Weak Monsoon.दक्षिण-पश्चिम मानसून अब देश से धीरे-धीरे विदाई की ओर बढ़ रहा है. 19 सितंबर 2026 से पश्चिमी राजस्थान के कुछ हिस्सों में मानसून की वापसी शुरू हो चुकी है. हालांकि मानसून की वापसी का अर्थ यह नहीं है कि बारिश तुरंत पूरी तरह बंद हो जाएगी. बंगाल की खाड़ी में बनने वाली मौसम प्रणालियां सितंबर के अंतिम दिनों में भी कई इलाकों में बारिश करा सकती हैं.

2026 का मानसून किसानों के लिए एक समान नहीं रहा. कई क्षेत्रों में बारिश के बीच लंबा अंतर रहा, तो कुछ जगहों पर कम समय में तेज बारिश हुई. इससे एक तरफ खेतों में नमी की कमी की स्थिति बनी, वहीं दूसरी ओर अचानक भारी बारिश से जलभराव और फसल प्रबंधन की समस्या सामने आई.

सिर्फ बारिश की मात्रा नहीं, उसका समय भी महत्वपूर्ण

खेती में बारिश का कुल आंकड़ा ही फसल की स्थिति तय नहीं करता. बारिश कब हुई, दो बारिश के बीच कितना अंतर रहा और कितनी तेज बारिश हुई, इन सभी बातों का फसल पर सीधा असर पड़ता है.

यदि फसल की शुरुआती अवस्था में पानी नहीं मिलता और बाद में अचानक बहुत अधिक बारिश हो जाती है, तो कुल बारिश का आंकड़ा भले ही संतोषजनक दिखाई दे, लेकिन फसल को आवश्यक समय पर नमी नहीं मिल पाती. वर्षा आधारित खेती वाले क्षेत्रों में यह समस्या और गंभीर हो जाती है, क्योंकि वहां किसान के पास अतिरिक्त सिंचाई के विकल्प सीमित होते हैं.

खरीफ की बुवाई पर दिखा असर

2026 के शुरुआती खरीफ सीजन में कम बारिश का असर कई प्रमुख फसलों के बुवाई क्षेत्र में दिखाई दिया. कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की 24 जुलाई 2026 की रिपोर्ट के अनुसार कुल खरीफ फसलों का क्षेत्र 826.19 लाख हेक्टेयर था, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह 865.01 लाख हेक्टेयर था.

धान का रकबा 234.43 लाख हेक्टेयर रहा, जो पिछले वर्ष के 240.62 लाख हेक्टेयर से कम था. दालों का क्षेत्र भी 84.57 लाख हेक्टेयर रहा, जबकि पिछले साल इसी अवधि में यह 91.46 लाख हेक्टेयर था.

मोटे अनाज और मक्का की बुवाई में भी शुरुआती कमी दर्ज हुई. 24 जुलाई तक श्री अन्न और मोटे अनाज का कुल क्षेत्र 142.21 लाख हेक्टेयर रहा, जबकि पिछले वर्ष यह 161.49 लाख हेक्टेयर था. मक्का का क्षेत्र भी पिछले वर्ष की तुलना में कम दर्ज किया गया.

सोयाबीन और कपास की बुवाई भी जुलाई में पीछे रही. हालांकि बाद में बारिश की स्थिति में सुधार आने से सोयाबीन की बुवाई का क्षेत्र पिछले वर्ष के स्तर के आसपास पहुंच गया. इससे पता चलता है कि मौसम में सुधार होने पर किसानों को बुवाई की स्थिति संभालने का अवसर भी मिला.

क्या खरीफ उत्पादन में बड़ी गिरावट आएगी?

इस सवाल का जवाब अभी जल्दबाजी में देना उचित नहीं होगा. शुरुआती बुवाई के आंकड़े यह जरूर बताते हैं कि मौसम की शुरुआत में कई फसलों पर दबाव रहा, लेकिन अंतिम उत्पादन केवल बुवाई क्षेत्र से तय नहीं होता.

फसल की स्थापना, बाद की बारिश, तापमान, सिंचाई की उपलब्धता, कीट एवं रोग तथा कटाई के समय मौसम जैसी परिस्थितियां भी उत्पादन को प्रभावित करती हैं. इसलिए अंतिम उत्पादन का आकलन आधिकारिक फसल कटाई और उत्पादन आंकड़े सामने आने के बाद ही अधिक स्पष्ट होगा.

किसानों की लागत पर बढ़ा दबाव

कम बारिश का असर केवल फसल पर नहीं बल्कि किसान की लागत पर भी पड़ सकता है. जिन किसानों के पास सिंचाई की सुविधा है, उन्हें बारिश की कमी की भरपाई के लिए अतिरिक्त सिंचाई करनी पड़ सकती है. इससे डीजल, बिजली और मजदूरी का खर्च बढ़ता है.

वर्षा आधारित खेती में अगर फसल की स्थापना कमजोर रही या दोबारा बुवाई करनी पड़ी, तो किसान को बीज, जुताई और श्रम पर दोबारा खर्च करना पड़ सकता है. छोटे किसानों के लिए यह चुनौती अधिक बड़ी हो सकती है.

अब रबी की तैयारी क्यों महत्वपूर्ण?

मानसून के दौरान होने वाली बारिश से तालाब, कुएं, जलाशय और भूजल स्रोत रिचार्ज होते हैं. जिन क्षेत्रों में पर्याप्त बारिश नहीं हुई है, वहां रबी की सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है.

इसलिए गेहूं, चना, सरसों, मसूर जैसी फसलों की बुवाई से पहले किसान को यह देखना चाहिए कि उसके पास पूरे रबी सीजन के लिए कितनी सिंचाई उपलब्ध होगी. पानी सीमित है तो कम पानी की जरूरत वाली फसलों और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उपयुक्त किस्मों पर विचार किया जा सकता है.

किसान अभी से क्या करें?

सबसे पहले खेत की मिट्टी में मौजूद नमी का आकलन करें. जहां जरूरत हो वहां नमी संरक्षण के उपाय अपनाएं. सिंचाई उपलब्ध है तो जरूरत के अनुसार ही पानी दें. खेत में जलभराव की संभावना वाले क्षेत्रों में निकासी की व्यवस्था रखें.

कटाई के करीब पहुंच चुकी खरीफ फसल को मौसम पूर्वानुमान देखकर काटें और कटाई के बाद उपज को खुले में न छोड़ें. बारिश के बाद बढ़ने वाले कीट और रोगों पर भी नजर रखें.
इसके साथ ही रबी की फसल का चुनाव उपलब्ध पानी, मिट्टी, मौसम और स्थानीय कृषि सलाह के आधार पर करें.

मौसम की जानकारी बने खेती का हिस्सा

बदलते मौसम में किसान के लिए स्थानीय मौसम पूर्वानुमान और कृषि मौसम सलाह महत्वपूर्ण हो गई है. सिंचाई, खाद, कीटनाशक का छिड़काव, कटाई और खेत से अतिरिक्त पानी निकालने जैसे फैसले मौसम को ध्यान में रखकर लेने चाहिए.

कृषि विज्ञान केंद्र और कृषि विभाग स्थानीय स्तर पर कृषि संबंधी सलाह उपलब्ध कराते हैं. किसान इन सेवाओं का उपयोग करके मौसम के अनुसार अपनी खेती की योजना बना सकते हैं.
आगे भी बारिश की संभावना को नजरअंदाज न करें

मानसून की वापसी शुरू होने के बावजूद सितंबर के अंत तक बारिश की गतिविधियां जारी रह सकती हैं. बंगाल की खाड़ी में बनने वाली मौसम प्रणालियां मध्य और पूर्वी भारत के कुछ हिस्सों में बारिश करा सकती हैं.

इसलिए किसानों को आने वाले दिनों में भी स्थानीय मौसम चेतावनियों पर नजर रखनी चाहिए. खरीफ की फसल की सुरक्षा के साथ रबी के लिए मिट्टी की नमी और पानी की उपलब्धता को सुरक्षित रखना अब सबसे महत्वपूर्ण तैयारी है.

कम बारिश वाला साल किसान के लिए केवल चुनौती नहीं, बल्कि खेती की रणनीति बदलने का संकेत भी है. पानी की उपलब्धता को समझकर फसल चुनना, मिट्टी की नमी बचाना, मौसम की जानकारी लेना और समय पर निर्णय करना आने वाले रबी सीजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा. Weak Monsoon

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