Vegetable Nursery : सब्जियों की पौध कैसे तैयार करें

Vegetable Nursery : सब्जी की खेती न सिर्फ सेहत के लिहाज से लाभकारी है, बल्कि कारोबारी नजरिए से भी काफी फायदेमंद है. आज पूरे भारत में तकरीबन 65 प्रकार की सब्जियों का कुल 71 लाख हेक्टेयर भूमि से तकरीबन 109 मिलियन टन उत्पादन होता है. इन सभी सब्जियों में कुछ की तो सीधे बोआई की जाती है, जैसे मटर, बींस, गाजर, मूली वगैरह. लेकिन कई खास सब्जियों, जैसे टमाटर, मिर्च, बैगन, फूलगोभी, पत्तागोभी, गांठगोभी, ब्रोकली, प्याज वगैरह की खेती के लिए पौध (Vegetable Nursery) तैयार करनी होती है. कभीकभी खीरा वर्गीय सब्जियों की भी पौध (Vegetable Nursery) तैयार कर के खेतों में रोपाई की जाती है. ऐसी फसलों की सफल खेती के लिए स्वस्थ पौध तैयार करना बहुत जरूरी है.

स्वस्थ पौध रोपण के कई चरण होते हैं. इस बारे में कृषि वैज्ञानिक डा. जीतेंद्र कुमार रंजन ने विस्तार से जानकारी दी :

जगह का चुनाव : पौध रोपण की शुरुआत हमेशा जगह के चुनाव से होती है, जिसे पौधशाला कहा जाता है. सब्जियों की पौधशाला (Vegetable Nursery) एक ऐसी जगह है, जहां पर सब्जियों की पौध (Vegetable Nursery) तैयार की जाती है और रोपण के समय तक पौध की देखरेख की जाती है. इस के लिए जगह का चुनाव करते समय कुछ बातों को ध्यान में रखें, जैसे पौधशाला के लिए जमीन हमेशा ऊंचे स्थान पर चुनें, जहां पानी का सही निकास हो सके. पौध तैयार करने के लिए बलुई मिट्टी या दोमट मिट्टी का चुनाव करें. मिट्टी का पीएच मान 6.5 के करीब होना चाहिए. सिंचाई के लिए पानी का इंतजाम पास में होना चाहिए. पौधशाला कभी भी छायादार पेड़ के पास न बनाएं. पौधशाला खेत के किनारे पर बनानी चाहिए, जिस से खेत के अन्य कामों में बाधा न हो.

क्यारी के लिए जमीन की तैयारी  : क्यारी के लिए मिट्टी को हल से जुताई कर के भुरभुरी बना लें. मिट्टी से पुरानी जड़ों के टुकड़ों व घास वगैरह को बाहर निकालें. इस के बाद मिट्टी में सड़ी हुई गोबर की खाद 4 से 5 किलोग्राम प्रति वर्गमीटर की दर से मिला दें. क्यारियों को अंतिम रूप देते समय मिट्टी को एकसार कर के हलके हाथों से दबा दें.

क्यारियां जमीन की सतह से कम से कम 20 से 25 सेंटीमीटर ऊपर होनी चाहिए. यह ऊंचाई मिट्टी की स्थिति, बारिश और पानी की निकासी पर निर्भर करती है. क्यारियों की लंबाई जरूरत और जगह के हिसाब से रखी जा सकती है, लेकिन चौड़ाई 50 सेंटीमीटर ही रखें, इस से निराईगुड़ाई करने में आसानी होती है. पानी की सही तरीके से निकासी के लिए चारों ओर नाली की चौड़ाई 25-30 सेंटीमीटर और गहराई 8 से 10 सेंटीमीटर रख कर इसे मुख्य जल निकासी की नाली से मिला दें.

बीजों की बोआई और पौधों का रखरखाव : अच्छे बीजों पर ही फसल की गुणवत्ता व बढ़ोतरी निर्भर करती है. बोआई से पहले सही किस्म के बीजों का चुनाव बेहद जरूरी है. इस के लिए बैगन में पूसा हाईब्रिड-5,6 और 9 व पंत संकर-1, टमाटर में अविनाश 2, रूपाली, ननहेम्स, शिमला मिर्च में भारत, इंदिरा, पूसा दीपी, पत्तागोभी में गोल्डन एकर, ग्रीन बाय, फूलगोभी में पूसा शुभ्रा, पीएबी 1 वगैरह किस्में खास हैं.

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ध्यान रखने योग्य बातें

* बीज ज्यादा पुराना न हो. बोआई क्यारियों में लाइनें खींच कर करें. लाइन से लाइन की दूरी 5 सेंटीमीटर और गहराई 1 सेंटीमीटर होनी चाहिए.

* बोआई के बाद क्यारियों को सूखी घास से ढक दें, जिस से मिट्टी में पर्याप्त नमी बनी रहे और जल्दी अंकुरण हो.

* अंकुरण शुरू होते ही घास को तुरंत हटाना न भूलें.

* क्यारियों के लिए सिंचाई का  अच्छा इंतजाम होना चाहिए. शुरुआत में फुहारे की सहायता से पौधों की सिंचाई करें.

* अंकुरित पौधों को गरमी में तेज धूप से, जाड़े में पाले व ज्यादा ठंड से और बरसात में तेज पानी से बचाने के लिए पालीथीन की चादर से ढक दें. पौधों को ज्यादा नमी से बचाने के लिए कम लागत वाला पालीहाउस बनाएं.

बचाव : क्यारियों में से समयसमय पर खरतवार निकालना न भूलें. इस के लिए पहले सावधानी से हलकी निराई करें और फिर हाथ से खरपतवार उखाड़ें.

सब्जियों के पौधों (Vegetable Nursery) में डैपिंग आफ जिसे पौधे का गलन या कमर तोड़ भी कहते हैं, नाम की बीमारी लग जाती है. यह मिट्टी में पनपे कवक के कारण होती है.

इस से बचाव के लिए 25 मिलीलीटर फारमल्डीहाइड का 1 लीटर पानी में घोल बना कर मिट्टी को उपचारित करें. इस के बाद खेत को 1 हफ्ते के लिए पौलीथीन से ढक दें. यह उपचार बीज बोने से करीब 15 दिनों पहले करें.

बीजों को सेरेसन या कैप्टाफ से 1 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें. छोटे पौधों को दीमक व पौध काटने वाले कीट भी नुकसान पहुंचाते हैं. इन की रोकथाम के लिए फ्यूराडान 10जी दवा क्यारियां बनाते समय मिट्टी में मिला दें. मैलाथियान या इंडो सल्फान दवा की 2 मिलीलीटर मात्रा प्रति लीटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करें.

पौधों की कम बढ़त होने पर 1 लीटर पानी में 5 ग्राम यूरिया का घोल बना कर छिड़काव करें. ध्यान रहे कि यूरिया ज्यादा न हो, वरना इस से पौधों के झुलसने का डर रहता है.

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ज्यादा पैदावार के लिए

कुछ सब्जियों में दवाओं व रसायनों का इस्तेमाल कर के उपज को बढ़ाया जा सकता है. खीरा वर्गीय सब्जियों के फूलों में कई प्रकार के लिंग मिलते हैं. वैसे ज्यादातर फसलों में मोनोशियस प्रकार के लिंग पाए जाते हैं, जिन में एक पौधे पर ही नर व मादा फूल खिलते हैं.

लौकी, करेला, तुरई, खीरा, चप्पन कद्दू, टिंडा, चचींडा वगैरह में मोनोशियस प्रकार के फूल मिलते हैं. इन सभी में अगर फूलों की संख्या बढ़ाई जा सके, तो फलों की पैदावार में इजाफा हो जाता है. इस के लिए जिब्रेलिक अम्ल इथरल, मौलिक हाईडाजाइड और कई रसायन, जैसे बोलोन, कैल्शियम वगैरह के घोल का छिड़काव कर के मादा फूलों की संख्या

बढ़ाई जा सकती है. यह छिड़काव पौधशाला (Vegetable Nursery) में ही तब किया जाता है, जब पौध में 2-4 पत्तियां ही हों. लेकिन यह काम कृषि विशेषज्ञों की सलाह से ही करना चाहिए.

पौध रोपण

पौध तैयार होने के बाद बारी आती है, पौध रोपण की. इस के लिए इस का कठोरीकरण करना जरूरी है. इस के लिए रोपाई से 2 से 3 दिनों पहले क्यारियों में सिंचाई रोक कर सिरकी या पालीथीन को हटा देते हैं.

पौध रोपण से पहले गोबर की खाद को खेत में अच्छी तरह से मिला दें. तैयार पौध को बहुत लंबे समय तक पौधशाला या क्यारियों में न रखें, वरना पौध ज्यादा बढ़वार के कारण रोपण करने पर कम उपज देती है.

हमेशा पौधों का रोपण शाम के समय करें. पौध रोपण के तुरंत बार हलकी सिंचाई जरूर करें. शुरू में पौधों की रोजना सिंचाई करें. बाद में जरूरत के मुताबिक सिंचाई करें.

बिना मिट्टी के कैसे करें सब्जियों की पौध तैयार

बारिश के मौसम में सब्जियों की पौधशाला तैयार की जाती है. सब्जियों के बीज ज्यादा महंगे व बारीक होने के कारण उन को खास देखभाल में उगाना जरूरी होता है. लिहाजा इस के लिए सब्जियों को पौधशाला में उगाना जरूरी है. पौधशाला में कैसे पौधों को कीड़ों व बीमारियों से दूर  रखा जाए, क्योंकि मिट्टी में बहुत से छोटे जीव पाए जाते हैं. उन में से कुछ जीव पौध के लिए नुकसानदायक भी होते हैं. इसलिए हमें पौधों को ऐसे तरीके से उगाना चाहिए जिस में मिट्टी की जरूरत न हो, लेकिन यदि कहा जाए कि बिना मिट्टी के भी फलसब्जियां पैदा हो सकती हैं, तो सुन कर थोड़ा अटपटा लगेगा, लेकिन ऐसा हो सकता है.

किसान इस तकनीक से खीरा, टमाटर, पालक, गोभी, शिमला मिर्च व दूसरी सब्जियां उगा सकते हैं.

इस तकनीक के कई फायदे हैं

* पौधों पर मिट्टी से होने वाले रोगों का असर नहीं होगा.

* पूरी तरह से विषाणु रोग रहित पौध उपलब्ध होती है.

* बेमौसमी पौध तैयार की जा सकती है, जिस से किसान की आमदनी बढ़ाई जा सकती है.

* कम रकबे में अधिक पौध तैयार करना मुमकिन है व 1 साल में 5 से 6 बार पौध तैयार की जा सकती है. 1 ट्रे में 90 से 110 तक पौधे तैयार किए जा सकते हैं.

* पौध को ट्रे के साथ दूर स्थानों तक ले जाया जा सकता है.

* ऐसी सब्जियां जिन की पुराने तरीके से पौध तैयार करना मुमकिन नहीं है. जैसे बेल वाली सब्जियों की भी पौध तैयार कर सकते हैं.

* पौध की बढ़वार एक जैसी होती है.

* पौध तैयार कर बेचने का कारोबार किया जा सकता है.

* पौध तैयार करने का समय तय है  करीब 25 से 30 दिन होता है.

* यह तकनीक सामान्य और संकर किस्मों के बीज उत्पादन में बहुत फायदेमंद हो सकती है.

कैसे लें इस तकनीक का फायदा

* इस के लिए हम सब से पहले प्लास्टिक की ट्रे का इस्तेमाल करते हैं, जिस में खाने बने होते हैं. इन खानों की गहराई 10 से 20 सेंटीमीटर तक होती है. इन्हें प्रो-ट्रे के नाम से जानते हैं.

* इन खानों में भरने के लिए बिना मिट्टी वाले कोकोपीट, वर्मीकुलाइट व परलाइट को 3:1:1 के अनुपात में मिलाया जाता है.

* मिलाने के बाद इस को गीला करते हैं. फिर इसे ट्रे के खानों में भरा जाता है.

* बाद में उंगली से हलके गड्ढे बना कर हर गड्ढे में 1-1 बीज बोया जाता है.

* बीज बोने के बाद वर्मीकुलाइट की पतली परत से ढक दिया जाता है ताकि बीजों को अंकुरण के वक्त सही नमी मिलती रहे.

* वर्मीकुलाइट में जल भरने की कूवत ज्यादा होती है, जो नमी को ज्यादा वक्त तक बनाए रखता है, जिस से अंकुरण अच्छा होता है.

* अमूमन सब्जियों के बीजों के अंकुरण के लिए 20 से 25 डिगरी सेंटीग्रेड तापमान सही होता है.

* यदि तापमान अंकुरण के लिए सही है तो ट्रे को बाहर ही रखा जा सकता है. नहीं तो यदि तापमान 10 से 12 डिगरी सेंटीग्रेड से कम है तो बीज बोआई के बाद ट्रे को अंकुरण कक्ष में रखा जाता है.

* अंकुरण के फौरन बाद ग्रीनहाउस में बनी बैंच या जमीन से ऊपर उठा कर बनाई गई क्यारियों के ऊपर ट्रे को रखा जाता है. यदि ग्रीन हाउस नहीं है, तो घर के कमरों में भी रख सकते हैं.

* सही बढ़वार के लिए अंकुरण के 1 हफ्ते बाद सिंचाई के पानी के साथ जरूरी मात्रा में मुख्य पोषक तत्त्वों (नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश) और सभी सूक्ष्म तत्त्वों को भी दिया जाता है. इस के लिए बाजार में मिलने वाले विभिन्न अनुपात (20:20:20 या19:19:19 या 15:15:15) में नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश उर्वरक जिन में सूक्ष्म तत्त्व भी मिले रहते हैं, उन का इस्तेमाल करना चाहिए.

* इस तकनीक से पौधे 25 से 30 दिनों में रोपाई के लायक हो जाते हैं.

* पौधों को तैयार होने पर ट्रे में बने खानों से बाहर निकाला जाता है. इस वक्त माध्यम के गुच्छे के चारों ओर जड़ों का फैलाव सफेद धागों जैसा साफ दिखाई देता है.

* ये पौधे आसानी से खानों से बाहर निकल आते हैं, जिस से इन की जड़ें नहीं टूटती और जमीन में आसानी से लगाए जा सकते हैं.

* सामान्य तापमान होने पर रोपाई का काम सुबह या दोपहर में किसी भी समय किया जा सकता है. लेकिन ज्यादा तापमान होने पर रोपाई का काम शाम को किया जाना चाहिए. इस पौध उत्पादन तकनीक को लघु उद्योग के रूप में अपनाया जा सकता है.

वैज्ञानिक तरीके से करें बेल वाली सब्जियां (Climbing vegetables)

करेला, तुरई, लौकी वगैरह बेल वाली सब्जियों की खेती मैदानी इलाकों में फरवरीमार्च और जूनजुलाई में की जाती है. पौलीहाउस तकनीक से सर्दियों के मौसम में इन सब्जियों की नर्सरी तैयार कर के इन की अगेती खेती की जा सकती है.

इन बेल वाली सब्जियों की पौध नर्सरी में तैयार की जाती है और फिर जड़ों को बिना नुकसान पहुंचाए खेत में रोप दिया जाता है. इस तकनीक में खर्च कम और मुनाफा अच्छा होता है.

परंपरागत खेती की तुलना में बेल वाली सब्जियां कम समय लेती हैं. इस से किसानों को मनमाफिक कीमतें मिलने की उम्मीद बढ़ जाती है और वे इन्हें मंडियों में जल्दी पहुंचा सकते हैं.

जिस सीजन में सब्जियों की कमी आ जाती है, उस दौरान भी किसान इन्हें कोल्ड स्टोरेज से निकाल कर बेच सकते हैं.

बेल वाली सब्जियों पर इन कीड़ों का हमला ज्यादा होता है:

सफेद मक्खी : इस कीट के शिशुओं द्वारा रस चूसने से पत्ते पीले पड़ जाते हैं. इन के मधुबिंदु पर काली फफूंद आने पर पौधों की भोजन बनाने की कूवत कम हो जाती है.

ऐसे करें रोकथाम : इंडोसल्फान 35 ईसी 2 मिलीलिटर प्रति लिटर या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल 1 मिलीलिटर प्रति 3 लिटर या डाइमिथिएट 30 ईसी 2 मिलीलिटर प्रति लिटर का छिड़काव करने से इस कीट हमला रोका जा सकता है.

इस के अलावा नीम बीज का अर्क 5 फीसदी या बीटी 1 ग्राम प्रति लिटर या इंडोसल्फान 35 ईसी 2 मिलीलिटर प्रति लिटर या कार्बारिल 50 डब्ल्यूपी 2 मिलीलिटर प्रति लिटर या स्पिनोसेड 45 एससी 1 मिलीलिटर प्रति लिटर का छिड़काव कर कीट हमलों से बचा जा सकता है.

खाद : बेल वाली सब्जियों में खेत की तैयारी के समय 15 से 20 टन प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद, 80 किलोग्राम नाइट्रोजन, 50 किलोग्राम फास्फोरस और 50 किलोग्राम पोटाश की जरूरत होती है.

बोआई : खेत में तकरीबन 45 सैंटीमीटर चौड़ी व 30 से 40 सैंटीमीटर गहरी नालियां बना लेते हैं. एक नाली से दूसरी नाली की दूरी फसल की बेल की बढ़वार के मुताबिक 1.5 से 5 मीटर तक रखें.

बोआई करने से पहले नालियों में पानी लगा देते हैं. जब नाली में नमी की मात्रा बीज बोआई के लिए सही हो जाए तो बोआई की जगह पर मिट्टी भुरभुरी कर के 0.05 से 1.0 मीटर की दूरी पर बीज बोएं.

बोआई का समय : इस की बोआई फरवरीमार्च में करते हैं और बारिश के मौसम में यानी जून के अंत से जुलाई के पहले या दूसरे सप्ताह में करते हैं.

सिंचाई : समयसमय पर फसल की सिंचाई करें ताकि फसल की सेहत अच्छी रहे. सिंचाई व निराईगुड़ाई का काम नालियों में ही करें.

बीज की दर : लौकी 4 से 5 किलोग्राम, करेला 6 से 7 किलोग्राम, कद्दू 3 से 4 किलोग्राम, तुरई 5 किलोग्राम, चप्पन कद्दू 5 से 6 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की जरूरत होती है.

उपज : लौकी 250 से 420 क्विंटल, करेला 75 से 120 क्विंटल, कद्दू 250 से 500 क्विंटल, तुरई 100 से 130 क्विंटल, चप्पन कद्दू 50 से 60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर मिलने की संभावना रहती है.

बेल वाली सब्जियां (Climbing vegetables)किस्में व संकर प्रजातियां

लौकी : पूसा नवीन, पूसा संदेश, पूसा संतुष्टि, पूसा समृद्धि, पीएसपीएल और पूसा हाईब्रिड 3.

करेला : पूसा 2 मौसमी, पूसा विशेष, पूसा हाईब्रिड 1 और पूसा हाईब्रिड 2.

तुरई : पूसा सुप्रिया, पूसा स्नेहा, पूसा चिकनी, पूसा नसदार, सतपुतिया, पूसा नूतन और को 1.

चप्पन कद्दू : आस्ट्रेलियन ग्रीन, पैटी पेन, अर्ली यैलो, पूसा अलंकार व प्रोलिफिक.

कद्दू : पूसा विश्वास, पूसा विकास, अर्का चंदन व पूसा हाईब्रिड 1.

स्वस्थ नर्सरी भरपूर उत्पादन

किसी भी उत्पादन प्रणाली की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि हम किस तरह के बीज बो रहे हैं. एक अच्छी तरह से प्रबंधित नर्सरी में उगाए गए स्वस्थ अंकुर उपज के मुनाफे को तय करते हैं. स्वस्थ अंकुर का उत्पादन मुख्य क्षेत्र में एक स्वस्थ फसल की स्थापना में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है. उच्च पैदावार प्राप्त करने और फसल की गुणवत्ता में सुधार के लिए अच्छी गुणवत्ता वाले रोपों का उत्पादन जरूरी है.

अब ज्यादातर वाणिज्यिक किसान उत्पादकता बढ़ाने के लिए उच्च उपज वाले हाईब्रिड बीज का उपयोग कर के गहन सब्जी की खेती करते हैं.

चूंकि ये हाईब्रिड बीज महंगे होते हैं, इसलिए हर किसी के बीज को एक स्वस्थ अंकुर में बदलना जरूरी हो जाता है और इस के लिए गहन नर्सरी प्रबंधन की जरूरत होती है.

Seedsसब्जियों के बीज उत्पादन को विशेष किसानों/कंपनियों द्वारा या ज्यादातर उन्नत देशों में एक खास गतिविधियों के रूप में लिया जा रहा है, लेकिन रोपाई की तैयारी के दौरान किसानों को कई बीमारियों और कीड़ों जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जो रोपाई मुक्त रोपाई हासिल करने के लिए नियंत्रित और प्रबंधित करना बहुत जरूरी है.

नर्सरी की परिभाषा

एक सब्जी नर्सरी युवा सब्जी पौध को बढ़ाने या संभालने के लिए एक जगह या एक प्रतिष्ठिन है, जब तक कि वे अधिक स्थायी रोपण के लिए तैयार न हों.

हमें नर्सरी की आवश्यकता क्यों है?

कुछ सब्जियों को अपने शुरुआती विकास काल के दौरान खास देखभाल की जरूर होती है. बहुत छोटे आकार के बीज वाली कुछ सब्जियां होती हैं. बेहतर देखभाल के लिए नर्सरी में पहली बार बोआई की जाती है और खेत की तैयारी के समय के साथ और बीज बोने के तकरीबन एक महीने बाद मुख्य खेत में रोपाई की जाती है.

ऐसी सब्जियां, जिन की रोपाई तैयार की जाती है

टमाटर, बैगन, प्याज, मिर्च, शिमला मिर्च, गोभी, पत्ता गोभी, नोलखोल (कोहल रबी), चीनी गोभी, ब्रसल स्प्राउट, अंकुरित ब्रोकली, चिकोरी (लाल और हरा), अजवायन और अन्य कई और सब्जियां.

नर्सरी के फायदे

* नर्सरी में विकास के साथसाथ उन के अंकुरण के लिए बीजों को अनुकूल विकास की स्थिति प्रदान करना संभव है.

* युवा पौधों की बेहतर देखभाल के रूप में रोगजनक संक्रमण और कीटों के खिलाफ छोटे क्षेत्र में नर्सरी की देखभाल करना आसान है.

* नर्सरी उगाने से उगाई जाने वाली फसल काफी शुरुआती है और बाजार में इस की कीमत ज्यादा है, इसलिए आर्थिक रूप से यह ज्यादा फायदेमंद है.

* भूमि और श्रम की बचत होती है, क्योंकि और अधिक सघन फसल चक्रणों का पालन किया जा सकता है.

* मुख्य खेत की तैयारी के लिए अधिक समय उपलब्ध है, क्योंकि नर्सरी अलग से उगाई जाती है.

* चूंकि सब्जियों के बीज बहुत महंगे होते हैं, विशेष रूप से हाईब्रिड बीज, इसलिए हम नर्सरी में बोआई कर के बीजों के अंकुरण के उच्च स्तर तक ले जा सकते हैं.

नर्सरी में सामान्य बीमारियों और कीड़ों का प्रबंधन

सुरक्षात्मक नर्सरी संरचना के सावधानपूर्वक निर्माण और रखरखाव से कीट और रोग की समस्याओं को कम किया जा सकता है. कुछ सामान्य सावधानियां

स्प्रे की संख्या को कम करने में मदद करेंगी, जैसे कि :

* कीड़ों को बाहर करने के लिए बिना किसी अंतराल के दरवाजे को ठीक से बंद करना.

* नियमित रूप से जाल में छेद की मरम्मत करना.

* अतिरिक्त सिंचाई से बचना, जो बीमारियों को बढ़ावा देता है.

* रोपाई ट्रे, नर्सरी उपकरण और नर्सरी क्षेत्र कीटाणुरहित करना.

* प्रवेश करने वाले किसी भी कीड़े को पकड़ने के लिए 2 दरवाजों के बीच में स्टिकी ट्रैप लगाना.

* मई और जून के महीने में नर्सरी क्षेत्र की मिट्टी की सोलराइजेशन की जानी चाहिए.

नर्सरी में सब से अधिक देखे जाने वाले कीड़े

* ह्वाइटफ्लाइज

* लीफ माइनर्स

* थ्रिप्स और एफिड्स

Sticky Trapस्टिकी ट्रैप का उपयोग कर कीड़ों की निगरानी करना

स्टिकी ट्रैप एकीकृत कीट प्रबंधन (आईपीएम) कार्यक्रम का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है. स्टिकी ट्रैप लागू करने में आसान और सस्ती है. स्टिकी कार्ड व्यस्क कीटों जैसे कि थ्रिप्स, ह्वाइटफ्लाइज, लीफ माइनर्स और पंख वाले एफिड्स के व्यस्क चरणों को फंसाने में मदद करते हैं.

स्टिकी ट्रैप के प्रकार

पीला : सामान्य कीट निगरानी के लिए सर्वश्रेष्ठ. ह्वाइटफिज, लीफ माइनर्स और पंख वाले एफिड्स को आकर्षित करते हैं.

नीला : थ्रिप्स के लिए और अधिक आकर्षक. थ्रिप्स जनसंख्या का पता लगाने के लिए उपयोग किया जाता है.

रासायनिक प्रबंधन

* ह्वाइटफ्लाइज : डायफेंटिहुरोन 2 ग्राम प्रति लिटर या एसिटोमाप्रिड 0.2 ग्राम प्रति या थियोमेटैक्सम 0.3 ग्राम लिटर या फ्लुक्नीडैम 150 मिलीलिटर प्रति हेक्टेयर या पायरीप्रोक्सीफेन 625 मिलीलिटर प्रति हेक्टेयर.

* लीफ माइनर्स : क्लोरोपाइरीफास 2 मिलीलिटर प्रति लिटर या थायोमेथोक्साम 0.3 ग्राम प्रति लिटर पृथ्वी पर डायटोमेसियस का छिड़काव (पाउडर फार्म).

* थ्रिप्स और एफिड्स : फिप्रोनिल 5 फीसदी 2 मिलीलिटर प्रति लिटर या डायफेनथियुरोन 2 ग्राम प्रति लिटर या थायोमेथाक्साम 0.3 ग्राम प्रति लिटर या स्पिनोसैड 175 मिलीलिटर प्रति हेक्टेयर.

नर्सरी में सब से अधिक देखे जाने वाले रोग

* डंपिंग औफ

* ब्लाइट

* विल्ट

डंपिंग औफ : इस रोग का प्रकोप मिर्च की नर्सरी में भूमिजनित फफूंदी के कारण होता है. यह रोग नर्सरी में नवजात पौधों को भूमि की सतह पर आक्रमण करता है. रोग से पौधे अंकुरण से पहले और बाद में भी मर जाते हैं. ग्रसित पौधे सूख कर जमीन की सतह पर गिर जाते हैं. पानी की अधिकता से रोग की उग्रता बढ़ जाती है.

प्रबंधन

* बोआई के लिए शुद्ध व स्वस्थ बीज काम में लेना चाहिए.

* बोआई के पूर्व बीज का थिरम या कैप्टान या बाविस्टिन 2.5 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचार कर के बोना चाहिए.

* नर्सरी में जल निकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिए.

* नर्सरी में पौध उगने पर क्यारियों को 0.2 प्रतिशत (2 ग्राम दवा प्रति लिटर पानी) कैप्टान या बाविस्टिन के घोल से सिंचाई करनी चाहिए.

ब्लाइट : यह एक तीव्र और पूर्ण क्लोरोसिस है, जिस के लक्षण में अचानक और गंभीर पीलापन, भूरापन, धब्बे पड़ना, मुरझाना या पत्तियों, तनों या पूरे पौधे का मरना शामिल है.

प्रबंधन

* इस के नियंत्रण के लिए प्रभावित पौधे उखाड़ देने चाहिए और मैंकोजेब या डाइफोलेटान की 2.5 मिली. मात्रा को प्रति लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए.

* इस के अतिरिक्त फाइटोलान 2 ग्राम दवा प्रति लिटर पानी में 7-8 दिन के अंतर पर छिड़काव कर भी इस रोग के प्रकोप से छुटकारा पाया जा सकता है या मैंकोजेब+कार्बंडाजिम 2.5-3 ग्राम प्रति लिटर पानी या सिमोक्सानिल+मैंकोजेब 2-3 मिलीलिटर प्रति हेक्टेयर पानी स्टीकर के साथ स्प्रे करें.

विल्ट : विल्टिग की विशेषता है ऊपरी पत्तियों का पीलापन, जो सूखने के साथ मुड़ जाती हैं. पौधे की संवहनी प्रणाली गंभीर रूप से प्रभावित होती है, खासकर निचले तने और जड़ों में और पौधे मुरझा जाते हैं.

प्रबंधन

* कौपरऔक्सीक्लोराइड 2.5 ग्राम प्रति लिटर के साथ ड्रिंचिंग करें.

* स्यूडोमोनास फ्लोरेसेंस 10 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज बोआई से पहले उपचारित करें.

* कार्बंडाजिम 1 ग्राम प्रति लिटर विल्ट प्रभावित पौधों के लिए साथ स्पौट ड्रिंचिंग करें.

नर्सरी का मौडर्न तरीका प्लास्टिक ट्रे

कहा जाता है कि सब्जियों की खेती से किसानों को भरपूर आमदनी होती है, सालभर नकदी बनी रहती है. मगर सब्जियों की नर्सरी उगाना हर जगह मुमकिन नहीं है. बाढ़ या दियारा इलाके में यह काम बहुत मुश्किल है, वहीं दूसरी ओर छोटे किसानों के पास गुजारे लायक जमीन नहीं होती है कि नर्सरी उगा सकें.

सब्जियों से भरपूर आमदनी के लिए खेती अगेती करनी चाहिए, जिस के लिए नर्सरी भी अगेती हो व तापक्रम माकूल हो. प्लास्टिक ट्रे में नर्सरी को उगा कर उसे अनुकूलता प्रक्रम में आसानी से रखा जा सकता है, जबकि खुले खेत में यह काम बहुत मुश्किल है.

प्लास्टिक ट्रे में सब्जियों की नर्सरी से ढेरों फायदे हैं, मसलन नर्सरी जल्दी और बेमौसम तैयार हो जाती है. बीज की जरूरत तकरीबन आधी होती है. रोग और कीट तकरीबन न के बराबर रहते हैं. नर्सरी को एक जगह से दूसरी जगह आसानी से भेज सकते हैं.

मतलब यह है कि नर्सरी के कारोबार को शानदार और दमदार बनाया जा सकता है. ऐसे में समय की मांग है कि अब प्लास्टिक ट्रे में नर्सरी लगाई जाए.

नर्सरी की इस विधि को भूमिरहित या प्लग ट्रे कहते हैं. प्लग ट्रे प्लास्टिक से बनी हुई ढेरनुमा आकार की होती है, जिस में प्लग (गहरे सैल) बने होते हैं.

बाजार में प्लास्टिक की अनेक गहरे खानेदार (प्लग) वाली ट्रे मिलती हैं. एक प्लग (खाने) में एक पौध उगाई जाती है. हमेशा शंकु आकार वाली ट्रे को खरीदना चाहिए, क्योंकि शंकु आकार वाली टे्र में पौधों की जड़ें बहुत आसानी से और गहराई से विकसित हो जाती हैं.

कैसे उगाएं नर्सरी

सभी पौध रोग और कीट मुक्त हों, इस के लिए सब से पहले प्लास्टिक ट्रे को उपचारित कर देना चाहिए. ट्रे को 0.1 फीसदी क्लोरीन ब्लीच के घोल पर 0.1 फीसदी सोडियम हाइपोक्लोराइड के घोल में कुछ देर डुबो कर निकाल लेना चाहिए.

इस के बाद प्रति प्लग 3 भाग को कोपिट, एक भाग वर्मी क्यूलाइट, एक भाग पर लाइट के मिश्रण से भर देना चाहिए. इस के बाद ट्रे को पौलीहाउस, एग्रोनैट या छोटे किसान लोटनेल पौलीहाउस में रख दें. इस के बाद हर प्लग में 1 सैंटीमीटर की गहराई पर बीज को दबा कर हलकी सिंचाई करनी चाहिए.

खाद, पानी व उर्वरक

ट्रे में कार्बनिक खादों का भरपूर इस्तेमाल करते हुए घुलनशील उर्वरकों का इस्तेमाल करना बेहतर  होता है. कद्दूवर्गीय सब्जियों के लिए हफ्ते में एक बार घोल बना कर छिड़काव करना उचित रहता है.

पौधों की बेहतर बढ़वार के लिए अंकुरण के एक हफ्ते बाद सिंचाई के साथ बाजार में मुहैया विभिन्न एनपीके के ग्रेड जैसे 20:20:20, 19:19:19 और 15:15:15 दे सकते हैं. ध्यान देने वाली बात यह है कि सिंचाई की सूक्ष्म विधि जैसे ड्रिप या स्प्रिंकलर सिंचाई यदि अपनाई गई, हो तो विभिन्न एनपीके ग्रेड वाले उर्वरकों का 70-80 पीपीएम की मात्रा होनी चाहिए.

प्लग ट्रे में सिंचाई हमेशा शाम को फुहार के रूप में करनी चाहिए. शाम को सिंचाई करने से पौध गलन की समस्या कम आती है.

फायदे ही फायदे

* पौध सड़न, जड़ गलन जैसी बीमारियों का डर कम हो जाता है.

* एक प्लग में एक पौधे का बेहतर ढंग से जमाव होने के चलते पौधों को समुचित पोषक तत्त्व और पानी मिलता है.

* खरपतवार नहीं उग पाते हैं.

* बेमौसम और जल्दी से पौधे तैयार हो जाते हैं, जिस से बाजार में सब्जियों की अगली आवक से कीमतें ज्यादा मिलती हैं और आमदनी में बढ़ोतरी होती है.

* 95-100 फीसदी पौधे जीवित और सेहतमंद होते हैं.

* पौध सामग्री को एक जगह से दूसरी जगह भेजने में आसानी रहती है.

* सालभर में 5-6 बार नर्सरी तैयार की जा सकती है.

नर्सरी में तैयार करें लतावर्गीय सब्जियों की पौध

जनवरीफरवरी का महीना लतावर्गीय सब्जियों की रोपाई के लिए बेहद ही खास माना जाता है. इस महीने लतावर्गीय सब्जियों की रोपाई कर गरमी के लिए अच्छा उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है.
इन बेल वाली सब्जियों में लौकी, तोरई, खीरा, टिंडा, करेला, तरबूज, खरबूजा, पेठा की रोपाई जनवरी या फरवरी महीने में कर गरमी के मौसम में मार्च से ले कर जून महीने तक अच्छी उपज ली जा सकती है.
इन लतावर्गीय सब्जियों की खेती बीज को सीधे खेत में बो कर या नर्सरी में पौध तैयार कर खेत में रोप सकते हैं.
जनवरीफरवरी माह में पौधों के उचित जमाव के लिए प्लास्टिक ट्रे, प्लास्टिक लो टनल या पौलीबैग तकनीकी का प्रयोग कर लतावर्गीय सब्जियों की नर्सरी तैयार की जा सकती है.
इस विधि से प्लास्टिक शीट से लो टनल में भी पौध तैयार की जाती है. इस में बीज को बो कर पौध तैयार की जाती है. इस के बाद तैयार पौध को खेत में रोपा जाता है. इस विधि से लतावर्गीय सब्जियों की रोपाई से पौधों के मरने पर उस की जगह पर दूसरे पौध को रोप कर नुकसान से बचा जा सकता है.
इन सब्जियों के पौधों की तैयार करें नर्सरी
इस समय बोआई के लिए जिन लतावर्गीय सब्जियों का चयन करते हैं, उस में लौकी, करेला, खीरा, कद्दू, टिंडा, खरबूजा, तरबूज, तोरई जैसी किस्में प्रमुख हैं.
ऐसे तैयार करें पौध
सर्दी के मौसम में लतावर्गीय सब्जियों की खेती के लिए नर्सरी में पौध तैयार करने के लिए कई विधियों का प्रयोग किया जाता है, जिस में  मुख्य रूप से प्लास्टिक ट्रे, प्लास्टिक लो टनल या पौली पैक में पौधों को तैयार करना ज्यादा मुफीद होता है.
ऐसे तैयार करें प्लास्टिक लो टनल
प्लास्टिक लो टनल में सब्जियों के पौध तैयार करने के लिए सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था कर लें. इस के लिए ड्रिप इरिगेशन ज्यादा मुफीद होता है.
प्लास्टिक लो टनल बनाने  के लिए जमीन से उठी हुई क्यारियां हवा की निकासी को नजर में रखते हुए उत्तर से दक्षिण दिशा में बनाई जानी चाहिए. इस के बाद क्यारियों के मध्य में एक ड्रिप लाइन बिछा दी जाती है. इन क्यारियों के ऊपर अर्धवृत्ताकार लोहे के 2 मिलीमीटर मोटे लोहे के तारों को मोड़ कर दोनों सिरों की दूरी 50 से 60 सैंटीमीटर और ऊंचाई 50 से 60 सैंटीमीटर रख कर सेट कर लेते हैं.
यह ध्यान रखें कि मोड़े गए तारों के बीच की दूरी 1.5 से 2 मीटर हो. 20-30 माइक्रोन मोटाई और 2 मीटर चौड़ाई वाली पारदर्शी प्लास्टिक की चादर को इन तारों पर चढ़ा कर ढक दिया जाता है.
बिना मिट्टी के पौध तैयार करना 
विशेषज्ञ राघवेंद्र विक्रम सिंह के अनुसार, इस विधि से लतावर्गीय सब्जियों की पौध तैयार करने के लिए मिट्टी का उपयोग नहीं किया जाता है, बल्कि इस विधि में मृदाविहीन विधि से बीज की रोपाई कर पौध तैयार की जाती है.
जो किसान इस विधि से नर्सरी में पौध तैयार करते हैं, उस से स्वस्थ पौधे तो तैयार किए ही जा सकते हैं. साथ ही, इस में कीटों व बीमारियों का प्रकोप भी कम पाया जाता है.
मृदाविहीन विधि से नर्सरी तैयार करने के लिए सब्जी के बीज की बोआई जमीन में न कर के प्लास्टिक की ट्रे में की जाती है, जिस के लिए जरूरी चीजों में कोकोपिट, प्लास्टिक ट्रे, वर्मी कंपोस्ट, सब्जी बीज और फफूंदीनाशक में 50 फीसदी में घुलनशील पाउडर बावस्टीन की जरूरत होती है.
इस विधि से बीज को प्लास्टिक ट्रे में रोपाई के पूर्व कोकोपिट ब्रिक को एक प्लास्टिक या जूट के बोरे में भर कर ऊपर से बोरे का मुंह बांध देते हैं. इस के बाद उस को 5-6 घंटे के लिए बोरे को पानी में डुबो कर  भिगो देते हैं. इस के बाद बोरे को पानी से बाहर निकाल कर भीगे हुए कोकोपिट को साफ प्लास्टिक की पन्नी पर पतली परत बनाते हुए फैला देते हैं. उस के बाद कोकोपिट को खूब दबा कर पानी निकाल लेते हैं.
जब इस कोकोपिट से पूरा पानी छन जाता है, तो उस में जितनी मात्रा कोकोपिट की होती है, उतनी ही मात्रा में वर्मी कंपोस्ट मिला लेते हैं. जब कोकोपिट और वर्मी कंपोस्ट का मिश्रण तैयार हो जाए, तो उस में प्रति किलोग्राम मिश्रण की दर से 2 ग्राम बावस्टीन को मिला लेते हैं.
जब यह मिश्रण पूरी तरह से तैयार हो जाए, तो प्लास्टिक ट्रे में इस मिश्रण को दबा कर भर लेते हैं. ट्रे में मिश्रण को भरने के बाद उस में बीज की बोआई कर ऊपर से कोकोपिट मिश्रण की एक हलकी परत से ढक दिया जाता है.
ट्रे में तैयार किए जाने वाले इस नर्सरी में पौधों को हलकी सिंचाई की जरूरत होती है. इस की सिंचाई हजारे से किया जाना ज्यादा उचित होता है.
पौलीबैग में नर्सरी तैयार करना
लता वाली सब्जियों की पौध तैयार करने के लिए पौलीथिन की छोटी थैलियों का भी उपयोग किया जा सकता है. इन थैलियों में पौध को उगाने के लिए मिट्टी, खाद व रेत का मिश्रण बराबर के अनुपात में मिला कर भरा जाता है.
मिश्रण भरने से पहले प्रत्येक थैली की तली में 2 से 3 छेद पानी के निकास के लिए बना लेते हैं. बीज को मिश्रण में रोपने के पहले केप्टान दवा की 2 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम बीज की दर से मिला कर उपचारित कर लेते हैं.
बीजों के अच्छे जमाव के लिए उन्हें 6 से 12 घंटे तक पानी में डुबो कर निकाल लेते हैं और फिर किसी सूती कपड़े या बोरे के टुकड़े में लपेट कर किसी गरम जगह पर रख देते हैं. जब बीजों का अंकुरण हो जाए, तो इसे तैयार पौलीबैग में बो देते हैं. इस से जमाव अच्छा होता है. अच्छे जमाव के लिए प्रत्येक थैली में 2 से 3 बीजों की बोआई करना उचित होता है बाद में एक पौधा छोड़ कर अन्य को निकाल देते हैं. बीज रोपाई के बाद इन पैकेटों को लो टनल या पौलीहाउस में रख दिया जाता है.
दोनों विधियों से पौधों की रोपाई करने के लिए अधिक ठंड से बचाने के लिए प्लास्टिक लो टनल के भीतर रख देते हैं. अगर  पौधों में पोषक तत्वों की कमी हो, तो पानी में घुलनशील एनपीके मिश्रण का छिड़काव कर देना चाहिए.
नर्सरी में लतावर्गीय पौधों को तैयार करने के दौरान देखभाल से जुड़ी जरूरी बातें
बस्ती जिले के पचारी कला गांव के प्रगतिशील किसान विजेंद्र बहादुर पाल के अनुसार, लतावर्गीय सब्जियों की नर्सरी तैयार करने के दौरान हमें कुछ विशेष बातों का खयाल रखना पड़ता है, जिस में पहला यह कि नर्सरी में पर्याप्त नमी बनाए रखें. बीज को नर्सरी में बोने के बाद 11वें एवं 21वें दिन 2 मिलीलिटर मैंकोजेब प्रति लिटर पानी के साथ घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए, जिस से कि नर्सरी में आर्द्रगलन, पौधगलन व अन्य फफूंदजनित बीमारियों से बचाव होता है.
यह भी ध्यान दें, जब नर्सरी में पौध 4 से 5 पत्ती वाले यानी 30 से 35 दिन के हो जाएं, तो ऊंची उठी हुई क्यारियों में अथवा गड्ढा बना कर निश्चित दूरी पर पौधों की रोपाई कर लेनी चाहिए.
नर्सरी से सब्जी फसलों की रोपाई से लाभ
सर्द मौसम में सब्जी की रोपाई बीज द्वारा सीधे खेत में किए जाने की अपेक्षा नर्सरी में पौध तैयार कर रोपना ज्यादा मुफीद होता है. इस से न केवल पौधों के लिए उपयुक्त आवश्यक वातावरण प्रदान कर समय से पौधे तैयार किए जा सकते हैं, बल्कि बीज की मात्रा भी कम लगती है और स्वस्थ पौधे भी तैयार होते हैं.
इस विधि से खेती करने से  उत्पादन लागत भी लगती है. चूंकि पौधे नर्सरी में लो टनल में या पौलीहाउस में पौध तैयार करने से वर्षा, ओला, कम या अधिक तापमान, कीड़े व रोगों का प्रभाव पौधों पर कम पड़ता है. नर्सरी में तैयार किए गए पौधों का विकास तेजी से होता है, इसलिए उपज जल्दी मिलनी शुरू हो जाती है.
तैयार पौधों की खेत में रोपाई 
नर्सरी में लतावर्गीय सब्जियों की पौध तैयार कर खेती करने वाले प्रगतिशील किसान राममूर्ति मिश्र का कहना है कि जब नर्सरी में लतावर्गीय सब्जियों के पौधों की खेत में रोपाई के लिए सर्वप्रथम नाली या थाले बना लेना उचित होता है. नाली को पूरब से पश्चिम दिशा की ओर बनाया जाता है. यह नालियां 45 सैंटीमीटर चौड़ी और 30 से 40 सैंटीमीटर गहरी बनाई जाती हैं.
नाली बनाते समय यह ध्यान रखें कि खीरा, टिंडा के लिए एक नाली से दूसरी नाली के बीच की दूरी 2 मीटर और कद्दू, पेठा, तरबूज, लौकी, तोरई के लिए 4 मीटर तक रखी जाए. इसी प्रकार नाली के उत्तरी किनारों पर थाले बनाए जाने चाहिए, जिस में  चप्पन कद्दू, टिंडा व खीरा के लिए 0.50 मीटर रखें.
इसी प्रकार कद्दू, करेला, लौकी, तरबूज के लिए एक मीटर की दूरी रखी जाती है. इन पौधों की रोपाई करने से कम लागत में अधिक पैदावार ली जा सकती है.
किसान राममूर्ति मिश्र के अनुसार, नर्सरी में लतावर्गीय सब्जियों की तैयार पौध की रोपाई फरवरी माह में शुरू करें, क्योंकि तब तक पाला पड़ने की संभावना कम हो जाती है. ऐसे में पौधों को नुकसान से बचाया जा सकता है.
नर्सरी से पौधों को खेत में पौलीबैग या प्लास्टिक ट्रे से पौधा मिट्टी सहित निकाल कर तैयार क्यारियों में शाम के समय रोपें. जैसे ही पौधों की रोपाई खेत में की जाए, उस के तुरंत बाद पौधों की हलकी सिंचाई करना न भूलें. पौधों के खेत में रोपाई के 10 से 15 दिन बाद फसल की निराई कर के खरपतवार साफ कर देना चाहिए. साथ ही, पहली गुड़ाई के बाद जड़ों के आसपास हलकी मिट्टी चढ़ानी चाहिए. खेत में रोपे गए इन लतावर्गीय सब्जियों में जब फूल और फल आ रहा हो, उस समय सिंचाई अवश्य करें.
खाद और उर्वरक 
कृषि विज्ञान केंद्र, बस्ती में विशेषज्ञ फसल सुरक्षा डा. प्रेमशंकर के अनुसार, नर्सरी से तैयार कर लता वाली सब्जियों को खाद व उर्वरक देने में काफी सतर्कता बरती जाए. ऐसे किसानों को रोपाई के पूर्व ही फसल में उर्वरक देने की पूरी तैयारी कर लेनी चाहिए.
खेत में जब पौध रोपाई के लिए अंतिम जुताई हो जाए, तो उस समय 200 से 500 क्विंटल सड़ी खाद के साथ 2 लिटर ट्राईकोडर्मा मिला देना चाहिए. इस से फसल को मिट्टी से फैलने वाले फफूंद से बचाया जा सकता है.
फसल से अधिक उत्पादन के लिए प्रति हेक्टेयर 240 किलोग्राम यूरिया, 500 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट एवं 125 किलोग्राम म्यूरेट औफ पोटाश की आवश्यकता पड़ती है. इस में सिंगल सुपर फास्फेट एवं पोटाश की पूरी मात्रा और यूरिया की आधी मात्रा नाली बनाते समय कतार में डालते हैं, जबकि यूरिया की चौथाई मात्रा रोपाई के 20 से 25 दिन बाद दे कर मिट्टी चढ़ा देते हैं. चौथाई मात्रा 40 दिन बाद टापड्रेसिंग दी जाती है.
पौधों को गड्ढे में रोपते समय प्रत्येक गड्ढे में 30 से 40 ग्राम यूरिया, 80 से 100 ग्राम सिंगल सुपर फास्फेट व 40 से 50 ग्राम म्यूरेट औफ पोटाश की मात्रा मिला कर रोपाई की जानी चाहिए.
पौधों की कटाई, छंटाई व सहारा देना
बड़े स्तर पर सब्जियों की खेती करने वाले बस्ती जिले के दुबौलिया गांव के प्रगतिशील किसान अहमद अली का कहना है कि लतावार्गीय सब्जियों की फसल से अधिक उत्पादन प्राप्त करने के लिए पौध की कटाईछंटाई फायदेमंद होती है. इसलिए पौधों को 3 से 7 गांठ के बाद सभी द्वितीय शाखाओं को काट देना चाहिए. पौधों को सहारा देने के लिए मचान बना कर मचान के खंभों के ऊपरी सिरे पर तार बांध कर पौधों को मचान पर चढ़ा लेते हैं.
इस प्रकार लतावर्गीय सब्जियों की खेती कर के अच्छी उपज एवं आमदनी भी अधिक प्राप्त की जा सकती है.