मछलीपालन (Fish Farming) के लिए कभी भी एक तालाब में अकेली एक प्रजाति की मछली का चयन नहीं करना चाहिए, बल्कि उच्च उत्पादकता वाली 2 से 6 प्रजातियों का चयन करना चाहिए, जिस से मछलियों की बढ़वार अच्छी होती है और उत्पादन भी अच्छी मात्रा में होता है.
कतला :
यह भारतीय मछली जिसे भाकुर भी कहा जाता है, बहुत तेजी से बढ़ती है. इस मछली में भोजन को मांस में बदलने में अच्छी कूवत पाई जाती है, इसलिए इस का बाजार भाव हमेशा अच्छा रहा है. यह मछली के शौकीनों की पसंदीदा मछली मानी जाती है.
इस मछली का सिर बड़ा होता है. इस की मूछें नहीं होती हैं. यह पानी की ऊपरी सतह पर तैरने वाले प्लवकों को भोजन के रूप में खाती है. यह मछली ज्यादातर तालाब के भोजन को खाती है, लेकिन कृत्रिम भोजन भी इसे पसंद होता है. इसी वजह से तालाब में कृत्रिम भोजन का छिड़काव भी किया जा सकता है.
कतला पहले साल में ही 12-14 इंच की लंबाई में बढ़ती है. इस का वजन 1.0 किलोग्राम से ले कर 1.25 किलोग्राम तक होता है. एक कतला मछली 1 साल में 1.2 किलोग्राम तक के वजन पर 15 रुपए की लागत लेती है, जबकि इस का बाजार भाव 100 से 150 रुपए प्रति किलोग्राम होता है. इस प्रकार इस से 85 से 135 रुपए तक का लाभ लिया जा सकता है.
सिल्वर कार्प :
यह मछली रूस व चीन में पाई जाती है. इस का पालन भारतीय किसानों की अच्छी आमदनी का साधन है. सिल्वर कार्प लंबी व चपटे शरीर वाली मछली है. इस का सिर नुकीला व थूथन गोल होता है. यह तालाब के शैवाल व सड़ेगले पदार्थों को खाती है. इसे अलग से मछलियों का चारा खिलाया जाना भी अच्छा होता है. सिल्वर कार्प तालाब में तेजी से बढ़ती है और 12 से 14 इंच लंबी हो जाती है. 1 साल में इस का वजन 1.5 किलोग्राम से 1.8 किलोग्राम तक हो जाता है. इस मछली को पालने में प्रति मछली मात्र 15 रुपए की लागत आती है.
रोहू :
इस मछली का वैज्ञानिक नाम लेबियो रोहिता है. यह भारतीय प्रजाति की सब से तेज बढ़ने वाली मछलियों में गिनी जाती है. इस प्रजाति की मछलियां सब से स्वादिष्ठ मानी जाती हैं. खाने वाले इसे सब से ज्यादा पसंद करते हैं. यह मछली तालाब के अंदर के शैवाल व जलीय पौधों की पत्तियों को खाती है. रोहू की वृद्धि दर कतला से थोड़ी कम है. यह अपने जीवनकाल में 3 फुट की लंबाई तक बढ़ सकती है, जिस का वजन 1 किलोग्राम तक पाया जाता है.
इन तमाम मछलियों के पालन के लिए 1 हेक्टेयर तालाब में 5 हजार मत्स्यबीज या अंगुलिकाएं डालने की जरूरत पड़ती है, इन के साथ तालिका में बताई जा रही अन्य प्रजातियों की मछलियों को पालना भी जरूरी होता है.
मछलियों का आहार व देखभाल :
मछलियों के विकास के लिए मूंगफली, सरसों या तिल की खली को चावल की कनकी या गेहूं की चोकर के साथ बराबर मात्रा में मिला कर मछलियों के भार के 1 से 2 फीसदी की दर से देना चाहिए. अगर ग्रास कार्प मछली का पालन किया गया है, तो पानी की वनस्पतियों जैसे लेमना, हाइड्रिला, नाजाज, सिरेटो फाइलम या स्थलीय वनस्पतियों जैसे नैपियर, बरसीम या मक्के के पत्ते वगैरह जितना खाएं उतनी मात्रा में रोजाना देना चाहिए.
मछलियों के बीज तालाब में डालने के बाद हर महीने तालाब में जाल डाल कर उन के स्वास्थ्य व वृद्धि की जांच करते रहना चाहिए. अगर मछलियां परजीवी से प्रभावित हों, तो उन्हें पोटैशियम परमैगनेट यानी लाल दवा या नमक के घोल में डुबो कर तालाब में छोड़ें. मछलियों में लाल चकत्ते या घाव दिखाई दें तो अपने नजदीकी मत्स्य विभाग से जरूर संपर्क करें.
मछलियों की निकासी व बिक्री :
मछलियों की उम्र जब 12-16 महीने की हो जाए और उन का वजन 1-2 किलोग्राम हो, तो उन्हें तालाब से निकाल कर स्थानीय मंडी या बाजार में बेचा जा सकता है, जिस से मत्स्यपालक अच्छा लाभ कमा सकते हैं.





