Fraud Against Farmers-
मंडी हो या बाजार हर कदम पर किसान ठगे जाते हैं. नेतागण किसानों के लिए सिर्फ घडि़याली आंसू बहाते हैं, क्योंकि उन्हें किसानों के वोट लेने होते हैं. असल में किसान अपनी परेशानियों से तंग रहते हैं. जब तक उन के बस में होता है तब तक वे हर किस्म की मार सहते हैं. कई बार खुद जान गवां देते हैं, लेकिन ठगने, लूटने व सताने वालों की जान नहीं लेते.
खेती से होने वाली कमाई बढ़ाने के सरकारी हथियार भोथरे हैं. किसानों से जुड़ी यह जमीनी हकीकत ओहदेदारों को नजर नहीं आती. लिहाजा किसानों के हालात नहीं सुधरते. प्रधानमंत्री ने किसानों की खातिर ठोस स्कीमें चलाने की हिदायत दी थी, लेकिन मातहत नहीं मानते. जब रसोईगैस की छूट खातों में जाने लगी, तो खाद की छूट किसानों के खातों में क्यों नहीं भेजी जाती? गन्नाकिसानों का बकाया क्यों नहीं मिल रहा? ऐसे और भी कई मामले हैं.
बरबादी की वजहें
गरीबी :
नई तकनीकें गरीबी दूर करने में कामयाब हैं, लेकिन तालीम, जानकारी व जागरूकता की कमी से किसानों की आमदनी कम है. ऊपर से कम उपज, मंडी में लूट व उपज के वाजिब दाम न मिलने से ज्यादातर किसान तंगहाल रहते हैं.
कर्ज :
रोटी, कपड़ा, मकान व खेती की जरूरतों को पूरा करने के लिए किसान सिर से पांव तक कर्ज में डूबे रहते हैं. वक्त पर कर्ज की अदायगी नहीं हो पाती और?ब्याज का बोझ बढ़ता रहता है. कई राज्यों में किसान कपास जैसी फसलों को बचाने के लिए महंगे कीटनाशक कर्ज ले कर खरीदते हैं, लेकिन नकली दवाओं से कीड़े नहीं मरते.
घूस :
देश में 85 फीसदी छोटे किसान हैं. पटवारी, बाबू, काननूगो, सूदखोर, मंडी, चकबंदी वाले उन की कमजोरी का फायदा उठाते हैं. जराजरा से काम के लिए उन्हें धक्के खिलाते हैं और तगड़ी घूस लेते हैं. गरीबों को कर्ज व छूट पाने के लिए ही नहीं अपने हर काम के लिए सरकारी मुलाजिमों को घूस देनी पड़ती है. इस से उन की जेब कटती है.
मौसम :
कीड़ों व बीमारियों से फसलें बचाना आसान नहीं है, ऊपर से मौसम की मार किसान की कमर तोड़ देती है. मौसम पर किसी का जोर नहीं चलता. अकसर मौसम के वैज्ञानिकों के अनुमान भी गलत साबित होते हैं.
मुआवजे का मजाक :
सभी किसान बीमे से कवर होने चाहिए, ताकि फसल खराब होने पर उन्हें मुआवजे से राहत मिले, लेकिन ऐसा नहीं है. कुछ रकम गरीब किसानों के बीमा प्रीमियम पर लगे तो किसान बरबाद होने से बच सकते हैं. मौसम की तबाही का मुआवजा भी किसानों को कायदे से नहीं मिल पाता.
सूखे व ओलों की मार पर राहत के लिए सौ रुपए तक के चेक किसानों को लंबे इंतजार के बाद मिलते हैं, क्योंकि सरकारी फाइलें चींटी की चाल चलती हैं. बारिश व ओले मार्च में पड़े थे, माली इमदाद जुलाई के आखिर में दी गई.
ठगी :
बाजार से खाद, बीज, दवा, मशीन व घरेलू सामानों की खरीदारी करते वक्त सब से ज्यादा किसान ठगे जाते हैं. उन से ज्यादा कीमत ले कर भी उन्हें नकली, घटिया व मिलावटी माल भिड़ा दिया जाता है. तगड़ी कीमत चुकाने के बावजूद बाजार में उन की जेब कटती है. इस तरह की ठगी से किसानों का माली नुकसान होता है.
लूट :
किसान जब अपनी उपज बेचने के लिए निकलते हैं, तो उन की मुश्किलों का दौर फिर शुरू हो जाता है. मंडियों पर काबिज आढ़ती, बिचौलिए, दलाल व मंडी समितियों के मुलाजिम किसानों को अपना शिकार समझ कर झपटते हैं. तरहतरह से उन्हें लूटतेखसोटते हैं. इस तरह किसान की मेहतन की कमाई भी उसे पूरी नहीं मिलती.
घटतौली :
मंडियों में घूमते इनसानी चूहे व घुन किसानों की उपज में खूब धड़ल्ले से कतरब्योंत करते हैं. गन्ना खरीद सेंटरों पर खुल कर करोड़ों रुपए की घटतौली की जाती है और खोखले व दिखावटी कायदेकानूनों की वजह से बेईमानों का कुछ नहीं बिगड़ता. नुकसान किसानों का होता है और गड़बड़ी करने वालों को बढ़ावा मिलता है.
जोरजबरदस्ती :
किसानों द्वारा दिए गए गन्ने की कीमत के करोड़ों रुपए हर साल चीनी मिलों के मालिक दबा लेते हैं. किसानों को इस बकाए पर कानूनन 15 फीसदी ब्याज देना चाहिए, लेकिन धन्नासेठ मामलों को कोर्टकचहरी में उलझा देते हैं. ऐसे में ब्याज मिलना तो दूर, मूल भी वक्त पर नहीं मिलता. यह किसानों के साथ जोरजुल्म व जबरदस्ती है.
भेदभाव :
खानेपीने की चीजों में मिलावट पकड़े जाने पर दोषियों को जेल व जुर्माने की सजा की खबरें अकसर आती रहती हैं, लेकिन नकली खाद, बीज, दवा और मशीन बेचने व बनाने वालों के खिलाफ कहीं कोई सख्त कार्यवाही सुननेदेखने को नहीं मिलती. किसी बेईमान मुलाजिम के वेतन से किसानों के नुकसान की वसूली भी नहीं होती. यह किसानों के साथ ज्यादती है.
छीनझपट :
खेती किसानों की कमाई का इकलौता जरीया है. अकसर खेती की जमीनें सरकारें जबरदस्ती छीन लेती हैं और मुआवजा कम देती हैं. वह भी घूस दे कर बहुत देर से मिलता है. कई बार भूमाफिया व दबंग जमीन कब्जा लेते हैं. किसान धक्के खाते हैं, लेकिन कहीं सुनवाई नहीं होती. गरीब किसान मुकदमा भी नहीं लड़ सकते. ऐसे में किसान यदि मरें न तो क्या करें?
ज्यादती :
सरकारी मुलाजिमों का वेतन 15-20 फीसदी सालाना बढ़ जाता है. सांसद, विधायक खुद अपने वेतन, पेंशन व सहूलियतों में मनचाहा इजाफा कर लेते हैं. डाक्टर, वकील व कारखानेदार भरपूर कमाई करते हैं. लेकिन खेती की लागत लगातार बढ़ने के बावजूद किसानों की आमदनी बढ़ने की कहीं कोई गारंटी नहीं है.
भेदभाव :
तरक्की की दौड़ में शहरी आगे व ग्रामीण पीछे हैं. इसी तरह खेती में भी पढ़े व बड़े किसान सहूलियतें पाने में छोटों से आगे रहते हैं. राष्ट्रीय कृषि मंडी व ई मंडी में आनलाइन उपज बेचने का फायदा भी बड़े किसानों को ही मिलेगा. छोटे किसानों की उपज वाजिब कीमत पर नजदीकी सेंटरों में खरीदने का पुख्ता इंतजाम नहीं है.
परदेदारी :
सूचना के साधन बढ़ने के बावजूद आज भी गांवों में सूचना व जानकारी की बहुत कमी है. यह पता चल सकता है कि खाद, बीज, दवा व कर्ज कहां मिलेगा, लेकिन सही जानकारी कहां मिलेगी, यह पता करना मुश्किल है.
आखिर इस दर्द की दवा क्या है?
छोटे किसानों की गरीबी दूर हो सकती है, बशर्ते स्कीमें ऐसी हों जिन से किसानों का वाकई भला हो, उन्हें राहत मिले. नकली खाद, बीज, दवा वगैरह बनाने व बेचने वालों व उपज में घटतौली करने वालों को सख्त सजा दी जाए. फसल खराब होने पर सभी किसानों को तुरंत बीमे से वाजिब राहत मिले. बाढ़, सूखे व ओले जैसे हालात में राहत व मुआवजे के फैसले जल्द किए जाएं. Fraud Against Farmers





