Gooseberry : आंवले के पुराने बगीचों का सुधार

Gooseberry : आंवला बेकार व किसी भी प्रकार की जमीन व जलवायु में उगाया जाने वाला पोषक तत्त्वों से भरपूर एक औषधीय फल है. 30 से 50 साल पुराने आंवले (Gooseberry) के पेड़ों की पैदावार काफी कम होने लगती है और इन की ऊंचाई ज्यादा होती है. ये कारोबारी लिहाज से फायदेमंद नहीं होते हैं. ऐसे पुराने आंवले (Gooseberry) के पेड़ों से ज्यादा उत्पादन लेने के लिए उन का जीर्णोद्धार यानी सुधार करने की जरूरत होती है. आंवले (Gooseberry) के पुराने पेड़ों का सुधार निम्नलिखित तरीके से करना चाहिए:

* ऐसे पेड़ों को दिसंबर या जनवरी में जमीन से 2.5 से 3.0 मीटर ऊंचाई से काट देना चाहिए. कटे हुए हिस्से को गाय के गोबर, मिट्टी व पानी या सिर्फ गाय के गोबर से लेप देते हैं, जिस से फफूंदीयुक्त रोग के संक्रमण का डर नहीं रहता.

* इस के बाद नए शूट्स यानी कल्ले निकलते हैं, जिन में से 4 से 6 स्वस्थ कल्लों या शाखाओं को सही जगह पर बचा कर रखते हैं. बाकी शाखाओं को काट देते हैं. यह ध्यान रखना चाहिए कि बची शाखाएं चारों तरफ  वाली हों.

* जून या जुलाई में किसी अच्छी प्रजाति से बची शाखाओं (कल्लों) पर बडिंग कर देना चाहिए. इस समय रोग व कीटों से बचाव जरूर करना चाहिए.

* बडिंग के 3 साल बाद पौधा एक पेड़ के रूप में जम जाएगा और फूल व फल देने लगेगा.

* बडिंग के पहले व दूसरे साल करीब 9 किलोग्राम फल प्रति पेड़ की दर से आएंगे, लेकिन तीसरे साल से करीब 110 किलोग्राम फल प्रति पेड़ की दर से हासिल होंगे.

* आंवले (Gooseberry) की छंटाई के बाद 7 से 10 दिनों के अंतराल पर थाले बना कर सिंचाई करनी चाहिए, जिस से नए कल्ले जल्दी निकलते हैं. टपका विधि से सिंचाई करना भी फायदेमंद हैं.

* भिंडी, गोभी, धनिया, हलदी, जमीकंद वगैरह सब्जियां और गेंदा, ग्लेडियोलस वगैरह फूल वाले पौधों को अंत: फसल के रूप में लगा सकते हैं. खारी जमीन में ढेंचा की खेती कर के मिट्टी को सुधारा जा सकता है.

* धान का पुआल, गन्ने की पेराई के बाद बचे भाग वगैरह को बगीचे में बिछा दें, जिस से नमी संरक्षण भी होगा और कार्बनिक पदार्थ भी बढ़ेगा. काली प्लास्टिक शीट भी फायदेमंद है.

* जीर्णोद्धार के समय 50 किलोग्राम प्रति पेड़ सड़ी हुई गोबर की खाद डालनी चाहिए. पेड़ों की कटाई के 1 महीने बाद 500 ग्राम नाइट्रोजन, 500 ग्राम फास्फोरस और 1 किलोग्राम पोटाश प्रति पेड़ के हिसाब से डालनी चाहिए.

उर्वरकों को मिट्टी में मिला देना चाहिए. खारी जमीन में 100 ग्राम बोरैक्स, 100 ग्राम जिंक सल्फेट व 100 ग्राम कापर सल्फेट प्रति पेड़ की दर से डालना चाहिए.

* अगस्त सितंबर में बोरान, जिंक व कापर (0.4 फीसदी) को हाइड्रेड चूने के साथ मिला कर छिड़काव करना चाहिए. इस से फलों का झड़ना रुकता है व फलों की क्वालिटी बेहतर होती है.

मुख्य कीट : आंवले (Gooseberry) में ज्यादातर शूट गाल मेकर, छाल खाने वाला कैटरपिलर, मिलीबग, उखटा, स्टोन भेदक वगैरह कीड़ों का प्रकोप होता है. इन कीड़ों से बचाव के लिए हमेशा सतर्क रहना चाहिए.

नियंत्रण

* शूट गाल मेकर के असर वाली टहनियों को काट देना चाहिए. 0.5 फीसदी मोनोक्रोटोफास अक्तूबर में छिड़कना चाहिए.

* छाल खाने वाले कैटरपिलर से बचाव के लिए 0.25 फीसदी डाइक्लोरोबोस से भीगी रुई कैटरपिलर द्वारा बनाए छेदों पर लगाएं और मिट्टी से लेप दें.

* मिलीबग से बचाव करने के लिए 0.05 फीसदी मोनोक्रोटोफास का छिड़काव करें. स्टोन भेदक कीट को मारने के लिए 0.2 फीसदी कार्बेरिल या 0.04 फीसदी मोनोक्रोटोफास का छिड़काव करें.

* छाल खाने वाली इल्ली द्वारा बनाए छेदों में 0.05 फीसदी इंडोसल्फान या 0.03 फीसदी मोनोक्रोटोफास डाल कर छेदों को मिट्टी से बंद करें. इस से पेड़ों को छाल खाने वाली इल्ली से नजात मिल जाएगी.

मुख्य रोग : आंवले (Gooseberry) में अकसर रतुआ (रावेनेलिया एंबलीसी) रोग  प्रकोप हो जाता है, जो काफी घातक होता है.

नियंत्रण

* सितंबर के शुरू में इंडोफिल एम 45, 0.3 फीसदी का छिड़काव करें और  15 दिनों बाद दोबारा छिड़काव करें. इस से रतुआ रोग को फैलने से रोका जा सकता है.

आंवले की खासीयत

* आयुर्वेद में आंवला एक खास फसल है.

* यह फल विटामिन सी का अच्छा स्रोत है.

* आंवला स्कर्वी रोधी (एंटी स्कार्बेटिक), मूत्रवर्धक, शिथिलता रोधी व जैविक रोधी (एंटीबायोटिक) होता है.

आंवले (Gooseberry) से फाइलेंबीन प्राप्त किया जाता है, जो केंद्रीय तंत्र के लिए अच्छा होता है.

* आंवला जिगर को मजबूत बनाने का एक अच्छा टानिक है.

Medicinal Plants : किसान औषधीय पौधे लगा कर ज्यादा कमाएं

Medicinal Plants : फसलों के साथ लगाए हुए पेड़ बहुत फायदेमंद होते हैं, क्योंकि पेड़ों के बड़े हो जाने पर उन से मोटी रकम मिलती है. इसलिए बहुत से किसान खेती से ज्यादा कमाई करने के लिए अकसर अपने खेतों की मेंड़ों पर शीशम, साल, सागौन या पापुलर आदि के पेड़ लगाते हैं.

बदलते दौर में किसान खेती के साथ औषधीय पौधे लगा कर अच्छी कमाई कर सकते हैं. यह बात अलग है कि ज्यादातर किसान इन के बारे में नहीं जानते. औषधीय पौधों के बीज, पौध, रोपण सामग्री व तकनीकी जानकारी भी हर किसी को आसानी से नहीं मिलती. इसलिए ज्यादातर किसान औषधीय पौधे नहीं लगाते.

माहिरों की खोजबीन के मुताबिक पहचाने गए औषधीय पौधों का कुनबा बहुत बड़ा है. इस पर 3 नई किताबें भारत सरकार की चिकित्सा अनुंसधान परिषद ने पिछले दिनों छापी हैं. इन में शामिल औषधीय पौधों व किस्मों की गिनती 1100 से ऊपर है, लेकिन फिलहाल इन में से सिर्फ 35 औषधीय पौधों की क्वालिटी के लिए ही मानक तयशुदा हैं.

ऐसा करें किसान

अशोक, अश्वगंधा, अर्जुन, अतीस, बायबिड़ंग, बेल, ब्राह्मी, चंदन, चिरायता, गिलोय, गूगल, इसबगोल, जटा मांसी, कालमेघ, कुटकी, शतावर, शंखपुष्पी, सफेदमूसली, दालचीनी, हरड़, बहेड़ा, आंवला, सौंफ व सनाय वगैरह की मांग आमतौर पर ज्यादा रहती है. औषधीय पौधों से मिली कई चीजें हमारे देश से दूसरे मुल्कों को भेजी जाती हैं, लेकिन इस में ज्यादातर  हिस्सा रसायनों के बगैर उगाए गए औषधीय पौधों से मिली आरगैनिक सामग्री का रहता है.

मेरठ के किसान महेंद्र सिंह ने बताया कि ज्यादातर किसान अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए पैसा आने के इंताजर में रहते हैं, जबकि औषधीय पौधों से पैसा काफी देर से मिलता है, लेकिन तुलसी की फसल सब से जल्दी सिर्फ 3 महीने में पक कर तैयार हो जाती है. लिहाजा किसान हिचक छोड़ कर इस काम की शुरुआत कर सकते हैं.

इस के अलावा अश्वगंधा, आंवला, ब्राह्मी, चिरायता, गुडुची, कालमेघ, मकोय, पाषणभेद, सनाय, मेहंदी व बच आदि 1 साल में तैयार हो जाते हैं. लिहाजा किसान अपनी पसंद व कूवत के मुताबिक पेड़ चुन सकते हैं. देसी, यूनानी व होम्योपैथिक वगैरह दवाएं औषधीय पौधों से मिली चीजों से बनती हैं. लिहाजा बहुत सी दवाओं के लिए कच्चे माल की भारी मांग रहती है. नतीजतन औषधीय पौधे बहुत तेजी के साथ घट रहे हैं, जबकि औषधीय पौधों की खेती उतनी तेजी से नहीं बढ़ रही, जितनी कि जरूरत है. इस के मद्देनजर सरकार औषधीय पौधे उगाने को बढ़ावा दे रही है, ताकि देसी दवाएं बनाने वाली कंपनियों को उम्दा क्वालिटी का कच्चा माल व किसानों, बागबानों को उन की मेहनत का वाजिब मुनाफा मिल सके.

औषधीय पौधों को बचाने व बढ़ाने के लिए साल 2000 से केंद्र सरकार का स्वास्थ्य महकमा राष्ट्रीय औषध पौध बोर्ड (एनएमपीबी) के जरीए कई स्कीमें चला रहा है.

अपने देश में औषधीय पौधों पर चल रही सरकारी स्कीमों की कमी नहीं है. मसलन राज्य बागबानी मिशन के जरीए चल रही केंद्र पुरोनिधानित स्कीम में भी औषधीय पौधे उगाने को बढ़ावा दिया जाता है, लेकिन ज्यादातर किसान इतना भी नहीं जानते कि दूसरी फसलों के मुकाबले औषधीय पौधों की खेती ज्यादा फायदेमंद है. यदि सरकारें ध्यान दें तो औषधीय पौधों से किसानों की माली हालत जल्दी व ज्यादा सुधर सकती है.

इस के लिए जरूरी है कि किसान औषधीय पौधे उगाने से ले कर उन के तैयार होने तक की पूरी तकनीक ठीक से जानते हों. हालांकि यह काम कोई मुश्किल या नामुमकिन नहीं है. लखनऊ की सरकारी संस्था सीमैप से ट्रेनिंग ले कर किसान औषधीय पौधे उगाना सीख सकते हैं व उन से हासिल सामग्री बेच कर अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं.

चलन पुराना

देसी, यूनानी, सिद्ध व होम्योपैथिक दवाएं बनाने में जड़ीबूटियों का इस्तेमाल सदियों से किया जाता रहा है. औषधीय पौधों से हासिल फल, फूल, बीज, छाल, तना, पत्ती व जड़ के हिस्से जड़ीबूटियां हैं. हमारे देश में 3 हजार से ज्यादा छोटीबड़ी कंपनियां देसी दवाएं बनाती हैं. अगर जानकारी हो तो औषधीय पौधों के उत्पाद बिकने में दिक्कत नहीं होती. फिर भी बेहतर होगा कि पहले ही किसी दवा कंपनी या खरीदार से बात कर ली जाए. हरिद्वार की पतंजलि फार्मेसी रोज सैकड़ों टन ग्वारपाठा व आंवला वगैरह कई चीजें खरीदती है.

दिल्ली जैसे बड़े शहरों में भी औषधीय उत्पादों के बाजार हैं. यह बात अलग है कि आम किसानों को यह जानकारी नहीं है कि औषधीय पौधों के उत्पाद कहां, कब, कैसे व कितनी कीमत में बिकते हैं. लिहाजा किसान पूरी जानकारी के बाद ही औषधीय पौधे लगाएं, ताकि उन्हें बाद में उपज बेचने के लिए परेशान न होना पड़े. इस के लिए जागरूकता जरूरी है.

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में सहकारिता महकमे के रजिस्ट्रारों ने किसानों की मदद व सहूलियत के लिए जड़ीबूटी संग्रह व बिक्री के सहकारी संगठन भी बना रखे हैं. इस के अलावा औषधीय एवं सगंध पौधा उत्पाद संघ नाम की संस्था बी 83, अशोकपुरा, हजपुरा डेली रोड, पटना, बिहार में भी चल रही है. साथ ही देसी दवा बनाने में काम आने वाले कच्चे माल के अनेक खरीदारों के पते इंटरनेट पर भी मौजूद हैं.

Medicinal Plants

खोजबीन

दिल्ली में भारत सरकार की एक मशहूर संस्था है वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद, जिसे सीएसआईआर भी कहा जाता है. इस संस्था के तहत उत्तर प्रदेश के लखनऊ शहर में केंद्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान काम कर रहा है, जिसे सीमैप भी कहते हैं.

इस संस्थान ने औषधीय पौधों की खेती को बढ़ावा देने का काफी काम किया है.

सीमैप ने औषधीय पौधों की उम्दा किस्में मुहैया कराने, प्रसंस्करण करने, किफायती उपकरण निकालने, ट्रेनिंग व सलाहमशविरा देने से ले कर बाजार उपलब्ध कराने तक हर पहलू पर काम किया है. लिहाजा किसान इस संस्था से मदद ले सकते हैं. सीमैप औषधीय पौधों की जानकारी देने के लिए किसान मेले एवं प्रदर्शनी लगाती है, ताकि किसान सीधे वैज्ञानिकों से मिल कर सवाल पूछ सकें.

इस के अलावा सीमैप संस्था फार्म बुलेटिन, प्रोसेसिंग पर पुस्तिका व बाजार के लिए मार्केटिंग डायरेक्टरी वगैरह मुहैया कराती है. किसान डायरेक्टरी में खरीदारों के पते देख सकते हैं. इस के अलावा किसानों की सहूलियत के लिए सीमैप की बुकलेट ओस ज्ञान्या में भी 70 खरीदारों के पते छापे गए हैं.

उत्तर प्रदेश के जंगल महकमे की नर्सरी में भी लगभग 85 किस्मों के औषधीय पौधे किसानों को वाजिब कीमत पर मुहैया कराए जाते हैं. किसान अकेले या मिल कर स्वयं सहायता समूह, सहकारी समिति या उत्पादक कंपनी आदि बना कर औषधीय खेती व उस की उपज बेचने का काम कर सकते हैं. जरूरत पहल करने की है.

औषधीय पौधों की किस्म, रोपण तकनीक, औजार, मशीनों व प्रोसेसिंग आदि के बारे में अधिक जानकारी के लिए किसान व उद्यमी सीमैप के नीचे दिए पते पर संपर्क कर सकते हैं:

निदेशक, केंद्रीय औषधीय एवं सगंध पौधा संस्थान, सीमैप, कुकरैल, लखनऊ : 226015, फोन 0522-2359623.

सरकारी स्कीमों में छूट, सहूलियत व माली इमदाद आदि के लिए निम्न पते पर संपर्क कर सकते हैं:

मुख्य कार्यकारी, राष्ट्रीय औषध पौधा बोर्ड, आयूष भवन, तीसरा तल, बी ब्लाक, जीपीओ कांप्लैक्स, आईएनए, नई दिल्ली 110023.

खास औषधीय पौधे

अश्वगंधा, गिलोय, रुद्राक्ष, काला सिरस, अशोक, भूमि आंवला, चिरायता, पंगारा, हारसिंगार, मुलैहटी, गूलर, वन तुलसी, सफेद तुलसी, रामा तुलसी, सदाबहार, तुन, पीला वासा, पोई, कचनार, पत्थर चूर, पलाश, कट करंज, प्रियंगू, मद, भांग, देवकिली, अजवायन, कसामर्द, सफेद मूसली, काली मूसली, कालमेघ, इसबगोल, घृतकुमारी, सनाय, बच, भृंगराज, आंवला, तगर, जंगली अरंड, सेहुंड, दूधी, कैंथा, बरगद, बबूल, बेच, चंदन, सप्तपर्णी, अंबाहलदी, पीली हलदी, हरी चाय, तेजपात, लघुपाठा, हाड़जोड़, नीबू, भाट, अपराजिता, कुंदरू, लसोड़ा, वरुन, सुदर्शन, जमालघोटा, पीपल, गुड़मार, गुड़हल, रतनजोत, आम, नीम, जामुन, इमली, बकैन, मौलश्री, जल ब्राह्मी, शहतूत, लाल कनेर, सर्पगंधा, सेमल, सागौन, सतावर, कदंब, ईश्वरमूल, दमनक, कटहल, काली मकोय, मोथा, शीशम, काला धतूरा, कनक धतूरा, गेंठी, जापानी पोदीना, वाराहीकंद, अनंतमूल, कुचैला, नागेश्वर, गोखरू व कैंच.

कुछ बड़े खरीदारों के पते

* मै. पतंजलि फार्मेसी, हरिद्वार, उत्तराखंड.

*  मै. डाबर इंडिया लि., 8/3 आसफअली रोड, नई दिल्ली-110001. फोन : 011-23253488.

* मै. बैद्यनाथ आर्युवेद भवन, प्रा. लि. लादीनगर, पटना. फोन : 0612-2353143.

*  मै. हिमालय ड्रग कंपनी, मकाली, बेंगलूरू, फोन : 080-23714444.

*  मै. झंडू इमामी लि., तीसरा तल, गोल्डन चैंबर, नया लिंक रोड, अंधेरी पश्चिम, मुंबई,

फोन : 022-26709000.

* मै. मेहता फार्मास्यूटिकल, छीहरता, जीटी रोड, अमृतसर, पंजाब.

Orchards: लीची, आम, आंवला व अमरूद के बागों की रोपाई

 

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Orchards : फलों की मांग दिनोंदिन बढ़ती जा रही है. फल वाले पौधों को लगा कर किसान ज्यादा फायदा कमाने लगे हैं. किसान फल वाले पेड़ों को लगा कर मिट्टी व पानी को बचाते हुए प्रति हेक्टेयर क्षेत्रफल से अच्छा लाभ प्राप्त कर सकते हैं. फल के पेड़ों से ज्यादा लाभ कमाने के लिए बागों को लगाते समय खास बातों को ध्यान में रखना चाहिए.

फल वाले पौधों का चुनाव

बागबानी की सफलता के लिए फल वाले पौधों का चुनाव स्थान, मिट्टी की किस्म, सिंचाई के साधन व जमीन के अंदर के पानी की गुणवत्ता को ध्यान में रखते हुए करते हैं. शीतोष्ण जलवायु में सेब, आड़ू, चेरी आदि व समशीतोष्ण जलवायु में लीची, अंगूर, लोकाट आदि और उष्ण जलवायु में आम, अमरूद, आंवला, कटहल आदि लगाना ठीक रहता है.

जगह का चुनाव

रोपाई के लिए फल वाले पौधों का चुनाव करने के बाद सही जगह का चुनाव सफल बागबानी के लिए जरूरी है. जगह चुनने के लिए निम्न बातें ध्यान में रखना जरूरी है:

* चुनी गई जगह में पानी नहीं भरा होना चाहिए और मिट्टी का पीएच मान 7-8 के करीब होना चाहिए.

* सिंचाई व जल निकास का अच्छा इंतजाम होना चाहिए.

* वाहन आनेजाने का सही रास्ता होना चाहिए.

* जगह गांव के पास होनी चाहिए.

बाग का रेखांकन

बाग की रोपाई में बाग के रेखांकन को ध्यान में रखते हैं. हर पौधे की वृद्धि के लिए काफी जगह होनी चाहिए ताकि उस का रखरखाव करने में कोई परेशानी न हो. इस बात को ध्यान में रखते हुए आम, अमरूद, लीची व आंवला की रोपाई वर्गाकार व आयताकार तरीके से करनी चाहिए. आम, अमरूद, लीची व आंवला की  रोपाई में लाइन से लाइन और पौध से पौध की दूरी इस तरह रखते हैं:

आम  : 10×10 मीटर

लीची : 12×10 मीटर

आंवला : 10×18 मीटर

अमरूद : 6×6 मीटर.

बाग का रेखांकन बहुत जरूरी है. रेखांकन ठीक न होने पर बाग की उत्पादकता पर असर पड़ता है. बाग का रेखांकन करने के लिए पौधे की तय दूरी से आधी दूरी पर खेत के एक कोने से पहली लाइन बनाते हैं. पहली लाइन के बाद सभी लाइनें पौधों हेतु निर्धारित पूरी दूरी पर बनाते हैं. जहां लाइनें एकदूसरे को काटती हैं, उसी जगह पर गड्ढा खोदते हैं.

Orchards

गड्ढों की खुदाई

आम, आंवला व लीची के लिए 3×3×3 फुट और अमरूद व बेल के लिए 2×2×2 फुट के आकर के गड्ढे खोदते हैं. खुदाई करने के बाद गड्ढों को धूप में खुला छोड़ देते हैं, जिस से उन में मौजूद नुकसानदायक कीट व रोगों की विभिन्न अवस्थाएं खत्म हो जाएं.

इस के बाद गड्ढे को गोबर की खाद, बालू व उसी खेत की मिट्टी को 1:1:1 में मिला कर जमीन से 20 सेंटीमीटर ऊंचाई तक भरते हैं. इस मिश्रण में 100 ग्राम ट्राइकोडर्मा भी मिला देते हैं. गड्ढा भरने के बाद उस की सिंचाई कर देते हैं. जिस से गड्ढा बैठ जाए. इस के बाद बैठे हुए गड्ढों में दोबारा उसी मिश्रण को भर देते हैं और गड्ढे के स्थान पर कुछ निशान लगा देते हैं.

पौध का चुनाव

आम, अमरूद, लीची व आंवला की रोपाई के लिए मुख्य प्रजातियां निम्न प्रकार हैं :

आम : दशहरी, दशहरी 51, लंगड़ा, चौसा, आम्रपाली व बंबइया.

अमरूद : लखनऊ 49, इलाहाबादी, सफेदा व ललित.

लीची : रोज सैंटेड, कलकतिया व साही.

आंवला : बनारसी, बलवंत, नरेंद्र आंवला 6, नरेंद्र आंवला 7, नरेंद्र आंवला 10, चकइया व फ्रांसिस.

रोपाई के लिए पौध किसी जानीमानी पौधशाला से खरीदें. फल की स्वस्थ पौध निम्न मानक के अनुसार होनी चाहिए :

* पौध की औसत ऊंचाई 75-100 सेंटीमीटर हो.

* पौधे के तने की मोटाई 1 से 1.5 सेंटीमीटर हो.

* ग्राफ्टिंग व बडिंग किए गए पौधे की उम्र करीब 1 साल हो.

* पौधा रोग व बीमारियों से मुक्त हो.

पौध की रोपाई

आम, अमरूद, लीची व आंवला के पौधों की रोपाई जुलाई व अगस्त महीने में करते हैं. रोपाई के समय पिंडी के आकार का गड्ढा मुख्य गड्ढे में ऊपरी सतह के बीच में बनाते हैं. इस के बाद पौधे की पिंडी की उस में इस प्रकार से रोपाई करते हैं कि पिंडी का ऊपरी हिस्सा जमीन की सतह से 2 से 3 सेंटीमीटर नीचे रहे. रोपाई शाम के समय करने के बाद हलकी सिंचाई कर देते हैं. पौधा लगाते समय इस बात का खास ध्यान रखते हैं कि किसी भी हालत में पौधे की पिंडी न टूटने पाए.

खास सावधानियां

*  आम व आंवला के बाग में अच्छी फसल लेने के लिए 10 फीसदी दूसरी प्रजाति के पौधे परागणकर्ता पौधों के रूप में लगाएं, जैसे दशहरी आम का बाग लगाते समय 10 फीसदी पौधे बंबई हरा या पीला के लगाएं. इसी तरह लंगड़ा या चौसा प्रजाति के आमों का बाग लगाते समय 10 फीसदी पौधे दशहरी आम के लगाएं.

* हर तीसरी लाइन में तीसरा पौधा परागणकर्ता पौधा लगाएं.

* आंवले की पौध की रोपाई करते समय एक जगह पर एक से अधिक प्रजातियों की रोपाई करें.

* जल्दी पकने वाली प्रजातियों के पौधे एक जगह पर और देर से पकने वाली प्रजातियों के पौधे दूसरी जगह पर लगाएं ताकि फल तैयार होने पर तोड़ने में परेशानी न हो.

* जंगल के पास बाग न लगाएं.

* लगाए गए पौधों में ग्राफ्टिंग/बडिंग से नीचे (मूलवृंत से निकले) कल्ले तोड़ते रहें.

* बागों में सहफसली खेती के रूप में दलहनी, तिलहनी व सब्जियों वाली फसलों का ही चयन करें. किसी भी दशा में रोपित पौधे से ज्यादा ऊंचाई वाली फसलों का चयन न करें.

* पौधों की रोपाई के बाद उर्वरक डालने के लिए और रोगों व कीटों से पौधों की हिफाजत के लिए समयसमय पर विशेषज्ञों की सलाह लेते रहें.

जबलपुर मंडी में हाथोंहाथ बिक रहे हैं छिंदवाड़ा केले (Chhindwara Bananas)

छिंदवाड़ा : जिले के हर्रई विकासखंड के ग्राम भुमका के आदिवासी किसान पूरनलाल इनवाती प्राकृतिक खेती से एक ओर जहां रसायनमुक्त फल सब्जी मार्केट में पहुंचा रहे हैं, तो वहीं लाखों रुपए का शुध्द मुनाफा भी कमा रहे हैं. किसान पूरनलाल इनवाती ने इस वर्ष एक एकड़ में प्राकृतिक पद्धति से केले की खेती कर 4 लाख रुपए का शुध्द मुनाफा कमाया है.

प्राकृतिक पद्धति से उन के द्वारा उगाए गए केले “छिंदवाड़ा केले” के नाम से जबलपुर मंडी में हाथोंहाथ बिक रहे हैं. केले के अलावा उन के द्वारा प्राकृतिक पद्धति से बैगन, टमाटर, मक्का की फसल भी लगाई गई है और आम, कटहल, आंवला, सेब, एप्पल बेर, ड्रैगन फ्रूट, नीबू, संतरा, काजू के पौधों का रोपण भी किया गया है.

किसान पूरनलाल इनवाती द्वारा ड्रिप पद्धति एवं फसल अवषेश का प्रबंधन कर पूरी तरह प्राकृतिक रूप से केले की टिशु कल्चर के द्वारा तैयार किस्म जी-9 लगाई गई है. साथ ही, फसल अवषेश प्रबंधन कर के मिट्टी की गुणवत्ता को सुधारा जा रहा है. पिछले वर्ष आधा एकड में केले की प्राकृतिक खेती कर 2 लाख, 7 हजार रुपए का शुध्द मुनाफा प्राप्त किया गया था.

इस वर्ष एक एकड से 4 से 5 लाख रुपए का शुध्द मुनाफा प्राप्त होना बताया है. एक एकड़ में 800 पौधे लगाए हैं, प्रत्येक पौधे से औसतन 45 किलोग्राम फल प्राप्त हो रहे हैं, जिसे किसान द्वारा जबलपुर मंडी में औसतन 25 रुपए प्रति किलोग्राम के भाव से विक्रय किया जा रहा है.

किसान द्वारा बताया गया कि हमारा प्राकृतिक केला जबलपुर मंडी में छिंदवाड़ा के केले के नाम से प्रसिद्ध है एवं व्यापारियों द्वारा हाथोंहाथ उचित दाम दे कर खरीद लिया जाता है. सामान्यतः जहां सामान्य केले की 15 से 18 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से मंडी में खरीदी होती है, वहीं हमारा प्राकृतिक केला 25 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से हाथोंहाथ बिक रहा है.

किसान द्वारा प्राकृतिक विधि से बैगन, टमाटर एवं मक्का की फसल भी लगाई गई हैं, साथ ही आम, कटहल, आंवला, सेब, एप्पल बेर, ड्रेगन फ्रूट, नीबू, संतरा, काजू के पौधों का भी रोपण किया गया है. किसान द्वारा कड़कनाथ मुरगीपालन, बकरीपालन एवं मछलीपालन इकाई भी स्थापित कर समन्वित खेती की जा रही है.

इस प्रकार कुल लगभग 6 एकड़ जमीन से किसान द्वारा वर्ष में लगभग 10 लाख रुपए का शुध्द लाभ प्राप्त किया जा रहा है. इस से प्रेरणा ले कर जिले के अन्य किसान भी प्राकृतिक खेती को अपना कर एवं समन्वित खेती कर अपनी आय बढ़ा सकते हैं.

किसान द्वारा की जा रही समन्वित खेती के इस उत्कृष्ट उदाहरण का अवलोकन पिछले दिनों जिले के अधिकारियों द्वारा भी किया गया. कलक्टर छिंदवाड़ा शीलेंद्र सिंह के निर्देशानुसार उपसंचालक, कृषि, जितेंद्र कुमार सिंह ने उद्यानिकी महाविद्यालय के डीन एवं सहसंचालक आंचलिक कृषि अनुसंधान केंद्र, चंदनगांव के डा. आरसी शर्मा के साथ किसान पूरनलाल इनवाती के खेत मे पहुंच कर प्राकृतिक पद्धति से एक एकड़ में की जा रही केले की खेती का अवलोकन किया. भ्रमण के दौरान सचिन जैन अनुविभागीय कृषि अधिकारी अमरवाड़ा एवं स्थानीय किसान भी उपस्थित थे.