Crop diversification : फसल विविधीकरण से अधिक उत्पादन

Crop diversification: महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के अनुसंधान निदेशालय द्वारा फसल विविधीकरण (Crop diversification) परियोजना के तहत आयोजित 2 दिवसीय अधिकारियों का प्रशिक्षण हुआ. इस कार्यक्रम में 30 सहायक कृषि अधिकारियों व कृषि पर्यवेक्षकों ने भाग लिया.

इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य कृषि अधिकारियों को क्षेत्र की कृषि व्यवस्था को बदलने के लिए नवीन रणनीतियों से सशक्त बनाना था ताकि, फसल विविधीकरण में प्रमुख चुनौतियों और अवसरों पर चर्चा की जा सके, जो शुष्क दक्षिण राजस्थान में सतत कृषि और ग्रामीण रोजगार की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.

इस परियोजना के प्रभारी डा. हरि सिंह ने कहा कि यह कार्यक्रम कृषि अधिकारियों और हितधारकों के लिए डिजाइन किया गया है, जो पारंपरिक एकफसली खेती से इंटरक्रौपिंग   प्रणालियों की ओर बदलाव पर आधारित है, जो मिट्टी की सेहत में सुधार, जलवायु परिवर्तनशीलता से जोखिम कम करने और किसानों की आय बढ़ाने में मदद कर सकता है.

राजस्थान के दक्षिणी जिलों जैसे उदयपुर, चित्तौड़गढ़ और बांसवाड़ा में जल की कमी और अनियमित मानसून जैसी समस्याओं का सामना करते हुए, फसल विविधीकरण दालों, तिलहन और बागबानी फसलों को मक्का और गेहूं जैसे मुख्य फसलों के साथ शामिल करना, उत्पादकता और रोजगार सृजन के लिए एक क्रांतिकारी बदलाव साबित हो रहा है.

अनुसंधान निदेशक डा. अरविंद वर्मा ने विविधीकृत फसलों के लिए खरपतवार प्रबंधन में उन्नत अभ्यास पर चर्चा की, जिस में उपज हानि को कम करने पर जोर दिया गया. डा. अरविंद वर्मा ने बताया कि फसल विविधीकरण में मोनोकल्चर के बजाए रोटेशन या इंटरक्रौपिंग सिस्टम में विभिन्न फसलों को उगाना शामिल है. यह खरपतवार जीवन चक्र को रोक कर और रासायनिक खरपतवारनाशियों पर निर्भरता कम कर के सतत खरपतवार प्रबंधन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

डा. पोखर रावल, प्रोफैसर के द्वारा विविधीकृत फसल प्रणालियों के तहत उत्पादकता बढ़ाने के लिए उन्नत कृषि अभ्यास पर जानकारी दी गई. उन्होंने फसलों में लगने वाले रोगों और उन के निदान पर गहन जानकारी दी. साथ ही, फसलों की देखभाल और उत्पादन बढ़ाने की आधुनिक विधियों की भी जानकारी दी.

इस कार्यक्रम में डा. बैरवा ने बागबानी और कृषि फसलों की लागत और लाभ का तुलनात्मक विश्लेषण कर के बताया. उन्होंने कहा कि बागबानी फसलों जैसे सब्जियां, फल और मसालों में निवेश थोड़ा अधिक होता है, लेकिन इन से मिलने वाला लाभ सामान्य फसलों की तुलना में बहुत अधिक होता है.

इस कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों ने यही कहा कि फसल विविधीकरण से किसानों को न केवल अधिक लाभ होगा, बल्कि स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे और कृषि प्रणाली लंबे समय तक स्थायी बनी रहेगी.

Rainy Season : बरसात के महीनों में खेती

Rainy Season : जुलाईअगस्त का महीना बरसाती मौसम का होता है. खेतों में कीटपतंगों का प्रकोप बढ़ जाता है. इस मौसम में फसल को बचाना बहुत ही जरूरी है. कीट खासकर फसल के पत्तों व फूल पर अपना हमला ज्यादा करते हैं. इस से फसल की पैदावार में कमी हो जाती है, इसलिए सही कीटनाशक का इस्तेमाल करें, जिस से फसल को ज्यादा नुकसान न हो.

इस के अलावा इस मौसम में खेतों में अनेक खरपतवार भी उग आते हैं. उन्हें भी समयसमय पर उखाड़ते रहें. फसल में बेकार व खराब पौधों को भी उखाड़ कर जला दें.

इस समय खासकर धान की खेती काफी मात्रा में की जाती है, इसलिए धान की खेती में पानी का जरूर ध्यान रखें.

गन्ने की फसल को भी गिरने से बचाएं. उन्हें आपस में जगहजगह इकट्ठा कर के बांध दें. गन्ने में अनेक प्रकार की बीमारियों से भी बचाव करें और जो रोगी पौधे हों उन्हें खेत से निकाल दें.

मक्का की फसल में पानी खड़ा न रहने दें. इस की फसल को भी कीट रोगों से बचाएं व खराब पौधे निकाल दें. दलहनी फसलें जैसे मूंग, उड़द, लोबिया, अरहर, सोयाबीन जैसी फसलों में फूल आने पर मिट्टी में नमी बनाए रखें. इस में ज्यादा फल बनेंगे और अच्छी पैदावार मिलेगी. इन दिनों दलहनी फसलों में फलीछेदक कीट का हमला ज्यादा होता है, इसलिए जरूरी कीटनाशक का इस्तेमाल करें.

पत्तागोभी और फूलगोभी की अगेती फसल लेने के लिए अगस्त में नर्सरी लगाएं. पत्तागोभी की गोल्डन, पूसा मुक्ता और फूलगोभी के लिए पूसा सिंथैटिक, पूसा शुभ्रा और पूसा हिम ज्योति किस्मों को बोने के लिए चुनें. यह पौध सितंबर में तैयार हो जाती है और उस समय इस की रोपाई करें.

गाजर व मूली की अगेती फसल लेने के लिए भी इसी माह बोआई करें. मूली की जापानी अर्ली और गाजर में पूसा केसर, पूसा मेघाली जैसी किस्मों का चुनाव करें.

अगस्त महीने के अंत तक पपीते की पौध भी गड्ढों में लगाई जा सकती है. इस के लिए गड्ढे अच्छी तरह से तैयार करें और उन्हें सही मिट्टी व गोबर की खाद से भर लें. दीमक से बचाव के लिए क्लोरोपाइरीफौस डालें.

इस महीने आम, अमरूद व केले के नए बाग लगाए जा सकते हैं. अपने इलाके के हिसाब से पौधों की किस्मों का चुनाव करें. इस के लिए अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से मदद ले सकते हैं.

आम के पुराने बागों के बचेखुचे फलों को तोड़ लें व पेड़ों की कटाईछंटाई कर उन के थालों को भी ठीक कर लें.

Rainy Season

बरसाती मौसम में पशुओं की भी सही देखभाल करें. गलघोटूं जैसी बीमारियों से बचाव के लिए समय पर टीके लगवाएं. बरसाती दिनों में अकसर पशुओं के पेट में रोग भी हो सकते हैं, इसलिए खानपान और साफसफाई का खास ध्यान रखें.

मुरगीपालक भी अपना शैड ठीक रखें, जिस से छत से पानी न टपके. बरसात के मौसम में मुरगेमुरगियों को भी बीमारी का खतरा बना रहता है. पानी से बचाव और उन के बिछावन का ध्यान रखें. मुरगियों में अगर थोड़ी सी भी कोई बीमारी दिखती है, तो तुरंत डाक्टर को दिखाएं.

इस समय अनेक तरह के कीड़ेमकोड़े बढ़ जाते हैं, जिन में कई कीट जहरीले भी हो सकते हैं, इसलिए पशुओं के साथसाथ खुद को भी उन से बचाना जरूरी है. बरसात का समय जितना सुहावना होता है उतनी ही सावधानी बरतनी इस में जरूरी है.

किसान भी नंगे पैर न रहें. खेतखलिहान में काम करते समय जूते वगैरह पहन कर रहें. मक्खीमच्छर व कीड़ों से भी अपना व पशुओं का बचाव करें.

आजकल तो पशुओं के लिए भी बड़े आकार में मच्छरदानी और पशुओं के नीचे बिछाने के लिए रबड़ के गद्दे यानी मेट आ रहे हैं. इन के इस्तेमाल से पशुओं को कीटपतंगों से महफूज रखा जा सकता है.

Farming Tasks : मई माह में खेती के ज़रूरी काम

Farming Tasks : मई माह में गरमी चरम पर होती है. लिहाजा हमेशा तो एसी में बैठना मुमकिन नहीं होता. इसलिए गरमी का कहर तो झेलना ही पड़ता है. जब बात किसानों की हो, तब तो आराम हराम होता है. किसान गरमी की लपट झेलते हुए बदस्तूर अपना काम करते रहते हैं और अनाज व अन्य फसलें उगाते रहते हैं.

पेश है, मई महीने के दौरान किए जाने वाले खेती के कामों का एक खुलासा:

* गेहूं की कटाई खत्म होने के बाद खाली खेतों को अगली फसल के लिहाज से तैयार कर लें.

* गेहूं के साथसाथ जई व जौ वगैरह फसलें दे चुके खेतों की मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई करें ताकि पिछली फसल के अवशेष खेत की मिट्टी में अच्छी तरह मिल जाएं और मिट्टी भुरभुरी हो जाए. पिछली फसल का मोटामोटा कचरा बटोर कर खेत से दूर फेंक देना चाहिए.

* मई की गरमी का खास फायदा यह होता है कि इस से तमाम कीड़ेमकोड़े झुलस कर खत्म हो जाते हैं. इसीलिए करीब 2 हफ्ते के अंतराल से खेतों की लगातार जुताई करते रहना चाहिए. ऐसा करने से गरमी व लू का असर मिट्टी में अंदर तक जाता है और वहां मौजूद खतरनाक बैक्टीरिया व फफूंदी नष्ट हो जाते हैं.

* मिट्टी को भरपूर धूप का सेवन कराना काफी फायदेमंद होता है. इस से मिट्टी का अच्छाखास इलाज हो जाता है और मिट्टी अगली फसल के लिए बढि़या तरीके से तैयार हो जाती है.

* अपने ईख के खेतों का खास खयाल रखें और 2 हफ्ते के अंतर से सिंचाई करते रहें, ताकि खेतों में भरपूर नमी बनी रहे.

* गन्ने के खेतों में सिंचाई के साथसाथ निराईगुड़ाई भी करते रहें ताकि खरपतवार न पनप सकें.

* गन्ने की फसल में कीड़ों व रोगों का खतरा बराबर बना रहता है, लिहाजा उन के मामले में सतर्क रहें. जरा भी जरूरत महसूस हो तो कृषि वैज्ञानिक से सलाह ले कर कीटों व रोगों का इलाज कराएं.

* अगर धान की अगेती किस्म की नर्सरी डालनी हो तो मई के आखिर तक डाल सकते हैं. नर्सरी में कंपोस्ट खाद या गोबर की सड़ी खाद का इस्तेमाल जरूर करें. इस के अलावा फास्फोरस व नाइट्रोजन का भी सही मात्रा में इस्तेमाल करें.

* धान की नर्सरी डालने में ध्यान रखें कि हर बार जगह बदल कर ही नर्सरी डालें. धान की नर्सरी से अच्छा नतीजा पाने के लिए सिंचाई में कमी न करें.

* अगर सिंचाई का इंतजाम हो तो चारे के लिहाज से ज्वार, बाजरा व मक्के की बोआई करें. पानी की दिक्कत होने पर इन फसलों की बोआई न करें, क्योंकि इन फसलों को ज्यादा पानी की जरूरत होती है.

* बरसीम, लोबिया व जई की बीज वाली फसलें इसी माह तैयार हो जाती हैं. ऐसे में उन की कटाई का काम खत्म करें.

* आखिरी हफ्ते में अरहर की अगेती किस्मों की बोआई करें, मगर बोआई से पहले जुताई कर के व खाद वगैरह मिला कर खेत को सही तरीके से तैयार करना जरूरी है.

* सूरजमुखी के खेतों की सिंचाई करें, क्योंकि गरम मौसम में खेत में नमी रहना जरूरी है.

* सूरजमुखी की सिंचाई के वक्त इस बात का खयाल रखें कि पौधों की जड़ें न खुलने पाएं. अगर पानी से जड़ें खुल जाएं, तो उन पर मिट्टी चढ़ाना न भूलें. मिट्टी चढ़ाने से पौधों को मजबूती मिलती है और वे तेज हवाओं को भी झेल लेते हैं.

* सूरजमुखी के खेत में मधुमक्खियों के बक्से छायादार जगह पर रखें. बक्सों के आसपास टबों में पानी भर कर रखें ताकि मधुमक्खियों को पानी की खोज में भटकना न पड़े. मधुमक्खियों से दोहरा फायदा होता है यानी शहद उत्पादन के साथसाथ परागण भी अच्छा होता है.

* सूरजमुखी की फसल को बालदार सूंड़ी व जैसिड रोग का काफी खतरा रहता है. ऐसा होने पर कृषि वैज्ञानिकों से सलाह ले कर दवा छिड़कें.

* गाजर, मूली, मेथी, पालक, शलजम, पत्तागोभी, गांठगोभी व फूलगोभी की बीज वाली फसलें अमूमन इस माह तक तैयार हो जाती हैं. ऐसे में उन की कटाई का काम निबटाएं. बीजों को निकालने के बाद सुखा कर उन का भंडारण करें.

* पहले डाली गई तुरई की नर्सरी के पौधे तैयार हो चुके होंगे, लिहाजा उन की रोपाई निबटाएं.

* तुरई की नई नर्सरी डालने का इरादा हो, तो यह काम फौरन खत्म करें. ज्यादा देर करने पर नर्सरी डालने का समय बीत जाएगा.

* खेत को अच्छी तरह तैयार करने के बाद बारिश के मौसम वाली भिंडी की बोआई करें. बोआई से पहले निराईगुड़ाई कर के खेत के तमाम खरपतवार निकालना न भूलें.

* अगर प्याज के खेतों में नमी कम लगे तो तुरंत हलकी सिंचाई करें. मई के अंत तक प्याज की पत्तियों को खेत पर झुका दें, ऐसा करने से प्याज की गांठें बेहतरीन होंगी.

* मई में लहसुन की फसल तैयार हो जाती है, लिहाजा उस की खुदाई करें. खुदाई के बाद फसल को 3 दिनों तक खेत में सूखने दें. 3 दिन बाद लहसुनों को उठा कर साफ व सूखी जगह पर रखें.

* मई में अकसर लीची के फलों के फटने की शिकायत सामने आती है. इस की रोकथाम के लिए लीची के गुच्छों व पेड़ों पर पानी का अच्छी तरह छिड़काव करना फायदेमंद रहता है.

* आम, अमरूद, नाशपाती, आलूबुखारा, पपीता, लीची व आंवला के बगीचों की 10-15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करते रहें. इस दौरान सिंचाई में लापरवाही बरतना ठीक नहीं है, क्योंकि गरमी से बागों का पानी बहुत तेजी से सूखता है.

* अगर औषधीय फसल तुलसी की बोआई करनी हो तो इस के लिए मई का महीना सही रहता है.

* मई में ही औषधीय फसल सफेद मूसली भी बो दें. यह बहुत ज्यादा फायदे वाली फसल होती है.

* औषधीय फसल सर्पगंधा की नर्सरी डालने के लिहाज से भी मई का महीना बेहद खास होता है.

* मई के तीसरे हफ्ते में पहाड़ी इलाकों में रामदाना की बोआई करें. बोआई से पहले बीजों को फफूंदीनाशक से उपचारित करें.

* मई में अकसर मछली पालने वाले तालाब सूखने लगते हैं, लिहाजा उन की मरम्मत कराएं ताकि उन का पानी बाहर न निकल सके. तालाब की सफाई का भी खयाल रखें. इस बात का खयाल रखें कि कोई भी तालाब में कचरा न डालने पाए.

* मई में मवेशियों को लू लगने का खतरा बढ़ जाता है, लिहाजा उन्हें बारबार साफ व ताजा पानी पिलाएं. लू लगने पर पशु के सिर पर बर्फ की पोटली रखें व पशु डाक्टर से इलाज कराएं.

* गरमी की वजह से गायभैंस के छोटे बच्चों को अकसर दस्त की बीमारी हो जाती है, ऐसे में उन्हें दूध कम पीने दें. बीमार बच्चे को दूसरे बच्चों से अलग रखें. जरूरी लगे तो डाक्टर को बुलाएं.

* मुरगियों को गरमी से बचाने के लिए उन के शेडों के अंदर कूलरों का इंतजाम करें या शेड की जालियों पर जूट के परदे लगा कर उन्हें पानी से भिगोते रहें. चूंकि मुरगियां नाजुक होती हैं, लिहाजा उन का खास खयाल रखना पड़ता है.

* मवेशियों के खाने का भी पूरा खयाल रखें. उन्हें बासी व खराब चारा न दें, वरना हैजा होने का खतरा रहता है. ऐसे में पशु को बचाना कठिन हो जाता है.

Farming Task

* आम के नए बाग लगाने के लिए 12×12 मीटर पर गड्ढों की खुदाई करें. नर्सरी में बीजू पौधों की सिंचाई करें और खरपतवार निकालें. फलों का चिडि़यों से बचाव करें. अगेती किस्मों के फलों की तोड़ाई करें और उन्हें बाजार में भेजने का इंतजाम करें.

* केले के पौधों में 50-60 ग्राम यूरिया प्रति पौधे की दर से मिलाएं. कीटों की रोकथाम के लिए कार्बोफ्यूरान 3 जी या फोरेट 10 जी 1 चाय चम्मच भर गोफे में डालें. फलों और डंठलों पर कालेभूरे धब्बे दिखाई देने पर कौपर औक्सीक्लोराइड 0.3 फीसदी के घोल का छिड़काव करें. इस के अलावा 5-7 दिनों के अंतर पर सिंचाई करें और नया बाग लगाने के लिए खेत की तैयारी और गड्ढ़ों की खुदाई करें.

* नीबूवर्गीय फलों के बाग की सिंचाई करें. कैंकर व्याधि और सफेद मक्खी का नियंत्रण संस्तुत विधियों के मुताबिक करें. नए बाग लगाने के लिए 6×6 मीटर पर गड्ढों की खुदाई करें.

* अमरूद के बागों में हलकी जुताई करने के बाद सिंचाई करें. सूखी टहनियों को निकाल दें.

* लीची के फलों को फटने से बचाने के लिए जमीन में सिंचाई द्वारा सही नमी बनाए रखें. नए बाग के लिए 10×10 मीटर की दूरी पर गड्ढों की खुदाई करें.

* अंगूर में 7 से 10 दिनों के अंतर पर सिंचाई करें. फल पकने की स्थिति से 1 हफ्ते पहले सिंचाई बंद कर दें. फल के गुणों में बढ़ोत्तरी के लिए इथ्रेल 1 मिलीलिटर प्रति 4 लिटर पानी की दर से या जिब्रेलिक एसिड की संस्तुत मात्रा का पौधों पर पर्णीय छिड़काव करें. फसल सुरक्षा के लिए जाल का इस्तेमाल करें.

* आंवले के नए बाग रोपने के लिए 8-10 मीटर की दूरी पर गड्ढों की खुदाई करें और नए रोपे गए बागों की 10-15 दिनों के अंतर पर सिंचाई करें.

* पपीते की फसल में लिंग भेद साफ होने पर नर पौधों को निकालें और जरूरत के मुताबिक सिंचाई का काम करें.

सब्जी और मसाले

* गरमियों में पैदा होने वाली सब्जियों की सिंचाई, तोड़ाई और उन्हें बाजार भेजने का काम करें.

* टमाटर, बैगन, मिर्च की फसलों में जरूरत के मुताबिक सिंचाई करें. फलों की तोड़ाई और बाजार का काम करें. टमाटर और बैगन के फलों से बीज निकालें. मिर्च के पके फलों को तोड़ कर सुखाने और बीज निकालने का काम करें.

* भिंडी की फसल में सिंचाई करें.

* फलों की तोड़ाई और बाजार ले जाने का इंतजाम करें. पकी फलियों को तोड़ने के बाद सुखा कर बीज निकालने का काम करें. बीमार और बेकार पौधों को उखाड़ कर जमीन में दबा दें.

* लहसुन और प्याज की खुदाई और उन्हें छाया में सुखाने का काम करें. छंटाई कर के उन्हें हवादार कमरों में रखें. लहसुन में पत्तियों सहित बंडल बना कर रखने से नुकसान कम होता है.

फूल और सुगंधित फसलें

* गुलाब की फसल में जरूरत के मुताबिक सिंचाई करें.

* रजनीगंधा में 15 दिनों के अंतराल पर दिए गए पोषक तत्त्व के मिश्रण को 400 लटर पानी में मिला कर प्रति एकड़ की दर से पर्णीय छिड़काव (फसल अवधि में कुल 16 छिड़काव) करें.

यूरिया 1.108 किलोग्राम, डीएपी 1.308 किलोग्राम, पोटैशियम नाइट्रेट 0.875 किलोग्राम, टी पाल 0.1 फीसदी.

* मेंथा में 10-12 दिनों के अंतर पर सिंचाई और निराईगुड़ाई करें. नाइट्रोजन की बची एकतिहाई मात्रा (40-50 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर) की टौप ड्रेसिंग का काम करें.

बाजरे (Millet) की वैज्ञानिक खेती

सूखे मौसम या कम सिंचाई वाले खेतों के लिए बाजरा बहुत ही उम्दा फसल है. यही वजह है कि बाजरे की खेती राजस्थान के अलावा उत्तर प्रदेश, हरियाणा, महाराष्ट्र, गुजरात, ओडिशा व पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर की जाती है.

बाजरा मोटे अनाजों की कैटीगरी में आता है. इस की खेती गरमियों में भी कर सकते हैं. यह कई रोगों को दूर करने के साथ शरीर को भी फिट रखने में कारगर है. यही वजह है कि शहरों में लोग इस की ऊंची कीमत देने को तैयार रहते हैं.

मिट्टी : बाजरे की खेती के लिए हलकी या बलुई दोमट मिट्टी अच्छी मानी गई है. साथ ही पानी के निकलने का अच्छा बंदोबस्त होना चाहिए.

खेत की तैयारी : पहली बार की जुताई मिट्टी पलटने वाले हल या रोटावेटर से करें और उस के बाद 2-3 बार देशी हल या कल्टीवेटर से जुताई कर के खेत को तैयार करें.

बोआई का समय और विधि : बोआई का सही समय जुलाई से ले कर अगस्त माह तक है. ध्यान रहे कि इस की बोआई लाइन से करने पर ज्यादा फायदा होता है. लाइन से लाइन की दूरी 40 सैंटीमीटर और पौध से पौध की दूरी 10 से 15 सैंटीमीटर रखें. बीज बोने की गहराई तकरीबन 4 सैंटीमीटर तक ठीक रहती है.

बीज दर और उपचार: इस की बोआई के लिए प्रति हेक्टेयर 4-5 किलोग्राम बीजों की जरूरत होती है. बीजों को 2.5 ग्राम थीरम या 2 ग्राम कार्बंडाजिम से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर लेना चाहिए. अरगट के दानों को 20 फीसदी नमक के घोल में डाल कर निकाला जा सकता है.

खरपतवार पर नियंत्रण : बाजरे की फसल में खरपतवार ज्यादा उगते हैं. बेहतर होगा कि खरपतवारों को निराईगुड़ाई कर के निकाल दें. इस से एक ओर जहां मिट्टी में हवा और नमी पहुंच जाती है, वहीं दूसरी ओर खरपतवार भी नहीं पनप पाते हैं.

खरपतवारों की कैमिकल दवाओं से रोकथाम करने के लिए एट्राजीन 0.50 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से 800-1000 लिटर पानी में मिला कर बोआई के बाद व जमाव से पहले एकसमान रूप से छिड़काव कर देना चाहिए.

खाद और उर्वरक : खाद और उर्वरकों का इस्तेमाल खेत की मिट्टी की जांच के आधार पर करना चाहिए. हालांकि मोटेतौर पर संकर प्रजातियों में हाईब्रिड के लिए 80-100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम फास्फोरस और 40 किलोग्राम पोटाश व देशी प्रजातियों के लिए 40-50 किलोग्राम नाइट्रोजन, 25 किलोग्राम फास्फोरस व 25 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए.

फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन की आधी मात्रा बोआई से पहले इस्तेमाल करें. उस के बाद नाइट्रोजन की बची आधी मात्रा टौप ड्रेसिंग के रूप में जब पौधे 25-30 दिन के हो जाएं तो छिटक कर छिड़काव करें.

सिंचाई : बाजरे की फसल बारिश के मौसम में उगाई जाती है. बरसात का पानी ही इस के लिए सही होता है. यदि बरसात का पानी न मिल सके तो फूल आने पर जरूरत के मुताबिक सिंचाई करनी चाहिए.

बाजरे (Millet)

खास रोगों का उपचार

बाजरे का अरगट : यह रोग क्लेविसेप्स माई क्रोसिफैला नामक कवक से फैलता है. यह रोग बालियों या बालियों के कुछ ही दानों पर ही दिखाई देता है. इस में दाने की जगह पर भूरे काले रंग की सींग के आकार की गांठें बन जाती हैं. इसे स्केलेरोशिया कहते हैं. प्रभावित दाने इनसानों और जानवरों के लिए नुकसानदायक होते हैं, क्योंकि उन में जहरीला पदार्थ होता है. इस रोग की वजह से फूलों में से हलके गुलाबी रंग का गाढ़ा और चिपचिपा पदार्थ निकलता है. रोग ग्रसित बालियों पर फफूंद जम जाता है.

रोकथाम : बोने से पहले 20 फीसदी नमक के घोल में बीजों को डुबो कर स्केलेरोशिया अलग किए जा सकते हैं. खड़ी फसल में इस की रोकथाम के लिए फूल आते ही घुलनशील जिरम 80 फीसदी चूर्ण 1.5 किलोग्राम या जिनेब 75 फीसदी चूर्ण 2 किलोग्राम या मैंकोजेब चूर्ण को 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 5-7 दिन के अंतराल पर छिड़कना चाहिए.

कंडुआ : यह रोग टालियोस्पोरियम पेनिसिलेरी कवक से लगता है. इस रोग में दाने आकार में बड़े, गोल अंडाकार व हरे रंग के हो जाते हैं. इन में काला चूर्ण भरा होता है. मंड़ाई करते समय ये दाने फूट जाते हैं, जिस से उन में से काला चूर्ण निकल कर सेहतमंद दानों पर चिपक जाता है.

रोकथाम : इस की रोकथाम के लिए किसी पारायुक्त कैमिकल से बीज उपचारित कर के बोने चाहिए. सावधानी के लिए एक ही खेत में हर साल बाजरे की खेती नहीं करनी चाहिए.

हरित बाली रोग : इसे डाउनी मिल्ड्यू नाम से जाना जाता है. रोगकारक स्केलेरोस्पोरा ग्रैमिनीकोला पत्तियों पर पीलीसफेद धारियां पड़ जाती हैं. इस के नीचे की तरफ रोमिल फफूंदी की बढ़वार दिखाई देती है. बाल निकलने पर बालों में दानों की जगह पर टेढ़ीमेढ़ी हरी पत्तियां बन जाती हैं और बाली गुच्छे या झाड़ू सी दिखाई देती है.

रोकथाम : शोधित बीज ही बोने चाहिए. रोग से ग्रसित पौधे को जला दें और फसल चक्र अपनाएं. शुरुआती अवस्था में जिंक मैगनिज कार्बामेट या जिनेब 0.2 फीसदी को पानी में घोल कर छिड़काव करें.

मुख्य कीट

तनामक्खी कीट : यह कीट बाजरे का दुश्मन है, जो फसल की शुरुआती अवस्था में बहुत नुकसान पहुंचाता है. जब फसल 30 दिन की होती है तब तक कीट से फसल को 80 फीसदी नुकसान हो जाता है.

इस के नियंत्रण के लिए बीज को इमिडाक्लोरोप्रिड गोचो 14 मिलीलिटर प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर के बोआई करनी चाहिए और बोआई के समय बीज की मात्रा 10 से 12 फीसदी ज्यादा रखनी चाहिए.

जरूरी हो तो अंकुरण के 10-12 दिन बाद इमिडाक्लोप्रिड 200 एसएल 5 मिलीलिटर प्रति 10 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए. फसल काटने के बाद खेत में गहरी जुताई करें और फसल के अवशेषों को इकट्ठा कर के जला दें.

तनाभेदक कीट : तनाभेदक कीट का प्रकोप फसल में 10 से 15 दिन से शुरू हो कर फसल के पकने तक रहता है. इस के नियंत्रण के लिए फसल काटने के बाद खेत में गहरी जुताई करें और फसल के अवशेषों को जला दें.

खेत में बोआई के समय कैमिकल खाद के साथ 10 किलोग्राम की दर से फोरेट 10 जी अथवा कार्बोफ्यूरान दवा खेत में अच्छी तरह मिला दें और बोआई 15-20 दिन बाद इमिडाक्लोरोप्रड 200 एसएल 5 मिलीलिटर प्रति 10 लिटर या कार्बोरिल 50 फीसदी घुलनशील पाउडर 2 ग्राम प्रति लिटर पानी में घोल बना कर 10 दिन के अंतराल पर 2 छिड़काव करें.

टिड्डा कीट : यह बाजरे की फसल को छोटी अवस्था से ले कर फसल पकने तक नुकसान पहुंचाता है. यह कीट पत्तों के किनारों को खा कर धीरेधीरे पूरी पत्तियों को खा जाता है. बाद में फसल में केवल मध्य शिराएं और पतला तना ही रह जाता है.

इस के नियंत्रण के लिए फसल में कार्बोरिल 50 फीसदी घुलनशील पाउडर 2 ग्राम प्रति लिटर पानी में घोल बना कर 10 से 15 दिन के अंतराल पर 2 छिड़काव करें.

पक्षियों से बचाव : बाजरा पक्षियों का मुख्य भोजन है. फसल में जब दाने बनने लगते हैं तो सुबहशाम पक्षियों से बचाव करना बहुत ही जरूरी है.

गाजर घास (Carrot Grass) से फसल का बचाव

गाजर घास की 20 प्रजातियां पूरे विश्व में पाई जाती हैं. गाजर घास की उत्पत्ति का स्थान दक्षिण मध्य अमेरिका है. अमेरिका, मैक्सिको, वेस्टइंडीज, चीन, नेपाल, वियतनाम और आस्ट्रेलिया के विभिन्न भागों में फैला यह खरपतवार भारत में अमेरिका या कनाडा से आयात किए गए गेहूं के साथ आया.

हमारे देश में साल 1951 में सब से पहले पूना में नजर आने के बाद यह विदेशी खरपतवार करीब 35 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में फैल चुका है. यह खरपतवार जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, अरुणाचल प्रदेश और नागालैंड के विभिन्न भागों में फैला हुआ है.

गाजर घास को देश के विभिन्न भागों में अलगअलग नामों जैसे कांग्रेस घास, सफेद टोपी, चटक चांदनी व गंधी बूटी आदि नामों से जाना जाता है. कांग्रेस घास इस का सब से ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला नाम है. यह घास खाली जगहों, बेकार जमीनों, औद्योगिक क्षेत्रों, बगीचों, पार्कों, स्कूलों, सड़कों और रेलवे लाइनों के किनारों पर बहुतायत में पाई जाती है. पिछले कुछ सालों से इस का प्रकोप सभी तरह की खाद्यान्न फसलों, सब्जियों व फलों में बढ़ता जा रहा है.

वैसे तो गाजर घास पानी मिलने पर साल भर फलफूल सकती है, पर बारिश के मौसम में ज्यादा अंकुरण होने पर यह खतरनाक खरपतवार का रूप ले लेती है. गाजर घास का पौधा 3-4 महीने में अपना जीवनचक्र पूरा कर लेता है. 1 साल में इस की 3-4 पीढि़यां पूरी हो जाती हैं.

करीब डेढ़ मीटर लंबे गाजर घास के पौधे का तना काफी रोएंदार और शाखाओं वाला होता है. इस की पत्तियां काफी हद तक गाजर की पत्तियों की तरह होती हैं. इस के फूलों का रंग सफेद होता है. हर पौधा 1000 से 50000 बेहद छोटे बीज पैदा करता है, जो जमीन पर गिरने के बाद नमी पा कर अंकुरित हो जाते हैं.

गाजर घास के पौधे हर प्रकार के वातावरण में तेजी से बढ़ते हैं. ये ज्यादा अम्लीयता व क्षारीयता वाली जमीन में भी उग सकते हैं. इस के बीज अपनी 2 स्पंजी गद्दियों की मदद से हवा व पानी के जरीए एक स्थान से दूसरे स्थान तक आसानी से पहुंच जाते हैं.

गाजर घास से होने वाले नुकसान

* गाजर घास से इनसानों को एग्जिमा, एलर्जी, बुखार व दमा जैसी बीमारियां हो जाती हैं. इस का 1 परागकण भी इनसान को बीमार करने के लिए काफी है. इस के परागकण श्वसन तंत्र में घुस कर दमा व एलर्जी पैदा करते हैं. इस के  ज्यादा असर से इनसानों की मौत तक हो जाती है.

* गाजर घास की वजह से खाद्यान्नों की फसलों की पैदावार में 40 फीसदी तक की कमी आंकी गई है. इस से फसलों की उत्पादकता घट जाती है.

* इस पौधे से ऐलीलो रसायन जैसे पार्थेनिन, काउमेरिक एसिड, कैफिक ऐसिड वगैरह निकलते हैं, जो अपने आसपास

किसी अन्य पौधे को उगने नहीं देते हैं. इस से फसलों के अंकुरण और बढ़वार पर बुरा असर पड़ता है.

* गाजर घास के वन क्षेत्रों में तेजी से फैलने के कारण कई खास वनस्पतियां और जड़ीबूटियां खत्म होती जा रही हैं.

* दलहनी फसलों में यह खरपतवार जड़ ग्रंथियों के विकास को प्रभावित करता है और नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले जीवाणुओं की क्रियाशीलता को कम कर देता है.

* इस के परागकण बैगन, मिर्च व टमाटर वगैरह सब्जियों के पौधों पर जमा हो कर उन के परागण, अंकुरण व फल विन्यास को प्रभावित करते हैं और पत्तियों में क्लोरोफिल की कमी व पुष्प शीर्षों में असामान्यता पैदा कर देते हैं.

* पशुओं के चारे में इस खरपतवार के मिल जाने से दुधारू पशुओं के दूध में कड़वाहट आने लगती है. ज्यादा मात्रा में इसे चर लेने से पशुओं की मौत भी हो सकती है.

गाजर घास के इस्तेमाल

* गाजर घास से कई तरह के कीटनाशक, जीवाणुनाशक और  खरपतवारनाशक बनाए जा सकते हैं.

* इस की लुगदी से कई तरह के कागज तैयार किए जा सकते हैं.

* बायोगैस उत्पादन में भी इसे गोबर के साथ मिलाया जा सकता है.

ऐसे करें रोकथाम

* बारिश के मौसम में गाजर घास को फूल आने से पहले जड़ से उखाड़ कर कंपोस्ट व वर्मी कंपोस्ट बनाना चाहिए.

* घर के आसपास गेंदे के पौधे लगा कर गाजर घास के फैलाव को रोका जा सकता है.

* मैक्सिकन बीटल (जाइगोग्रामा बाइकोलाराटा) रामकीट को बारिश के मौसम में गाजर घास पर छोड़ना चाहिए.

* गाजर घास की रासायनिक विधि द्वारा रोकथाम करने के लिए खरपतवार वैज्ञानिक की सलाह लेनी चाहिए.

* नमक के 20 फीसदी घोल से गाजर घास की रोकथाम की जा सकती है, पर यह विधि छोटे क्षेत्र के लिए ही ठीक है.

* गैर कृषि क्षेत्रों में इस की रोकथाम के लिए शाकनाशी रसायन एट्राजिन का इस्तेमाल फूल आने से पहले 1.5 किलोग्राम सक्रिय तत्त्व प्रति हेक्टेयर की दर से करना चाहिए. ऐसे क्षेत्रों में शाकनाशी रसायन जैसे ग्लाइफोसेट 1.5-2.0 फीसदी या मेट्रीब्यूजिन 0.3-0.5 फीसदी घोल का फूल आने से पहले छिड़काव करने से गाजर घास नष्ट हो जाती है.

* मक्का, ज्वार व बाजरा की फसलों में एट्राजिन 1-1.5 किलोग्राम सक्रिय तत्त्व प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई के तुरंत बाद (अंकुरण से पहले) इस्तेमाल करना चाहिए.

* जमीन को गाजर घास से बचाने के लिए सामुदायिक कोशिशें बहुत जरूरी हैं. गांवों, शहरी कालोनियों, स्कूलों, महाविद्यालयों में रहने या पढ़ने वाले लोगों को चाहिए कि वे अपने आसपास की जमीन को गाजर घास से मुक्त रखें. इसी तरह की कोशिशों से पंजाब राज्य के लुधियाना जिले का मनसूरा गांव पहला गाजर घास मुक्त क्षेत्र बन गया है.

* जगहजगह जा कर लोगों को गाजर घास के नुकसानों व रोकथाम के बारे में जानकारी दे कर उन्हें जागरूक करना चाहिए.

* हर साल अगस्तसितंबर में गाजर घास जागरूकता सप्ताह मनाया जाता है, क्योंकि अक्तूबरनवंबर में गाजर घास सब से ज्यादा होती है.

पार्थेनियम घास के नुकसान और उस पर काबू पाना

पार्थेनियम को अनेक नामों से जाना जाता है जैसे गाजर घास, सफेद टोपी, गंधी बूटी, चटक चांदनी, कांग्रेस घास वगैरह, पर इस का वानस्पतिक नाम पार्थेनियम हिस्टेरोफोरस है, इसलिए यह पार्थेनियम नाम से ही ज्यादा प्रचलित है.

यह एक सफेद फूलों वाली, सीधी खड़ी रहने वाली, बीज से पैदा होने वाली, एक से डेढ़ मीटर ऊंचाई वाली विदेशी घास या खरपतवार है. इस की पत्तियां किनारे से कटी होती हैं और वे गाजर या गुलदाऊदी फूल की पत्तियों जैसी होती हैं.

पार्थेनियम के फूल छोटे, आकर्षक और बहुत ज्यादा तादाद में होते हैं. प्रति पौधा तकरीबन 2,000 से ले कर 6,000 बीज और कभीकभार उस से भी ज्यादा बीज बनाता है, जो छोटे, हलके व काले रंग के होते हैं. ये फूल कई सालों तक सुषुप्तावस्था में पड़े रह सकते हैं.

माकूल हालात आने पर भी यह पौधा सालभर फलताफूलता रहता है और यह 3 से 4 महीनों में अपना जीवनचक्र पूरा कर लेता है. इस के तनों व पत्तियों पर बहुत छोटेछोटे रोएं पाए जाते हैं, जो बहुत तरह से नुकसान पहुंचाते हैं.

गाजर घास से नुकसान

* यह घास अपने छोटेछोटे हलके बीजों से, जिन की अंकुरण कूवत बहुत ज्यादा होती है, बहुत जल्दी हवा, पानी, पक्षी व जानवरों की मदद से फैलता है. इस के चलते यह फसलों के साथसाथ दूसरे वनस्पतियों को भी खत्म कर देती है.

रिसर्च में यह पाया गया है कि इस घास की जड़ों में जहरीले कैमिकलों का रिसाव होता है, जिस से दूसरी वनस्पति बहुत ज्यादा प्रभावित होती है. फसलोत्पादन में 40 फीसदी से भी ज्यादा हानि होती है और इस के नियंत्रण में होने वाले खर्च को अगर देखें, तो किसानों को बहुत कम मुनाफा होता है और कभीकभार नुकसान भी उठाना पड़ता है.

* दुनिया के तकरीबन 20 देशों में इस पार्थेनियम नामक खरपतवार का प्रकोप देखा गया है. भारत में यह खरपतवार पहली बार साल 1955 में पूना, महाराष्ट्र में दिखाई दिया था.

ऐसा माना जाता है कि अमेरिका से आयात किए गए गेहूं के साथ यह खरपतवार हमारे देश में आया था और अब भीषण प्रकोप की तरह पूरे देश में 35 मिलियन हेक्टेयर से ज्यादा क्षेत्र पर अपना कब्जा जमा चुका है. यह घास खेती के लिए ही नहीं, बल्कि जैव विविधता के लिए भी घातक बनती जा रही है.

* इस खरपतवार की जड़ों से एक तरह का तरल पदार्थ निकलता रहता है, जो मिट्टी को खराब करता है. यह पोषक तत्त्व व नमी का लगातार अवशोषण भी करता रहता है.

आमतौर पर वनस्पति या फसलों की तुलना में अवशोषण करने की क्षमता इस में ज्यादा होती है. मिट्टी धीरेधीरे अपनी उर्वरता खो कर बंजर जमीन में बदल जाती है.

* गाजर घास में पार्थेनिन नामक कैमिकल पाया जाता है, जो बहुत ही नुकसानदायक होता है. गाजर घास के संपर्क में आने से एक्जिमा, डर्मेटाइटिस, एलर्जी, बुखार, दमा जैसी कई बीमारियां हो जाती हैं. बहुत ज्यादा प्रभावित होने पर इनसान की मौत तक हो जाती है.

* बहुत ज्यादा हरा दिखने के चलते पशु इसे खाने के लिए दौड़ते हैं. कुछ पशु बहुत भूखे होने के चलते इसे खा भी लेते हैं, पर इस की खराब गंध होने के चलते ज्यादातर पशु नहीं खाते.

* जो पशु इसे खा लेते हैं, उन के मुंह में अल्सर हो जाता है. मुंह से लार निकलने लगती है और कभीकभार तो पशु मर भी जाते हैं, वहीं दुधारू पशुओं के दूध में गंध आ जाती है और एक जहरीला पदार्थ घुस जाता है, जिसे लेने से इनसानों में भी अनेक तरह की बीमारियां हो जाती हैं. इस से होने वाली दूसरी बीमारियों में त्वचा पर धब्बे, फफोले पड़ जाते हैं और आंख से पानी आने लगता है.

* कभीकभी यह घास सड़कों के मोड़ पर, पगडंडियों पर दोनों ओर उग कर गाडि़यों को चलाने में रुकावट पैदा करती है, तो कभीकभी पैदल चलने वालों के लिए परेशानी का सबब बन जाती है.

नियंत्रण के उपाय

गाजर घास के जहरीलेपन को देखते हुए उस के प्रभावी नियंत्रण के बारे में सभी को सामूहिक कोशिश करने की जरूरत है. जैसे, कोई दूसरी मुहिम चलाई जाती है, उसी तरह से पार्थेनियम मुहिम चलाने की जरूरत है.

वैसे, हर साल भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के सभी संस्थानों और उस के अधीन सभी केंद्रों व कार्यालयों को 16 से 22 अगस्त तक पार्थेनियम जागरूकता अभियान मनाने का निर्देश रहता है. इस के तहत पूरे हफ्ते अनेक कार्यक्रम किए जाते हैं. किसानों, आम नागरिकों, छात्रों को पार्थेनियम या गाजर घास के नुकसान व नियंत्रण के तरीकों के बारे में बताया जाता है.

नियंत्रण की विधियां

निवारक विधि : पार्थेनियम के पौधों को इस के वानस्पतिक बढ़वार वाली अवस्था यानी फूल आने से पहले जड़ से उखाड़ कर नष्ट कर देना चाहिए.

जड़ उखाड़ने से पहले हाथों में दस्ताने पहन लेने चाहिए और शरीर के संपर्क से दूर रखते हुए उखाड़ना चाहिए, पर यह किसी एक की कोशिश से नहीं होगा. इस के लिए सामूहिक अभियान चलाने की जरूरत है.

गरमियों में खेत की गहरी जुताई करनी चाहिए, ताकि इस के बीज ऊपर आ जाएं और नष्ट हों. गाजर घास की मार झेल रहे खेत की मिट्टी को दूसरे खेतों में न ले जाएं, जहां से पार्थेनियम के पौधों को उखाड़ कर नष्ट किया गया हो. उन जगहों का निरीक्षण करते रहना चाहिए, क्योंकि वहां पहले से पड़े बीजों से पौधे फिर से आ सकते हैं.

रासायनिक विधि : शाकनाशी दवाओं का इस्तेमाल बहुत ही आसानी से इसे नियंत्रित कर सकता है. इन कैमिकलों में एट्राजिन, एलाक्लोर, डाययुरान, मैट्रिब्युजिन, 2-4 डी, ग्लाइफोसेट वगैरह खास हैं.

गाजर घास के पौधे जब छोटे हों, तब अगर इन दवाओं का इस्तेमाल किया गया है तो बहुत ही कारगर होता है, वरना बाद में इस की शाखाएं कड़ी हो जाती हैं और नियंत्रण मुश्किल होता है.

गाजर घास के साथ उगी दूसरी घासों या वनस्पतियों के नियंत्रण के लिए ग्लाइफोसेट 1 से 1.5 फीसदी (10 से 15 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी) और घास कुल के पौधों को नष्ट करने के लिए मैट्रिब्युजिन 0.3 से 0.5 फीसदी (3 से 5 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी) का छिड़काव किया जा सकता है.

जैविक विधि : गाजर घास पर काबू पाने के लिए कुछ वनस्पतियां जैसे चकोड़, जंगली चौलाई, हिप्टिस वगैरह को इस्तेमाल में लाया जा सकता है. चकोड़ के बीज अक्तूबरनवंबर माह में इकट्ठा कर लें और अप्रैलमई माह में गाजर घास के क्षेत्रों में बिखेर दें. बरसात शुरू होते ही चकोड़ के पौधे निकलेंगे और जल्दी ही बढ़ कर गाजर घास को नियंत्रित करेंगे.

चकोड़ एक चौड़ी पत्ती वाली घास है. इसे साग के रूप में खाया भी जाता है. यह लैग्यूमिनस कुल का पौधा है और जमीन को फायदा भी पहुंचाता है.

गाजर घास को एक बीटल यानी कीट, जिसे मैक्सिकन बीटल (जाइगोग्रामा वाइकोलोराटा) कहा जाता है का इस्तेमाल करने से भी नियंत्रण पाया जा सकेगा. इस के पूरे पौधे यानी पत्तियों, तना व फूल को खा कर ये पौधों को सुखा कर मार देते हैं.

ये बीटल सिर्फ गाजर घास को ही खाते हैं और इन की तादाद बहुत तेजी से बढ़ती है. एक जगह पर पौधों को चट करने के बाद ये बीटल दूसरी जगह गाजर घास के पौधों पर अपना भरणपोषण करने के लिए चले जाते हैं. नतीजतन, फसल का सफाया होने लगता है. साथ ही, इस का प्रयोग कंपोस्ट बनाने में भी किया जा सकता है. इस के फूल आने से पहले उखाड़ कर कंपोस्ट पिट में डाल कर कंपोस्ट बनाया जा सकता है. वर्मी कंपोस्ट (केंचुआ खाद) बनाने में भी इसे उपयोग में ला सकते हैं.

सामूहिक अभियान चला कर ही इस खतरनाक गाजर घास को समूल नष्ट किया जा सकता है.

ओरोबैंकी से बचाएं सरसों की समस्या

कई फसलों खासकर  सरसों, बैगन, टमाटर, फूलगोभी, पत्तागोभी, तंबाकू,  शलजम वगैरह पर हमला करने वाले ओरोबैंकी यानी ब्रूमरेप खरपतवार की खास बात यह है कि इस की हर किस्म पूरी तरह से परजीवी होती है.

ओरोबैंकी सेरेनुआ इस की एक दूसरी किस्म है, जो बिहार इलाके में सरसों की फसल पर परजीवी है. सरसों की फसल में इस के प्रकोप से 10 से 70 फीसदी तक का नुकसान होता है. यह परजीवी सरसों उगाए जाने वाले सभी इलाकों जैसे राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, पश्चिम बंगाल व ओडिशा में पाया जाता है.

ओरोबैंकी से ग्रस्त सरसों के पौधे छोटे रह जाते हैं और कभीकभी मर भी जाते हैं. ओरोबैंकी के चूपकांग यानी हास्टोरिया सरसों की जड़ों में घुस कर पोषक तत्त्व हासिल करते हैं. पौधों को उखाड़ कर देखें, तो ओरोबैंकी की जड़ें सरसों की जड़ों के अंदर घुसी हुई दिखती हैं. सरसों के पौधों के नीचे मिट्टी से निकलते हुए ओरोबैंकी परजीवी दिखाई पड़ते हैं.

ओरोबैंकी का तना गूदेदार होता है और इस की लंबाई 15 से 50 सैंटीमीटर होती है. तना हलका पीला या बैगनीलालभूरे रंग का होता है, जो पतली भूरी पत्तियों की परतों से ढका रहता है. फूल पत्तियों के कक्ष से निकलते हैं, जो सफेद नली के आकार के होते हैं.

यह अंडाकार बीजयुक्त फलियां बनाता है, जो तकरीबन 5 सैंटीमीटर लंबा होता है व जिन में सैकड़ों की संख्या में छोटेछोटे काले बीज होते हैं. ये बीज मिट्टी में कई सालों तक जिंदा रहते हैं.

ओरोबैंकी के बीज मिट्टी में 10 साल से भी ज्यादा समय तक जिंदा रह सकते हैं. इस के बीजों का जमाव तभी होता है, जब सरसों कुल के पौधों की जड़ें सरसों की जड़ों की ओर बढ़ती हैं व करीबी संबंध बना कर उन से जुड़ जाती हैं. इस से ओरोबैंकी फसल द्वारा बनाए गए भोजन को ले कर अपनी बढ़वार करता है. वह तकरीबन एक महीने तक मिट्टी में ही बढ़वार कर अंगूठे के आकार के जमीनी तने में भोजन इकट्ठा करता रहता है.

इस के बाद सरसों की 50 से 60 दिन की अवस्था के दौरान यह मिट्टी से बाहर निकल कर बढ़ता है. बाहर आने के बाद भी यह हरे पत्ते नहीं बना कर परजीवी ही बना रहता है. इस के बाद इस में फूल आ जाते हैं और अनगिनत छोटेछोटे बीज बन जाते हैं. यह सारी प्रक्रिया तनों के उगने से ले कर बीज बन कर बिखरने तक 2 महीने में पूरी हो जाती है.

रोकथाम के उपाय

 

Sarson

*           नए इलाकों में ओरोबैंकी के बीज का प्रवेश नहीं होने देना चाहिए और परजीवी के बीजरहित सरसों के शुद्ध बीज का इस्तेमाल करना चाहिए.

*           ओरोबैंकी परजीवी को हाथ से उखाड़ कर या निराईगुड़ाई द्वारा जमीन के ऊपर के तने को काट कर बीज बनने से पहले ही खत्म कर देना चाहिए.

*           यदि बीज बन गए हों, तो पौधों को सावधानी से निकालना चाहिए, जिस से बीज मिट्टी में नहीं मिलें.

*           जिन इलाकों में बहुत ज्यादा हमला होता है, वहां सरसों की फसल टै्रप क्रौप के रूप में बोनी चाहिए. 30 से 40 दिन में परजीवी के पौधे बाहर निकलते दिखाई दें, तो गहरी जुताई कर के सरसों सहित इस के जमीनी तने को खत्म कर इस के बाद दूसरी फसल बो दें.

*           जब तक ओरोबैंकी पर पूरी तरह काबू नहीं हो जाता, सरसों की जगह पर अरंडी की फसल बोएं, क्योंकि अरंडी एक सालाना फसल है. इस से परजीवी को रोकने में मदद मिलेगी.

*           कुछ पौधों, जैसे मिर्च को बोने से ओरोबैंकी के बीजों का जमाव हो जाता है, लेकिन मिर्च की फसल को इस परजीवी से कोई नुकसान नहीं होता है. इस तरह मिट्टी में मौजूद ओरोबैंकी के बीजों को जमा कर इस फसल का टै्रप फसल के रूप में इस्तेमाल कर परजीवी के पौधों को खत्म किया जा सकता है. इस तरह मिर्चसरसों का फसल चक्र अपनाने से इस परजीवी पर कुदरती तौर पर काबू पाया जा सकता है.

*           लंबे समय तक फसल चक्र अपना कर इस की ज्यादती को रोका जा सकता है.

*           पौधों की मिट्टी की सतह के पास 25 फीसदी ताम्रघोल का छिड़काव कर के यह परजीवी खत्म किया जा सकता है.

*           ओरोबैंकी पौधों पर सोयाबीन के तेल की 2 बूंदें डाल देने से पौधा मर जाता है.

*           सरसों की रोगरोधी किस्म दुर्गामणि की बोआई करें.

गाजर घास से फसल का बचाव

गाजर घास की 20 प्रजातियां पूरे विश्व में पाई जाती हैं. गाजर घास की उत्पत्ति का स्थान दक्षिणमध्य अमेरिका है. अमेरिका, मैक्सिको, वेस्टइंडीज, चीन, नेपाल, वियतनाम और आस्ट्रेलिया के विभिन्न भागों में फैला यह खरपतवार भारत में अमेरिका या कनाडा से आयात किए गए गेहूं के साथ आया.

हमारे देश में साल 1951 में सब से पहले पूना में नजर आने के बाद यह विदेशी खरपतवार तकरीबन 35 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में फैल चुका है.

गाजर घास को देश के विभिन्न भागों में अलगअलग नामों जैसे कांग्रेस घास, सफेद टोपी, चटक चांदनी व गंधी बूटी वगैरह नामों से जाना जाता है. कांग्रेस घास इस का सब से ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला नाम है.

वैसे तो गाजर घास पानी मिलने पर सालभर पनपती है, पर बारिश के मौसम में ज्यादा अंकुरण होने पर यह खतरनाक खरपतवार का रूप ले लेती है. गाजर घास का पौधा 3-4 महीने में अपना जीवनचक्र पूरा कर लेता है यानी 1 साल में इस की 3-4 पीढि़यां पूरी हो जाती हैं.

तकरीबन डेढ़ मीटर लंबी गाजर घास के पौधे का तना काफी रोएंदार और शाखाओं वाला होता है. इस की पत्तियां असामान्य रूप से गाजर की पत्तियों की तरह होती हैं. इस के फूलों का रंग सफेद होता है. हर पौधा 1,000 से 50,000 बेहद छोटे बीज पैदा करता है, जो जमीन पर गिरने के बाद नमी पा कर अंकुरित हो जाते हैं.

गाजर घास के पौधे हर प्रकार के वातावरण में तेजी से बढ़ते हैं. ये ज्यादा अम्लीयता व क्षारीयता वाली जमीन में भी उग सकते हैं. इस के बीज अपनी 2 स्पंजी गद्दियों की मदद से हवा व पानी के जरीए एक स्थान से दूसरे स्थान तक आसानी से पहुंच जाते हैं.

गाजर घास के नुकसान

* गाजर घास से इनसानों को एग्जिमा, एलर्जी, बुखार व दमा जैसी बीमारियां हो जाती हैं. इस का 1 पराग कण भी इनसान को बीमार करने के लिए काफी है. इस के पराग कण सांस नली में घुस कर दमा व एलर्जी पैदा करते हैं. इस के ज्यादा असर से इनसानों की मौत तक हो जाती है.

* गाजर घास की वजह से खाद्यान्नों की फसलों की पैदावार में 40 फीसदी तक की कमी आंकी गई है. इस से फसलों की उत्पादकता घट जाती है.

* इस पौधे से एलीलो रसायन जैसे पार्थेनिन, काउमेरिक एसिड, कैफिक एसिड वगैरह निकलते हैं, जो अपने आसपास किसी अन्य पौधे को उगने नहीं देते हैं. इस से फसलों के अंकुरण और बढ़वार पर बुरा असर पड़ता है.

* गाजर घास के वन क्षेत्रों में तेजी से फैलने के कारण कई खास वनस्पतियां और जड़ीबूटियां खत्म होती जा रही हैं.

* दलहनी फसलों में यह खरपतवार जड़ ग्रंथियों के विकास को प्रभावित करता है और नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने वाले जीवाणुओं की क्रियाशीलता को कम कर देता है.

* इस के परागकण बैगन, मिर्च व टमाटर वगैरह सब्जियों के पौधों पर जमा हो कर उन के परागण, अंकुरण व फल विन्यास को प्रभावित करते हैं और पत्तियों में क्लोरोफिल की कमी व पुष्प शीर्षों में असामान्यता पैदा कर देते हैं.

* पशुओं के चारे में इस खरपतवार के मिल जाने से दुधारू पशुओं के दूध में कड़वाहट आने लगती है. ज्यादा मात्रा में इसे चर लेने से पशुओं की मौत भी हो सकती है.

यों करें रोकथाम

* बारिश के मौसम में गाजर घास को फूल आने से पहले जड़ से उखाड़ कर कंपोस्ट व वर्मी कंपोस्ट बनाना चाहिए.

* घर के आसपास गेंदे के पौधे लगा कर गाजर घास के फैलाव को रोका जा सकता है.

* गाजर घास की रासायनिक विधि द्वारा रोकथाम करने के लिए खरपतवार वैज्ञानिक की सलाह लेनी चाहिए.

* नमक के 20 फीसदी घोल से गाजर घास की रोकथाम की जा सकती है, पर यह विधि छोटे क्षेत्र के लिए ही ठीक है.

सामुदायिक कोशिशें

* जमीन को गाजर घास से बचाने के लिए सामुदायिक कोशिशें बहुत जरूरी हैं. गांवों, शहरी कालोनियों, स्कूलों, महाविद्यालयों में रहने या पढ़ने वाले लोगों को चाहिए कि वे अपने आसपास की जमीन को गाजर घास से मुक्त रखें. इसी तरह की कोशिशों से पंजाब राज्य के लुधियाना जिले का मनसूरा गांव पहला गाजर घास मुक्त क्षेत्र बन गया है.

* जगहजगह जा कर लोगों को गाजर घास के नुकसानों व रोकथाम के बारे में जानकारी दे कर उन्हें जागरूक करना चाहिए.

* हर साल अगस्तसितंबर माह में गाजर घास जागरूकता सप्ताह मनाया जाता है, क्योंकि अक्तूबरनवंबर में गाजर घास बहुत ज्यादा होती है.

गाजर घास के इस्तेमाल

* गाजर घास का इस्तेमाल तमाम किस्म के कीटनाशक, जीवाणुनाशक और खरपतवारनाशक बनाने में किया जा सकता है.

* इस की लुगदी से कई तरह के कागज तैयार किए जा सकते हैं.

* बायोगैस उत्पादन में भी इसे गोबर के साथ मिलाया जा सकता है.

आलू की खेती

हमारे देश में गेहूंचावल के बाद आलू की अच्छीखासी पैदावार होती है. उत्तर प्रदेश में सब से ज्यादा आलू की खेती की जाती है.

कई बार आलू की खेती से किसान अच्छाखासा मुनाफा कमाते हैं, लेकिन कभीकभार यही ज्यादा पैदावार किसानों के लिए घाटे का सौदा भी बन जाती है, इसलिए सब से पहले हमें आलू की बोआई में अच्छी किस्मों का इस्तेमाल करना चाहिए जो रोगरहित हों.

केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला ने आलू की 3 नई किस्में तैयार की हैं. संस्थान द्वारा विकसित ये नई किस्में कुफरी गंगा, कुफरी नीलकंठ और कुफरी लीमा हैं. आलू की ये प्रजातियां मैदानी इलाकों में आसानी से पैदा होंगी. किसान आलू की नई किस्में लगा कर अच्छी पैदावार ले सकते  हैं.

ये आलू पकने में आसान हैं और इन का स्वाद भी अच्छा है. कम समय में अधिक पैदावार होगी. 70 से 135 दिन की अलगअलग कुफरी किस्म की फसल से प्रति हेक्टेयर 350 से 400 क्विंटल तक पैदावार ली जा सकती है.

देश के केंद्रीय आलू अनुसंधान संस्थान, शिमला ने विभिन्न जलवायु क्षेत्रों के लिए अब तक 51 आलू की प्रजातियां विकसित की हैं. इन में से कुछ चुनिंदा किस्मों की जानकारी दी गई है. इन प्रजातियों को देश के अलगअलग इलाकों में लगाया जाता है.

देश की जलवायु और भौगोलिक परिस्थितियों के मुताबिक पूरे साल कहीं न कहीं आलू की खेती होती रहती है. उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार, मध्य प्रदेश, पंजाब और हिमाचल प्रदेश आलू के उत्पादन में अग्रणी राज्य माने जाते हैं. देश में सब से ज्यादा आलू उत्पादन उत्तर प्रदेश में होता है. देश के कुल उत्पादन में 32 फीसदी हिस्सेदारी उत्तर प्रदेश की है.

किसानों को चाहिए कि वे आलू की खेती करने के लिए अपने इलाके के हिसाब से बेहतर बीज का चुनाव करें और समय पर फसल बोएं. आलू बीज का आकार भी आलू की पैदावार में खासा माने रखता है.

फसल से अच्छी पैदावार लेने के लिए जमीन समतल और पानी के अच्छे निकास की सुविधा होनी चाहिए. आलू की खेती अनेक तरह की मिट्टी में की जा सकती है परंतु अच्छी पैदावार के लिए अधिक उर्वरायुक्त बलुई दोमट व दोमट मिट्टी ठीक रहती है.

बोआई का उचित समय : आलू की अगेती बोआई के लिए 15 सितंबर से 15 अक्तूबर तक का समय ठीक होता है. सामान्य फसल की बोआई के लिए 15 अक्तूबर से 15 नवंबर तक का समय सही रहता है.  आलू की अनेक किस्म ऐसी हैं जो बोने के 70-80 दिनों बाद आलू खोदने लायक हो जाते हैं.

बोआई करने से पहले बीजोपचार जरूर करें. इस से जड़ वाली बीमारियों से छुटकारा मिलता है. इस के लिए बोरिक एसिड 3 फीसदी का घोल यानी 30 ग्राम प्रति लिटर पानी के हिसाब से घोल बनाएं.

उर्वरकों का इस्तेमाल :

आलू की अच्छी फसल के लिए 150 किलोग्राम नाइट्रोजन, 100 किलोग्राम फास्फोरस और 80 किलोग्राम पोटाश की जरूरत प्रति हेक्टेयर होती है. अच्छी पैदावार लेने के लिए गोबर की खाद भी डालें. यदि आप ने फसल बोने से पहले मिट्टी की जांच कराई हो और उस में जस्ता व लोहा जैसे सूक्ष्म तत्त्वों की कमी हो, तो 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट और 50 किलोग्राम फेरस सल्फेट प्रति हेक्टेयर की दर से उर्वरकों के साथ बोआई से पहले खेत में डालें.

बीजों की मात्रा :

बोआई के लिए आलू के रोगरहित बीज भरोसे की जगह से खरीदें. वैसे, सरकारी संस्थानों, राज्य बीज निगमों या बीज उत्पादन एजेंसियों से ही बीज खरीदना चाहिए.

बोआई :

आलू की बोआई करने के लिए मेंड़ से मेंड़ की दूरी 50-60 सैंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 15 से 20 सैंटीमीटर रखें. कई बार आलू के आकार के हिसाब से यह दूरी कम या ज्यादा भी की जाती है.

आमतौर पर आलू को 8 से 10 सैंटीमीटर की गहराई पर खुरपी की सहायता से बोया जाता है, ताकि अंकुरण के लिए मिट्टी में सही नमी बनी रहे.

हाथ से बोई गई फसल में पौधों में अच्छे विकास और अच्छी पैदावार के लिए पेड़ों की जड़ों पर मिट्टी चढ़ाना भी जरूरी होता है. जब पौधे 15-20 सैंटीमीटर के हो जाएं तो ऊपर मिट्टी चढ़ाएं.

ये सामान्य बातें हैं जिन्हें सभी किसान जानते हैं. आजकल आलू की बोआई के लिए बाजार में आलू बोने के यंत्र भी मौजूद हैं, जिन्हें हम पोटैटो प्लांटर कहते हैं.

सिंचाई का रखें ध्यान

फसल की पहली सिंचाई बोआई के 15-20 दिनों के अंदर कर लेनी चाहिए. सिंचाई करते समय ध्यान रखें कि मेंड़ें पानी में आधे से अधिक नहीं डूबनी चाहिए.

इस के बाद तकरीबन 15 दिनों के अंतराल पर दोबारा सिंचाई करें. आलू की फसल में तकरीबन 8 से 10 बार सिंचाई की जरूरत होती है. आलू तैयार होने पर जब उस की खुदाई करनी हो तो तकरीबन 10 दिन पहले ही उस की सिंचाई बंद कर दें जिस से आलू की खुदाई अच्छी तरह से हो सके.

फसल में कीट व रोगों से बचाव है जरूरी

आलू की फसल को अनेक रोग व कीटों से बचाने के लिए बीमारी के हिसाब से दवाओं का इस्तेमाल करें. आलू में अनेक तरह की बीमारियां जैसे अगेती झुलसा और पछेती झुलसा होने पर पौधे की पत्तियों पर गोल आकार के भूरे धब्बे बनने शुरू हो जाते हैं.

इन कीटों की रोकथाम के लिए 2 से ढाई किलोग्राम डाइथेन जेड 78 या डाइथेन एम 45 का 1000 लिटर पानी में घोल बना कर फसल पर छिड़काव करें. जरूरत पड़े तो 15 दिन बाद फिर से यह क्रिया अपनाएं.

आलू की दूसरी बीमारी है आलू का कोढ़ यानी कौमन स्कैब. इस रोग से फसल की पैदावार में तो कमी नहीं आती, लेकिन आलू भद्दे हो जाते हैं, जिस से बाजार में उन की सही कीमत नहीं मिल पाती है. आलू के कंदों के छिलकों पर लाल या भूरे रंग के छोटेछोटे धब्बे बन जाते हैं. इस बीमारी से बचाव के लिए बीजोपचार जरूरी है.

ऐसे करें कीट नियंत्रण

एपीलेक्ना बीटल : इस कीट की सूंड़ी व वयस्क दोनों ही पत्तियां खाते हैं, जिस से पत्तियों में केवल नसें बचती हैं. यह कीट पीले रंग के होते हैं. इन की रोकथाम के लिए इंडोसल्फान 35 ईसी 1.25 लिटर या कार्बारिल 5 फीसदी घुलनशील चूर्ण की 2 किलोग्राम मात्रा 800 लिटर पानी में मिला कर छिड़काव करें.

कटवर्म : यह जमीन के अंदर रहने वाला कीट है, इस की सूंड़ी रात के समय छोटेछोटे पौधों के तनों को काट देतीहै. इस की रोकथाम के लिए एल्ड्रिन 5 फीसदी चूर्ण आखिरी जुताई के समय मिट्टी में मिला दें.

आलू का माहू कीट : यह हरे रंग का कीट होता है, जो विषाणु फैलाता है. बचाव के लिए डाईमिथोएट 30 ईसी की 1 लिटर मात्रा 600 लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करें.

सफेद लट या गुबरेला : यह कीट जमीन के अंदर फसल को नष्ट कर देता है. फोरेट 10 जी या काबोफ्यूराल 3 जी 15 किलोग्राम बोआई से पहले इस्तेमाल करें.

जायद में मोटे अनाजों में बाजरा की उन्नत खेती

भारत सरकार की कोशिशों के बाद वर्ष 2023 को दुनियाभर में मोटा अनाज वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है. श्री अन्न में बाजरा, ज्वार, रागी, कुटकी, कोंदो, सांवा, चेना आदि को शामिल किया गया है. मोटे अनाजों में बाजरा प्रमुख मोटे अनाज की फसल है. इसे पूर्वकाल में गरीबों का भोजन भी कहा जाता था. बाजरे की खेती खरीफ को छोड़ कर जायद में भी की जाने लगी है.

जायद में बाजरे की बोआई मार्चअप्रैल में की जाती है. इस की खेती हरे चारे के लिए भी की जाती है. बाजरे के दाने में 11.6 प्रतिशत प्रोटीन, 5 प्रतिशत वसा, 67 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट तथा 2.7 प्रतिशत खनिज लवण पाया जाता है.

भूमि का चुनाव

बाजरे की खेती के लिए बलुई दोमट या दोमट भूमि अच्छी रहती है. समतल भूमि वाली व जीवांशयुक्त भूमि में भी बाजरा की खेती करने से अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है.

भूमि की तैयारी

आलू, सरसों, मटर आदि की फसल कटाई के बाद पलेवा करने के बाद मिट्टी पलटने वाले हल से 20 से 25 सैंटीमीटर गहरी एक जुताई तथा उस के बाद कल्टीवेटर या देशी हल से 2 जुताई कर के पाटा लगा कर खेत की तैयारी कर लेनी चाहिए.

बाजरा की उन्नतशील प्रजातियां

सीजेड पी 9602

इस किस्म के पौधों की ऊंचाई 185 से 200 सैंटीमीटर होती है. पत्तों का रंग चमकीला होता है. इस किस्म के पौधे 70 से 75 दिन में पक कर तैयार हो जाते हैं तथा दानों का रंग हलका पीलापन लिए होता है. यह किस्म जोगिया रोग के प्रति सहनशील होती है. इस की पैदावार 13 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

एचएचबी 672

इस किस्म के पौधों की ऊंचाई 160 से 180 सैंटीमीटर होती है. इस किस्म के सिट्टे सख्त रोजेदार वह 22 से 25 सैंटीमीटर लंबे तथा परागकण पीले रंग के होते हैं. यह किस्म सूखे के प्रति सहनशील है.

पूसा 605

यह एक संकर किस्म है जो 75 से 80 दिन में पकने वाली होती है तथा कम वर्षा वाले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है. पौधों की ऊंचाई 125 से 150 सैंटीमीटर होती है. उपज 9 से 10 क्विंटल हेक्टेयर प्राप्त होती है. सूखा चारा 25 क्विंटल हेक्टेयर प्राप्त हो जाता है.

पूसा हाईब्रिड 605

यह किस्म 74 से 80 दिन में पक कर तैयार हो जाती है. उपज 22 से 24 क्विंटल हेक्टेयर प्राप्त हो जाती है.

आईसीटीपी 8203

यह किस्म 80 से 50 दिन में पक कर तैयार होती है. इस से 25 से 30 क्विंटल दाने की उपज प्राप्त होती है.

अन्य किस्में

पूसा 443, पूसा 384, एच एच 216, एच एच 223.

बोआई का समय

जायद में बाजरा की बोआई का उचित समय मार्च के प्रथम सप्ताह से अप्रैल के प्रथम सप्ताह तक का ही होता है. बाजरा एक परपरागित फसल है. इस के परागकण 46 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान पर भी जीवित रह सकते हैं, जो बीज बनाते हैं.

बीज उपचार

चेंपा रोग से फसल को बचाने के लिए बीज को नमक के 20 प्रतिशत घोल में लगभग 5 मिनट तक डुबो कर रखें. तैरते हुए बीजों को निकाल कर अलग कर दें. शेष डूबे हुए बीजों को निकाल कर छाया में सुखा कर बोने के काम में लें. बीज को 2.5 ग्राम थीरम या 2 ग्राम कार्बंडाजिम प्रति किलोग्राम की दर से शोधित कर ही बोना चाहिए.

बीज दर और बोआई

बाजरे के दाने के लिए 4 से 5 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होता है. बाजरे की बोआई लाइन में करने से अधिक उत्पादन प्राप्त होता है. बोआई में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 45 सैंटीमीटर तथा पौधे से पौधे की दूरी 10 से 12 सैंटीमीटर रखते हैं.

उर्वरकों का प्रबंधन

मृदा परीक्षण के आधार पर ही उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए. मृदा परीक्षण की सुविधा

न होने पर संकुल प्रजातियों के लिए 60 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम फास्फोरस, 40 किलोग्राम पोटाश तथा संकर प्रजातियों के लिए 80 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम फास्फोरस, 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर प्रयोग करना चाहिए. यदि गोबर की खाद उपलब्ध हो, तो 5 टन प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई से पहले खेत की तैयारी के समय देना चाहिए.

विरलीकरण थिनिंग/गैप फिलिंग

बोआई करने के 15 से 20 दिनों बाद खेत में पर्याप्त नमी होने पर घने पौधों को उखाड़ कर कम पौधे वाले स्थान पर रोपित कर देना चाहिए तथा रोपित पौधों में पानी लगा देना चाहिए.

सिंचाई

जायद के मौसम में बोई गई बाजरे की फसल में 4-5 सिंचाइयों की आवश्यकता पड़ती है. 15 से 20 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करते रहना चाहिए. कल्ले निकलते समय व फूल आने पर खेत में अवश्य नमी होना चाहिए.

खरपतवार नियंत्रण व निराईगुड़ाई

बाजरे की बोआई के 3-4 सप्ताह बाद खेत की निराई कर के खरपतवार अवश्य निकाल देना चाहिए. गुड़ाई करते समय ध्यान रखना चाहिए कि पौधे की जड़ें नहीं कटें. यदि निराईगुड़ाई करना संभव न हो तो खरपतवार नियंत्रण हेतु बोआई करने के तुरंत बाद अथवा अंकुरण से पूर्व एट्राजिन की 0.5 किलोग्राम मात्रा को 600 से 700 लिटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर एकसमान रूप से छिड़काव करना चाहिए.

फसल संरक्षण

कातरा कीट बाजरे की फसल को प्रारंभिक अवस्था में काट कर नुकसान पहुंचाता है. इस कीट की रोकथाम के लिए मिथाइलपैराथियान 2 प्रतिशत या क्यूनालफास 1.5 प्रतिशत 6 किलोग्राम दानेदार प्रति हेक्टेयर की दर से बुरकाव करना चाहिए.

रूटबग

इस कीट की रोकथाम के लिए 25 किलोग्राम मिथाइलपैरा थियान 2 प्रतिशत चूर्ण को प्रति हेक्टेयर की दर से भुरकाव करना चाहिए. इस के अतिरिक्त क्यूनालफास की 1.25 लिटर की मात्रा को 500 लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए.

जोगिया या हरितबाल रोग

जहां तक संभव हो रोग प्रतिरोधक किस्मों को बोना चाहिए. जिस खेत में इस रोग का प्रकोप दिखाई दे, वहां बोआई के 21 दिनों बाद मैनकोजेब 2 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करें.

अरगट

इस रोग से ग्रसित पौधों के सिट्टे पर शहद जैसा गुलाबी पदार्थ के रूप में दिखाई देता है. कुछ दिनों बाद यह

पदार्थ भूरा एवं चिपचिपा हो जाता है तथा बाद में काले पदार्थ के रूप में बदल जाता है. पौधों पर सिट्टे बनते समय 2.5 किलोग्राम जिनेब या 2 किलोग्राम मैनकोजेब को 200-300 लिटर पानी में घोल कर कम से कम 3 छिड़काव 3-4 दिनों के अंतराल पर करना चाहिए. जहां तक संभव हो बीज को उपचारित कर ही होना चाहिए.

उन्नत बीज पैदा करना

किसान अपने खेत पर बाजरे की संकुल किस्मों का स्वयं बीज पैदा कर सकते हैं. बीज के लिए फसल को उगाते समय अनेक सावधानियां जैसे बीज के लिए बोई गई बाजरे की फसल के चारों तरफ आधरीय बीज उत्पादन के लिए 400 मीटर तथा प्रमाणित बीज के लिए 200 मीटर तक बाजरे की दूसरी किस्म नहीं होनी चाहिए. जिस खेत में बीज पैदा करना हो उस में पिछले वर्ष बाजरा न उगाया गया हो.

इस के अतिरिक्त समयसमय पर खेत में अन्य किस्मों के पौधों को निकालना, खरपतवार कीड़े एवं बीमारियों का नियंत्रण आवश्यक है. खेत के चारों तरफ कम से कम 10 मीटर फसल छोड़ कर, बीज के लिए सिट्टे या बाली को अलग काट कर अच्छी प्रकार सुखा लेना चाहिए. सिट्टे या बाली की मड़ाई कर दानों की ग्रेडिंग कर लेनी चाहिए.

अच्छे आकार के बीजों को धूप में सुखा कर 10 से 11 प्रतिशत नमी रहने पर कीटनाशक व फफूंदनाशक से उपचारित कर लोहे की टंकियों में भर कर अच्छी प्रकार से बंद कर देना चाहिए. इस बीज की अगले वर्ष बोआई के लिए प्रयोग किया जा सकता है तथा अतिरिक्त आय प्राप्त की जा सकती है.

कटाई एवं गहाई

बाजरे की विभिन्न किस्में 70 से 90 दिन में पक कर तैयार हो जाती हैं. खड़ी फसल में हंसिया से सिट्टों या बालियों को काट कर या पहले से फसल को काट कर के खलिहान में लाएं, उस के बाद बालियों को काट लिया जाता है. दानों में नमी की मात्रा 20 प्रतिशत रहने पर ही फसल की कटाई करनी चाहिए. जब खलिहान में सिट्टे या बाली सूख जाए तो थ्रैशर से दानों को अलग कर लेना चाहिए तथा 10 से 11 प्रतिशत नमी पर ही सुखा कर भंडारित करना चाहिए.

उपज

बाजरे की संकुल किस्मों से 15 से 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त होती है तथा संकर किस्मों से लगभग 25 से 30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त हो जाती है.