पुष्पा नेगी : गोपालन से प्रकृति संरक्षण और रोजगार सृजन

ग्राम कोटी अठुरर्वाला अठूरवाला, जनपद देहरादून, उत्तराखंड की रहने वाली पशुपालक पुष्पा नेगी पशुपालन के क्षेत्र में नवीनतम तकनीक अपना कर स्थानीय किसानों को भी जागरूक करती हैं. उनके इन्ही योगदानों के लिए उन्हें दिल्‍ली प्रैस की कृषि पत्रिका ‘फार्म एन फूड’ द्वारा लखनऊ में आयोजित  कृषि सम्‍मान अवार्ड 2024 में ‘बैस्‍ट  डेयरी ऐंड एनिमल कीपर अवार्फाड ‘ से सम्मानित किया गया.

cow rearing

पशुपालक पुष्पा नेगी के द्वारा साल 2016 से गोपालन किया जा रहा है और इस समय उन के पास लगभग 30 गाय हैं, जिन में होल्सटीन फ्रीसियन और साहीवाल दोनों नस्ल की गई गाय शामिल हैं. पुष्पा नेगी गाय के दूध से घी, छाछ, मक्खन आदि बना कर बाजार में अच्छे दामों पर बेचती हैं और प्रकृति संरक्षण को ध्यान में रखते हुए उन के यहां गाय के गोबर से दीया दीपक, मूर्ति, समरानी कप, गौ काष्ठ एवं वर्मी कंपोस्ट आदि चीजें तैयार की जाती हैं. इस काम में उन्होंने अनेक लोगों को जोड़ रखा है, जिस से उन्हें भी रोजगार मिल रहा है.

 

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प्रगतिशील पशुपालक के रूप में पुष्पा नेगी को मुख्यमंत्री द्वारा ‘किसानश्री सम्मान’, हंस फाउंडेशन और आरडीसी -2024 में केंद्रीय मंत्री परशोत्तम रूपाला द्वारा दिल्ली में सम्मानित किया गया जा चुका है. पुष्पा नेगी अपने खेत में उत्तराखंड का प्रसिद्ध अनाज मंडावा उगा रही हैं, जो अपने पौष्टिक गुणों के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है. पुष्पा नेगी का कहना है कि उन के इन कामों में परिवार ने सदैव पूरा सहयोग किया है.

कर्नल हरिश्चंद्र सिह: चिया सीड की खेती की प्रशंसा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी की

कर्नल हरिश्चंद्र सिह लखनऊ, उत्तरप्रदेश से हैं और 54 वर्ष की उम्र में सैन्य सेवा से सेवानिवृत्त होने के बाद वर्ष 2016 में जनपद बाराबंकी से जैविक खेती की शुरुआत की. उनकी असाधारण उपलब्धियों के लिए दिल्‍ली प्रैस की कृषि पत्रिका ‘फार्म एन फूड’ आयोजित कृषि सम्‍मान अवार्ड 2024 में उन्हें बैस्ट फार्मर अवार्ड इन और्गेनिक फार्मिंग अवार्ड से सम्मानित किया गया.

उन की पारिवारिक पृष्ठभूमि का भी इस में योगदान रहा.

कर्नल हरिश्चंद्र सिंह का उद्देश्य उन फलों, फसलों और सब्जियों को उगाना है, जो स्वास्थ्यवर्धक हों, जिन में कम से कम देखरेख हो, कम से कम लागत लगे और अच्छा मुनाफा हो. इस क्रम में उन्होंने चिया सीड, ड्रैगन फ्रूट, एप्पल बेर, जिमीकंद और कालेबैगनी आलू की खेती से अपने नए शौक की शुरू की. इस में वे काफी हद तक सफल रहे. बाद में उन्होंने अपनी फसलों में केला, लाल गूदे वाले आलू, क्वीनोआ, रामदाना, काले चावल और काले गेहूं आदि को भी सम्मिलित किया.

लगभग 4 साल पहले कर्नल हरिश्चंद्र सिंह के चिया सीड की खेती की प्रशंसा देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने ‘मन की बात कार्यक्रम’ में करते हुए इसे आत्मनिर्भर भारत में एक बड़ा कदम बताया.

स्वास्थ्यवर्धक एवं लाभप्रद फसलों, फलों तथा सब्जियों की जैविक खेती स्वयं करना तथा ज्यादा से ज्यादा किसानों को इस मुहिम से जोड़ना अब कर्नल हरिश्चंद्र सिंह का जुनून सा बन गया है. उन्होंने बताया कि साल 2023 में भारत सरकार द्वारा प्रकाशित ‘कौफी टेबल बुक’ में मुझे एक प्रगतिशील किसान के रूप में स्थान दिया गया है. यह मेरे लिए गर्व की बात है.

 

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कर्नल हरिश्चंद्र सिंह का कहना है कि हमारे इस प्रयास में कृषि क्षेत्र से जुड़ी संस्थाओं, कृषि विशेषज्ञों, प्रगतिशील कृषकों, पत्र पत्रिकाओं एवं मीडियाकर्मियों का बहुत बड़ा योगदान है, जो हमारे मार्ग दर्शक और प्रेरणास्रोत हैं. इन से प्रेरित हो कर अब मैं अपने जैविक खेती के रकबे को बढ़ा रहा हूं, साथ ही श्रीअन्न और नीबू की खेती भी शुरू कर चुका हूं.

किसानों को नई तकनीक से जोड़ उन की आमदनी बढ़ा रहीं डा. पूजा गौड़

उत्‍तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ में आयोजित दिल्‍ली प्रैस की कृषि पत्रिका ‘फार्म एन फूड’ द्वारा आयोजित कृषि सम्‍मान अवार्ड 2024 में बैस्ट फार्मर अवार्ड इन मार्केटिंगसे सम्मानित उत्तर प्रदेश के मऊ जिले में जन्मी पूजा गौड़ की शुरुआती पढ़ाईलिखाई मऊ में और बाद की पढ़ाईलिखाई मुंबई में हुई.

मुंबई में मल्टीनैशनल कंपनी इनफोर्मेशन टैक्नोलौजी में उच्च पद पर वे आसीन रहीं, लेकिन शादी उत्तराखंड में होने के बाद उन का झुकाव वहां के जनजातीय इलाके से हुआ. वहां उन्होंने समाजसेवा का काम शुरू किया, लेकिन लौकडाउन के दौरान जब साल 2020 में वे वर्क फ्रोम होम होने की वजह से जब ससुराल आईं, तब देहरादून के सुंदर आदिवासी इलाके के गांव में समाजसेविका के रूप में काम करना शुरू किया और समाजसेवा के रूप उन्होंने उन आदिवासी किसान  महिला को चुना, जो दिनभर खेत, जंगल और चूल्हा व परिवार में अपनी पूरी जिंदगी काठिन मेहनत और बहुत ही न्यूनतम आय के साथ व्यतीत कर रही थीं.

Dr. Pooja Gaur

डा. पूजा गौड़ व्यावसायिक रूप से सूचना प्रौद्योगिक के क्षेत्र में मुख्य प्रबंधक, पश्चिमी भारत में कार्यरत रही हैं और प्रबंधक में ही डाक्टर औफ फिलौसफी (पीएचडी) की उपाधि हासिल की है, लेकिन 2 मास्टर डिगरी एवं पीएचडी की डिगरी लेने के बावजूद भी एवं सूचना प्रौद्योगिकी में अच्छे पद पर कार्यरत होने के बवजूद भी जिंदगी में उन्हें कहीं न कहीं कमी सी लगती थी और दिल में एक कसक सी थी कि कहीं दूर जा कर गंवई इलाके में काम करने की.  और एक ग्रामीण समाज की सेवा का भाव  ने उन को गांव की तरफ मोड़ दिया.

जब वे गांव लौटीं तो उन्होंने देखा कि किसानों की दशा व दिशा को सुधारने के लिए सरकार द्वारा चलाई जा रही दूरदर्शी योजना से किसान व गांव वाले इस के वास्तविक हकदार थे, वे लोग इन योजनाओं का लाभ नहीं उठा पा रहे थे और यही हाल उन के खेतों में उगाई जा रही फसलों और सब्जियों आदि का था, जिस का उन को उन की मेनहत का वाजिब दाम नहीं मिल पा रहा था. इस तरह की विषम परिस्थितियों को देखते हुए उन्होंने लोकतांत्रिक रूप से उन की स्थिति को उभरने के लिए 2 संगठनों की स्थापना की और उन्हें रजिस्टर्ड कराया.

बनाया फेडीज कपसाड वेलफेयर एसोसिएशन

फेडीज कपसाड़ कृषि बहुद्देशीय सहकारी समिति लिमिटेड के माध्यम से किसानों को सुखसुविधाएं प्रदान की गई हैं. यह एक साधरण सहकारी समिति नहीं है. इस समिति के माध्यम से पूजा गौड़ ने अपने वेतन का पैसा खर्च कर तकरीबन 7,000 वर्गफुट की जमीन पर कोऔपरेटिव हाउस बनाया. उन्हें संगठित किया गया और उन के अधिकार को समझाया गया. सरकार की विभिन्न दूरदर्शी इन महत्त्वपूर्ण योजनाओं के बारे में जनजागरूकता अभियान चलाया गया, जिस का परिणाम यह रहा कि प्रधानमंत्री आवास योजना, मनरेगा, जनजीवन मिशन और जिला परिषद और ब्लौक एवं ग्राम पंचायत स्तर पर चलाई गई योजना का सीधा लाभ वास्तविक लोगों को पहुंचना शुरू हुआ.

यह डा. पूजा गौड़ की दूरदर्शी सोच थी, जो वर्तमान में अध्यक्ष के रूप में हैं और चकराता प्रखंड के किसानों की भलाई के बारे में सोचा और उन को रोजगार मुहैया कराने की योजना बनाई और पुनर्वास की मुहिम को सफल बनाने में योगदान दिया. डा. पूजा गौड़ की पहली प्रथमिकता है कि किसानों को नई तकनीक से जोड़ कर उन की आमदनी को बढ़ाया जा सके.

 

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डा. पूजा गौड़ ने किसानों और महिलाओं को उन की माली स्थिति को बेहतर करने के लिए कोरोना काल में भी किसानों और महिलाओं द्वारा उत्पादित चीजों का बेहतर मूल्य दिलाने के लिए कंपनियों के साथ अनुबंध किया गया. इस का नतीजा यह हुआ कि ये कंपनियां सीधे कोऔपरेटिव हाउस पहुंचीं एवं किसानों के समस्त उत्पाद जैसे टमाटर, गोभी, शिमला मिर्च, खीरा, सेब, आड़ू और अन्य घरलू उत्पाद आदि को एक अच्छा बाजार दिलाया, जिस से किसानों को इलाके में तकरीबन डेढ़ करोड़ रुपए का राजस्व हासिल हुआ.

800 मीट्रिक टन उत्पादन पशु आहार संयंत्र से मिलेंगे रोजगार (Employment)

साबरकांठा: केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने पिछले दिनों गुजरात के साबरकांठा जिले के हिम्मतनगर में 800 मीट्रिक टन उत्पादन क्षमता वाले अत्याधुनिक पशु आहार संयंत्र का उद्घाटन किया. इस अवसर पर गुजरात के विधानसभा अध्यक्ष शंकर चौधरी सहित कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे.

मंत्री अमित शाह ने कहा कि साबर डेयरी की स्थापना के रूप में जो बीज बोया गया था, वह आज एक वट वृक्ष बन कर साढ़े 3 लाख से ज्यादा परिवारों की आजीविका का साधन बन चुका है.

अमित शाह ने यह भी कहा कि पशुपालन से जुड़ी कुछ महिलाओं से उन्होंने मुलाकात की. इन महिलाओं ने बताया कि साबर डेयरी और उस के दूध के व्यापार की वजह से ही वे आज सम्मान से जीवन जी रही हैं.

सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कहा कि दूध उत्पादन के क्षेत्र में अच्छे प्रदर्शन के लिए जिन 2 मंडलियों को सम्मानित किया गया, उन में दूध के व्यापार से एक करोड़ रुपए से अधिक का चैक हासिल करने वाली मंडली भी शामिल है.

उन्होंने आगे कहा कि सहकारी डेयरी आंदोलन ने न सिर्फ महिलाओं का सशक्तिकरण किया, बल्कि गांवों में समृद्धि लाने और पोषण प्रदान का भी काम किया है.

मंत्री अमित शाह ने कहा कि अमूल द्वारा शुरू की गई श्वेत क्रांति के कारण यह सफलता देखने को मिली है.

सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कहा कि तकरीबन 210 करोड़ रुपए की लागत से साबर डेयरी के पशु आहार संयंत्र स्थापना की गई है, ताकि स्थानीय लोगों के मवेशियों को पोषक आहार मिल सके.

उन्होंने कहा कि 800 मीट्रिक टन क्षमता का यह अत्याधुनिक चारा संयंत्र न केवल साबरकांठा और अरावली के किसानों की चारा संबंधी जरूरतों को पूरा करेगा, बल्कि रोजगार के नए अवसर भी पैदा करेगा.

उन्होंने कहा कि वर्ष 1976 में अपनी स्थापना से ले कर पशु आहार संयंत्र के उद्घाटन तक साबर डेयरी ने 2050 मीट्रिक टन पशु आहार क्षमता हासिल की है.

भारत में वर्ष 1970 में प्रतिदिन सिर्फ 40 लिटर प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष दूध उपलब्ध था, जबकि 2023 में देश में प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष 167 लिटर दूध की उपलब्धता थी. इस का मतलब है कि दुनिया के सभी देशों में प्रति व्यक्ति दूध उत्पादन की सब से ज्यादा औसत भारत की है और इस में सहकारी आंदोलन का बहुत बड़ा योगदान है.

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने किसानों से प्राकृतिक खेती अपनाने की अपील करते हुए कहा कि आने वाले दिनों में प्राकृतिक खेती किसान की समृद्धि का कारण बनेगी और देश एवं दुनिया के नागरिकों को कैंसर, डायबिटीज और ब्लडप्रेशर से मुक्त करने का साधन भी बनेगी.

उन्होंने आगे कहा कि प्राकृतिक खेती काफी आसान है और इस से समाज का स्वास्थ्य एवं आय बढ़ाने में काफी मदद मिल सकती है. प्राकृतिक खेती करने वाले किसानों को उन के उत्पाद के लिए अच्छी कीमत दिलाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय सहकारी आर्गेनिक लिमिटेड और राष्ट्रीय सहकारी निर्यात लिमिटेड की स्थापना की है, जो किसानों से प्राकृतिक खेती से उगाए गए उत्पाद खरीद कर उन का निर्यात करेगी.

मंत्री अमित शाह ने कहा कि प्राकृतिक खेती करने पर पहले साल में फसल थोड़ी कम हो सकती है, लेकिन दूसरे और तीसरे साल में लाभ होगा.।प्राकृतिक खेती करने पर केंचुए से ही खेत काफी समृद्ध हो जाएगा और कोई कीटनाशक छिड़कने की आवश्यकता नहीं होगी.

उन्होंने कहा कि इस प्रयोग को गुजरात में काफी अपनाया गया है और डेयरी क्षेत्र को अपने प्रशिक्षण कार्यक्रम में प्राकृतिक खेती के प्रशिक्षण को शामिल करना चाहिए.

सहकारिता मंत्री अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी मोदी ने ‘गोबरधन योजना’ की शुरुआत की है. यह योजना उन लोगों के लिए है, जिन के पास ज्यादा पशुधन है. गुजरात की कई डेयरियों ने गोबरधन की अवधारणा पर बहुत अच्छे तरीके से अमल किया है. गोबरधन से बनी खाद खेतों को समृद्ध बनाती है.

उन्होंने आगे कहा कि जब सहकारिता आंदोलन में डेयरी की शुरुआत की गई, उस समय किसी को नहीं पता था कि अमूल 60 हजार करोड़ रुपए का बड़ा तंत्र बन जाएगा.

उन्होंने कहा कि प्राकृतिक खेती की शुरुआत में भी यह प्रयोग व्यर्थ लग सकता है, लेकिन अंतत: यह भारत के किसानों के लिए 10 लाख करोड़ रुपए का वैश्विक बाजार खोलने और देश में समृद्धि लाने का साधन बनेगी.

पशुओं के लिए महामारी निधि (Pandemic Fund) परियोजना

नई दिल्ली : पशुपालन और डेयरी विभाग (डीएएचडी) की पशुधन पर अधिकार प्राप्त समिति (ईसीएएच) की 8वीं बैठक 28 अक्टूबर, 2024 को विज्ञान भवन में भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार प्रो. अजय कुमार सूद की अध्यक्षता और डीएएचडी की सचिव अलका उपाध्याय की उपाध्यक्षता में आयोजित की गई.

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर), केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ), भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर), जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) आदि के प्रतिनिधि बैठक में भारत के पशुधन स्वास्थ्य क्षेत्र में प्रगति पर चर्चा करने के लिए सदस्य के रूप में उपस्थित थे.

बैठक के दौरान विभाग ने पशु औषधियों, टीकों, जैविक पदार्थों और फीड एडिटिव्स के क्षेत्र में निर्धारित प्रक्रिया से अब तक किए गए प्रयासों और उपलब्धियों पर प्रकाश डाला. विभाग ने पशुओं की बीमारियों जैसे खुरपकामुंहपका रोग (एफएमडी), ब्रुसेलोसिस, पेस्ट डेस पेटिट्स रूमिनेंट्स (पीपीआर) और क्लासिकल स्वाइन फीवर (सीएसएफ) के लिए चल रहे विभिन्न टीकाकरण कार्यक्रमों में हुई महत्वपूर्ण प्रगति की भी जानकारी दी.

इसे पशुधन स्वास्थ्य और रोग नियंत्रण कार्यक्रम (एलएचडीसीपी) के तहत 100 फीसदी केंद्रीय वित्त पोषण मिल रहा है. ये सभी टीके स्वदेशी रूप से विकसित और देश में बनाए गए हैं, जो पशुधन स्वास्थ्य में आत्मनिर्भरता और वैश्विक सहयोग के लिए भारत की प्रतिबद्धता को प्रदर्शित करते हैं. इस के अलावा प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार को राष्ट्रीय डिजिटल पशुधन मिशन (एनडीएलएम) पर हुई प्रगति के बारे में भी जानकारी दी गई, जिस का उद्देश्य देश में टीकाकरण, प्रजनन और उपचार सहित सभी पशुधन और पशुपालन गतिविधियों को डिजिटल रूप से पहचानना और पंजीकृत करना है. डिजिटल प्लेटफार्म पर वर्तमान में हर सेकंड 16 से अधिक लेनदेन हो रहे हैं, जो कार्यक्रम की व्यापक पहुंच और दक्षता को दर्शाता है.

‘वन हेल्थ मिशन’ के तहत विभाग जल्द ही रोग प्रबंधन के लिए परिचालन तत्परता में सुधार करने के लिए पशु रोग प्रतिक्रिया पर केंद्रित एक मौक ड्रिल आयोजित करेगा. प्रो. अजय कुमार सूद ने हाल ही में मानक पशु चिकित्सा उपचार दिशानिर्देश (एसवीटीजी) और पशु रोगों के लिए संकट प्रबंधन योजना (सीएमपी) के साथसाथ 25 डालर मिलियन जी-20 महामारी निधि परियोजना के शुभारंभ की भी सराहना की. महामारी निधि परियोजना का उद्देश्य प्रयोगशाला क्षमताओं को मजबूत करना, रोग निगरानी को बढ़ाना और देश में पशु स्वास्थ्य प्रणालियों में लचीलापन बढ़ाने के लिए मानव संसाधन को मजबूत करना है.

ईसीएएच ने हाल ही में जारी पोल्ट्री रोग कार्ययोजना पर भी विचारविमर्श किया, जिस में जैव सुरक्षा उपायों, निगरानी बढ़ाने और टीकाकरण प्रोटोकाल के माध्यम से सक्रिय रोग प्रबंधन पर जोर दिया गया है, जिस से भारत में पोल्ट्री क्षेत्र और जनस्वास्थ्य दोनों की सुरक्षा हो सके.

केरल में पिछले दिनों हाईपैथोजेनिक एवियन इन्फ्लूएंजा (एचपीएआई) के प्रकोप के मद्देनजर विभाग ने बीमारी को नियंत्रित करने के लिए एक व्यापक रणनीति विकसित की है, ताकि जनस्वास्थ्य खतरों को रोका जा सके. बैठक के दौरान बताया गया कि रोगग्रस्त मुरगेमुरगियों को चिकित्सा निर्देशों के अनुसार मारने के लिए मुआवजे की दरों को संशोधित किया गया है और सितंबर के महीने के दौरान विभाग द्वारा सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इस संबंध में जानकारी दे दी गई है.

बैठक में यह भी रेखांकित किया गया कि विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूओएएच) ने हाल ही में आईसीएआर-एनआईवीईडीआई, बैंगलुरू को पीपीआर और लेप्टोस्पायरोसिस के लिए भारत में डब्ल्यूओएएच संदर्भ प्रयोगशालाओं के रूप में मान्यता दी है. इस से पहले आईसीएआर-एनआईएसएडी, भोपाल (एवियन इन्फ्लूएंजा के लिए) और केवीएसएसयू, बैंगलुरू (रेबीज के लिए) को पहले ही यह मान्यता दी जा चुकी है, जो पशुधन स्वास्थ्य को बढ़ाने के लिए डीएएचडी की निरंतर प्रतिबद्धता को दर्शाता है.

पशु स्वास्थ्य पर अधिकार प्राप्त समिति
साल 2021 में स्थापित, ईसीएएच-डीएएचडी के थिंक टैंक के रूप में काम करता है, जो राष्ट्रीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों, उभरते रोग खतरों, वन हेल्थ प्रयासों और पशु चिकित्सा टीकों, दवाओं और जैविक क्षेत्र के लिए नियामक ढांचे पर साक्ष्य-आधारित दृष्टिकोण और नीति संबंधी सिफारिशें प्रदान करता है.

किसानों के मददगार हो सकते हैं  फिश फार्म (Fish Farms )

भारत का मौसम मछलीपालन के लिए बहुत अच्छा है. भारत में सब से अधिक मछली उत्पादन वाले राज्यों में आंध्र प्रदेश, गुजरात, केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और पंजाब शामिल हैं. पूरे देश में करीब डेढ़ करोड़ लोग मछलीपालन से रोजगार हासिल कर रहे हैं.

केंद्र सरकार का कृषि मंत्रालय राज्यों में मछलीपालन विभाग खोल कर इस का प्रचारप्रसार करता है. इस के साथ ही साथ नेशनल फिशरीज डेवलपमेंट बोर्ड भी मछलीपालन को बढ़ावा देता है. ये दोनों ही विभाग किसानों को मछलीपालन से जुड़ी जानकारी देते हैं. सब से पहले किसानों को इन विभागों से संपर्क कर के मछलीपालन उद्योग के बारे में पता करना चाहिए. इन विभागों से किसानों को मछलीपालन की केवल जानकारी ही नहीं मिलती, बल्कि बैंक से लोन पाने के साथ ही साथ तकनीकी मदद भी मिल जाती है. किसान अपने तालाब बना कर उन को ‘फिश फार्म’ की तरह से बना सकते हैं. वे तालाब की मेंड़ पर कई तरह के पेड़ लगा सकते हैं. सरकारी मदद से मछली के अच्छी प्रजाति के बीज भी मिल जाते हैं.

मछलीपालन के लिए  तालाब के लिए जमीन का चुनाव करते समय यह देखें कि जमीन बहुत उबड़खाबड़ न हो.  जलभराव वाला क्षेत्र नहीं होना चाहिए. जलभराव की दशा में बरसात के दिनों में ऐसा पानी वहां जम जाता है, जो मछलियों को नुकसान पहुंचा सकता है. तालाब के आसपास खेत नहींहोने चाहिए. खेत में पैदावार के लिए कई तरह के कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जाता है, जो मछलियों को नुकसान पहुंचा सकते हैं. तालाब का चुनाव मछली की प्रजाति के मुताबिक होना चाहिए. कुछ मछलियां कम पानी में रहती हैं और कुछ गहरे पानी में रहती हैं. बंजर जमीन और खाली पड़ी जमीन में तालाब बनाने का काम किया जा सकता है.

तालाब में मछलियों की सुरक्षा का खास खयाल रखना चाहिए. पहली बार जब मछलीपालन शुरू करें, तो तालाब में बीज डालने के लिए उन का साइज 50 से 100 ग्राम होना चाहिए. तालाब को रोगमुक्त रखने के लिए जैविक कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए. पहली बार तालाब में पानी भर कर 15 दिनों के लिए छोड़ देना चाहिए. तालाब के पानी और मिट्टी के पीएच को समयसमय पर देखना चाहिए. मछली की प्रजाति अपने लोकल बाजार के हिसाब से लेनी चाहिए. मछलियों को बीमारियों से दूर रखने के लिए तालाब को साफसुथरा और रोगमुक्त रखना चाहिए. मछलियों को खली और दूसरी खाने की चीजें देनी चाहिए. खाद्य पदार्थ को तालाब के कोने में डाल देना चाहिए. इस के अलावा तालाब का पानी समयसमय पर बदलते रहना चाहिए.

करीब 1 साल के बाद मछलियों की बिक्री शुरू होनी चाहिए. तब तक मछलियां 800 ग्राम से डेढ़ किलोग्राम के करीब हो जाती हैं. अगर किसानों में लगन और सही जानकारी है, तो वे अपने तालाब में ही मछली के छोटे बच्चे भी पाल कर उन को बीज की तरह से प्रयोग कर सकते हैं. शुरुआत में किसानों को छोटे स्तर पर इसे शुरू करना चाहिए. फिर धीरेधीरे इसे आगे बढ़ाना चाहिए. तालाब को ‘फिश फार्म’ की तरह से विकसित करना चाहिए. तालाब के पास सब्जियों और पपीते की खेती की जा सकती है. कुछ लकड़ी वाले पेड़ भी लगाए जा सकते हैं. ‘फिश फार्म’ बनाने से किसानों का रिस्क कम हो जाता है और उन की कमाई बढ़ जाती है. मछली खाने वालों की तादाद में लगातार इजाफा होने से यह बिजनेस बढ़ रहा है. खाने के रूप में मछली बहुत फायदेमंद होती है. यह प्रोटीन का सब से अच्छा जरीया होती है. मछली में कोलेस्ट्राल सब से कम होता है. इस के अलावा मछली में मिनरल व विटामिन भी ज्यादा होते हैं. इसे एक हेल्दी फूड माना जाता है.

ज्वार (sorghum) की नई किस्म : प्रताप ज्वार 2510

उदयपुर : महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर के वैज्ञानिकों ने किसानों, पशुपालकों के लिए ज्वार की नई किस्म प्रताप ज्वार 2510 विकसित की है. इस किस्म का विकास अखिल भारतीय ज्वार अनुसंधान परियोजना, उदयपुर में कार्यरत वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है.

डा. अरविंद वर्मा, निदेशक अनुसंधान, महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर ने बताया कि राजस्थान के दक्षिणीपूर्वी क्षेत्र में ज्वार एक प्रमुख मिलेट फसल है, जो वर्षा आधारित क्षेत्रों में अनाज और पशु चारे के लिए उगाई जाती है. पशु चारे के लिए ज्वार का प्रदेश में प्रमुख योगदान है. उन्होंने बताया कि राजस्थान में ज्वार की खेती लगभग 6.4 लाख हैक्टेयर में की जा रही है एवं मुख्य रूप से अजमेर, नागौर, पाली, टोंक, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, राजसमंद एवं भीलवाड़ा जिलों में इस की खेती होती है.

अनुसंधान निदेशक ने बताया कि अखिल भारतीय ज्वार अनुसंधान परियोजना सन 1970 में प्रारंभ हुई थी तथा इस परियोजना के अंतर्गत अभी तक कुल 11 किस्में क्रमशः एसपीवी 96, एसपीवी 245, राजचरी-1, राजचरी-2, सीएसवी 10, एसपीएच 837, सीएसवी 17, प्रताप ज्वार 1430, सीएसवी 23, प्रताप चरी 1080 एवं प्रताप राज ज्वार-1 अनुमोदित हो चुकी हैं.

ज्वार की नई किस्म प्रताप ज्वार 2510 को पत्र संख्या 40271 के अंतर्गत 9 अक्तूबर, 2024 को जारी भारत सरकार के राजपत्र में राजस्थान राज्य के लिए अधिसूचित किया गया.

परियोजना प्रभारी डा. हेमलता शर्मा ने बताया कि यह मध्यम अवधि (105-110 दिन) में पकने वाली किस्म है, जिस से 40-45 क्विंटल प्रति हैक्टेयर दाने की एवं 130-135 क्विंटल प्रति हैक्टेयर सूखे चारे की उपज प्राप्त होती है तथा यह किस्म एंथ्रेकनोज, जोनेट, मोल्ड रोगों एवं तना मक्खी तथा तना छेदक कीटों के लिए सामान्य प्रतिरोधी है.

डा. अजीत कुमार कर्नाटक, कुलपति, महाराणा प्रताप कृषि प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, उदयपुर ने बताया कि राजस्थान में ज्वार मुख्य रूप से चारे के लिए उगाई जाती है किंतु विगत वर्ष 2023 ‘अंतर्राष्ट्रीय मिलेट वर्ष’ के रूप में मनाया गया, जिस से ज्वार के दानों में पोषक गुणों के बारे में आमजन में जागृति आई है. ज्वार एक ग्लुटेन मुक्त अनाज होता है, अतः इस का उपयोग दलिया, ब्रैड, केक आदि बनाने में किया जाता है. ज्वार के दाने का उपयोग खाद्य तेल, स्टार्च, डेक्सट्रोज आदि के लिए भी किया जाता है.

उन्होंने आगे बताया कि वैज्ञानिक तरीके से ज्वार की खेती करने से राजस्थान के किसान इस से अधिक उत्पादन एवं आर्थिक लाभ प्राप्त कर सकते हैं.

बढ़ेगी दुग्ध उत्पादन (Milk Production) क्षमता

लखनऊ : उत्तर प्रदेश के दुग्ध विकास मंत्री धर्मपाल सिंह ने विभागीय अधिकारियों को निर्देशित किया है कि दुग्ध उत्पादन 3.5 लाख लिटर प्रतिदिन किया जाए और तरल दुग्ध बिक्री 2 लाख लिटर प्रतिदिन किए  जाने के प्रयास किए  जाएं. प्रत्येक दुग्ध संघ कम से कम 5 मिल्क बूथ बनाने का लक्ष्य निर्धारित कर उसे पूरा करे. दुग्ध संघों में कार्यरत डेयरी प्लांट की क्षमता उपयोगिता को बढ़ा कर 50 फीसदी किया जाए.

दुग्ध विकास मंत्री धर्मपाल सिंह ने पिछले दिनों विधान भवन स्थित अपने कार्यालय कक्ष में विभागीय कार्यों के पिछले  एक सप्ताह में क्रियान्वयन की समीक्षा की. उन्होंने कहा कि दुग्ध विकास विभाग का लक्ष्य प्रदेश की जनता को शुद्ध दूध उपलब्ध कराना है और दुग्ध उत्पादन से जुड़े किसानों, पशुपालकों को दुग्ध मूल्य का नियमित रूप से भुगतान कराना प्राथमिकता है.

उन्होंने विभागीय अधिकारियों को बंद पड़ी दुग्ध समितियों को पुनः चालू किए जाने और वर्तमान में संचालित समितियां किसी भी कारण से बंद न किए जाने पर विशेष बल दिया.

मंत्री धर्मपाल सिंह ने कहा कि नंद बाबा एवं गोकुल पुरस्कार के वित्तीय वर्ष 2023-24 के लाभार्थियों की चयन सूची तैयार कर उन्हें पुरस्कृत करने की कार्यवाही शीघ्र पूरी की जाए. दुग्ध विकास मंत्री ने कानपुर, गोरखपुर और कन्नौज डेयरी प्लांट का संचालन एनडीडीबी को दिए जाने के संबंध में हुई प्रगति की भी समीक्षा की और कहा कि जो भी औपचारिकताएं शेष या अपूर्ण हैं, उन्हें शीघ्र पूरा किया जाए. प्रदेश में दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए नई समितियों के गठन एवं पुनर्गठन का लक्ष्य निर्धारण किया गया है, उसे सुदृद्ध कार्ययोजना बना कर शीघ्र पूरा किया जाए. साथ ही, उन्होंने कहा कि पराग के उत्पादों की मार्केटिंग कर विशेष ध्यान दिया जाए.

उन्होंने निर्देश दिए कि किसानों एवं पशुपालकों को उन के दुग्ध मूल्य का भुगतान निर्धारित समयावधि में किया जाए और देरी न होने पाए. वर्तमान भुगतान के साथ ही बकाया धनराशि का भी भुगतान कर भुगतान प्रक्रिया को नियमित किया जाए और अवगत कराया गया कि वर्तमान में 18108 निबंधित समितियां हैं, जिस के सापेक्ष 7094 कार्यरत समितियां हैं. प्रत्येक दुग्ध संघ द्वारा 2 दुग्ध समितियों का भ्रमण एवं अनुश्रवण किया जा रहा है. पिछले एक माह में 775 कार्यरत एवं 459 अकार्यरत दुग्ध समितियां कुल 1234 दुग्ध समितियों में भ्रमण किया गया. 169 अकार्यरत समितियों को कार्यरत किया गया.

बैठक में दुग्ध विकास विभाग के प्रमुख सचिव के. रवींद्र नायक ने मंत्री को आश्वस्त करते हुए कहा कि उन से प्राप्त दिशानिर्देशों का अनुपालन सुनिश्चित किया जाएगा. उन्होंने अधिकारियों को निर्देशित किया कि जिन दुग्ध संघों द्वारा अभी भी दुग्ध मूल्य भुगतान में उदासीनता बरती जा रही है, उन के द्वारा भुगतान कार्य गंभीरता से किया जाए.

उन्होंने अधिकारियों को समितियों की संख्या बढ़ाए जाने के संबंध में तत्परता से काम किए जाने के निर्देश दिए. बैठक में गठन/पुनर्गठन के सापेक्ष संचालित दुग्ध समितियां, दुग्ध समितियों द्वारा भ्रमण, डेयरी प्लांट की उपयोगिता क्षमता, दुषा उपार्जन, तरल दुग्ध बिक्री, बकाया दुग्ध, मूल्य भुगतान आदि की गहन समीक्षा की गई.

बैठक में पीसीडीएफ के प्रबंध निदेशक आनंद कुमार सिंह, दुग्ध आयुक्त राकेश कुमार मिश्रा, पीसीडीएफ के डा. मनोज तिवारी, नयन तारा सहित शासन के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे.

पशुपालकों के लिए लाभकारी मोबाइल पशु चिकित्सा

जयपुर: पशुपालन, गोपालन, डेयरी और देवस्थान मंत्री जोराराम कुमावत ने कहा कि हमारी सरकार पशुओं व पशुपालकों के विकास के प्रति बहुत ही संवेदनशीलता के साथ काम कर रही है. उन्होंने आगरा रोड स्थित राजस्थान राज्य पशुधन प्रबंधन एवं प्रशिक्षण संस्थान में पिछले दिनों मोबाइल वेटेरिनरी इकाइयों के लिए काल सैंटर के लोकार्पण कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में कहा कि काल सैंटर का संचालन निश्चित रूप से विभाग के लिए एक बहुत ही सराहनीय कदम है. कार्यक्रम में विशिष्ट अतिथि के रूप में राज्य मंत्री, पशुपालन, गोपालन, मत्स्य एवं गृह विभाग जवाहर सिंह बेढम उपस्थित रहे.

मंत्री जोराराम कुमावत ने प्रधानमंत्री मोदी और मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को धन्यवाद देते हुए कहा कि मोबाइल पशु चिकित्सा एवं काल सैंटर पशुधन और पशुपालकों के लिए एक बहुत बड़ी सुविधा है. काल सैंटर की सुविधा होने से घर पर ही पशुओं का इलाज मिलना शुरू हो जाएगा, जिस से पशुपालकों के समय और पैसे दोनों की बचत होगी. उन्होंने कहा कि मंगला पशु बीमा योजना की क्रियान्विति भी जल्द शुरू की जाएगी.

पशुपालन, गोपालन, मत्स्य एवं गृह राज्य मंत्री जवाहर सिंह बेढम ने कहा कि किसानों की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने का एक जरीया पशुपालन है, इसीलिए पशु को पशुधन कहा गया है. पशुपालन के माध्यम से हमारे ग्रामीण क्षेत्र की अर्थव्यवस्था नियमित रहती है.

उन्होंने आगे कहा कि पशुपालक के घर पर पशुओं के लिए चिकित्सकीय सुविधा उपलब्ध कराना एक उपयोगी पहल है.

इस अवसर पर शासन सचिव पशुपालन, गोपालन एवं मत्स्य डा. समित शर्मा ने कहा कि काल सैंटर का अधिकतम उपयोग सुनिश्चित करते हुए पशुधन और पशुपालकों को अधिक से अधिक संख्या में लाभ पहुंचाना इस योजना का उद्देश्य है. आने वाले 6 महीनों में पशुपालन विभाग प्रदेश के सर्वश्रेष्ठ 3 विभागों में होगा, ऐसा हमारा प्रयास है.

उन्होंने काल सैंटर पर वीडियो कालिंग की सुविधा शुरू करने के लिए भी बीआईएफएल के अधिकारियों को सुझाव दिया.

कार्यक्रम के आरंभ में पशुपालन विभाग के निदेशक डा. भवानी सिंह राठौड़ ने अतिथियों का स्वागत करते हुए कहा कि मोबाइल पशु चिकित्सा सेवा द्वारा 1,61,934 शिविरों के माध्यम से 27.48 लाख से अधिक पशुओं का उपचार करते हुए लगभग 6.86 लाख पशुपालकों को लाभान्वित किया गया है.

कार्यक्रम को बीएफआईएल के प्रतिनिधि किशोर संभशिवम ने भी संबोधित किया. अतिरिक्त निदेशक डा. आनंद सेजरा ने अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन किया. कार्यक्रम का संचालन डा. हेमंत पंत ने किया.

कार्यक्रम में मोबाइल वेटरिनरी यूनिट की सेवा प्रदाता फर्म से सुनील अग्रवाल और महेश गुप्ता, बीएफआईएल से असद और अमन, प्रहलाद नागा निदेशक गोपालन, डा. प्रकाश भाटी, डा. सुरेश मीना, डा. प्रवीण कुमार, डा. तपेश माथुर सहित बड़ी संख्या में विभाग के अधिकारी और पशुपालक उपस्थित थे.

6 महीने में 6 लाख से अधिक पशुओं का टीकाकरण (Vaccination)

देवास : उपसंचालक, पशुपालन एवं डेयरी विभाग, देवास के डा. सीएस चौहान ने बताया कि केंद्र एवं राज्य शासन द्वारा पशु कल्याण के लिए संचालित विभिन्न कार्यक्रमों में से मुख्य रूप से टीकाकरण, उपचार, चलित चिकित्सा इकाइयां संचालन, गौशाला संचालन एवं राजमार्गों से पशु हटाना आदि कार्य पशुपालन विभाग के अमले द्वारा जिले में किया जा रहा है.

उन्‍होंने आगे यह भी बताया कि विभाग द्वारा वित्तीय वर्ष में 1 अप्रैल से अब तक टीकाकरण में 6 लाख, 32 हजार, 619 पशुओं में विभिन्न टीका किया गया. 1 लाख, 38 हजार, 815 पशुओं का उपचार संस्थाओं द्वारा किया गया. चलित चिकित्‍सा इकाई का साल 1962 से संचालन किया जा रहा है, जो घरघर पहुंच कर पशुओं में उपचार करती है. इस में 4377 पशुपालकों को घर पहुंच कर सेवाएं दी गईं.

जिले के मुख्य राजमार्गों पर गौ पैट्रोलिंग द्वारा पशुओं को सड़क हादसों से बचाने के लिए सड़क से गौशाला पहुंचाया जा रहा है. जिले में 84 गौशाला संचालित हैं, जिस में 10 हजार, 845 गौवंश संरक्षित हैं, जिन को इस वर्ष वर्तमान तक 491.04 लाख का अनुदान सहायता दी गई है.