गन्ना व राजमा की सहफसली खेती

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में गन्ना मुख्य फसल के रूप में उगाया जाता है. नकदी फसल होने और तमाम चीनी मिलें होने की वजह से किसानों के बीच गन्ना बहुत ही लोकप्रिय फसल है. इस की खेती ज्यादातर एकल फसल के रूप में की जाती है. किसान गन्ने की फसल को नौलख व पेड़ी के रूप में 2-3 साल तक लेते रहते हैं. गन्ने के उत्पादन व उत्पादकता के लिहाज से उत्तर प्रदेश का जिला बिजनौर प्रदेश व देश में अग्रणी स्थान पर है. साल 2016-17 के अांकड़ों के मुताबिक गन्ने की औसत उत्पादकता 784.97 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है और इस का कुल रकबा 2,10,269 हेक्टेयर है, जिस में सहफसली खेती का रकबा करीब 16 हजार हेक्टेयर है.

गन्ना और राजमा सहफसली प्रौद्योगिकी

खेत का चुनाव व तैयारी : गन्ना और राजमा की खेती के लिए समतल जीवांशयुक्त बलुई दोमट मिट्टी का चुनाव करना चाहिए. गोबर की खाद को खेत में डाल कर 4-5 बार जुताई कर के मिट्टी को भुरभुरी बना लेना चाहिए.

बीज का चुनाव व बोआई : पंत अनुपमा, अर्का कोमल, करिश्मा, सेमिक्स और कंटेंडर आदि राजमा की उन्नत प्रजातियां हैं. राजमा के बीजों को कार्बेंडाजिम की 2 ग्राम मात्रा से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें और गन्ने के बीजोपचार के लिए कार्बेंडाजिम की 200 ग्राम मात्रा को 100 लीटर पानी में घोल कर टुकड़ों को उस में 25-30 मिनट तक डुबोएं. गन्ना और राजमा की सहफसली खेती में राजमा के 80 किलोग्राम और गन्ने के 60 क्विंटल बीज प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करने चाहिए. बोआई 25 अक्तूबर से 15 नवंबर के मध्य कर लेनी चाहिए. गन्ने की 2 लाइनों के बीच राजमा की 2 लाइनों की मेंड़ों पर बोआई करें.

निराईगुड़ाई व सिंचाई : दोनों फसलों की बोआई सर्दी के मौसम में होने की वजह से खरपतवारों की समस्या कम रहती है. फिर भी खरपतवार निकालने के लिए फसल में 2-3 बार निराईगुड़ाई करें. पूरे फसलोत्पादन के दौरान जमीन को नम बनाए रखें, ताकि फसल को पाले से सुरक्षित रखा जा सके.

खाद व उर्वरक : खेत में 400 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से गोबर की खाद मिलानी चाहिए. इस के अलावा 150 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस, 80 किलोग्राम पोटाश और 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट उर्वरकों का प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए.

फसल सुरक्षा : बोआई से पहले बीजोपचार जरूर करें. आमतौर पर फलियां बनते समय फली भेदक, पर्ण सुंरगक व कुछ चूषक कीटों का हमला हो जाता है. कभीकभी मोजैक रोग का संक्रमण भी हो जाता है.

कीटों व रोगों की रोकथाम

* नीम का तेल 1.5 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें. इस के इस्तेमाल से फसल की सुरक्षा भी हो जाती है और इनसानों की सेहत पर भी बुरा असर नहीं पड़ता है.

* नीम का तेल न होने पर 2 लीटर क्यूनालफास 25 ईसी या 1.25 लीटर मोनोक्रोटोफास 36 एसएल या 2 किलोग्राम कार्बोरिल 50 डब्लूपी को 600-700 लीटर पानी में मिला कर प्रति हेक्टेयर की दर से

12-14 दिनों के अंतर पर छिड़काव करें.

उन्नत तकनीक से खेती करने पर राजमा फलियों की औसत उपज 50-60 क्विंटल प्रति एकड़ तक हासिल हो जाती है और करीब 40 हजार रुपए प्रति एकड़ अतिरिक्त आमदनी हो जाती है. इस के साथ ही गन्ने की उत्पादकता में भी इजाफा होता है. इस की खास वजह खेत में डाले गए खाद व उर्वरकों का अधिकतम इस्तेमाल है. खरपतवार प्रबंधन का लाभ भी दोनों फसलों द्वारा हासिल किया जाता है और सहफसल में अपनाए गए कीट व रोग प्रबंधन का लाभ मुख्य फसल को भी मिल जाता है.

गन्ने (Sugarcane) की पैदावार खुशियां लाए हजार

गन्ने से अच्छी पैदावार लेने के लिए उन्नत प्रजाति को चुनना और बोआई के लिए कृषि यंत्रों का इस्तेमाल, संतुलित पोषक तत्त्व प्रबंधन और सहफसली खेती करना जरूरी है.

गन्ने की फसल लेना मालीतौर पर किसानों के लिए फायदेमंद है, क्योंकि उन्नत तकनीक अपना कर ही उत्पादन को काफी हद तक बढ़ाया जा सकता है. उत्पादन में ज्यादा इजाफा इस तरह भी किया जा सकता है:

गन्ने की 1 एकड़ बोआई में खादों का इस्तेमाल:

* गोबर की खाद-25 क्विंटल.

* डीएपी-50 किलोग्राम.

* यूरिया-30 किलोग्राम.

* माइक्रोन्यूटैंट-13-500.

* सल्फर-3 किलोग्राम.

* एजो फास्फोरस-1 लिटर फास्फोरस.

* ट्राइकोडर्मा-1 लिटर.

* पोटाश-50 किलोग्राम.

नोट-: अच्छे नतीजे लाने के लिए मिश्रण बोआई से 2 हफ्ते पहले मिला कर छाया में रखें.

खेत की करें तैयारी

* सब से पहले खेत की मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई करें. उस के बाद हैरो टिलर से जुताई करें.

* गहरी जुताई करने के बाद 5 फुट की गहराई पर कूंड़ निकालें.

बीज का चयन

* गन्ने का बीज मोटा, ताजा, लंबी पोरी वाला, 8-10 महीने वाला व उन्नत प्रजाति का हो.

* गन्ने की नीचे की 3-4 पोरी बीज में न लें.

* गन्ने का बीज जड़ वाला गिरा हुआ चूहे द्वारा काटा हुआ, चोटीबेधक कीट व बीमारी से बिलकुल ग्रसित न लें.

* गन्ने का बीज टूटनेफूटने से बचाने के लिए बीज को एक जगह से दूसरी जगह पर अगोला व पत्ती सहित ही ले जाएं.

* गन्ने की आंखें धूप से बचाएं.

* गन्ने की आंखों के ऊपर से पत्ती पूरी तरह साफ करें.

* गन्ने के बीज को 2 ही आंख के टुकड़ों में काटें.

* गन्ने के बीज के टुकड़े काटने के बाद जल्दी से जल्दी कूंड़ों में डाल कर मिट्टी से ढक दें वरना इस के जमाव पर असर पडे़गा.

यों करें बोआई

ट्रैंच विधि से 2 पंक्ति में बोआई : ट्रैंच विधि से एक लाइन से दूसरी लाइन में बोआई उन रकबों में फायदेमंद है, जहां हलकी मिट्टी या क्षारीय मिट्टी हो. इस विधि से जल की बचत के साथसाथ सहफसली खेती कर के मुनाफा लिया जा सकता है.

ट्रैंच विधि से लागत कम आती है, उपज ज्यादा मिलती है और सहफसली खेती जैसे लहसुन, प्याज, चना, मटर, मसूर, खीरा व टमाटर भी आसानी से की जा सकती है.

इस विधि में यू आकार की 25 सैंटीमीटर गहरी और 30 सैंटीमीटर चौड़ी खाई 90 सैंटीमीटर की दूरी पर ट्रैक्टरचालित ट्रैंचर से खोदी जाती है.

इस मशीन द्वारा एक बार में 2 खाई बनाई जाती हैं और तीसरीचौथी खाई दूसरे चक्कर पर मशीन में लगे गाइडर की मदद से बराबर की दूरी पर बनती हैं. इन ट्रैंचों (खाइयों) में गन्ने के टुकड़े खाई के बीच में समानांतर यानी पैरलल अथवा क्रौस डाले जाते हैं. दोहरी जुड़वां लाइन में गन्ना बोआई के लिए पेयर्ड रो प्लाटिंग रिजर द्वारा बीच में 120 सैंटीमीटर चौड़ी बेड बना कर उस के दोनों तरफ 30-30 सैंटीमीटर की दूरी पर कूंड़ निकाले जाते हैं.

इस तरह 2 जुड़वां खाइयों के बीच की दूरी 120+30 या 150 सैंटीमीटर होती है. गन्ने के टुकडों की बोआई मजदूरों द्वारा ट्रैंच की तली में एक तरफ डाल कर की जाती है. सिंचाई भी ट्रैंचों में ही की जाती है.

* 2 आंख वाले गन्ने के बीज टुकड़े से टुकडे़ के बीच 4 इंच का अंतर रख कर ही बोआई करें.

* गन्ने के टुकड़े के ऊपर फावड़े या औजार से 1-2 इंच मिट्टी चढ़ा दें. हलकी मिट्टी करने के लिए पाटे का इस्तेमाल कतई न करें.

* हलकी मिट्टी चढ़ाने के बाद तुरंत पानी लगा दें. पानी लगाते समय कूंड़ों की लंबाई कम रखें अन्यथा कूंड़ों में पानी रुकेगा तो जमाव प्रभावित होगा.

* खेत में अच्छी नमी होने पर ही खरपतवारनाशी काम करेगी.

* खरपतवारनाशी का इस्तेमाल करने के लिए साफ पानी का ही इस्तेमाल करें.

* खरपतवारनाशी का छिड़काव नोजल से ही करें.

* पूरी तरह से नियंत्रण पाने के लिए खरपतवारनाशी दवा का दूसरा छिड़काव 10 दिन पर करें.

* यदि खरपतवारनाशी का इस्तेमाल नहीं किया गया है तो 25 दिन व 65 दिन पर खुरपा चला कर खरपतवार निकाल दें.

छिड़काव

उर्वरकों को गोबर की सड़ी खाद में मिला कर फिर गुड़ाई करें. गोबर की खाद 15 क्विंटल प्रति एकड़ के हिसाब से इस्तेमाल करें.

फसल की सुरक्षा

बोआई के समय कीटनाशक दवा डेंटसू 100 ग्राम और टेल स्टार 400 मिलीलिटर या लिसेंटा 160 मिलीलिटर प्रति एकड़ में पहला छिड़काव करें. बोआई के समय कूंड़ों में गन्नों के टुकड़ों के ऊपर मिट्टी चढ़ाने से पहले छिड़काव करें.

दूसरा कीटनाशक का इस्तेमाल बोआई के 45-60 दिन बाद 150 मिलीलिटर प्रति एकड़ कोराजन ड्रेंचिंग कर के सिंचाई कर दें या सिंचाई करने के बाद ड्रेंचिंग करें.

कीटनाशक का इस्तेमाल सिंचाई करने के बाद जब हलका सा पैर घुसता हो तब करें.

मिट्टी चढ़ाना

* गन्ने की फसल में 2 बार मिट्टी चढ़ाएं.

* 60-65 दिन पर कल्ले निकलते समय उर्वरक और कोराजन का इस्तेमाल कर के हलकी मिट्टी चढ़ाएं. मिट्टी चढ़ाने के बाद पानी दे कर पत्तियों के ऊपर माइक्रोन्यूटैंट का छिड़काव करें.

* दूसरी भारी मिट्टी 120 से 150 दिन पर उर्वरक की तीसरी मात्रा और कोराजन की दूसरा ड्रेंचिंग कर भारी मिट्टी चढ़ाएं. मिट्टी चढ़ाने के बाद सिंचाई कर के गन्ने की पत्तियों पर दूसरा माइक्रोन्यूटैंट का छिड़काव जरूर करें.

सिंचाई

* खेत में हमेशा नालियों में हलकी सिंचाई करें.

* खेत में कहीं भी पानी नहीं रुकना चाहिए.

* खेत में हमेशा नमी बनाए रखें.

* नाली विधि से पानी की बचत होती है और एक बार में 4-5 लाइन से आलू विधि से पानी दें.

गन्ने की नई प्रजातियों से लें अधिक उत्पादन

गन्ना भारत की फायदेमंद नकदी फसल है. गन्ना उष्ण कटिबंधीय व उपोष्ण देशों में उगाया जाता है. भारत में कपड़ा उद्योग के बाद चीनी उद्योग का दूसरा स्थान है. दुनिया के कुल 114 देशों में चीनी का उत्पादन 2 फसलों गन्ना व चुकंदर के द्वारा किया जाता है. दुनिया के खास गन्ना उत्पादक देश ब्राजील, भारत, क्यूबा, चीन, मैक्सिको व फिलिपींस हैं.

गन्ने के रकबे में भारत पहले स्थान पर है, परंतु चीनी उत्पादन में भारत ब्राजील के बाद गन्ने का दूसरा सब से वैश्विक चीनी उत्पादक और दुनिया का खास चीनी उपभोक्ता है. यह 11.08 मिलियन टन चीनी का उत्पादन करता है. वैश्विक चीनी का लगभग 70 फीसदी गन्ने से मिलता है. भारत का कुल गन्ना खेती रकबा लगभग 5.08 मिलियन हेक्टेयर है और उत्पादन 68 टन प्रति हेक्टेयर की उत्पादकता के साथ 350.02 मिलियन टन है.

गन्ने की फसल से 100 टन प्रति हेक्टेयर की पैदावार ली जा सकती है. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए हमें उन्नत प्रजाति, समन्वित पोषक तत्त्व, नवीन विधियों द्वारा बोआई एवं रोग व कीटों के प्रबंधन की जानकारी होनी चाहिए.

खेत की तैयारी

खेत को तैयार करने के लिए एक बार मिट्टी पलटने वाले हल से जोत कर 3 बार हैरो से जुताई करें. देशी हल की 5 से 6 जुताइयां काफी होती हैं. अंतिम जुताई के समय गोबर, कंपोस्ट, प्रेसमड (चीनी मिल से मिलने वाली) का इस्तेमाल जरूर करें और इस को 10-15 टन प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में मिला दें. आखिरी जुताई के समय पाटा लगाएं.

मिट्टी व आबोहवा

गन्ने की खेती के लिए अच्छी जल निकास वाली भारी मिट्टी पसंद की जाती है. हालांकि यह मध्यम और हलकी बनावट वाली मिट्टी पर भी सुनिश्चित सिंचाई के साथ अच्छी तरह से बढ़ती है. 0.5 फीसदी के साथ मिट्टी में

0.6 फीसदी कार्बन और पीएच मान 6.5-7.5 गन्ने की बढ़वार के लिए सब से मुनासिब है.

बीज एवं बीजोपचार

मिट्टीजनित एवं बीजजनित रोगों से फसल को बचाने के लिए गन्ने के टुकड़ों को नम वायु उपचार 54 डिगरी सैल्सियस तापमान 8 घंटे तक उपचारित करने से पैडी का बोनापन, उकठा आदि नहीं होते हैं. बोने से पहले फफूंदनाशक दवाओं जैसे एगलाल 1.23 किलोग्राम दवा को 250 लिटर पानी में मिला कर टुकड़ों को घोल में डुबो कर बोते हैं.

बोआई का समय

* शरदकालीन बोआई : 15 सितंबर से 31 अक्तूबर तक.

* बसंतकालीन बोआई : 1 फरवरी से 31 मार्च तक.

* विलंब या देर से बोआई : 15 अप्रैल से 31 मई तक.

बोआई के तरीके

समतल विधि

यह रोपण का सब से सरल व सस्ता तरीका है. आमतौर पर शरदकालीन गन्ने में लाइन से लाइन की दूरी 90 सैंटीमीटर, बसंतकालीन में 75 सैंटीमीटर और ग्रीष्मकालीन गन्ने में 60 सैंटीमीटर रखें. कूंड ट्रैक्टर के द्वारा भी निकाले जा सकते हैं. कूंडों की गहराई 10-15 सैंटीमीटर होनी चाहिए.

समतल विधि में गन्ने की बोआई देशी हल अथवा ट्रैक्टरचालित नाली खोलने वाला हल अथवा ट्रैक्टरचालित कटर प्लांटर से बोआई करते हैं. दोहरी लाइन बोआई विधि में शरदकालीन, बसंतकालीन एवं ग्रीष्मकालीन बोआई में लाइनों की दूरी क्रमश: 90:30:90:60:30:60 और 45:30:45 सैंटीमीटर रखते हैं.

समतल विधि में बोआई के बाद मिट्टी और बोए गए गन्ने के टुकड़ों से नमी की कमी तेजी से होती है और जमाव पर बुरा असर पड़ता है.

ट्रैंच विधि से बोआई

ट्रैंच विधि में यू आकार की 25 सैंटीमीटर गहरी और 30 सैंटीमीटर चौड़ी खूड़ (ट्रैंच) 90 सैंटीमीटर की दूरी पर ट्रैक्टरचालित ट्रैंचर से खोदी जाती है. इस मशीन द्वारा एक बार में 2 खूड़ (ट्रैंच) बनाई जाती हैं और तीसरी व चौथी ट्रैंच दूसरे चक्कर पर मशीन में लगे गाइडर की मदद से लगे निशानों पर समान दूरी पर बनती है.

ट्रैंचों (खूड़) में गन्ने के टुकड़े खूड़ के बीच में समानांतर अथवा क्रौस डाले जाते हैं. दोहरी जुड़वां लाइन में गन्ना बोआई के लिए दोहरी लाइन प्लांटिंग रिजर द्वारा बीच में 120 सैंटीमीटर चौड़ी बेड बना कर उस के दोनों तरफ 30-30 सैंटीमीटर के अंतराल पर खूड़ निकाले जाते हैं. इस प्रकार 4 जुड़वां खूड़ों के बीच की दूरी 120+30 या 150 सैंटीमीटर होती है. गन्ने के टुकड़ों की बोआई श्रमिकों द्वारा ट्रैंच की तली में एक तरफ डाल कर की जाती है. सिंचाई ट्रैंचों में की जाती है.

गोल गड्ढा विधि

गोल गड्ढा विधि में तकरीबन 2,700 गसेल गड्ढे प्रति एकड़ बनाए जाते हैं. गड्ढे 90 सैंटीमीटर व्यास के होते हैं. गड्ढे की आपस की दूरी 150 सैंटीमीटर और लाइन से लाइन की दूरी 180 सैंटीमीटर होती है. किसी ट्रैक्टरचालित गड्ढा मशीन द्वारा गड्ढे बनाए जाते हैं.

बोआई से पहले गड्ढों में 5 किलोग्राम गोबर की खाद, 100 ग्राम जिप्सम व 125 ग्राम सुपर फास्फेट भर दिया जाता है. फिर दो आंख वाले 22 बीज टुकड़े डालने चाहिए. गन्ने के टुकड़ों के ऊपर क्लोरोपाइरीफास 20 ईसी का छिड़काव 4 लिटर प्रति हेक्टेयर की दर से करने के बाद 5 सैंटीमीटर मोटाई में मिट्टी डाल कर गड्ढा बंद कर दें.

पौली बैग नर्सरी

नर्सरी के लिए रोगरहित बीज गन्ना लिया जाता है. हाथ से एक आंख के बीज टुकड़े काट कर 0.1 फीसदी कार्बंडाजिम के घोल में 10 मिनट के लिए डुबा लें और फिर छोटेछोटे छिद्र किए गए 12×8 सैंटीमीटर पौली बैग में की जा सकती है. इस विधि से जड़ों का कोई  नुकसान नहीं होता है, इसलिए पौध भी बहुत कम लगती है. पौली बैग विधि में पौधे में अधिक टिलर निकलते हैं. पौली बैग से निकले अंकुर वाटरलौगिंग रकबे में भी लगाए जा सकते हैं.

बड चिप तकनीक

इस विधि में बड चिप की मदद से नर्सरी लगाई जाती है और फिर पौधे को सावधानी से खेत में लगा दिया जाता है. बड चिपिंग मशीन की मदद से गन्ने की आंख को गांठ के भाग से बाहर निकाल लें. एक एकड़ रकबे में बोआई के लिए 6 क्विंटल बड चिप की जरूरत पड़ती है और बाकी गन्ना मिल में पिराई के लिए भेज दिया जाता है.

बड चिप का क्लोरोपायरीफास 2 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी+कार्बंडाजिम 1 ग्राम लिटर पानी के घोल में 10 मिनट के लिए भिगो कर उपचार कर लें.

बराबर मात्रा में मिट्टी रेत और गोबर की सड़ी खाद कंपोस्ट का मिश्रण बना कर छोटेछोटे छिद्रों वाले पौलीथिन बैग या केबिटी ट्रे में भर कर आंख के मुंह के ऊपर की तरफ कर दें और मिट्टी के मिश्रण से ढक दें. फव्वारे से लगातार सिंचाई करते रहें व बिजाई के 15 दिन बाद या 25 दिन बाद 1 फीसदी यूरिया के घोल का छिड़काव करें. यह 6 से 8 हफ्ते बाद खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाती है.

गन्ने और अंत:फसली खेती

गन्ने में अंत:फसल जैसे गेहूं, लोबिया, फ्रैंच बीन, काबुली चना, तरबूज, बैगन आदि जैसी फसलों को लगाते हैं. बसंतकालीन गन्ने के साथ मूंग और उड़द की अंत:फसली खेती खासतौर से उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब और हरियाणा में कर के दलहन का लगभग 10 लाख हेक्टेयर के अलावा रकबे को बढ़ाया जा सकता है. दोहरे लाभ के लिए दलहनी फसलों के बोने से जैसे गन्ना+लोबिया व गन्ना+मूंग तरीके द्वारा शुद्ध मुनाफे में बढ़ोतरी की जा सकती है.

सिंचाई

गन्ना फसल की जल मांग अधिक है. तकरीबन 1400 से 1800 मिलीलिटर है. गन्ने में 6 से 8 सिंचाइयों की जरूरत पड़ती है. सिंचाई की सुविधा यदि सीमित हो, तो गन्ने की क्रांतिक संवेदनशील दशाओं और गन्ने का जमाव कल्लों का प्रस्फुटन, जल्द बढ़वार और पकने की दशा में सिंचाई जरूर करें.

बारिश के मौसम से पहले 10-15 दिन के फासले पर मौसम के अनुसार एवं 1-2 सिंचाई बारिश के बाद करें. गन्ने में पहली सिंचाई 40-50 दिन बाद करनी चाहिए. गन्ने में कल्ले निकलते समय सिंचाई जरूर करें. इस के बाद 15-20 दिन के अंतर से सिंचाई करते रहें.

खाद एवं उर्वरक

गन्ने में खाद की मात्रा मिट्टी की जांच के मुताबिक डालनी चाहिए. पोषक तत्त्वों के लिए 150 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 से 80 किलोग्राम फास्फोरस व 60 किलोग्राम पोटाश की दर से प्रयोग करना चाहिए. फसल में फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन की एकतिहाई मात्रा बोआई के समय कूंड़ों में गन्ना बीज के नीचे या बीज कूंड के साथ खोले गए खाली कूंड में डालनी चाहिए. नाइट्रोजन की बची मात्रा 2 बार में सिंचाई सुविधा के मुताबिक बारिश होने से पहले डाल दें. 20-25 किलोग्राम जिंक सल्फेट एवं 20 किलोग्राम गंधक बोते समय इस्तेमाल करना चाहिए.

खरपतवार पर नियंत्रण

समयसमय पर खरपतवारों के नियंत्रण के लिए निराई करते रहना चाहिए. सामान्यत: 5 से 6 बार निराईगुड़ाई करना अति आवश्यक है. लाइन से लाइन की गुड़ाई की अपेक्षा पौधे से पौधे की गुड़ाई अधिक लाभकारी पाई गई है.

गन्ने की कटाई की विधि

जैसे ही हैंड रिप्रफैक्टोमीटर दस्ती आवर्तन मापी का बिंदु 18 तक पहुंचे, गन्ने की कटाई शुरू कर देनी चाहिए. गन्ने की मिठास से भी गन्ने के पकने का पता लगाया जा सकता है. कटाई करने से पहले मेंडें़ समतल कर के गन्ने की कटाई तेज धार वाले औजार से जमीन की सतह से करनी चाहिए.

उपज

गन्ने की वैज्ञानिक विधि से खेती करने से तकरीबन 70 से 90 टन प्रति हेक्टेयर उपज ली जा सकती है.