पराली समस्या ( Stubble Problem) का समाधान सरकार को किसानों के साथ मिल कर करना होगा

हरियाणा सरकार द्वारा किसानों पर पराली जलाने के लिए की जा रही कड़ी कार्रवाई ने देशभर के किसानों में गहरी नाराजगी और चिंता पैदा कर दी है. हाल ही में 13 किसानों की गिरफ्तारी, ‘रैड एंट्री’ जैसे कदम और किसानों की फसल मंडियों में न बेचने देने के आदेशों ने किसानों में आक्रोश भर दिया है.

किसानों की गिरफ्तारी और उन के माल को मंडी में न बेचने देना एक ऐसा कदम है, जो केवल उन की समस्याओं को बढ़ाएगा. हरियाणा सरकार ने पराली जलाने के 653 मामलों में अब तक 368 किसानों की ‘रैड एंट्री’ कर दी है, जिस से ये किसान अगले 2 साल तक अपनी फसल मंडियों में नहीं बेच पाएंगे. इस से न केवल उन की माली हालत कमजोर होगी, बल्कि उन का गुस्सा भी बढ़ेगा. इस तरह की दमनकारी नीतियां केवल किसानों और सरकार के बीच की खाई को बढ़ाने का काम करती हैं.

किसान पहले ही पूर्व की हरियाणा सरकार से नाराज चल रहे थे. राज्य में किसानों की इन‌ गिरफ्तारियों और फसल मंडियों में न बिकने देने जैसे तुगलकी मध्यकालीन फरमान ने इस मुद्दे को और गरमा दिया है. लगता है कि सरकार की नीतिनिर्माताओं ने अपना दिमाग खूंटी पर टांग दिया है, वरना इतनी आसान सी बात ही समझ में नहीं आती कि इस समस्या का समाधान केवल दंडात्मक उपायों से कभी भी नहीं हो सकता. किसानों के सामने कई जमीनी व्यावहारिक समस्याएं हैं, जिन्हें समझे बिना ऐसे कबीलाई न्याय और कठोर नीतियां लागू करना उन के साथ घोर अन्याय है और व्यापक देशहित के भी खिलाफ है.

इस बात से किसी को भी इनकार नहीं है कि पराली जलाना एक गंभीर पर्यावरणीय मुद्दा है, लेकिन इसे केवल किसानों की गलती मानना उचित नहीं है, यह सिक्के का केवल एक पहलू है. इस संवेदनशील मामले में किसानों की मजबूरी को समझना अत्यंत आवश्यक है.

पराली का निबटान एक महंगी और समयसाध्य प्रक्रिया है, जिस में किसान को काफी माली नुकसान उठाना पड़ता है. ट्रैक्टरों और पानी के इस्तेमाल से पराली को मिट्टी में मिलाने का खर्च प्रति एकड़ 5,000 रुपए से अधिक होता है, जो छोटे और मझोले किसानों के लिए एक भारी बोझ है. इस के अलावा फसल के सीजन के बीच में समय की कमी भी उन्हें पराली जलाने के लिए मजबूर कर देती है.

किसानों के सम्मुख चुनौतियां

किसान फसल कटाई के तुरंत बाद अगली फसल के लिए खेत तैयार करने की जल्दी में होते हैं. यदि पराली को सड़ने के लिए खेत में छोड़ा जाता है, तो इस में काफी समय लगता है, और इस देरी से उन्हें दूसरी फसल का नुकसान होता है. “समय से चूका किसान, डाल से चूका बंदर की तरह होता है, जो धरती पर मुंह के बल गिरा नजर आता है.” इस स्थिति में किसानों के पास न तो इतना समय होता है और न ही इतनी आर्थिक क्षमता कि वे पराली के प्रबंधन के लिए जरूरी संसाधनों में निवेश कर सकें.

दुनिया के प्रसिद्ध पर्यावरणविदों और शोधकर्ताओं ने भी इस समस्या की जड़ को समझा है. नार्वे के जलवायु विशेषज्ञ एरिक सोल्हेम का कहना है, “सस्टेनेबल खेती का विकास तभी संभव है, जब किसानों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए पर्यावरणीय नीतियां बनाई जाएं. किसान पर्यावरण का दुश्मन नहीं है, वह इस का साथी है.” यह विचार स्पष्ट करता है कि किसानों को दोषी ठहराने के बजाय उन्हें टिकाऊ समाधान प्रदान करना आवश्यक है.

विकल्पों की खोज

यह सही है कि पराली जलाने से पर्यावरण को नुकसान होता है और वायु प्रदूषण बढ़ता है, लेकिन समाधान का रास्ता किसानों को दंडित करने में नहीं है. समस्या के समाधान के लिए सरकार को किसानों के साथ मिल कर विचारविमर्श करना चाहिए. सरकार का यह दायित्व है कि वह किसानों के लिए ऐसे विकल्प तैयार करे, जो व्यवहारिक हो और किसानों के हित में हो. किसानों को तकनीकी सहायता, संसाधन और आर्थिक सहायता प्रदान की जानी चाहिए, ताकि वे पराली जलाने के विकल्पों को अपना सकें.

पंजाब और हरियाणा में पहले से ही कई पायलट प्रोजैक्ट्स चल रहे हैं, जहां पराली से जैविक खाद बनाई जा रही है या उसे ऊर्जा के उत्पादन के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है. लेकिन यह समाधान तब तक सफल नहीं होंगे, जब तक किसानों को इस का उपयोग करने के लिए पर्याप्त आर्थिक सहायता और तकनीकी मार्गदर्शन नहीं मिलेगा.

हमारा मानना है कि सरकार को दंडात्मक कार्रवाई से पहले किसानों की समस्याओं को समझ कर उन के लिए व्यवहारिक समाधान निकालने चाहिए. पराली जलाने पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाना और किसानों को सजा देना उन्हें और अधिक संकट में डाल देगा. देशभर के किसानों में यह संदेश जा रहा है कि सरकार के खिलाफ आंदोलन करने के कारण सरकार किसानों से बदला ले रही है.

वहीं किसानों का यह मानना है कि पराली के पर्यावरणीय मुद्दे पर किसानों को जेल में डालने जैसी कठोर दमनात्मक कार्यवाही करने के पहले महानगरों में दौड़ रहे जहर उगलते करोड़ों वाहन मालिकों और वायुमंडल में विशाक्त धुआं उगलते कारखानों के मालिकों के खिलाफ कार्यवाही कर उन्हें जेल में डालने की हिम्मत दिखाए. देश में कितने ही कारखाने पर्यावरण के नियमों, ग्रीन ट्रिब्यूनल को छकाते हुए धज्जियां उड़ाते हुए नदियों में गंदगी उड़ेल रहे हैं और वायुमंडल में लगातार 24 घंटे जहरीला धुआं भर रहे हैं. आज तक सरकार ने किसी एक भी उद्योगपति को पर्यावरण के मुद्दे पर जेल में नहीं डाला है. चूंकि किसान अकेला है, गरीब है, बेसहारा है, इन में एकजुटता की कमी है और चौधरी चरण सिंह जैसा उस का कोई सक्षम राजनीतिक आका नहीं है, इसीलिए सरकार जब चाहे किसान की गरदन दबोच लेती है और उस पर लट्ठ बजा देती है.

यही सरकारें जीत के आते ही हफ्तेभर के भीतर ही अपने खिलाफ सारे मामलों को राजनीतिक मामले कह कर वापस ले लेती हैं और किसान आंदोलनों में जेल गए किसान साथी आज भी जेलों में सड़ रहे हैं, उन की सुध लेने वाला भी कोई नहीं है. पर इन सारे घटनाक्रमों से किसानों में धीरेधीरे सरकार के ख़िलाफ नफरत और गुस्सा बढ़ता जा रहा है. आगे चल कर यह स्थिति विस्फोटक हो सकती है.

सरकार इस तरह से किसानों को जेल में डालने के पहले ध्यान रखें कि सरकार की जेलों में न तो इतनी जगह है और न ही सरकार के खजाने में इतना पैसा, और न ही सरकार के गोदाम में इतना अनाज है कि वह देश के 16 करोड़ किसान परिवारों, एक परिवार में यदि 5 सदस्य भी हैं तो लगभग 80 करोड़ लोगों को जेल में डाल कर उन्हें बिठा कर खाना खिला सके.

मिलजुल कर होगा समाधान

पराली जलाने की समस्या के समाधान के लिए एक सामूहिक दृष्टिकोण की आवश्यकता है. पर्यावरण की सुरक्षा और किसानों की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए एक संतुलित नीति बनाई जानी चाहिए. सरकार को किसानों के साथ मिल कर एक समाधान ढूंढना चाहिए, जिस में किसानों की आवश्यकताओं को प्राथमिकता दी जाए. अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञ भी मानते हैं कि किसी भी पर्यावरणीय नीति की सफलता तभी संभव है, जब उसे सामाजिक और आर्थिक रूप से उचित ढंग से लागू किया जाए.

किसान संगठनों का मानना है कि किसानों के खिलाफ कठोर नीतियां अपनाने के बजाय सरकार को उन के साथ संवाद कर समाधान निकालना चाहिए. किसानों की आर्थिक स्थिति और पर्यावरण की रक्षा दोनों को ध्यान में रखते हुए एक सुदृढ़ और व्यवहारिक नीति बनाई जानी चाहिए. पराली जलाने के विकल्प किसानों को तभी अपनाने चाहिए, जब उन्हें इस के लिए आवश्यक संसाधन और सहायता मिल सके.

सरकार को अपने कठोर रवैए पर पुनर्विचार कर किसान संगठनों और विशेषज्ञों के साथ मिल कर इस समस्या का समाधान खोजना चाहिए. अगर सरकार पहल करे, तो अखिल भारतीय किसान महासंघ इस मुद्दे पर किसानों और किसान संगठनों से बात कर बीच का रास्ता निकालने की कोशिश कर सकती है. किसानों की समस्याओं को नजरअंदाज करना एक दीर्घकालिक समाधान नहीं है, बल्कि उन के साथ मिल कर काम करने से ही हम एक टिकाऊ और सफल कृषि प्रणाली की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं.

नाबार्ड की मदद से बन रहे एफपीओ, हो रहे खास काम

बड़वानी : कलक्टर डा. राहुल फटिंग की अध्यक्षता में पिछले दिनों जिला निगरानी समिति की बैठक आयोजित की गई, जिस में फार्मर प्रोड्यूस और्गेनाइजेशन एफपीओ की प्रगति पर विस्तृत चर्चा की गई. बैठक में विभिन्न कृषक उत्पादक संगठन एवं सीबीबीओ संस्थाओं के प्रतिनिधि उपस्थित हुए, जिन के द्वारा एफपीओ की प्रगति का ब्योरा पीपीटी प्रेजेंटेशन के माध्यम से दिया गया.

नाबार्ड से जिला विकास प्रबंधक विजेंद्र पाटिल ने बताया कि भारत सरकार की 10,000 एफपीओ योजना के अंतर्गत बड़वानी जिले के सभी 7 विकासखंडों में 14 एफपीओ बनाए गए हैं. जिले में ज्यादातर एफपीओ द्वारा अपने किसान सदस्यों को कम दर में कृषि संबंधित सामग्री मुहैया कराने के उद्देश्य से खाद, बीज, दवा आदि की दुकानें बनाई हैं. कुछ एफपीओ द्वारा विशेष काम किया जा रहा है, जिन में नाबार्ड एवं कृषि विकास संस्था की मदद से पानसेमल में देवमोगरा माता एफपीओ द्वारा 8 लाख रुपए की मिर्ची दुबई में निर्यात की गई. वर्ष 2024-25 के लिए यह लक्ष्य 1 करोड़ रुपए के निर्यात का रखा गया है. एफपीओ के सदस्य द्वारा उन्नत मिर्च की नर्सरी संचालित की जा रही है.

नाबार्ड एवं मंथन संस्था की मदद से निवाली में मोगी माता एफपीओ ने हलदी प्रोसैसिंग प्लांट स्थापित किया. भारत सरकार की एआईएफ योजना एवं नाबार्ड की एएमआई सब्सिडी योजना के अंतर्गत बैंक औफ इंडिया, सेंधवा शाखा ने मोगी एफपीओ को यह इकाई लगाने के लिए लोन दिया.

सीबीबीओ मंथन के डा. रजत सक्सेना द्वारा बताया गया कि स्थानीय स्तर पर इस से पहले हलदी प्रसंस्करण की सुविधा न होने के कारण किसानों से उन का उत्पादन बिचौलिए औनेपौने दाम में खरीदते थे, लेकिन हलदी प्रसंस्करण की सुविधा मोहैया होने से किसानों को स्थानीय स्तर पर ही यह संभव हो सकेगा, जिस से कि किसानों को उन के उत्पाद का उचित दाम मिलेगा एवं रोजगार के नए मौके मिलेंगे.

डीडीएम ने नाबार्ड प्रायोजित नैब संरक्षण गारंटी योजना के बारे में बताया, जिस से बैंकों द्वारा एफ़पीओ को समय पर लोन दिया जा सकेगा. बैठक के दौरान कलक्टर ने सभी सीबीबीओ को निर्देशित किया कि वह धरातल पर बेहतर काम करें. विशेषकर, फसलों के मूल्य संवर्धन के काम हो.

बड़वानी में नेचरटूअर्थ एफपीओ अदरक के प्रसंस्करण और नागलवाडी में संत सियाराम एफपीओ टमाटर पर काम करना सुनिश्चित करें.

बैठक में आरबीआई से विनय मोरे, एलडीएम संदीप अग्रवाल, डीडीए जमरे एवं अन्य विभाग उपस्थित थे.

किसान कल्याण एवं कृषि विकास विभाग, उपसंचालक, एमएस देवके ने जानकारी देते हुए बताया कि वर्तमान में जिले में किसानों द्वारा बोआई का काम जारी है. सोयाबीन की नई किस्मों का बीज आगामी सीजन में उपलब्ध कराने के लिए भारतीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान द्वारा जिले में विकासखंडवार एक गांव का चयन कर 3 क्विटल का बीज 10 किसानों के लिए उपलब्ध कराया गया.

गांव सिरपुर के 5 किसान और गांव दहीनाल के 5 किसानों के खेतों पर नई किस्मों के फसल प्रदर्शन आयोजित किए गए, जिस में किसानों को सोयाबीन किस्म एनआरसी-130 एवं एनआरसी-142 का बीज उपलब्ध करा कर संबंधित कृषि विस्तार अधिकारी कनक ससाने एवं महेंद्र चौबे द्वारा बीजोपचार के बाद किसानों के खेतों में प्रदर्शन प्लाट आयोजित किए जा रहे हैं, जिस में अनुशंसा के अनुसार संतुलित उर्वरकों का उपयोग किया गया और इन किसानों के खेतों में अन्य किसानों का भी भ्रमण कराया गया.

किसान आंदोलनः किसान की समस्या की जड़ में कौन? बाजार या सरकार

यदि गौर से देखा जाए, तो आजादी के बाद से ही अलगअलग समस्याओं को ले कर स्थानीय स्तर पर किसान लगातार आंदोलन कर रहे हैं. बिजली, पानी, खाद, बीज, परिवहन, गोदाम और बाजार की अलगअलग क्षेत्र में अलगअलग समस्याएं रही हैं. छुटपुट स्तर पर इन्हें अस्थाई तौर पर सुलझाने के प्रयास भी हुए, पर रोग बढ़ता ही गया ज्योंज्यों दवा की. इन समस्याओं के स्थायी समाधान के लिए कोई दूरगामी नीति आज तक नहीं बन पाई, जो कि बेहद जरूरी थी.

पिछले आंदोलन की अगर बात करें, तो इस की जड़ में सरकार के वे तीनों विवादास्पद कानून थे, जिसे सरकार ने बिना किसान संगठनों और किसानों से चर्चा किए, बिना उन्हें विश्वास में लिए ही किसानों की भलाई के नाम पर किसानों पर थोप दिया था. अंधे को भी दिख रहा था कि तीनों कानून कारपोरेट के पक्ष में गढ़े गए थे, परंतु कारपोरेट्स प्रेमहिंडोले पर झूल रही सरकार ने किसानों को निरा ही बेवकूफ समझ लिया.

किंतु इन तीनों कानून की गाज जब किसानों पर गिरी और उन्हें उन की जमीन हाथ से निकलती नजर आई, तो किसान अपनी तत्कालीन सभी छोटीबड़ी समस्याओं को किनारे रख कर अपने खेत, खेती बचाने के लिए सड़क पर उतर आए.

आखिरकार जब तीनों कानून वापस हुए और आंदोलन वापस हुआ तो किसानों के हाथ एक बार फिर खाली थे. हाथ में था केवल एमएससी गारंटी कानून लागू करने का आश्वासन का झुनझुना. जैसे ही सरकार ने अपने चुनिंदा तनखैय्या नुमाइंदों की एक नौटंकी एमएसपी गारंटी कमेटी बनाई, यह बिलकुल साफ हो गया कि सरकार की नीयत किसानों को ‘एमएसपी गारंटी‘ देने की नहीं है.

सरकार के इस धोखे और वादाखिलाफी ने पहले से ही सुलग रहे किसान आक्रोश की आग में घी का काम किया है. ऐसी हालत में किसान गुस्से के तवे पर राजनीतिक रोटी सेंकने वाले वाले कोढ़ में खाज का काम करते रहे हैं और इस से समस्या और उलझ जाती है.

कुलमिला कर यह स्थिति किसानों के साथ ही सरकार और देश के लिए भी ठीक नहीं है. ऐसे में जरूरी हो जाता है कि इस समस्या का हल ढूंढ़ने के लिए इस की जड़ों की तहकीकात के साथ ही इस बारे में उठने वाले कुछ प्रमुख सवालों के ईमानदार जवाब ढूंढे़ जाएं.

सरकार का फसल लागत पर 50 फीसदी लाभ जोड़ कर एमएसपी तय करने या देने का दावा कितना सही है?

सरकार का यह दावा पूरी तरह से झूठ और गलत आंकड़ों पर आधारित है. एमएसपी तय करने में सब से महत्वपूर्ण आंकड़ा फसल लागत का होता है. इस में एमएस स्वामीनाथन की अनुशंसा के अनुसार ब्2़थ्स् यानी सी2 प्लस एफएल की मांग किसानों द्वारा की जाती रही है.

फसल लागत में जब तक किसान व उस के परिवार की मजदूरी वर्तमान कुशल मजदूर की तय दर से जोड़ी जाए, मजदूरों का वास्तविक भुगतान, बैलों के मूल्य और उन के भोजन एवं रखरखाव का खर्च, ट्रैक्टर, पावर टिलर, मोटरसाइकिल आदि का संचालन खर्च, भूमि के लीज का भुगतान, बीज, उर्वरक, खाद, सिंचाई शुल्क एवं ट्रैक्टर, ड्रिप ,सिंचाई पंप आदि सभी कृषि उपकरणों एवं कृषि भवनों पर वार्षिक मूल्य नुकसान की गणना, कार्यशील पूंजी पर ब्याज आदि को वर्तमान बाजार मूल्य के आधार पर नहीं जोड़ा जाता, तब तक खेती की लागत की गणना सही नहीं मानी जा सकती.

हालत यह है कि डीजल की बढ़ी कीमतों के कारण ट्रैक्टर की जुताई के खर्च में तकरीबन 20 फीसदी की वृद्धि हो गई. मजदूरी में तकरीबन 25 फीसदी की वृद्धि हो गई. खाद, बीज, दवा आदि में 20 से 25 फीसदी की वृद्धि देखी जा रही है.

ऐसी हालत में जब फसल लागत में 20 से 25 फीसदी की वृद्धि हो रही है, तब सरकार की एमएसपी में अधिकतम 1 फीसदी से 6 फीसदी तक की जाने वाली सालाना वृद्धि से किसान फायदे के बजाय घाटा हो रहा है. किसान को लागत पर 50 फीसदी फायदा मिलने के बजाय लागत 15 से 20 फीसदी घाटा हो रहा है. यही वजह है कि किसान की कमर टूट गई है.

एमएसपी न मिलने से किसान को कितना नुकसान है?

इस संदर्भ में सरकार की ही शांताकुमार कमेटी का कहना है कि अभी केवल 6 फीसदी उत्पादन ही एमएसपी पर खरीदा जाता है, बाकी 94 फीसदी किसानों का उत्पादन एमएसपी से भी कम रेट पर बिकता है, जिस की वजह से किसानों को हर साल तकरीबन 7 लाख करोड़ रुपए का नुकसान होता है. हर साल किसानों को मिलने वाली सभी प्रकार की सब्सिडी को अलग कर दिया जाए तो भी, देशभर के किसानों को 5 लाख करोड़ से ज्यादा का घाटा हर साल सहना पड़ रहा है. इन हालात में खेती व किसानी कैसे बचेगी, यह सरकार और उस के नीति निर्माताओं के लिए भी सोचने का विषय है.

एमएसपी पर खरीद में सरकार और बाजार की भूमिका

एक सवाल यह भी उठाया जाता है कि भला सरकार किसानों का सारा माल कैसे खरीद सकती है? सरकार कारोबारियों को भी किसानों का माल खरीदने के लिए कैसे बाध्य कर सकती है?

सौ बात की एक बात यह है कि हम ’किसान तो यह कहते ही नहीं कि किसानों का ‘एक दाना‘ भी सरकार हम किसानों से खरीदे.’ हमारा सरकार से कहना साफ है कि आप तो बस किसानों के साथ बैठ कर खेती पर होने वाले सभी वाजिब खर्चों को जोड़ कर समुचित ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य‘ तय कर दे और उस से कम पर की जाने वाली किसी भी खरीदी को गैरकानूनी घोषित करते हुए उस के लिए समुचित सजा के प्रावधान का कानून पारित कर दे. वर्तमान में सरकार डीजल व पैट्रोल के दाम तय कर ही रही है.

जमीन की खरीदीबिक्री का भी मूल्य स्टांप ड्यूटी के लिए सरकार ही तय करती है. गन्ने का मूल्य तो कितने ही सालों से सरकार तय कर ही रही है. बाजार को भी खरीदी के लिए बाध्य करने की जरूरत नहीं है. साथ ही, आयात नीति में जिस तरह देश की अन्य जरूरी वस्तुओं को आयात संरक्षण दिया जाता है, वैसे ही कृषि उत्पादों को भी सस्ते आयात से आवश्यकतानुसार जरूरी संरक्षण दिया जाए. बस सरकार को इतना ही तो करना है. वैसे भी खरीदीबिक्री का काम और विशेष परिस्थितियों के अलावा अनाजों की खरीदी कर के वोट के लिए उसे मुफ्त बांटना किसी सरकार का काम नहीं होना चाहिए.

क्या ‘एसपी गारंटी कानून‘ से सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ेगा?

बिलकुल नहीं. सरकार के खजाने पर कोई अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ने वाला. यह जानबूझ कर फैलाया जाने वाला निरर्थक भ्रम है. सरकार तो वैसे भी जो भी अनाज सरकारी योजनाओं में वितरण के लिए किसानों से खरीदती है, वह न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ही खरीदती है, इसलिए सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ने का सवाल ही नहीं उठता.

सरकार को तो बस एक छोटा सा कानून बनाना है, जिस में सरकार का एक पैसा खर्च नहीं होने वाला. वैसे भी यह सरकार बिना जनता के मांगे ही सैकड़ों नएनए कानून बनाने के लिए जानी जाती है, तो फिर किसानों की जायज मांग पर एक कानून और सही.

क्या इस से बाजार और व्यापारी को नुकसान होगा?

जरा भी नहीं. व्यापारी न्यूनतम समर्थन मूल्य के आधार पर उस से ऊपर की दर पर खरीदी करेंगे और अपना वाजिब लाभ जोड़ कर आगे उपभोक्ताओं को बेचेंगे. किसान अपना पैसा बैंक में नहीं रखता, इसलिए किसान को मिला पैसा तत्काल वापस बाजार में आ जाएगा, जिस से क्रियाशील पूंजी और बाजार की गति को और तेजी मिलेगी, देश के विकास दर में तीव्रता आएगी.

क्या इस से अंतिम उपभोक्ता को नुकसान होगा?

जी, बिलकुल नहीं. उलटे इस से उपभोक्ता भी अनावश्यक शोषण से बचेगा. उदाहरण से समझें, बाजार में किसानों का गेहूं 16 किलोग्राम बिका है और उपभोक्ताओं को 40 किलोग्राम आटा खरीदना पड़ रहा है यानी बाजार की ताकतें एमएसपी से कम दर पर खरीदी कर के किसानों का शोषण करने के साथ ही तकरीबन सौ फीसदी फायदा ले कर उपभोक्ताओं की भी जेब काट रही हैं.

एक और उदाहरण, गन्ना भी सरकार नहीं खरीदती, पर चीनी मिलों की खरीदी के लिए उस का रेट उस ने तय कर दिया है, तो इस से उपभोक्ताओं को लगातार चीनी वाजिब मूल्य पर मिल रही है. न्यूनतम समर्थन मूल्य के साथ ही कृषि उत्पादों और उन से तैयार उत्पादों की अधिकतम विक्रय मूल्य भी तय कर दिए जाएंगे, तो उपभोक्ताओं को जबरदस्त राहत मिलेगी.

क्या यह समस्या सचमुच बहुत जटिल है?

इस समस्या का हल ढूंढ़ने कहीं दूर जाने की भी जरूरत नहीं है, क्योंकि वह तो पहले ही मौजूद है. सरकार और किसान दोनों के द्वारा इसे जीतहार का सवाल न बनाया जाए और सरकार अपना अब तक के अपने गैरजरूरी अड़ियल, दमनकारी अलोकतांत्रिक रुख तत्काल छोड़ कर, दिमाग के जाले साफ कर देश के सभी किसान संगठनों के साथ मिलबैठ कर एक ऐसा सकारात्मक हल बड़े आराम से निकाल सकती है, जिस में किसानों को उन की लागत और मेहनत की वाजिब कीमत मिले, व्यापारियों को भी वाजिब मुनाफे के साथ खुला बाजार मिले और उपभोक्ताओं को भी वाजिब कीमत पर कृषि उत्पाद मिले.

साथ ही, किसानों की अन्य लंबित समस्याएं भी मिलबैठ कर बड़े आराम से सुलझाई जा सकती हैं. ऐसी किसी भी सकारात्मक पहल को अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा 45 किसान संगठनों का महासंघ), राष्ट्रीय एमएसपी गारंटी किसान मोरचा (223 किसान संगठन) और अन्य सकारात्मक किसान संगठनों का पूरा साथ व समर्थन मिलेगा.

– डा. राजाराम त्रिपाठी, राष्ट्रीय संयोजक, अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा),राष्ट्रीय प्रवक्ताः एमएसपी गारंटी कानून किसान मोरचा 

कृषि यंत्र बैंक बनाएं फायदा उठाएं

खेती में इस्तेमाल होने वाले खास यंत्रों में ट्रैक्टर, कंबाइन हार्वेस्टर, जीरो टिल सीड कम फर्टिलाइजर ड्रिल, रोटावेटर लेजर लैंड लैवलर, मल्टीक्रौप थ्रेशर, पैडी राइस प्लांटर वगैरह हैं, जो खेती के कठिन कामों को आसान बनाते हैं, लेकिन ये सभी महंगे कृषि यंत्र हैं. म?ोले औैर छोटी जोत वाले किसानों के लिए इन्हें खरीदना आसान नहीं होता.

कुछ किसान जोरआजमाइश कर के ट्रैक्टर खरीद तो लेते हैं, लेकिन उस के साथ इस्तेमाल होने वाले अनेक कृषि यंत्र नहीं खरीद पाते, जबकि टै्रक्टर से सही कमाईर् तभी होगी, जब उस के साथ इस्तेमाल होने वाले अनेक कृषि यंत्र भी किसानों के पास मौजूद हों.

कृषि यंत्र सभी किसानों की पहुंच में हों, इस के लिए सरकार ने सीएचसी यानी कस्टम हायरिंग सैंटर फार्म मशीनरी स्कीम बनाई है. इस के तहत आप प्रोजैक्ट पास करवा सकते हैं और उस स्कीम से आप अपने इलाके के हिसाब से खेती में इस्तेमाल होने वाले कृषि यंत्रों का बैंक बना सकते हैं. इन कृषि यंत्रों को आप अन्य किसानों को किराए पर दे कर अपनी आमदनी में इजाफा कर सकते हैं. इस के अतिरिक्त कोऔपरेटिव ग्रुप बना कर भी आप कृषि यंत्र बैंक बना सकते हैं.

कहने का मतलब है कि आप के किसान ग्रुप को कुल रकम का केवल 20 फीसदी ही पैसा देना है, बाकी बची 80 फीसदी रकम सरकार द्वारा सब्सिडी के रूप में दी जाएगी.

ऐसे कृषि उत्पादक संघ के गठन के लिए किसानों के पास खुद की खेती योग्य जमीन होनी चाहिए. साथ ही, इस में जितने भी किसान चाहे सदस्य के रूप में जुड़ सकते हैं.

समूह द्वारा फार्म मशीनरी बैंक के तहत खरीदे गए स्ट्रा चौपर के जरीए पराली प्रबंधन को भी बढ़ावा दिया जा रहा है, जिस से इस समूह द्वारा खेत में पराली जलाए जाने पर रोक लगाए जाने में कामयाबी मिली है.

फार्म मशीनरी बैंक चलाने वाले किसान समूहों को किराए पर यंत्रों को दिए जाने का सारा हिसाबकिताब और रजिस्टर रखना जरूरी है. जब भी कोई इस रजिस्टर को देखना चाहे तो देख सके.

Farming Machinesकोई भी किसान दूसरे किसानों को संगठित कर कृषि उत्पादक संघ या एफपीओ का गठन कर फार्म मशीनरी बैंक का लाभ ले सकता है, क्योंकि फार्म मशीनरी बैंक की स्थापना के एफपीओ को वरीयता दी जाती है. एफपीओ द्वारा फार्म मशीनरी के लिए आवेदन न किए जाने के चलते इस योजना का लाभ राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन यानी एनआरएलएम के तहत गठित समूहों को दे दी जाती है. ऐसे में किसान चाहें तो संगठित हो कर खुद की किसान कंपनी बना कर कृषि महकमे द्वारा दिए जाने वाले फार्म मशीनरी बैंक का फायदा ले सकते हैं.

इसी एफपीओ के निदेशक मंडल में शामिल राम मूर्ति मिश्र ने जानकारी दी कि अगर किसान संगठित हो कर एफपीओ बनाते हैं, तो वह कृषि महकमे द्वारा अनुदान पर फार्म मशीनरी बैंक की स्थापना कर सकते हैं, बल्कि इस के जरीए मड़ाई के लिए थ्रेशिंग फ्लोर, बीज विधायन संयंत्र जैसे व्यवसायों को शुरू करने के लिए भी अनुदान ले सकते हैं.

उन्होंने बताया कि एफपीओ का गठन कर किसान कृषि मशीनरी, खादबीज, ब्रांडिंग, पैकेजिंग व मार्केटिंग जैसी समस्या से भी छुटकारा पा सकते हैं. इस से वे अपनी आमदनी के साथ ही दूसरे किसानों की आमदनी में भी इजाफा कर सकते हैं.

एफपीओ के गठन से जुड़ी जानकारी हासिल करने के लिए राम मूर्ति मिश्र के मोबाइल नंबर 9889387997 पर फोन कर के संपर्क कर सकते हैं.

एमएसपी के खिलाफ 250 किसान संगठन हुए एकजुट

‘एमएसपी गारंटी कानून मोरचा’ का राष्ट्रीय अधिवेशन 19 अगस्त, 2023 को श्री रकाबगंज साहिब गुरुद्वारा के कांफ्रेंस हाल में आयोजित किया गया. कार्यक्रम की अध्यक्षता एमएसपी गारंटी कानून मोरचा के राष्ट्रीय अध्यक्ष सरदार वीएम सिंह ने की.

सरदार वीएम सिंह ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में कहा कि इस मोरचा के गठन के बाद अब तक कई राज्यों में मोरचे की बड़ीबड़ी बैठकें संपन्न हुई हैं. आप सभी के सहयोग से एमएसपी की लड़ाई अब देश के प्रत्येक गांव तक पहुंच गई है.

उन्होंने आगे कहा कि ‘एमएसपी गारंटी किसान मोरचा’ को तकरीबन देश के 27 प्रांतों के 223 किसान संगठनों का जो समर्थन मिला है, वो अभूतपूर्व है.

मोरचे के राष्ट्रीय प्रवक्ता डा. राजाराम त्रिपाठी सम्मेलन को वर्चुअली संबोधित करते हुए कहा कि अगली आगामी लोकसभा चुनाव 2024 के पूर्व हर किसान मतदाता और उस के मतदान बूथ तक ‘एमएसपी गारंटी कानून नहीं- तो वोट नहीं’ नारे को पहुंचाया जा रहा है. एमएसपी गारंटी कानून के मुद्दे पर देश के सारे किसान संगठन एकमत व एकजुट हैं.

डा. राजाराम त्रिपाठी ने इस मौके पर सभी किसान संगठनों से देश में सांप्रदायिक सदभाव व भाईचारा कायम रखने, सभी अल्पसंख्यक समुदायों की रक्षा करने और देश की अखंड संप्रभुता की सर्वोच्च प्राथमिकता पर रक्षा करने का प्रस्ताव रखा, जिसे सभी ने एकमत हो कर पारित किया.

MSPइस राष्ट्रीय सम्मेलन में देश की तकरीबन सभी राज्यों के कोर कमेटी मेंबर एवं मोरचा प्रदेश संयोजकों ने सक्रिय भागीदारी की, जिन में प्रमुख रूप से महाराष्ट्र से वरिष्ठ किसान नेता राजू शेट्टी, उत्तराखंड से सोमदत्त शर्मा, पंजाब से जसकरन सिद्धू, हिमाचल प्रदेश से संजय शर्मा, बिहार से छोटेलाल श्रीवास्तव, मध्य प्रदेश से दीपक पांडेय मुदगल, जम्मूकश्मीर से यावर मीर अली, मेघालय से कैप्टन अल्फोंड, तमिलनाडु से गुरुस्वामी, कर्नाटक से चंद्रशेखर, हरियाणा से जसबीर सिंह घसोला, झारखंड से संजय ठाकुर, केरल से पीवी राजगोपाल, उत्तर प्रदेश से प्रदेश सहसंयोजक बलराज भाटी, दिल्ली से महेंद्र राणा, राजस्थान से जलपुरुष राजेंद्र सिंह के प्रतिनिधि मेजर हिमांशुऔर छत्तीसगढ़ से इस मोरचे के राष्ट्रीय प्रवक्ता डा. राजाराम त्रिपाठी प्रमुख रूप से शामिल रहे.

देशभर से आए किसान नेताओं ने बताया कि देश का प्रत्येक किसान परिवार इस मुहिम का हिस्सेदार बने, इसलिए गांवगांव में प्रचार कर समर्थन जुटाया जा रहा है. गांव में दीवार पुताई, प्रभात फेरी, बैनर और पोस्टर लगा कर हर परिवार तक एमएसपी के फायदे को बताया जा रहा है. गांवों की समितियां अपनेअपने तरीके से एमएसपी का माहौल बनाने का काम कर रही हैं. गांवों में अब ये नारे लगने लगे हैं, “गांवगांव एमएसपी, हर घर एमएसपी” और “फसल हमारी भाव तुम्हारा, नहीं चलेगा नहीं चलेगा” और “एमएसपी गारंटी नहीं तो वोट नहीं”.

सम्मेलन में हिमाचल प्रदेश, जम्मूकश्मीर और देश के अंदर कई राज्यों में भारी बाढ़ और प्राकृतिक आपदा के कारण किसानों की खेती के साथ ही जानमाल की हुई हानि को ले कर गंभीर चिंता व्यक्त की गई. इस के अलावा छत्तीसगढ़ सहित कई राज्यों में पर्याप्त वर्षा न होने के कारण फसलों की बोनी और खड़ी फसल दोनों ही प्रभावित हुई हैं, इसलिए केंद्र व राज्य सरकारों से प्रभावित किसानों के लिए तत्काल विशेष राहत देने की मांग की गई. किसान नेता गुरुस्वामी ने तमिलनाडु के किसानों की समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित किया.

ऊर्जा अध्यक्ष सरदार वीएम सिंह ने गुरुस्वामी को आश्वस्त किया कि मोरचे की अगली बैठक तमिलनाडु में ही रखी जाएगी और वहां के विशिष्ट समस्याओं की निराकरण के लिए तत्काल मौके पर ही पहल की जाएगी. सम्मेलन में अन्य कई जरूरी प्रस्ताव भी पारित किए गए.

किसानों ने बनाई अपनी सब्जी मंडी

बिहार के समस्तीपुर जिले के पूसा प्रखंड में एक छोटा सा बाजार है, जिस का नाम है मोरसंड. यहां सड़क के किनारे सुबहसवेरे 7 बजे से ही सब्जियों की मंडी सजने लगती है. इस स्थानीय मंडी में आने वाली सब्जियां इतनी ताजी, खूबसूरत और अच्छी होती हैं कि अगर आप का मन न भी हो, तब भी आप सब्जी खरीदने को मजबूर हो जाएंगे.

लेकिन मोरसंड गांव में लगने वाली इस सब्जी मंडी का संचालन बाकी मंडियों की तर्ज पर बिहार सरकार नहीं करती है, बल्कि इस सब्जी मंडी को किसान बिचौलियों से बचने के लिए खुद ही संचालित करते हैं.

किसानों द्वारा संचालित मंडी सरकार द्वारा संचालित शहर की मुख्य मंडी से काफी दूरी पर मौजूद है. उस के बावजूद भी ग्राहक सरकारी मंडी में न जा कर मीलों का फासला तय कर किसानों द्वारा संचालित इस मंडी में खरीदारी करने आते हैं, जहां किसानों को उन के गांव के बगल में ही सब्जियों की उपज का सरकारी मंडी से अच्छा रेट मिल जाता है. इस से यहां अपनी सब्जी बेचने वालों को न केवल अच्छा मुनाफा मिलता है, बल्कि समय और पैसे की बचत भी होती है.

किसानों को खुद की मंडी चलाने का ऐसे आया विचार

पूसा के मोरसंड कसबे में किसानों द्वारा संचालित इस मंडी को खोलने का काम छोटे और म   झोले किसानों की आय बढ़ाने और उन के जीवनस्तर को सुधारने के लिए बिहार में काम कर रही संस्था आगा खान ग्राम समर्थन कार्यक्रम भारत व एक्सिस बैंक फाउंडेशन द्वारा दिया गया.

जब किसानों ने एकेआरएसपीआई को मंडी में अपनी सब्जियों की उपज का वाजिब रेट न मिलने की बात बताई, तो एकेआरएसपीआई के कार्यकर्ताओं ने उन्हें संगठित कर जनता सब्जी संग्रह सह विक्रय केंद्र, मोरसंड बहादुरपुर नाम से एक किसानों की एक मंडी समिति बनवाने में मदद की.

इस मंडी समिति में सब्जी उत्पादक गांवों के किसानों को पदाधिकारी और सदस्य बनाया गया. इस के बाद किसानों ने मोरसंड कसबे की एक जगह को मंडी के रूप में चुना, जहां इस समिति से जुड़े सभी किसान अपनी सब्जियों को थोक में बेचने के लिए लाने लगे.

शुरुआती दौर में किसानों को ग्राहक कम मिलते थे, लेकिन जब लोगों को यह पता चला कि मोरसंड कसबे में किसानों द्वारा संचालित मंडी में ताजा और अच्छी सब्जियां वाजिब रेट में मिल रही हैं, तो दूरदूर के व्यापारी भी इन किसानों की सब्जियां खरीदने आने लगे.

सरकारी मंडी की जगह किसानों द्वारा खुद की मंडी खोलने के सवाल पर किसानों द्वारा संचालित मोरसंड मंडी के अध्यक्ष राम नंदन सिंह ने बताया कि भारत भले ही कृषि प्रधान देश है, लेकिन यहां सब से बुरी हालत भी किसान की ही है. सरकारें किसानों को तमाम तरह की छूट और राहतें देने की बात करती हैं, लेकिन कृषि उपज के वाजिब रेट को ले कर कोई ठोस सरकारी नीति न होने के चलते किसान हर जगह ठगा जाता रहा है.

उन्होंने बताया कि कभी मौसम किसान पर मुसीबत बन कर टूटता है, तो कभी हालात उस का साथ नहीं देते और सबकुछ ठीक रहने के बावजूद भी जब वह अपनी फसल बेचने मंडी पहुंचता है, तो वहां सही भाव नहीं मिलता. क्योंकि मंडियों में बिचौलियों और मुनाफाखोरों का गठजोड़ उन्हें अपनी उपज औनेपौने दामों में बेचने को मजबूर होना पड़ता है.

ऐसी दशा में हम किसानों द्वारा संचालित इस मंडी पर पूरा नियंत्रण भी किसानों का होता है, जिस से हमें अपनी फसल का रेट तय करने का पूरा अधिकार होता है.

उन्होंने आगे बताया कि 5 किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले मोरसंड व उस से लगे आसपास के गांवों चकहारी, पुनास, सिहिया खुर्द, ठहरा पातेपुर, गोपीनाथ, कैजिया, बेला जैसे दर्जनों गांवों के सैकड़ों किसान इस मंडी से जुड़े हुए हैं, जो अपनी सब्जियों जैसे आलू, गोभी, टमाटर, ब्रोकली, मटर, कद्दू, लौकी, गाजर, मेथी, धनिया, बंदगोभी, नेनुआ, बैगन, सेम, प्याज, लहसुन, परवल, मूली, साग, कुसुम, फर, भिंडी, पालक, खीरा, गेंधरी, हरी मिर्च जैसी फसलें बेचने आते हैं. यहां कुछ ही घंटों में किसानों की सब्जियां आसानी से बिक जाती हैं.

मोरसंड कसबे के किसानों द्वारा संचालित इस मंडी के संरक्षक देवनारायण सिंह ने बताया कि शहर की सरकारी मंडियों में किसान जब सब्जी या फल ले कर पहुंचता था, तो वहां उन की मुलाकात बहुत सारे एजेंट से हो जाती थी, जो उन की सब्जी को बिकवाने का काम करते थे, क्योंकि इन मंडियों में किसान बिचौलियों के बिना कुछ भी खरीदबेच नहीं सकते. वजह, यहां बिचौलिए ही किसानों की फसल की बोली लगाता है और उसे बिकवाता है.

उन्होंने बताया कि कुछ व्यापारी साठगांठ कर किसान की फसल औनेपौने दाम में खरीद लेते हैं. ऐसा छोटे शहरों की मंडियों में होता है, जहां ग्राहक कम आते हैं. और जो ग्राहक आते हैं, वह व्यापारी यानी बिचौलियों से आपस में मिले हुए होते हैं, जो किसान से उस की फसल को कम कीमत में खरीद कर दिल्ली, कानपुर जैसी बड़ी मंडी में पहुंचा कर ऊंचे भाव में बेचने में कामयाब हो जाते हैं.

इस मंडी में कई तरीके से होता है किसानों का फायदा

महिला किसान सविता देवी ने बताया कि सरकारी मंडी की तुलना में किसानों द्वारा संचालित खुद की मंडी में कई तरीके से धन, समय और श्रम की बचत होती है, क्योंकि किसान अपने खेतों में सब्जी की तुड़ाई करने के बाद दूर मंडियों में बेचने जाता है, तो उस में ट्रांसपोर्टेशन का खर्च तो जुड़ता ही है, साथ ही साथ मंडी में जाने के बाद उन्हें मंडी टैक्स, एजेंट का कमीशन, पल्लेदारी की जरूरत पड़ती है. ये सब खर्चे किसान को अपनी जेब से करने होते हैं. जो सब्जियों की बिक्री से हुई आमदनी से ही देना पड़ता है. बाकी जो बचता है, वो किसान को मिलता है.

लेकिन मोरसंड मंडी के सफल संचालन के लिए किसानों की सहमति से महज एक रुपया किलोग्राम मंडी शुल्क लिया जाता है. इस के अलावा सब्जियों की लोडिंग और अनलोडिंग का काम किसान खुद ही आपस में मिल कर करते हैं, जिस से पल्लेदारी पर आने वाला शुल्क पूरी तरह से बच जाता है.

पूसा प्रखंड के लालपुर गांव के किसान राम दयाल ने बताया कि वह बैगन, फूलगोभी, पालक, टमाटर सहित कई तरह की सब्जियों की खेती करते हैं.

उन्होंने बताया कि कुछ साल पहले तक उन्हें तैयार सब्जियों को बेचने के लिए गांव से तकरीबन 15 से 20 किलोमीटर दूर तक की मंडी में जाना पड़ता था, जिस से उन्हें ट्रांसपोर्टेशन पर अतिरिक्त खर्च करना पड़ता था. दूर मंडियों में आनेजाने में लगने वाले अतरिक्त समय व खर्च में भी कमी आई है.

उन्होंने यह भी बताया कि किसानों की इस मंडी का संचालन पूरी तरह से किसान ही करते हैं और इस पर सरकार का किसी तरह का हस्तक्षेप भी नहीं है.

जनता सब्जी संग्रह सह विक्रय केंद्र, मोरसंड बहादुरपुर में सब्जियों की बिक्री का हिसाबकिताब देखने वाले और इस समिति के कोषाध्यक्ष मंजेश कुमार ने बताया कि कई बार शहर की मंडी में सब्जियां बेचने के बाद आढ़ती किसानों का पैसा बकाया कर देते हैं, जबकि इस मंडी में किसानों की उपज की बिक्री के तुरंत बाद उन्हें भुगतान कर दिया जाता है.

शहर की मंडियों से व्यापारी यहां खरीदने आते हैं सब्जियां

समस्तीपुर जिले में बड़ी सब्जी मंडी होने के बावजूद भी वहां से फुटकर व्यापारी मोरसंड में सब्जियों की खरीदारी करने आते हैं. फुटकर व्यापारी बाबुल कुमार से जब यह पूछा गया कि जब जिले में मंडी है, तो वह इतनी दूर सब्जियों की खरीदारी करने क्यों आते हैं?

उन्होंने कहा कि शहर की मंडी में बहुत ज्यादा भीड़ होती है. इस से बचाव तो होता ही है. साथ ही, यहां लोडिंग चार्ज, मंडी शुल्क, कमीशन एजेंट शुल्क भी नहीं देना पड़ता है. यहां हर समय हरी और ताजी सब्जियां मिलती हैं, जबकि शहर की मंडी में दूर से आने वाली सब्जियां बासी हो जाती हैं.

उन्होंने जानकारी देते हुए बताया कि शहर की मंडी में देरी से पहुंचने पर सब्जियां नहीं मिल पाती हैं, जबकि यहां लेट हो जाने पर भी सब्जी उपलब्ध हो जाती है. और कभीकभी न पहुंच पाने की दशा में किसान द्वारा उन की दुकान तक डिलीवरी भी दे दी जाती है.

आगा खान ग्राम समर्थन कार्यक्रम (भारत) में पूसा के एरिया मैनेजर शांतनु सिद्धार्थ दुबे ने बताया कि एकेआरएसपीआई व एक्सिस बैंक फाउंडेशन के सहयोग से मोरसंड में किसानों द्वारा संचालित सब्जी मंडी पूरे बिहार के लिए मौडल है.

उन्होंने बताया कि इस मंडी के खुल जाने से किसानों की आमदनी में इजाफा हुआ है, जिस से किसान अपनी जरूरतों को पूरा करने के बाद भी बचत कर लेते हैं.

एकेआरएसपीआई में बिहार प्रदेश के कृषि प्रबंधक डा. बसंत कुमार ने बताया कि मोरसंड सब्जी मंडी की सफलता को देखते हुए इसी तर्ज पर बिहार में और भी कई जगहों पर किसान इस तरह की खुद की मंडी संचालित करने की कवायद कर रहे हैं. अगर ऐसा होता है, तो किसानों की सरकारी सब्जी मंडी पर निर्भरता कम होगी. साथ ही, अपनी उपज की कीमत भी किसान खुद तय कर पाएंगे.

एकेआरएसपीआई में बिहार प्रदेश के रीजनल मैनेजर सुनील कुमार पांडेय ने बताया कि एकेआरएसपीआई द्वारा एक्सिस बैंक फाउंडेशन के सहयोग से समस्तीपुर में छोटे व म   झोले किसानों की आय बढ़ाने के लिए फील्ड लैवल पर कई तरह की तकनीकी, व्यावहारिक और आर्थिक सहायता मुहैया कराई जा रही है, जिस से किसान खेती में जोखिम को कम करने में कामयाब होने के साथ ही आधुनिक तरीकों से लागत को कम कर अपनी आय में इजाफा करने में कामयाब हो रहे हैं.

सब्जी उत्पादन तकनीक प्रशिक्षण  का आयोजन

हाल ही में ‘सब्जी उत्पादन तकनीक’ पर कृषि विज्ञान केंद्र, बस्ती पर प्रशिक्षण का आयोजन किया गया. केंद्राध्यक्ष प्रो. एसएन सिंह ने बताया कि केंद्रीय बारानी कृषि अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद से इस जनपद में जलवायु परिवर्तन आधारित कृषि तकनीकों का प्रदर्शन एवं क्षमता में विकास हेतु परियोजना की शुरुआत की गई है, जिस का उद्देश्य कृषि बागबानी, सब्जी उत्पादन, पशुपालन, मत्स्यपालन, मशरूम उत्पादन, मधुमक्खीपालन आदि क्षेत्रों में रणनीतिक अनुसंधान के तहत अनुकूलीय रणनीतियों के निर्माण के साथसाथ जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का आंकलन प्रमुख है.

उन्होंने कहा कि प्राकृतिक और मानव निर्मित संसाधनों के निरंतर प्रबंधन के साथ ही साथ कृषि उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि करने वाली जलवायु अनुकूल कृषि प्रौद्योगिकियों के माध्यम से बेरोजगारों को कृषि आधारित स्वरोजगार से जोड़ कर पारिवारिक आय में वृद्धि करना है. इसी उद्देश्य को दृष्टिगत रखते हुए किसानों व बेरोजगार नौजवानों को जायद के मौसम में उत्पादित की जाने वाली सब्जियों जैसे भिंडी, मिर्चा, लौकी, तोरई, लोबिया, धनिया, सहजन आदि की खेती करने का प्रशिक्षण प्रदान किया जा रहा है. इस से वे अतिरिक्त आय के साथसाथ रोजगार भी पा सकते हैं.

पशुपालन विशेषज्ञ डा. डीके श्रीवास्तव ने अवगत कराया कि जायद के मौसम में सिंचाई की समुचित व्यवस्था होने पर आलू, सरसों, चना, मटर के बाद हरा चारा उत्पादन के लिए लोबिया और बाजरा की खेती करना उपयुक्त है. इस से पशुओं को शुष्क मौसम में भरपूर प्रोटीनयुक्त हरा चारा मिलता रहेगा, जिस से उन की दूध उत्पादन क्षमता प्रभावित नहीं होगी.

लोबिया की प्रमुख किस्में पूसा कोमल, काशी कंचन, नरेंद्र आदि हैं. इस के लिए एक हेक्टेयर क्षेत्रफल में 20 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है. इसी प्रकार बाजरा की उन्नत किस्म अनन्त है, जिस में 8-10 कटाई कर के चारा प्राप्त कर सकते हैं.

पौध रक्षा वैज्ञानिक डा. प्रेम शंकर ने सब्जियों में लगने वाले प्रमुख रोगों एवं कीड़ों पर चर्चा करते हुए बताया कि सब्जियों में रोगों एवं कीटों से बचाव के लिए नीम तेल 10 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी की दर से 10 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें. नियंत्रित न होने की दशा में सब्जियों को    झुलसा रोग से बचाने के लिए मैनकोजेब 64 फीसदी, साइमोक्जिल 8 फीसदी डब्ल्यूपी फफूंदीनाशक मिश्रण का 1.2 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से 600-800 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करें.

प्रसार वैज्ञानिक डा. आरवी सिंह ने जायद में सब्जियों (भिंडी, लोबिया, तोरोई, लौकी, कद्दू, करेला आदि) की खेती की नवीनतम तकनीकों के विषय में किसानों को विस्तृत जानकारी दी. साथ ही, जायद में दलहनी फसल (मूंग, उड़द) की खेती के विषय में भी विस्तृत जानकारी प्रदान की.

उन्होंने यह भी बताया कि जो किसान भाई वसंतकालीन गन्ने की खेती करते हैं, वे गन्ने के साथ लोबिया, भिंडी, करेला एवं धनिया (हरी पत्ती के लिए) की सहफसली खेती से अधिक आय प्राप्त कर सकते हैं.

इस प्रशिक्षण कार्यक्रम में प्रगतिशील किसान ओमप्रकाश, कमलेश, नरायन आदि ने प्रतिभाग किया. इस अवसर पर केंद्र के वैज्ञानिकों के साथसाथ जेपी शुक्ला, निखिल सिंह, प्रहलाद सिंह, बनारसी व सीताराम आदि कार्मिक भी उपस्थित रहे.