Nutri Smart Food : मोटे अनाज से बढ़ेगा रोजगार

Nutri Smart Food: ज्वार, बाजरा, रागी, मक्का जैसी मोटे अनाज की फसलें आज किसानों को दे रही हैं मोटा मुनाफा, क्योंकि अब अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इनकी पहचान न्यूट्री-स्मार्ट फूड के तौर पर हो रही है. Nutri Smart Food

राष्ट्रीय कृषि विकास योजना बना रही आत्मनिर्भर

आज दुनिया-भर के लोग अच्छी सेहत के लिए मिलेट्स यानी मोटे अनाज को अपने भोजन में शामिल कर रहे हैं. जिसके तहत आज मोटे अनाज की प्रोसेसिंग कर अनेक पौष्टिक उत्पाद बनाए जा रहे हैं.

हाल ही में राजस्थान के उदयपुर जिले के डबोक गांव में राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) के अंतर्गत मेवाड़ क्षेत्र की परंपरागत फसलों के प्रसंस्करणों का उत्कृष्टता केंद्र के तहत पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम ‘मेवाड़ क्षेत्र की परंपरागत फसलों का प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन’ का सफलतापूर्वक आयोजन किया गया. Nutri Smart Food

इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य क्षेत्र के किसानों, महिला स्वयं सहायता समूहों, ग्रामीण युवाओं और नवोद्यमियों को स्थानीय स्तर पर उपलब्ध परंपरागत फसलों के वैज्ञानिक प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन एवं विपणन से जोड़कर उन्हें आत्मनिर्भर बनाना रहा.

‘न्यूट्री-स्मार्ट फूड’ के रूप अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मिल रही पहचान

राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र में ज्वार, बाजरा, रागी, मक्का जैसी मोटे अनाज की फसलें परंपरागत रूप से उगाई जाती रही हैं, किंतु लंबे समय तक इनके सीमित उपयोग के कारण किसानों को अपेक्षित आर्थिक लाभ नहीं मिल रहा था, लेकिन अब वर्तमान समय में मोटे अनाज को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ‘न्यूट्री-स्मार्ट फूड’ के रूप में पहचान मिलने से इनके प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन की अपार संभावनाएं उभरकर सामने आ रही हैं. यह बात परियोजना प्रभारी डॉ. कमला महाजनी ने कही.

मोटे अनाज कैसे हैं लाभकारी

मोटे अनाज, हल्दी और अदरक के पोषणात्मक, औषधीय व स्वास्थ्य संबंधी लाभों पर विस्तार से व्याख्यान योगिता पालीवाल द्वारा दिया गया. उन्होंने बताया कि मोटे अनाज फाइबर, आयरन, कैल्शियम और सूक्ष्म पोषक तत्त्वों से भरपूर होते हैं, जो मधुमेह, हृदय रोग और कुपोषण जैसी समस्याओं के समाधान में सहायक हैं. साथ ही, हल्दी और अदरक के प्राकृतिक औषधीय गुणों, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में उनकी भूमिका और घरेलू व औद्योगिक उपयोग की संभावनाओं पर जानकारी दी.

मोटे अनाज के उत्पादों का है बड़ा बाजार

अंकिता पालीवाल ने मोटे अनाज की बढ़ती राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय बाजार मांग, उपभोक्ता रुझानों और मूल्य संवर्धन से मिलने वाले अतिरिक्त आर्थिक लाभों की जानकारी दी. प्रतिभागियों को मोटे अनाज आधारित विभिन्न नवाचारात्मक उत्पादों जैसे मल्टीग्रेन आटा मिश्रण, चकली, लड्डू, कुकीज, चॉकलेट, रेडी-टू-कुक मिक्स और रेडी-टू-ईट उत्पादों की विस्तृत जानकारी प्रदान की गई और बताया कि आज मोटे अनाज की प्रोसेसिंग कर इसके अनेक पौष्टिक उत्पाद तैयार हो रहे हैं, जिनकी बड़े पैमाने पर बाजार में मांग है.

इसके साथ-साथ नेहा शेखावत ने उत्पादों की गुणवत्ता, मानकीकरण, लेबलिंग और पैकेजिंग के महत्त्व पर भी चर्चा की गई जो मार्केटिंग बढ़ाने का बड़ा पहलू है.

प्रोसेसिंग तकनीक की मिली जानकारी

5 दिन के प्रशिक्षण आयोजन में प्रतिभागियों को मोटे अनाज, हल्दी और अदरक के प्रसंस्करण की आधुनिक व पारंपरिक तकनीकों से रूबरू कराया गया और हल्दी व अदरक की सफाई, उबालना, ब्लांचिंग, सुखाना, पिसाई, छानना, पैकेजिंग और भंडारण की वैज्ञानिक विधियों के बारे में बताया गया.

इसके अतिरिक्त, मोटे अनाज से बेकरी उत्पाद और पारंपरिक उत्पाद तैयार करने की प्रक्रियाओं का भी चरणबद्ध अभ्यास कराया गया, जिससे प्रतिभागियों को लघु उद्योग स्तर पर उत्पादन कैसे किया जाए, इसकी जानकारी भी मिली.

सरकारी योजनाओं का कैसे लें लाभ

कार्यक्रम के अंतर्गत सरकारी योजनाओं, उद्यमिता विकास और वित्तीय सहायता पर केंद्रित विशेष सत्रों का आयोजन किया गया. इन सत्रों में प्रतिभागियों को खाद्य प्रसंस्करण से जुड़ी केंद्र और राज्य सरकार की विभिन्न योजनाओं, अनुदान, सब्सिडी, बैंक ऋण,  Nutri Smart Food स्वयं सहायता समूह आधारित उद्यम, स्टार्ट-अप योजनाओं और विपणन सहायता के बारे में नेहा शेखावत द्वारा विस्तार से जानकारी दी गई.

विशेषज्ञों ने यह भी समझाया कि किस प्रकार सीमित पूंजी में छोटे स्तर की प्रसंस्करण इकाइयां स्थापित कर किसान और महिलाएं स्थानीय संसाधनों का उपयोग करते हुए अपनी आय में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकती हैं.

प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों के साथ संवादात्मक सत्र भी आयोजित किए गए, जिनमें उन्होंने अपनी जिज्ञासाएं और व्यावहारिक समस्याएं साझा कीं.

अंकिता पालीवाल द्वारा उनके प्रश्नों का समाधान कर उन्हें व्यावसायिक योजना निर्माण, लागत-लाभ विश्लेषण और बाजार से जुड़ने के व्यावहारिक सुझाव दिए गए. Nutri Smart Food

27 से 31 जनवरी, 2026 तक चलने वाले इस प्रशिक्षण कार्यक्रम ने प्रतिभागियों को न केवल तकनीकी ज्ञान और कौशल प्रदान किया, बल्कि स्थानीय परंपरागत फसलों के माध्यम से सतत आजीविका सृजन, ग्रामीण रोजगार व उद्यमिता विकास के प्रति जागरूक भी किया. ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने की दिशा में अत्यंत महत्त्वपूर्ण साबित होते हैं.

Millets : मिलेट्स की खेती  क्यों जरूरी है

Millets : भारत में सांवा, कोदो, कुटकी, रागी, मक्का, बाजरा, ज्वार आदि फसलें पुराने समय से ही उगाई जाती रही हैं. आजकल इसे मोटा अनाज, श्रीअन्न या मिलेट्स भी कहते हैं. मोटा अनाज बहुत पोषक और गुणवत्ता के साथ जलवायु के लिए अनुकूल है और कम पानी में पैदा होने वाली प्रमुख फसलें हैं. 20वीं सदी तक अधिकतर क्षेत्रों में इन की खेती अरहर के साथ मिश्रित रूप से की जाती रही है.

हरित क्रांति के दौर में धीरेधीरे मोटे अनाज (Millets) की खेती की ओर लोगों का रुझान कम होने लगा था. ग्रामीण क्षेत्रों में एक कहावत प्रसिद्ध है पूस का रिन्हा, माघ में खाए. अर्थात लाई पूस माह (15 जनवरी) में बनती थी, जो माघ माह (फरवरी) तक खाई जाती थी.

ग्रामीण क्षेत्रों में कहावत है कि जैसा खाओ अन्न, वैसे रहेगा मन. मडुवा मीन, चीना संग दही. कोदो भात दूध संग लही. सब अंनन में मडुवा राजा, जबजब सेंको तबतब ताजा. सब अनन में सांवा जेठ, से बसे धाने के हेठ.

मोटे अनाज (Millets) में सभी तरह के पोषक तत्त्व मिलते हैं. इस के खाने से स्वास्थ्य ठीक रहता है, क्योंकि इस में ज्यादा उर्वरक की आवश्यकता नहीं होती, कीटनाशकों का प्रयोग भी नाममात्र का होता है. जब से धान व गेहूं का दौर चला, उर्वरक, पैस्टीसाइड का अंधाधुंध प्रयोग होने लगा. इस कारण तरहतरह की बीमारियां भी मानव और पशुओं में होने लगी हैं. जमीन से केंचुआ और मेंढकों की संख्या कम हो गई, पक्षियों में चील, कौए, गौरैया और गिद्धों की संख्या में कमी आई है. अब हमें श्रीअन्न की खेती पर ध्यान देना होगा. इस की खेती विशेषकर खरीफ मौसम में की जाती है.

जमीन की तैयारी और बोआई

मोटे अनाज (Millets) की खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली दोमट भूमि सही रहती है. भूमि को अच्छी तरह से जोत कर समतल बनाना चाहिए. स्वस्थ और उच्च गुणवत्ता वाले बीजों का चयन करना चाहिए. बीजों को बोआई से पहले उपचारित करना चाहिए, ताकि रोगों और कीटों से बचाव हो सके.

Millets

फसल प्रबंधन

उचित मात्रा में खाद और उर्वरकों का उपयोग, समयसमय पर निराईगुड़ाई और सिंचाई महत्त्वपूर्ण हैं. श्रीअन्न (Millets) की फसलें ज्यादातर कम पानी में भी अच्छी होती हैं, लेकिन सूखे के समय सिंचाई की आवश्यकता होती है. ये पर्यावरण के अनुकूल फसलें हैं जिन्हें कम पानी और कम उर्वरकों में भी उगाया जा सकता है. मोटे अनाज की खेती में उत्पादन लागत कम लगती है और ये किसानों के लिए आर्थिक दृष्टि से लाभकारी फसलें हैं.

हालांकि, आजकल मोटे अनाज की काफी मांग है, फिर भी किसानों को उन की उपज के लिए उचित बाजार उपलब्ध नहीं है और उन्हें अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता, जिस से अनेक किसान चाह कर भी इस की खेती बड़े पैमाने पर नहीं कर पा रहे हैं.

प्रसंस्करण सुविधाओं की कमी

इन अनाजों के प्रसंस्करण के लिए आधुनिक सुविधाओं की कमी है. इस के लिए प्रसंस्करण यंत्रों की जरूरत है, जो किसानों की पहुंच में नहीं हैं. भारत ?सरकार और विभिन्न राज्य सरकारें मोटे अनाज की खेती को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाएं और सब्सिडी प्रदान कर रही हैं. किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों के बारे में प्रशिक्षण दिया जा रहा है और विपणन सुविधाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है, फिर भी अभी अनेक किसानों तक इन सब की पहुंच नहीं है.

पशुओं के लिए लाभकारी

मोटे अनाज का सेवन इनसानों के अलावा पशुओं के स्वास्थ्य के लिए भी बेहद लाभकारी है, क्योंकि इस में उच्च मात्रा में फाइबर, प्रोटीन और विटामिन होते हैं. आमतौर पर किसानों का रु?ान मुख्य रूप से अपनी दैनिक जरूरतों और पशु चारे के लिए ही मोटे अनाज को उगाने की ओर होता है. इस के विपरीत अगर सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर श्रीअन्न की खरीद सुनिश्चित करे, तो इस का रकबा बढ़ सकता है.

बनाए जा रहे हैं विभिन्न व्यंजन

मोटे अनाज से रोटी, चावल, खीर, पूरी, बिसकुट, मिठाई, कौर्नफ्लैक्स, दलिया, नमकीन, टिक्की, मठरी, केक आदि विभिन्न व्यंजन बनाए जा रहे हैं, जो स्वादिष्ठ होने के साथसाथ सेहत के लिए भी लाभदायक हैं.

जो लोग इन की प्रोसैसिंग कर रहे हैं, वे अतिरिक्त कमाई भी कर रहे हैं.

Russia’s Negative List : भारतीय 70 जड़ी बूटियां व मसाले नैगेटिव लिस्ट में

Russia’s Negative List :  भारतीय हर्बल खेती के प्रमुख प्रतिनिधि एवं राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड के सदस्य डा. राजाराम त्रिपाठी का मौस्को में प्रतिष्ठित “Meet & Greet” कार्यक्रम में जोरदार स्वागत किया गया. डा. राजाराम त्रिपाठी,  राष्ट्रीय संयोजक, अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा) और ‘मां दंतेश्वरी हर्बल समूह’ के संस्थापक भी हैं.

इस कार्यक्रम में रूस के विभिन्न औद्योगिक, व्यापारिक और कृषि क्षेत्रों के सफल उद्यमी, डाक्टर, किसान और विशेषज्ञ मौजूद थे, जिन्होंने भारत के औषधीय पौधों, मसालों और सुपरफूड्स जैसे उत्पादों की रूसी बाजार में बढ़ती मांग पर जोर दिया.

इस विशेष चर्चा का विषय बनी भारत की तकरीबन 70 महत्त्वपूर्ण जड़ीबूटियां और मसाले, जिन में अश्वगंधा की जड़ी भी शामिल है. रूस में अश्वगंधा जैसा प्रसिद्ध हर्बल उत्पाद भी प्रचलन में नहीं है. रूस में भारतीय मूल के जानकारों ने बताया कि यह अघोषित सूची भारतीय हर्बल व मसालों के आयात के लिए बड़ी बाधा बनी हुई है. जिस का प्रमुख कारण, रूसी अधिकारियों के पास इन उत्पादों के सही तथ्यों व वैज्ञानिक प्रमाणों की कमी  माना जा रहा है.

डा. राजाराम त्रिपाठी ने स्पष्ट कहा “आप के द्वारा बताए गए यह प्रतिबंध केवल व्यापारिक नुकसान नहीं, बल्कि दोनों देशों के लिए औषधीय और स्वास्थ्य सहयोग में भी बड़ी बाधा है. मैं इसे भारत सरकार के समक्ष उच्च प्राथमिकता से उठाऊंगा और वैज्ञानिक डेटा और शोध के माध्यम से इसे दूर करने का हर संभव प्रयास करूंगा. इस से न केवल भारतीय किसानों को लाभ होगा, बल्कि रूस के नागरिकों के स्वास्थ्य में भी सुधार आएगा.”

डा. राजाराम त्रिपाठी ने यह भी बताया कि वे जल्द ही  दोबारा रूस आने की योजना बना रहे हैं, जहां वे किसानों के बीच जा कर परंपरागत एवं आधुनिक कृषि तकनीकों के आदानप्रदान का आयोजन करेंगे ताकि, दोनों देशों के किसानों को इस का सीधा लाभ मिले.

इस कार्यक्रम के सफल आयोजन में ‘इंटरनैशनल बिजनेस एलायंस’ के अध्यक्ष सैमी मनोज कोटवानी और ‘कृषि जागरण’ के संस्थापक एमसी डोमिनिक की भूमिका महत्त्वपूर्ण रही. रूस में भारतीय हर्बल एवं ऐरोमैटिक उत्पादों की बढ़ती मांग को देखते हुए, और अमेरिका द्वारा भारत पर लगाए गए 25 फीसदी टैरिफ के संदर्भ में, रूस को वैकल्पिक निर्यात बाजार के रूप में देखा जा रहा है. इस संदर्भ में भारतरूस के व्यापार और सांस्कृतिक सहयोग को अधिक सशक्त बनाने की आवश्यकता पर सभी उपस्थित लोगों ने जोर दिया.

प्रमुख तथ्य:-

– रूस की नैगेटिव लिस्ट में शामिल हैं तकरीबन 70 भारतीय औषधीय जड़ीबूटियां, जिन में अत्यंत महत्त्वपूर्ण अश्वगंधा भी है

– इस प्रतिबंध का कारण रूस में भारत की औषधीय जड़ीबूटियों के वैज्ञानिक प्रमाणों की कमी बताई गई है.

– डा. राजाराम त्रिपाठी भारत सरकार के समक्ष इसे उच्च प्राथमिकता से उठा कर वैज्ञानिक साक्ष्यों के माध्यम से प्रतिबंध हटाने के लिए प्रयास कर रहे हैं.

– रूस में भारतीय मसालों, सुपरफूड्स, मिलेट्स एवं ऐरोमैटिक उत्पादों की भारी मांग है.

– अमेरिका की 25 फीसदी टैरिफ की पृष्ठभूमि में रूस को भारत के लिए एक महत्त्वपूर्ण वैकल्पिक निर्यात बाजार के रूप में माना जा रहा है.

– डा. राजाराम त्रिपाठी जल्द ही रूस आकर भारतीय एवं रूसी किसानों के बीच पारंपरिक एवं आधुनिक कृषि तकनीकों के आदानप्रदान की पहल करेंगे.

आईबीए अध्यक्ष मनोज कोटवानी ने कार्यक्रम समापन पर कहा कि, यह कार्यक्रम कृषि, स्वास्थ्य और व्यापार के क्षेत्रों में भारतरूस के सहयोग को नए आयामों पर ले जाने का अवसर है. डा. राजाराम त्रिपाठी का यह मिशन न केवल भारतीय हर्बल उत्पादकों को मजबूत बनाएगा, बल्कि दोनों देशों के बीच आयुर्वेद और प्राकृतिक चिकित्सा के आदानप्रदान को भी प्रोत्साहित करेगा.

मौस्को में आयोजित यह “Meet & Greet” भारतीय हर्बल उद्योग की वैश्विक उपस्थिति मजबूत करने के लिए एक महत्त्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.

खरीफ में कैसे लें मक्का (Maize) फसल से अच्छी पैदावार

 

Maize : मक्का की खेती रबी, खरीफ व जायद तीनों मौसम में की जाती है. खरीफ मौसम में मक्का (Maize) की बोआई मानसून की शुरुआत के साथ मई के अंत से जून के महीने तक की जाती है. बसंत ऋतु की फसलें फरवरी के अंत से मार्च के अंत तक बोई जाती हैं. बेबी कौर्न मक्का की बोआई दिसंबर और जनवरी को छोड़ कर पूरे साल की जा सकती है. स्वीट कौर्न की बोआई के लिए खरीफ और रबी सीजन सब से अच्छा है. मक्का से पापकौर्न, कौर्नफ्लेक्स, स्टार्च, एल्कोहल, सतुआ, भूजा, रोटी, भात, दर्रा, घुघनी, आदि अनेक व्यंजन बनाए जाते हैं. इस के डंठल और तना पशुओं को चारे के रूप में खिलाने में उपयोग किया जाता है.

कब करें बोआई

खरीफ मक्का की खेती के लिए बरसात के मौसम की शुरुआत में की जाती है. खरीफ मक्का की 70 फीसदी से अधिक खेती बारिश आधारित स्थिति में उगाई जाती है.

भूमि की तैयारी- मक्का की खेती के लिए जल निकास वाली बलुई दोमट भूमि सही रहती है. पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से और 2-3 जुताई कल्टीवेटर या रोटावेटर द्वारा करनी चाहिए.

बोआई का समय – देर से पकने वाली प्रजाति की बोआई मई मध्य से मध्य जून तक पलेवा कर करनी चाहिए. जिस से बारिश होने से पहले खेत में पौधे भलीभांति जम जाएं. जल्दी पकने वाली मक्का की बोआई जून के अंत तक कर ली जानी चाहिए.

बीज की मात्रा और बोआई की विधि – देशी छोटे दाने वाली प्रजाति 16-18 किलोग्राम और संकर प्रजाति के लिए 20-22 किलोग्राम व संकुल के लिए 18-20 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता होती है.

अगैती किस्मों के लिए पंक्ति से पंक्ति की दूरी 45 सैंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 20 सैंटीमीटर, मध्यम व देर से पकने वाली प्रजातियों में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 60 सैंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 25 सैंटीमीटर रखनी चाहिए. बीज की 3.5 सैंटीमीटर गहराई रखनी चाहिए. मक्का की बोआई  मेंड़ों पर करें. विरलीकरण द्वारा पौधों की उचित दूरी का भी ध्यान रखें.

खास प्रजातियां – संकर प्रजाति: गंगा-2, गंगा-11, प्रकाश, जे.एच.3459, पूसा अगैती संकर मक्का-2, पूसा अगैती संकर मक्का-3 आदि. इन की उपज क्षमता 40-45 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

संकुल प्रजाति: नवज्योति, नवीन, तरुण, श्वेता, आजाद उत्तम, गौरव, कंचन, सूर्या, शक्ति-11 आदि. इन की उपज क्षमता 35-40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

उर्वरकों का प्रयोग : खेत की मिट्टी जांच के आधार पर उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए. देर से पकने वाली संकर व संकुल प्रजातियों के लिए 120:60:60 जल्दी पकने वाली प्रजातियों के लिए 100:60:40 और देशी प्रजातियों के लिए 80:40:40 किलोग्राम नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश का प्रयोग करना चाहिए. गोबर की खाद प्रयोग करने पर 25 फीसदी नाइट्रोजन की मात्रा कम कर देना चाहिए. बोआई के समय एक चौथाई नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा कूंड़ों में बीज के नीचे डालना चाहिए. नाइट्रोजन की बची हुई मात्रा को तीन बार में बराबरबराबर मात्रा में टौपड्रेसिंग के रुप में दें.

पहली टौपड्रेसिंग बोआई के 25-30 दिन बाद (निराई के तुरंत बाद) दूसरी नर मंजरी से आधा पराग गिरने के बाद, तीसरी संकर मक्का में बोआई के 50-60 दिन के बाद और संकुल में 40-45 दिन बाद की जाती है.

जल प्रबंधन : पौधों को शुरुआती दौर और सिल्किंग (मोचा) से दाना पड़ने की अवस्था में पर्याप्त नमी आवश्यक है. सिल्किंग के समय पानी न मिलने पर दाने कम बनते हैं.

विशेषज्ञ ध्यान देने योग्य बातें – फसल में दाने बनते समय चिड़ियों और जानवरों से बचाव बहुत जरूरी है.

कटाई व मड़ाई – खरीफ मक्का की कटाई सितंबरअक्टूबर के महीने में की जाती है. कच्चे भुट्टे भी उपयोग में लाए जाते हैं, जिन का बाजार भाव भी अच्छा मिलता है. फसल पकने पर भुट्टों को ढकने वाली पत्तियां जब 75 फीसदी सूख जाए व पीली पड़ने लगे तब कटाई कर लेनी चाहिए. इस प्रकार की तकनीकी अपना कर मक्का की अच्छी पैदावार ली जा सकती है.

(लेखक वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक, निदेशक प्रसार्ड ट्रस्ट मल्हनी भाटपार रानी देवरिया, उ.प्र.)

Millets : मिलेट्स की खेती 

Millets : भारत में सांवा कोदो, कुटकी, रागी, मक्का, बाजरा, ज्वार आदि फसलें पुराने समय से ही उगाई जाती रही हैं. आजकल इसे मोटे अनाज, श्री अन्न या मिलेटस् भी कहते है. मोटा अनाज बहुत पोषक और गुणवत्ता के साथ जलवायु के लिए अनुकूल है और कम पानी में पैदा होने वाली प्रमुख फसलें हैं. 20वीं सदी तक अधिकतर क्षेत्रों में इस की खेती अरहर के साथ मिश्रित रुप से की जाती रही है.

हरित क्रांति के दौर में धीरेधीरे मोटे अनाज की खेती के तरफ से लोगों का रूझान कम होने लगा. ग्रामीण क्षेत्रों में एक कहावत प्रसिद्ध है पूस का रिन्हा, माघ में खाए. अर्थात लाई पूस माह (15 जनवरी) में बनती थी, जो माघ माह (फरवरी )तक खाई जाती थी. ग्रामीण क्षेत्रों में कहावतें प्रसिद्ध हैं – कहावत है जैसा खाओ अन्न, वैसे रहेगा मन. मडुवा मीन, चीना संग दही. कोदो भात दुध संग लही. सब अंनन में मडुवा राजा, जब जब सेको तब तब ताजा. सब अनन में सांवा जेठ, से बसे धाने के हेठ.

मोटे अनाज में सभी तरह के पोषक तत्व मिलते है, इस के खाने से स्वास्थ्य ठीक रहता है, क्योंकि इस में ज्यादा उर्वरक की आवश्यकता नहीं होती, कीटनाशकों का प्रयोग भी नाममात्र का होता था. जब से धान गेहूं का दौर चला, उर्वरक, पेस्टीसाइड का अंधाधुंध प्रयोग होने लगा. जिस कारण तरह तरह की बीमारियां भी मानव और पशुओं में होने लगी. जमीन से केंचुआ और मेंढकों की संख्या कम हो गई, पंक्षियों में चिल ,कौवै, गौरैयां और गिद्धों की संख्या में कमी आई है. अब हमें श्री अन्न की खेती पर ध्यान देना होगा. इस की खेती विशेष कर खरीफ मौसम में की जाती है.

जमीन की तैयारी और बोआई : मोटे अनाज की खेती के लिए अच्छी जल निकासी वाली दोमट भूमि सही रहती है. भूमि को अच्छी तरह से जोत कर समतल बनाना चाहिए. स्वस्थ और उच्च गुणवत्ता वाले बीजों का चयन करना चाहिए. बीजों को बोआई से पहले उपचारित करना चाहिए ताकि, रोगों और कीटों से बचाव हो सके.

फसल प्रबंधन : उचित मात्रा में खाद और उर्वरकों का उपयोग, समयसमय पर निराईगुड़ाई, और सिंचाई महत्वपूर्ण हैं. श्री अन्न की फसलें ज्यादातर कम पानी में भी अच्छी होती हैं, लेकिन सूखे के समय सिंचाई की आवश्यकता होती है. यह पर्यावरण के अनुकूल फसलें हैं जिन्हें कम पानी और कम उर्वरकों में भी उगाया जा सकता है. मोटे अनाज की खेती में उत्पादन लागत कम लगती है और यह किसानों के लिए आर्थिक दृष्टि से लाभकारी फसलें हैं.

हालांकि, आजकल मोटे अनाज की काफी मांग है फिर भी किसानों को उन की उपज के लिए उचित बाजार उपलब्ध नहीं हैं और उन्हें अपनी उपज का उचित मूल्य नहीं मिल पाता. जिस से अनेक किसान चाह कर भी इस की खेती बड़े पैमाने पर नहीं कर रहे हैं.

प्रसंस्करण सुविधाओं की कमी : इन अनाजों के प्रसंस्करण के लिए आधुनिक सुविधाओं की कमी है. इस के लिए प्रसंस्करण यंत्रों की जरूरत है. जो किसानों की पहुंच में नहीं हैं. भारत सरकार और विभिन्न राज्य सरकारें मोटे अनाज की खेती को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाएं और सब्सिडी प्रदान कर रही हैं. किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों के बारे में प्रशिक्षण दिया जा रहा है और विपणन सुविधाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है. फिर भी अभी अनेकों किसानों तक इन सब की पहुंच नहीं है.

पशुओं के लिए लाभकारी : मोटे अनाज का सेवन इंसानों के अलावा पशुओं के स्वास्थ्य के लिए भी बेहद लाभकारी है क्योंकि इस में उच्च मात्रा में फाइबर, प्रोटीन और विटामिन होते हैं. आमतौर पर किसानों का रुझान मुख्य रूप से अपनी दैनिक जरूरतों और पशु चारे के लिए ही मोटे अनाज को उगाने की ओर होता है. इस के विपरीत, अगर सरकार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर श्री अन्न की खरीद सुनिश्चित करें तो इस का रकबा बढ़ सकता है.

बनाए जा रहे हैं विभिन्न व्यंजन : मोटे अनाज से रोटी, चावल, खीर, पूड़ी, बिस्किट, मिठाई, कौर्न फलेक्स, दलिया, नमकीन, टिक्की, मटरी, केक आदि विभिन्न व्यंजन बनाएं जा रहे हैं जो स्वादिष्ट होने के साथसाथ सेहत के लिए भी लाभदायक है. जो लोग मोटे अनाज की प्रोसैसिंग कर रहे हैं, वह अतिरिक्त कमाई भी कर रहे हैं.

बाजरे (Millet) की खेती

Millet : अगर कहा जाए कि सूखे मौसम या कम सिंचाई वाले खेतों के लिए बाजरा (Millet) बहुत ही उम्दा फसल है, तो यह बिलकुल सही बात होगी. बाजरा (Millet) फसल है, जो सूखा सहन करने वाली सभी तरह के अनाज वाली फसलों में सब से आगे है. यही वजह है कि बाजरे (Millet) की खेती राजस्थान के साथसाथ उत्तर प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, गुजरात, ओडिशा व पश्चिम बंगाल के सूखाग्रस्त इलाकों में भी बड़े पैमाने पर की जाती है.

सूखा सहनशील फसल होने के कारण ही बाजरे की खेती बहुत आसानी से गरमियों के मौसम में भी कर सकते हैं. बाजरा मोटे अनाजों की श्रेणी में आता है. यह कई रोगों को दूर करने के साथ ही साथ शरीर को फिट रखने में भी कारगर है. यही वजह है कि शहरों में लोग इस की ऊंची कीमत भी अदा करने को तैयार रहते हैं.

मिट्टी : बाजरे की खेती के लिए अच्छी जल निकास वाली हलकी दोमट या बलुई दोमट मिट्टी अच्छी होती है.

खेत की तैयारी : पहली बार की जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें और उस के बाद 2-3 बार देशी हल या कल्टीवेटर से जुताई कर के खेत को तैयार करें.

बोआई का समय और विधि: बोआई का सही समय मध्य जुलाई से ले कर मध्य अगस्त तक का है. ध्यान रहे कि इस की बोआई लाइन से करने पर ज्यादा फायदा होता है. लाइन से लाइन की दूरी 45 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 10 से 15 सेंटीमीटर रखें. बीज बोने की गहराई तकरीबन 4 सेंटीमीटर तक ठीक रहती है.

बीज दर और उपचार : इस की बोआई के लिए प्रति हेक्टेयर 4-5 किलोग्राम बीजों की जरूरत होती है. बीजों को 2.5 ग्राम थीरम या 2 ग्राम कार्बेंडाजिम से प्रति किलोग्राम बीज की दर से शोधित कर लेना चाहिए.

खरपतवार नियंत्रण : अच्छा होगा कि खरपतवारों को निराईगुड़ाई कर के निकाल दें. इस से एक ओर जहां मिट्टी में हवा और नमी पहुंच जाती है, वहीं दूसरी ओर खरपतवार भी नहीं पनप पाते हैं. खरपतवारों की रासायनिक दवाओं से रोकथाम करने के लिए एट्राजीन 50 फीसदी नामक रसायन की 1.5-2 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से ले कर 700-800 लीटर पानी में मिला कर बोआई के बाद व जमाव से पहले एक समान रूप से छिड़काव कर देना चाहिए.

Millet

खाद और उर्वरक : खाद और उर्वरकों का इस्तेमाल खेत की मिट्टी की जांच के आधार पर मिली सलाह के मुताबिक करना चाहिए. हालांकि मोटे तौर पर संकर प्रजातियों (हाईब्रिड) के लिए 80-100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम फास्फोरस और 40 किलोग्राम पोटाश व देशी प्रजातियों के लिए 40-50 किलोग्राम नाइट्रोजन, 25 किलोग्राम फास्फोरस व 25 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए. फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन की आधी मात्रा बोआई से पहले इस्तेमाल करें. नाइट्रोजन की बची हुई आधी मात्रा टापड्रेसिंग के रूप में जब पौधे 25-30 दिनों के हो जाएं तो छिटक कर दें.

सिंचाई : ज्यादातर देखने में आता है कि बरसात का पानी ही इस के लिए सही होता है. यदि बरसात का पानी न मिल सके, तो 1-2 बार फूल आने पर जरूरत के मुताबिक सिंचाई करनी चाहिए.

रोग प्रबंधन : बाजरे में खासतौर पर कंडुआ, अरगट और बाजरे का हरित बाल (डाउनी मिल्ड्यू) रोग लगते हैं, जिन के बारे में विस्तार से जानकारी निम्न प्रकार है:

अरगट : यह रोग भुट्टों या बालियों के कुछ दानों पर ही दिखाई देता है. इस में दाने के स्थान पर भूरे काले रंग की सींग के आकार की गांठे बन जाती हैं, जिन्हें स्कलेरोशिया कहते हैं. प्रभावित दाने इनसानों और जानवरों के लिए नुकसानदायक होते हैं, क्योंकि उन में विषैला पदार्थ होता है. इस रोग की वजह से फूलों में से हलके गुलाबी रंग का गाढ़ा और चिपचिपा पदार्थ निकलता है, जो सूखने पर कड़ा हो जाता है.

इस की रोकथाम के लिए बोने से पहले 20 फीसदी नमक के घोल में बीजों को डुबो कर स्कलेरोशिया अलग किए जा सकते हैं. खड़ी फसल में इस की रोकथाम के लिए फूल आते ही घुलनशील मैंकोजेब चूर्ण को 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 5-7 दिनों के अंतराल पर छिड़कना करना चाहिए.

कंडुआ : इस रोग में दाने आकार में बड़े, गोल, अंडाकार व हरे रंग के हो जाते हैं, जिन में काला चूर्ण भरा होता है. मंड़ाई के समय ये दाने फूट जाते हैं, जिस से उन में से काला चूर्ण निकल कर, स्वस्थ दानों पर चिपक जाता है.

इस की रोकथाम के लिए किसी पारायुक्त रसायन से बीज शोधित कर के बोने चाहिए. सावधानी के लिए एक ही खेत में हर साल बाजरे की खेती नहीं करनी चाहिए.

हरित बाली रोग : इसे अंगरेजी में डाउनी मिल्ड्यू नाम से जाना जाता है. यह एक फफूंद जनक रोग है. इस रोग में बाजरे की बालियों के स्थान पर टेढ़ीमेढ़ी हरी पत्तियां सी बन जाती हैं, जिस से पूरी की पूरी बाली झाड़ू के समान नजर आती है और पौधे बौने रह जाते हैं.

इस रोग से बचाव के लिए अरगट रोग की तरह रासायनिक दवा का छिड़काव करें और बोआई से पहले बीजों का शोधन करें. रोगग्रसित पौधों को काट कर जला दें.

कीट प्रबंधन : बाजरे में दीमक, तना मक्खी, तना छेदक और मिज कीट का प्रकोप कभीकभी देखने को मिलता है. इन कीटों की रोकथाम के लिए किसी स्थानीय विशेषज्ञ से मिली सलाह के मुताबिक किसी असरकारक रासायनिक दवा का छिड़काव करना चाहिए.

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कुछ और ध्यान रखने वाली बातें

* इलाके की अनुकूलता के हिसाब से बताई गई प्रजातियों के बीज प्रयोग करें.

* यदि बरसात नहीं हो पा रही है, तो सिंचाई जरूर करें. ध्यान रहे कि फूल आने पर सिंचाई ज्यादा जरूरी होती है.

* बोआई के 15 दिनों बाद कमजोर पौधों को खेत से उखाड़ कर पौधे से पौधे की दूरी 10-15 सेंटीमीटर कर देनी चाहिए. इस के अलावा ज्यादा नजदीक जमे पौधों को उखाड़ कर खाली जगहों पर लगा देना चाहिए.

‘किसान दिवस’ पर किसानों को मिला सम्मान

बस्ती : प्रधानमंत्री रह चुके चौधरी चरण सिंह के जन्मदिवस के उपलक्ष्य में आत्मा योजनांतर्गत जनपद स्तरीय किसान मेले का आयोजन कृषि विज्ञान केंद्र, बंजरिया, बस्ती में किया गया, जिस का आरंभ जिलाधिकारी रवीश गुप्ता ने संयुक्त रूप से किया.

हर्रैया के विधायक सरोज मिश्र ने अपने संबोधन में कहा कि प्रदेश सरकार द्वारा संचालित योजनाओं का लाभ जनपद के सभी किसानों को मिले. उन्होंने किसानों से अपील की कि वे मोटे अनाज की खेती करें, जिस से लोगों की सेहत सुधरने के साथ ही किसानों को लाभ भी हो, मोटा अनाज खाने से ब्लडप्रेशर, शुगर, गठिया आदि तमाम तरह की बीमारियां नहीं होती हैं.

जिला पंचायत अध्यक्ष ने किसानों को संबोधित करते हुए बताया कि सरकार द्वारा किसानों के लिए अनेक योजनाएं चल रही हैं. इस समय किसानों को मुफ्त में बिजली भी दी जा रही है. उन्होंने स्व. चौधरी चरण सिंह के योगदान पर विस्तृत से चर्चा करते हुए उन के द्वारा लिए गए निर्णयों से किसानों में कैसे समृद्धि आई, इस पर बताया.

जिलाधिकारी रवीश गुप्ता ने बताया कि कृषि एवं इस के संवर्गी विभागों द्वारा किसानों के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही  हैं. वर्तमान में किसानों की फार्मर रजिस्ट्री की जा रही है. इस से किसान अपने किसान क्रेडिट कार्ड द्वारा फसल बीमा, प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि और सरकार द्वारा चलाई जा रही योजनाओं का लाभ ले सकते हैं.

उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि किसान कृषि विभाग द्वारा चलाई जा रही भूमि परीक्षण प्रयोगशाला में मिट्टी की जांच करा कर ही उर्वरक का प्रयोग करें, जिस से लागत में कमी आएगी और उर्वरक पर निर्भरता भी कम होगी.

इस अवसर पर कृषि, उद्यान, रेशम, मत्स्य विभाग, फसल बीमा, इफको, कृषि विज्ञान केंद्र, खाद एवं बीज और पशुपालन विभाग से संबंधित स्टालों का विधायक, जिला पंचायत अध्यक्ष, जिलाधिकारी व मुख्य विकास अधिकारी ने निरीक्षण किया और उन्नतशील कृषि निवेशों, नवीनतम तकनीकी जानकारी एवं शासन द्वारा किसानों के लिए  चलाई जा रही किसान उपयोगी विभिन्न योजनाओं की जानकारी उन्हें दी गई.

इस अवसर पर कृषि समेत उस के संवर्गी जैसे डेयरी, पशुपालन, सब्जी की खेती, मोटे अनाज की खेती, प्राकृतिक खेती आदि के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले किसानों को पुरस्कृत किया गया, जिस में 15 किसानों को प्रथम पुरस्कार, प्रमाणपत्र, शाल के साथ 7,000 रुपए, 15 किसानों को द्वितीय पुरस्कार हेतु प्रमाणपत्र, शाल एवं 5,000 रुपए और विकास खंड स्तर पर 70 किसानों को प्रथम पुरस्कार हेतु प्रमाणपत्र, शाल एवं 2,000 रुपए का पुरस्कार दिया गया. इस के अलावा कृषि सखियों को भी सम्मानित किया गया.

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इस दौरान विशेषज्ञों ने बताया कि इस समय गेहूं और सरसों की बोआई पूरी हो चुकी है. इस साल बोआई दूसरे सालों की अपेक्षा 10-15 दिन पहले हो गई है, इस से हमारा उत्पादन बढ़ेगा.

उन्होंने आगे बताया कि सरसों की सिंचाई 35-45 दिन के बाद ही करें. सरसों की कच्ची सिंचाई बिलकुल न करें, इस से पौधे मजबूत होते हैं. जिन के गेहूं की पहली सिंचाई हो चुकी हो, वे किसान गेहूं में 10 किलोग्राम प्रति एकड़ जिंक डालें. साथ ही, खरपतवारनाशी का पहले प्रयोग कर फिर उर्वरक का प्रयोग करें. इस के साथ ही गेहूं/सरसों में जिंक के साथ माइक्रोन्यूट्रेंट 3 किलोग्राम प्रति एकड़ डालने से पैदावार बढ़ जाती है. वहीं तिलहनी फसलों में 12 किलोग्राम प्रति एकड़ सल्फर का प्रयोग अवश्य करें. सरसों की पहली सिंचाई के बाद एक बोरी यूरिया प्रति एकड़ प्रयोग करने से उत्पादन अच्छा मिलता है.

उपकृषि निदेशक अशोक कुमार गौतम ने कृषि विभाग एवं संवर्गी विभागों के योजनाओं की विस्तार से जानकारी दी. इस के अलावा मुख्य पशु चिकित्साधिकारी, मुख्य कार्यकारी अधिकारी मत्स्य, जिला उद्यान निरीक्षक, प्रबंधक अग्रणी बैंक, बस्ती आदि ने अपने विभाग से संबंधित योजनाओं की जानकारी दी.

इस अवसर पर हर्रैया के विधायक सरोज मिश्र एवं अखिलेश सिंह, कप्तानगंज के गुलाब चंद्र सोनकर, जिला कृषि अधिकारी, जिला कृषि रक्षा अधिकारी, भूमि संरक्षण अधिकारी, सहायक निदेशक (मृदा परीक्षण/कल्चर), जिला उद्यान अधिकारी, उपदुग्धशाला अधिकारी, जिला प्रबंधक लीड बैंक व अधिक तादाद में किसान उपस्थित रहे.

बाजरे की प्रोसेसिंग (Processing of Millets) – रोजगार का जरीया

एक मोटे अनाज के रूप में पहचान बनाने वाले बाजरे से आज अनेक खाद्य पदार्थ बनाए जा रहे हैं. खासकर बाजरे का दलिया बना कर आज अनेक कंपनियां खासी कमाई कर रही हैं. आजकल बाजरे के नमकीन सेब, लड्डू, बरफी, शकरपारा, ढोकला, केक, पास्ता, मट्ठी व बिस्कुट वगैरह भी काफी पसंद किए जा रहे हैं. बाजरे में काफी मात्रा में प्रोटीन, वसा, रेशा व खनिज लवण होते हैं, जो हमारे लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण हैं.

बाजरे की प्रोसेसिंग कर के ये सब व्यंजन बड़ी आसानी से तैयार किए जा सकते हैं. लघु उद्योग के रूप में गांव वाले या शहरी लोग भी इसे कारोबार के रूप में अपना सकते हैं. काम शुरू करने के लिए इस की ट्रेनिंग लेना बहुत जरूरी है.

ट्रेनिंग के लिए चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार (हरियाणा) के खाद्य एवं पोषण विभाग से संपर्क किया जा सकता है. इस कृषि विश्वविद्यालय से जुड़े गृह विज्ञान महाविद्यालय में बाजरे के कई प्रकार के व्यंजनों को बनाना सिखाया जाता है. बाजरे की प्रोसेसिंग को ले कर इन का एक खास विभाग है ‘बाजरा उत्कृष्टता केंद्र’. इस के तहत इन के विशेषज्ञ समयसमय पर लोगों को ट्रेनिंग देते हैं, जो कि बहुत कम दिनों की होती है. इन के अनुभवी लोग तमाम जगहों पर जा कर भी ट्रेनिंग देते हैं.

प्रोसेसिंग तकनीक से बाजरा व अन्य अनाजों को उत्पाद के रूप में बदला जा सकता है. पुराने समय के लोग पारंपरिक तरीकों से इन अनाजों की प्रोसेसिंग करते थे जैसे बाजरे का आटा बनाने के लिए उसे हाथ से कूटना, हाथ की चक्की से पीसना, छिलका उतारना, दलिया बनाना वगैरह. लेकिन इन तरीकों से मेहनत और समय तो ज्यादा लगता था, पर उत्पादन कम होता था. साथ ही अनाज में छिलका आदि भी लगा रह जाता था, जिस से सही गुणवत्ता भी नहीं मिल पाती थी.

अब इन कामों के लिए प्रोसेसिंग की मशीनें आ गई हैं. इन मशीनों से ये काम बहुत आसानी से किए जा सकते हैं. मशीनों के इस्तेमाल से समय की बचत के साथसाथ मेहनत भी कम लगती है. मशीनों की जानकारी ले कर इस रोजगार की दिशा में काम किया जा सकता है.

बाजरे की प्रोसेसिंग के लिए कुछ खास मशीनें

डिस्टोनर, ग्रेडर व एस्पिरेटर : यह बाजरे की ग्रेडिंग करने की मशीन है. इस मशीन से बाजरे से रेत, कंकड़ व पत्थर वगैरह को अलग किया जाता है और बाजरे के दानों की ग्रेडिंग भी की जाती है.

छिलका उतारने की मशीन : इस मशीन से बाजरे की ऊपरी मोटी परत दानों से अलग की जाती है. छिलका उतारते समय दाने थोड़ी मात्रा में टूट भी जाते हैं, लेकिन छिलका उतरे अनाज से बाजरे के व्यंजन ज्यादा स्वादिष्ठ बनते हैं.

अनाज उबालने की मशीन (पारबौयलिंग मशीन) : यह मशीन 2 भागों में बनी होती है. इस मशीन में अनाज भिगोया व थोड़ी देर तक उबाला जाता है, जिस से बाजरे के अपोषक तत्त्व कम हो जाते हैं और बाजरे को ज्यादा समय तक रखा जा सकता है. साथ ही बाजरे की पौष्टिकता बढ़ जाती है, जिस से बने खाद्य पदार्थ ज्यादा पौष्टिक व स्वादिष्ठ होते हैं.

दलिया बनाने की मशीन (हैमर मिल/पुलवेरीजर) : आज बाजरे का दलिया काफी पसंद किया जाता है. इस मशीन से बढि़या क्वालिटी का दलिया निकाला जाता है. इस मशीन से छिलका उतारे गए बाजरे का दलिया बनाया जाता है और इसे मोटा आटा बनाने के लिए इस्तेमाल करते हैं. दलिया बनने के बाद मोटे आटे व दलिया को छान कर अलग कर लिया जाता है. यह मशीन अलगअलग कूवत में मिलती है.

सोलर टनल ड्रायर : यह मशीन सोलर ऊर्जा द्वारा चलती है. इस मशीन से बाजरे व किसी भी खाद्य पदार्थ को सुखाया जाता है. इस मशीन से समय व ईंधन की बचत होती है.

इस का तापमान नियंत्रित होता है. चूंकि यह मशीन सौर ऊर्जा से चलती है, इसलिए इस की कार्य क्षमता आकार व मौसम पर निर्भर करती है.

अगर आप भी बाजरे के उत्पाद बना कर बेचना चाहते हैं यानी अपनी इकाई लगाना चाहते हैं, तो सब से पहले ट्रेनिंग लेना जरूरी है. संस्थान द्वारा कम समय के कोर्स भी चलाए जा रहे हैं, जिन्हें कर के आप अपना कारोबार शुरू कर सकते हैं.

ज्यादा जानकारी के लिए चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार (हरियाणा) के बाजरा उत्कृष्टता केंद्र, खाद्य एवं पोषक विभाग, गृह विज्ञान महाविद्यालय से संपर्क कर सकते हैं.

सर्वोत्तम मिलेट्स मिशन – मोटे अनाज हैं पोषण का भण्डार

रीवा: देश भर में मिलेट्स मिशन चलाया जा रहा है. रीवा जिले में भी कृषि के विविधीकरण के प्रयासों के तहत मोटे अनाजों की पैदावार बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं. मोटे अनाज उगाने के लिए बड़ी संख्या में किसानों ने प्राकृतिक खेती के लिए पंजीयन कराया है. अन्य अनाजों की तुलना में मोटे अनाज आसानी से पचने वाले और अधिक पोषण देने वाले होते हैं. मोटे अनाजों में फाइबर, प्रोटीन, विटामिन और कई तरह के खनिज पाए जाते हैं. मोटे अनाज प्राकृतिक रूप से ग्लूटेन फ्री होते हैं. मोटे अनाज उगाने के लिए परंपरागत खेती की विधियाँ उपयुक्त हैं. इसलिए मोटे अनाज मिट्टी के स्वास्थ्य और पर्यावरण की सुरक्षा में भी सहायक होते हैं.

इस संबंध में उप संचालक कृषि यूपी बागरी ने बताया कि रीवा जिले ही नहीं पूरे विंध्य क्षेत्र में 50 वर्ष पूर्व तक मोटे अनाजों की बड़े पैमाने पर खेती होती थी. कोदौ, ज्वार, मक्का तथा अन्य मोटे अनाज मुख्य रूप से मेहनतकशों और गरीबों का भोजन थे. कम बारिश में भी इनकी अच्छी फसल होती थी.

मोटे अनाजों को कई सालों तक बिना किसी दवा के सुरक्षित भण्डारित रखा जा सकता है. मोटे अनाजों की खेती परंपरागत विधि से की जाती थी. खेती का आधुनिकीकरण होने तथा अधिक उत्पादन के लिए रासायनिक खाद एवं अन्य खादों का उपयोग करने के कारण मोटे अनाजों की खेती कम हो गई. इनका उत्पादन अपेक्षाकृत कम होता है, लेकिन इनकी पोषकता अधिक होती है. इसलिए शासन द्वारा मिलेट्स मिशन के माध्यम से मोटे अनाजों की खेती को बढ़ावा देने के प्रयास किए जा रहे हैं.

चावल और गेंहू के कुल कृषि आच्छादन में 20 प्रतिशत की कमी करके इनके स्थान पर मोटे अनाजों की खेती का लक्ष्य रखा गया है. इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए देश में 10.8 लाख टन मोटे अनाजों की खेती करनी होगी. मोटे अनाजों की खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने इनका न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करना शुरू किया है.

स्मार्ट गूगल क्लासरूम में होगी पढ़ाई

उदयपुर, 5 अक्टूबर। महाराणा प्रताप कृषि और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय सीटीएई, उदयपुर गर्व से विद्युत अभियांत्रिकी विभाग में अत्याधुनिक स्मार्ट क्लासरूम का उद्घाटन किया गया. मुख्य अतिथि डॉ. आर. सी. अग्रवाल उपमहानिदेशक (कृषि शिक्षा आईसीएआर) थे एवं अध्यक्षता माननीय डॉ. अजीत कुमार कर्नाटक कुलपति (एमपीयूएटी)ने की. डॉ. कर्नाटक ने कहा की नए स्मार्ट क्लासरूम में उन्नत तकनीकी उपकरण और इंटरैक्टिव शिक्षण संसाधन शामिल हैं, जो एक समृद्ध और सहयोगी शैक्षणिक वातावरण को बढ़ावा देने के लिए डिजाइन किए गए हैं.

स्मार्ट बोर्ड, उच्च-गुणवत्ता वाले प्रक्षिप्तक, सहयोगी कार्यस्थल, और एकीकृत ऑडियो-विजुअल सिस्टम जैसी सुविधाओं के साथ, ये क्लासरूम शिक्षण और अध्ययन के अनुभव को बढ़ाने का उद्देश्य रखते हैं. डॉ. आर. सी. अग्रवाल ने कहा कि “इन स्मार्ट क्लासरूम का उद्घाटन हमारे शैक्षणिक उत्कृष्टता की खोज में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है”. हमें विश्वास है कि शिक्षा में ये तकनीकी निवेश हमारे छात्रों को अपने पूर्णतम क्षमता तक पहुंचने के लिए सशक्त करेगी.

अधिष्ठाता डॉ अनुपम भटनागर का कहना है कि यह पहल सीटीएई के व्यापक प्रयासों का एक हिस्सा है. डॉ. विक्रमादित्य दवे का कहना है कि “हम ऐसे स्मार्ट क्लासरूम लॉन्च करने के लिए उत्साहित हैं जो हमारे छात्रों को नवीनतम और सबसे प्रभावी सीखने के वातावरण प्रदान करने के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं.

हमारे पाठ्यक्रम में प्रौद्योगिकी के एकीकरण से न केवल शैक्षणिक अनुभव समृद्ध होगा, बल्कि यह हमारे छात्रों को आधुनिक कार्यबल की मांगों के लिए तैयार करेगा जिससे कॉलेज के पाठ्यक्रम को यूट्यूब पर प्रसार एवं पीडीएफ में नोट्स एवं गूगल क्लासरूम से कक्षायें संचालित हो सकेगी.” डॉ सुनील जोशी निदेशक प्लानिंग एंड मॉनिटरिंग, निदेशक अनुसंधान अरविंद वर्मा, इलेक्ट्रिकल विभाग के सदस्य डॉ जयकुमार मेहरचंदानी, डॉ नवीन जैन, डॉ विनोद कुमार यादव भी उपस्थित थे.

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मिलेट हट का उद्घाटन

विश्वविद्यालय के सामुदायिक एवं व्यावहारिक विज्ञान महाविद्यालय में शनिवार को मिलेट हट का उद्घाटन डॉ राकेश चंद्र अग्रवाल, उप-महानिदेशक (कृषि शिक्षा), आईसीएआर, नई दिल्ली, द्वारा किया गया. डॉ. अग्रवाल ने बताया कि यह कदम ग्रामीण और शहरी समुदायों में मिलेट्स की खेती और उनके उपयोग को प्रोत्साहित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है.

इस अवसर पर कुलपति डॉ. अजीत कुमार कर्नाटक ने कहा कि यह पहल स्थानीय और पारंपरिक खाद्य पदार्थों के पुनरुद्धार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है इसका उद्देश्य मिलेट्स (मोटे अनाज) के महत्व को प्रोत्साहित करना और स्वास्थ्य लाभ के लिए इसके उपयोग को बढ़ावा देना है. विश्वविद्यालय की अधिष्ठता, डॉ. धृति सोलंकी, ने बताया की मिलेट से आस पास के स्थानीय निवासियों एवं आस के ग्रामीण इलाकों के जनमान्य के लिए इसकी महत्ता एक महत्वपूर्ण पहल सिद्ध होगा.

कार्यक्रम के समन्वयक डॉ. हेमू राठौड़, डॉ सरला लखवात एवं डॉ कमला महाजनी ने अपने विचार व्यक्त डॉ रेणु मोगरा द्वारा मिलेट हट व मिलेट से बने उत्पादों की जानकारी दी गयी. इस उद्घाटन के दौरान मिलेट्स से बने विभिन्न उत्पादों की प्रदर्शनी भी लगाई गई.