Animal diseases-
इसे जुहारी बुखार भी कहते हैं. यह बीमारी नमकीन मिट्टी में चराए जाने वाले पशुओं में होती है. बैसीलस एंथरेसिस जीवाणु मुंह, नाक, चोट, मक्खियों या अन्य काटने वाले जीवों के माध्यम से खून में जाने के कारण एंथ्रेक्स होता है. इस से बीमार मरे जानवरों की खाल को न जलाना और न दफनाना भी इस के फैलाव की वजह है. यह तालाबों में संक्रमित शव को डालने से चरने वाले पशुओं में फैल सकती है.
भेड़ों या घोड़ों में संक्रमण आमतौर पर संक्रमित चरागाह जमीन पर चराई का ही नतीजा होता है. इस के अलावा यह दूषित आहार के माध्यम से भी फैलता है. एंथ्रेक्स स्पोर 100 साल या उस से अधिक समय तक मिट्टी में जिंदा रह सकता है.
लक्षण:
एंथ्रेक्स के लक्षण पशु के संक्रमण मार्ग पर निर्भर करते हैं. अगर यह पशु में मुंह या नाक के माध्यम से जाता है, तो इस के लक्षण तेजी से पैदा हो जाते हैं और पशु की जल्दी ही मौत हो जाती है. जब संक्रमण चोट या कीड़े के काटने की वजह से त्वचा के माध्यम से शरीर में जाता है, तो चोट के स्थान पर लक्षण दिखाई देते हैं.
चोट वाली जगह पर सूजन शुरू में गरम और बाद में ठंडी और संवेदनहीन हो जाती है.
नाक से खून जैसा या हलके चाकलेटी रंग का पानी निकलता है और बीमार पशु के मल के रास्ते से काला खून निकलता है.
पशु का गुदा बाहर आ जाता है और उस पर लाल रंग के चकत्ते दिखाई देते हैं.
पशु को तेज बुखार होता है जिस के कारण वह बेहोश हो कर मर जाता है.
रोकथाम व उपचार
यह बहुत ही घातक बीमारी है और इस से पशु का इलाज हो पाना मुश्किल हो जाता है.
लंबे समय से इस बीमारी के निदान के लिए एंटीबायोटिक दवा पैनिसिलीन का इस्तेमाल किया जा रहा है.
इस के उपचार का तरीका अलगअलग हो सकता है. अगर दवाओं का इस्तेमाल बीमारी के शुरू होते ही कर रहे हैं, तो इस के नतीजे अच्छे भी हो सकते हैं. एंथ्रेक्स का एक टीका लगवाने के बाद दूसरा टीका लगाने के लिए 2 हफ्ते तक इंतजार करना चाहिए. टीके जीवाणु के सजीव रूप होते हैं और एंटीबायोटिक दवाएं टीके को मार सकती हैं या बेअसर कर सकती हैं. इसलिए टीकाकरण के बाद एंटीबायोटिक दवाओं के उपचार से बचना चाहिए. मरे पशु को खाल सहित मिट्टी में दबा दें. बीमारी के स्थान पर कीटाणुनाशक डाल कर सफाई करें.





