Guava and Lemon : बागबानी फसलों में अमरूद और नीबू का भारत में खास स्थान है. कई बार बागबानों को इन से कम पैदावार मिलती है. कभी पेड़ों में फूल नहीं आते या फूल आने के बाद फल नहीं बनते. कई बार फूल तो बहुत आते हैं लेकिन फल बनने से पहले ही फूल झड़ जाते हैं, जिससे किसानों की उम्मीदों पर पानी फिर जाता है. इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं? आइए, जानते हैं ऐसा क्यों होता है?

फल न आने के क्या हैं खास कारण

-कुछ पारंपरिक किस्मों में भी प्राकृतिक रूप से कम फूल और कम फल बनते हैं, इसलिए अधिक फल उत्पादन के लिए हमेशा उन्नत किस्में ही लगाएं, जो कम समय में अधिक उत्पादन देती हैं.

-अपने क्षेत्र के अनुसार ही किस्मों का चुनाव करें. स्थानीय जलवायु के अनुकूल अगर किस्म का चयन नहीं किया गया तो, उत्पादन में कमी आ सकती है.

-कई बार कुछ किस्मों में कम उम्र के दौरान पौधों में फूल नहीं आते. वहीं पुराने हुए पेड़ों की छंटाई भी जरूरी होती है. अधिक उम्र के पेड़ों में यदि नियमित छंटाई नहीं की गई हो, तो नई फलदार शाखाएं नहीं बनती हैं, जिससे उत्पादन में कमी आती है.

-पौधों के असंतुलित पोषण प्रबंधन के चलते भी फलत कम होती है.

इसके अलावा :

-नाइट्रोजन की अधिकता.

-अधिक पत्तियां, कम फूल.

-फॉस्फोरस व पोटाश की कमी.

-सूक्ष्म पोषक तत्त्व (जिंक, बोरॉन, आयरन) की कमी होना.

-मिट्टी में सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी का होना भी एक खास कारण हो सकता है, इसलिए समय पर मिट्टी की जांच से मिले नतीजों के अनुसार बागबानी करें और किस्मों का चुनाव करें.

-इसके अलावा लंबे समय तक लगातार रासायनिक उर्वरकों के उपयोग के कारण भी यह समस्या हो सकती है.

-उचित जल प्रबंधन न होना, अधिक सिंचाई जड़ों में सड़न भी फूल झड़ने का कारण हो सकते हैं.

-कम सिंचाई से भी पौधे में तनाव होता है जिससे फूल बनना कम हो जाता है.

-पुराने पेड़ों का उचित जीर्णोद्वार/प्रूनिंग न होना भी इसके लिए जिम्मेदार है.

समय पर तुरंत करें कीट एवं रोगों का प्रबंधन

थ्रिप्स, माहू, मिलीबग, फल मक्खी आदि से फूलों और कलियों को नुकसान पहुंचता है. फफूंद, जीवाणु एवं वायरस जनित रोग भी फलत को प्रभावित करते हैं.

-अधिक तापमान, अनियमित वर्षा, सूखा या तेज हवाएं फूलों के गिरने का प्रमुख कारण बनती हैं. वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन के कारण यह समस्या दिनोंदिन बढ़ रही है.

क्या है समाधान

-उपयुक्त किस्मों का चयन करें.

-संतुलित पोषण प्रबंधन करें.

-सूक्ष्म पोषक तत्त्व का ध्यान रखें.

-फर्टिगेशन (ड्रिप के साथ उर्वरक)
बायोफर्टिलाइजर का उपयोग करें.

-जल प्रबंधन में ड्रिप सिंचाई तकनीक अपनाएं जिससे 30 से 40 फीसदी पानी की बचत होती है.

-फूल बनने के समय हल्की और नियमित सिंचाई करें.

-जल भराव न होने दें.

-एकीकृत कीट एवं रोग प्रबंधन अपनाएं.

जैविक तरीकों से रोकथाम

-नीम तेल 5 फीसदी का छिड़काव करें.

-ट्राइकोडर्मा द्वारा मृदा उपचार करें.

रासायनिक तरीकों से रोकथाम

-इमिडाक्लोप्रिड/थायमेथोक्साम

-कॉपर ऑक्सीक्लोराइड / बोर्डो मिश्रण

-फूल आने के समय अत्यधिक कीटनाशकों का प्रयोग न करें, इससे परागण होने में कमी होती है.

मधुमक्खी से बढ़ती है फलत

-मधुमक्खियों की उपस्थिति से लगभग 30 फीसदी तक उत्पादन में बढ़त होती है. इसलिए बाग में मधुमक्खी पालन करना पेड़ों से उत्पादन बढ़ाना भी है.

इसलिए बागवान यह जान लें कि पेड़ों से अगर सही उत्पादन नहीं मिल रहा है. उचित मात्रा में फल नहीं आ रहे हैं, तो इसका समाधान पूरी तरह संभव है. जरूरत है सही किस्म का चयन, संतुलित पोषण प्रबंधन, वैज्ञानिक तरीके से सिंचाई, समय पर पेड़ों की छंटाई तथा कीट-रोग प्रबंधन अपनाकर बागबान कम फल आने की समस्या से निजात पा सकते हैं.

यदि बागबान आधुनिक तकनीकों को अपनाएगा तो न केवल उत्पादन बढ़ेगा बल्कि उत्पादन भी अच्छा मिलेगा.

इसके अलावा किसान अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), कृषि संस्थान के बागबानी विशेषज्ञों से सलाह लेकर अपनी समस्या का समाधान कर सकता है.

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