बागबानी में पशु पालन (Goat Farming) से कई तरह के फायदे होते हैं. खेती में छाई बेरोजगारी पर लगाम लगेगी और गांवों में रोजगार के अवसर पैदा होंगे. किसानों की आमदनी में इजाफा होने से किसान कर्ज मुक्त होगा और कुदरती संसाधनों का बचाव होगा. इस से किसानों के पास संसाधनों का विकास होगा और उन को मजदूरों की जरूरत कम रहेगी.

सूखे और आधे सूखे इलाकों में पानी की कमी के कारण फसल व सब्जी काफी कम होती है. यहां के किसान सूखे इलाकों में पनपने वाले फलदार पौधे बेर, लसोड़ा, खेजड़ी, कैर लगाने के साथ कम भोजन व पानी की जरूरत वाली बकरी के पालन का काम कर सकते हैं.

बकरियों के लिए बगीचे से मिलने वाली पत्तियों, फूलों, कच्चे फलों व खरपतवार का इस्तेमाल चारे के रूप में कर सकते हैं और बाग के बीच लेमन घास, हाथी घास, रिजका, सेवन घास उगा कर बकरियों को चारा मुहैया करा सकते हैं.

फल उत्पादन :

सूखे इलाकों की खेती में टिकाऊपन लाने व कुदरती संसाधनों के बचाव के लिए फलों की खेती बहुत जरूरी है. बगीचे के रास्ते, बाउंडरी और 20-25 फीसदी रकबे में जलवायु व मिट्टी के अनुसार बेर, खेजड़ी, लसोड़ा, बेलपत्र के बाग लगाने चाहिए.

बागबानी फसलों से ज्यादा आमदनी लेने के लिए उन्नत किस्मों की रोपाई, सही देखरेख, पोषण प्रबंधन, कीट व बीमारी प्रबंधन वैज्ञानिक ढंग से करने चाहिए. किसी भी वजह से एक फसल खत्म होने पर बाग से मिलने वाली पैदावार किसान को माली मदद देती है.

इस के साथ बाग की कटाईछंटाई में मिली शाखाओं का इस्तेमाल बकरी के चारे के रूप में किया जा सकता है.

बकरी पालन :

सूखे व आधे सूखे इलाकों में चारागाह, बागबानी कर बकरी की छोटी इकाई (20+1) का पालन करना चाहिए. इस से दूध, मांस और खाद प्राप्त होती है. बकरी पालन से ज्यादा लाभ लेने के लिए उन्नत नस्लों सिरोही, जखराणा, मारवाड़ी का पालन और सही खानपान वैज्ञानिक विधि से करना चाहिए. इस इकाई से हर साल 24 से 30 बच्चे बेचने लायक मिल जाते हैं.

अगर किसान इन दोनों कामों को मिल कर अपनाएं तो खेती से मिलने वाले घासफूस का भरपूर इस्तेमाल होगा और हर साल 4-5 बार आमदनी मिलेगी. इस तरह की तकनीक अपनाने से कम संसाधनों वाले किसानों के भी आर्थिक स्तर में सुधार होगा. मिट्टी की उर्वरा ताकत बनी रहेगी.

बाग की बनावट :

बाग का रेखांकन करने के लिए खेत के किसी एक किनारे से पौधे के लिए जरूरी दूरी रखते हुए पूरे खेत में दोनों किनारे से इसी विधि द्वारा रेखांकन कर लेते हैं और चुनी जगहों पर पौधे लगाते हैं. चारागाह उद्यानिकी में पौधों की आपसी दूरी सामान्य से 10-15 फीसदी ज्यादा रखनी चाहिए. बगीचों को वर्गाकार विधि से ही लगाना चाहिए, क्योंकि यह सब से आसान व सही तरीका है. इस में सभी तरह के खेती के काम आसानी से किए जा सकते हैं. पौधे लगाने के एक महीने पहले मईजून तक गड्ढे खोद कर 20-25 दिन तक गड्ढों को खुला छोड़ देना चाहिए ताकि तेज धूप से कीटाणु खत्म हो जाएं. गड्ढे खोदते समय ऊपर की आधी उपजाऊ मिट्टी एक तरफ रख देनी चाहिए और बाकी आधी मिट्टी एक तरफ डालनी चाहिए.

गड्ढों की भराई:

खुदाई के एक महीने बाद गड्ढों को भर देना चाहिए.

हर गड्ढे में गोबर की सड़ी हुई खाद 20-25 किलो, सुपर फास्फेट सौ ग्राम, मिथाइल पैराथियान 2 फीसदी, (50 ग्राम) नीम की खली 2 किलो और क्षारीय मिट्टी हो तो 250 ग्राम जिप्सम के मिश्रण में खेत की ऊपरी मिट्टी मिला कर भर दें.

बारिश शुरू होने से पहले मिश्रण से गड्ढे को खेत की सतह से कुछ ऊंचाई तक दबा कर भर देना चाहिए और भरपूर मात्रा में पानी डाल दें ताकि गड्ढे की मिट्टी अच्छी तरह बैठ जाए. 2-3 बार अच्छी बारिश होने के बाद ही पौधों की रोपाई करनी चाहिए.

पौधा रोपण :

सरकारी व अच्छी नर्सरी से खरीदे गए पौधों को तैयार गड्ढों में रोपित करना चाहिए. रोपाई जुलाईअगस्त महीनों में शाम के समय करनी चाहिए. पौधों को रोपने के 2 घंटे पहले लिपटी हुई घास पिंड व पौलिथीन थैली को थोड़े समय के लिए पानी में रख कर उस में मौजूद हवा को बाहर निकालें जिस से पौधा लगाते समय पिंड की मिट्टी बिखरे नहीं. लिपटी हुई घास व पौलिथीन थैली को मिट्टी के पिंड से हलके से हटा देना चाहिए और जड़ों को सुरक्षित रखना चाहिए. पौधे पर लगी पैबंद वाले स्थान व शाखा के जुड़ाव वाले बिंदु को जमीन से 25 सेंटीमीटर ऊपर रखना चाहिए. जरूरत हो तो पौधे को सहारा दें, ताकि पौधा झुके नहीं. पौधा लगाने के बाद सिंचाई करें व समयसमय पर पानी देते रहें. पैबंद के नीचे से निकलने वाली शाखाओं व बीमार शाखाओं को हटाते रहें.

पौधा सूखने लगे तो हलकी निराई कर के केंचुए की खाद में क्लोरोपाइफास नामक दवा मिला कर डालें और सिंचाई करें. संभव हो सके तो छाछ व चाय का पानी डालें. अगर पत्तियों पर किसी तरह के कीट दिखाई दें तो मेलाथियान नामक दवा का छिड़काव करना चाहिए.

घास रोपण :

3 से 5 साल पुराने बगीचे में जुलाई महीने में पौधों की 2 लाइनों के बीच 5 फुट चौड़ाई में अच्छी जुताई करें. उस में 150 क्विंटल सड़ी हुई गोबर की खाद के साथ में 75 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट, 50 किलोग्राम म्यूरेट आफ पोटाश और 25 किलोग्राम यूरिया मिला कर बारिश शुरू होने पर 30×30 सेंटीमीटर की दूरी पर घास की पौध रोपण कर देना चाहिए.

सिंचाई व सही देखरेख करने से एक साल में चारागाह तैयार हो जाता है, जिस से घास की कटाई कर बकरियों को दी जा सकती है. फल पेड़ों पर फलन नहीं होने की दशा में सीधी चराई भी की जा सकती है, परंतु यह ध्यान में रखना चाहिए कि बकरियां पौधों को किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाएं.

निराईगुड़ाई :

जरूरत के अनुसार समयसमय पर सिंचाई, निराईगुड़ाई, जल प्ररोहों को काटना, बीमार शाखाओं को काटना व पौधों का ढांचा बनाने के लिए ट्रेनिंग वगैरह काम करते रहना चाहिए. अच्छे फल व ज्यादा उपज लेने के लिए पौधों को कीट व बीमारियों से बचाना चाहिए. सूक्ष्म तत्त्वों की पूर्ति के लिए उर्वरकों का पत्तों पर छिड़काव करते रहना लाभदायक रहता है.

एक हेक्टेयर में बेर या खेजड़ी के साथ सालाना घासों को उगा कर 20 बकरी और 1 बकरे की इकाई का पालन आसानी से किया जा सकता है.

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