Wheat Disease : पीला रतुआ गेहूं का दुश्मन

Wheat Disease : सदाबहार अनाज गेहूं की फसल किसानों की आर्थिक रीढ़ है. देश में गेहूं का उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है, लेकिन इस बार ठंड कम पड़ने से गेहूं की फसल पीले रतुआ के खतरों से घिरी हुई है.

पीला रतुआ एक ऐसी बीमारी (Wheat Disease) है, जो फसल को 50 से ले कर सौ फीसदी तक बरबाद कर सकती है. अगर समय रहते किसान जागरूक हो जाएं, तो इस रोग के खतरे से बचा भी जा सकता है.

किसान बड़े पैमाने पर गेहूं की अगेती व पछेती फसल की बोआई करते हैं. बरसात न होने और ठंड कम पड़ने के कारण फसल कमजोर हो जाती है. इस बार देश में किसान मौसम की इस बेरुखी के शिकार हो रहे हैं. ऐसे में गेहूं की फसल की अच्छी पैदावार को ले कर चिंताएं बढ़ रही हैं. जनवरी से ले कर मार्च तक अगेतीपछेती खेती में पीला रतुआ रोग लगने की संभावना अधिक रहती है.

कृषि अधिकारी गेहूं को पीला रतुआ से बचाने के लिए किसानों को सतर्क रहने की हिदायत देते हैं. पीला रतुआ एक फफूंद है, जो हवा के जरीए फैसला है. पीला रतुआ का तापमान में गिरावट से सीधा संबंध है.

इस रोग में गेहूं के पौधों की पत्तियों पर पीले व नारंगी रंग के धब्बे पड़ जाते हैं. रोग का प्रकोप बढ़ने पर पौधों के तनों व बालियों पर भी धब्बे पड़ जाते हैं. इस रोग का यदि समय रहते इलाज नहीं किया जाए, तो फसल बरबाद होने का डर रहता है. जब तापमान 25-30 डिगरी से ऊपर चला जाता है, तो पत्तियों की निचली सतह पर रोग के जीवाणु काले रंग की धारियां बना लेते हैं.

किसानों को माहिरों से पूछ कर पता कर लेना चाहिए कि वाकई यह रोग है या नहीं, क्योंकि कई बार पोषक तत्त्वों की कमी के कारण भी गेहूं के पत्ते पीले होने लगते हैं. जब तक रोग का पता न चले तब तब तक दवा का छिड़काव न करें.

इस की पहचान का तरीका आसान और साधारण होता है. पीले पत्तों और पीला रतुआ में अंतर होता है. पोषक तत्त्वों की कमी से पीली हुई गेहूं की पत्तियों को सफेद कपड़े पर रख कर रगड़ें तो कपड़ा पीला नहीं होगा, पर पीला रतुआ से प्रभावित गेहूं की पत्तियों को अगर सफेद कपड़े से रगड़ा जाए, तो कपड़ा पीला हो जाता है.

पीला रतुआ फैलने का पता चल जाए, तो जितनी जल्दी हो सके फफूंदनाशक दवा प्रोपिकोनाजोल का छिड़काव करें. इस की मात्रा 200 मिलीलीटर प्रति एकड़ के हिसाब से पानी में घोल बना कर इस्तेमाल करनी चाहिए. इस रोग के असर से गेहूं की बालियों में दाने कम बनते हैं और उन का वजन भी कम हो जाता है. इस से पैदावार में 50 फीसदी तक की कमी हो सकती है. पीला रतुआ का प्रकोप ज्यादा होने पर पैदावार का सौ फीसदी नुकसान भी हो सकता है.

कई बार गेहूं के पौधों के पीला होने के दूसरे कारण भी होते हैं. भूमिगत पानी में नमक की मात्रा ज्यादा होने, खेत के लंबे समय तक गीला रहने या 2 से ज्यादा खरपतवारनाशकों को मिला कर प्रयोग करने से पौधे पीले हो जाते हैं. ऐसे में रतुआ रोकने वाली दवा का छिड़काव न करें. ऐसे में गेहूं की फसल पर 3 फीसदी यूरिया और 0.5 फीसदी जिंक सल्फेट का इस्तेमाल करना चाहिए.

1 एकड़ के लिए 6 किलोग्राम यूरिया और 1.0 किलोग्राम जिंक सल्फेट (33 फीसदी) को 200 लीटर पानी में मिला कर स्प्रे करना चाहिए. इस से फसल का पीलापन ठीक हो जाएगा और पौधों में रुकी हुई उर्जा विकसित हो जाएगी.

किसानों को समयसमय पर फसल का मुआयना करते रहना चाहिए. फसल में बीमारी होने पर किसानों को उस का समय से इलाज कर देना चाहिए.

यदि पीला रतुआ का प्रकोप होने का अंदाजा हो, तो ब्लाक या जिले के कृषिरक्षा अधिकारियों से संपर्क कर के बचाव के उपायों के बारे में जानकारी लेनी चाहिए.

हर प्रदेश और जिले में इस रोग को ले कर प्रशासन चौकन्ना रहता है. अपनी जागरूकता से किसान खुद की व दूसरों की फसलों को बरबाद होने से बचा सकते हैं.

Farmer Story : जैविक खेती से भंवर ने कमाया नाम

Farmer Story: आज के दौर में उम्दा किस्म की फसल सफलतापूर्वक उगाना किसी चुनौती से कम नहीं है, क्योंकि रासायनिक खादों ने फसलों को सेहत के लिहाज से जहरीला बना दिया है. जैविक खेती ही इस मुश्किल का सब से अच्छा हल है.

राजस्थान के जोधपुर जिले के किसान भंवरलाल ने जैविक खेती में नए प्रयोगों से बहुत नाम कमाया है और फसलों का उत्पादन बढ़ा कर कमाई भी की है. भंवरलाल के पास 125 बीघे जमीन है, जिस में 75 बीघे सिंचाई वाली है. साल 1962 में मैट्रिक पास करने के बाद भंवरलाल मास्टर बन गए. 3 साल तक नौकरी करने के बाद वे नौकरी छोड़ कर खेती के काम में लग गए.

भंवरलाल खरीफ में बाजरा, तिल व मूंग की फसल उगाते हैं और रबी में जीरा, सौंफ, मेथी, धनिया, राई व चारा फसलें (रिजका) उगाते हैं. उन के घर में गायें हैं, जिन से खेती के लिए जैविक खाद गोबर के रूप में मिल जाती है. वे गायों को इस तरह रखते हैं कि उन का मूत्र भी एक नाली में बह कर इकट्ठा हो जाए.

जैविक खेती के तहत उन्होंने गौमूत्र इकट्ठा कर के एक ड्रम में भर कर उसे सिंचाई के पानी के साथ मिला कर देना शुरू किया. इस से फसलों के कीटरोग के अंश खत्म हो गए और फसल की पैदावार भी बढ़ी. जैविक खाद के साथ गौमूत्र देने से फसल की गुणवत्ता भी अच्छी रही और अनाज स्वादिष्ठ भी होने लगा.

गोबर की खाद व गौमूत्र जमीन में देने से फसलों में सिंचाई भी कम करनी पड़ी. इस से पानी की बचत हुई और गैरजरूरी रासायनिक खाद व दवाओं का खर्च भी बचा. इस के साथ दीमक से बचाव भी हो गया.

जैविक खेती में नवाचारों में छाछ इकट्ठा कर के खट्टा होने पर नीबू की फसल व अन्य फसलों पर छिड़कने से पत्तों का सिकुड़न रोग खत्म हो गया और पत्तों में पीलेपन की बीमारी नहीं रही. नीबू, आक व धतूरे के पत्तों और निंबोली को ड्रम में भर कर उस की 10 किलोग्राम मात्रा में 100 लीटर पानी डाल कर उस से छिड़काव करने से सौंफ, जीरा व धनिया में कीटों व दूसरे रोगों से छुटकारा पाया.

जैविक खेती में गोबर की जैविक खाद का बहुत महत्त्व है. इस में घर के पशुओं का गोबर काम आ जाता है. कभीकभी बाहर से भी गोबर खरीदना पड़ता है, जिसे वे गड्ढे में सड़ा देते हैं और फिर जरूरत के मुताबिक फसलों में इस्तेमाल करते हैं. भंवरलाल का कहना है कि यूरिया से बढ़वार तो जरूर होती है, परंतु फसलों में ताकत नहीं होती और खेती टिकाऊ नहीं रहती है.

भंवरलाल के मुताबिक निंबौली को इकट्ठा कर के पीस कर व छान कर फसल पर छिड़काव करने से कीटों व रोगों में कमी होती है. इस से हवा भी साफ रहती है.

भंवरलाल लगातार जैविक खेती में आगे बढ़ रहे हैं. उन्हें जहां भी नई जानकारी मिलती है, वे उसे समझ कर अपनाते हैं. भंवरलाल बताते हैं कि जैविक खेती में देशी खाद की करामात होती है. सभी किसान भाई जैविक खेती की तरफ बढ़ें, तो फसल में जहर कम हो सकता है. इस से खर्चा कम होगा, स्वास्थ्य सुधरेगा व खेती में सिंचाई कम होगी. जैविक खेती ही टिकाऊ खेती है. भंवरलाल ने जैविक खेती में तमाम प्रयोग किए हैं.

IARI की विकसित किस्मों से महका किसानों का जीवन

IARI : 4 जनवरी, 2026 को आईएआरआई द्वारा विकसित पांच किस्में, जिसमें एक धान, एक चारा मक्का उन 184 किस्मों में शामिल थीं, जिन्हें केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ‌द्वारा राष्ट्र को समर्पित किया गया.

कहां के लिए कौन से किस्म देगी अच्छी उपज?

  • धान संकर पूसा आरएच 60 : दो लाइन वाली किस्म, जिसे बिहार एवं पूर्वी उत्तर प्रदेश के लिए जल्दी ही जारी किया जाएगा.
  • जलवायु सहिष्णु गेहूं किस्म एचडी 3428, एचआई 1669 और एचआई 1674 को जारी किया गया.
  • उद्‌देश्य-विशिष्ट मक्का संकर – पूसा वैक्सी मक्का हाईब्रिड-1 एवं पूसा फोरज मक्का हाईब्रिड-1 के साथ उच्च उपज वाले सिंगल-क्रॉस कर विभिन्न कृषि जलवायु परिस्थितियों के लिए जारी किए गए.
  • यांत्रिक कटाई हेतु चना किस्म पूसा अश्विनी उच्च घनत्व रोपण एवं यंत्रीकरण के लिए अति शीघ्र अरहर किस्में पूसा जवाहर अरहर ड्वार्फ 22-1 एवं 22-2, पीएसएम 12 तथा अतिरिक्त मोटे दानों वाली सरसों किस्म पूसा सरसों-37 शामिल हैं.
  • आईएआरआई की बासमती धान किस्में पूसा बासमती 1718, 1692 और 1509 तथा रोग प्रतिरोधी पीबी 1847, पीबी 1885 और पीबी 1886 ने मिलकर भारत के कुल बासमती निर्यात का लगभग 90% योगदान दिया, जिससे वर्ष 2024-25 में देश को 50,312 करोड़ रुपए की आय हुई.

प्रत्यक्ष बोआई के लिए उपयुक्त खरपतवारनाशी-सहिष्णु किस्में पीबी 1979 एवं पीबी 1985 श्रम लागत में कमी, जल बचत तथा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में संभावित कमी के कारण तेजी से अपनाई जा रही हैं.

  • कर्नाटक के लिए चना किस्म बीजीडी 133 (पूसा सुमंगला). जम्मू कश्मीर के लिए मक्का संकर पीएसएमएच-1′. मध्य प्रदेश के लिए पीजेएचएम-3′ विकसित किए गए.
  • इस वर्ष जारी की गई दस किस्मों को जैव-सुदृढ़ (बायोफोर्टिफाइड) किया गया.
  • गेहूं की किस्में एचआई 1669 और एचआई 1674 प्रोटीन, जिंक एवं आयरन से भरपूर हैं, जबकि एचडी 3428 उच्च प्रोटीन युक्त किस्म है.
  • मक्का में 7 जैव-सुदृढ़ संकर विकसित किए गए, जिनमें पूसा बायोफोर्टिफाइड मक्का हाइब्रिड-8′ है.

संस्थान ने किया 1, 933 टन बीज उत्पादन

साल 2025 में आईएआरआई (IARI) ने 1, 933 टन गुणवत्तायुक्त बीज उत्पादन किया, जिसमें 1,881 टन खेत फसल बीज और 52 टन उद्यान एवं पुष्प फसल बीज शामिल हैं.

Cumin : जीरे की फसल में चरमा रोग का खतरा

Cumin  : इन दिनों हो रही बारिश, बूंदाबांदी, ओस और बादलों को देखते हुए जीरे (Cumin) की फसल में चरमा (झुलसा या ब्लाइट) रोग लगने की आशंका है.

यह रोग ‘आल्टरनेरिया बर्नसाई’ नामक कवक से होता है. फसल में फूल आना शुरू होने के बाद अगर आकाश में बादल छाए रहते हैं, तो यह रोग लग जाता है. जीरे (Cumin) की फसल में फूल आने से ले कर फसल पकने तक यह रोग कभी भी हो सकता है. मौसम अनुकूल होने पर यह रोग बहुत तेजी से फैलता है.

रोग के लक्षण : जीरे (Cumin) की पत्तियों पर भूरे रंग के धब्बों के रूप में रोग के लक्षण दिखाई देते हैं. धीरेधीरे ये काले रंग में बदल जाते हैं. पत्तियों से तने व बीजों पर इस का प्रकोप बढ़ता है. इस के असर से पौधों के सिरे झुके हुए नजर आते हैं. यह रोग हमेशा फूल आने के बाद ही होता है, क्योंकि उस समय पौधों में ‘बायोकेमिकल’ बदलाव होते हैं. यही बदलाव फफूंद को रोग फैलाने में मदद देते हैं.

रोग के लिए अनुकूल हालात : रोग बढ़ने के लिए करीब 3 दिनों तक ज्यादा आर्द्रता (90 फीसदी या ज्यादा) व 23 से 28 डिगरी सेल्सियस तापमान की आवश्यकता होती है. संक्रमण के बाद यदि आर्द्रता लगातार बनी रहे या बारिश हो जाए तो रोग भयानक रूप ले लेता है.

आमतौर पर इस रोग की बढ़ोतरी हवा की दिशा में होती है. बाधित भूमि व पौधों का मलबा संक्रमण करने का काम करता है. नए क्षेत्रों में शुरुआती संक्रमण करने में बीज महत्त्वपूर्ण होते हैं. सघन पौधों में रोग तेजी से फैलता है.

रोकथाम

* बोआई के लिए स्वस्थ बीजों का इस्तेमाल करें.

* सिंचाई का सही इंतजाम करें. मगर ज्यादा सिंचाई न करें.

* ज्यादा पानी वाली फसल जीरे (Cumin) के पास न लगाएं.

* फूल आते समय आकाश में बादल दिखाई देने व रोग की शुरुआती हालत में डाइफेनोकोनाजोल 0.05 फीसदी या मैंकोजेब 0.2 फीसदी या थायोफिनेट मिथाइल 0.1 फीसदी घोल का छिड़काव करें. जरूरत पड़ने पर 12 से 15 दिनों बाद दोबारा छिड़काव करें.

ध्यान रहे कि जीरा एक निर्यात की चीज है, इसलिए बहुत ज्यादा दवाओं का इस्तेमाल न करें, ताकि दवाओं का असर बीजों पर न पड़े और जीरे (Cumin) की गुणवत्ता बनी रहे.

WH 1402 : गेहूं किस्म डब्ल्यूएच 1402 की पहुंच अब अधिक किसानों तक

WH 1402 : चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय द्वारा विकसित की गई उन्नत किस्मों के बीज देशप्रदेश में अधिक से अधिक किसानों को उपलब्ध करवाने के लिए निजी क्षेत्र की कंपनियों के साथ समझौते किए जा रहे हैं. इसी कड़ी में विश्वविद्यालय द्वारा अधिक उत्पादन देने वाली गेहूं की उन्नत किस्म डब्ल्यूएच 1402 (WH 1402 ) का निजी क्षेत्र की कंपनी श्री संत सीड्स एलएलपी, टोहाना के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए हैं.

जानकारी देते हुए कुलपति प्रो. बीआर कांबोज ने बताया कि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा लगातार उन्नत किस्मों के बीज विकसित किए जा रहे हैं, ताकि किसानों के उत्पादन में बढ़ोतरी की जा सके. वैज्ञानिकों द्वारा गेहूं की अगेती, पछेती और समय पर बिजाई करने के लिए विभिन्न उन्नत किस्में विकसित की गई हैं.

इस कंपनी के साथ हुआ समझौता

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बीआर कांबोज की उपस्थिति में समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए. विश्वविद्यालय की ओर से अनुसंधान निदेशक डा. राजबीर गर्ग ने, जबकि कंपनी की ओर से श्री संत सीड्स एलएलपी, टोहाना के निदेशक मलकीत सिंह वह गुरमीत सिंह ने हस्ताक्षर किए.

किस्म की खासीयत

अनुसंधान निदेशक डा. राजबीर गर्ग ने बताया कि गेहूं की नई किस्म डब्ल्यूएच 1402 (WH 1402) की बिजाई का उचित समय अक्तूबर के आखिरी हफ्ते से नवंबर का पहला हफ्ता है और बीज की मात्रा 100 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है. इस किस्म को 2 पानी जिस में पहला पानी बिजाई के 20- 25 दिन बाद शिखर जड़ें निकलते समय व दूसरा पानी बिजाई के 80-85 दिन बाद बालियां निकलते समय देने की जरूरत है.

उन्होंने आगे बताया कि इस किस्म की 100 दिन में बालियां निकलती हैं और 147 दिन में पक कर तैयार हो जाती है. इस किस्म की बालियां लंबी (14 सैंटीमीटर) व लाल रंग की है. इस किस्म की ऊंचाई 100 सैंटीमीटर है जिस से इस के गिरने का खतरा न के बराबर है. इस की किस्म का दाना मोटा है. इस में 11.3 फीसदी प्रोटीन, हेक्टोलिटर वेट (77.7 केजी/एचएल) लौह तत्त्व (37.6 पीपीएम), जिंक (37.8 पीपीएम) है, इसलिए पौष्टिकता के हिसाब से यह किस्म अच्छी है.

इस अवसर पर कुलसचिव डा. पवन कुमार, कृषि महाविद्यालय के अधिष्ठाता डा. एसके पाहुजा, मानव संसाधन प्रबंधन निदेशक डा. रमेश कुमार, बीज विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के अध्यक्ष डा. वीरेंद्र मोर, गेहूं व कपास अनुभाग के अध्यक्ष डा. करमल सिंह, डा. विक्रम सिंह, डा. एमएस दलाल, आईपीआर सैल के प्रभारी डा. योगेश जिंदल, डा. रेणू मुंजाल व डा. जितेंद्र भाटिया उपस्थित रहे.

Kurmula Insect : कुरमुला कीट फसल को करे तबाह

Kurmula Insect : उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र के किसानों के लिए कुरमुला कीट (Kurmula Insect) एक जटिल समस्या बना हुआ है, पहाड़ी क्षेत्रों में बोई जाने वाली ज्यादातर फसलों पर इस का प्रकोप होता है. यह आलू, प्याज, गेहूं, मंडुवा व चौलाई वगैरह फसलों को ज्यादा नुकसान पहुंचाता है.

पर्वतीय क्षेत्रों में किसानों द्वारा इस का सही ढंग से प्रबंधन न करने के कारण कुरमुलों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. इसी कारण फसलों की पैदावार भी घटती जा रही है. पर्वतीय क्षेत्रों में इसे अलगअलग नामों से जाना जाता है, जैसे गुबरैला, सफेद गिडार व उकसा. गढ़वाल इलाके में इसे कुरमुला या कुरगुला नाम से जाना जाता है. अंगरेजी में इसे व्हाइट ग्रब के नाम से जाना जाता है.

जीवन चक्र : उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में कुरमुले की विभिन्न प्रजातियों का जीवनचक्र अलगअलग होता है. इस की ज्यादातर प्रजातियों का जीवनचक्र 1 साल का होता है. कुछ प्रजातियों का जीवनचक्र 2 साल या उस से ज्यादा होता है. गढ़वाल इलाके में पाए जाने वाले कुरमुला कीटों (Kurmula Insect) का जीवनचक्र करीब 5-6 महीने का होता है. इस प्रजाति के कीट का वयस्क भूरेसफेद रंग का होता है. ये मई

महीने के आखिर या जून महीने के शुरू में जमीन से निकलते हैं. ये ज्यादातर शाम के समय निकलते हैं.

जमीन से निकलने के बाद ये कुरमुला कीट (Kurmula Insect) पेड़पौधों की पत्तियों को खाते. कुरमुला 35-50 अंडे मिट्टी में 8-10 सेंटीमीटर की गहराई पर एकल रूप में देती है. यह अवस्था 10-15 दिनों की होती है. करीब 35-50 दिनों बाद दूसरी अवस्था आ जाती है. इस अवस्था में यह फसलों को सब से ज्यादा नुकसान पहुंचाता है. यह पेड़पौधों की जड़ों को खाता है. करीब 40-50 दिनों में तीसरी अवस्था आ जाती है. अक्तूबर के आखिर में या नवंबर के शुरू में तापमान में गिरावट के साथसाथ तीसरी अवस्था के गिडार गहराई में चले जाते हैं और मिट्टी के अंदर सोए रहते हैं. अप्रैलमई में तापमान

बढ़ने के साथसाथ ये जमीन के नीचे से ऊपर की ओर बढ़ने लगते हैं और प्यूपावस्था में 15-25 दिनों तक रहने के बाद वयस्क बन जाते हैं.

नुकसान

मईजून में बरसात शुरू होते ही कुरमुला कीट (Kurmula Insect) के वयस्क जमीन से बाहर निकल कर पेड़पौधों की पत्तियों को काट कर खाते हैं. ये फल के पेड़ों, जंगली पेड़ों, फूलों के पौधों व सब्जियों के पौधों को ज्यादा हानि पहुंचाते हैं. ये सेब, नाशपाती, अखरोट व आड़ू के पेड़ों की पत्तियों को ज्यादा हानि पहुंचाते हैं. सब्जियों व अन्य फसलों में ये जड़ों को ज्यादा नुकसान पहुंचाते हैं. मई से सितंबर के दौरान वयस्क कुरमुला जमीन में अंडे देता है और अंडों से जब ग्रब निकल कर बाहर आते हैं, तो वे पेड़पौधों की जड़ों को नुकसान पहुंचाते हैं.

कुरमुला का नियंत्रण

उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में अलगअलग जलवायु होने के कारण कुरमुला की प्रजातियों को खत्म करना एक बहुत जटिल समस्या है. लगातार इस्तेमाल से रासायनिक कीटनाशी कुरमुला पर बेअसर हो रहे हैं, लिहाजा इस पर जैविक तरीके से ही काबू पाया जा सकता है. जैविक तरीके से नियंत्रित करने के लिए हमें निम्नलिखित बातों पर गौर करना होगा.

* कुरमुला नियंत्रण के लिए सामूहिक रूप से काम करना चाहिए.

* खेतों में हमेशा केंचुआ खाद या पूरी तरह से सड़ी हुई गोबर की खाद का ही इस्तेमाल करें. कच्चे गोबर का इस्तेमाल खेतों में कतई न करें, क्योंकि कुरमुला सब से ज्यादा कच्चे गोबर में पलता है.

मार्चअप्रैल में खेतों की गहरी जुताई करनी चाहिए, ताकि खेतों के अंदर पल रहे कुरकुले ऊपर आ जाएं और सूरज की रोशनी से खत्म हो जाएं, इस के अलावा कीट ऊपर आने से परिंदों की नजर उन पर आसानी से पड़ जाती है और वे उन्हें खा लेते हैं.

* कुरमुला कीट (Kurmula Insect) नियंत्रण के लिए प्रकाश प्रपंच वीएल कुरमुला ट्रैप का विकास किया गया है. इस ट्रैप को किसानों को सामूहिक रूप से खेतों के आसपास जगहजगह लगाना चाहिए. 1 ट्रैप 1 हेक्टेयर जमीन के लिए ठीक है. इस का इस्तेमाल बरसात में शाम के समय करना चाहिए.

* जिन स्थानों पर प्रकाश प्रपंच का इंतजाम न हो, वहां खेतों में बिजली के बल्ब के नीचे पानी से भरे घड़े रख कर कुरमुला नियंत्रण कर सकते हैं.

* जैव कीटनाशी द्वारा भी इस कीट को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है. बैसिलस सिरियस स्ट्रेन डब्ल्यूजी, पीएसबी 2 नामक पाउडर कुरमुलों को आसानी से नियंत्रित कर लेता है. इस पाउडर को गोबर की खाद में मिला कर खेत में डाल देने से लंबे अरसे के लिए कुरमुले नियंत्रित हो जाते हैं. इस पाउडर को 10 ग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से खाद में मिला कर इस्तेमाल करना चाहिए.

Pheromon Trap : फलमक्खी प्रबंधन में उपयोगी फैरोमैन ट्रैप

Pheromon Trap : राजस्थान के झुंझुनूं जिले की चिड़ावा तहसील के किसान फलसब्जियों की खेती में फलमक्खी से होने वाले तकरीबन 50 फीसदी नुकसान से काफी परेशान थे. इस की रोकथाम के लिए उन्होंने कीटनाशक दवाओं का उपयोग किया, लेकिन इस के बाद भी पूरी तरह से फलसब्जियों में होने वाले नुकसान से वे संतुष्ट नहीं थे. इस समस्या से नजात दिलाने के लिए रामकृष्ण जयदयाल डालमिया संस्थान ने किसानों को फैरोमैन ट्रैप उपलब्ध कराए, जिस से फल मक्खी से होने वाला नुकसान काफी हद तक खत्म हो गया और कीटनाशक दवाओं से फलसब्जियों पर होने वाला बुरा असर और उस पर आने वाली लागत भी खत्म हो गई.

फैरोमैन ट्रैप (Pheromon Trap) उपलब्ध कराने से पहले किसानों को इस के उपयोग की विधि का प्रशिक्षण भी दिया गया. यह पहल न केवल किसानों के लिए राहत की बात साबित हुई बल्कि, सतत कृषि पद्धति को बढ़ावा देने वाली प्रणाली भी बन गई.

संस्थान के कृषि एवं वानिकी समन्वयक शुभेंद्र भट्ट ने बताया कि फलसब्जियों की खेती में फल मक्खी किसानों के लिए एक गंभीर समस्या बनी हुई थी. इस से पैदावार में 50 से 60 फीसदी तक नुकसान दर्ज किया जाता रहा है. इस समस्या से निबटने और रासायनिक दवाओं पर निर्भरता घटाने और पर्यावरण अनुकूल समाधान देने के उद्देश्य से फैरोमैन ट्रैप (Pheromon Trap) को अपनाने की सलाह दी है.

उन्होंने आगे बताया की पिछले साल में चिड़ावा और आसपास के क्षेत्रों के बगीचों में फल मक्खी का प्रबंधन न होने के कारण किसानों के फल उत्पादन में भारी गिरावट आई थी, जिस के चलते इस साल संस्थान में पहले से ही किसानों को जागरूक कर के फैरोमैन ट्रैप (Pheromon Trap) का वितरण सुनिश्चित किया था, जिस के अच्छे नतीजे आज देखे जा सकते हैं.

फल मक्खी पके या कच्चे फलों में अंडे देती है, जि ससे फल अंदर से सड़ने लगते हैं. इस कीट का समय पर प्रबंधन न करने पर किसानों को भारी आर्थिक हानि झेलनी पड़ती है. ट्रैप की मदद से बिना कीटनाशक उपयोग किए फल मक्खी की संख्या को प्रभावी रूप से नियंत्रित किया जा सकता है.

फैरोमैन ट्रैप की कार्यप्रणाली

इस में मेल ल्यूअर फैरोमैन का प्रयोग किया जाता है, जो नर मक्खियों को आकर्षित करता है. नर मक्खियां आकर्षित हो कर जाल में फंस जाती हैं और मर जाती हैं. नर की संख्या घटने पर प्रजनन चक्र टूटता है और धीरेधीरे फल मक्खी की आबादी कम हो जाती है.

उपयोग की विधि

एक एकड़ में औसतन 10–12 फैरोमैन ट्रैप (Pheromon Trap) लगाने की सलाह दी जाती है. इन को पौधों की छाया वाले स्थानों पर 5–6 फुट की ऊंचाई पर टांगना चाहिए. फैरोमैन ल्यूअर को 2 माह में बदलना आवश्यक है. यह पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित है. रासायनिक कीटनाशकों पर खर्च घटता है. फलों की गुणवत्ता बनी रहती है और अधिक उत्पादन प्राप्त होता है.

किसान का अनुभव

ट्रैप लगाने वाले किसानों ने बताया कि ट्रैप लगाने के बाद विगत वर्ष की अपेक्षा फसल का नुकसान अभी न के बराबर है. किसान अब वास्तविकता में संस्थान द्वारा उपलब्ध कराए गए ट्रैप की मदद से इस वर्ष अच्छा उत्पादन लेने की स्थिति में हैं.

शुभेंद्र भट्ट के अनुसार राम कृष्ण जयदयाल डालमिया सेवा संस्थान हमेशा की तरह किसानों की बेहतरी के लिए निरंतर प्रयासरत है. संस्थान के शस्य वैज्ञानिकों ने इस बार कार्यालय स्तर पर अनुसंधान एवं परीक्षण कर कम लागत में देशी तरीके से तैयार किए जाने वाले ट्रैप्स का विकास किया है. इन ट्रैप्स का निर्माण सफलतापूर्वक पूरा हो चुका है और अब इन्हें किसानों तक पहुंचाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है. संस्थान के अनुसार इन देशी ट्रैप्स का उपयोग करने से किसानों की लागत लगभग नगण्य रहेगी, जबकि फसलें फल मक्खी जैसे कीटों से सुरक्षित रहेंगी.

New Rice Varieties : बाढ़ और रोगों की चुनौती में खरी उतरीं नई धान किस्में

New Rice Varieties : हाल ही में आई बाढ़ के बाद BAU के खेतों में आयोजित फील्ड निरीक्षण के दौरान कुलपति डा. डीआर सिंह ने धान की नई किस्मों (New Rice Varieties) सबौर श्री सब-1, सबौर कतरनी धान-1 और सबौर विभूति धान के प्रदर्शन का जायजा लिया. उन के साथ निदेशक अनुसंधान डा. एके सिंह, निदेशक (बीज और फार्म) डा. फैजा अहमद और धान अनुसंधान दल के अन्य वैज्ञानिक उपस्थित थे.

सबौर श्री सब-1 (BRR0266/IET32122)

मार्कर असिस्टेड ब्रीडिंग के माध्यम से विकसित इस किस्म ने 14 दिनों तक जलमग्न रहने के बावजूद 30–35 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की उपज दी, जबकि सामान्य परिस्थितियों में यह 50–55 क्विंटल तक उपज देती है. 140–145 दिनों में परिपक्व होने वाली यह किस्म बिहार के बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों के लिए आदर्श है.

सबौर कतरनी धान-1 (BRR0215)

पारंपरिक कतरनी धान किस्म अकसर बारिश और गिरने से नष्ट हो जाती है. यह उन्नत किस्म केवल 110–115 सैंटीमीटर ऊंची है, जिस से इस के गिरने की संभावना कम होती है. साथ ही, यह भागलपुर की GI टैग वाली कतरनी किस्म की सुगंध और गुणवत्ता को भी बरकरार रखती है. इस की उपज 42–45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है और यह 135–140 दिनों में तैयार हो जाती है.

सबौर विभूति धान

इस बार की बाढ़ में 7–8 दिन जलमग्न रहने के बावजूद इस किस्म को केवल 5–10 फीसदी क्षति हुई. इस में बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट (BLB) के खिलाफ 3 प्रतिरोधी जीन मौजूद हैं, साथ ही यह ब्लास्ट रोग को भी सहन करती है. महसूरी-प्रकार की यह अर्धबौनी किस्म 135–140 दिनों में परिपक्व होती है और औसतन 55–60 क्विंटल की उपज देती है. अनुकूल परिस्थितियों में यह 85 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज दे सकती है.

New Rice Varieties

कुलपति डा. डीआर सिंह ने कहा, “हालिया बाढ़ और रोगों की बढ़ती घटनाएं दर्शाती हैं कि ऐसी किस्में समय की मांग हैं. BAU की ये धान किस्में किसानों को जलवायु संकट और रोगों के दबाव से सुरक्षा प्रदान करते हुए उन की आमदनी सुनिश्चित करती हैं.”

डॉ. एके सिंह, निदेशक अनुसंधान ने कहा, “सबौर श्री सब-1, कतरनी धान-1 और विभूति धान वैज्ञानिक अनुसंधान और फील्ड परीक्षण का परिणाम हैं. हाल की आपदाओं में इन की सफलता यह प्रमाणित करती है कि ये किस्में बिहार के किसानों के लिए वरदान हैं.”

बिहार के लिए महत्त्व

बिहार में 30 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में धान की खेती होती है, लेकिन हर साल बाढ़, जलमग्नता और BLB जैसी बीमारियां किसानों की उपज और आय पर असर डालती हैं. BAU सबौर द्वारा विकसित ये उन्नत किस्में न केवल इन समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करती हैं, बल्कि जलवायु के प्रति संवेदनशील कृषि के लिए भी आशा की नई किरण हैं.

इन उपलब्धियों के साथ, BAU सबौर एक बार फिर किसानों की आवश्यकताओं के अनुरूप, नवाचारी और टिकाऊ कृषि समाधान प्रदान करने वाले अग्रणी राष्ट्रीय संस्थान के रूप में अपनी भूमिका को सिद्ध करता है.

Net House : खेती रक्षक नैटहाउस – बेमौसम में भी उगाएं सब्जियां

Net House :आज के समय में कृषि क्षेत्र में नईनई तकनीकियां आ रही हैं. दिनोदिन खेती करने के तौरतरीके बदल रहे हैं. बिन मौसम की फलसब्जियां सालोंसाल आप को बाजार मैं दिख जाएंगी. यह सब बदलाव खेती में होने वाले विकास का आईना है. किसान अब किसी भी मौसम में किसी भी फलसब्जी की खेती कर सकता है और इस के लिए किसानों को एक खास तकनीक अपनाने की जरूरत होती है. इस तरह की खेती ग्रीनहाउस, पौलीहाउस और नैटहाउस (Net House) में की जाती है, जिन्हें फसल रक्षक नैटहाउस कह सकते हैं.

नैटहाउस (Net House) में अपनी मनपसंद खेती करने के लिए उस में उस फसल के माफिक ऐसा वातावरण मिलता है, जिस की उसे जरूरत होती है. हालांकि, फसल रक्षक नैटहाउस तैयार करने में भारीभरकम खर्च आता है, लेकिन यह खर्च एक बार करने से कई सालों तक केवल आमदनी ही होती है. इस के अलावा नैटहाउस लगाने के लिए सरकार द्वारा भी अच्छीखासी सब्सिडी दी जाती है, जो राज्यों के अनुसार अलगअलग हो सकती है. सरकार से सब्सिडी लेने के लिए आप को अपने राज्य की संबंधित कृषि विभाग की बैबसाइट पर औनलाइन आवेदन करन होगा. यह सब्सिडी 70 से 80 फीसदी तक हो सकती है.

नैटहाउस (Net House) में बेमौसम की फलसब्जियां किसी भी समय उगाई जा सकती हैं. इस में पौधों को बाहरी मौसम के नुकसान से बचाने के लिए जालीदार ढांचे का उपयोग किया जाता है. यह एक आधुनिक और प्रभावी तरीका है जिस से किसान अपनी फसलों को सुरक्षित रख सकते हैं और उत्पादन बढ़ा सकते हैं.

नैटहाउस (Net House) में खेती करने से अनेक फायदे भी हैं, जैसे जब बेमौसम की सब्जियां नैट हाउस में उगाते हैं, तो आप को उन की मनमाफिक कीमत मिलती है, क्योंकि बेमौसम सब्जियों की होटलों आदि में काफी मांग होती है. मंडी में भी अच्छे दाम मिलते हैं.

कीटों और पक्षियों से बचाव

नैटहाउस (Net House) में जालीदार ढांचा होता है, जो कीटों और पक्षियों को फसलों से दूर रखता है, जिस से फसलों को नुकसान नहीं पहुंचता.

जलवायु परिवर्तन से बचाव 

नैटहाउस(Net House)  में तापमान और आर्द्रता को नियंत्रित किया जा सकता है, जिस से पौधों को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से बचाया जा सकता है.

उत्पादन में बढ़ोतरी

नैटहाउस में पौधों को सुरक्षित और स्वस्थ वातावरण मिलता है, जिस से उत्पादन बढ़ सकता है.

रासायनिक उपयोग में कमी

नैटहाउस में कीटों और रोगों को नियंत्रित करने के लिए रासायनिक उपयोग की आवश्यकता कम होती है, जिस से फसलों की गुणवत्ता बढ़ जाती है.

नैटहाउस के लिए जरूरी उपकरण

नैटहाउस में लिए जालीदार ढांचा आवश्यक है, जो कीटों और पक्षियों को फसलों से दूर रखता है और नैटहाउस में जरूरी सिंचाई प्रणाली भी आवश्यक है, जो पौधों को पर्याप्त पानी देने का काम करती है.

इस के अलावा नैटहाउस में वातावरण नियंत्रण प्रणाली आवश्यक है जो तापमान और आर्द्रता को नियंत्रित करती है और उस में होने वाली फसल को मनमाफिक तापमान देती है. नैटहाउस में टमाटर, मिर्च, खीरा कद्दू, करेला आदि सब्जियां उगाई जा सकती हैं.

खेती रक्षक नैटहाउस

मध्य प्रदेश में खेती रक्षक नैटहाउस जो 400 वर्गमीटर से 1600 वर्गमीटर तक के आकार में उपलब्ध हैं, सब से किफायती नैटहाउस माना जाता है, जिस में 3 गुना से 5 गुना अधिक उपज मिलती है. इस में 90 फीसदी पानी की बचत होती है और 90 फीसदी तक ही कीटबीमारी नहीं लगती हैं. इस के अलावा अधिक धूप, बरसात, ओलावृष्टि से भी बचाव होता है.

आप इस फसल रक्षक नैटहाउस में 15 से भी ज्यादा तरह की फलसब्जियां उगा सकते हैं, नर्सरी भी तैयार कर सकते हैं.

अधिक जानकारी के लिए मोबाइल नंबर 7207799223 पर बात कर सकते हैं या वैबसाइट www.kheyti.com पर भी विजिट कर सकते हैं.

Barley : पंत विश्वविद्यालय ने विकसित की पंत जौ 1106 प्रजाति

Barley : अधिकतर किसान फसलचक्र के नाम पर धान, गेहूं, गन्ना के उत्पादन पर अधिक ध्यान देते हैं लेकिन कुछ फसलें ऐसी हैं, जिन की कीमत भी अच्छी मिलती है और उत्पादन भी अच्छा लिया जा सकता है.

यदि किसान जौ (Barley) की खेती करते हैं तो उन को अधिक मुनाफा हो सकता है. जौ का अधिक उत्पादन हो सके इस बात को ध्यान में रखते हुए गोविंद वल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय पंतनगर में कृषि अनुसंधान में जौ क्रांति की ओर एक कदम बढ़ाया है. ‘श्री अन्न’ की तरह पौष्टिकता से भरपूर जौ की नई अधिक उत्पादक किस्म पंत जौ 1106 यूपीबी विकसित की गई है. स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद जौ (Barley) की इस प्रजाति को तैयार करने में वैज्ञानिकों को लगभग 12 वर्ष का समय लग गया है.

अब केंद्रीय प्रजाति विमोचन समिति ने इसे पूरे उत्तर प्रदेश असम, पश्चिम बंगाल, बिहार समेत पूर्वोत्तर राज्यों में खेती के लिए स्वीकृत किया है. इन राज्यों में यह बीज बेहतर पैदावार व गुणवत्ता के लिए उपयुक्त है.

अब तक देश के विभिन्न क्षेत्रों और जलवायु के लिए उपयुक्त 140 से अधिक जौ (Barley) की किस्म का विकास किया जा चुका है. पंतनगर विश्वविद्यालय के गेहूं एवं जौ अनुसंधान परियोजना के संबंध में डा. जेपी जायसवाल ने बताया कि पंत जौ 1106 अधिक उपज और बेहतर गुणवत्ता वाली किस्म है. राष्ट्रीय परीक्षणों में पंत जौ 1106 की औसत उपज 44.57 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और अधिकतम उपज क्षमता 74.93 क्विंटल प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई है.

यह प्रजाति भूरे व पीले रतवा यानी रस्ट तथा लीफ ब्लाइट जैसी बीमारियों से लड़ने में सक्षम है. नवंबर महीने में अच्छे जल निकास और मध्यम उर्वराशक्ति वाली भूमि में इस की बोआई उपयुक्त होती है. वर्तमान में राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश में जौ (Barley) का सर्वाधिक उत्पादन किया जाता है.

भारत में लगातार डायबिटीज रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है, क्योंकि खानपान पर ध्यान न देने के कारण यह बीमारी बहुत तेजी से बढ़ी है, इसलिए जरूरी है कि ऐसे अनाज को अपने भोजन में शामिल करें जिस से आप डायबिटीज को नियंत्रित रख सकें. इस किस्म में रेशे फाइबर की मात्रा अधिक होते हैं.

‘श्रीअन्न’ की तरह जौ (Barley) भी पोषक तत्त्वों से भरपूर होती है. वर्तमान में कई मल्टीग्रेन उत्पादन में इस का उपयोग हो रहा है. यह पोषण की दृष्टि से बहुत ही लाभकारी है. इस में प्रोटीन की मात्रा 12.3 फीसदी पाई गई है. यह जौ की 2 अन्य किस्मों में मिलने वाले प्रोटीन की मात्रा से अधिक है. इस किस्म का विकास अनुवांशिकी एवं पादप प्रजनन विभाग के वैज्ञानिकों ने संयुक्त प्रयास कर के किया है.

जौ (Barley) में मौजूद घुलनशील फाइबर (बीटा ग्लूकैन) ग्लूकोज के अवशोषण को धीमा करता है, जिस से भोजन के बाद ब्लड शुगर लैवल धीरेधीरे बढ़ता है.

फाइबर से भरपूर

इस में फाइबर और प्रोटीन की मात्रा अधिक होती है, जो आप को लंबे समय तक संतुष्ट रखता है और कम खाने में मदद करता है, जिस से वजन घटाने में भी मदद मिलती है. यह मैग्नीशियम का एक अच्छा स्रोत है, जो इंसुलिन प्रतिरोध को कम करने और इंसुलिन संवेदनशीलता को बेहतर बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

पोषक तत्त्वों से भरपूर

जौ (Barley) विटामिन बी (जैसे नियासिन, थायमिन) और खनिजों (जैसे आयरन, मैग्नीशियम) से भी भरपूर होता है, जो विभिन्न शारीरिक कार्यों के लिए आवश्यक हैं. रातभर पानी में भिगोए हुए जौ को उबाल कर इसका पानी पिया जा सकता है. आप दलिया या खिचड़ी बना कर भी इसका सेवन कर सकते हैं. जौ को पेय पदार्थों के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है.