Production of Pulses : दालों की पैदावार और अधिक बढ़ानी होगी

Production of Pulses: संयुक्त राष्ट्र की पहल पर हर वर्ष 10 फरवरी को विश्व दलहन दिवस मनाया जाता है. इसका मुख्य उद्देश्य दालों का हमारी सेहत के लिए जो महत्त्व है, उसके प्रति जागरूकता फैलाना है और इसकी खेती के बारे में लोगों को बताना है. दलहन की खेती पर्यावरण संरक्षण के हित में भी है, क्योंकि इससे मिट्टी की उर्वरता बढ़ती है. यह देखते हुए कि दालों से हमें कई लाभ मिलते हैं, हमें इसकी खेती की तरफ और ध्यान देना चाहिए.

दालों से मिलने वाले फायदे की बात करें, तो हरी मूंग हमारे पेट के लिए बहुत लाभकारी होती है. इसी तरह, चना और अरहर की दाल भी सेहत के लिए बहुत लाभकारी है. बावजूद इसके, इसकी खेती को लेकर जरूरी जागरूकता नहीं दिखती, जो दुखद है.

दलहन की पैदावार के लिए किसानों को मेहनत खूब करनी पड़ती है, पर जब मेहनत का उचित फल नहीं मिलता, तो उनकी रुचि दलहन की खेती को लेकर घटने लगती है.

यह अच्छी बात है कि केंद्र सरकार ने दालों की पैदावार बढ़ाने के प्रयास किए हैं, लेकिन उसकी योजनाएं तभी कामयाब हो सकेंगी, जब कृषि विभाग, कृषि विशेषज्ञ और किसान मिलकर इस दिशा में काम करेंगे. जैसे- कृषि विभाग की ओर से किसानों को जागरूक करने के प्रयास करने चाहिए.

कृषि विशेषज्ञ मौसमचक्र के अनुसार या जहां दलहन की पैदावार न के बराबर होती है, वहां इसकी उपज बढ़ाने के लिए नई तकनीक विकसित करें, और किसानों को चाहिए कि वे संबंधित विभागों से जरूरी जानकारियां लेकर दलहन की खेती पर अपना ध्यान केंद्रित करें, ताकि इसकी पैदावार बढ़े.

अगर इन तीनों का सही मायने में संगम हो गया, तो निस्संदेह देश में दलहन की खेती नई ऊंचाई को छू सकेगी और भारत जैसे कृषि प्रधान देश में किसी भी दाल की कीमत आसमान तक नहीं पहुंच सकेगी.

यह सब करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि भारत को दालों का ज्यादा से ज्यादा निर्यात करना चाहिए, ताकि देश की आर्थिक स्थिति पर सकारात्मक असर पड़े और किसानों की आय बढ़ सके. करीब डेढ़ साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐसी लगभग 109 उन्नत किस्म के बीजों को जारी किया था, जो जलवायु परिवर्तन, अधिक उपज और जैविक कृषि को बढ़ावा देने वाले हैं. इनमें मुख्य तौर पर अनाज, तिलहन, फल और सब्जियां हैं.

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का यह बहुत ही अच्छा प्रयास रहा, लेकिन दलहन को लेकर भी ऐसी कोशिशें होनी चाहिए. हालांकि, इन सबकी सफलता तभी सुनिश्चित हो सकेगी, जब संबंधित विभागों और किसानों के बीच उचित तालमेल बनाया जाएगा. सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए.

यह कोई छिपा सत्य नहीं है कि विश्व में दालों का सबसे बड़ा उत्पादक देश भारत है. यहां करीब 280 लाख टन दलहन का उत्पादन होता है, जो वैश्विक उत्पादन का करीब 25 फीसदी है. जिस तरह से भारत दाल के उत्पादन में आगे बढ़ रहा है, उसी का नतीजा है कि अब सरकार ने दलहन में ‘आत्मनिर्भरता मिशन’ की शुरुआत की है, ताकि 2030-31 तक दालों का उत्पादन 350 लाख टन किया जा सके.

ऐसा करना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि हम दालों के बड़े उपभोक्ता भी हैं. इतना ही नहीं, न्यूनतम समर्थन मूल्य, यानी एमएसपी पर सौ फीसदी खरीदारी सुनिश्चित करने पर भी सरकार जोर दे रही है, ताकि आयात पर निर्भरता कम हो.

दालों की सरकारी खरीद का गणित जो नहीं जानते, उनको बता दूं कि देश में पहले गेहूं और धान की खरीद तो एमएसपी पर होती थी, लेकिन दलहन व तिलहन के लिए ऐसी व्यवस्था नहीं थी, पर केंद्र सरकार ने किसानों को आय समर्थन देने के लिए दलहन व तिलहन को एमएसपी पर खरीदने की व्यवस्था की. नतीजतन, बीते 8 वर्षों में दलहन की 75 फीसदी तक उपज सरकारी मूल्यों पर खरीदी जा रही है, जिसका लाभ किसान पा रहे हैं.

सरकारों का यह समझना भी सुखद है कि दालें केवल कृषि उत्पाद नहीं हैं, बल्कि पोषण सुरक्षा, मृदा स्वास्थ्य और ग्रामीण आजीविका की आधार भी हैं. इसी के मद्देनजर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 अक्तूबर, 2025 को 11,440 करोड़ रुपए के बजटीय आवंटन के साथ दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन की शुरुआत की. इसका लक्ष्य दाल उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ खेती के क्षेत्र को 310 लाख हेक्टेयर तक बढ़ाना भी है.

इसका एक मकसद यह भी है कि 4 वर्षों तक एमएसपी पर तुअर, उड़द और मसूर की सौ फीसदी खरीद सुनिश्चित हो. इसके लिए किसानों के बीच कुल 88 लाख निःशुल्क बीज किट और 126 लाख क्विंटल प्रमाणित बीज बांटने की व्यवस्था की गई है.

यह सब इसीलिए किया जा रहा है, क्योंकि सरकारें दाल उत्पादन की जरूरत और किसानों की आवश्यकता, दोनों को बखूबी समझ रही हैं. यह आत्मनिर्भर बनने की दिशा में बढ़ते भारत का संकेत है.

ऐसे में, यह कहना गलत होगा कि दालों के उत्पादन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा. अलबत्ता, पहले से कहीं अधिक गंभीरता दिख रही है. उम्मीद यही है कि जिस तरह से काम किए जा रहे हैं, जल्द ही हम दलहन के मामले में पूरी तरह से आत्मनिर्भर हो जाएंगे. इससे न सिर्फ किसानों को लाभ मिलेगा, बल्कि आम आदमी के पोषण पर भी इसका सकारात्मक असर पड़ेगा.

भारत सरकार ने दलहन आत्मनिर्भरता मिशन (2025-26 से 2030-31) के तहत 11,440 करोड़ रुपए के बजट के साथ दालों के उत्पादन में आत्मनिर्भरता का लक्ष्य रखा है. इसका उद्देश्य 2030-31 तक उत्पादन को 350 लाख टन तक पहुंचाना और किसानों के लिए तुअर, उड़द व मसूर की 100 फीसदी खरीद सुनिश्चित कर आयात पर निर्भरता कम करना है.

दलहन आत्मनिर्भरता की मुख्य बातें :

लक्ष्य : 2030-31 तक 350 लाख टन दलहन उत्पादन और 310 लाख हेक्टेयर कृषि क्षेत्र.

रणनीति : ‘बीज से बाजार तक’ (Seed to Market) दृष्टिकोण, क्लस्टर-आधारित खेती और उच्च उपज वाली किस्मों का उपयोग.

किसान सहायता : 88 लाख मुफ्त बीज किट और 126 लाख क्विंटल प्रमाणित बीजों का वितरण.

खरीद गारंटी : 4 वर्षों तक नेफेड (NAFED) और एनसीसीएफ (NCCF) द्वारा एमएसपी (MSP) पर 100 फीसदी खरीद.

प्रभाव : लगभग 2 करोड़ किसानों को लाभ, विदेशी मुद्रा की बचत और कृषि में सुधार.

यह मिशन न केवल भारत को दालों के आयात से मुक्त करेगा, बल्कि ग्रामीण समृद्धि और पोषण सुरक्षा को भी मजबूत करेगा.

भारत सरकार ने दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए 11,440 करोड़ रुपए के बजट के साथ 2025-26 से 2030-31 तक के लिए एक विशेष मिशन शुरू किया है, जिसका लक्ष्य उत्पादन को 350 लाख टन तक बढ़ाना है. इसमें उच्च गुणवत्ता वाले बीज वितरण, एमएसपी पर 100 फीसदी खरीद, उन्नत कृषि तकनीकों (KVK) और 111 उच्च-संभावित जिलों पर केंद्रित क्लस्टर-आधारित रणनीतियां अपनाई जा रही हैं.

उत्पादन बढ़ाने के लिए प्रमुख उपाय :

लक्ष्य और रणनीति : 2030-31 तक दलहन खेती का क्षेत्रफल 310 लाख हेक्टेयर तक बढ़ाना और उत्पादकता को 1130 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर तक ले जाना है.

बीज और तकनीक : किसानों को 88 लाख मुफ्त बीज किट और 126 लाख क्विंटल प्रमाणित बीज का वितरण किया जा रहा है. उन्नत बीजों और बोआई तकनीकों पर ध्यान दिया जा रहा है.

समर्थन और खरीद : पीएम-आशा के तहत अरहर, उड़द और मसूर की 100 फीसदी एमएसपी खरीद की गारंटी है, जिससे किसानों को बेहतर दाम मिलें.

क्षेत्रीय विकास : मध्य प्रदेश जैसे राज्यों की तरह, देश में अन्य स्थानों पर भी उन्नत कृषि पद्धतियों को अपनाकर उत्पादन 8 मिलियन टन तक बढ़ाया जा सकता है.

तकनीकी सहयोग : 111 उच्च-क्षमता वाले जिलों में, विशेष रूप से रबी और खरीफ दोनों फसलों में उन्नत बीज का उपयोग (Seed Village) किया जा रहा है.

यह मिशन न केवल भारत को दालों के आयात में कम निर्भर बनाएगा, बल्कि किसानों की आय में वृद्धि और मृदा स्वास्थ्य में भी सुधार करेगा

Farming Tips : फरवरी महीने में करें खेती के ये काम

रबी की सबसे प्रमुख फसल गेहूं है, जो देश में बड़े पैमाने पर की जाती है और समय से बोई गई गेहूं की फसल में अच्छा फुटाव का समय है  Farming Tips .

सिंचाई का रखें ध्यान

गेहूं फसल में सिंचाई करते समय इस बात का ध्यान रखें कि ज्यादा तेज हवाएं न चल रही हों, अगर हवा चल रही हों तो उन के थमने का इंतजार करें और मौसम ठीक होने पर ही खेत की सिंचाई करें.

गन्ना बोआई की करें तैयारी

फरवरी के दूसरे पखवारे के बाद गन्ने की बोआई का सिलसिला शुरू किया जा सकता है. बोआई के लिए गन्ने की ज्यादा पैदावार देने वाली किस्मों का चुनाव करना चाहिए. किस्मों के चयन में अपने जिले के कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों से मदद ली जा सकती है.

गन्ना बोआई से पहले करें ये काम

गन्ने का जो बीज इस्तेमाल करें, वह बीमारी से रहित और उन्नत किस्म का होना चाहिए. बोआई से पहले बीजों को उपचारित कर लेना चाहिए. बोआई के लिए 3 पोरी व 3 आंख वाले गन्ने के स्वस्थ टुकड़े बेहतर होते हैं.

दलहनी फसलों में करें कीट रोग प्रबंधन

एन दिनों मटर की फसल पूरे शबाब पर होती है. उस की देखभाल भी जरूरी है. मटर की फसल में चूर्णिल आसिता रोग के कारण पत्तियों और फलियों पर सफेद चूर्ण सा फैल जाता है. रोग के प्रारंभिक लक्षण दिखाई देते ही उस का उचित निदान करें और कृषि माहिरों की राय ले कर दवा का छिड़काव करें.

लोबिया, राजमा जैसी फसलों की बोआई के लिए यह उचित समय है, इसलिए जो किसान इन की खेती करना चाहते हैं तो वे इस काम को समय से निबटा लें. Farming Tips

सब्जी की खेती के लिए करें ये काम

भिंडी की खेती साल में 2 बार की जा सकती है. इस समय ग्रीष्मकालीन भिंडी की खेती के लिए बोआई का सही समय है. इस के अलावा इस महीने बैगन की रोपाई भी की जाती है. बैगन के पौधों की रोपाई करने के बाद पौधों की हलकी सिंचाई करें.

मैंथा और मिर्च की करें बोआई

फरवरी महीने में ही मैंथा और मिर्च की खेती के लिए भी उचित समय है. मिर्च की खेती के लिए इस समय पौध रोपाई की जा सकती है.

मिर्च की उन्नत किस्म काशी अनमोल, काशी विश्वनाथ, जवाहर मिर्च-283, जवाहर मिर्च-218, अर्का सुफल और संकर किस्म काशी अर्ली, काशी सुर्ख या काशी हरिता शामिल हैं, जो ज्यादा उपज देती हैं.

भिंडी की उन्नत किस्मों के लिए पूसा ए-4, परभनी क्रांति, पंजाब-7, अर्का अभय, अर्का अनामिका, वर्षा उपहार, हिसार उन्नत, काशी प्रगति आदि का चुनाव करें.

टमाटर की खेती की करें तैयारी

टमाटर की खेती भी वर्ष में 2 बार की जाती है. शीत ऋतु के लिए इस की बोआई जनवरी से फरवरी माह तक की जाती है.

अच्छी उपज के लिए
टमाटर की उन्नत किस्मों में देशी किस्म-पूसा रूबी, पूसा-120, पूसा शीतल, पूसा गौरव, अर्का सौरभ, अर्का विकास, सोनाली और संकर किस्मों में पूसा हाइब्रिड-1, पूसा हाइब्रिड -2, पूसा हाइब्रिड -4, अविनाश-2, रश्मि और निजी क्षेत्र से शक्तिमान, रैड गोल्ड, 501, 2535 उत्सव, अविनाश, चमत्कार, यूएस 440 आदि का चुनाव करें.

तिलहनी फसल सूरजमुखी

सूरजमुखी की फसल 15 फरवरी तक लगाई जा सकती है. इस की फसल की बोआई करते समय इस के बीजों की पक्षियों से रक्षा करना बेहद जरूरी है. इस की संकर किस्में बीएसएस-1,केबीएसए 1, ज्वालामुखी, एमएसएफएच-19, सूर्या आदि शामिल हैं. इस की बोआई करने से पूर्व खेत में भरपूर नमी न होने पर पलेवा लगा कर जुताई करनी चाहिए. 2-3 बार जुताई कर के खेत को भुरभुरा बना लेना चाहिए या रोटावेटर का इस्तेमाल करना चाहिए.

बागबान दें ध्यान

जिन लोगों ने आम का बाग लगा रखा है, वे अपने आम के बागबगीचे का ध्यान रखें. इन दिनों आम में चूर्णिल आसिता रोग लगने का काफी अंदेशा रहता है, इसलिए विशेषज्ञ से सलाह ले कर इस का निदान करें.

अनेक बीमारियों के साथसाथ इन दिनों आम के पेड़ों को कुछ कीटों का भी खतरा रहता है. अगर ऐसा हो, तो अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र के बागबानी वैज्ञानिक की राय ले कर कीटों व बीमारी का निबटारा करें.

केले के फसल का रहे खयाल

इन दिनों सदाबहार फल केले के बागों का खयाल रखना भी जरूरी है. बाग में फैली तमाम सूखी पत्तियां बटोर कर खाद के गढ्डे में डाल दें.

केले की उम्दा फसल हासिल करने के लिए बाग की निराईगुड़ाई करने के बाद पर्याप्त मात्रा में नाइट्रोजन व पोटाश वाली खादें डालें. केले के पेड़ों पर अगर किसी बीमारी या कीटों का हमला नजर आए, तो तुरंत उस का इलाज फल वैज्ञानिक की राय के मुताबिक करें.

नीबूवर्गीय पौधों की करें रोपाई

फरवरी महीने में नीबूवर्गीय पौधों की भी बोआई करने का उचित समय है. नीबू, संतरा व मौसमी वगैरह के बीजों की बोआई पौधशाला में की जा सकती है.

पशुओं की देखभाल में न करें अनदेखी

आमतौर पर फरवरी महीने में ठंड कम होने लगती है. ऐसे में पशुपालक पशुओं की सेहत को ले-कर लापरवाह हो जाते हैं और अपने मवेशियों को सर्दी से बचाने के उपाय बंद कर देते हैं, जिस से पशुओं के बीमार होने की भी खतरा होता है, इसलिए मौसम के प्रति सजग रहें. Farming Tips

जाती हुई सर्दी इनसानों के साथसाथ जानवरों को भी बीमार करने वाली होती है, इसलिए सर्दी से बचाव के उपाय एकदम से बंद न करें. Farming Tips

Arhar : अरहर की खेती में होगी कमाई

Arhar : अरहर को ज्वार, बाजरा, उड़द व कपास वगैरह फसलों के साथ बोया जाता है. इस की फसल के लिए बलुई दोमट मिट्टी वाले खेत सब से अच्छे होते हैं. इस के अलावा अरहर की खेती के लिए ढलान वाले खेत सब से सही होते हैं. ढलान वाले खेतों में पानी रुकता नहीं है. अरहर बोने के लिए खेत की जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करने के बाद 2 से 3 बार कल्टीवेटर से खेत की जुताई करनी चाहिए.

अरहर बोने का समय : अगेती अरहर (टा 21) बोने का समय अप्रैल से मई के बीच में होता है. जहां सिंचाई के अच्छे साधन हैं, वहां पर जून में और देर से पकने वाली अरहर की बोआई 15 जुलाई तक जरूर कर देनी चाहिए.

बीजों का उपचार : 1 किलोग्राम बीजों को 2 ग्राम थीरम और 1 ग्राम कार्बेंडाजिम से उपचारित करना चाहिए. बीज बोने से पहले अरहर का उपचार राइजोबियम से करना चाहिए. 1 पैकेट राइजोबियम कल्चर 10 किलोग्राम बीज के लिए इस्तेमाल में लाया जाता है. जिस खेत में अरहर पहली बार बोई जा रही हो, वहां पर कल्चर का इस्तेमाल जरूर करना चाहिए.

बीज की मात्रा : अरहर के 1 हेक्टेयर खेत के लिए 12 से 15 किलोग्राम बीजों की जरूरत होती है. अगर पानी का प्रभाव खेत में है तो बहार किस्म वाली अरहर सितंबर महीने तक 20 से 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बोनी चाहिए. अरहर की किस्म और मौसम के हिसाब से बीजों की मात्रा और पौधे से पौधे के बीच की दूरी रखनी चाहिए. अरहर की बोआई करने के लिए देशी हल का इस्तेमाल सही रहता है. अरहर की एक लाइन से दूसरी लाइन की दूरी 20 से 90 सेंटीमीटर के बीच रखी जाती है. दूरी बीज के हिसाब से रखते हैं. आईसीपीएल 151 की दूरी 30 से 45 सेंटीमीटर, टा 17 की दूरी 120 सेंटीमीटर, टा 21 की दूरी 75 सेंटीमीटर, टा 7 और आजाद की दूरी 90 सेंटीमीटर लाइन से लाइन के बीच रखनी चाहिए. अरहर की सभी किस्मों के लिए पौधे से पौधे के बीच की दूरी 20 से 30 सेंटीमीटर रखनी चाहिए.

खाद का प्रयोग : अरहर की अच्छी पैदावार के लिए 10 से 15 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 से 45 किलोग्राम फास्फोरस और 20 किलोग्राम सल्फर का इस्तेमाल 1 हेक्टेयर खेत में करना चाहिए. अरहर के लिए सिंगल सुपर फास्फेट व डाई अमोनिया फास्फेट का इस्तेमाल फायदेमंद होता है.

अरहर की फसल में सिंचाई का भी खास खयाल रखना चाहिए. टा-21, यूपीएएस 120, आईसीपीएल 151 को पलेवा कर के बोना चाहिए. दूसरे किस्म की अरहर को बोने के लिए बारिश में नमी होने पर बोना चाहिए. खेत में कम नमी हो तो फलियां बनते समय अक्तूबर के महीने में सिंचाई करनी पड़ती है. देर से पकने वाली किस्मों में अरहर को पाले से बचाने के लिए दिसंबर और जनवरी महीने में सिंचाई करना फायदेमंद होता है.

निराई व गुड़ाई : अरहर के खेत में पहली निराई बोआई के 1 महीने के अंदर होनी चाहिए. दूसरी निराई पहली निराई के 20 दिनों के बाद करनी चाहिए. घास और चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों को नष्ट करने के लिए पेंडीमेथलीन 30 ईसी 3 लीटर और एलाक्लोर 50 ईसी 4 लीटर को 700 से 800 लीटर पानी में घोल कर बोआई के बाद पाटा लगा कर अरहर जमने से पहले छिड़काव करें.

कीट व बीमारियां : अरहर  फसल में उकठा और बांझा किस्म के रोग होते हैं. इस के अलावा फली बेधक कीट व पत्ती लपेटक कीट, फलों की मक्खी भी अरहर के पौधों को नुकसान पहुंचाती हैं.

उकठा रोग में अरहर की पत्तियां पीली पड़ कर सूख जाती हैं और पौधा सूख जाता है. जड़ें सड़ कर गहरे रंग की हो जाती हैं. छाल हटा कर देखने पर जड़ से तने तक की ऊंचाई में काले रंग की धारियां पाई जाती हैं. इस से बचाव के लिए इस रोग लगे खेत में 3 से 4 सालों तक अरहर की खेती नहीं करनी चाहिए. थीरम और कार्बेंडाजिम को 2:1 के अनुपात में मिला कर 3 ग्राम प्रति किलोग्राम की दर से बीज को उपचारित कर के बोना चाहिए. अगर अरहर को ज्वार के साथ बोते हैं, तो यह रोग काफी कम हो जाता है.

अरहर को बांझा रोग बहुत नुकसान पहुंचाता है. इस रोग में अरहर की पत्तियां छोटी हो जाती हैं. फूल नहीं आते हैं. जिस से दाने नहीं बनते. यह रोग माइट द्वारा फैलता है. इस का कोई असरदार उपचार नहीं होता है. बहार, नरेंद्र और अमर किस्म की खेती कर के अरहर को इस रोग से बचाया जा सकता है.

Pulses : किसान बढ़ाएं दलहनी फसलें

Pulses : दलहन की खेती को बढ़ावा देने के लिए साल 2016 को अंतर्राष्ट्रीय दलहन साल के तौर पर मनाने का ऐलान किया गया है. अपने देश में दालों की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं. लिहाजा दलहन की ज्यादा पैदावार के बावजूद आम आदमी  के लिए दाल खाना मुश्किल हो गया है.

कहने को भारत दुनिया भर में सब से बड़ा दाल पैदा करने वाला देश है, लेकिन आम आदमी की थाली दाल से खाली है. दूसरे देशों को दालें भेजने की जगह, हम वहां से दालें मंगवाते हैं.

दरअसल, भारत में दालों की पैदावार, मांग से बहुत कम है. आजादी के बाद बीते सालों में दलहनी फसलों की खेती को बढ़ावा देने के नाम पर ऐसा कुछ नहीं हुआ, जिस से हमारा देश दालों के उत्पादन में आगे होता. ऊपर से कालाबाजारिए दालों की जमाखोरी से कीमतें बढ़ा कर खूब पैसे बनाते हैं.

दलहन फंसी दलदल में

अपने देश में दालों की सालाना खपत लगभग 225 लाख टन है, जबकि दालों का उत्पादन 175 लाख टन से नीचे है. मजबूरन लाखों टन दालें हर साल दूसरे देशों से मंगवानी पड़ती हैं. लिहाजा दलहनी फसलों का रकबा और पैदावार बढ़ाने की जरूरत है.

Pulse Cropsदलहनी फसलों की किसानों को मिलने वाली कीमत में कम बढ़ोतरी होने से भी ज्यादातर किसान इन की खेती नहीं करना चाहते हैं.

दलहन की पैदावार में मध्य प्रदेश पहले, महाराष्ट्र दूसरे व राजस्थान तीसरे नंबर पर है. देश में हो रहे दालों के कुल उत्पादन में इन राज्यों की हिस्सेदारी क्रमश: 25, 16 व 12 फीसदी है. दलहन की खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकारी महकमे दिनरात एक करने का नाटक करते हैं, जबकि असल में दलहन की बढ़त के लिए सरकारी विभाग कुछ नहीं कर रहे हैं.

दलहनी फसलों का रकबा, उन की औसत उपज व उत्पादन घट रहा है. दरअसल, हमारे देश के ज्यादातर किसानों को आज भी खेती की नई तकनीकों के बारे में कुछ नहीं पता है.

लिहाजा वे सिंचित व उपजाऊ जमीन में गेहूं, गन्ना व धान और कम उपजाऊ व असिंचित जमीन में दलहनी फसलें उगाते हैं. उन्हें अच्छी क्वालिटी के बीज सही समय व सही कीमत पर आसानी से नहीं मिलते. कई बार सूखा व ओले पूरी फसल बरबाद कर देते हैं. लिहाजा दलहनी फसलें अकसर दूसरी फसलों के मुकाबले पीछे रह जाती हैं.

ऐसे में जरूरी है कि दलहनी फसलों की खेती में हो रही इस कमी की असली वजहें खोजी जाएं और उन्हीं के मुताबिक मौजूदा सभी मामले सुलझाए जाएं.

Pulse Crops

सरकार ने दलहनी फसलों को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय कृषि विकास योजना व राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन में दालों पर खास ध्यान देते हुए उन्हें शामिल कर रखा है. इस के अलावा एक्सेलेरेटेड पल्स प्रोग्राम है जिस में नीति आयोग मदद कर रहा है. लेकिन फिर भी दालों की पैदावार नहीं बढ़ रही है. दलहनी फसलों के अच्छे बीजों के उत्पादन व उन के बंटवारे का सही इंतजाम नहीं है. दलहनी फसलों के बीज किसानों की करीब 25 फीसदी मांग ही पूरी कर पाते हैं.

आमतौर पर दलहनी फसलों की ओर किसानों का झुकाव कम रहता है. इस के कई कारण हैं जैसे कीड़े, बीमारी, खरपतवार, खराब मौसम, कम उपज व ढुलमुल खरीद व्यवस्था.

फायदेमंद हैं दलहनी फसलें

ज्यादातर किसान यह सच नहीं जानते कि दलहनी फसलें उगाने से किसानों को काफी फायदा होता है. इस से एक तो उपज की कीमत अच्छी मिलती है, साथ ही मिट्टी की उपजाऊ ताकत भी बढ़ती है. दरअसल, दलहन की जड़ों में मौजूद बैक्टीरिया हवा से नाइट्रोजन खींच कर जमीन में जमा करते रहते हैं. इसलिए फसल में कैमिकल उर्वरक डालने का खर्च बचता है और जमीन को कुदरती खाद का फायदा मुफ्त में मिल जाता है.

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बहुत से किसान नहीं जानते कि दलहनी फसलों से खरपतवारों से भी छुटकारा मिलता है. माहिरों का कहना है कि लगातार गेहूं, गन्ना व धान जैसी फसलें लेते रहने से खेतों में कई तरह की घासफूस हो जाती हैं, लेकिन सनई, ढेंचा, मूंग व उड़द आदि फसलें शुरुआत में खुद बहुत तेजी से फैल कर जमीन को ढक लेती हैं. लिहाजा खेत में उगे खरपतवारों को पूरी हवा, रोशनी व पानी आदि न मिलने से बढ़ने का मौका नहीं मिलता.

दलहनी फसलों की पकी हुई फलियों से मिली दालों में खनिज और विटामिनों से भरपूर लौह व जिंक की अच्छी मात्रा पाई जाती है. इन्हें फलियों  से निकालने के बाद जो कचरा बचता है, उसे चारे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. दालों को देश के हर इलाके के भोजन में पसंद किया जाता है.

दलहनी फसलों के बारे में ट्रेनिंग, सलाह व बीज आदि देने के लिए कानुपर में भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान काम कर रहा है. इस संस्थान के माहिरों ने अब तक ज्यादा उपज देने वाली 35 ऐसी अच्छी व रोगरोधी किस्में निकाली हैं, जिन्हें अलगअलग इलाकों की मिट्टी व आबोहवा के अनुसार अपनाया जा सकता है.

लगाएं मिनी दाल मिल

फिर भी नकदी फसलों के मुकाबले दलहनी फसलों की खेती में ज्यादातर किसानों को फायदा नजर नहीं आता. लिहाजा उन्हें इस बात के लिए भी जागरूक किया जाए कि वे अपनी उपज की कीमत बढ़ाएं. तैयार उपज

मंडी ले जा कर आढ़तियों को न सौंपें. आटा चक्की, धान मशीन व तेल के स्पैलर लगाने के साथसाथ किसान दाल की प्रोसेसिंग भी करें. ज्यादातर किसान पोस्ट हार्वेस्ट टैक्नोलौजी यानी कटाई बाद की तकनीक नहीं जानते.

दाल बनाने का काम मुश्किल नहीं है. लिहाजा किसान तकनीक सीखें व अकेले या मिल कर मिनी दाल मिल लगाएं. दालें तैयार करें और थोक व खुदरा दुकानदारों को बेचें. होटलों, कैंटीन व मैस आदि को सप्लाई करने पर किसानों को उन की दलहनी उपज की कीमत ज्यादा मिलेगी.

मिनी दाल मिल की जानकारी के लिए किसान उद्यमी निदेशक, केंद्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी संस्थान मैसूर; निदेशक, केंद्रीय कृषि अभियांत्रिकी संस्थान भोपाल; निदेशक, केंद्रीय फसल कटाई उपरांत की अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी संस्थान, लुधियाना या निदेशक, भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान, कानपुर से संपर्क कर सकते हैं.

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उम्दा किस्मों के बीज

बहुत से किसान दलहन की अच्छी किस्मों के प्रमाणित बीज लेने के लिए इधरउधर धक्के खाते रहते हैं, लेकिन उन्हें आसानी से अच्छे बीज नहीं मिलते. लिहाजा बीज लेने के इच्छुक किसान नेशनल सीड कारपोरेशन (एनएससी), उत्तर प्रदेश बीज विकास निगम, नजदीकी कृषि विश्वविद्यालय, कृषि विज्ञान केंद्र, राज्य सरकार के सीड स्टोर, सहकारी बीज भंडार या भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान से संपर्क कर सकते हैं.

दलहन के बारे में ज्यादा जानकारी व सलाह के लिए इच्छुक किसान अपने जिले के कृषि विभाग, नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र या इस पते पर संपर्क कर सकते हैं:

निदेशक, भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान, कानपुर  208024 (उत्तर प्रदेश).

फोन : 0512-2570264

दलहन की उम्दा किस्में

भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान, कानपुर के माहिरों ने दलहनी फसलों की कई ऐसी उम्दा किस्में निकाली हैं, जो ज्यादा पैदावार देती हैं और उन में कीड़े व बीमारी लगने का खतरा भी नहीं रहता. इन में चने की आईपीसी 2005-62, 2004-1, 2004-98, 97-67, उज्जवल, शुभ्रा, डीसीपी 92-3 और मसूर की प्रिया, नूरी, शेरी, अंगूरी व आईपीएल 316, 526 और मूंग की मोती, सम्राट, मेहा व आईपीएम 0-3 और उड़द की बसंत बहार, उत्तरा, आईपीयू 2-43 व 07-3 और मटर की प्रकाश, विकास, आर्दश, अमन, आईपीएफ 4-9 व आईपीएफडी 6-3, 10-12 और अरहर की आईपीए 203, पूसा 992 व आईसीपीएल 88039 खास किस्में हैं.

दलहन, तिलहन व फलफूल ( Pulses, Oilseeds and Fruit Crops) के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता जरूरी 

उदयपुर :  कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी ने कहा कि खाद्यान्न में तो हम संपन्न हैं, लेकिन दलहन, तिलहन और फलफूल उत्पादन के क्षेत्र में अभी बहुतकुछ करने की जरूरत है. दलहन, तिलहन में हम आत्मनिर्भर ही नहीं, बल्कि निर्यातक बन सकें, इस के लिए भरसक प्रयास करने होंगे.

राज्य मंत्री भागीरथ चौधरी चौधरी पिछले दिनों राजस्थान कृषि महाविद्यालय के नूतन सभागार में आयोजित पूर्व छात्र परिषद के 23वें राष्ट्रीय सम्मेलन को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे. उन्होंने कहा कि जब तक किसान के घर में समृद्धि नहीं होगी, देश में खुशहाली नहीं आ सकती.

उन्होंने आगे कहा कि दलहन व तिलहन उत्पादन में कृषि विज्ञान केंद्र महती भूमिका निभा सकते हैं. उन्होंने आश्वस्त किया कि कृषि विश्वविद्यालय संज्ञान में लाए, तो दलहन व तिलहन, फल एवं फूल उत्पादन में बेहतरी के लिए भारत सरकार हर संभव मदद को तैयार है.

मंत्री भागीरथ चौधरी ने कहा कि वैश्विक महामारी कोरोना के दौरान देश की 145 करोड़ की आबादी को हमारे अन्नदाता किसान ने अविस्मरणीय संबल दिया. यही कारण रहा कि आज देश के 80 करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज मिल रहा है. किसानों की आय बढ़ाने के प्रधानमंत्री के सपने को मूर्त रूप देने के लिए देशभर के कृषि विज्ञान केंद्र किसानों के लिए जनजागृति का काम करे.

उन्होंने कहा कि खासकर उदयपुर संभाग जनजाति बहुल इलाका है, ऐसे में यहां के विधार्थियों को कृषि शिक्षा ले कर किसानों की आय बढ़ाने में मददगार बनना चाहिए. उन्होंने कहा कि आज धरती को बचाने की आवश्यकता है. डीएपी यूरिया के अनियंत्रित प्रयोग और अंधाधुंध रसायनों के प्रयोग से धरती की सेहत काफी बिगड़ चुकी है. इस पर चिंतन के साथसाथ जनजागरण की जरूरत है. धरती स्वस्थ रहेगी, तो मनुष्य भी स्वस्थ रहेगा. पानी को भी बचाना होगा. उन्नत बीज उत्पादन के साथसाथ कम पानी से पैदावारी कृषि वैज्ञानिकों का मूल मंत्र होना चाहिए. पहले बाजरा फसल 120 दिन में तैयार होती थी, लेकिन वैज्ञानिकों ने उन्नत बीज तैयार किए तो अब 70 दिन में फसल पक रही है.

Pulses Oilseeds and Fruit Crops

समारोह के विशिष्ट अतिथि सांसद मन्नालाल रावत ने देशभर से आए राजस्थान कृषि महाविद्यालय के पूर्व छात्रों को अनुभव का खजाना बताते हुए कहा कि वे कृषि से जुड़े सभी सैक्टर में अपने अनुभव साझा करें, ताकि 2047 में विकसित भारत के सपने को साकार रूप दिया जा सके.

कार्यक्रम के अति विशिष्ट अतिथि देवनारायण बोर्ड के चेयरमैन ओम बढाना व जिलाध्यक्ष भगवती प्रसाद सारस्वत ने भी विचार रखे.  उन्होंने कहा कि खेती में लागत बढ़ने से किसान विचलित है.

किसानों की आय दोगुना के लिए 6 सूत्र

पटना : केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण व ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने पटना में कृषि भवन में किसानों के साथ परिचर्चा की. उन्होंने कहा कि कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है. प्रधानमंत्री मोदी ने भी लालकिले से कहा है कि वो तीन गुना तेजी से काम करेंगे. वे बिहार की सरकार, मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और कृषि विभाग को बधाई देना चाहते हैं. वे लगातार किसान के कल्याण के काम में लगे हुए हैं. उन्होंने स्टाल देखे, मखाना, चावल, शहद, मक्का, चाय सबकुछ अद्भुत है. बड़ी जमीन के टुकड़े हमारे पास नहीं हैं, 91 फीसदी सीमांत किसान हैं. लेकिन फिर भी किसान अद्भुत काम कर रहे हैं.

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि हमारे किसानों के लिए 6 सूत्र हैं, जिन पर हम काम कर रहे हैं. उत्पादन बढ़ाना, इस के लिए जरूरी है अच्छे बीज. उत्पादन अच्छा है, लेकिन और भी अधिक संभावना है. फल, सब्जी, अनाज, दलहन, तिलहन के अच्छे बीज जरूरी हैं. 65 फसलों की 109 प्रजातियों के बीज प्रधानमंत्री मोदी ने किसानों को समर्पित किए हैं. ऐसी धान की किस्म है, जिस में 30 फीसदी कम पानी लगता है. बाजरे की एक किस्म है, जिस की फसल 70 दिन में आ जाती है. ऐसे बीज हैं, जो जलवायु के अनुकूल हैं. बढ़ते तापमान में भी अच्छा उत्पादन देते हैं. वे भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) में बात करेंगे, जिस से यहां किसानों को बीज की उपलब्धता हो जाए.

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उन्होंने आगे कहा कि उत्पादन की लागत घटाना हमारा दूसरा संकल्प है. प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि से किसानों को बहुत मदद मिलती है. किसान क्रेडिट कार्ड (केसीसी) से खाद के लिए सस्ता लोन मिल जाता है. तीसरी चीज है उत्पादन के ठीक दाम मिल जाएं. यहां का मखाना धूम मचा रहा है. मखाना एक्सपोर्ट क्वालिटी का पैदा हो रहा है. चीजें एक्सपोर्ट होती हैं, तो किसान को ज्यादा फायदा होता है. इस से जुड़ा कार्यालय बिहार में आए, इस के लिए वे प्रयास करेंगे.

उन्होंने आगे यह भी कहा कि कृषि का विविधीकरण सरकार के रोडमैप में है. परंपरागत फसलों के साथ ही ज्यादा पैसे देने वाली फसलों को बढ़ावा देने में हम कोई कसर नहीं छोड़ेंगे. वे फूड प्रोसैसिंग की बात भी करना चाहेंगे. बिहार का टैलेंट दुनिया में अद्भुत है. इस टैलेंट का ठीक उपयोग बिहार को भारत का सिरमौर नहीं बनाएगा, भारत को दुनिया का सिरमौर बना देगा. इसे खेती में और कैसे लगा सकते हैं, नए आइडियाज के साथ. कैमिकल फर्टिलाइजर का उपयोग आखिर हम कब तक करेंगे. इस से उर्वरक क्षमता भी कम होती है और जो उत्पादन होता है, उन का शरीर पर भी दुष्प्रभाव पड़ता है. आजकल केंचुए गायब हो गए हैं. खाद डाल कर उन का समापन ही कर दिया. केंचुआ 50-60 फीट जमीन के नीचे जाता है, ऊपर आता है, इस से जमीन उर्वरक रहती है.

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में प्राकृतिक खेती का मिशन शुरू हो रहा है. इस से उत्पादन घटेगा नहीं, बढ़ेगा. उन्होंने कहा कि अगली बार खेतों में ही कार्यक्रम करेंगे, प्रैक्टिकल दिक्कत भी देखेंगे. किसान के बिना दुनिया नहीं चल सकती है. बाकी चीजें तो फैक्टरी में बन जाएंगी, लेकिन गेहूंचावल कहां से लाओगे? हम सब मिल कर काम करेंगे.

अरहर की उन्नत की खेती

खरीफ मौसम की फसल अरहर देश की खास उपयोगी दलहन फसल अरहर है. यह अलगअलग भौगोलिक हालात में भी उगाई जा सकती है.

जलवायु : अरहर उन दलहन फसलों में से एक है जो अलगअलग जलवायु और हालात में भी अच्छी पैदावार देती है, लेकिन ज्यादा और अच्छी पैदावार के लिए लगभग इसे 30 से 35 डिगरी सैल्सियस तापमान की जरूरत पड़ती है और इस के लिए 60 से 75 सैंटीमीटर सालाना बारिश जरूरी है.

जमीन : अरहर की पैदावार के लिए दोमट मिट्टी अच्छी मानी गई है. जलनिकासी व नमकरहित जमीन भी अच्छी मानी जाती है.

फसल चक्र : अरहर की खेती मिश्रित फसल प्रणाली में की जाती है. उन में से कुछ खास इस प्रकार हैं :

अरहरगेहूं, अरहरमक्काचरी, अरहरगेहूंमूंग.

अंतरफसल चक्र में भी अरहर की खेती की जा सकती है. जैसे, अरहरसोयाबीन, अरहरज्वार, अरहरबाजरा.

बोआई का समय : अरहर की बोआई देश के भौगोलिक हालात पर निर्भर करती है. इस की बोआई उत्तरपश्चिमी क्षेत्र जैसे दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के कुछ इलाकों में जून के दूसरे हफ्ते में खेत में पलेवा कर, खेत की अच्छी तरह जुताई कर बोआई करें.

मानसून की पहली बारिश के बाद सही नमी में बोआई की जा सकती है. अरहर और मूंग की अंतरफसल की बोआई का सही समय अप्रैल का दूसरा हफ्ता है.

बीजों का उपचार : बोआई से पहले अरहर के बीज को राइजोबियम जीवाणु का टीका गुड़ के घोल में मिला कर अरहर के बीज में अच्छी तरह से मिलाना चाहिए. उसी घोल में कोई फफूंदीनाशक दवा जैसे बाविस्टिन 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से मिलाना चाहिए.

बोआई की विधि : इसे जून में बोते समय लाइन से लाइन की दूरी 50-60 सैंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 15-20 सैंटीमीटर रखनी चाहिए. मूंग या उड़द के अंतरफसली में अरहर की पंक्ति की दूरी 1 मीटर और 2 लाइनों के बीच में मूंग या उड़द की 2 या 3 लाइनें बोनी चाहिए.

बीज की मात्रा : 1 हेक्टेयर की बोआई के लिए 90 से 95 फीसदी अंकुरण कूवत वाला स्वस्थ प्रमाणित बीज 15-20 किलोग्राम सही रहता है. यदि इसे मूंग या उड़द के साथ बोते हैं तो इस की आधी मात्रा ही बोआई के लिए ठीक रहती है.

अच्छी किस्में : यूपीएएस 120, मानक, प्रभात पूसा अगेती, पूसा 33, आईसीपीएच 151, पूसा 855, पीवीएम 4, एएल 15, टा 21, पंत ए 1 व 2 उन्नत किस्में खास हैं.

खाद की मात्रा : अरहर की अच्छी पैदावार के लिए 20 किलोग्राम नाइट्रोजन और 50 किलोग्राम फास्फोरस प्रति हेक्टेयर की दर से दें. 100 किलोग्राम डीएपी प्रति हेक्टेयर की दर से हल के साथ पोश बांध कर बीज के नीचे देनी चाहिए.

यदि डीएपी न हो तो तकरीबन 40 किलोग्राम यूरिया और 300 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट बोआई के समय देना चाहिए.

निराईगुड़ाई : बोआई के 25-30 दिन बाद खुरपी या कसौले से निराई करें और जरूरत पड़ने पर खरपतवारनाशक दवा का छिड़काव करें. इस के लिए एलाक्लोर (लासो) 4 लिटर दवा 500-600 लिटर पानी में घोल बना कर बोआई के बाद और अंकुरण से पहले प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.

इस के अलावा बीज की बोआई से पहले खरपतवारनाशक दवा बसालिन छिड़कने से भी खरपतवार की रोकथाम की जा सकती है.

सिंचाई : यदि काफी समय तक बारिश नहीं होती है तो सिंचाई करनी चाहिए.

ध्यान रहे कि अरहर की फसल में फूल आने के बाद सिंचाई नहीं करनी चाहिए, लेकिन फलियों में दाना बनते समय सिंचाई करना लाभदायक रहता है.

कीटों की रोकथाम : अरहर में फूल आते समय ब्लास्टर बीटल या मारुका टेसटुलेसिस नामक कीट का असर दिखाई देता है तो कीटनाशक दवा इंडोसल्फान 35 ईसी की 2 मिलीलिटर मात्रा को प्रति लिटर पानी में घोल बना कर या मोनोक्रोटोफास का घोल बना कर छिड़काव करें.

फली बनते समय फलीछेदक नामक कीट का ध्यान रखना चाहिए. यदि कीट का असर दिखता है तो पहला छिड़काव मोनोक्रोटोफास का 1 मिलीलिटर दवा को प्रति लिटर पानी में घोल कर जरूरत के मुताबिक छिड़काव करें.

दूसरा छिड़काव फेनवेनटेट 20 ईसी या साइपरमेथरिन 25 ईसी का 2 मिलीलिटर पानी में पहले छिड़काव के 15 दिन बाद दूसरा छिड़काव करें. यदि जरूरत पड़े तो तीसरा छिड़काव साइपरमेथरिन और मोनोक्रोटोफास का छिड़काव करें. इस में दोनों दवाओं की पूरी मात्रा डालें.

उपज : अच्छी विधियां अपना कर 20-25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक की उपज हासिल की जा सके.

55 दिनों में तैयार होगी जनकल्याणी मूंग 55

 

वाराणसी के प्रगतिशील किसान प्रकाश सिंह रघुवंशी ने बताया कि उन की ‘कुदरत कृषि शोध संस्था’ द्वारा मूंग की नई प्रजाति ‘जनकल्याणी मूंग’ विकसित की गई है. यह फसल मात्र 55 दिनों में पक कर तैयार हो जाएगी.

इस मूंग की फलियां लंबी और गहरे हरे रंग की हैं, जो गुच्छे के आकार में लगती हैं. एक फली में 10-12 दाने होते हैं. दाने मोटे और वजनदार हैं. इस मूंग से 7-8 क्विंटल प्रति एकड़ पैदावार मिलती है.

यह एक देशी प्रजाति है. इस का बीज बारबार बोआई के काम लिया जा सकता है. इस प्रजाति को 25 फरवरी से अप्रैल के अंतिम सप्ताह तक बो सकते हैं. बोआई में एक एकड़ के लिए तकरीबन 6-8 किलोग्राम तक बीज की जरूरत होगी.

Moongयह प्रजाति मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, बिहार जैसे अनेक राज्यों के लिए अनुकूल है.

किसान प्रकाश सिंह रघुवंशी को कृषि में नवाचारों के लिए अनेक बार पुरस्कृत भी किया जा चुका है. वह राष्ट्रपति से सम्मानित भी हो चुके हैं. वे गेहं, चना, मूंग, अरहर व सब्जियों आदि की सैकड़ों प्रजातियां तैयार कर चुके हैं.

अधिक जानकारी के लिए प्रगतिशील किसान प्रकाश सिंह रघुवंशी के मोबाइल नंबर : 9580246411 और 9839253974 पर संपर्क कर सकते हैं.

भारत और सस्केचेवान के बीच कृषि व्यापार संबंध मजबूत होंगे

नई दिल्ली: कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री शोभा करंदलाजे और कनाडा के सस्केचेवान प्रांत के प्रधानमंत्री स्कौट मो के बीच कृषि भवन, नई दिल्ली में बैठक संपन्न हुई.

इस बैठक का एजेंडा दालों, पोटाश, कृषि प्रौद्योगिकियों और अनुसंधान साझेदारी के सुसंगत और विश्वसनीय आपूर्तिकर्ता के रूप में भारत के साथ सस्केचेवान के बीच जारी व्यापार संबंधों के बारे में चर्चा करना था.

राज्य मंत्री शोभा करंदलाजे ने भारत की ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा के लिए भारत और सस्केचेवान के बीच व्यापार संबंधों के महत्व पर जोर दिया. उन्होंने इस बात का उल्लेख किया कि सस्केचेवान यूरेनियम, पोटाश, दालों, मटर, चना और अर्धरासायनिक लकड़ी के गूदे के उत्पादों और वस्तुओं का एक विश्वसनीय आपूर्तिकर्ता है और भारत में दालों के आयात के सब से बड़े स्रोतों में से एक है.

उन्होंने जैव प्रौद्योगिकी, कृषि तकनीक और अपशिष्ट जल उपचार के क्षेत्र में सहयोग की संभावनाओं का पता लगाने पर जोर दिया. भारत और सस्केचेवान के बीच नियमित तकनीकी समूह की बैठकों के माध्यम से टिकाऊ कृषि के क्षेत्र में जानकारी के आदानप्रदान, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण को मजबूत बनाने का प्रस्ताव रखा.

Agricultural Trade Relations

सस्केचेवान के प्रधानमंत्री स्कौट मो ने इस बात का उल्लेख किया कि भारतसस्केचेवान संबंध मजबूत हुए हैं और सस्केचेवान भागीदार देशों को ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा हासिल करने में मदद कर रहा है.

उन्होंने वैश्विक खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कृषि खाद्य उत्पादन प्रणाली को आगे बढ़ाने, टिकाऊ कृषि, खाद्य उत्पादों, नवाचार को साझा करने और प्राकृतिक संसाधनों को विकसित करने के महत्व को भी रेखांकित किया.

इस के अलावा उन्होंने टिकाऊ कृषि, कैनोला और गेहूं जैसी फसलों के कार्बन फुटप्रिंट के बारे में तुलनात्मक विश्लेषण और बेंचमार्क अध्ययन के लिए ग्लोबल इंस्टीट्यूट फौर फूड सिक्योरिटी (जीआईएफएस) के महत्व पर जोर दिया और भारत के साथ प्रौद्योगिकियों और सर्वोत्तम टिकाऊ उत्पादन प्रथाओं को साझा करने की इच्छा जताई.

प्रधानमंत्री स्कौट मो ने तकनीकी समूह की बैठकों के माध्यम से भारत और सस्केचेवान के बीच सहयोग के क्षेत्रों, जानकारी के आदानप्रदान और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के बारे में चर्चा करने और संभावनाओं का पता लगाने पर सहमति प्रकट की. दोनों पक्षों ने आपसी संबंधों को मजबूत बनाने के लिए चर्चा में निरंतरता और नियमित संवाद का समर्थन किया.

पूसा अरहर 16 : बौनी और जल्दी पकने वाली किस्म

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली के साथ मिल कर अरहर की अर्द्धबौनी और जल्दी पकने वाली पूसा अरहर 16 किस्म विकसित की है. बहुफसलीय प्रणाली में अतिरिक्त फसल जैसे सरसों, गेहूं, आलू के लिए भी यह मुफीद किस्म है.

जून के पहले हफ्ते में यह किस्म बोने पर इस के पौधे की लंबाई 120-125 सैंटीमीटर और जुलाई के पहले हफ्ते में बोने पर इस के पौधे की लंबाई 95-100 सैंटीमीटर होती है. इस किस्म के पकने की औसत अवधि 115-120 दिन है.

यह किस्म पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए अच्छी है. औसत उपज तकरीबन 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. दानों में प्रोटीन की मात्रा 23.5 फीसदी और रंग भूरा होता है.

जमीन का चुनाव : इस किस्म के लिए बलुई दोमट मिट्टी मुफीद होती है. सही जल निकास और हलके ढलान वाले खेत अरहर के लिए सर्वोत्तम होते हैं क्योंकि खेत में पानी जमा होने पर अरहर फसल खराब हो जाती है. लवणीय और क्षारीय जमीन में इस की खेती से अच्छे नतीजे नहीं मिलते.

बोआई का सही समय : यह जल्दी पकने वाली प्रजाति है. इस की बोआई जून के पहले पखवाड़े या जुलाई के पहले पखवाड़े में करनी चाहिए.

बोआई लाइन में करें. इस के लिए सीड ड्रिल या हल के पीछे चोंगा बांध कर लाइन में बोआई कर सकते हैं.

खेत की तैयारी : एक गहरी जुताई के बाद 2-3 जुताई हल या हैरो से करना सही रहता है. हर जुताई के बाद सिंचाई और जल निकास की सही व्यवस्था के लिए पाटा देना जरूरी है.

बीज की मात्रा और बीजोपचार : इस किस्म की बोआई के लिए 10-12 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ लगता है. बीजोपचार के बाद ही बीज बोएं. ट्रायकोडर्मा विरिडी 10 ग्राम प्रति किलोग्राम या 2 ग्राम थाइरम प्रति एक ग्राम बेबीस्टोन (2:1) में मिला कर 3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचार करने से फफूंद नष्ट हो जाती है.

बीजोपचार कर लेने के बाद अरहर का राइजोबियम कल्चर 5 ग्राम और पीएसबी कल्चर 5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से करें. कल्चर से उपचार करने के बाद बीज को छाया में सुखा कर उसी दिन बोनी करें.

उर्वरक का प्रयोग : बोआई के समय 8 किलोग्राम नाइट्रोजन, 20 किलोग्राम फास्फोरस, 8 किलोग्राम पोटाश और 20 किलोग्राम गंधक प्रति एकड़ कतारों में बीजों के नीचे दिया जाना चाहिए. 3 साल में एक बार 10 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति एकड़ आखिरी बखरीनी पूर्व भुरकाव करने से पैदावार में अच्छी बढ़ोतरी होती है.

सिंचाई : जहां सिंचाई की सुविधा हो, वहां एक सिंचाई फूल आने पर व दूसरी सिंचाई फलियां बनने पर जरूर करनी चाहिए. इस से पैदावार अच्छी होती है.

खरपतवार नियंत्रण : खरपतवार पर नियंत्रण पाने के लिए 20-25 दिन में पहली निराई और फूल आने से पहले दूसरी निराई करें. 2-3 बार खेत में कोल्पा यंत्र से भी यह काम कर सकते हैं. इस से मिट्टी में हवा का आवागमन बना रहता है. पैंडीमिथेलिन 500 ग्राम सक्रिय तत्त्व प्रति एकड़ बोनी के बाद इस्तेमाल करने से खरपतवारों की रोकथाम होती है. खरपतवारनाशक का प्रयोग करने के बाद एक निराई तकरीबन 30-40 दिन की अवस्था पर करनी चाहिए.

खास रोग उकटा रोग : अरहर पर इस रोग का असर ज्यादा होता है. रोग के लक्षण आमतौर पर फसल में फूल लगने की अवस्था में दिखाई देते हैं. नवंबर से जनवरी माह के बीच यह रोग देखा जा सकता है.

इस रोग में पौधा पीला हो कर सूख जाता है. इस की जड़ें सड़ कर गहरे रंग की हो जाती हैं और छाल हटाने पर जड़ से ले कर तने की ऊंचाई तक काले रंग की धारियां पाई जाती हैं इसलिए बीजोपचार किया गया बीज ही बोएं.

गरमी में खेत की गहरी जुताई करें व अरहर के साथ ज्वार की अंतरवर्तीय फसल लेने से इस रोग का हमला कम होता है.

बांझपन विषाणु रोग : यह रोग विषाणु से फैलता है. इस रोग के लक्षण पौधे की ऊपरी शाखाओं में पत्तियां छोटी, हलके रंग की और अधिक लगती हैं और फूलफली नहीं लगती हैं. ग्रसित पौधों में पत्तियां ज्यादा लगती हैं.

यह रोग मकड़ी द्वारा फैलता है. खेत में उग आए बेमौसम अरहर के पौधों को उखाड़ कर जला दें. मकड़ी का नियंत्रण करना चाहिए.

फाइटोप्थोरा झुलसा रोग: इस रोग से ग्रसित पौधा पीला पड़ कर सूख जाता है. इस की रोकथाम करने के लिए 3 ग्राम मैटालैक्सिल फफूंदीनाशक दवा प्रति किलोग्राम बीज के हिसाब से उपचारित करें. बोआई पाल (रिज) पर करनी चाहिए और मूंग की फसल साथ में लगाएं.

खास कीट

फली मक्खी : फली पर यह मक्खी छोटा सा गोल छेद बनाती है. इल्ली अपना जीवनकाल फली के भीतर दानों को खा कर पूरा करती है और बाद में प्रौढ़ बन कर बाहर आती है. दानों का सामान्य विकास रुक जाता है.

मादा छोटे व काले रंग की होती है जो बढ़ती हुई फलियों में अंडे देती है. अंडों से बारीक कीट बनते हैं जो फली के दानों को खाने लगते हैं. इस से दानों की बढ़वार रुक जाती है और आकार छोटा रह जाता है. यह 3 हफ्ते में अपना एक जीवनचक्र पूरा करती है.

फली छेदक इल्ली : छोटी इल्लियां फलियों के हरे ऊतकों को खाती हैं व बड़े होने पर कलियों, फूलों, फलियों व बीजों पर नुकसान करती हैं. इल्लियां फलियों पर टेढ़ेमेढ़े छेद बनाती  हैं. इस कीट की मादा छोटे सफेद रंग के अंडे देती है. इल्लियां पीली, हरी, काली रंग की होती हैं और इन के शरीर पर हलकी गहरी पट्टियां होती हैं. अनुकूल परिस्थितियों में 4 हफ्ते में एक जीवनचक्र पूरा करती है.

कुछ मादा कीट फलियों पर गुच्छों में अंडे देती है. अंडे कथई रंग के होते हैं. इस कीट के जहर बच्चे और बड़े दोनों ही फली और दानों का रस चूसते हैं, जिस से फली आड़ीतिरछी हो जाती है और दाने सिकुड़ जाते हैं.

प्लू माथ: इस कीट की इल्ली फली पर छोटा सा गोल छेद बनाती है. उन दानों के पास ही इस का मल देखा जा सकता है. कुछ समय बाद प्रकोपित दाने के आसपास लाल रंग की फफूंद आ जाती है. मादा गहरे रंग के अंडे एकएक कर के कलियों व फली पर देती है. इस की इल्लियां हरी और छोटेछोटे कांटों से घिरी रहती हैं. इल्लियां फलियों पर ही शंखी में बदल जाती हैं. एक जीवनचक्र तकरीबन 4 हफ्ते में पूरा करती है.

ब्रिस्टल बीटल : ये भृंग कलियों, फूलों और कोमल फलियों को खाती है जिस से उत्पादन में काफी कमी आती है. यह कीट अरहर, मूंग, उड़द और अन्य दलहनी फसलों पर भी नुकसान पहुंचाता है. भृंग को पकड़ कर खत्म कर देने से प्रभावी नियंत्रण हो जाता है.

कीट प्रबंधन : कीटों के प्रभावी नियंत्रण के लिए समन्वित प्रणाली अपनाना जरूरी है. इस के लिए गरमी में खेत की गहरी जुताई करें. शुद्ध अरहर न बोएं. फसलचक्र अपनाएं. क्षेत्र में एक ही समय पर बोनी करनी चाहिए. जरूरत के हिसाब से ही रासायनिक खाद इस्तेमाल करें. अरहर में अंतरवर्तीय फसलें जैसे ज्वार, मक्का या मूंगफली को लेना चाहिए.

यांत्रिकी विधि द्वारा रोकथाम : खेत में तय दूरी पर प्रकाश प्रपंच लगाने चाहिए. फैरोमौन ट्रैप लगाएं. इस के अलावा जरूरत पड़े तो कीटनाशक का उचित मात्रा में इस्तेमाल करें.

कटाई व मड़ाई: 80 फीसदी फलियों के पक जाने पर फसल की कटाई कर लेनी चाहिए. बाद में फसल को सूखने के लिए बंडल बना कर एक जगह रखें, फिर 4-5 दिन सुखाने के बाद पुलमैन थ्रेशर या लकड़ी के लट्ठे से पिटाई कर दानों को भूसे से अलग कर लेते हैं.