Urad: उड़द  की आधुनिक खेती

दलहनी फसलों में उड़द (Urad) की एक खास जगह है. शाकाहारी व्यक्तियों के लिए प्रोटीन की जरूरत पूरी करने में दलहनी फसलों का खास योगदान है.

दलहनी फसलों में प्रोटीन की मात्रा 15 से 34 फीसदी पाई जाती है. दलहनी फसलों की खेती से मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ती है.

इन फसलों की खेती में नाइट्रोजन वाले उर्वरक कम डालने की जरूरत पड़ती है, क्योंकि इन फसलों की जड़ों की गांठों में पाए जाने वाले जीवाणुओं द्वारा वायुमंडल से नाइट्रोजन ले कर इक्ट्ठा किया जाता है. लिहाजा दलहनी फसलों की खेती करने से किसानों को दोहरा मुनाफा मिलता है.

उड़द (Urad) की खेती आधुनिक विधि से करने में उपज ज्यादा होती है. यदि कोई किसान फसल पकने के समय खड़ी फसल से फलियों की तोड़ाई कर लेता है, तो खेत में बचे हुए खाली पौधों की खेत में ही जुताई कर देने से मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ व जीवाणुओं की मात्रा में इजाफा होगा, जिस से कि अगले मौसम में उस खेत में दूसरी फसल को लाभ पहुंचता है.

जमीन का चुनाव : उड़द (Urad) की खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी जिस में पानी की रुकावट न हो बढि़या मानी गई है. वैसे किसी भी तरह की मिट्टी में इस की खेती कामयाबी से की जा सकती है.

बोने का सही समय : उड़द (Urad) की बोआई के लिए मार्च का पहला हफ्ता मुनासिब माना जाता है. लेकिन इस की बोआई अपै्रल तक की जा सकती है. उड़द (Urad) की बोआई अरहर के साथ मिला कर मिलवां खेती के रूप में की जाती है. अच्छी उपज के लिए समय से बोआई करना मुनासिब रहता है.

बीज की मात्रा : 1 हेक्टेयर बोआई के लिए करीब 25 से 30 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है. जहां तक हो सके प्रमाणित बीज का ही इस्तेमाल करें, जो कि सरकारी बीज गोदामों या कृषि विश्वविद्यालयों पर मिलता रहता है. सरकारी बीज की दुकानों से भी बीज ले सकते हैं.

बोआई : उड़द (Urad) की खेती के लिए कूंड़ों में बोआई करना ठीक रहता है. इस में कूंड़ से कूंड़ की दूरी 30 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 10 सेंटीमीटर रखनी चाहिए. उड़द (Urad) की बोआई बिखेर कर करनी चाहिए, क्योंकि पाटा लगाते समय यदि बीज इकट्ठा हो जाएंगे तो एक ही स्थान पर पौधों की संख्या ज्यादा हो जाएगी व फसल की बढ़वार नहीं होगी.

बीज उपचार :  बोआई से पहले बीजों का उपचार करना जरूरी होता है. यह काम कम लागत में किया जा सकता है. यह फसल की अच्छी पैदावार व बीमारियों की रोकथाम के लिए बेहतर होगा. 3 ग्राम थीरम प्रति किलोग्राम बीज की दर से ले कर बीजों को उपचारित करने के बाद बीजों को राईजोबियम कल्चर के 1 पैकेट से 10 किलोग्राम बीजों की दर से उपचारित करें, इस से फसल की पैदावार में बढ़ोत्तरी होगी.

खाद व उर्वरक : दलहनी फसलों की खेती में उर्वरकों का कम इस्तेमाल करना चाहिए. यदि कंपोस्ट व गोबर की सड़ी हुई खाद मौजूद हो, तो उसे खेत में जरूर डालें. इस से मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरा शक्ति बढ़ती है. उड़द (Urad) की खेती के लिए 15 से 20 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम फास्फोरस और 20 से 30 किलोग्राम गंधक प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई से पहले इस्तेमाल करने से उपज में इजाफा होगा.

सिंचाई : जायद मौसम में उड़द (Urad) की खेती करने के लिए सिंचाई की जरूरत पड़ती है. हर हफ्ते जरूरत के मुताबिक सिंचाई करनी चाहिए. गरमी में पानी की ज्यादा जरूरत पड़ती है.

खरपतवारों की रोकथाम : बोआई के 20 से 25 दिनों बाद निराई व गुड़ाई कर के समय से खरपतवारों को निकाल देना चाहिए. चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के लिए खरपतवार नाशक दवा का भी इस्तेमाल किया जा सकता है. इस के लिए फल्यूक्लोरीन 45 फीसदी दवा की 2 लीटर मात्रा 700 से 800 लीटर पानी में घोल कर बोआई से पहले छिड़काव कर के खेत में मिला देना चाहिए. यदि यह दवा न मिले तो दूसरी दवा लासों की 4 लीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से 700 से 800 लीटर पानी में घोल कर बोआई के तुरंत बाद छिड़काव करें.

 

उड़द (Urad) के खास कीट

काला लाही (माहूं) : पौधे से फली निकलने की अवस्था में इस कीट के शिशु व वयस्क पौधों की पत्तियों पर पाए जाते हैं. ये बसंतकालीन फसल की कोमल टहनियों, फूलों व कम पकी फलियों से रस चूसते हैं, जिस से पौधे कमजोर हो जाते हैं. मानसून से पहले हलकी बारिश होने पर फलियां और दाने कमजोर होते हैं. पुरवा हवा बहने से गरमी की फसल पर इन की संख्या अचानक तेजी से बढ़ सकती है.

रोकथाम : माहूं का हमला होने पर पीले चिपचिपे ट्रैप का इस्तेमाल करें, जिस से माहूं ट्रैप पर चिपक कर मर जाएं. परभक्षी काक्सीनेलिड्स या सिरफिड या क्राइसोपरला कार्निया का संरक्षण कर के 50000-100000 अंडे़ या सूंडि़यां प्रति हेक्टयर की दर से छोड़ें. नीम का अर्क 5 फीसदी या 1.25 लीटर नीम का तेल 100 लीटर पानी में मिला कर छिड़कें. ज्यादा प्रकोप होने पर मेटासिस्टाक्स 25 ईसी या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल या डाइमेथोएट 30 ईसी का 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी का छिड़काव करें.

हरा फुदका (जैसिड) : फसल की शुरुआती अवस्था से ले कर इस के शिशु व वयस्क पौधों की पत्तियां व फलियां निकलने तक आक्रमण कर के रस चूसते हैं. इस से पत्तियां पीली पड़ जाती हैं और आखिर में सूख कर झड़ने लगती हैं.

रोकथाम : कीट की संख्या नुकसान के स्तर से ऊपर जाते ही मेटासिस्टाक्स 25 ईसी या डाइमेथोएट 30 ईसी या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल या थायोमेक्जाम 25 ईसी का 1 मिलीमीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें.

सफेद मक्खी : ये कीट पौधों से रस चूस कर पत्तियों पर रस छोड़ते हैं. द्रव पर काला चूर्णी फफूंदी (शूटी मोल्ड) के पनपने और फैलने के कारण प्रकाश संश्लेषण की क्रिया बाधित होती?है. पीला मोजैक के विषाणु के तेजी से फैलाव से पत्तियां पीली पड़ जाती हैं और फलियां कम लगती हैं और उन का आकार सामान्य से छोटा होता है. उन में दाने पूरी तरह विकसित नहीं हो पाते. फसल पूरी तरह से बरबाद हो जाती है.

रोकथाम : बोआई से 24 घंटे पहले डायमेथोएट 30 ईसी कीटनाशी रसायन से 8.0 मिलीलीटर प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजोपचार करना चाहिए. मिथाइल डेमीटान (मेटासिस्टाक्स) 25 ईसी का 625 मिलीलीटर या मैलाथियान 50 ईसी या डायमेथोएट 30 ईसी का 1 लीटर प्रति हेक्टेयर की दर से जरूरत पर छिड़काव करना चाहिए.

थ्रिप्स : उड़द (Urad) की फसल पर फूल की दशा में गरमी की बोआई में थ्रिप्स का मुलायम कलियों पर हमला होता है. ये कीट फूलों को बहुत नुकसान पहुंचाते हैं. बसंत व गरमी में फूल खिलने से पहले ही झड़ जाते हैं. दाने सही तरह से नहीं बन पाते. सभी रस चूसक कीटों में थ्रिप्स सब से ज्यादा नुकसानदायक है.

रोकथाम : जमीन में नमी की कमी होने पर 1 बार हलकी सिंचाई कर देनी चाहिए ताकि थ्रिप्स के हमले को कम किया जा सके. थ्रिप्स की रोकथाम के लिए फूल खिलने से पहले ही डायमेथोएट 30 ईसी या मैलाथियान 50 ईसी का 1 लीटर प्रति हेक्टेयर या मेटासिसटाक्स 25 ईसी का 700 मिलीलीटर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

Uradखास रोग

पीली चितेरी रोग (येलो मोजेक) : यह विषाणु द्वारा पैदा होने वाला सब से ज्यादा विनाशकारी रोग है. यह विषाणु बीज व छूने से नहीं फैलता. पीली चितेरी रोग सफेद मक्खी (बेमिसिया टैबेसाई) जो एक रस चूसक कीट है, के द्वारा फैलता है. इस रोग की उग्र दशा में 100 फीसदी तक उपज का नुकसान होता है. जो पौधे शुरुआत में ही रोग ग्रसित हो जाते है, वे बिना कोई उपज दिए ही खत्म हो जाते हैं.

रोकथाम : रोग रोधी प्रजातियां नरेंद्र उड़द 1, आईपीयू 94-1 (उत्तरा), आजाद उड़द 1, केयू 300, शेखर 2 आदि लगाएं. सफेद मक्खी की रोकथाम के लिए फसल पर मेटासिस्टाक्स या डामेथोएट या मोनोक्रोटोफास (0.04 फीसदी) से छिड़काव करना चाहिए.

झुर्रीदार पत्ती रोग (लीफ क्रिंकल) : यह रोग उड़द (Urad) बीन लीफ क्रिंकल विषाणु द्वारा होता है. रोग का फैलाव पौधे के रस व बीज से होता है. यह खेत में लाही (माहूं) व अन्य कीटों द्वारा भी फैलता है. इस रोग के लक्षण फसल बोने के 3-4 हफ्ते बाद नजर आते हैं. रोगी पत्तियों की परत पर सिकुड़न (झुर्रियां) व मरोड़पन होता है. रोगी पौधों में फूल देर से आते?हैं और वे छोटे व गुच्छेदार हो जाते हैं. अधिकतर कलिकाएं व फूल पूरी तरह से बढ़वार होने से पहले ही गिर जाते हैं.

रोकथाम : यह रोग सफेद मक्खी या माहूं द्वारा फैलता है, इसलिए इस की रोकथाम करने के लिए फसल पर मेटासिस्टाक्स या मैलाथियान या डायमेथोएट या मोनोक्रोटोफास (0.04 फीसदी) से छिड़काव करना चाहिए.

सर्कोस्पोरा पत्र बुंदकी रोग (सर्कोस्पोरा लीफ स्पाट) : इस रोग के लक्षण पत्तियों पर गहरे भूरे रंग के धब्बे के रूप में दिखाई देते हैं. धब्बों का बाहरी भाग भूरे रंग का होता है. ये धब्बे पौधे की शाखाओं व फलियों पर भी बन जाते हैं. सही वातावरण में ये धब्बे बड़े आकार के हो जाते हैं और फूल आने व फलियां बनने के समय रोगी पत्तियां गिर जाती हैं.

रोकथाम : बोआई से पहले बीजों को कवकनाशी कार्बाडेंजिम 2 ग्राम या थीरम 2-5 ग्राम से प्रति किलोग्राम की दर से उपचारित करना चाहिए. फसल पर रोग के लक्षण दिखाई पड़ते ही कार्बेंडाजिम (0.1 फीसदी) या मैंकोजेब (0.2 फीसदी) कवकनाशी के घोल का छिड़काव करना चाहिए.

चूर्णी फफूंदी रोग (पाउड्री मिल्ड्यू) : यह रोग इरीसिफी पोलीगोनाई नामक कवक द्वारा पैदा होता है. गरम और सूखे वातावरण में यह रोग तेजी से फैलता है. इस रोग में पौधों की पत्तियों, तनों व फलियों पर सफेद चूर्णी धब्बे दिखाई देते हैं. ये धब्बे बाद में मटमैले रंग के हो जाते हैं. रोग के बहुत ज्यादा प्रकोप से पत्तियां पूरी विकसित होने से पहले ही सूख जाती हैं.

रोकथाम : फसल पर रोग के लक्षण दिखाई देते ही कार्बेंडाजिम 1 ग्राम या सल्फेक्स 3 ग्राम का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए.

राइजोक्टोनिया जाल अंगमारी (वेब ब्लाइट) : यह रोग राइजोक्टोनिया सोलेनाई नामक कवक द्वारा पैदा होता है, जो माकूल वातावरण मिलने पर जल्दी ही फैल कर डंठल व तने तक पहुंच जाता है. इस रोग में पत्तियां पहले पीली और बाद में भूरे रंग की हो कर सूख जाती हैं. ज्यादा प्रकोप में धब्बे पकी फलियों पर भी दिखाई देते हैं.

रोकथाम : बोआई से पहले बीजों को कवकनाशी जैसे थीरम या वाइटावैक्स की 2.5 ग्राम मात्रा से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर के बोना चाहिए. खड़ी फसल में संक्रमण दिखाई देने पर कार्बाडेंजिम (बेनोमिल) का 1 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए.

कटाईगहाई

जब फसल 80 फीसदी तक पक जाती है, तो उसे जड़ से उखाड़ लेते हैं. उड़द (Urad) की फलियां गुच्छों में लगती हैं. पूरी फसल में फलियों को 2 से 3 बार में तोड़ लिया जाता है. आमतौर पर खरीफ की फसल में कुछ फलियां आखिर तक बनती रहती हैं. ऐसी दशा में पकी फलियों को तोड़ना फायदेमंद होगा. तकरीबन 80 फीसदी फलियां पकने पर फसल की कटाई कर सकते हैं. पकी फसल पर बारिश होने की हालत में फलियों के अंदर दाने जमने लगते हैं. इसलिए मौसम को ध्यान में रखते हुए फसल की कटाई व फलियों की तोड़ाई करना फायदेमंद रहता है.

उपज : उड़द (Urad) की औसत उपज 10 से 15 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है. वैज्ञानिक विधि से खेती करने पर इस की पैदावार 25 क्विंटल प्रति हेक्टयर तक ली जा सकती है.

Cluster Bean : ग्वार के उन्नत बीजों की खेती

Cluster Bean : ग्वार एक ऐसी फसल है जिस से बारानी इलाकों में भी उगा कर फायदा लिया जा सकता है. बारानी इलाके वे होते हैं जहां का इलाका शुष्क या असिंचित होता है यानी वहां की खेती बारिश पर आधारित होती है. जरूरत है केवल समय के साथ चलने की इसलिए आज के दौर में खेती के आधुनिक तौरतरीकों को अपना कर खेती करें.

ग्वार की फसल को पौष्टिक चारे के अलावा हरी खाद के लिए भी उगाया जाता है. हरियाणा के अनेक इलाकों में ग्वार की खेती ज्यादातर उस के दानों के लिए की जाती है.

ग्वार में गोंद होने की वजह से इस बारानी फसल का औद्योगिक महत्त्व भी बढ़ता जा रहा है. भारत से करोड़ों रुपए का गोंद विदेशों को बेचा जाता है. ग्वार की उन्नत किस्मों में 30 से 35 फीसदी तक गोंद की मात्रा होती है.

गंवई इलाकों में ग्वार की फलियों के साथसाथ फूलों का साग बना कर खाने में इस्तेमाल किया जाता है. अब तो शहरों में भी ग्वार की फलियों को सब्जी के रूप में बहुत से लोग पसंद करते हैं.

ग्वार की फली (Cluster Bean)  का बाजार भाव भी अच्छा मिलता है, इसलिए किसानों को चाहिए कि वह ग्वार की खेती करते समय जागरूक रहें और अपने इलाके के मुताबिक उन्नत किस्मों के बीजों का इस्तेमाल करें, जिस से बेहतर पैदावार मिल सके.

ग्वार की अच्छी पैदावार के लिए रेतीली दोमट मिट्टी वाली जमीन अच्छी रहती है. हालांकि हलकी जमीन में भी इसे पैदा किया जा सकता है, परंतु कल्लर (ऊसर) जमीन इस के लिए ज्यादा ठीक नहीं है.

जमीन की तैयारी : सब से पहले 2-3 जुताई कर के खेत को तैयार करें. खेत की जमीन एकसार करने के साथसाथ खरपतवारों का भी खत्मा कर दें.

बोआई का समय : जल्दी तैयार होने वाली फसल के लिए जून के दूसरे पखवारे में बोआई करें. इस के लिए एचजी 365, एचजी 563, एचजी 2-20, एचजी 870 और एचजी 884 किस्मों को बोएं.

देर से तैयार होने वाली फसल के लिए एचजी 75, एफएस 277 की मध्य जुलाई में बोआई करें. अगेती किस्मों के लिए बीज की मात्रा 5-6 किलोग्राम प्रति एकड़ और मध्य अवधि के लिए बीज 7-8 किलोग्राम प्रति एकड़ की जरूरत होती है. बीज की किस्म और समय के मुताबिक ही बीज बोएं.

फसल बोने से पहले मिट्टी की जांच जरूर करा लें ताकि खाद व उर्वरक देने की मात्रा भी जरूरत के मुताबिक दी जा सके.

खरपतवारों की रोकथाम : बीज बोने के एक माह बाद खेत की निराईगुड़ाई करें. अगर बाद में भी जरूरत महसूस हो तो 15-20 दिन बाद दोबारा एक बार और खरपतवार निकाल दें.

गुड़ाई करने के लिए हाथ से चलने वाले कृषि यंत्र हैंडह्वील (हो) से कर देनी चाहिए. ‘पूसा’ पहिए वाला हो वीडर बहुत ही साधारण प्रकार का कम कीमत यंत्र है. इस यंत्र से खड़े हो कर निराईगुड़ाई की जाती है. इस का वजन तकरीबन 8 किलोग्राम है. इस यंत्र को आसानी से फोल्ड कर के कहीं भी लाया व ले जाया जा सकता है.

इस यंत्र को खड़े हो कर आगेपीछे धकेल कर चलाया जाता है. निराईगुड़ाई के लिए लगे ब्लेड को गहराई के अनुसार ऊपरनीचे किया जा सकता है. पकड़ने में हैंडल को भी अपने हिसाब से एडजस्ट कर सकते हैं. यह कम खर्चीला यंत्र है.

खेत में पानी : आमतौर पर इस दौरान मानसून का समय होता है और पानी की जरूरत नहीं पड़ती. लेकिन अगर बारिश न हो और खेत सूख रहे हों तो फलियां बनते समय हलकी सिंचाई जरूर करें.

फसल कटाई: जब फसल की पत्तियां पीली पड़ कर झड़ने लगें और फलियों का रंग भी भूरा होने लगे तो फसल की कटाई करें और कटी फसल को धूप में सूखने के लिए छोड़ दें. जब कटी फसल सूख जाए तो इस की गहाई करें और दानों को सुखा कर रखें.

अगर फसल में कीट बीमारी का हमला दिखाई दे तो कीटनाशक छिड़कें और कुछ दिनों तक पशुओं को खिलाने से परहेज करें.

चारे के लिए Cluster Bean  की खास किस्में

ग्वार (एचएफजी 156) : ग्वार ( Cluster Bean ) एक पौष्टिक चारा फसल होने के साथसाथ मिट्टी की पैदावार कूवत भी बढ़ाती है. इस को अकेले या ज्वारबाजरा के साथ भी बोया जा सकता है.

चारे के लिए किस्म (एचएफजी 156) : यह एक लंबी अनेक शाखाओं वाली फसल है. पत्तियों के किनारे कटे हुए होते हैं. यह किस्म 70 दिन में तैयार हो जाती है. इस किस्म की बोआई अप्रैल से मध्य जुलाई तक करनी चाहिए.

अगेती फसल में सिंचित हालात में अच्छी बढ़त होती है. वर्षाकालीन फसल जो जुलाई में बोई जाती है, वह किस्म पर निर्भर होती है. एचएफजी 156 की बोआई में बीज की मात्रा 16 किलोग्राम प्रति एकड़ के हिसाब से लगती है.

हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार, (हरियाणा) के चारा अनुभाग के जरीए कुछ उन्नत किस्मों की जानकारी

ये हैं ग्वार की कुछ खास उन्नत किस्में

एफएस 277 : यह किस्म बिना शाखाओं वाली सीधी व लंबी बढ़ने वाली है. साथ ही, देर से पकने वाली किस्म है. यह मिश्रित खेती के लिए अच्छी मानी गई है. इस की बीज की पैदावार 5.5-6.0 क्विंटल प्रति एकड़ है.

एचजी 75 : शाखाओं वाली यह किस्म रोग के प्रति सहनशील और देर से पकने वाली है. इस के बीज की पैदावार 7-8 क्विंटल प्रति एकड़ है.

एचजी 365 : यह कम शाखाओं वाली जल्दी पकने वाली किस्म है. यह किस्म 85-100 दिनों में पक जाती है और औसतन पैदावार 6.5-7.5 क्विंटल प्रति एकड़ है. इस किस्म के बोने के बाद आगामी रबी फसल आसानी से ली जा सकती है.

एचजी 563 : Cluster Bean की इस किस्म पकने में 85-100 दिन लेती है. इस के पौधों पर फलियां पहली गांठ व दूसरी गांठ से ही शुरू हो जाती हैं. इस का दाना चमकदार और मोटा होता है. इस किस्म की पैदावार 7-8 क्विंटल प्रति एकड़ है.

एचजी 2-20 : ग्वार की यह किस्म पूरे भारत में साल 2010 में अनुमोदित की गई है. 90-100 दिन में पकने वाली इस किस्म की फलियां दूसरी गांठ से शुरू हो जाती हैं और इस की फली में दानों की तादाद आमतौर पर दूसरी किस्मों से ज्यादा होती है व दाना मोटा होता है. इस किस्म की औसत पैदावार 8-9 क्विंटल प्रति एकड़ है.

एचजी 870 : ग्वार की इस किस्म को साल 2010 में हरियाणा के लिए अनुमोदित किया गया. पकने का समय 85-100 दिन. दाने की पैदावार 7.5-8 क्विंटल प्रति एकड़. गोंद की औसत मात्रा 31.34 फीसदी तक.

एचजी 884 : ग्वार ( Cluster Bean) की इस किस्म को पूरे भारत के लिए साल 2010 में अनुमोदित किया गया था. यह 95-110 दिन में पकती है. मोटे दाने, दाने की पैदावार 8 क्विंटल प्रति एकड़ व गोंद की औसत मात्रा 29.91 फीसदी तक है.

नए तरीकों से करें गेहूं (Wheat) की खेती

गेहूं दुनियाभर में सब से ज्यादा उगाई जाने वाली फसल है. भारत में अनाज की फसलों में गेहूं का खास स्थान है. रकबे और पैदावार की दृष्टि से गेहूं चावल के बाद दूसरे स्थान पर है. गेहूं देश की कुल जनसंख्या के तकरीबन 40 फीसदी लोगों का खास भोजन है, जबकि उत्तर भारत में तकरीबन 83 फीसदी जनसंख्या अपनी भोजन संबंधी जरूरतों के लिए गेहूं पर निर्भर है. इस का इस्तेमाल रोटी, दलिया, हलवा, मिठाई, पावरोटी, बिस्कुट, मैदा जैसे अनेक पदार्थों को बनाने में होता है.

गेहूं की पैदावार की दृष्टि से उत्तर प्रदेश का पहला स्थान है. उत्तर भारत में गेहूं की खेती रबी मौसम में की जाती है. इन इलाकों की जलवायु भी अलग है, जो अधिक पैदावार बढ़ाने में बाधक है, लेकिन फिर भी यहां पर उत्पादन बढ़ाने की काफी संभावनाएं हैं, जिस में अच्छी विधियां अपनाना बहुत जरूरी है. ये विधियां परंपरागत तरीकों से ज्यादा प्रभावी और लाभप्रद हैं.

मिट्टी व जलवायु : गेहूं की अच्छी पैदावार के लिए सही जल निकास वाली चिकनी दोमट व बलुई दोमट जमीन अच्छी रहती है. मौजूदा दौर में उत्तर प्रदेश में सभी तरह की सामान्य मिट्टी में इस की खेती की जा सकती है. इस के अलावा ऐसी जमीन जिस का पीएच मान 6 से 8.5 के बीच होता है, उस में गेहूं की पैदावार की जा सकती है. बढ़वार की शुरुआती अवस्थाओं में गेहूं की उपज को पकने के दौरान ठंडी और सूखी जलवायु की जरूरत पड़ती है.

खेत की तैयारी : सब से पहले 2 जुताई मिट्टी पलटने वाले हैरो से करते हैं. फिर 2-3 जुताई कल्टीवेटर या देशी हल से करते हैं. आखिर में पाटा चला कर खेत तैयार करते हैं. जमीन के लिए फास्फेटिका कल्चर 2.5 किलोग्राम और एजोटोबैक्टर 2.5 किलोग्राम इन दोनों जैविक कल्चरों को 1 एकड़ खेत के लिए 100 से 120 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद में मिला कर 4 से 5 दिनों के लिए जूट के बोरे से ढकने के बाद खेत की तैयारी में आखिरी जुताई के समय छिटक कर मिट्टी में मिला देते हैं.

बीज की मात्रा : सामान्य स्थिति में गेहूं की बोआई के लिए प्रति हेक्टेयर 100 किलोग्राम बीज की जरूरत होती है. मोटे दाने की दशा में यह मात्रा 120 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर हो जाती है. यदि छिटकवां विधि या देर से बोआई की जाए तो प्रति हेक्टेयर 125 किलोग्राम बीज की जरूरत पड़ती है. बीजशोधन के लिए 2.5 ग्राम थीरम, 2.5 ग्राम कार्बेंडाजिम या 5 ग्राम ट्राइकोडर्मा स्पोर में से किसी एक दवा को प्रति किलोग्राम बीज की दर से ले कर किसी साफ घड़े में बीज और दवा डाल कर पालीथीन से मुंह बांध कर अच्छी तरह बीज पर दवा लगाते हैं.

बोआई का समय : बोआई समय से करनी चाहिए. लाइन से लाइन की दूरी 23 सेंटीमीटर और बीज की गहराई 5 सेंटीमीटर होनी चाहिए. देर से बोआई के लिए लाइन से लाइन की दूरी 18 सेंटीमीटर और बीज की गहराई 4 सेंटीमीटर होनी चाहिए. बोआई का समय 15 अक्तूबर से 25 नवंबर तक अच्छा रहता है. देर से बोआई का समय 25 नवंबर से 25 दिसंबर तक है.

बोआई का तरीका : गेहूं की बोआई 6 तरह से की जा सकती है. छिटकवां विधि, हल के पीछे कूड़ में, सीडड्रिल मशीन से, डिबलर से, जीरो टिल सीडड्रिल मशीन और उभरी हुई क्यारी तरीके से की जाती है. बोआई में यह ध्यान रखें कि प्रति वर्गमीटर 400 से 500 बाली वाले पौधे जरूर हों वरना उपज पर कुप्रभाव पड़ेगा. बोआई के समय जमीन में सही नमी होना जरूरी है.

खाद और उर्वरक : खाद और उर्वरकों का इस्तेमाल मिट्टी की जांच के मुताबिक ही करना चाहिए. अच्छी उपज लेने के लिए कंपोस्ट खाद 100 से 112 क्विंटल प्रति हेक्टेयर इस्तेमाल करें. आमतौर से 150 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस, 40 किलोग्राम पोटाश, लेकिन देरी से बोआई के लिए 80 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम फास्फोरस और 30 किलोग्राम पोटाश व अन्य तत्त्वों की पूर्ति के लिए 30 किलोग्राम गंधक व पोषक 20 से 25 किलोग्राम सूक्ष्म पोषक तत्त्व मिश्रण का इस्तेमाल करते हैं दोमट या मटियार मिट्टी में नाइट्रोजन की आधी मात्रा पहली सिंचाई के 24 घंटे पहले या ओट आने पर देनी चाहिए. बलुई दोमट या बलुई जमीन में नाइट्रोजन की 1/3 मात्रा और फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा बोआई के समय कूड़ों में बीज के 2 से 3 सेंटीमीटर नीचे दी जाती है और बची नाइट्रोजन की आधी मात्रा पहली सिंचाई के बाद और आधी मात्रा दूसरी सिंचाई के बाद देनी चाहिए.

जल प्रबंधन : गेहूं की फसल में दी गई तालिका के मुताबिक समयसमय पर सिंचाई करना सही रहता है.

खरपतवारों की रोकथाम : फसल में यदि खरपतवार उगे हों तो एक गुड़ाई 30 से 35 दिनों पर करें. रासायनिक तरीके से खरपतवारों की रोकथाम तालिका में दी गई है.

फायदेमंद हैं रंगीन सब्जियां (Colorful Vegetables)

हाल ही में देखा गया है कि पिछले एक दशक में देश में फलों व सब्जियां की प्रति व्यक्ति उपलब्धता में उल्लेखनीय बढ़ोतरी हुई है, जो कि कृषि क्षेत्र में आई प्रगति को तो दर्शाता ही है, साथ ही यह खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और पोषण के लिहाज से भी एक बड़ी महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है.

पिछले 10 सालों में समूचे देश में फलों और सब्जियों की प्रति व्यक्ति उपलब्धता क्रमश: 7 और 12 किलोग्राम बढ़ी है. प्रति व्यक्ति उपलब्धता बढ़ने का श्रेय मुख्य रूप से तो उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पंजाब और जम्मूकश्मीर को मिलना चाहिए, जिन के योगदान से ही आज देश प्रति व्यक्ति हर साल 227 किलोग्राम फल व सब्जियों का उत्पादन कर रहा है, जो प्रति व्यक्ति 146 किलोग्राम की अनुशंसित खपत से कहीं ज्यादा है.

दरअसल, आज का भारत परंपरागत खेती से आगे बढ़ कर नवाचार और तकनीकी उपायों को अपनाने में सफल हो रहा है. किसानों द्वारा ड्रिप सिंचाई उच्च उपज वाली फसलों को प्राथमिकता देना और स्मार्ट खेती जैसे वीडियो को अपनाना इस के मुख्य कारण हैं.

इस के अलावा प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, कृषि अवसरंचना कोष और किसान उत्पादक संगठन जैसी पहलों ने किसानों को बेहतर संसाधन तो दिए ही हैं, साथ ही, उन की बाजारों तक पहुंच भी सुनिश्चित की है.

लोगों में स्वास्थ्य एवं पोषण को ले कर बढ़ती जागरूकता ने भी फलों एवं सब्जियों की मांग को प्रोत्साहित किया है. लोगों के आहार पैटर्न में यह जो बदलाव दिखाई दे रहा है, वह कोरोना महामारी के दौर से ही दिखना शुरू हो गया था.

हालांकि, आसमान में होती मौसम की स्थितियों में होने वाले नुकसानों पर भी भारतीय स्टेट बैंक ने अपनी रिपोर्ट में प्रकाश डाला है कि आजकल बाजार में हरी सब्जियों के साथसाथ बैंगनी रंग की सब्जियों का चलन काफी बढ़ गया है. लोग इन सब्जियों को स्वास्थ्य के लिए काफी महत्त्वपूर्ण मानते हुए अधिक खरीद रहे हैं, साथ ही, किसानों को उस की कीमत भी अच्छी मिल रही है.

कई सब्जियों और फलों की प्रजातियां ऐसे विज्ञान द्वारा विकसित कर दी गई हैं, जिन का कलर बैंगनी हो गया है. चाहे टमाटर हो या पत्तागोभी, मूली, शलजम, गाजर, आलू, फूलगोभी, ब्रोकोली, केला, अंगूर आदि फल और सब्जियां हैं, जिन की लगातार बाजार में मांग बढ़ रही है.

रंगीन सब्जियां (Colorful Vegetables)

रंगीन सब्जियों की पोषण सुरक्षा में भूमिका

रंगीन सब्जियां पोषण सुरक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, क्योंकि ये आवश्यक विटामिन, खनिज और एंटीऔक्सिडैंट से भरपूर होती हैं. इन में मौजूद प्राकृतिक पिगमेंट जैसे कैरोटीनौइड, एंथोसायनिन और फ्लेवोनौइड़स न केवल सब्जियों को आकर्षक रंग प्रदान करते हैं, बल्कि ये शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली यानी इम्यून सिस्टम को भी मजबूत बनाते हैं.

गाजर, पालक, टमाटर और बैंगन जैसी सब्जियां कुपोषण से बचाने में मददगार हैं, क्योंकि ये विटामिन ए, सी, ई और के, के साथसाथ आयरन, कैल्शियम और पोटैशियम की कमी को भी पूरा करती हैं.

इन सब्जियों में मौजूद फाइबर पाचन तंत्र को स्वस्थ बनाए रखता है, जबकि बीटाकैरोटीन आंखों और त्वचा के स्वास्थ्य को बढ़ावा देता है. इस के अलावा हृदय और हड्डियों को मजबूत करने में भी इन का महत्त्वपूर्ण योगदान है. कम कैलोरी और उच्च पोषण मूल्य के कारण रंगीन सब्जियां संतुलित आहार और टिकाऊ पोषण सुरक्षा का एक अनिवार्य हिस्सा हैं.

बैंगनी कलर लोगों को करता है आकर्षित

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अनुसार, अनाज के उत्पादन में तापमान में 3 डिगरी सैल्सियस से एक डिगरी भी ज्यादा होने पर गेहूं की पैदावार में 3 से 4 फीसदी की कमी आ सकती है, जो बेहद चिंताजनक है. लेकिन इस से भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि 30 से 35 फीसदी फसल कटाई भंडारण, परिवहन और पैकेजिंग के गलत तौरतरीकों के चलते खराब हो जाती है.

देश के 7 फीसदी कोल्ड स्टोरेज केवल 4 राज्यों गुजरात, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश और पंजाब में है. भारत फिलहाल फल व सब्जियों के उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर है. लेकिन बढ़ती आबादी और भविष्य की जरूरतों के मद्देनजर अब आत्मनिर्भरता के साथ आगे बढ़ने का समय है. फलसब्जियों की उपलब्धता बढ़ाना सकारात्मक संकेत है, लेकिन खाद्य सुरक्षा में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में अभी लंबा सफर तय करना बाकी है.

आखिर क्यों होता है इन का रंग बैंगनी

सब्जियों का बैंगनी रंग मुख्य रूप से उन के अंदर मौजूद एंथोसायनिन नामक पिगमेंट के कारण होता है, जो एक प्रकार का फ्लेवोनौइड है. यह पिगमेंट सब्जी के परिपक्वता स्तर और उस के अंदर की अम्लीयता पर निर्भर करता है. जैसेजैसे सब्जी अपने विकास के अंतिम चरण में पहुंचती है, एंथोसायनिन पूरी तरह से विकसित हो जाता है, जिस से उस का रंग गहरा बैंगनी हो जाता है.

इस के अलावा बाहरी कारण जैसे प्रकाश, तापमान और पर्यावरणीय दबाव भी इस रंग को और गहरा बनाने में भूमिका निभाते हैं. बैंगनी रंग का विकास अकसर सब्जी के पकने और पोषक तत्त्वों के पूरे विकास का संकेत देता है. यह रंग न केवल सौंदर्य बढ़ाता है, बल्कि यह एंटीऔक्सिडैंट गुणों से भरपूर होता है, जो सब्जी को पोषण और स्वास्थ्य के नजरिए से और भी उपयोगी बनाता है.

रंगीन सब्जियों की खूबियां

रंगीन सब्जियां जैसे गाजर, टमाटर, पालक, ब्रोकोली, शिमला मिर्च, चुकंदर, बैंगन और अन्य अपने विशिष्ट रंगों के कारण विशेष पोषक तत्त्वों से भरपूर होती हैं. इन रंगों के पीछे मौजूद पिगमेंट्स जैसे कैरोटीनौइड, फ्लेवोनौइड्स और एंथोसायनिंस स्वास्थ्य लाभ प्रदान करते हैं.

लाल सब्जियां : टमाटर और चुकंदर जैसे खाद्य पदार्थ लाइकोपीन और एंथोसायनिन से भरपूर होते हैं, जो हृदय स्वास्थ्य को बढ़ावा देने और कैंसर के खतरे को कम करने में सहायक हैं.

हरी सब्जियां : पालक, ब्रोकोली और पत्तेदार सब्जियां आयरन, कैल्शियम और फाइबर का सब से बेहतर स्रोत हैं. ये हड्डियों को मजबूत करती हैं और पाचन तंत्र को स्वस्थ बनाए रखती हैं.

पीली और नारंगी सब्जियां : गाजर और कद्दू जैसे खाद्य पदार्थ विटामिन ए और बीटाकैरोटीन प्रदान करते हैं, जो आंखों की रोशनी और प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करते हैं.

बैंगनी और नीली सब्जियां : बैंगन और अन्य गहरे रंग की सब्जियां एंटीऔक्सिडैंट से भरपूर होती हैं, जो कोशिकाओं को क्षति से बचाने में मदद करती हैं.

फरवरी महीने में खेती के खास काम (Farming Tasks)

फरवरी का महीना खेतीबारी के लिए बहुत अहम है, क्योंकि यह मौसम फसल और पशुओं के लिए नाजुक होता है, इसलिए किसानों को कुछ एहतियात बरतने चाहिए:

* समय पर बोई गेहूं की फसल में इन दिनों फूल आने लगते हैं. इस दौरान फसल को सिंचाई की बहुत जरूरत होती है. झुलसा, गेरुई, करनाल बंट जैसी बीमारी का हमला फसल पर दिखाई दे, तो मैंकोजेब दवा के 2 फीसदी घोल का छिड़काव करें.

* गन्ने की बोआई 15 फरवरी के बाद कर सकते हैं. बोआई के लिए अपने इलाके की आबोहवा के मुताबिक गन्ने की किस्मों का चुनाव करें. बोआई में 3 आंख वाले सेहतमंद बीजों का इस्तेमाल करें. बोआई 75 सैंटीमीटर की दूरी पर कूंड़ों में करें. बीज को फफूंदनाशक दवा से उपचारित कर के ही बोएं.

* सूरजमुखी की बोआई 15 फरवरी के बाद कर सकते हैं. उन्नत बीजों की बोआई लाइन में 4-5 सैंटीमीटर की गहराई पर करें. बीज को कार्बंडाजिम से उपचारित कर के बोएं.

* मैंथा की बोआई करें. बोआई के लिए उन्नतशील किस्में जैसे हाईब्रिड एमएसएस का चुनाव करें. 1 हेक्टेयर खेत के लिए 400-500 किलोग्राम मैंथा जड़ों की जरूरत पड़ती है. बोआई के दौरान 30 किलोग्राम नाइट्रोजन, 75 किलोग्राम फास्फोरस और 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें.

* आलू की फसल पर पछेता झुलसा बीमारी दिखाई दे, तो इंडोफिल दवा के 0.2 फीसदी वाले घोल का अच्छी तरह छिड़काव करें. फसल को कोहरे और पाले से बचाने का भी इंतजाम  करें.

* चना, मटर और मसूर की फसल में फलीछेदक कीट की रोकथाम के लिए कीटनाशी का इस्तेमाल करें. चने की फसल की सिंचाई करें. मटर की चूर्ण फफूंदी बीमारी की रोकथाम के लिए कैराथेन दवा का इस्तेमाल करें.

* टमाटर की गरमियों की फसल की रोपाई करें. रोपाई 60×45 सैंटीमीटर की दूरी पर करें. रोपाई से पहले खेत को अच्छी तरह तैयार कर लें.

* प्याज की रोपाई अभी तक नहीं की गई है, तो फौरन रोपाई करें. पिछले महीने रोपी गई फसल की निराईगुड़ाई करें. जरूरत के मुताबिक सिंचाई करें.

* इस महीने धूप में चटकपन आ जाता है. धूप देख कर किसान पशुओं की देखरेख में लापरवाही बरतने लगते हैं. ऐसा न करें, पशुओं का ठंड से पूरा बचाव करें. जरा सी लापरवाही नुकसानदायक हो सकती है.

* अपने ऐसे पशु, जो जल्द ही ब्याने वाले हों, को दूसरे पशुओं से अलग कर दें और उन पर लगातार निगरानी रखें. गाभिन पशु का कमरा आदामदायक और कीटाणुरहित हो. इस में तूड़ी का सूखा डाल कर रखें.

* अगर बरसीम सही मात्रा में उपलब्ध हो, तो दाना मिश्रण में 5-7 फीसदी खल को कम कर के अनाज की मात्रा बढ़ा दें.

मटर की जैविक खेती, जानिए किस्में, देखभाल और पैदावार

मटर की जैविक खेती में फसलों के उत्पादन के लिए प्राकृतिक संसाधनों जैसे गोबर की सड़ी खाद, जैव उर्वरक का प्रयोग  आदि फसल के पोषण व रसायनरहित कीट, रोग और खरपतवार नियंत्रण के लिए किया जाता है. मटर की जैविक खेती में किसान कम लागत में अच्छी गुणवत्ता वाली सब्जी मटर का अधिक उत्पादन कर सकते हैं.

मटर की रासायनिक खेती में न चाहते हुए भी उत्पादकों को 8 से 10 छिड़काव कीटनाशकों के करने पड़ते हैं, जिस से मटर के फल जहरीले हो जाते हैं, जो इनसानी सेहत के लिए नुकसानदायक हैं. अंधाधुंध रसायनों के इस्तेमाल से भूमि बंजर हो रही है और पर्यावरण दूषित हो रहा है, इसलिए मटर की जैविक खेती आज की जरूरत है.

जलवायु

मटर की जैविक खेती के लिए नम और ठंडी जलवायु अधिक अच्छी रहती है, इसलिए हमारे देश में ज्यादातर मटर की फसल रबी के मौसम में लगाई जाती है, जहां पर 4 महीने ठंडा मौसम रहता है, साथ ही, ठंड धीरेधीरे गरमी की ओर बढ़ती है, इसलिए मटर की जैविक खेती के लिए यह मौसम सब से बेहतर होता है. साथ ही, उन सभी स्थानों पर जहां सालाना बारिश 60 से 80 सैंटीमीटर तक होती है, वहां मटर की फसल आसानी से उगाई जा सकती है.

मटर फसल की बढ़वार में अधिक बारिश का होना काफी नुकसानदायक होता है. बीज के अंकुरण के लिए औसत तापमान 22 डिगरी सैल्सियस व अच्छी फसल के लिए 12-20 डिगरी सैल्सियस तापमान सब से अच्छा होता है.

भूमि का चयन

मटर की खेती ज्यादातर उन सभी तरह की मिट्टियों में आसानी से की जा सकती है, जिन में अच्छी मात्रा में नमी उपलब्ध हो, परंतु फलीदार फसल के लिए अधिक अम्लीय एवं अधिक क्षारीय भूमि अच्छी नहीं होती. लेकिन जैविक पदार्थों से भरपूर बलुई दोमट या दोमट मिट्टी, मटर की खेती के लिए सब से अच्छी होती है.

भूमि का पीएच मान 6.5 से 7.5 के बीच होना अच्छा होता है. ऐसी मिट्टी, जिस में पानी का ठहराव न होता हो और पानी सोखने की क्षमता अधिक हो, वहां उत्पादन सब से अच्छा होता है.

खेत की तैयारी

मटर की जैविक खेती के लिए खेत को 2 से 3 बार गहरी जुताई कर मिट्टी को भुरभुरी बना लेना चाहिए, ताकि पौधों की बढ़वार अच्छी हो सके. गोबर की खाद 250 से 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से अंतिम जुताई के समय मिला दें.

गोबर की खाद के बदले केंचुआ खाद भी 100 से 150 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से मिला सकते हैं. बीजों के अच्छे जमाव के लिए खेत में उचित नमी होनी चाहिए. ट्राइकोडर्मा पाउडर से मिट्टी को बोआई से पहले मिला कर उपचारित कर लेना चाहिए. बोआई से पहले उपचारित खाद को खेत में फैला दें. ट्राइकोडर्मा के प्रयोग से फफूंद या कवकजनित रोगों की रोकथाम बेहतर तरीके से हो जाती है.

उन्नत किस्में

मटर की जैविक खेती के लिए उन्नत और अधिक उत्पादन देने वाली किस्मों का चयन करना चाहिए, ताकि मटर की जैविक फसल से अधिकतम उपज प्राप्त हो सके. साथ ही, यदि संभव हो, तो जैविक प्रमाणित बीज का बोआई के लिए उपयोग करें.

मटर की कुछ प्रचलित किस्में अर्केल, बोनविले, जवाहर मटर-1, जवाहर मटर-2, लिंकन, वीएल-3, पालम प्रिया, सोलन निरोग, जीसी-477, पंजाब-89, पंत मटर-155 व विवेक मटर-8 व 9 आदि हैं.

बोआई का उचित समय

मैदानी क्षेत्रों में अंगरेजी किस्म के लिए मध्य सितंबर से मध्य अक्तूबर व मध्यम देर से पकने वाली किस्म के लिए 15 अक्तूबर से 15 नवंबर तक बोआई की जा सकती है.

लेकिन बोआई के समय अधिक तापमान होने के कारण पौधे कम बढ़ते हैं और मटर में तना छेदक व उकठा रोग के होने की संभावना बढ़ जाती है.

मटर की बोआई अक्तूबर के पहले सप्ताह से ले कर नवंबर माह के अंत तक की जा सकती है. समय से पहले और समय के बाद बोआई करने से उत्पादकता एवं गुणवत्ता दोनों पर बुरा असर पड़ सकता है.

बीज का उपचार मटर की जैविक खेती के लिए स्वस्थ व रोगमुक्त प्रमाणित बीज का चयन करना चाहिए और खेत में बोआई से पहले राइजोबियम कल्चर से उपचारित करें (3 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज). ऐसा करने से उपज में 10-15 फीसदी तक की बढ़ोतरी होती है.

बीज दर व अंतराल

मटर की जैविक खेती में जल्दी पकने वाली किस्मों के लिए 100 से 125 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर और मध्य व देर से पकने वाली किस्मों के लिए 70 से 90 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर बीज की मात्रा उपयुक्त है.

अगेती किस्मों की कतार से कतार की दूरी 30 सैंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 5 से 7 सैंटीमीटर और देर से पकने वाली किस्मों के लिए कतार से कतार की दूरी 30-40 सैंटीमीटर और कतार में पौधे से पौधे की दूरी 5 से 8 सैंटीमीटर रहती है.

उपचारित बीज की बोआई सीड ड्रिल अथवा देशी हल द्वारा कतारों में की जाती है. बीज की बोआई 5-8 सैंटीमीटर की गहराई पर करें.

खाद प्रबंधन

मटर की अच्छी उपज लेने के लिए 2 टन वर्मी कंपोस्ट या 5 टन गोबर की खाद का इस्तेमाल करना चाहिए. यह खाद अच्छी प्रकार से हल चलाते समय भूमि में मिला देनी चाहिए. वर्मी कंपोस्ट को आखिरी बोआई के समय उपयोग करना चाहिए, जिस से मटर की जैविक फसल में पोषक तत्त्वों की पूर्ति संभव हो.

वर्मी कंपोस्ट 1:10 भाग पानी के साथ मिला कर कम से कम फसल बोनी के 30 दिन एवं 45 दिन के बाद स्प्रे करें.

सिंचाई व जल प्रबंधन

मटर की बिजाई से पहले एक सिंचाई और उस के बाद 10-12 दिन के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए. मटर की फसल के लिए पानी की आवश्यकता भूमि व बारिश पर निर्भर करती है, इसलिए आमतौर पर मटर की फसल के लिए 2 से 3 सिंचाइयां बहुत जरूरी होती हैं.

पहली सिंचाई बीज बोने से पहले, दूसरी सिंचाई फल आने पर और तीसरी सिंचाई जब फलियां तैयार हो रही हों. जमीन में अधिक नमी मटर की फसल के लिए नुकसानदायक होती है, जिस से जड़ सड़न रोग, पौधों का पीला पड़ना और फसल के दूसरे तत्त्वों को उपयोग में लाने में बाधा होती है.

खरपतवार नियंत्रण

मटर की जैविक खेती में 1 से 2 निराईगुड़ाई की जरूरत होती है, जो कि फसल की किस्म पर निर्भर करती है. पहली निराई व गुड़ाई जब पौधों में 3-4 पत्ते हों या बिजाई से 3 से 4 सप्ताह बाद करनी चाहिए. दूसरी, फूल आने से पहले करें. खेत की मेंड़ों पर पाए जाने वाले सालाना घास वाले और चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों की रोकथाम उन को नष्ट करने के बाद कर सकते हैं.

Organic farming of peas

कीट एवं रोग नियंत्रण

एंथ्रेक्नोज

इस रोग में पत्तियों के ऊपर पीलेकाले रंग के सिकुड़े हुए धब्बे बन जाते हैं और धीरेधीरे पूरी पत्ती को ढक लेते हैं. यह बीमारी बीज के माध्यम से एक मौसम से दूसरे मौसम में फैलती है.

रोकथाम

बोने से पहले बीज को बीजामृत या गौमूत्र से उपचारित करें और रोगरोधी किस्म लगाएं.

फली छेदक

खेत में फेरोमोन ट्रैप लगाएं. टी आकार की खूंटियां (20-25 प्रति हेक्टेयर की दर से खेत में लगाएं) टांगें. रस्सों की अंतर्वर्ती फसल लगाने से भी काफी फायदा होता है.

माहू

माहू कीट का प्रकोप जनवरी महीने में शुरू होता है. यह कीट पत्तियों व टहनियों से रस चूसता है.

रोकथाम

इस रोग से बचाव के लिए पीला ट्रैप लगाएं. नीम तेल को अच्छी तरह पानी के साथ मिलाने के बाद 1500 पीपीएम का 2.5 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी के साथ मिला कर स्प्रे करें.

पत्ती में सुरंग बनाने वाला कीड़ा पौधे की पत्तियों में सफेद धागे की तरह बारीक सुरंग बनाता है. अधिक प्रकोप होने से पत्तियां सूख जाती हैं. इस कीट के उपचार के लिए नीम गोल्ड 2 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी में मिला कर या नीम की निंबोली का सत (अर्क) 4 फीसदी का छिड़काव 15 दिनों के अंतराल पर करें.

जैविक प्रमाणीकरण

जैविक प्रमाणीकरण, जैविक उत्पाद की गुणवत्ता एवं सत्यता को प्रमाणित करने के लिए तीसरे पक्ष द्वारा कराया गया एक मूल्यांकन है. जैविक उत्पादों की बढ़ती मांग को ध्यान में रखते हुए सभी देशों ने जैविक खेती करने के कुछ मापदंड तैयार किए हैं.

भारत में एपीडा यानी कृषि एवं प्रसंस्कृत खाद्य उत्पादन निर्यात एवं विकास प्राधिकरण जैविक उत्पादों के मापदंड तय करती है. जैविक प्रमाणपत्र भूमि पर जैविक तरीके से की गई खेती की सत्यता को निर्धारित करते हुए उस भूमि के लिए निर्गत किया जाता है.

फलियों की तुड़ाई

मटर की जैविक फसल से अधिक पैदावार प्राप्त करने के लिए फलियों को समय पर तोड़ना बहुत आवश्यक है, अन्यथा इन की क्वालिटी पर असर पड़ता है.

फलियां तब तोड़ें, जब वे पूरी तरह दानों से भर जाएं. इस के बाद फलियों का हरा रंग घटने लगता है. आमतौर पर फलियों की तुड़ाई सुबह या शाम के समय 7 से 10 दिन के अंतराल पर करनी चाहिए.

मटर फसल की कुल 4-5 बार तुड़ाई होती है. दाल के लिए उगाई गई फसल की कटाई पूरी तरह पकने के बाद ही करनी चाहिए. दिन में तेज धूप पड़ने पर मटर की क्वालिटी पर असर पड़ता है.

पैदावार

मटर की जैविक फसल की पैदावार 70 से 90 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है.

भंडारण

हरी मटर की फलियों की ग्रेडिंग व पैकिंग बहुत ध्यान से करनी चाहिए. अकसर मटर को बोरियों, बांस की टोकरियों आदि में पैक किया जाता है और मंडियों में पहुंचाया जाता है. मटर की फलियों पर अधिक नमी नहीं होनी चाहिए, वरना इस पर फफूंद जैसे रोग लग सकते हैं.

आदर्श मछुआरा गांव (Model Fisherman Village) का विकास 

मत्स्यपालन विभाग, मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय द्वारा चलाई जा रही प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) अन्य बातों के साथसाथ एकीकृत आधुनिक तटीय मत्स्यन गांवों (इंटीग्रेटेड मौडर्न कोस्टल फिशिंग विल्लेजस) के विकास के लिए तटीय राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को सहायता प्रदान करती है.

हर एक एकीकृत तटीय मत्स्यन गांव के विकास के लिए अनुमानित  इकाई लागत केंद्र और संबंधित राज्य सरकार के बीच 60:40 के आधार पर बांटी जाती है और केंद्र शासित प्रदेशों के मामले में भारत सरकार 100 फीसदी इकाई लागत प्रदान करती है.

पीएमएमएसवाई के अंतर्गत कुल 11 एकीकृत आधुनिक तटीय गांवों के विकास के लिए 7,756.46 लाख रुपए के निवेश के प्रस्तावों को मंजूरी दी गई है, जिन में  केरल में 6,106.61 लाख रुपए की लागत से नौ तटीय गांव,  लक्षद्वीप में 899.85 लाख रुपए की लागत से एक तटीय गांव और पश्चिम बंगाल में 750 लाख रुपए की लागत से एक तटीय गांव शामिल हैं.

चूंकि यह योजना केंद्र और संबंधित राज्य सरकारों के बीच लागत को आपस में बांट के आधार पर पीएमएमएसवाई की गैरलाभार्थी उन्मुख गतिविधियों के रूप में चलाई जाती है, इसलिए इस योजना के अंतर्गत लाभार्थियों को कोई प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता प्रदान नहीं दी जाती है.

इस के अलावा,पीएमएमएसवाई के अंतर्गत, मत्स्यपालन विभाग, मत्स्यपालन,  पशुपालन और डेयरी मंत्रालय ने तटीय राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के परामर्श से क्लाईमेट रेसीलिएंट कोस्टल फिशरमन विल्लेजस  के रूप में विकास के लिए तटरेखा के करीब स्थित कुल 100 तटीय मछुआरा गांवों की पहचान की है, ताकि उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत मछुआरा गांव बनाया जा सके.

इस कार्यक्रम के लिए राष्ट्रीय मात्स्यिकी विकास बोर्ड (एनएफडीबी), हैदराबाद को एक नोडल एजेंसी बनाया गया है और वर्तमान वित्त वर्ष में पीएमएमएसवाई के अंतर्गत पहचान किए गए 100 तटीय गांवों के विकास के लिए एनएफडीबी के प्रस्ताव को 200 करोड़ रुपए की कुल लागत से मंजूरी दी गई है.

इस के साथ ही, पहचान किए गए तटीय मछुआरा गांवों में  विकसित की गई आवश्यकता आधारित मात्स्यिकी सुविधाओं में फिश ड्राईंग यार्ड, प्रोसैसिंग सेंटर, फिश मार्केट, फिशिंग जेट्टी, आइस प्लांट, कोल्ड स्टोरेज और आपातकालीन बचाव सुविधाएं जैसी सामान्य सुविधाएं शामिल हैं.

यह कार्यक्रम सी वीड कल्टीवेशन, आर्टिफिश्यल रीफ्स, सी रेंचिंग, हरित ईंधन (ग्रीन फ्युल) को बढ़ावा देने, मछुआरों और फिशिंग वेसेल्स के लिए सेफ्टी और सुरक्षा उपायों और ओरनामेंटल फिशरीस जैसी वैकल्पिक आजीविका गतिविधियों को अपनाने जैसी पहलों के माध्यम से क्लाइमेट रेसीलिएंट फिशरीस को भी बढ़ावा देता है.

इस कार्यक्रम में बीमा, आजीविका और पोषण सहायता, किसान क्रेडिट कार्ड और पहचान किए गए तटीय गांवों में रहने वाले पात्र मछुआरों तक केसीसी कवरेज जैसी अन्य गतिविधियों की भी परिकल्पना की गई है.

पीएमएमएसवाई के अंतर्गत क्लाईमेट रेसीलिएंट कोस्टल फिशरमन विल्लेजस यानी आदर्श मछुआरा गांवे के रूप में तटीय राज्यों में से गुजरात में 8, महाराष्ट्र में 15, दमन व दीव में 1, पुदुच्चेरी में 2, ओडिशा में 18, आंध्रप्रदेश में 15, लक्षद्वीप में 2, तमिलनाडु में 16, कर्नाटक में 5, केरल में 6, अंडमाननिकोबार में 5, पश्चिम बंगाल में 5 और गोवा में 2 गांवो की पहचान की गई है.

मछुआरों के लिए कल्याणकारी योजनओं (Welfare Schemes) का शुभारंभ

मत्स्यपालन विभाग, मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय द्वारा भारत में मात्स्यिकी क्षेत्र के स्थायी और जिम्मेदार विकास और मछुआरों के कल्याण के माध्यम से नीली क्रांति (ब्लू रेवोल्यूशन) लाने के लिए सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में 20,050 करोड़ रुपए के निवेश से एक प्रमुख योजना ‘प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना’ (पीएमएमएसवाई) का कार्यान्वयन  किया जा रहा है.

इस योजना में मछुआरों और मत्स्य किसानों के लिए कई कल्याणकारी गतिविधियों की परिकल्पना की गई है, जिस में विभाग ने पीएमएमएसवाई योजना के तहत वेस्सल कम्युनिकेशन एंड सपोर्ट सिस्टम के नैशनल रोलआउट प्लान को मंजूरी दी है, जिस में 364 करोड़ रुपए के कुल खर्च के साथ सभी तटीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों  में 1,00,000 फिशिंग वेसल्स पर ट्रांसपोंडर की स्थापना शामिल है.

नाव मालिकों को ट्रांसपोंडर के लिए मुफ्त में सहायता प्रदान की जाती है, जिस में टू वे कम्यूनिकेशन की सुविधा उपलब्ध है और संपूर्ण एक्सक्लूसिव इकोनोमिक जोन को कवर करते हुए किसी भी आपात स्थिति के दौरान छोटे टेक्स्ट मैसेज भेजे जा सकते हैं. यह मछुआरों को समुद्री सीमा के पास आने या उसे पार करने पर अलर्ट भी करता है.

इस के अलावा अन्य गतिविधियों जैसे समुद्री राज्यों/संघ  राज्य क्षेत्रों में इंटीग्रेटेड कोस्टल फिशिंग, गांवों का विकास, जिस का उद्देश्य स्थायी मत्स्य प्रथाओं के माध्यम से पर्यावरणीय नुकसान को कम करते हुए तटीय मछुआरों को आर्थिक और सामाजिक लाभ प्रदान  करना है.

18 से 70 साल की आयु समूह में आकस्मिक मृत्यु या स्थायी पूर्ण शारीरिक अक्षमता  पर 5 लाख रुपए, आकस्मिक स्थायी आंशिक शारीरिक अक्षमता पर 2.50 लाख रुपए और दुर्घटनावश अस्पताल में भरती होने पर 25,000 रुपए का बीमा लाभ प्रदान करना, 18 से 60 साल की आयु समूह के लिए मछली पकड़ने पर प्रतिबंध/मंद अवधि के दौरान मत्स्य संसाधनों के संरक्षण के लिए सामाजिक व आर्थिक रूप से पिछड़े सक्रिय पारंपरिक मछुआरों के परिवारों के लिए आजीविका और पोषण संबंधी सहायता देना, जिस में  मछली पकड़ने पर प्रतिबंध/मंद अवधि के  दौरान  3 महीनों के लिए प्रति मछुआरे  को 3,000 रुपए की सहायता प्रदान की जाती है, जिस में लाभार्थी का योगदान 1,500 रुपए  होता है और इस के लिए सामान्य राज्य के लिए अनुपात 50:50, उत्तरपूर्वी राज्यों और हिमालयी राज्यों  के  लिए  80:20, जबकि केंद्र शासित प्रदेशों के लिए सौ फीसदी है.

वर्तमान में चल रही पीएमएमएसवाई के तहत मछुआरों और मत्स्य किसानों को माली रूप से सशक्त बनाने और उन की बारगैनिंग पावर बढ़ाने के लिए मत्स्य किसान उत्पादक संगठनों/फिश फार्मर प्रोड्यूसर और्गेनाइजेशन (एफएफपीओ) की स्थापना के लिए आर्थिक सहायता प्रदान करने का प्रावधान है, जो मछुआरों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने में मदद करता है.

मत्स्यपालन विभाग ने अब तक 544.85 करोड़ रुपए की कुल परियोजना लागतपर कुल 2,195 एफएफपीओ की स्थापना के लिए मंजूरी दी है, जिस में 2,000 मत्स्य सहकारिताओं को एफएफपीओ का रूप देने और 195 नए एफएफपीओ गठित करना शामिल है.

इस के अलावा, मछुआरों और मत्स्यपालकों द्वारा संस्थागत ऋण तक पहुंच को सुविधाजनक बनाने के लिए साल 2018-19 से किसान क्रेडिट कार्ड की  सुविधा को मात्स्यिकी क्षेत्र तक विस्तारित किया गया है और आज तक मछुआरों और मत्स्यपालकों को 4,50,799 केसीसी कार्ड दिए गए हैं.

राष्ट्रीय गोकुल मिशन (Rashtriya Gokul Mission)

‘राष्ट्रीय गोकुल मिशन’ योजना दूध उत्पादन और बोवाइन पशुओं की उत्पादकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है. इस योजना के कार्यान्वयन और पशुपालन एवं डेयरी विभाग द्वारा किए गए अन्य उपायों से देश में दूध उत्पादन साल 2014-15 में 146.31 मिलियन टन से बढ़ कर साल 2023-24 में 239.30 मिलियन टन हो गया है.

पिछले 10 सालों के दौरान 63.55 फीसदी की वृद्धि हुई है. देश में बोवाइन पशुओं की कुल उत्पादकता साल 2014-15 में प्रति पशु प्रति वर्ष 1,640 किलोग्राम से बढ़ कर साल 2023-24 में प्रति पशु प्रति वर्ष 2,072 किलोग्राम हो गई है. यह 26.34 फीसदी की वृद्धि है, जो विश्व में किसी भी देश द्वारा बोवाइन पशुओं की उत्पादकता में हुई सब से अधिक बढ़ोतरी है.

देशी और नौनडिस्क्रिप्ट गोपशुओं की उत्पादकता वर्ष 2014-15 में प्रति पशु प्रति वर्ष 927 किलोग्राम से बढ़ कर साल 2023-24 में प्रति पशु प्रति वर्ष 1,292 किलोग्राम हो गई है, जो 39.37 फीसदी  की वृद्धि है.

भैंसों की उत्पादकता साल 2014-15 में प्रति पशु प्रति वर्ष 1,880 किलोग्राम से बढ़ कर साल 2023-24 में प्रति पशु प्रति वर्ष 2,161 किलोग्राम हो गई है, जो 14.94 फीसदी  की वृद्धि है.

राष्ट्रीय गोकुल मिशन के अंतर्गत दूध उत्पादन और बोवाइन पशुओं की उत्पादकता को बढ़ाने के लिए कई सफलतापूर्वक योजनाओं का कार्यान्वयन किया जा रहा है.

राष्ट्रव्यापी कृत्रिम गर्भाधान कार्यक्रम: राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत पशुपालन और डेयरी विभाग दूध उत्पादन और देशी नस्लों सहित बोवाइन पशुओं की उत्पादकता को बढ़ावा देने के लिए कृत्रिम गर्भाधान कवरेज का विस्तार कर रहा है. अब तक 8.32 करोड़ पशुओं को कवर किया गया है, 12.20 करोड़ कृत्रिम गर्भाधान किए गए हैं, जिस से 5.19 करोड़ किसान लाभान्वित हुए हैं.

संतति परीक्षण और नस्ल चयन: इस कार्यक्रम का उद्देश्य देशी नस्लों के सांडों सहित उच्च आनुवंशिक गुणवत्ता वाले सांडों का उत्पादन करना है. संतति परीक्षण को गोपशु की गिर, साहीवाल नस्लों और भैंसों की मुर्राह, मेहसाणा की नस्लों के लिए चलाया जा रहा है.

नस्ल चयन कार्यक्रम के अंतर्गत गोपशु की राठी, थारपारकर, हरियाणा, कांकरेज की नस्ल और भैंस की जाफराबादी, नीली रवि, पंढारपुरी और बन्नी नस्लों को शामिल किया गया है. अब तक 3,988 उच्च आनुवंशिक गुणवत्ता वाले सांडों का उत्पादन किया गया है और उन्हें वीर्य उत्पादन के लिए शामिल किया गया है.

इनविट्रो फर्टिलाइजेशन (आईवीएफ) तकनीक का कार्यान्वयन : देशी नस्लों के उत्कृष्ट पशुओं का प्रसार करने के लिए विभाग ने 22 आईवीएफ प्रयोगशालाएं स्थापित की हैं. आईवीएफ तकनीक की आनुवंशिक उन्‍नयन में महत्‍वपूर्ण भूमिका है और यह कार्य एक ही पीढ़ी में संभव है. इस के अतिरिक्‍त किसानों को उचित दरों पर तकनीक उपलब्ध कराने के लिए सरकार ने आईवीएफ मीडिया शुरू किया है.

सेक्ससौर्टेड वीर्य उत्पादन : विभाग ने गुजरात, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में स्थित 5 सरकारी वीर्य स्टेशनों पर सैक्स सौर्टेड वीर्य उत्पादन सुविधाएं स्थापित की हैं. 3 निजी वीर्य स्टेशन भी सैक्ससौर्टेड वीर्य खुराक का उत्पादन कर रहे हैं. अब तक उच्च आनुवंशिक गुणवत्ता वाले सांडों से 1.15 करोड़ सैक्ससौर्टेड वीर्य खुराकों का उत्पादन किया गया है और उसे कृत्रिम गर्भाधान के लिए उपलब्ध कराया गया है.

जीनोमिक चयन : गोपशु और भैंसों के आनुवंशिक सुधार में तेजी लाने के लिए विभाग ने देश में जीनोमिक चयन शुरू करने के लिए विशेष रूप से तैयार की गई एकीकृत जीनोमिक चिप विकसित की है – देशी गोपशुओं के लिए गौ चिप और भैंसों के लिए महिष चिप.

ग्रामीण भारत में बहुद्देश्यीय कृत्रिम गर्भाधान तकनीशियन (मैत्री): इस योजना के तहत मैत्री को किसानों के द्वार पर गुणवत्तापूर्ण कृत्रिम गर्भाधान सेवाएं प्रदान करने के लिए प्रशिक्षित और सुसज्जित किया जाता है. पिछले 3 सालों के दौरान राष्ट्रीय गोकुल मिशन के तहत 38,736 मैत्री को प्रशिक्षित और सुसज्जित किया गया है.

सैक्ससौर्टेड वीर्य का उपयोग कर के त्वरित नस्ल सुधार कार्यक्रम : इस कार्यक्रम का उद्देश्य 90 फीसदी सटीकता के साथ बछियों का उत्पादन करना है, जिस से नस्ल सुधार और किसानों की आय में वृद्धि हो. किसानों को सुनिश्चित गर्भधारण के लिए सैक्ससौर्टेड वीर्य की लागत के 50 फीसदी तक सहायता मिलती है.

इस कार्यक्रम से अब तक 341,998 किसान लाभान्वित हो चुके हैं. सरकार ने किसानों को उचित दरों पर सैक्ससौर्टेड वीर्य उपलब्ध कराने के लिए देशी रूप से विकसित सैक्ससौर्टेड वीर्य तकनीक शुरू की है.

इनविट्रो फर्टिलाइजेश तकनीक का उपयोग कर त्वरित नस्ल सुधार कार्यक्रम : इस तकनीक का उपयोग बोवाइन पशुओं के तीव्र आनुवंशिक उन्नयन के लिए किया जाता है और आईवीएफ तकनीक अपनाने में रुचि रखने वाले किसानों को प्रत्येक सुनिश्चित गर्भावस्था पर 5,000 रुपए की प्रोत्साहन राशि उपलब्ध कराई जाती है.

देशी बोवाइन नस्लों के विकास और संरक्षण के लिए साल 2014-15 और साल 2024-25 (दिसंबर, 2024 तक) के बीच कार्यान्वयन एजेंसियों को 4,442.87 करोड़ रुपए की वित्तीय सहायता जारी की गई और इस के मुकाबले साल 2004-05 और साल 2013-14 के बीच गोपशु और भैंस विकास के लिए 983.43 करोड़ रुपए की राशि जारी की गई. इस योजना का लाभ दूध उत्पादन और बोवाइन पशुओं की उत्पादकता में वृद्धि के रूप में डेयरी से जुड़े किसानों को मिल रहा है.

फूलों की खेती (Flower Farming) आमदनी बढ़ाए

यदि किसी काम को करने की लगन और मेहनत का जज्बा हो तो व्यक्ति अच्छीखासी आमदनी हासिल कर सकता है. यह सिद्ध कर के दिखाया है नरसिंहपुर जिले के गाडरवारा के किसान उमाशंकर कुशवाहा ने.

फूलों की खेती कर के उमाशंकर ने पूरी गाडरवारा तहसील में अपना नाम रोशन किया है. उमाशंकर ने परंपरागत खेती से हट कर अपनी आमदनी के जरीए बढ़ाए हैं. वे अपने खेतों में फूलों की खेती कर के कई किस्म के फूल उगाते हैं. फूलों के साथसाथ मालाएं और गुलदस्ते बना कर बेचते हैं. साथ ही शादीब्याह, जन्मदिन जैसे मौकों पर फूलों से पंडालों की सजावट भी कुशलता के साथ करते हैं.

गाडरवारा में शक्कर नदी के पार कौड़या रोड पर उमाशंकर का फार्महाउस है, जिस में उन के चारों भाइयों के परिवार रहते हैं. वे लोग सब्जीभाजी की खेती के अलावा फूलों की खेती बड़े पैमाने पर करते हैं. उमाशंकर कुशवाहा बताते हैं कि उन के मामाजी भी सोहागपुर पिपरिया में फूलों की खेती करते थे. उन्हें देख कर ही उमाशंकर के मन में भी फूलों की खेती करने की चाहत हुई.

मुख्य रूप से गेंदा, नवरंगा और गैलार्डिया के फूलों की खेती करने वाले उमाशंकर का कहना है कि वे साल में 2 बार फूलों के बीज डाल कर फूलों की खेती करते हैं. वे जूनजुलाई में खेतों को अच्छी तरह से तैयार कर के गेंदे की पौध लगाते हैं.

देशी किस्म का गेंदा 90 से 100 दिनों में फूल देने लगता है, जबकि हाईब्रिड किस्म के गेंदे 50 से 60 दिनों में ही फूल देने लगते हैं. सितंबर से फरवरी तक गेंदे में अच्छी मात्रा में फूल निकलते हैं.

गरमी के मौसम में होने वाले फूलों नवरंगा और मांगरेट की बौनी किस्में अक्तूबर में बोई जाती हैं. फूलों के पौधों को रासायनिक खाद व उर्वरक के अलावा समयसमय पर कोराजन जैसे कीटनाशकों का इस्तेमाल भी करना पड़ता है.

नवरंगा की बोआई : नवरंगा फूल जिसे गैलार्डिया के नाम से भी जाना जाता है, को गरमी के फूलों का राजा कहा जाता है.

इसे बोने के लिए अक्तूबर में खेत की 2 बार जुताई के कर मिट्टी को भुरभुरी व समतल बना कर तकरीबन 3×1 मीटर की क्यारियां तैयार कर लेते हैं. क्यारियों में गोबर की सड़ी खाद डाल कर यूरिया, पोटाश और फास्फोरस भी डाला जाता है.

क्यारियों में अच्छी किस्म के फूल के बीज प्रति एकड़ 800 ग्राम से 1 किलोग्राम की मात्रा में 5 सेंटीमीटर गहरा बो देते हैं. बीज बोने के बाद ऊपर से सूखी घास डाल कर हलकी सिंचाई करते हैं.

क्यारियों में बीज बोने के 3 से 4 हफ्ते बाद खेत में लगाने के लिए पौध तैयार हो जाती है.

पौधों को शाम के समय लगाना अच्छा रहता है. हफ्ते में 2 से 3 दिन सिंचाई की जाती है. बीज बोने के 110 दिनों से 120 दिन में नवरंगा के फूल खिलने लगते हैं. इस में एक ही पौधे में बहुत सारे फूल लगते हैं.

कीटों की रोकथाम के लिए डायमेथियोट 30 ईसी दवा का छिड़काव समयसमय पर करते रहते हैं. फूलों की तोड़ाई का काम सुबह किया जाता है. फूलों पर पानी सींच कर उन्हें बांस की टोकरियों में पैक कर के बाहर भेजा जाता है. तोड़े गए फूलों को गीले कपड़े से ढक कर रखा जाता है. इन फूलों से आकर्षक गुलदस्ते और मालाएं बनाते हैं.

फूलों की खेती (Flower Farming)

5 लाख तक सालाना आमदनी : मौजूदा समय में उमाशंकर 1 एकड़ खेत में गेंदा, गुलाब, सेवंती वगैरह फूलों की खेती कर रहे हैं. फूल स्थानीय बाजारों में 30 से 50 रुपए प्रति किलोग्राम के हिसाब से बेचने के साथ ही आर्डर पर बाहर भी भेजे जाते हैं. उन के परिवार के सदस्य फूलों की माला तैयार करते हैं, जो 5 रुपए से ले कर 20 रुपए में बिकती हैं.

आम दिनों में रोजाना तकरीबन 500 रुपए तक फूलों की बिक्री से आमदनी होती है, जो खास मौकों पर बढ़ कर 2 हजार रुपए तक हो जाती है. कई बार मांग ज्यादा होने पर वे गुलाब के फूल 100 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से नागपुर से मंगा कर 150 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बेच कर भी अतिरिक्त आमदनी कर लेते हैं.

1 एकड़ में की जा रही फूलों की खेती में साल भर में तकरीबन 1 लाख रुपए की लागत आती है और उस से उमाशंकर के परिवार को तकरीबन 5 लाख रुपए की आमदनी हो जाती है.

शादीब्याह में होती है अच्छी आमदनी : शादीब्याह के दौरान उमाशंकर फूलों से मंडप सजाने का काम भी करते हैं. विवाह मंडप के साथ जयमाला स्टेज सजाने का काम कर के वे रोजाना 5 से 20 हजार रुपए तक कमा लेते हैं. वे गांव के युवकों को भी रोजगार देते हैं.

कई बार तो शादी के सीजन में 4-5 जगहों पर मंडप सजाने का काम मिल जाता है. गांव के 2-3 युवकों को उन्होंने मंडप सजाने के काम में माहिर बना दिया है. काम ज्यादा होने पर वे गांव के इन युवकों की मदद ले कर उन्हें भी आमदनी कराते हैं.

इसी तरह जन्मदिन पार्टी, शादी की सालगिरह जैसे कार्यक्रमों के साथसाथ उन्हें सुहागरात की सेज सजाने का काम भी मिलता है. राजनीतिक या सार्वजनिक समारोहों में भी उन्हें फूलों की मालाएं और गुलदस्ते सप्लाई करने का आर्डर मिलता रहता है.

30 वर्षीय उमाशंकर कुशवाहा ने अपनी सूझबूझ से खेती को फायदे वाला काम साबित किया है. उमाशंकर से फूलों की खेती के में उन के मोबाइल नंबर 982694273 पर बात कर के जानकारी हासिल की जा सकती है.