, उस का एक बड़ा हिस्सा आवारा पशुओं ने बरबाद कर दिया है. आवारा पशुओं ने सब तबाह कर दिया. उन को समझ नहीं आ रहा कि क्या करें.

आवारा पशुओं के आतंक से बरबाद हुई खेती से चिंतित उन का कहना है कि यदि उन्हें यह फसल नहीं मिली तो उन के परिवार के सामने भूखों मरने की नौबत आ जाएगी. इस तबाही के बाद अपनी बचीखुची फसल की देखभाल के लिए उन्होंने अपने बेटे का स्कूल छुड़वा कर उसे रखवाली करने के काम में लगा दिया है. अब दिन में बेटा फसल की निगरानी करता है और रात को वे खुद खेत पर सोते हैं. उन्हें लगता है कि इस तरह से वे अपने परिवार के लिए तैयार अन्न की सुरक्षा कर सकते हैं.

यह दर्द अकेले दिनेश का नहीं है. इस इलाके के तमाम किसान इसी तरह के दर्द से जूझ रहे हैं. पहले से ही संकट से जूझ रहे इन किसानों को अचानक आई इस मुसीबत से उबरने का कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है. जो किसान फसल को बटाई पर तैयार करते हैं वे भी इन आवारा जानवरों से काफी परेशान हैं, क्योंकि उन की फसल तैयार करने की लागत जमीन मालिक से ज्यादा आती है. आवारा पशु झुंड में होते हैं और फसल को बरबाद कर देते हैं.

दरअसल, योगी सरकार द्वारा जब से अवैध बूचड़खानों पर कार्यवाही शुरू हुई है, तब से पशु व्यवसायी और कारोबारी गायों की खरीदबिक्री तकरीबन बंद कर चुके हैं. ऐसी स्थिति में लगातार महंगे हो रहे पशु चारे के कारण पशुपालकों ने बेकार पशुओं को रखना बंद कर दिया है यानी उन्हें खुला छोड़ दिया है, क्योंकि उन की अब कोई कीमत नहीं है.

आवारा पशु (Stray Animals)काफी मात्रा में खुले छोड़े गए इन जानवरों को किसी गौशाला में भी नहीं रखा जा सकता, क्योंकि इन के लिए चारापानी और रखने की जगह नहीं है. आज हालत यह है कि आप किसी भी गांव में चले जाइए, आवारा पशुओं के झुंड आप को दिखाई देंगे. ये आवारा पशु आज किसानों के लिए संकट बन गए हैं.

बात यहीं तक सीमित नहीं है. गौकशी के नाम पर बंद किए गए बूचड़खानों से पशुपालन उद्योग पर भी संकट के बाद मंडराने लगे हैं. आज हालात ये हैं कि खुद योगी सरकार के पास भी इन आवारा पशुओं के निबटान का कोई उपाय नहीं है.

सरकार के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि आखिर बेकार गायबैलों और बछड़ों का आम किसान क्या करे? गौशालाओं की दुर्दशा का हाल भी किसी से छिपा नहीं है. ऐसे में आम पशुपालक अपने बेकार जानवरों को खुला छोड़ देते हैं. इस स्थिति के लिए सरकार खुद जिम्मेदार है.

दरअसल, अब तक उन इलाकों में किसानों को फसल की रखवाली की जरूरत नहीं पड़ती थी, जहां नीलगाय का आतंक नहीं था, अब आवारा पशुओं द्वारा फसलों की इस तरह से की जा रही तबाही की वजह से किसानों ने बाकायदा खेतों के पास मचान बना लिए हैं, जिस से  वे अपनी फसलों की देखभाल कर रहे हैं. कई किसान सिर्फ अपने खाने के लिए ही चिंतित नहीं हैं, बल्कि उन का कहना है कि यदि फसल ठीक से नहीं हुई तो वे खेती के कर्ज को कैसे अदा कर पाएंगे?

दिनेश से जब यह पूछ गया कि आखिर वे इन आवारा पशुओं से खेती को बचाने के लिए क्या तरीके सोचते हैं, तो उन्होंने कहा कि सरकार को इन की खरीदफरोख्त की मंजूरी दे देनी चाहिए ताकि इन बेकार जानवरों को बेचा जा सके. उन के मुताबिक उन के पास खुद एक बूढ़ी गाय है, जिसे बेच कर वे नई गाय लेना चाहते हैं ताकि घर में दूध का इंतजाम हो सके. लेकिन गाय के लिए उन के पास कोई खरीदार नहीं है और 2 गाय रखने की उन की हिम्मत नहीं है.

पिछले 15 सालों से पशुओं की खरीदबिक्री का काम कर रहे कपील अहमद से जब पूछा गया कि क्या वे अब गायबैलों की खरीदबिक्री नहीं करते, तो उन का कहना था कि अब वे इस काम को बंद कर चुके हैं. इस की वजह बताते हुए उन्होंने कहा कि पहले गायों को ले जाते हुए उन्हें किसी तरह का डर नहीं लगता था, लेकिन अब उन की हिम्मत नहीं होती है.

आवारा पशु (Stray Animals)एक किसान के मुताबिक गायों की तस्करी का आरोप लगा कर पुलिस ने उन का बेवजह उत्पीड़न किया, जबकि वे केवल भैंसों का ही कारोबार करते थे. वे बताते हैं कि उन के घर तकरीबन 2-4 किसान हर दिन आते हैं जो अपनी गाय और बैलबछड़े खरीदने को कहते हैं, लेकिन वे साफ मना कर देते हैं.

कुल मिला कर योगी सरकार के इस गौ प्रेम ने आज केवल पशुपालन को ही संकट में नहीं डाला, बल्कि किसानों के लिए भी एक बहुत बड़ा संकट पैदा हो गया है. आज जब खेती लगातार घाटे का सौदा बन चुकी है और किसान कर्ज के बोझ तले दब कर आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे हैं. ऐसे में आवारा पशु किसानों के लिए मुसीबत बन गए हैं. पहले से ही मुसीबतें झेल रहे किसान इस नई परेशानी का सामना कैसे करेंगे, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा. फिलहाल आवारा पशुओं के आतंक से परेशान किसानों के पास आंसू बहाने के सिवा कोई रास्ता नहीं है.

पशुधन स्वास्थ (Livestock Health) और उन के विकास के लिए संगोष्ठी

हिसार: लाला लाजपत राय पशुचिकित्सा एवं पशुविज्ञान विश्वविद्यालय में कुलपति, डा. राजा शेखर वुंडरू, आईएएस, अतिरिक्त मुख्य सचिव, हरियाणा सरकार के दिशानिर्देशानुसार लुवास के 15वें स्थापना दिवस के उपलक्ष में एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया.

लुवास की स्थापना वर्ष 2010 में शेर-ए-पंजाब, लाला लाजपत राय की स्मृति में की गई थी, जिस का उद्देश्य पशुधन, मुर्गी और पालतू पशुओं की महत्वपूर्ण बीमारियों के निदान, रोकथाम और नियंत्रण पर गहन शोध के माध्यम से पशुओं की पीड़ा को कम करना एवं पशुधन के विकास के लिए निरंतर प्रयासरत रहना हैं.

यह दिन लुवास के लिए हर साल बहुत खास होता है क्योंकि आज के दिन लुवास विश्वविद्यालय की स्थापना की गई थी और यह लुवास में शिक्षण, अनुसंधान और विस्तार में उत्कृष्टता की यात्रा की याद दिलाता है. इस अवसर पर पशु चिकित्सा महाविद्यालय हिसार के वर्ष 1969 के पास आउट बैच के पूर्व छात्रों ने भी अपने परिवार के साथ लुवास परिसर में पुनर्मिलन समारोह मनाया. इस कार्यक्रम का आयोजन पशु चिकित्सा महाविद्यालय के अधिष्ठाता द्वारा संस्थागत नवाचार परिषद, मानव संसाधन प्रबंधन निदेशालय के सहयोग से किया गया था.

पशुधन स्वास्थ संगोष्ठी (Livestock Health)
पशुधन स्वास्थ (Livestock Health seminar)

डा. नरेश जिंदल, ने कार्यक्रम अध्यक्ष के रूप में समारोह की अध्यक्षता की और डा. राजेश खुराना, निदेशक, मानव संसाधन प्रबंधन और अध्यक्ष, संस्थागत नवाचार परिषद, लुवास ने सह-अध्यक्ष के रूप में भाग लिया. इस अवसर पर उपस्थित पशु चिकित्सा महाविद्यालय के वर्ष 1969 पासआउट बैच के पूर्व छात्रों ने लुवास स्थापना समारोह की सराहना करते हुए लुवास द्वारा पशु चिकित्सा, पशु विज्ञान शिक्षा तथा अनुसंधान के स्तर को ऊंचा उठाने के लिए किये जा रहे कार्यो की तारीफ़ करी. पूर्व छात्रों ने अपने विचार साझा किए तथा छात्रों और विभाग के  सदस्यों को पशुधन एवं डेयरी उद्योग की वर्तमान जरूरतों को ध्यान में रखते हुए अनुसंधान करने की सलाह दी, जिस से नवाचारों को बढ़ावा मिले.

स्थापना दिवस के अवसर पर कुलसचिव डा. एस. एस. ढाका ने लुवास में चल रही विभिन्न शैक्षिक, अनुसंधान एवं विस्तार कार्यक्रमों के बारे में अवगत कराया तथा लुवास की उपलब्धियों और विश्वविद्यालय के विभागीय सदस्यों और विद्यार्थियों द्वारा की जा रही विभिन्न गतिविधियों के साथ-साथ भविष्य के प्रयासों के बारे में भी विचार विमर्श किया.

कार्यक्रम के अंत लुवास के अनुसंधान निदेशक डा. नरेश जिंदल ने पशुपालकों के लाभ के लिए विश्वविद्यालय द्वारा किए जा रहे अनुसंधान पहलुओं पर भी विस्तार से चर्चा करी.

पशुपालकों (Cattle Farmers) को भेड़ की उन्नत नस्लों का वितरण

डूंगरपुर: केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान अविकानगर की अनुसूचित जनजाति उपयोजना मे डूंगरपुर जिले के भटनाड़ा ग्राम पंचायत भवन में किसानवैज्ञानिक संगोष्ठी एवं भेड़पालन के लिए 100 पशुओं के वितरण का आयोजन किया गया. इस मौके पर अविकानगर संस्थान के निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर के मार्गदर्शन में टीएसपी उपयोजना के नोडल अधिकारी डा. जी. गणेश सोनवाणे द्वारा संगोष्ठी में उपस्थित आदिवासी किसानों को वैज्ञानिक ढंग से भेड़पालन, टीकाकरण एवं साल भर किए जाने वाली गतिविधियों पर विस्तार से संवाद किया गया. इस मौके पर टीएसपी उपयोजना के माध्यम से डूंगरपुर जिले में किए जा रहे काम के बारे में अतिथियों को अवगत कराया गया.

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि उमेश मीणा विधायक आसपुर विधानसभा ने भी उपस्थित किसानों को वर्तमान समय के हिसाब से वैज्ञानिक तरीके से पशुपालन एवं खेती करने पर जोर दिया और सभी आदिवासी किसानो को स्वरोजगार अपनाकर अपने परिवार की आर्थिक उन्नति के लिए नई पीढ़ी को कौशल विकास की ओर बढ़ने का आह्वाहन किया.

कार्यक्रम का संचालन डा. अमर सिंह मीणा द्वारा किया गया. संगोष्ठी के अवसर पर 11 आर्थिक रूप से कमजोर आदिवासी परिवारों को 5 भेड़ (4 मादा एवं 1 नर) की इकाई एवम 45 भेड़पालक आदिवासी किसानों को उन्नत नस्ल का एक मेढ़ा के साथ फीडिंग ट्रौप, पैलेट फीड, तसला, बालटी, खोडी, खुरपी, दंराती आदि का वितरण कार्यक्रम में उपस्थित अथितियों द्वारा किया गया. इस कार्यक्रम में सोहन लाल अहारी एवं रमनलाल कलसुवा द्वारा भेड़पालक आदिवासी किसानों का सर्वे कर के कार्यक्रम आयोजन में सहयोग किया गया. अविकानगर से पशुओं का परिवहन रामखिलाडी मीणा व राजेश चंदेल द्वारा किया गया. संगोष्ठी एवं वितरण कार्यक्रम में अविकानगर संस्थान के वित्त अधिकारी भूपेंद्र कुमार गुर्जर, सरपंच देवशंकर नेनोमा एवं भटनाड़ा पंचायत के गांववासियों के साथ लाभान्वित आदिवासी किसान उपस्थित रहे.

पशुपालकों को भेड़ की उन्नत नस्लों के संदर्भ आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम

डूंगरपुर: केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान अविकानगर में चल रही अनुसूचित जाति उपयोजना के अन्तर्गत पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान डा. अरूण कुमार तोमर निदेशक के निर्देशन में आयोजित किया गया. जिसके समापन कार्यक्रम मे संस्थान द्वारा चयनित अनुसूचित जाति की 25 महिलओं एवं पुरूष बीपीएल किसानों ने भाग लिया.

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में किसानों को भेड़-बकरीयों में प्रजनन, स्वास्थ्य, पशु पोषण, अधिक उत्पादन के लिए कृत्रिम गर्भाधान, ऊन एवं ऊन के उत्पादों की नवीन तकनीकी जानकारियां दी गईं. कार्यक्रम के समापन समारोह में अनुसूचित जाति उपयोजना के नोडल अधिकारी डा. अजय कुमार ने किसानों को संम्बोधित करते हुए कहा कि वे भेड़-बकरी पालन कर अपनी आजीविका में सुधार कर सकते हैं और कहा कि वे संस्थान से 5 दिन में मिली जानकरी को क्षेत्र के दुसरे  किसानों से भी साझा कर उन की भी जानकारी को बढ़ाएं. जिस से अन्य किसान भी इस का फायद ले सकें.

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के समन्वयक डा. एल.आर. गुर्जर, प्रभारी, तकनीकी स्थानांतरण एवं सामाजिक विज्ञान विभाग एवं डा. रंगलाल मीणा, वैज्ञानिक रहे. कार्यक्रम में गौतम चौपड़ा, डी.के. यादव एवं अन्शुल शर्मा ने भी सहयोग प्रदान किया.

ऊंट सरंक्षण योजना में मिल रहे 20,000 रुपए, कैसे उठाएं जल्दी फायदा

जयपुर: राज्य सरकार द्वारा उष्ट्र संरक्षण योजना के तहत डीबीटी को आधार और जनआधार से जोड़ने के लिए अधिसूचना जारी कर दी गई है. पशुपालन और गोपालन विभाग के शासन सचिव डा. समित शर्मा ने बताया कि पशुपालन विभाग द्वारा वर्तमान में ऊंटों के संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए उष्ट्र संरक्षण योजना का संचालन किया जा रहा है, जिस में टोडियों के जन्म पर उन के पालनपोषण के लिए प्रोत्साहनस्वरूप उष्ट्रपालकों को 2 किस्तों में 20,000 रुपए की माली मदद देने का प्रावधान है.

उन्होंने आगे बताया कि इस अधिसूचना के जारी होने से अब योग्य उष्ट्रपालकों को इस योजना का लाभ लेने के लिए अपना आधारकार्ड और जनआधार संख्या होने का प्रमाण प्रस्तुत करना होगा, जिस से उन के बैंक खातों में पारदर्शिता एवं सुगमता के साथ राशि हस्तांतरित की जा सकेगी. इस से योजना में पारदर्शिता आएगी और उष्ट्रपालकों को उन की सहायता राशि सरल और निर्बाध तरीके से सीधे प्राप्त हो सकेगी. साथ ही, योजना के तहत आवेदन करते समय कई तरह के पहचानपत्र व अन्य दस्तावेज अपलोड करने की भी बाध्यता नहीं होगी.

डा. समित शर्मा ने बताया कि योजना के तहत लाभार्थियों को सुविधाजनक रूप से लाभ मिल सके, इस के लिए लाभार्थियों को इस के बारे में जागरूक करने के लिए विभिन्न माध्यमों से उन तक सूचना पहुंचाई जाएगी. उन्होंने कहा कि सरकार के इस कदम से लाभार्थियों को समय पर आर्थिक लाभ मिलने के साथसाथ विभाग के काम में भी आसानी होगी और दक्षता आएगी.