घटिया खादबीज की रोकथाम के लिए बनेगा कड़ा कानून

नई दिल्ली : केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रत्येक मंगलवार किसान और किसान संगठनों से संवाद के क्रम में पिछले दिनों नई दिल्ली में किसान संगठनों के सदस्यों से चर्चा की. उन्होंने किसान संगठनों के आए सभी अध्यक्ष, संयोजक व किसानों का स्वागत किया. किसान संगठनों ने कृषि की लागत कम करना, लाभकारी मूल्य देना, फसलों को पानी के भराव से बचाना, कीटनाशक व अच्छा बीज मिल सके और फसल को पशुओं से कैसे बचा सकें आदि के संबंध में चर्चा की व कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए.

उन्होंने आगे बताया कि किसान अनियंत्रित कीटनाशकों व उर्वरकों के उपयोग से धरती के स्वास्थ्य के खराब होने को ले कर भी चिंतित हैं और सरकारी योजनाओं की जानकारी सभी तक कैसे पहुंचे, ताकि सभी किसान उस का लाभ उठा पाएं.

किसानों ने कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान से कहा कि जानकारी के अभाव में कई बार किसान योजनाओं का लाभ नहीं ले पाते हैं. फसल बीमा योजना अच्छी योजना है, लेकिन सभी किसानों का बीमा नहीं हो पाता है. किसान क्रेडिट कार्ड पर पैसा मिलने के संबंध में भी किसानों ने सुझाव दिए हैं.

किसानों ने कई व्यावहारिक समस्याएं सामने रखी हैं, जैसे कि ट्रांफार्मर के जलने पर उसे समय सीमा में बदला जाए, ताकि फसल की सिंचाई प्रभावित न हो. किसानों ने फैक्टरियों से दूषित पानी निकलने और उस से फसलें या भूमिगत जल खराब होने की समस्या पर भी चर्चा की. यह चर्चा उन के लिए बहुत ही उपयोगी है, क्योंकि किसानों की सेवा ही देश की सच्ची सेवा है.

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि किसानों की समस्याएं ऐसी हैं कि दिखने में छोटी लगती हैं, लेकिन इन का समाधान हो जाए तो किसानों की 10 से 20 फीसदी आमदनी बढ़ जाएगी. इसलिए हम ने तय किया है कि जो केंद्र सरकार से संबंधित समस्याएं हैं, जैसे किसानों को घटिया कीटनाशक व बीज न मिलें, इस के लिए कानून को और कड़ा बनाने आदि को ले कर केंद्र सरकार विचार करेगी.

उन्होंने यह भी कहा कि कई चीजें ऐसी हैं, जो राज्य सरकारों को करनी हैं. किसानों के राज्यों से संबंधित सुझाव हम राज्य सरकारों को भेजेंगे.

fertilizer seeds

उन्होंने बताया कि किसानों ने मैनुअल सर्वे से रिकौर्ड को मेंटेन करने से होने वाली परेशानी से बचने को ले कर भी सुझाव दिए हैं, जो कि बहुत ही उपयोगी हैं. किसानों को धन्यवाद देता हूं कि वे चर्चा के लिए आए और उन्होंने अपने बहुमूल्य सुझाव दिए. हमें जो सुझाव मिले हैं, उन पर मिल कर काम करेंगे और समस्याओं के समाधान पर राज्य सरकारों के साथ मिल कर भी प्रयास करेंगे.

अमरूद की खेती से हो रही बंपर आमदनी

विदिशा : जिले के प्रगतिशील किसान थान सिंह यादव उद्यानिकी फसलों के प्रेरणास्रोत बने हैं. उन्होंने अपने खेतो में नवाचारों की फसल कर के दूसरे किसानों को इस ओर बढ़ने की लालसा बढ़ाई है. उदयगिरि गुफाओं के पास ही थान सिंह के खेतों में उद्यानिकी फसलें पर्यटकों का ध्यानाकर्षण कर रही हैं.

पर्यावरण में प्रत्यक्ष रूप से योगदान करने वाले किसान थान सिंह यादव ने जब से उद्यानिकी फसलों का दामन पकड़ा है, तब से आमदनी में चौगुना मुनाफा हो रहा है. उद्यानिकी विभाग की योजनाएं, प्रशिक्षण भ्रमण कार्यक्रमों से प्राप्त जानकारियों को सीधे खेतों में उतार कर प्रगतिशील किसान का ओहदा हासिल करने वाले सुनपुरा के किसान शासन की किसान हितैषी योजनाओं से पृथकपृथक प्रगति हासिल की गई है.

किसान थान सिंह यादव द्वारा साल 2017-18 मे उद्यान विभाग की सहायता से अनुदान पर अमरूद की एल-49, इलाहबादी सफेदा किस्म का चयन कर फल अनुसंधान केंद्र, ईटखेडी, भोपाल से पौधे लाए गए और इन को उच्च घनत्व मे 6 बाई 3 मीटर की दूरी पर रोपा गया. विभाग द्वारा अनुदान पर 0.500 हेक्टेयर में अमरूद फलोद्यान एवं ड्रिप लगाई गई. वर्ष 2021-22 से किसान को फलोद्यान से उत्पादन प्राप्त होने लगा. साल 2023 में तकरीबन 1.80 लाख रुपए की आमदनी प्राप्त की गई.

थान सिंह यादव बताते हैं कि ड्रिप लगाने से फलोद्यान मे 25-30 फीसदी उत्पादन बढ़ा. साथ ही, सभी पौधों को समान रूप से पानी उपलब्ध हो पाया, जिस से शतप्रतिशत पौधे जीवित रहे. फलोद्यान के रखरखाव में हर साल 50,000 रुपए खर्च आता है. इस प्रकार 1.20 लाख रुपए की शुद्ध आय प्राप्त करते हैं, जो कि कृषि फसलों की अपेक्षा दोगुना लाभ दे रही है. प्रगतिशील किसान थान सिंह यादव ने किसान हितैषी योजनाओं का लाभ उठाने का आह्वान किसानों से किया गया.

नैनो डीएपी से मिल रही अधिक पैदावार

शिवपुरी : किसान कप्तान धाकड़ ने कृषि वैज्ञानिकों से फसल की पैदावार बढ़ाने के लिए आवश्यक सलाह ली. सलाह लेने के उपरांत उन्होंने अपने खेत में होने वाली फसलों में नैनो डीएपी का उपयोग करना शुरू किया. परिणामस्वरूप, अब वे नैनो डीएपी के उपयोग से अच्छी पैदावार प्राप्त कर रहे हैं. उन्होंने किसानों को भी सलाह दी है कि वे भी नैनो डीएपी का उपयोग कर सकते हैं.

तहसील शिवपुरी के ग्राम पिपरसमां निवासी कप्तान धाकड़ ने बताया कि उन्होंने नैनो डीएपी का उपयोग बीजोपचार में किया. बीजोपचार के बाद उन्हें इस के अच्छे परिणाम प्राप्त हुए, तो उन्होंने दानेदार खाद्य की मात्रा कम कर दी, जिस से पौधे का अंकुरण सही ढंग से हुआ. अभी वर्तमान में भी वे अपने खेत में नैनो डीएपी का उपयोग कर रहे हैं, जिस से आज उन की फसल बिलकुल ठीक हुई है. जिस फसल में उन्होंने दानेदार का उपयोग नहीं किया और नैनो डीएपी का उपयोग किया, उस फसल में उन्हें अच्छा फायदा हुआ है. उन्होंने नैनो डीएपी का उपयोग टमाटर में भी किया. टमाटर में भी इस के अच्छे परिणाम प्राप्त हुए हैं.

उन्होंने किसानों को यही सलाह दी है कि गेहूं, सोयाबीन, चना आदि के लिए नैनो डीएपी का ही उपयोग करें. क्योंकि इस के उपयोग से बीज में सही अंकुरण होता है. पौधा भी सही रूप से विकसित होता है.

किसान योजनाओ का कैसे लें फायदा

राजगढ़़ : कृषि विभाग की विभिन्न योजना के अंतर्गत बीज,सिंचाई, यंत्र एवं आदान सामग्री का लाभ लेने के लिए जिले के किसान “एमपी किसान” पोर्टल पर औनलाइन पंजीयन कराएं. पंजीयन के लिए वैब ब्राउजर पर kisan.mp.gov.in  के माध्यम से स्वयं या नजदीकी एमपी औनलाइन पर जा कर आवेदन करें.

जिले के किसान कृषि विभाग से संबंधित योजनाओं का लाभ प्राप्त करने के लिए वैब ब्राउजर पर जा कर kisan.mp.gov.in यूआरएल के माध्यम से किसान खुद ही पंजीयन कर सकते हैं. किसान पोर्टल पर जाने के लिए दिए गए यूआरएल kisan.mp.gov.in वैब ब्राउजर पर अंकित करें.

कृषि योजना में पंजीयन करने के लिए पंजीयन पर क्लिक करें. लिंक पर क्लिक करने बाद नए टैब मे पंजीयन पेज ओपन हो जाता है और पंजीयन के लिए जरूरी दस्तावेज के संलग्न होने की जानकारी दी जाती है, जैसे किसान का आधारकार्ड, किसान की भूमि से संबंधित जानकारी, किसान की समग्र आईडी, किसान का जाति प्रमाणपत्र. यदि आवेदक अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति का हो, तो जानकारी ध्यानपूर्वक पढ़ें और आगे बढ़ें.

बटन पर क्लिक करने के बाद किसान का पंजीयन फार्म प्रदर्शित हो जाता है, जहां दो औप्शन प्रदर्शित होते हैं. आधार नंबर द्वारा पंजीयन अथवा भूअभिलेख द्वारा पंजीयन करें. औप्शन में से किसी एक औप्शन के माध्यम से अपना पंजीयन कर सकते हैं अथवा नजदीकी एमपी औनलाइन पर जा कर भी अपना पंजीयन यानी आवेदन करा सकते हैं.

इस वर्ष कृषि विभाग के औनलाइन पोर्टल एमपी किसान पर आवेदन के पंजीयन के उपरांत ही किसानों को कृषि विभाग की योजनाओं का लाभ प्राप्त हो सकेगा. इसलिए किसानों से अपील की जाती है कि औनलाइन पोर्टल एमपी किसान पर अपना आवेदन पंजीयन कराएं.

पराली जलाने की रोकथाम के लिए उड़नदस्‍ते तैनात

चंडीगढ़ : सीएक्यूएम के निर्देशों के तहत पंजाब और हरियाणा राज्य सरकार द्वारा तैयार की गई व्यापक कार्ययोजनाओं का लक्ष्य खरीफ सीजन 2024 में धान की पराली जलाने की घटनाओं को रोकना है.

पंजाब और हरियाणा राज्यों में धान की कटाई के मौसम के दौरान धान की पराली जलाने की घटनाओं की रोकथाम के लिए एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय और निगरानी कार्रवाई को तेज करने के लिए सीएक्यूएम की सहायता करने वाले सीपीसीबी के उड़नदस्ते को 01 अक्तूबर, 2024 से 30 नवंबर, 2024 के दौरान पंजाब और हरियाणा के चिन्हित जिलों में तैनात किया गया है, जहां धान की पराली जलाने की घटनाएं आमतौर पर अधिक होती हैं.

इस तरह से तैनात किए गए उड़नदस्ते संबंधित अधिकारियों/जिला स्तर के अधिकारियों/संबंधित राज्य सरकार द्वारा नियुक्त नोडल अधिकारियों के साथ निकट समन्वय में काम करेंगे.

पंजाब के जिन 16 जिलों में उड़नदस्‍ते तैनात किए गए हैं, उन में अमृतसर, बरनाला, बठिंडा, फरीदकोट, फतेहगढ़ साहिब, फाजिल्का, फिरोजपुर, जालंधर, कपूरथला, लुधियाना, मानसा, मोगा, मुक्तसर, पटियाला, संगरूर और तरनतारन शामिल हैं. वहीं हरियाणा के जिन 10 जिलों में उड़नदस्‍ते तैनात किए गए हैं, उन में अंबाला, फतेहाबाद, हिसार, जींद, कैथल, करनाल, कुरुक्षेत्र, सिरसा, सोनीपत और यमुनानगर शामिल हैं.

उड़नदस्‍ते संबंधित अधिकारियों के साथ निकट समन्वय में जमीनी स्तर की स्थिति का आंकलन करेंगे और दैनिक आधार पर आयोग और सीपीसीबी को रिपोर्ट करेंगे. इस रिपोर्ट में आवंटित जिले में धान की पराली जलाने की घटनाओं को रोकने के लिए उठाए गए कदमों के बारे में भी जानकारी दी जाएगी. इस के अलावा सीएक्यूएम जल्द ही पंजाब और हरियाणा में कृषि विभाग और अन्य संबंधित एजेंसियों के साथ निकट समन्वय के लिए धान की कटाई के मौसम के दौरान मोहाली/चंडीगढ़ में “धान की पराली प्रबंधन” सेल स्थापित करेगा. दोनों राज्‍यों के विभिन्‍न जिलों में उड़नदस्‍ते तैनात किए गए हैं.

पाम औयल की खेती (Palm Oil Cultivation) पर कार्यशाला

गुवाहाटी: असम के कृषि विभाग द्वारा भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण विभाग (डीएएंडएफडब्लू) के सहयोग से आयोजित सतत तेल पाम खेती पर दोदिवसीय राष्ट्रीय स्तर की समीक्षा और कार्यशाला गुवाहाटी में संपन्न हुई. इस कार्यक्रम में सरकारी निकायों, निजी कंपनियों, किसानों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के प्रमुख हितधारकों को वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं का आदानप्रदान करने और भारत में सतत तेल पाम खेती को आगे बढ़ाने के लिए एकसाथ लाया गया.

कार्यशाला की अगुआई में, किसानों और तेल पाम उद्योग के प्रतिनिधियों के साथ एक संवाद सत्र आयोजित किया गया, जिस में तेल पाम उद्योग की चुनौतियों पर चर्चा की और सर्वोत्तम प्रथाओं पर विचारविमर्श किया गया. देश के विभिन्न हिस्सों से तेल पाम किसानों के साथसाथ उद्योग के प्रतिनिधियों ने संवाद सत्र में भाग लिया. इस के बाद राज्य सरकार के प्रतिनिधियों के साथ खाद्य तेल, तेल पाम (एनएमईओ-ओपी) पर राष्ट्रीय मिशन के कार्यान्वयन में बाधाओं की पहचान करने के लिए राज्य के प्रदर्शन की भौतिक और वित्तीय समीक्षा की गई, जिस से कार्यान्वयन दक्षता में सुधार के लिए भविष्य की कार्रवाई को आकार देने में मदद मिली.

सम्मेलन को संबोधित करते हुए असम के कृषि मंत्री अतुल बोरा ने क्षेत्र की अर्थव्यवस्था के लिए टिकाऊ तेल पाम की खेती के रणनीतिक महत्व पर जोर दिया और किसानों को सरकार के निरंतर समर्थन का आश्वासन दिया. उन्होंने असम की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि असम पूरे पूर्वोत्तर और देश में टिकाऊ तेल पाम क्षेत्र को आगे बढ़ाने में अग्रणी भूमिका निभा रहा है.

भारत सरकार के डीए एंड एफडब्ल्यू के सचिव डा. देवेश चतुर्वेदी ने देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए खाद्य तेल उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के राष्ट्रीय उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए पाम औयल की खेती के महत्व पर प्रकाश डाला और सभी हितधारकों से यह सुनिश्चित करने के लिए एकसाथ आने को कहा कि घरेलू स्तर पर उत्पादित पाम औयल का हिस्सा अगले 5-6 वर्षों में मौजूदा 2 फीसदी से बढ़ कर 20 फीसदी हो जाए.

चर्चा की शुरुआत करते हुए, संयुक्त सचिव (तिलहन), डीए एंड एफडब्ल्यू अजीत कुमार साहू ने एनएमईओ-ओपी के कार्यान्वयन के मुद्दों के बारे में विस्तार से बताया, चुनौतियों से निबटने के लिए राज्यों, किसानों और उद्योग के बीच सहयोग पर जोर दिया.

कार्यक्रम की शुरुआत में असम की कृषि उत्पादन आयुक्त अरुणा राजोरिया ने सभी प्रतिनिधियों का स्वागत किया और विशेष रूप से पूर्वोत्तर में टिकाऊ तेल पाम प्रथाओं को बढ़ावा देने में राज्य की अग्रणी भूमिका को रेखांकित किया.

कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (सीएसीपी) के अध्यक्ष विजय पाल शर्मा ने पाम औयल की खेती के आर्थिक प्रभाव पर ध्यान केंद्रित किया. उन्होंने प्रौद्योगिकी और टिकाऊ प्रथाओं की भूमिका को बेहतर लाभप्रदता से जोड़ते हुए इस के महत्व पर प्रकाश डाला.

संजय अग्रवाल, पूर्व सचिव डीए एंड एफडब्ल्यू की अध्यक्षता में आयोजित एक महत्वपूर्ण सत्र में एनएमईओ-ओपी के कार्यान्वयन चुनौतियों की जांच की गई. उन्होंने तेल पाम उत्पादन में तेजी लाने के लिए सरकारी निकायों, उद्योग जगत के नेताओं और किसानों के बीच अधिक समन्वय का आग्रह किया, जिस में नीति और कार्यान्वयन की बाधाओं पर चर्चा की गई.

कार्यशाला में पौधों की गुणवत्ता और तेल की पैदावार में सुधार के लिए शेल जीन तकनीक सहित तकनीकी प्रगति का प्रदर्शन किया गया. उच्च गुणवत्ता वाली रोपण सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित करने पर मुख्य ध्यान दिया गया, जो तेल पाम की खेती की सफलता के लिए एक महत्वपूर्ण कारक है. इस के अतिरिक्त पाम तेल के स्वास्थ्य और पोषण संबंधी पहलुओं पर चर्चा की गई, गलत धारणाओं को दूर किया गया और इस के लाभों पर प्रकाश डाला गया.

पाम औयल उत्पादक देशों की परिषद (सीपीओपीसी) के प्रतिनिधियों सहित अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों ने पाम औयल की खेती में वैश्विक रुझानों और विनियामक विकास पर जानकारी प्रदान की. राउंड टेबल सस्टेनेबल पाम औयल (आरएसपीओ) और वर्ल्ड वाइड फंड फौर नेचर (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) ने स्थिरता और जलवायु लचीलेपन पर चर्चा में योगदान दिया, भारत के लिए टिकाऊ प्रथाओं को अपनाने और अन्य क्षेत्रों में अनुभव किए गए पर्यावरणीय नुकसानों से बचने के लिए रणनीतियों को साझा किया.

पाम औयल की खेती (Palm Oil Cultivation)

गोदरेज एग्रोवेट लिमिटेड (जीएवीएल), 3एफ औयल पाम प्राइवेट लिमिटेड, पतंजलि फूड्स लिमिटेड (पीएफएल) और एएके जैसे उद्योग जगत के नेताओं ने सक्रिय रूप से भाग लिया और औयल पाम मूल्य श्रंखला में अपने अनुभव साझा किए. उन्होंने भारत में स्थायी औयल पाम उत्पादन को बढ़ाने में निजी क्षेत्र की भूमिका पर प्रकाश डाला, विशेष रूप से सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से.

कार्यक्रम का समापन सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ हुआ, जिस में भारत में, विशेषकर पूर्वोत्तर क्षेत्र में पाम की खेती के भविष्य की संभावनाओं पर ध्यान केंद्रित किया गया. चर्चाओं में डाउनस्ट्रीम उद्योगों और सार्वजनिक-निजी सहयोग की भूमिका पर विचार किया गया, जिस से घरेलू उत्पादन को बढ़ावा मिल सके.

कार्यशाला से प्राप्त मुख्य बातों से हितधारकों को एनएमईओ-ओपी को लागू करने के लिए अपनी रणनीतियों को परिष्कृत करने में मदद मिलने की उम्मीद है. साथ ही, इस में शामिल सभी लोगों के लिए स्थिरता, लाभप्रदता और आर्थिक विकास सुनिश्चित होगा.

नीति निर्माताओं, उद्योग जगत के नेताओं, किसानों और अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों के सहयोग ने भारत में पाम औयल उत्पादन के भविष्य के लिए एक मजबूत नींव रखी, जिस में पूरे श्रंखला में विकास और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाए रखने पर जोर दिया गया.

खादबीज की कालाबाजारी की तो होगी सख्त कार्यवाही

अशेाक नगर : कलक्टर सुभाष कुमार द्विवेदी द्वारा निर्देशित किया गया कि सभी लोग इस बात का ध्यान रखें कि आगामी रवि सीजन को देखते हुए किसान भाइयों को किसी प्रकार की परेशानी का सामना न करना पड़े, इसलिए सही प्रकार से उच्च गुणवत्ता के उर्वरकों का निर्धारित दर पर बिक्री किया जाना सुनिश्चित करें. साथ ही, डीएपी के विकल्प के रूप में एनपीके 20 :20 :0 :13 ,12:32:16, 16: 16 : 16, सिंगल सुपर फास्फेट एवं टीएसपी उर्वरकों से पूर्ति करने के लिए किसान भाइयों को तकनीकी रूप से सलाह दी जाएं. साथ ही, समस्‍त डीलरों को तकनीकी रूप से प्रशिक्षण भी दिया गया. आने वाले समय में किसानों को पर्याप्त मात्रा में खादबीज उपलब्ध रहे.

बैठक में कलक्‍टर सुभाष द्विवेदी ने निर्देश दिए कि जिले में खादबीज की कालाबाजारी न हो, सुनिश्चित किया जाए. साथ ही, उन्होंने निर्देश दिए कि कालाबाजारी करने वालों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाएगी.

उन्होंने यह भी कहा कि जिले में पर्याप्त मात्रा में यूरिया है. यूरिया की कोई कमी नहीं है. साथ ही, उन्होंने कृषि विभाग को निर्देशित किया कि किसानों की मांग के अनुसार डीएपी और एनपीके के प्रस्ताव बना कर शासन को भेजा जाए, जिस से जिले में खाद की कमी न रहे.

उन्होंने आगे कहा कि जिले में किसी प्रकार की कोई नकली खाद न बिके, यह सुनिश्चित किया जाए. बैठक उपसंचालक, कृषि, केएस कैन एवं समस्त वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी और समस्त थोक एवं रिटेलर खादबीज विक्रेता एवं कृषक उत्‍पादन संगठन उपस्थित रहे.

भारतीय मानक ब्यूरो ने राष्ट्रीय कृषि संहिता पर कार्यशाला आयोजित की

नई दिल्ली : भारतीय मानक ब्यूरो (Bureau of Indian Standards) ने राष्ट्रीय कृषि संहिता (एनएसी) के विकास में तेजी लाने के लिए पिछले दिनों एक कार्यशाला आयोजित की. कृषि क्षेत्र के महत्व, संसाधनों और नवीनतम प्रौद्योगिकियों के अधिकतम उपयोग को समझते हुए बीआईएस ने एनएसी विकसित करने का प्रस्ताव रखा, जो फसल चयन से ले कर कृषि उपज के भंडारण तक सर्वोत्तम कार्य प्रणालियां सुनिश्चित करेगा.

एनएसी में उभरती कृषि प्रौद्योगिकियों, नवीन कृषि पद्धतियों और पूरे भारत में बदलती क्षेत्रीय स्थितियों को शामिल करने की परिकल्पना की गई है. इस कोड को विकसित करते समय जिन क्षेत्रों में मानकीकरण की कमी है, उन की पहचान की जाएगी और उन के लिए मानक विकसित किए जाएंगे.

यह कार्यक्रम राष्ट्रीय मानकीकरण प्रशिक्षण संस्थान (एनआईटीएस), नोएडा में आयोजित किया गया था, जिस में केंद्र और राज्य सरकारों, आईसीएआर संस्थानों, राज्य कृषि विश्वविद्यालयों और उद्योग संघों के हितधारकों ने भाग लिया. यह बीआईएस द्वारा विकसित अन्य सफल कोडों जैसे कि राष्ट्रीय भवन संहिता (एनबीसी), निर्माण और बिजली के लिए राष्ट्रीय विद्युत संहिता (एनईसी) की तर्ज पर है.

बीआईएस के महानिदेशक प्रमोद कुमार तिवारी ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की और इस बात पर प्रकाश डाला कि कृषि मशीनरी, उपकरण और जानकारी के लिए मानक मौजूद हैं, लेकिन राष्ट्रीय कृषि संहिता (एनएसी) नीति निर्माताओं को आवश्यक सूचना और किसान समुदाय को मार्गदर्शन प्रदान कर के भारतीय कृषि में गुणवत्ता संस्कृति को सक्षम करने के रूप में काम करेगी. एनएसी के विकास के लिए मुख्य विचारों में इस का दृष्टिकोण, संरचना, जुड़ाव के लिए विभिन्न तरीके, संस्थागत तत्परता और प्रदर्शनों का महत्व शामिल होगा.

बीआईएस के डीडीजी (मानकीकरण) संजय पंत ने कहा कि एनएसी में किसानों के लिए अधिक अनुकूल वातावरण बना कर भारत के कृषि क्षेत्र को बदलने की अपार संभावनाएं हैं. किसानों के सामने आने वाली चुनौतियों का समाधान कर के और कुशल व टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा दे कर, एनएसी ग्रामीण भारत में लाखों लोगों की आजीविका में उल्लेखनीय सुधार कर सकता है.

कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों को 7 समूहों में संगठित किया गया, ताकि उन्हें फसल चयन, जमीन की तैयारी, बोआई/रोपाई, सिंचाई/जल निकासी, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन, पौधों के स्वास्थ्य प्रबंधन, कटाई/थ्रैशिंग, प्रारंभिक प्रसंस्करण, कटाई के बाद के कामों, स्थिरता, रिकौर्ड रखरखाव, पता लगाने की क्षमता और स्मार्ट कृषि सहित कृषि के विशिष्ट पहलुओं पर गहन जानकारी दी जा सके. कार्यशाला का समापन एनएसी के विकास में योगदान देने के लिए नोडल संगठनों और विशेषज्ञों की पहचान के साथ हुआ.

कृषि भारत की अर्थव्यवस्था, आजीविका और खाद्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है, जो देश के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 20 फीसदी है और 50 फीसदी कार्यबल को रोजगार देती है. ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली 60 फीसदी से अधिक आबादी को कृषि आवश्यक आय और रोजगार के अवसर प्रदान करती है.

भारत का कृषि क्षेत्र चावल, गेहूं, कपास और मसालों सहित दुनिया की प्रमुख फसलों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा पैदा करता है, जो इसे वैश्विक खाद्य सुरक्षा में महत्वपूर्ण योगदानकर्ता बनाता है. इस के अलावा कृषि कपड़ा, खाद्य प्रसंस्करण और अन्य उद्योगों के लिए कच्चा माल प्रदान कर के भारत के औद्योगिक क्षेत्र का समर्थन करती है.

प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि और फसल बीमा योजनाओं जैसी पहलों के माध्यम से कृषि विकास पर सरकार का ध्यान किसानों की आजीविका को बढ़ाने, उत्पादकता को बढ़ावा देने और खाद्य उत्पादन में भारत की निरंतर आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करने पर केंद्रित है.

अंधाधुंध कीटनाशकों के चलते बासमती चावल पर गिरी गाज

बासमती ऐक्सपोर्ट डेवलपमेंट फाउंडेशन (बीईडीएफ), मोदीपुरम के प्रधान वैज्ञानिक डा. रितेश शर्मा ने बताया कि रसायनों के अंधाधुंध उपयोग के कारण बासमती फसल के स्वाद और गुणवत्ता की रक्षा के लिए 10 कीटनाशकों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है.

30 जिलों में 10 कीटनाशकों पर प्रतिबंध

उत्तर प्रदेश से बासमती का निर्यात बढ़ाने के लिए सरकार ने बासमती का उत्पादन करने वाले प्रदेश के 30 जिलों में 10 रासायनिक कीटनाशकों की खरीदबिक्री से ले कर उस के प्रयोग तक पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया है. पूर्व में एपीडा (कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण) और उस के बाद प्रदेश के कृषि निर्यात विभाग की अनुशंसा के बाद सरकार ने यह कदम उठाया है.

कृषि विभाग ने 12 सितंबर को बासमती उत्पादन वाले सभी चिन्हित 30 जिलों में सूचीबद्ध 10 रासायनिक कीटनाशकों को रोक के आदेश जारी कर दिए.

सरकार के इस कदम से विदेशों खासकर यूरोपीय मध्यपूर्व के देशों में उत्तर प्रदेश से बासमती का निर्यात बढ़ जाएगा. बासमती चावल के निर्यात लक्ष्य को पाने में सरकार के सामने सब से बड़ी बाधा प्रदेश के खेतों में अंधाधुंध रासायनिक कीटनाशकों का प्रयोग है, क्योंकि कई देशों ने यहां के बासमती को उस के उत्पादन में अत्यधिक कीटनाशकों के प्रयोग किए जाने के कारण लौटा दिया था. इस से न सिर्फ निर्यातकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा था, बल्कि प्रदेश और देश की इमेज को भी धक्का लगा था. उत्तर प्रदेश को मांस के बाद बासमती चावल के निर्यात से ही सब से अधिक विदेशी पैसा हासिल होता है.

सब से पहले अमेरिका और ईरान ने बासमती लेने से किया था मना

इन कीटनाशकों पर लगी है रोक :

कार्बनडाजिम, क्लोरोपाइरीफास, ट्राईसाइक्लाजोल, एसीफेट, थाइमैथोक्साम, बुफ्रोफेजिन, इमिडाक्लोप्रिड, प्रोपिकोनाजोल, हैक्साकोनाजोल, प्रोफिनोफास के नाम शामिल हैं.

इन जिलों में लगी है रोक

एपीडा व कृषि निर्यात विभाग की संस्तुति पर सरकार ने बासमती धान का उत्पादन करने वाले जिन 30 प्रमुख जिलों में रासायनिक कीटनाशकों पर प्रतिबंध लगाया है, उन में आगरा, अलीगढ़, औरैय्या, बागपत, बरेली, बिजनौर, बदायूं, बुलंदशहर, एटा, कासगंज, फर्रुखाबाद, फिरोजाबाद, इटावा, गौतमबुद्धनगर, गाजियाबाद, हापुड़ आदि शामिल हैं. यह प्रतिबंध अगले 60 दिनों तक प्रभावी रहेगा.

उर्वरक और कीटनाशकों के उपयोग को कम करने पर ध्यान देने के बावजूद भी बासमती चावल अप्रैलसितंबर, 2019-20 में भारत से निर्यात में 9.6 फीसदी की गिरावट आई है.

किसान, जो वास्तविक निर्माता हैं. उचित बुनियादी ढांचे को क्रम में सुनिश्चित किया जाना चाहिए. खाद्यान्नों का भंडारण करना, ताकि किसानों को परिरक्षकों का उपयोग करने के लिए मजबूर न होना पड़े. किसान कई रोग और कीट प्रतिरोधी/सहनशील किस्मों का उपयोग करने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए. अधिक लाभ कमाने के लिए बाजार में उपलब्ध है. नियामक संस्थाएं यह सुनिश्चित करेंगी कि उत्पाद अंतर्राष्ट्रीय मानकों का अनुपालन करते हैं, यह अनुपालन भारत करेगा, इस के जैविक विनियमन और ब्रांडिंग के लिए रणनीतियों का भी पता लगाएं. किसान कम में अधिक कमा सकें इनपुट. जैविक भोजन को देखते हुए ऐसी किसी समस्या का सामना नहीं करना पड़ता.

जिंदा मछली परिवहन के लिए ड्रोन प्रौद्योगिकी

कोलकाता : केंद्र सरकार के मत्स्यपालन विभाग के सचिव डा. अभिलक्ष लिखी ने पिछले दिनों कोलकाता स्थित आईसीएआर-केंद्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान (सीआईएफआरआई) का मत्स्यपालन प्रबंधन संबंधी ड्रोन अनुप्रयोग के क्षेत्र में इस संस्थान के अनुसंधान एवं विकास की समीक्षा करने के लिए दौरा किया.

इस कार्यक्रम में वैज्ञानिक, राज्य मत्स्यपालन अधिकारी, मछुआरे और मछुआरियां शामिल हुईं. प्रस्तुति के दौरान, राज्यों के मत्स्यपालन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों, नागर विमानन मंत्रालय, नेफेड, एनसीडीसी, एनईआरएमएआरसी, एसएफएसी, खुदरा विक्रेताओं, स्टार्टअप, मत्स्यपालन अधीनस्थ कार्यालयों, राज्य सरकार के अधिकारियों, एफएफपीओ, सहकारी समितियों आदि को वर्चुअल कौंफ्रेंस के माध्यम से शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया है.

ड्रोन प्रदर्शन के दौरान, डा. अभिलक्ष लिखी ने मछलीपालकों और मछुआरों के साथ सक्रिय रूप से बातचीत की, उन के अनुभवों, उन की सफलता की कहानियों और उन के दैनिक कार्यों में आने वाली चुनौतियों को सुना. इस बातचीत ने इस बारे में बहुमूल्य जानकारी प्रदान की कि कैसे ड्रोन जैसी आधुनिक प्रौद्योगिकी उन की जरूरतों को पूरा कर सकती है, दक्षता में सुधार कर सकती है और मत्स्यपालन के क्षेत्र में उत्पादकता बढ़ा सकती है. साथ ही, उन्हें अपनी आकांक्षाओं और चिंताओं को व्यक्त करने के लिए एक मंच भी प्रदान कर सकती है.

इस मौके पर बोलते हुए सचिव डा. अभिलक्ष लिखी ने कहा कि आईसीएआर-सीआईएफआरआई द्वारा शुरू की गई पायलट परियोजना मछलीपालन के क्षेत्र में नए अवसरों को खोलेगी, जो कम समय और न्यूनतम मानवीय भागीदारी के साथ ताजी मछली के परिवहन के लिए एक प्रभावी और आशाजनक विकल्प प्रदान करेगी और साथ ही मछलियों पर तनाव को कम करेगी.

उन्होंने आगे कहा कि निजी भागीदारी के साथ ड्रोन प्रौद्योगिकी का उपयोग कर के मछली परिवहन पर अनुसंधान और विकास भी उपभोक्ताओं और किसानों को आपूर्ति श्रंखला प्रणाली में बेहतर स्वच्छ ताजी मछली उपलब्ध कराने में सक्षम बनाएगा.

उन्होंने यह भी कहा कि फरवरी, 2024 में 6,000 करोड़ रुपए के परिव्यय के साथ प्रधानमंत्री मत्स्य समृद्धि योजना (पीएम-एमकेएसएसवाई) को स्वीकृति दी गई थी, जिस का उद्देश्य साल 2025 तक मत्स्यपालन क्षेत्र के सूक्ष्म उद्यमों और छोटे उद्यमों सहित मछली किसानों, मछली विक्रेताओं को कार्य आधारित पहचान देने के लिए एक राष्ट्रीय मत्स्यपालन डिजिटल प्लेटफार्म (एनएफडीपी) बना कर असंगठित मत्स्यपालन क्षेत्र को औपचारिक रूप देना है.

सचिव अभिलक्ष लिखी ने कहा कि एनएफडीपी के जरीए पीएम-एमकेएसएसवाई संस्थागत ऋण की पहुंच और प्रोत्साहन, जलीय कृषि बीमा की खरीद, सहकारी समितियों को एफएफपीओ बनने के लिए मजबूत करना, ट्रेसबिलिटी को अपनाना, मूल्य श्रंखला दक्षता और सुरक्षा व गुणवत्ता आश्वासन और रोजगार सृजन करने वाली प्रथाओं को अपनाने के लिए प्रदर्शन अनुदान को सुगम बनाएगा.

उन्होंने आईसीएआर-सीआईएफआरआई और अन्य हितधारकों से ड्रोन आधारित इन अनुप्रयोगों को मछली किसानों तक पहुंचाने के लिए कदम उठाने और यह सुनिश्चित करने का आग्रह किया कि सभी की इन अनुप्रयोगों तक पहुंच हो सके. उन्होंने मत्स्यपालन विभाग से इन सभी मूल्यवान प्रदर्शनों का दस्तावेजीकरण करने और उन को मंत्रालय को भेजने के लिए भी कहा, ताकि उन का इस्तेमाल देशभर के मछली किसानों के बीच जागरूकता पैदा करने के लिए किया जा सके.

इस समीक्षा बैठक में आईसीएआर-सीआईएफआरआई के निदेशक डा. बीके दास ने ड्रोन आधारित प्रौद्योगिकियों में संस्थान की उपलब्धियों और प्रगति को विस्तारपूर्वक प्रस्तुत किया. मत्स्यपालन में ड्रोन प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग पर एक स्टार्टअप द्वारा प्रस्तुति भी दी गई.

विभिन्न ड्रोन आधारित प्रौद्योगिकियों, जैसे स्प्रेयर ड्रोन, फीड ब्राडकास्ट ड्रोन और कार्गो डिलीवरी ड्रोन का प्रदर्शन आईसीएआर-सीआईएफआरआई और स्टार्टअप कंपनियों द्वारा 100 से अधिक मछुआरों और मछुआरिनों के बीच किया गया.

भारतीय मत्स्यपालन क्षेत्र में जलीय संसाधनों की निगरानी और प्रबंधन में कई चुनौतियां हैं, जो जलीय संसाधनों के संरक्षण के लिए प्रभावी और टिकाऊ योजना बनाने में बाधा डालती हैं. हालांकि आधुनिक प्रौद्योगिकियों के लगातार बढ़ते विकास के साथ तालमेल रखने के लिए कृषि प्रणाली में हर दिन सुधार हो रहा है, लेकिन उतरी हुई मछलियों के किफायती उपयोग के लिए व्यवस्थित मछली परिवहन में उचित वैज्ञानिक पद्धति, समय दक्षता और लागत प्रभावी साधनों का अभाव है, क्योंकि यह हमारे मत्स्यपालन और मछली प्रसंस्करण उद्योगों के समुचित विकास के लिए एक जरूरी शर्त है. दूरदराज के मछली पकड़ने वाले क्षेत्रों से लंबी दूरी तक परिवहन के लिए आवश्यक लंबा समय और हैंडलिंग और संरक्षण की कमी से मछलियों को अपूरणीय क्षति हो सकती है. यहां तक कि वे मर भी सकती हैं, जिस से बाजार में उन की कीमत कम हो जाती है और किसानों को भारी नुकसान होता है.

हाल ही में ड्रोन जैसी आधुनिक प्रौद्योगिकी में दूरदराज के स्थानों पर महत्वपूर्ण सामान पहुंचाने, पहुंच बाधाओं को दूर करने और तेजी से डिलीवरी को सक्षम बनाने की जबरदस्त क्षमता है. मत्स्यपालन उद्योग में ड्रोन प्रौद्योगिकी की क्षमता का पता लगाने के लिए, केंद्र सरकार के मत्स्यपालन विभाग ने आईसीएआर-सीआईएफआरआई को “जिंदा मछली परिवहन के लिए ड्रोन प्रौद्योगिकी विकसित करने” संबंधी एक पायलट परियोजना सौंपी है.

यह परियोजना आईसीएआर-केंद्रीय अंतर्देशीय मत्स्य अनुसंधान संस्थान (सीआईएफआरआई), कोलकाता द्वारा कार्यान्वित की जाएगी, जिस का उद्देश्य 100 किलोग्राम पेलोड वाला ड्रोन डिजाइन करना और विकसित करना है, जो 10 किलोमीटर तक जिंदा मछली ले जा सकेगा.