Beekeeping-
शहद के मामले में बिहार देश का नंबर एक राज्य बन गया है. यूरोप और खाड़ी देशों में बिहार के शहद की मांग काफी ज्यादा है. यहां तरहतरह की फसलों से शहद तैयार किया जाता है.
शहद में फैट कम करने का गुण सब से ज्यादा होता है. इसलिए लोग ब्रेड में मक्खन की जगह शहद का इस्तेमाल करते हैं. अलगअलग मौसमों में अलगअलग तरह से शहद तैयार किया जाता है, जैसे दिसंबरजनवरी में सरसों, फरवरी में गेंदा व सहजन, मार्चअप्रैल में लीची, मई में सूरजमुखी, जून में करंज, सितंबर में करवैनी से शहद निकलता है. लीची का शहद अन्य शहदों के मुकाबले ज्यादा महंगा बिकता है.
मधुमक्खी की प्रजातियां
मधुमक्खियों की 2 तरह की प्रजातियां पाई जाती हैं, भारती मधुमक्खी और यूरोपियन (मैलीफेरा) मधुमक्खी. यूरोपियन मधुमक्खी दुनिया में सब से ज्यादा पाई जाती है.
भारत में साल 1962 में इसे लाया गया. साल 1972 में पंजाब व हरियाणा में इस का पालन शुरू हुआ. जहां से इस का फैलाव धीरेधीरे अन्य राज्यों में भी हुआ.
भारत में मधुमक्खियों की 3 प्रजातियां हैं.
भारती मधुमक्खी : इसे एपिस सेराना इंडिका भी कहा जाता है. यह मधुमक्खी एक साल में तकरीबन 10 किलोग्राम तक मधु तैयार करती है. यह स्वभाव से पालतू होती है और अपना छत्ता पेड़पौधों के खोखले भाग, दीवार की दरार वगैरह में बनाती है.
भौंरा या तरिया मधुमक्खी : इसे एपिस डोर साटा कहा जाता है. यह बहुत ही तेज और गुस्सैल मधुमक्खी होती है. आकार में बड़ी होती है, पर इस की रानी मक्खी बहुत छोटी होती है. यह ज्यादातर जंगल, झाडि़यों, चट्टानों व पुराने मकानों के छज्जों पर अपना छत्ता बनाती है. इसे जंगली मधुमक्खी भी कहते हैं.
गोठेलिया मधुमक्खी : इसे एपिस फ्लोरिया कहते हैं. इस का आकार सभी मधुमक्खियों से छोटा होता है. यह भी जंगली मधुमक्खी होती है, जो एक स्थान को छोड़ कर दूसरे स्थान पर चली जाती है. यह अपना छोटा सा छत्ता झाडि़यों में बनाती है. इस के छत्ते से एक बार में 250 ग्राम तक मधु निकाला जा सकता है.
मधुमक्खी का परिवार
रानी मधुमक्खी : एक बक्से में सिर्फ एक ही रानी मधुमक्खी को रखा जाता है. नई निकली हुई रानी मक्खी 10 दिन के अंदर अपने छत्ते से बाहर आ जाती है और एक से ज्यादा नर मक्खियों के साथ संभोग करती है. इस समय यह लगभग 2 करोड़ शुक्राणुओं को ग्रहण करती है, जिस के कारण यह जीवन भर अंडे दे सकती है. अंडे से रानी मक्खी 14 दिनों में तैयार हो जाती है. यदि शुक्राणु से अंडे मेल हो जाता है, तो मजदूर या रानी मक्खियां बनती हैं.
मजदूर (मादा) मक्खी : ये मधुमक्खियां काफी मेहनती होती हैं. ये 3 से 6 दिनों तक के शिशुओं को भोजन देती हैं व 6 से 13 दिनों की आयु तक नन्हें शिशुओं का पालन करती हैं. ये रस को गाढ़ा कर के शहद में बदलने का काम करती हैं.
ये 1 से 3 किलोमीटर तक की दूरी से भोजन ला सकती हैं. मजदूर मक्खी डंक मार कर खुद मर जाती हैं.
ड्रोन नर मक्खी : इस का आकार मोटा, आंखें बड़ी, पेट गोल और जननांग काला होता है. इस मक्खी के डंक नहीं होता है और इसे आसानी से हाथों में पकड़ा जा सकता है. यह बहुत आलसी होता है. संभोग के मौसम में रानी मक्खी के साथ संभोग करता है और कुछ समय बाद मर जाता है.
क्या कहते हैं मधुमक्खी पालक
पूरे बिहार में केवल मुजफ्फरपुर और मेहसी में काफी ज्यादा मात्रा में लीची की खेती होती है. मार्चअप्रैल के महीनों में लीची के फूलों पर मधुमक्खियां रस लेने का काम करती हैं. लीची के बगीचों में मधुमक्खी पालने से लीची की फसल को बहुत फायदा होता है, लेकिन मधुमक्खी पालन बगीचों में किया गया तो इस से फसल को नुकसान भी पहुंचता है. एक हेक्टेयर लीची के बाग में केवल 14 से 15 बक्से ही रखना उचित है. मधु बनाने का काम साल में 8 महीने चलता है. बारिश और शरद ऋतु में मधुमक्खी को चीनी की चाशनी बना कर भोजन दिया जाता है.
एजाजुल हक, समदपुरा, चक्लालू का कहना है कि मेहसी में लीची के साथ आम व सरसों की भी फसल ली जाती है. लीची के पेड़ों में मंजरी आने के साथ बगीचों में मधुमक्खी पालने का काम शुरू हो जाता है. लीची के पेड़ों में लगी मंजरी के पराग निषेचन की क्रिया में मधुमक्खी सहायक होती हैं.
मधुमक्खी लीची की मंजरी से रस चूसने के साथ परागकण को एकदूसरी मंजरी पर ले जाने का काम करती हैं. इस से लीची की फसल ज्यादा व फूल बड़ा होता है. वहीं एक बगीचे में अगर ज्यादा मधुमक्खी के बक्से रख कर मधुमक्खी पालन किया जाए तो लीची की फसल में काफी कमी आएगी. मधुमक्खियां मंजरी से ज्यादा मात्रा में रस चूस जाएंगी, साथ ही जिस बगीचे में मधुमक्खी का पालन किया गया है, उस बगीचे की मंजरी का परागकण झड़ कर नीचे गिरेगा. इस से फसल कम मात्रा में होगी. इसलिए मधुमक्खी के बक्से आसपास न रखें, बल्कि कुछ दूरी बना कर ही रखें. Beekeeping





