सेहतमंद बथुआ

सागों का सरदार बथुआ है. इसे सेहत के लिहाज से सब से अच्छा आहार माना जाता है. बथुआ को अंगरेजी में लैंब्स क्वार्टर्स कहते हैं. इस का वैज्ञानिक नाम चैनोपोडियम एल्बम है.

साग और रायता बना कर बथुआ पुराने समय से ही खाया जाता रहा है, लेकिन क्या आप को पता है कि दुनिया की सब से पुरानी महल बनाने की किताब शिल्प शास्त्र में लिखा है कि हमारे बुजुर्ग अपने घरों को हरा रंग करने के लिए पलस्तर में बथुआ मिलाते थे?

हमारी बुजुर्ग औरतें सिर से जू व फांस यानी डैंड्रफ साफ करने के लिए बथुए के पानी से बाल धोया करती थीं.

बथुआ विटामिन बी1, बी2, बी3, बी5, बी6, बी9 और विटामिन सी से भरपूर है. साथ ही, इस में कैल्शियम, लोहा, मैग्नीशियम, मैगनीज, फास्फोरस, पोटैशियम, सोडियम, जिंक आदि मिनरल्स होते हैं.

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100 ग्राम कच्चा बथुआ यानी इस के पत्तों में 7.3 ग्राम कार्बोहाइड्रेट, 4.2 ग्राम प्रोटीन व 4 ग्राम पोषक रेशे होते हैं.

बथुआ में जिंक होता है, जो शुक्रवर्धक होता है. बथुआ कब्ज दूर करता है. अगर पेट साफ रहेगा, तो कोई भी बीमारी शरीर में लगेगी ही नहीं. साथ ही, ताकत और स्फूर्ति बनी रहेगी.

जब बथुआ को मट्ठा, लस्सी या दही में मिला दिया जाता है, तो यह किसी भी मांसाहार से ज्यादा प्रोटीन वाला व किसी भी अन्य खाद्य पदार्थ से ज्यादा सुपाच्य व पौष्टिक आहार बन जाता है. साथ में बाजरे या मक्के की रोटी, मक्खन व गुड़ की डली हो, तो इसे खाने के लिए अमीर भी तरसते हैं.

जब हम बीमार होते हैं, तो आजकल डाक्टर सब से पहले विटामिन की गोली खाने की सलाह देते हैं. पेट से होने वाली महिलाओं को खासतौर पर विटामिन बी, सी व आयरन की गोली बताई जाती है. बथुआ में ये सबकुछ हैं.

कहने का मतलब तो यही है कि बथुआ पहलवानों से ले कर पेट से होने वाली महिलाओं तक, बच्चों से ले कर बड़ेबूढ़ों तक सब के लिए फायदेमंद है.

बथुआ का सेवन कम से कम मसाले डाल कर करें. स्वाद के लिए काला नमक मिलाएं और देशी गाय के घी से छौंक लगाएं.  बथुए का उबला हुआ पानी अच्छा लगता है और दही में बनाया हुआ रायता स्वादिष्ठ होता है.

कहने का मतलब है कि जब तक इस मौसम में बथुआ का साग मिलता रहे, हर रोज इस की सब्जी बना कर खाएं.

फार्म एन फूड एग्री अवार्ड से नवाजे गए किसान और कृषिकार

हमारे देश के गांवों से हो रहे नौजवानों के पलायन और सूने होते गांव इस बात की गवाही दे रहे हैं कि लोगों का खेतीबारी से लगातार मोह भंग होता जा रहा है. इस की काफी हद तक जिम्मेदार सरकार की नीतियां और खेती की पुरानी पद्धतियां हैं.

जिन किसानों का खेती से मोह भंग हुआ है, उन में से ज्यादा तादाद छोटे और मझोले किसानों की है, क्योंकि ये किसान रूटीन खेती के चलते खुद के खानेभर का नहीं उगा पाते हैं. ऐसे में वे नहीं चाहते हैं कि उन की अगली पीढ़ी भी अभावों में जिए, इसलिए ऐसे किसान अपने बच्चों को पढ़ालिखा कर नौकरियों और दूसरे व्यवसाय के योग्य तैयार करने का प्रयास कर रहे हैं.

इन किसान परिवारों से जो लोग इस काबिल हो रहे हैं, वे बाहर जा कर पैसे कमा रहे हैं. ऐसे लोग एक बार भी खेतीबारी और गांव की तरफ मुड़ कर नहीं देख रहे हैं. इस वजह से उन के पुरखों की जमीन बंजर हो रही है. बड़े किसानों द्वारा औनेपौने दामों पर वे जमीनें खरीद ली जाती हैं.

खेती से मोह भंग होने की एक वजह यह भी है कि सरकारी मशीनरी से ले कर आम लोगों का नजरिया भी किसानों के प्रति सम्मानजनक न होना है. चूंकि खेती काफी हद तक मौसम पर भी निर्भर करती है. ऐसे में कभीकभी खेती में आपदा, कीट व रोग की मार किसानों की कमर तोड़ देती है.Awards

 

एक बार जब किसान की पूंजी डूबती है, तो कर्ज और नुकसान के चलते खेती से किनारा करना उन की मजबूरी बन जाती है.

इन्हीं समस्याओं और जोखिमों को मात दे कर जो लोग खेती को आधुनिक तरीके से करते हैं, वे न केवल खेती से धंधे के रूप में अच्छाखासा मुनाफा कमा रहे हैं, बल्कि उन्हें सम्मान के नजरिए से भी देखा जाने लगा है.

खेती में अच्छा करने वालों को अब कई बड़े सम्मान भी मिलने लगे हैं, जिस में पद्मश्री से ले कर भारतीय कृषि एवं अनुसंधान परिषद व भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा भी नकदी, मोमैंटो और प्रमाणपत्र के साथ राष्ट्रीय पुरस्कार दिया जाने लगा है. इस की महज यही वजह है कि दूसरे लोग इन सफल किसानों से सीख ले कर खेतीबारी को अपना कर लाभ कमा पाएं.

देश में ऐसे बहुतेरे किसान, वैज्ञानिक, कृषि संस्थान, संगठन और कृषि पत्रकार हैं, जो खेती के जरीए नाम और पैसा दोनों कमा रहे हैं. देश के ऐसे ही चुनिंदा कृषि महारथियों को हर साल ‘फार्म एन फूड’ द्वारा डिस्ट्रिक्ट लेवल, स्टेट लैवल व नैशनल लैवल पर अवार्ड दिया जाता रहा है.

‘फार्म एन फूड’ द्वारा इस साल यह अवार्ड समारोह उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद में स्थित कृषि विज्ञान केंद्र में आयोजित किया गया, जिस में उत्तर प्रदेश के तमाम जिलों सहित बिहार और छत्तीसगढ़ के 100 से भी अधिक कृषि महारथी मौजूद रहे.

पारंपरिक तरीके से स्वागत

किसानों ने अतिथियों को मोटे अनाज की बालियों का गुच्छा भेंट कर के कार्यक्रम की शुरुआत की. इस मौके पर किसान राम चरित्र ने रागी की बालियों से बना गुच्छा अतिथियों को भेंट करते हुए उस के फायदे गिनाए और जैविक  गुड़ का स्वाद अतिथियों सहित सभी किसानों को चखाया.

Awardsअतिथियों और वक्ताओं को किया संबोधित

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि बस्ती मंडल के संयुक्त कृषि निदेशक अविनाश चंद्र तिवारी ने दूरदराज से आए किसानों के नवाचारों की सराहना करते हुए कहा कि हमें किसानों को सब से ज्यादा सम्मान के नजरिए से देखने की जरूरत है, क्योंकि यही ऐसे लोग हैं, जो बिना ठंडी, गरमी और बरसात की फिक्र किए दिनरात खेतों में मेहनत कर के अनाज उगाते हैं और इन्हीं के उगाए अनाज से हमारा और आप का पेट भरता है.

उन्होंने किसानों को सरकार की स्कीमों से जुड़ कर खेती को व्यावसायिक रूप से करने की भी सलाह दी.

विशिष्ट अतिथि और वक्ता अखिल भारतीय किसान महासंघ के राष्ट्रीय संयोजक व ‘मां दंतेश्वरी हर्बल समूह’ के संस्थापक

डा. राजाराम त्रिपाठी ने देश में रासायनिक खेती से हो रहे सेहत के नुकसान को गिनाते हुए बताया कि रासायनिक खेती मानव स्वास्थ्य के साथ ही मिट्टी की सेहत पर भी बुरा असर डाल रही है.

उन्होंने आगे बताया कि जिस तरीके से खेती में रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों का उपयोग हो रहा है, आने वाले दिनों में इस से उत्पादन पर काफी बुरा असर पड़ने वाला है, इसलिए उन्होंने जैविक खेती का रकबा बढ़ाए जाने और खाने में जैविक तरीके से उगाए गए उत्पादों को शामिल किए जाने पर जोर दिया.

उन्होंने यह भी कहा कि वे आदिवासी किसानों के जरीए जैविक और हर्बल खेती करवा कर उन की माली हालत को सुधारने का काम कर रहे हैं.

डा. राजाराम त्रिपाठी ने बताया कि उन के नेतृत्व में ‘मां दंतेश्वरी हर्बल’ को देश का पहला और्गेनिक (जैविक) सर्टिफाइड उत्पाद बनाने वाले कृषक समूह के रूप में 22 साल पहले वर्ष 2000 में मान्यता मिली थी. उन के जैविक उत्पादों की गुणवत्ता का ही परिणाम है कि वे 2 दशकों से अपने उत्पादों को यूरोप, अमेरिका सहित कई देशों में निर्यात कर रहे हैं और वहां इन्हें काफी पसंद भी किया जा रहा है. उन्हें देश का ‘बैस्ट ऐक्सपोर्टर अवार्ड’ भी मिल चुका है.

उन्होंने एमएसपी के मुद्दे पर बोलते हुए कहा कि अगर सरकार किसानों की फसल को एमएसपी के जरीए खरीदना ही चाहती है, तो उस में कुछ चुनिंदा फसलें ही क्यों शामिल की गई हैं? उन्होंने कहा कि सरकार को इस पर विचार करना चाहिए. देश में उगाई जाने वाली हर फसल को एमएसपी में शामिल किया जाए.

साथ ही, उन्होंने किसानों को पारंपरिक खेती से इतर व्यावसायिक खेती अपनाने की सलाह दी और कहा कि किसान व्यावसायिक खेती करें, जैविक खेती और हर्बल खेती करें. किसानों को बाजार से जोड़ने में जहां भी जरूरत होगी, वे अवसर उपलब्ध कराएंगे.

इस के बाद अयोध्या जनपद के उपकृषि निदेशक डा. संजय कुमार त्रिपाठी ने कहा कि किसानों के जिम्मे देश के सवा अरब की आबादी का भार है, क्योंकि किसानों के उगाए अनाज से ही देश के लोगों का पेट भरता है.

उन्होंने खेती में तकनीकी और मशीनरी के इस्तेमाल पर जोर देते हुए कहा कि खेती में मशीनरी के इस्तेमाल से लागत और श्रम में कमी ला कर आमदनी को बढ़ाया जा सकता है.

उन्होंने आगे यह भी कहा कि राज्य और केंद्र सरकारों से खेतीबारी में काम आने वाले कृषि यंत्रों और खादबीज पर ढेर सारी अनुदान योजनाएं संचालित हैं. किसान इन योजनाओं का लाभ ले कर अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं.

बस्ती जनपद के जिला कृषि अधिकारी मनीष कुमार सिंह ने अपने संबोधन में बताया कि कृषि महकमे की योजनाओं का लाभ सभी किसानों को आसानी से मिल पाए, इस के लिए अनुदान योजनाओं के लिए औनलाइन व्यवस्था की गई है, जहां से किसान आवेदन कर के अनुदान का लाभ प्राप्त कर सकते हैं.

चार्टर्ड एकाउंटैंट अजीत कुमार चौधरी ने किसानों को फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी के जरीए कृषि उत्पादों की ब्रांडिंग, प्रोसैसिंग और मार्केटिंग किए जाने की सलाह दी.

उन्होंने आगे बताया कि किसान संगठित हो कर एफपीओ बनाएं, तो उन्हें सरकार की तरफ से भी सरकारी इमदाद के साथ तमाम सहूलियतें प्रदान की जा रही हैं. उन्होंने एफपीओ बनाने की कानूनी प्रक्रिया पर भी जानकारी दी.

कृषि विज्ञान केंद्र, बस्ती के अध्यक्ष व प्राध्यापक प्रो. डा. एसएन सिंह ने कृषि विज्ञान केंद्र के जरीए किसानों को दी जाने वाली सहूलियतों और ट्रेनिंग योजनाओं के बारे में बताया. उन्होंने यह भी कहा कि जब भी कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों की जरूरत किसानों को हो, वे संपर्क कर के खेती से जुड़ी जानकारियां ले सकते हैं.

कार्यक्रम में कृषि विज्ञान केंद्र, संतकबीर नगर के वैज्ञानिक राघवेंद्र विक्रम सिंह, बस्ती से डा. डीके श्रीवास्तव, डा. वीबी सिंह, डा. प्रेम शंकर, हरिओम मिश्र, डा. अंजलि वर्मा, डा. संदीप सिंह कश्यप व भदोही, केवीके के वैज्ञानिक मनोज कुमार पांडेय ने भी किसानों को खेती से जुड़े टिप्स दिए.

राज्य स्तरीय अवार्ड में यह नाम रहे शामिल

कृषि क्षेत्र में विशेष उपलब्धियों के लिए अरविंद कुमार सिंह, अहमद अली, राजेंद्र सिंह, परमानंद सिंह, सुरेंद्र प्रसाद, अमित विक्रम त्रिपाठी, सीमा, डा. वीबी सिंह, डा. संदीप सिंह कश्यप, हरि ओम मिश्र, डा. अंजलि वर्मा, बनारसी लाल, डा. मनोज कुमार सिंह, जेपी शुक्ला, निखिल सीताराम, राघवेंद्र बहादुर पाल, प्रो. डा. रवि प्रकाश मौर्य, डा. मनोज कुमार पांडेय, मोहित शुक्ला, कुंवर सिंह, अनूप बहादुर पाल, मलय कुमार पांडेय, लालजी चौधरी, विजय नंदन पांडेय, भानु प्रताप चतुर्वेदी, कौशल सिंह, ध्रुव कुमार चौधरी, आनंद कुमार पांडेय, प्रेम प्रकाश सिंह, आत्मा प्रसाद पाठक, कर्नल केसी मिश्रा, रीता पांडेय, योगेंद्र सिंह, राम मनोहर चौधरी, शोभित मिश्र, वंदना चौधरी, मनीष श्रीवास्तव, अनुपमा वर्मा, धर्मेंद्र कुमार पांडेय को राज्य स्तरीय फार्म एन फूड अवार्ड से नवाजा गया.

जिला स्तरीय अवार्ड से नवाजे गए किसान

जिला स्तरीय फार्म एन फूड अवार्ड से जिन किसानों को नवाजा गया, उन में प्रहलाद चौधरी, कमलेश चौधरी, साहब दीन निषाद, ओम प्रकाश चौधरी, जगदीश प्रसाद त्रिपाठी, श्यामू, सुनील कुमार, राम बचन यादव, रमेश चौधरी, राम निहाल, मंगल, पप्पू, गोपाल यादव, ज्ञान दास यादव, अंजनी सिंह, गीता सिंह, राम चरित्र, राजा राम यादव, राजेंद्र सिंह, प्रदीप कुमार, लालता प्रसाद, राकेश कुमार, अमरिका, सिराज अहमद, रियाज अहमद, सिकंदर वर्मा, जीतेंद्र कौशल सिंह का नाम शामिल रहा.

देशी खाने का उठाया लुत्फ

कार्यक्रम समापन के बाद फार्म एन फूड की तरफ से देशी अंदाज में खाने की व्यवस्था की गई थी, जिस में लिट्टीचोखा के साथ लाल मूली का सलाद, तीखी चटनी और गरमागरम खिचड़ी के साथ ही मसाले वाले गुड़ की व्यवस्था की गई थी, जिसे किसानों ने खूब पसंद किया.

इन्हें मिला राष्ट्रीय अवार्ड

जिन लोगों का खेती में खासा योगदान रहा है और उन्होंने अपनी पहचान राष्ट्रीय लैवल पर बनाने में कामयाबी पाई है, उस में सब से ऊपर नाम कृषि विज्ञान केंद्र, बस्ती के अध्यक्ष व प्राध्यापक प्रो. डा. एसएन सिंह का रहा. उन्होंने किसानों में नई कृषि तकनीकियों के प्रसार के जरीए किसानों की आमदनी को 3 गुना तक बढ़ाने में कामयाबी पाई है, इसीलिए उन की अगुआई में कृषि विज्ञान केंद्र, बस्ती को बीते साल भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय अवार्ड प्रदान किया गया.

इसी के साथ उन के सहयोगी वैज्ञानिक राघवेंद्र विक्रम सिंह, डा. डीके श्रीवास्तव, डा. प्रेम शंकर और डा. मनोज कुमार पांडे को भी नैशनल लैवल का अवार्ड प्रदान किया गया.

एमएसपी गारंटी किसान मोरचा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा) के राष्ट्रीय संयोजक डा. राजाराम त्रिपाठी को भी फार्म एन फूड नैशनल अवार्ड प्रदान किया गया.

राम मूर्ति मिश्र, विजेंद्र बहादुर पाल, आज्ञा राम वर्मा, संजीव कुमार, उमाशंकर पांडेय, अरविंद शुक्ला, आशुतोष पांडेय, अशोक कुमार सिंह, नागेंद्र पांडेय, नीतू कुमारी, डा. केके शुक्ल, देवानंद तिवारी, विवेक पांडेय, अदिति राज को भी कृषि क्षेत्र में विशेष उपलब्धियों के लिए नैशनल अवार्ड से नवाजा गया. ग्रामीण फाउंडेशन इंडिया से अनीता यादव और सिद्धार्थ फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड से संजय श्रीवास्तव को भी नैशनल अवार्ड दिया गया.

डा. राजाराम त्रिपाठी : एक परिचय

डा. राजाराम त्रिपाठी देश के पहले ऐसे किसान हैं, जिन्हें देश के सर्वश्रेष्ठ किसान होने का अवार्ड 3-3 बार भारत सरकार के कृषि मंत्री के हाथों मिल चुका है. अब तक देशविदेश से उन्हें 150 से अधिक अवार्ड मिले हैं. इसी के साथ उन की बेटी अपूर्वा त्रिपाठी को भी नैशनल अवार्ड से नवाजा गया है.

डा. राजाराम त्रिपाठी ने विलुप्त हो रही जड़ीबूटियों के संरक्षण के लिए न केवल महत्त्वपूर्ण कार्य किया है, बल्कि विलुप्त होती दुर्लभ वनौषधियों के लिए उन के प्राकृतिक रहवास के लिए ‘इथिनो मेडिको गार्डन’ के रूप में देश का पहला मानवनिर्मित हर्बल फारेस्ट भी विकसित किया है, जहां इन विलुप्त होती प्रजातियों का संरक्षण व संवर्धन किया जा रहा है.

छत्तीसगढ़ के बहुत पिछड़े व अतिसंवेदनशील क्षेत्र के रूप में बस्तर को जाना जाता है. इस पिछड़े इलाके में उन्होंने वहां उम्मीद की एक नई पौध का रोपण किया है और वहां के 700 से अधिक आदिवासी परिवार ‘मां दंतेश्वरी हर्बल समूह’ के साथ हर्बल फार्मिंग से जुड़ कर न केवल अपनी आजीविका चला रहे हैं, बल्कि भारत की विरासती जड़ीबूटियों को संजो रहे हैं. इस के अलावा सैंट्रल हर्बल एग्रो मार्केटिंग फैडरेशन के माध्यम से देश के 50 हजार से अधिक और्गेनिक फार्मर्स डा. राजाराम त्रिपाठी के इस अभियान में कदमताल कर रहे हैं.

बीएससी, एलएलबी, हिंदी साहित्य, अंगरेजी साहित्य, इतिहास, अर्थशास्त्र, राजनीति विज्ञान सहित 5 विषयों में एमए और डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त डा. राजाराम त्रिपाठी को देश का सब से ज्यादा शिक्षा प्राप्त किसान माना जाता है.

इसी के साथ डा. राजाराम त्रिपाठी देश के 45 किसान संगठनों के महासंघ ‘अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा)’ के राष्ट्रीय संयोजक भी हैं. साथ ही, वे देश के अग्रणी 223 किसान संगठनों के द्वारा बनाए गए ‘एमएसपी गारंटी किसान मोरचा’ का राष्ट्रीय प्रवक्ता बनाया भी है.

इन्होंने भारत सरकार के सर्वोच्च शोध संस्थान के संगठन सीएसआईआरआईएचबीटी के साथ करार कर स्टीविया की खेती और उस की पूर्णत: कड़वाहटरहित और शक्कर से 250 गुना मीठी स्टीविया की शक्कर बनाने के लिए कारखाना लगाने के लिए 2 करार किए हैं.

विलुप्त हो रही जड़ीबूटियों को संरक्षित करने का काम वे कर रहे हैं. उन के इन योगदान को देखते हुए उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर के कई पुरस्कार, जिन में ग्रीन वारियर भी शामिल है, से नवाजा गया है.

अंगूर की खेती और खास किस्में

भारत में अंगूर की ज्यादातर व्यावसायिक खेती उष्ण कटिबंधीय जलवायु वाले क्षेत्रों में महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु वाले उत्तरी राज्यों में विशेष रूप से की जा रही है.

जून के महीने में देश के उष्ण कटिबंधीय जलवायु वाले क्षेत्रों से ताजा अंगूर उपलब्ध नहीं होते हैं. ऐसे समय में उपोष्ण कटिबंधीय जलवायु वाले क्षेत्रों जैसे पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली व राजस्थान के कुछ भागों में अंगूर की खेती की जा रही है, जिस से जून माह में अंगूर मिलते हैं.

मृदा एवं जलवायु की आवश्यकता

अंगूर की बागबानी हर प्रकार की मिट्टी में की जा सकती है, लेकिन इस के लिए बड़े कणों वाली रेतीली से ले कर मटियार दोमट मिट्टी सब से अच्छी मानी गई है.

खाद व उर्वरक : दक्षिणी भारत में अंगूर के बागों में सब से ज्यादा खाद व उर्वरकों का इस्तेमाल किया जाता है. वैसे यह भी सही है कि वहां पर उपज भी सब से ज्यादा यानी तकरीबन 100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त की जाती है.

दरअसल, वहां के हालात व जलवायु में काफी मात्रा में खाद व उर्वरकों की जरूरत पड़ती है. वहां पर हर तुड़ाई के बाद अंगूर के बगीचों में खाद डाली जाती है. पहली खुराक में नाइट्रोजन व फास्फोरस की पूरी मात्रा और पोटैशियम की आधी मात्रा दी जाती है. फल लगने के बाद पोटैशियम की बाकी मात्रा दी जाती है.

उत्तर भारत में प्रति लता के हिसाब से हर साल 75 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद दी जाती है. इस के अलावा हर साल 125-250 किलोग्राम नाइट्रोजन, 62.5-125 किलोग्राम फास्फोरस और 250-375 किलोग्राम पोटैशियम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से दी जाती है.

अंगूर की फसल में 5 साल की बेलों में 500 ग्राम नाइट्रोजन, 700 ग्राम म्यूरेट औफ पोटाश या 700 ग्राम पोटैशियम सल्फेट व 50-60 किलोग्राम नाइट्रोजन की खाद प्रति बेल हर साल देने को कहा जाता है.

काटछांट के तुरंत बाद जनवरी के आखिरी हफ्ते में नाइट्रोजन व पोटाश की आधी मात्रा व फास्फोरस की पूरी मात्रा डालनी चाहिए. बाकी उर्वरकों की मात्रा फल लगने के बाद डाल कर जमीन में अच्छी तरह मिला देना चाहिए. ऐसा करने से अंगूर की भरपूर उपज मिलती है.

कलम लगाना : कलम के नीचे का कट गांठ के ठीक नीचे होना चाहिए और ऊपर का कट तिरछा होना चाहिए. इन कलमों को अच्छी तरह तैयार की गई क्यारियों में लगा देना चाहिए. ये कलमें हमेशा निरोग व पकी टहनियों से ही लेनी चाहिए. 4-6 गांठों वाली 25-45 सैंटीमीटर लंबी कलमें ली जाती हैं, जो 1 साल में रोपने के लिए तैयार हो जाती हैं.

रोपाई : उत्तर भारत में अंगूर की रोपाई का सही समय जनवरी महीना है, जबकि दक्षिणी भारत में अक्तूबरनवंबर व मार्चअप्रैल महीने में रोपाई की जाती है.

सधाई व छंटाई : अंगूर की भरपूर उपज लेने के लिए बेलों की सही छंटाई जरूरी है. अनचाहे भाग काट दिए जाते हैं, इसे सधाई कहते हैं और बेल पर फल लगने वाली शाखाओं को सामान्य रूप से फैलने के लिए किसी भाग की छंटनी को छंटाई कहते हैं.

अंगूर की बेल को साधने के लिए 2.5 मीटर ऊंचाई पर सीमेंट के खंभों के सहारे लगे तारों के जाल पर बेलों को फैलाया जाता है. बेलों को जाल तक पहुंचाने के लिए केवल एक ही ताना बना दिया जाता है. बेलों के जाल पर पहुंचने पर ताने को काट दिया जाता है.

अंगूर की बेलों की समय पर काटछांट करना बेहद जरूरी है, पर कोंपलें फूटने से पहले काम पूरा हो जाना चाहिए. काटछांट का सही समय जनवरी का महीना होता है.

सिंचाई : आमतौर पर अंगूर की बेलों को नवंबर से दिसंबर महीने तक सिंचाई की जरूरत नहीं होती है, लेकिन छंटाई के बाद बेलों की सिंचाई जरूरी होती है. फूल आने व फल बनने के दौरान पानी की जरूरत होती है. जैसे ही फल पकने शुरू हो जाएं, सिंचाई बंद कर देनी चाहिए. फलों की तुड़ाई के बाद भी एक सिंचाई जरूर करनी चाहिए.

फलों की तुड़ाई : अंगूर के फलों के गुच्छों को पूरी तरह पकने के बाद ही तोड़ना चाहिए, क्योंकि अंगूर तोड़ने के बाद नहीं पकते हैं. फलों की तुड़ाई सुबह या शाम के समय करनी चाहिए. पैकिंग से पहले गुच्छों से टूटे या गलेसड़े दानों को निकाल देना चाहिए, ताकि अच्छे अंगूर खराब न हों.

उपज : अंगूर के बाग की अच्छी देखभाल करने के 3 साल बाद फल मिलने शुरू हो जाते हैं, जो 25-30 सालों तक चलते रहते हैं. उत्तर भारत में उगाई जाने वाली किस्मों से शुरू में कम उपज मिलती है, पर बाद में उपज में इजाफा होता रहता है. नई ‘पूसा अदिति’ किस्म से अन्य किस्मों के मुकाबले ज्यादा उपज मिलती है. उत्तर भारत के किसानों को इस नई किस्म को उगा कर लाभ उठाना चाहिए.

खरपतवार की रोकथाम के लिए नियमित रूप से निराई व गुड़ाई करें.

अंगूर की खास किस्में

भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के फल एवं बागबानी विभाग, नई दिल्ली की अंगूर की एक खास किस्म ‘पूसा अदिति’ है. इस का विकास उत्तर भारत के इलाकों को ध्यान में रख कर किया गया है.

पूसा अदिति : यह अगेती किस्म है. गुच्छे का वजन तकरीबन 450 ग्राम होता है. हर दाने का आकार एकसमान होता है. इस के दाने फटते नहीं हैं. इस किस्म के अंगूर पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश व राजस्थान राज्यों में उगाए जा सकते हैं. यह ज्यादा उपज देने वाली किस्म है.

यह किस्म मानसून आने से पहले जून के दूसरे हफ्ते तक तैयार हो जाती है.

पूसा उर्वशी : शीघ्र पकने वाली (जून के द्वितीय सप्ताह), गुच्छे ढीले, बड़े, जिस में मध्यम अंडाकर दाने लगे होते हैं. फलों का रंग हलका हरापन लिए होता है. बीजरहित फल, जो ताजा खाने और किशमिश बनाने के लिए उपयुक्त है. कुल घुलनशील शर्करा का स्तर 18-22 फीसदी रहता है.

पूसा नवरंग : यह किस्म भी जून के पहले और दूसरे सप्ताह में पक कर तैयार हो जाती है. दानों में बीज रहते हैं, गुच्छों का आकार मध्यम (180-250 ग्राम), गहरे कालेबैंगनी रंग के होते है. इस के फलों की त्वचा और रस का रंग गहरा बैगनी होता हैं.

यह किस्म जूस और रंगीन शराब बनाने के लिए उपयुक्त है. फलों में कुल घुलनशील शर्करा का स्तर 18-20 प्रतिशत रहता है.

पूसा सीडलैस : यह जून के तीसरे सप्ताह में पक कर तैयार हो जाती है. इस के गुच्छे मध्यम से लंबे आकार के गठीले होते हैं. दाने सरस, छोटे, बीजरहित और हरापन लिए हुए पीले रंग के होते हैं. गूदा मुलायम मीठा होता है, जिस में कुल घुलनशील शर्करा का स्तर 20-22 फीसदी रहता है.

ब्यूटी सीडलैस : यह किस्म कैलीफोर्निया (संयुक्त राष्ट्र अमेरिका) से लाई गई है और जून के पहले सप्ताह में पक कर तैयार हो जाती है. गुच्छे शंक्वाकार व छोटे से मध्यम आकार के होते हैं. इस के दाने सरस, छोटे, गोल और काले रंग के होते हैं.

फलों का गूदा मुलायम और हलका सा अम्लीय होता है. छिलका मध्यम मोटा होता है. फलों में कुल घुलनशील शर्करा का स्तर 18-19 फीसदी रहता है. फल बीजरहित होते हैं. अत: खाने के लिए उपयुक्त है.

पर्लेट : इस किस्म का विकास भी कैलीफोर्निया (संयुक्त राष्ट्र अमेरिका) में किया गया था. यह किस्म भी शीघ्र पकने वाली है, जो जून के दूसरे सप्ताह में पक जाती है. गुच्छे मध्यम से लंबे और गठे हुए होते हैं. इस का फल सरस, हरा, मुलायम गूदा और पतले छिलके वाला, बीजरहित होता है. इस में कुल घुलनशील शर्करा का स्तर 20-22 फीसदी रहता है. इस में जिब्रेलिक अम्ल के उपचार से फलों का आकार बढ़ाया जा सकता है.

Grapesऐसे करें कीटों से बचाव

थ्रिप्स : इस कीट का प्रकोप मार्च से अक्तूबर माह तक रहता है. यह अंगूर की पत्तियों, शाखाओं और फलों का रस चूस कर नुकसान पहुंचाता है. इस की रोकथाम के लिए तकरीबन 500 मिलीलिटर मैलाथियान को 500 लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए.

चैफर बीटिल : यह अंगूर का सब से खतरनाक कीट है, जो रात के समय बेलों पर हमला करता है और पूरी फसल को तबाह कर देता है. इस की रोकथाम के लिए 0.5 फीसदी क्विनालफास के घोल का छिड़काव करना चाहिए.

एंथ्रेक्नोज : यह एक फफूंदीजनक रोग है. इस का प्रकोप पत्तियों व फलों दोनों पर होता है. पत्तियों की शिराओं के बीच में जगहजगह टेढ़ेमेढ़े गहरे भूरे रंग के धब्बे बन जाते हैं. इन के किनारे भूरे या लाल रंग के होते हैं. बीच का हिस्सा धंसा हुआ होता है और बाद में पत्ता गिर जाता है. शुरू में काले रंग के धब्बे फलों पर पड़ जाते हैं.

इस की रोकथाम के लिए पौधे के रोगी भागों को काट कर जला दें. पत्तियां निकलने पर 0.2 फीसदी बाविस्टीन के घोल का छिड़काव करें. बारिश के मौसम में कार्बंडाजिम के 0.2 फीसदी घोल का छिड़काव करें.

चूर्णी फफूंदी : यह एक फफूंदीजनक रोग है. इस में पत्ती, शाखाओं व फलों पर सफेद चूर्णी धब्बे बन जाते हैं. ये धब्बे धीरेधीरे सभी पत्तों व फलों पर फैल जाते हैं, जिस के कारण फल गिर सकते हैं या देरी से पकते हैं.

इस की रोकथाम के लिए 0.2 फीसदी घुलनशील गंधक या 0.1 फीसदी कैराथेन का छिड़काव 10-15 दिनों के अंतराल करें.

भेड़ बकरी पालन में जागरूक बन करें विकास

अविकानगर: केंद्रीय भेड़ एवं ऊन अनुसंधान संस्थान अविकानगर में जगन्नाथ यूनिवर्सिटी चाकसू जयपुर के 70 एग्रीकल्चर स्नातक के स्टूडैंट्स का एक दिवसीय शैक्षणिक भ्रमण कार्यक्रम अपनी फैकल्टी डा. जितेंद्र कुमार शर्मा, डा. रामावोतर शर्मा, इंजीनियर एंजेलो डेनिश के साथ आयोजित किया गया.

निदेशक डा. अरुण कुमार तोमर के अनुसार कृषि व पशुपालन में भविष्य में स्टूडैंट्स को ज्यादा से ज्यादा जागरूक कर ही इस में उद्यमिता का विकास किया जा सकता है, इसलिए स्टूडैंट्स ने भ्रमण के दौरान संस्थान के दुंबा भेड़, अविशान भेड़, बकरी एवं खरगोशपालन इकाई के विजिट के साथ टैक्नोलौजी पार्क, मैडिसिनल गार्डन, हौर्टिकल्चर, चारा एवं पशुओं के लिए आवश्यक चारा वृक्ष व अन्य पोषण प्रबंधन के बारे में जान कर वहां पर उपस्थित संस्थान के कर्मचारियों के साथ संस्थान मे चल रहे शोध कार्य को जाना.

एटिक सैंटर के तकनीकी कर्मचारी मोहन सिंह द्वारा स्टूडैंट्स को संस्थान का एक दिवसीय भ्रमण के तहत विभिन्न जगह जैसे वूल प्लांट, सैक्टर्स, प्रदर्शनी हाल, फिजिलौजी आदि का भी भ्रमण कराया गया

17वा दीक्षांत समारोह : शिक्षा और कृषि पर विशेष ध्यान देना होगा

उदयपुर : 20 दिसंबर, 2023. प्रदेश के राज्यपाल कलराज मिश्र ने विवेकानंद सभागार में आयोजित महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय के 17वें दीक्षांत समारोह को संबोधित किया. उन्होंने दीक्षांत समारोह में 864 स्नातक (बीएससी), 201 स्नातकोत्तर (एमएससी) व 74 विद्या वाचस्पति छात्रछात्राओं को दीक्षा प्रदान करने के साथ ही उपाधियां 42 स्वर्ण पदक से नवाजा.

राज्यपाल ने इस वर्ष का कुलाधिपति स्वर्ण पदक दीक्षा शर्मा, एमएससी, कृषि (सस्य विज्ञान) को प्रदान किया.

इस कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि शिक्षा और कृषि पर विशेष ध्यान दे कर ही हम सही माने में राष्ट्र को समृद्ध बना सकते हैं. राष्ट्र की प्रगति का मूल आधार खाद्य और पोषण सुरक्षा ही है. हरित क्रांति और दुग्ध क्रांति के बाद देश खाद्य व पोषण सुरक्षा में आज आत्मनिर्भर जरूर बन गया है, लेकिन यह अंत नहीं है. हमें अभी विकसित भारत के स्वप्न को साकार करना है. इस के लिए हमें कृषि निर्यात को बढ़ाना होगा. यह भी ध्यान रखना होगा कि भूमि की उर्वर शक्ति और जैव विविधता पर खतरा न मंडराए.

उन्होंने आगे कहा कि प्रति व्यक्ति खाद्य उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि के उपरांत भी आबादी का एक बड़ा तबका अभी भी अल्पपोषण व कुपोषण की विपदा झेल रहा है.

कृषि में महिलाओं की खास भूमिका

राज्यपाल कलराज मिश्र ने कहा कि कृषि में महिलाओं की भूमिका आज भी महत्वपूर्ण है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के शोध से पता चलता है कि प्रमुख फसलों के उत्पादन में महिलाओं की भागीदारी 75 फीसदी, बागबानी में 79 फीसदी, फसल कटाई के उपरांत के कामों में 51 फीसदी और पशुपालन व मत्स्यपालन में 95 फीसदी है. इसी के मद्देनजर कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने 15 अक्तूबर को महिला कृषक दिवस मनाने की पहल की है.

दुग्ध उत्पादन में अव्वल

कार्यक्रम में डा. आरसी अग्रवाल, उपमहानिदेशक, कृषि शिक्षा, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली ने कहा कि भारतीय कृषि विविधतापूर्ण है. इस में जलवायु, मृदा, भूगर्भीय पारिस्थितिकी व वनस्पति तंत्र सम्मिलित हैं, जो सहस्त्राब्दियों से विकसित प्राकृतिक आवास, फसलों व पशुधन की विविधता तय करता है. भारत फसली पौधों की उत्पत्ति के विश्व के 8 केंद्रों में से एक है. तकरीबन 166 फसल प्रजातियां व फसलों की 320 जंगली प्रजातियों की उत्पत्ति यहां हुई.

उन्होंने आगे कहा कि देश में इस समय कुल 76 विश्वविद्यालय और 732 केवीके हैं. 8 वर्ष पूर्व तक 23 फीसदी छात्राएं कृषि शिक्षा ग्रहण कर रही थीं, जो आज बढ़ कर 50 फीसदी हो चुकी है. कृषि में महिलाओं की भागीदारी के अच्छे संकेत हैं. वर्ष 2040 तक 9.50 लाख कृषि स्नातकों की आवश्यकता होगी, जो आज 50 फीसदी ही है.

Doctorateडा. आरसी अग्रवाल ने बताया कि पशुपालन भारतीय अर्थव्यवस्था का अभिन्न अंग है. पशु आनुवांशिक संसाधन राष्ट्र की पारंपरिक शक्ति है. आज 221 मिलियन टन दुग्ध उत्पादन के साथ हम विश्व पटल पर प्रथम पायदान पर है. दुग्ध उत्पादन में राजस्थान ने उत्तर प्रदेश को पीछे छोड़ते हुए सर्वाधिक दुग्ध उत्पादन वाले राज्य का गौरव पाया है.

उन्होंने खुशी जाहिर की कि एमपीयूएटी ने भी बकरी की 3 प्रजातियों के पंजीकरण में महती भूमिका निभाई है.

डा. आरसी अग्रवाल ने कहा कि वर्ष 1960 से आरंभ हुए कृषि विश्वविद्यालयों ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के साथ मिल कर कृषि को नई दिशा दी है. हम ने फसलों के क्षेत्र में हरित, दुग्ध में श्वेत, मत्स्य में नीली, तिलहन में पीली, उद्यानिकी व मधुमक्खीपालन में स्वर्णिम, अंडा उत्पादन में रजत, कौफी में भूरी व ऊन उत्पादन में स्लेटी क्रांतियों से एक इंद्रधनुषी परिक्रमण का निर्माण किया है. भारत की 1950-51 से अब तक की यात्रा उत्कृष्ट रही है. इस काल में हम ने उत्पादन की दृष्टि से खाद्यान्न में 6.46, उद्यानिकी में 14.36, दुग्ध में 13.06, अंडे में 76.87 व मत्स्य उत्पादन में 22 फीसदी की वृद्धि दर्ज की है. यही नहीं, वर्ष 2010 तक हम खाद्यान्न सुरक्षित राष्ट्र की श्रेणी में आ गए.

उन्होंने आगे कहा कि आज हमारी आबादी 142 करोड़ है. अनुमान के अनुसार, वर्ष 2023 तक भारत की आबादी 150 करोड़ और वर्ष 2040 तक 159 करोड़ पहुंचने की संभावना है. चिंता इस बात की है कि शहरीकरण औद्योगिकीकरण के कारण ग्रामीण श्रेत्रों में फसली क्षेत्रफल में कमी आ रही है. हम जल की दृष्टि से भी असमृद्ध देखा हैं. विश्व के ताजा पानी का मात्र 4 फीसदी हिस्सा ही हमारे पास है. ऐसे में चुनौतियों को ध्यान में रख कर योजनाएं बनानी होंगी.

उपलब्धियों में शीर्ष पर विश्वविद्यालय

Doctorateकुलपति अजीत कुमार कर्नाटक ने कहा कि विगत एक वर्ष में विश्वविद्यालय ने अनुसंधान के अलावा विभिन्न क्षेत्रों में अनेक उपलब्धियां हासिल की हैं. विराट परिसर, श्रेष्ठ अकादमिक स्तर व शैक्षणिक गुणवत्ता के कारण आज विश्वविद्यालय की भूमिका अद्वितीय है.

प्राकृतिक खेती पर डिगरी कोर्स होगा शुरू

डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने बताया कि प्राकृतिक खेती पर आगामी वर्ष से विश्ववि़द्यालय कृषि स्नातक कार्यक्रम का एक कोर्स चलाएगा. साथ ही, एक प्रथम डिगरी कार्यक्रम आरंभ करने का भी विचार चल रहा है.

12 भारतीय व विदेशी पेटेंट हासिल

डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने प्रमुख उपलब्धियां गिनाते हुए कहा कि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने पहली बार अभिन्न तकनीक विकसित कर विगत एक वर्ष में 12 भारतीय व विदेशी पेटेंट हासिल किए. इन में प्रमुख है, बायोचार निर्माण, सौर ऊर्जा चलित आइसक्रीम गाड़ी का निर्माण, कृषि अवशेषों से हाइड्रोजनयुक्त सिनगैस का निर्माण व स्वचालित सब्जी पौध रोपण तकनीक आदि.

ड्रोन के उपयोग में प्रथम विश्वविद्यालय

उन्होंने बताया कि भारतीय विश्वविद्यालय कृषि में ड्रोन के उपयोग में राज्य का प्रथम विश्वविद्यालय है. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा उपलब्ध 2 ड्रोन खरीद कर किसानों के खेतों पर छिड़काव के लिए सब से पहले उपयोग में लाना शुरू किया.

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद राष्ट्रीय पशु आनुवांशिक संसाधन ब्यूरो करनाल में बकरी की 3 प्रजातियां सोजत, गूजरी व करौली का पंजीकरण कराया गया, जबकि चैथी प्रजाति नैनणा के पंजीकरण की कार्यवाही अंतिम चरण में है.

Milletsमिलेट्स वर्ष में भी पहचान बनाई

कुलपति डा. अजीत कुमार कर्नाटक ने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय मिलेट्स वर्ष में भी विश्वविद्यालय ने राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है. मिलेट्स पर सचित्र मार्गदर्शन, जागरूकता, रैलियां व कार्यशालाएं आयोजित की गईं. छात्रों द्वारा मिलेट्स केक ने तो राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की. मिलेट्स को भोजन में शामिल करने व मिलेट्स पर किए गए कामों के संबंध में एक कौफी टेबल बुक भी तैयार की गई.

अनेक उन्नत बीज किस्में भी रिलीज

अनुसंधान के क्षेत्र में विश्वविद्यालय द्वारा विकसित मक्का की किस्म प्रताप संकर मक्का-6 को राष्ट्रीय स्तर पर चिन्हित व अनुमोदित किया गया. वर्ष 2022-23 में ज्वार, मूंगफली, चना, अश्वगंधा, असालिया, इसबगोल, एवं अफीम फसलों की 8 किस्में यथा प्रताप ज्वार-2510, प्रताप मूंगफली-4, प्रताप चना-2, प्रताप चना-3, प्रताप अश्वगंधा-1, प्रताप असालिया, प्रताप इसबगोल-1 एवं चेतक अफीम राज्य स्तरीय किस्म रिलीज समिति को अनुमोदन हेतु भेजी गई है. विभिन्न अनुसंधान परियोजनाओं द्वारा वर्ष 2023 में 76 तकनीकों का विकास कर किसानों के उपयोग के लिए सिफारिश की गई. वर्ष 2022-23 में हमारे प्रक्षेत्रों पर 4105.71 क्विंटल गुणवत्ता बीज का उत्पादन किया गया और 7.35 लाख पादप रोपण सामग्री तैयार की. साथ ही, मछली के 125 लाख स्पान, 3.20 लाख फ्राई और 1.95 लाख फिंगरलिंग का उत्पादन कर किसानों को वितरित किए गए.

उत्तर प्रदेश में गन्ना खेती की मौडर्न तकनीक

हमारे देश के कुल गन्ना क्षेत्रफल का तकरीबन 60 फीसदी हिस्सा उत्तर भारत के राज्यों में है, जबकि कुल गन्ना उत्पादन का महज 50 फीसदी हिस्सा ही इन राज्यों से मिलता है. इस की मुख्य वजह राष्ट्रीय गन्ना उत्पादकता स्तर 70 टन प्रति हेक्टेयर की अपेक्षा उत्तर भारतीय राज्यों में गन्ना उत्पादकता 55-60 टन प्रति हेक्टेयर से भी कम होना है, इसलिए यह जरूरी है कि इन राज्यों के लिए संस्तुत उन्नत गन्ना किस्में और उन्नत उत्पादन तकनीक अपना कर पेड़ी गन्ने की उत्पादकता को बढ़ाया जाए.

गन्ने की उत्पादकता बढ़ाने में खेत की तैयारी, बीज की गुणवत्ता व इस की मात्रा और बोआई विधि का खास असर पड़ता है. अगर इन में से किसी एक पर भी उचित ध्यान न दिया जाए, तो उपज प्रभावित हो सकती है.

गन्ने की उपज में कमी के विभिन्न कारणों में गन्ने की उन्नत तकनीक के प्रति किसानों में जानकारी की कमी, बढ़ती हुई उत्पादन लागत, लाभांश में कमी और कमजोर बाजार है, जो किसानों के सामने मुख्य मुद्दे बन गए हैं.

बढ़ती हुई गन्ने व चीनी मांग की आपूर्ति के लिए प्रति इकाई उत्पादकता बढ़ाना ही एकमात्र विकल्प होगा, क्योंकि अब गन्ने के तहत क्षेत्रफल बढ़ाने की संभावना नहीं है. पिछले सालों के आंकड़ों से साफ है कि गन्ना उत्पादन और उत्पादकता में उतारचढ़ाव रहा है.

गन्ना उत्पादन बढ़ाने की उन्नत कृषि तकनीकों को अपना कर गन्ना किसान अपने खेतों में उत्पादन बढ़ाने के साथ गन्ना खेती से अधिक लाभ कमा सकते हैं.

गन्ने की संस्तुत किस्में

उत्तर भारतीय राज्यों में उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, बिहार और मध्य प्रदेश प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्य हैं. इन राज्यों के लिए गन्ने की संस्तुत किस्में इस प्रकार हैं :

जल्दी पकने वाली किस्में : को.शा. 687, को.शा. 8436, को.शा. 88230, को.शा. 90265, को.शा. 95255. कोलख 94184, बी.ओ. 102 सी.ओ.एच. 92201, को.जे. 83, को. पंत 84211, को. 87263, को. 98014, को. 0238, को. 0118, को. 0124, को. 0239, को.शा. 96268, कोलख 9709.

मध्य व देर से पकने वाली किस्में : को.शा. 8432, को.शा. 92263, को.से. 92423, को.शा. 93278, को.शा. 91230, को.शा. 88216, को.शा. 96275, को.शा. 94257, बी.ओ. 110, बी.ओ. 91, बी.ओ. 128, कोजे 82, कोजे 84, को. 6304, को. 62175, को. पंत 90223, को.शा. 94270, कोह 119, को. पंत 97222, को.शा. 07250, को.से. 01434, यू.पी. 39, को. पंत 84212, यू.पी. 0097, को.शा. 97261, को.से. 96436.

खेत की तैयारी

जहां गन्ना बोया जाना है, उस खेत की पहली गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करें. उस के बाद 3-4 जुताई हैरो या कल्टीवेटर से करें. हर जुताई के बाद पाटा जरूर लगाएं, जिस से मिट्टी नम व भुरभुरी हो जाए.

भूमि में पर्याप्त नमी के लिए बोने से पहले सिंचाई करें, विशेष रूप से जब समतल विधि से बोते हैं. खेत की तैयारी के दौरान शुरू में केवल नालियां खोदनी चाहिए. अन्य सभी काम जैसे बीज की बोआई, गन्ना काटना, उर्वरक एवं कीटनाशकों का छिड़काव, कूंड़ों में मिट्टी भराई आदि. कटर प्लांटर से बोआई करें. ऐसा करने से मिट्टी में नमी का नुकसान कम होने के साथ ही समय की भी बचत होती है.

उन्नत बीज का चयन

फसल की उपज बढ़ाने में स्वस्थ बीजों की बोआई का खासा महत्त्व है. उन्नतशील किस्म होते हुए भी यदि बीज की क्वालिटी का ध्यान नहीं रखा गया, तो उस किस्म की उपज क्षमता होने के बावजूद भी अच्छी उपज नहीं मिल सकती है.

बीज बोने के लिए जहां तक हो सके, गन्ने के ऊपरी एकतिहाई से दोतिहाई भाग को ही चुनना चाहिए, क्योंकि इस का जमाव जल्दी व अधिक होता है. गन्ने की उन्नतशील किस्म के बीज को स्वस्थ बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि उन के बोने से पहले बीज की छंटाई तक विशेष ध्यान रखना चाहिए.

बोने के लिए गन्ने के बीजों की आयु 10-12 माह ही होनी चाहिए. पेड़ी या गिरे हुए गन्ने को बोने के लिए प्रयोग नहीं करना चाहिए. गन्ना कटाई के तुरंत बाद ही बो देना चाहिए. यदि हो सके, तो गन्ने को 10-12 घंटे तक पानी में भिगोने के बाद ही बोएं.

बीज व मिट्टी उपचार

गन्ने को बीजजनित रोगों से बचाने के लिए उष्मोपचारित बीज की बोआई करनी चाहिए. इस के लिए संस्थान द्वारा विकसित आर्द्र उष्ण वायु यंत्र में गन्ने को 54 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान पर ढाई घंटे तक उपचारित करते हैं. इस से बीजजनित रोगों जैसे लाल सड़न, उकठा, कंडुवा, पेड़ी कुठन व घासीय प्ररोह के प्रकोप की संभावना बहुत कम हो जाती है.

इस यंत्र की सुविधाएं सभी चीनी मिलों में उपलब्ध हैं. इस के बाद गन्ने की 3 आंख वाले  टुकड़े को बावस्टीन की 200 ग्राम मात्रा को 100 लिटर पानी में घोल कर 15-20 मिनट तक उपचारित करना चाहिए. ऐसा करने से जमाव जल्दी व अधिक होता है और भूमि में गन्ने के टुकड़े सड़ने से बच जाते हैं.

बोआई का उचित समय व बीज की मात्रा

गन्ने के अच्छे जमाव के लिए बोते समय 20 से 30 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान होना चाहिए. यह तापमान उत्तर प्रदेश व उत्तर भारत के अन्य राज्यों में 15 फरवरी से मार्च माह तक और

15 सितंबर से अक्तूबर माह तक रहता है, जिस में गन्ने की बोआई करने पर अधिकतम जमाव प्राप्त होता है. गन्ने की मोटाई के अनुसार 60-70 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बीज की जरूरत होती है.

गन्ने की बोआई विधि

समतल विधि : समतल विधि में बोने से पहले खेत की पहली गहरी जुताई करते हैं और 3-4 जुताई कल्टीवेटर से कर के खेत की अच्छी तैयारी के बाद देशी हल अथवा रिजर द्वारा कूंड़ बना लेना चाहिए.

इस विधि में शरदकालीन गन्ने में पंक्ति से पंक्ति की दूरी 90 सैंटीमीटर, वसंतकालीन में 75 सैंटीमीटर और कूंड़ों की गहराई 7 से 10 सैंटीमीटर रखते हैं.

नाइट्रोजन की एकतिहाई मात्रा, फास्फोरस एवं पोटाश की पूरी मात्रा कूंड़ों में मिला देते हैं. इस के बाद बोआई के लिए गन्ने की 3 आंख वाले टुकड़ों को फफूंदीनाशक जैसे बावस्टीन की 200 ग्राम मात्रा को 100 लिटर पानी में घोल कर 15-20 मिनट तक उसे डुबाने के बाद बोते हैं. कटे हुए 3 आंख वाले गन्ने के टुकड़ों को कूंड़ों में सिरे से सिरा या आंख से आंख मिला कर इस प्रकार बोते हैं कि प्रति मीटर कूंड़ लंबाई में 4-5 टुकड़े आ जाएं.

बोने के बाद कूंड़ों में बोए गए टुकड़ों के ऊपर क्लोरोपाइरीफास की 5 लिटर मात्रा का 1500-1600 लिटर पानी में घोल बना कर हजारे द्वारा प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें और इस के बाद कूंड़ों को देशी हल या कुदाली से ढक कर पाटा लगा देना चाहिए.

इस विधि द्वारा बोआई करने से मिट्टी और बोए गन्ने के कटे टुकड़ों से नमी का नुकसान तेजी से होता है, इसलिए उचित सिंचाई की व्यवस्था वाले एरिया में इस विधि को अपनाएं.

Sugarcaneनाली विधि : समतल विधि में कम सिंचाई मिलने से गन्ने का अंकुरण तकरीबन 30 फीसदी तक ही होता है. सिंचाई की कमी की अवस्था में नाली विधि काफी उपयोगी होती है. नाली विधि में बोआई के बाद गन्ने का जमाव अपेक्षाकृत अधिक होता है.

नाली विधि द्वारा गन्ने की बोआई करने के लिए 20 सैंटीमीटर गहरी और 40 सैंटीमीटर चौड़ी नालियां बनाई जाती हैं. एक नाली और दूसरी समानांतर नाली के केंद्र से केंद्र की दूरी 90 सैंटीमीटर रखते हैं. नालियों में गोबर कंपोस्ट या प्रेसमड खाद डाल कर अच्छी तरह मिला देते हैं. गन्ने के 3 आंख वाले टुकड़ों की बोआई नालियों में करते हैं, उस के बाद 4-5 सैंटीमीटर मिट्टी डाल कर ढक देते हैं. बोआई के तुरंत बाद एक हलकी सिंचाई नालियों में करते हैं और ओट आने पर एक अंधी गुड़ाई कर देते हैं. इस से जमाव काफी अच्छा होता है.

गन्ना जमाव के बाद फसल की बढ़वार के हिसाब से नालियों में मिट्टी डालते जाते हैं. ऐसा करने से नाली के स्थान पर मेंड़ और मेंड़ के स्थान पर नाली बन जाती है, जो बारिश में जल निकास के काम आती है.

इस विधि द्वारा गन्ने की अच्छी उपज के साथसाथ पेड़ी की भरपूर उपज भी मिल जाती है. इस विधि में 70-75 फीसदी तक जमाव संभव है.

पौली बैग विधि : उन्नतशील किस्म के बीज की कमी की स्थिति में पौली बैग विधि भी बहुत कारगर है. इस विधि से प्रति हेक्टेयर 20 क्विंटल बीज की जरूरत होती है. गेहूं कटाई के बाद गन्ना बोआई करने वाले क्षेत्रों के लिए पौली बैग विधि से गन्ना बोआई कर के अधिक पैदावार ली जा सकती है, क्योंकि गेहूं कटाई के एक माह पूर्व ही उस की नर्सरी तैयार कर मुख्य खेत में बो दिया जाता है.

पौली बैग में नर्सरी तैयार करने के लिए सब से पहले मिट्टी का मिश्रण तैयार किया जाता है. मिट्टी, बालू और गोबर की खाद या कंपोस्ट की बराबरबराबर मात्रा ले कर अच्छी तरह मिलाते हैं. इस के बाद क्लोरोपाइरीफास 20 ईसी की 10 मिलीलिटर मात्रा से एक क्विंटल मिट्टी के मिश्रण को उपचारित करते हैं.

इस उपचारित मिट्टी के मिश्रण को 5 इंच लंबी व 5 इंच चौड़ी साइज की पौलीथिन बैग में भरते हैं. पौलीथिन बैग में चारों ओर और नीचे से कुछ छेद कर देते हैं, जिस से सिंचाई के बाद अतिरिक्त पानी निकल जाए और गन्ने के टुकड़े सड़ने से बच जाएंगे.

नर्सरी तैयार करने के लिए गन्ने के ऊपरी दोतिहाई भाग को ले कर इस में से एक आंख वाले टुकड़े काट लिए जाते हैं. इन के कटे हुए टुकड़ों को 50 लिटर पानी में 100 ग्राम बावस्टीन मिला कर 15-20 मिनट तक डुबो कर रखा जाता है. इस के बाद पौलीथिन बैग में उपचारित मिट्टी भर देते हैं और टुकड़ों को पौलीथिन बैग में लंबवत अवस्था में इस प्रकार रखते हैं कि आंख ऊपर की ओर रहे और एक हलकी सिंचाई कर देते हैं.

पौली बैग नर्सरी में 5-6 दिन के अंतराल पर पानी का छिड़काव करते हैं. 3-4 सप्ताह में अच्छा जमाव हो जाता है और 3-4 पत्तियां निकल आती हैं, जिन की लंबाई तकरीबन 6 इंच होती है.

रोपाई से पूर्व पौधों की ऊपरी पत्तियों को 2-3 सैंटीमीटर काट देना चाहिए. ऐसा करने से पौधों द्वारा पानी कम लगता है. तैयार खेत में जिन पौधों को बोना है, 90 सैंटीमीटर की दूरी पर रिजर द्वारा कूंड़ बना लेते हैं. इन कूंड़ों में 45 सैंटीमीटर की दूरी पर पौधों की बोआई करें.

इस प्रकार एक बार में तकरीबन 25,000-28,000 पौधे लगते हैं. बोने के बाद तुरंत सिंचाई करनी चाहिए. बोआई के बाद 8-10 दिन बाद खेत का निरीक्षण करें. यदि किसी स्थान पर पौधे सूख गए हों अथवा मर गए हों, उस स्थान पर फिर से नए पौधों की रोपाई कर देनी चाहिए.

रिंग पिट विधि : इस विधि द्वारा गन्ना बोने से पहले तैयार खेत में मेंड़ के किनारे लंबाई व चौड़ाई में 60 सैंटीमीटर जगह छोड़ कर बाकी पूरे खेत में 105 सैंटीमीटर की दूरी पर लंबाई और चौड़ाई में रस्सी की सहायता से लाइन बनाते हैं और कटान बिंदुओं पर 75 सैंटीमीटर व्यास वाले गड्ढे बना लेते हैं. गड्ढे की गहराई तकरीबन 30 सैंटीमीटर रखते हैं.

इस विधि से एक हेक्टेयर खेत में तकरीबन 9,000 गड्ढे बन जाते हैं. प्रत्येक गड्ढे में 3 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद के साथ 20 ग्राम डीएपी, 8 ग्राम यूरिया, 16 ग्राम पोटाश और 2 ग्राम जिंक सल्फेट मिट्टी के साथ अच्छी तरह मिला देते हैं.

खाद और उर्वरक मिलाने के बाद हर गड्ढे में 2 आंख वाले 20 टुकड़ों को साइकिल के पहिए में लगी तीलियों की तरह बिछा देते हैं, फिर इन टुकड़ों पर क्लोरोपाइरीफास 20 फीसदी का 5 लिटर प्रति हेक्टेयर की दर से 1,500-1,600 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़क देते हैं और इन टुकड़ों को भुरभुरी मिट्टी से 5-6 सैंटीमीटर तक ढक देते हैं और बोने के तुरंत बाद एक हलकी सिंचाई कर देते हैं.

उचित ओट आने पर इन गड्ढों की हलकी गुड़ाई करनी चाहिए, जिस से कड़ी परत टूट कर मुलायम हो जाए. उस के बाद जब गन्ने में 4 पत्तियों की अवस्था आ जाए, तो गड्ढे की भराई धीरेधीरे कर दें.

मिट्टी की पहली भराई करते समय गड्ढे में 16 ग्राम यूरिया प्रति गड्ढा डाल दें. जून के अंतिम सप्ताह या वर्षा पूर्व फ्यूरोडान 3 जी की 4 ग्राम और यूरिया 16 ग्राम प्रति गड्ढे में डाल कर बची हुई मिट्टी गड्ढे में भर कर एकसार कर दें. इस विधि को अपना कर किसान प्रति हेक्टेयर 150 टन प्रति हेक्टेयर गन्ना उपज प्राप्त कर सकते हैं.

कटर प्लांटर द्वारा गन्ने की बोआई : कटर प्लांटर से बोआई करने पर एक दिन में तकरीबन 1.5-2.0 हेक्टेयर खेत की बोआई हो जाती है. इस यंत्र द्वारा गन्ना बोआई की सभी क्रियाएं जैसे कूंड़ खुलना, उर्वरक का पड़ना, गन्ने के टुकड़े कट कर गिरना, कीटनाशी दवाओं का पड़ना, कूंड़ों का ढकना और पाटा होना एकसाथ हो जाता है.

इस यंत्र से 35-40 फीसदी तक बोआई लागत में कमी आ जाती है. बोआई से संबंधित सभी क्रियाएं एकसाथ होने के कारण जमाव में तकरीबन 8-10 फीसदी की वृद्धि पाई गई है.

उर्वरक प्रबंधन

100 टन की पैदावार के लिए गन्ने की फसल 208 किलोग्राम नाइट्रोजन, 63 किलोग्राम फास्फोरस, 280 किलोग्राम पोटैशियम, 34 किलोग्राम लोहा, 12 किलोग्राम मैगनीज, 0.6 किलोग्राम जस्ता एवं 0.2 किलोग्राम तांबा आदि तत्त्व मिट्टी से लेती है. इस प्रकार मिट्टी जांच के अनुसार ही उर्वरकों का प्रयोग करना चाहिए.

आमतौर पर गन्ने की भरपूर उपज लेने के लिए 150 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस, 60 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर संस्तुत किया गया है. फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा और नाइट्रोजन की एकतिहाई मात्रा बोते समय कूंड़ों में और बाकी बची नाइट्रोजन की मात्रा को बराबरबराबर 2 बार में टौप ड्रैसिंग द्वारा बोने के 90 दिनों के अंदर डाल देना चाहिए.

यदि समेकित पोषक तत्त्व प्रबंधन किया जाए, तो गन्ने की उपज में बढ़ोतरी के साथसाथ जमीन की उर्वरता भी बनी रहती है. अत: संस्तुत उर्वरक की मात्रा को आधी कार्बनिक व आधी अकार्बनिक तत्त्वों से दी जाए, तो फसल वृद्धि के साथसाथ जमीन की उर्वरता भी बनी रहती है.

जल निकास का उचित प्रबंधन

उत्तर भारत में गन्ने की फसल से भरपूर उपज लेने के लिए 5 सिंचाई बारिश होने से पहले और 2 सिंचाई बारिश के बाद करने की जरूरत रहती है. पानी की उपलब्धता के अनुसार यदि 4 सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध है, तो पहली, दूसरी, तीसरी और चौथी सिंचाई क्रमश: जमाव पूरा होने पर पहली, दूसरी व तीसरी कल्ले निकलने की अवस्थाओं पर करनी चाहिए. यदि 3 सिंचाइयों के लिए पानी उपलब्ध है, तो  सिंचाई पहले, दूसरे और तीसरे कल्ले निकलते समय करनी चाहिए. यदि 2 सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध है, तो ये सिंचाई दूसरे और तीसरे कल्ले निकलते समय करनी चाहिए.

एकांतर नाली विधि द्वारा सिंचाई : इस विधि में पूरे खेत की सिंचाई करने के बजाय एक पंक्ति छोड़ कर पानी लगाया जाता है. इस के लिए हर दूसरी पंक्ति के खाली स्थान में 25 सैंटीमीटर चौड़ी और 15 सैंटीमीटर गहरी नाली बना ली जाती है, जिस में सिंचाई के लिए पानी भर दिया जाता है.

एकांतर नाली विधि द्वारा सिंचाई करने से सामान्य उपज तो मिलती ही है, साथ ही साथ सिंचाई में भी 36 फीसदी तक पानी की बचत हो जाती है. इस बचे हुए पानी को दूसरी फसलों की सिंचाई कर के उपज में बढ़ोतरी और अधिक लाभ लिया जा सकता है.

फसल सुरक्षा

फसल को भूमिजनित कीटों से बचाने के लिए बोआई के समय बने कूंड़ों में बोए गए गन्ने के टुकड़ों पर 5 लिटर क्लोरोपाइरीफास (1 लिटर सक्रिय तत्त्व प्रति हेक्टेयर) को 1,500-1,600 लिटर पानी में घोल कर फव्वारे द्वारा डालना चाहिए, वहीं चोटी बेधक कीट की रोकथाम के लिए जून के अंतिम सप्ताह में फ्यूराडान की 33 किलोग्राम (1 किलोग्राम सक्रिय तत्त्व प्रति हेक्टेयर) का प्रयोग गन्ने की जड़ों के पास करना चाहिए.

मिट्टी चढ़ाना व बंधाई करना

गन्ने की फसल को गिरने से बचाने के लिए जून के अंतिम सप्ताह या जुलाई के पहले सप्ताह में गन्ने की जड़ों पर मिट्टी चढ़ाएं. अगस्त माह में पहली बंधाई पंक्तियों में खड़े प्रत्येक थान की अलगअलग करें. दूसरी बंधाई सितंबर में 2 आमनेसामने के थानों को आपस में मिला कर करें. ऐसा करने से वर्षा ऋतु में तेज हवा के बावजूद भी गन्ना कम गिरेगा, जिस से उपज में कमी नहीं आएगी.

मैदानी इलाकों में आलू की उन्नत खेती

आलू सब्जी वाली फसल है. इस की खेती रबी या शरद मौसम में की जाती है. इस की उपज क्षमता समय के अनुसार सभी फसलों से ज्यादा है, इसीलिए इस को ‘अकालनाशक फसल’ भी कहते हैं. इस का प्रत्येक कंद पोषक तत्त्वों का भंडार है, जो बच्चों से ले कर बड़ों तक के शरीर का पोषण करता है.

भारत में मूल रूप से आलू की खेती प्रारंभिक अवस्था में पहाड़ी इलाकों में की जाती थी. आलू के स्वाद एवं पौष्टिकता ने स्थानीय किसानों को आकर्षित किया और धीरेधीरे आलू की खेती का विस्तार मैदानी इलाकोें में भी अक्तूबर से मार्च माह तक होने लगा.

हमारे देश में आलू मुख्य रूप से सर्दियों के मौसम में उगाया जाता है. आलू की फसल तैयार होने की कम अवधि के कारण इसे आसानी से 2 फसलों के बीच में किया जा सकता है, जिस से फसल सघनता भी प्रभावित नहीं होती है. समान हालात में दूसरी फसलों की तुलना में आलू की खेती से प्रति इकाई क्षेत्रफल व समय में अधिक लाभ प्राप्त होता है. बढ़ती आबादी के लिए भोजन के साथसाथ आलू की खेती गांवों में रोजगार के अवसर का भी महत्त्वपूर्ण विकल्प हो सकता है.

खेत का चुनाव

आलू उगाने के लिए समतल खेत का चुनाव करना चाहिए. किसी भी दशा में खेत का ढलान 0.5 फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए. जहां तक संभव हो, आलू उन खेतों में न लगाएं, जहां पिछले साल आलू की फसल ली गई हो. फसल को अदलबदल कर लगाने से मिट्टी से पैदा होने वाली आलू की बीमारियां जैसे काली रूसी, मृदु गलन, शुष्क गलन, भूरा गलन, साधारण चूर्णी खुरंड (स्कैब), जीवाणु मुरझान और मूलग्रंथि सूत्रकृमि आदि से छुटकारा पाया जा सकता है.

मिट्टी का चुनाव

बलुई दोमट मिट्टी, जिस में जल निकासी का उचित प्रबंध हो, आलू के उत्पादन के लिए बेहतर है. अगर खाद और पानी की उचित व्यवस्था हो, तो बलुई मिट्टी में भी आलू उगाया जा सकता है. भारी मिट्टी आलू की खेती के लिए उपयुक्त नहीं होती है.

ग्रीष्मकालीन जुताई और हरी खाद

यदि संभव हो, तो मृदाजनित बीमारियों, कीटों और खरपतवारों के प्रकोप से आलू की फसल को बचाने के लिए गरमी के मौसम (मईजून) में 1 या 2 बार खेत की गहरी जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से कर के इसे खाली छोड़ देना चाहिए, जिस से रोगाणु व कीटों के प्रकोप को कम किया जा सकता है.

वर्षा के प्रारंभ होने पर ढैंचा की बोआई हरी खाद के रूप में करनी चाहिए. जब फसल 50-60 दिन की हो जाए, तब उसे मिट्टी पलटने वाले हल से मिट्टी में अच्छी तरह से दबा देना चाहिए. इस से मिट्टी की भौतिक दशा और उर्वराशक्ति में सुधार होता है. नतीजतन, कैमिकल उर्वरकों की बचत होती है और आलू की पैदावार क्वालिटी में भी बढ़ोतरी होती है.

खेत की तैयारी

मिट्टी पलटने वाले हल से गहरी जुताई करने के बाद जरूरत के मुताबिक 2-3 बार डिस्क हैरो या कल्टीवेटर चला कर खेत को अच्छी तरह तैयार करना चाहिए. यदि पिछली फसल के अवशेष खेत में हों, तो उन को भलीभांति निकाल देना चाहिए. भूमि में आलू के कंद बनने के समय किसी भी तरह का प्रतिरोध नहीं होना चाहिए. यदि प्रतिरोध होता है, तो पैदावार कम हो जाती हे.

मैदानी इलाकों की खास किस्में

अगेती किस्में : कुफरी ख्याति, कुफरी, पुखराज, चंद्रमुखी.

मध्यम अवधि वाली किस्में : कुफरी ज्योति, कुफरी लालिमा, कुफरी अरुण, कुफरी सूर्या, कुफरी कंचन, कुफरी ललित.

पछेती किस्में : कुफरी सिंदूरी और कुफरी बहार.

अन्य किस्में : कुफरी चिप्सोना 1, 2, 3 और 4.

आलू के छिलके के रंग के आधार पर भी किस्मों को चुना जा सकता है. मुख्य रूप से सफेद और लाल छिलके वाली किस्मों को ही उगाया जाता है. कुफरी सिंदूरी, कुफरी कंचन और कुफरी लालिमा लाल छिलके वाली किस्में हैं.

बोआई का उचित समय

आलू की बोआई किस्मों के आधार पर अक्तूबर से नवंबर माह तक की जा सकती है. अगेती फसल की खेती कर के किसान अधिक आमदनी ले सकता है.

जहां तक संभव हो, आलू की बोआई ज्यादा पहले न की जाए, क्योंकि आलू के बीज के सड़ने की संभावना अधिक तापमान की वजह से बढ़ जाती है, जिस के फलस्वरूप पैदावार भी कम होती है.

अन्य किस्मों की तुलना में कुफरी सूर्या अधिक तापमान सहन करने के लिए उपयुक्त है. मुख्य फसल की बोआई का उचित समय मध्य अक्तूबर से मध्य नवंबर तक होता है.

बीज की तैयारी

बोआई के 10 से 15 दिन पहले बीज को कोल्ड स्टोरेज से निकाल कर 24 घंटे के लिए खुला छोड़ देना चाहिए, वरना आलू के सड़ने का डर रहता है. इस के बाद आलू को किसी छायादार एवं खुले स्थान पर फैला देना चाहिए. सड़ेगले कंदों को छांट कर अलग कर देना चाहिए. जब कंदों में अच्छी तरह अंकुरण हो जाए, तभी बोना चाहिए.

ध्यान रखें कि बीज को खेत में बोने के लिए ले जाते समय कंद का अंकुर न टूटने पाए, वरना बीज जमाव प्रभावित होगा.

बीज का आकार एवं मात्रा

आलू बीज उत्पादन के लिए 30 से 40 ग्राम वजन विशेष रूप से मुरगी के अंडे के आकार के आलू के कंद को लगाना चाहिए. बीज के आकार के अनुसार एक हेक्टेयर खेत के लिए 20 से 30 क्विंटल आलू कंद पर्याप्त होता है. काट कर आलू लगाने से बीज की मात्रा कम लगती है, लेकिन विषाणु और जीवाणुजनित रोगों के फैलने की संभावना अत्यधिक रहती है, जिस से आलू की पैदावार बुरी तरह प्रभावित हो जाती है. बीज दर को जरूरत के मुताबिक पौधे से पौधे की दूरी या कतार से कतार की दूरी को कम या ज्यादा कर के किया जा सकता है.

आलू बीज का चुनाव

* आलू बीज रोगरहित और स्वस्थ होना चाहिए.

* बीज किसी सरकारी विभाग या रजिस्टर्ड संस्था से ही लेना चाहिए.

* आलू बीज का वजन 30-50 ग्राम का होना चाहिए.

* अंकुररहित या पतले अंकुर वाले कंदों को नहीं बोना चाहिए.

बोने से पहले सावधानियां

* यदि किसान खुद का बीज उपयोग करते हों, तो यह ध्यान रहे कि 3-4 साल बाद बदल लेना चाहिए.

* आलू बीज को कोल्ड स्टोरेज से लाने के बाद धुंधली रोशनी वाले हवादार कमरे में कुछ दिनों के लिए फैला देना चाहिए.

* कंदों में स्वस्थ अंकुर निकले होने चाहिए, जो एक सैंटीमीटर लंबे, हरे व मोटे हों.

बोने के समय सावधानियां

* स्वस्थ अंकुरित कंदों को ही खेत में लगाना चाहिए.

* बिना अंकुरित वाले कंदों (ब्लाइंड ट्यूबर्स) को नहीं लगाना चाहिए.

* सड़ेगले आलुओं को भी निकाल देना चाहिए.

* अंकुरित आलू बीजों को टोकरियों में भर कर सावधानी से खेत में ले जाना चाहिए.

* इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि अंकुर टूटने न पाए, वरना खेत में कंदों को निकलने में समय लगेगा.

पंक्ति से पंक्ति और पौधे से पौधे की दूरी

पूरी तरह से अंकुरित 30-40 ग्राम वजन के कंदों की बोआई के लिए पंक्ति से पंक्ति की दूरी 60 सैंटीमीटर और कंद से कंद की दूरी 30 सैंटीमीटर रखनी चाहिए. कंद से कंद की दूरी को 50-60 सैंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी को 15-25 सैंटीमीटर तक बीज के अनुसार घटाया  व बढ़ाया जा सकता है.

आलू बीज को काट कर लगाने से पंक्ति से पंक्ति की दूरी और कंद से कंद की दूरी को आमतौर पर कम रखते हैं. यदि ट्रैक्टर द्वारा आलू लगाना हो, तो पंक्ति से पंक्ति और पौधे से पौधे की दूरी 60×20 सैंटीमीटर सही होती है.

आलू की खेती में पोषक तत्त्व

आलू की अच्छी उपज के लिए 16-17 पोषक तत्त्व अनिवार्य हैं. इन में नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटैशियम मुख्य तत्त्व हैं. गंधक, कैल्शियम और मैगनीशियम दूसरे और मोलिब्डेनम, जस्ता, तांबा, लोहा व मैगनीज सूक्ष्म पोषक तत्त्व हैं.

पोषक तत्त्वों का काम

नाइट्रोजन के प्रयोग से कंदों की तादाद और आकार में वृद्धि होती है. इस की कमी से पौधों की बढ़वार रुक जाती है और पहले नीचे की पत्ती, उस के बाद सभी पत्तियों का रंग पीला पड़ जाता है, वहीं दूसरी तरफ नाइट्रोजन की अधिकता होने पर ट्यूबर देर से बनते हैं, पौधे की बढ़वार ज्यादा हो जाती है और कंद का आकार छोटा रह जाता है.

फास्फोरस की कमी से जड़ों का विकास कम हो जाता है और उपज कम होती है. पोटैशियम की कमी से आलू में रोगों से लड़ने की क्षमता में कमी आती है और क्वालिटी भी प्रभावित होती है.

मिट्टी की जांच

आलू की खेती करने से पहले खेत की मिट्टी की जांच करा कर खेती करें, तो बेहतर उपज भी मिलेगी.

उर्वरकों की सही मात्रा तभी आंकी जा सकती है, जब मिट्टी की जांच से पता लग सके कि मिट्टी में पोषक तत्त्वों की कमी या अधिकता है. जांच के आधार पर उचित मात्रा में उर्वरक डालने से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति व पैदावार सुनिश्चित की जा सकती है और पर्यावरण का संतुलन भी सही रहता है.

खाद एवं उर्वरक

आमतौर पर आलू की अच्छी उपज के लिए गोबर या कंपोस्ट खाद की 10-20 टन प्रति हेक्टेयर की जरूरत होती है. यदि मिट्टी की जांच नहीं हो पाई हो, तो नाइट्रोजन 150-200 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की जरूरत होती है.

यूरिया 300-400 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर देना चाहिए. फास्फोरस की 80-120 किलोग्राम मात्रा प्रति हेक्टेयर देनी चाहिए, जिस की पूर्ति सिंगल सुपर फास्फेट 400-500 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर देने से हो जाती है.

पोटाश की 100-150 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की जरूरत पड़ती है, वहीं म्यूरेट औफ पोटाश 175-225 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर देने से पूरी की जा सकती है.

खाद एवं उर्वरक का प्रयोग

अंतिम जुताई के समय खाद की आधी मात्रा खेत में बिखेर कर मिला देनी चाहिए. बची हुई खाद की आधी मात्रा और नाइट्रोजन की आधी मात्रा, फास्फोरस और पोटोश की पूरी मात्रा बोआई के समय बनी नालियों में देनी चाहिए.

उर्वरकों को अच्छी तरह मिट्टी में मिला देना चाहिए. पत्ती चूसक कीट की रोकथाम के लिए थिमेट 10जी दवा को 10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से या बोआई के समय 8 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर मिट्टी भराई के समय प्रयोग करनी चाहिए.

फसल की सिंचाई

बोते समय खेत में पर्याप्त नमी होनी चाहिए. अगर नमी कम हो, तो एकसमान अंकुरण के लिए बोने के दूसरे दिन ही हलकी सिंचाई कर देनी चाहिए.

ध्यान रहे कि सिंचाई में पानी इतना ही देना चाहिए कि मेंड़ का एकतिहाई ऊपरी भाग सूखा रहे. इस के बाद मिट्टी की बनावट एवं मौसम के मुताबिक सिंचाई करें. आलू बीज की फसल में लगभग 4 से 6 सिंचाई की जरूरत होती है. मिट्टी चढ़ाने के बाद सिंचाई अवश्य करनी चाहिए. पौधों के लतर उखाड़ने के 10 दिन पहले सिंचाई बंद कर देनी चाहिए.

करें खरपतवार नियंत्रण

फसल में खरपतवार पर नियंत्रण पाने के लिए बोने के बाद, लेकिन आलू बीज जमने से पहले औक्सीफ्लुरोफेन (गोल) की 0.5 लिटर वा मेट्रीब्यूजिन नामक दवा 0.75 ग्राम की एकतिहाई मात्रा को 100 लिटर पानी में घोल बना कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए. इस बात का ध्यान रखें कि दवा के छिड़काव के समय खेत में पर्याप्त नमी हो.

फसल की गुड़ाई

अच्छी पैदावार और ज्यादा आमदनी के लिए सही समय पर निराईगुड़ाई और मिट्टी चढ़ाना बहुत जरूरी है. फसल की समय से गुड़ाई करने से बेहतद पैदावार मिलती है. आमतौर पर फसल की गुड़ाई 20 से 30 दिनों पर करनी चाहिए.

गुड़ाई के बाद बाकी बचे नाइट्रोजन को डाल कर मिट्टी चढ़ाने का काम पूरा कर लेना चाहिए. मिट्टी चढ़ाने का काम मशीन द्वारा या खुद भी किया जा सकता है. मशीन से करने पर पैसे व समय की बचत होती है. ऐसा करने से कंदों का विकास अच्छा होता है.

पछेती झुलसा के लिए अनुकूल मौसम

पछेती झुलसा फफूंद द्वारा लगने वाला एक रोग है. सब से ज्यादा नुकसान आलू की फसल को होता है. यह रोग पौधों की पत्तियों, डंठलों और कंदों सभी में लगता है.

जब 2-3 दिन तक लगातार तापमान 10 डिगरी-20 डिगरी सैल्सियस, हवा में नमी 85 फीसदी से ज्यादा हो, बादल छाए हों और हलकी बूंदाबांदी होती रहे या कोहरा छाया हो, ऐसे हालात में यह सुनिश्चित समझना चाहिए कि रोग लगने वाला है.

पछेती झुलसा के लक्षण

पहले पत्तियों पर छोटे, हलके भूरे अनियमित धब्बे दिखाई देते हैं, जो जल्दी ही बढ़ कर बड़े दिखने वाले धब्बे बन जाते हैं. बाद में पत्तियों की निचली सतह पर धब्बों के चारों तरफ अंगूठीनुमा सफेद फफूंद दिखाई देती है. कंद का गूदा बदरंग हो जाता है और उस में से जली हुई चीनी जैसी महक आती है. गूदे के किनारे पर जंगनुमा भूरापन आ जाता है.

पछेती झुलसा की रोकथाम

पछेती झुलसा रोग से बचाव के लिए जब 2 पंक्तियों के पौधों के पत्ते आपस में सटने लगें, तो मैंकोजेब (डाइथेन एम-45) नामक दवा का 0.20 फीसदी का घोल बना कर दिसंबर महीने के पहले मध्य सप्ताह में रोग के लगने के पहले अवश्य छिड़काव कर देना चाहिए.

पहली बार यदि खेत में झुलसा रोग का लक्षण दिखाई देता है, तो रिडोमिल/कर्जेंट एम-8 दवा का 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से 1,000 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए. मौसम बीमारी के अनुकूल होने पर इन दवाओं का छिड़काव बारीबारी से बदलबदल कर करना चाहिए.

आलू की खुदाई, ग्रेडिंग व भंडारण

जब फसल में पीलापन दिखाई पड़ने लगे, तो पौधों को भूमि की सतह के ऊपर से काट देना चाहिए. कटाई के 10 दिन बाद जब मिट्टी अनुकूल हो जाए, तब ही खुदाई करनी चाहिए. पौध काटने के बाद कंद को मिट्टी के अंदर छोड़ देने से छिलका सख्त हो जाता है और खुदाई के समय आलू नहीं छिलता है.

खुदाई से पहले 2-4 कंद को खोद कर भी देखा जा सकता है और अगर छिलका सख्त लगे, तब खुदाई कर देनी चाहिए.

खुदाई के बाद आलू को ज्यादा देर तक धूप में न छोड़ें और किसी छायादार स्थान पर ढेर लगा कर 10-12 दिनों के लिए रख दें. इस के बाद ढेर में से कटे एवं रोगग्रस्त कंदों को निकाल देना चाहिए. साथ ही, आकार के मुताबिक कंदों को अलग कर देना चाहिए.

अलगअलग साइज के आलुओं का अलगअलग वर्गीकरण करने के लिए कृषि यंत्र का भी उपयोग किया जा सकता है. इस के लिए आलू ग्रेडिंग यंत्र भी आते हैं.

गन्ने की खेती को आसान बनाते यंत्र

आमतौर पर गन्ने की बोआई शरदकाल में 15 अक्तूबर से 15 नवंबर माह के बीच या वसंत के मौसम में 15 फरवरी से 15 मार्च तक की जाती है. पहले साल गन्ना बीज से फसल बोआई की जाती है, उस के बाद अगले 2 सालों तक फसल काटने के बाद ठूंठ बचते हैं, उन ठूंठों में से दोबारा अंकुरण होता है और पैदावार मिलती है. इसे पेड़ी या खूंटी फसल कहते हैं.

पहली बार फसल पैदावार के मुकाबले दूसरे व तीसरे साल फसल उपज में कुछ कमी आ जाती है, लेकिन अगर फसल प्रबंधन का खास ध्यान रखा जाए तो ये फसलें भी पहले साल जैसी पैदावार दे सकती हैं.

गन्ने की खेती में काम आने वाले कृषि यंत्रों का प्रयोग कर किसान अपनी लागत में तो कमी ला ही सकता है, बल्कि अधिक मुनाफा भी कमा सकता है.

गन्ना लोडर

यह यंत्र गन्ने की कटाई के पश्चात इसे मिल पर पहुंचाने के लिए ट्रौली में लोड करने के लिए प्रयोग में लाया जाता है. यह यंत्र 55 हौर्सपावर की क्षमता या इस से अधिक क्षमता वाले ट्रैक्टरों के हाइड्रोलिक के सहारे से संचालित होता है, जो 5 मीटर की ऊंचाई पर गन्ने को आसानी से लोड कर देता है. इस के मजबूत स्टील फ्रेमों से एक बार में अधिक गन्ने को लादा जा सकता है.

गन्ना लोडर से जहां कटाई के बाद गन्ने की क्षति को कम किया जा सकता है, वहीं 90 फीसदी मानव श्रम में कमी लाते हुए लागत में भी कमी लाई जा सकती है. इस मशीन की बाजार में अनुमानित कीमत 4 लाख रुपए से ले कर 6 लाख रुपए तक है.

गन्ने की खेती में रिजर

यह गन्ने की बोआई में प्रयोग आने वाला एक यंत्र है, जो ट्रैक्टर में कल्टीवेटर की तरह फिट किया जाता है. यह किसी भी सामान्य क्षमता के ट्रैक्टर से जोड़ कर चलाया जा सकता है.

यह मशीन गन्ने की बोआई के लिए निर्धारित दूरी पर नालियां बनाता है. गहराई का निर्धारण ट्रैक्टर चालक द्वारा किया जाता है. इस मशीन में श्रम शक्ति की अधिक आवश्यकता होती है. इस से 8 घंटे में 2 एकड़ खेत की बोआई में 15-20 आदमियों की जरूरत होती है.

इस मशीन से बोआई में पहले गन्ने को टुकड़ों में काटा जाता है. साथ ही, इस की कटाई के बाद टुकड़े की नालियों में रोपाई की जाती है, फिर ऊपर से खाद का बुरकाव किया जाता है. इस के उपरांत इन नालियों को गिरा कर पाटा लगाया जाता है. इस यंत्र से बोआई करने में लागत व श्रम अधिक लगता है. इस यंत्र की अनुमानित कीमत 50,000 रुपए है.

गन्ने की खेती में पावर वीडर

गन्ने की फसल की गुड़ाई व खरपतवार नियंत्रण के लिए प्रयोग किया जाने वाला यह यंत्र मानव श्रम में बचत का अच्छा साधन है. इस यंत्र की कीमत 70,000 से एक लाख रुपए तक है, जो डीजल इंजन से संचालित होता है.

इस यंत्र में 2 हत्थे लगे होते हैं. इस मशीन द्वारा किसान एक दिन में तकरीबन एक एकड़ खेत की गुड़ाई आसानी से कर सकता है.

प्रगतिशील किसान राममूर्ति मिश्र ने 2 एकड़ खेत में गन्ना बोया है. वे पावर वीडर के द्वारा गन्ने की खेती में गुड़ाई व खरपतवार नियंत्रण के ऊपर होने वाले मानव श्रम के खर्च में 80 फीसदी कमी लाने में सफल रहे हैं.

उन का कहना है कि पावर वीडर से गुड़ाई करने में प्रतिघंटा एक लिटर डीजल की खपत है, जिस पर महज 300 रुपए खर्च होता है और श्रमिकों से गुड़ाई कराने में एक एकड़ में 25 श्रमिकों की जरूरत पड़ती है, जिस पर तकरीबन 10,000 रुपए का खर्चा आता है. इस तरह न केवल किसान मशीनों का प्रयोग कर गन्ने की खेती को आसान बना सकते हैं, बल्कि लाभदायक भी बना सकते हैं.

अधिक जानकारी के लिए इस पते पर संपर्क कर सकते हैं :

सूरत सिंह, श्रीजी हैवी प्रोजैक्ट वर्क्स लि., शुगर केंद्र्र क्राप सोल्यूशन, ए-504, अंधेरीकुर्ला रोड, अंधेरी ईस्ट मुंबई-400049, मोबाइल नंबर  है: 9416853266.

सूरजमुखी की खेती

हमारे देश में तिलहनी फसलों का उत्पादन उतना नहीं है, जितना होना चाहिए. तिलहनी फसलें ही ऐसी फसल हुआ करती हैं, जिन में लागत कम व शुद्ध लाभ दोगुनातिगुना मिलने की संभावना रहती है. ऐसे में सूरजमुखी एक बड़ी ही महत्त्वपूर्ण फसल है. इस में 40 से 45 फीसदी शुद्ध तेल निकलता है. इस की खली में प्रोटीन बहुत अधिक मात्रा में होता है, जो मुरगियों और पशुओं को आहार दे कर उन के स्वास्थ्य को उत्तम बनाता है.

इस का तेल हृदय रोगियों के लिए बहुत ही फायदेमंद होता है.  सूरजमुखी के तेल की भी मांग बहुत है. सूरजमुखी का उत्पादन यदि समूहों में किया जाए, तो उत्पादन मूल्य बहुत बढि़या मिलने की संभावना रहती है.

भूमि

सूरजमुखी की खेती के लिए गहरी दोमट भूमि अच्छी मानी गई है. बीज के जमाव के लिए उचित नमी होना आवश्यक है. सिंचाई का उचित प्रबंध होना चाहिए और जल निकास की अच्छी एवं उत्तम व्यवस्था होनी चाहिए.

बोने का समय व बीज दर

वैसे तो इस फसल को खरीफ, रबी और जायद तीनों मौसम में आसानी से बोया जा सकता है और अच्छा उत्पादन भी प्राप्त किया जा सकता है, परंतु जायद में ज्यादातर खेत खाली छोड़े जाते हैं, तो उस समय यह फसल और भी लाभकारी साबित होगी.

यह फसल 90 से 110 दिन में तैयार हो जाती है. जायद में मार्च का प्रथम पखवारा बोआई के लिए अच्छा होता है. प्रति हेक्टेयर 10 से 12 किलोग्राम बीज की आवश्यकता पड़ती है. बोने से पहले प्रति किलोग्राम बीज को 2 से 3 ग्राम थीरम अथवा कार्बंडाजिम से शोधित कर लेना चाहिए. इसे 60-20 सैंटीमीटर की दूरी पर बोना चाहिए. बीज को 3 से 4 सैंटीमीटर की गहराई पर बोना चाहिए, जिस से पौधों में आपस की दूरी 20 सैंटीमीटर हो जाए.

उन्नत किस्में

मौडर्न ड्वार्फ के केबीएसएस-1 सनराइज सेलैक्शन, संजीव-95, आईसीआई-36, एसएच-3332 इत्यादि.

उर्वरक

60 से 80 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किलोग्राम फास्फोरस, 40 किलोग्राम पोटाश और 150 से 200 किलोग्राम जिप्सम प्रति हेक्टेयर की दर से देना चाहिए.

सिंचाई

अच्छी पैदावार के लिए 6 से 8 सिंचाइयों की आवश्यकता पड़ती है. पहली सिंचाई बोआई के 15 से 20 दिन बाद करनी चाहिए. बाकी सिंचाइयां 10 से 12 दिन के अंतराल पर करनी चाहिए. दाना बनते समय हलकी सिंचाई करनी चाहिए.

खरपतवार नियंत्रण और मिट्टी चढ़ाना

बोआई के 15 से 20 दिन बाद और पहली सिंचाई से पूर्व खेत में से खरपतवार को निकाल देना चाहिए. जब पौधों की ऊंचाई घुटनों के बराबर हो जाए, तब लाइनों पर मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए. एक बार में 10 से 15 सैंटीमीटर मिट्टी चढ़ा देनी चाहिए. खरपतवारों को पेंडीमेथलिन 30 फीसदी 3.30 लिटर प्रति हेक्टेयर की दर से बीज जमाव से पहले और बोआई के 2-3 दिन बाद 800 से 1,000 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव कर नियंत्रण किया जा सकता है.

परसेंचन क्रिया

अच्छी पैदावार व अच्छी गुणवत्ता के लिए अच्छी तरह से फूल आ जाने पर हाथ में दस्ताने पहन कर फल के मुंडक पर चारों ओर धीरे से पहले किनारे वाले भाग में उस के बाद बीच के भाग में प्रात:काल घुमाना चाहिए.

बीज उत्पादन 

(मुक्त परागित)

खेत का चयन : बीज उत्पादन के लिए उगाई जाने वाली फसल में खेत का चयन काफी महत्त्व रखता है, इसलिए सुरजमुखी के बीज उत्पादन के लिए ऐसे खेत का चुनाव करना चाहिए, जिस में पिछले मौसम में इस की फसल न ली गई हो. खेत में जल निकास की उचित व्यवस्था होनी चाहिए. इस की खेती के लिए मृदा गहरी, उपजाऊ और उदासीन पीएच वाली होनी चाहिए. वैसे, चिकनी मिट्टी में भी उत्पादन सफलतापूर्वक किया जा सकता है.

पृथक्करण-1 : यह अंशत: स्व एवं संकर परागित फसल है. संकर परागण की मात्रा कीट सक्रियता के अनुसार 18-60 तक भिन्नभिन्न हो सकती है. इस के बीज खेतों को चारों ओर से 400 मीटर, आधार बीज के लिए और 200 मीटर की दूरी प्रमाणित बीज फसल के लिए होनी चाहिए.

सस्य क्रियाएं : खेत की तैयारी के समय इस के उत्पादन के लिए मिट्टी भुरभुरी होनी चाहिए. इस के लिए एक गहरी जुताई हल से कर के 2-3 जुताई हैरो से करनी चाहिए.

सूरजमुखी के बीज का छिलका मोटा होता है और पानी को धीरेधीरे सोखता है, इसलिए खासकर सर्दियों व गरमियों की बोआई के लिए बोने से पूर्व सिंचाई की विशेष आवश्यकता होती है.

बीज एवं बोआई : आधार बीज उत्पादन के लिए प्रजनक अथवा आधार बीज और प्रमाणित बीज के लिए आधार बीज प्रयोग करना चाहिए. बीज किसी मान्य स्रोत से ही लेना चाहिए.

सूरजमुखी को किसी ऋतु विशेष में नहीं उगाया जाता है. उस के लिए सिर्फ हिमांक तापमान ही हानिकारक होता है, इसलिए इस समय को छोड़ कर किसी भी समय भूमि की तैयारी के अनुसार इस की बोआई की जा सकती है.

उदाहरण के लिए, देश के पूर्वी भागों में आर्मवार्ट्स जाति की बोआई जल्दी पकने वाली गेहूं के बाद फरवरी मार्च में की जाती है. रबी के लिए नवंबर और वसंत ऋतु के लिए जनवरी के बाद के सप्ताहों तक व खरीफ में मानसून के बाद यदि सिंचाई के साधन उपलब्ध हैं, तो पौधे लगाने का समय उपयुक्त है.

बीज दर : एक हेक्टेयर क्षेत्र के लिए 10 किलोग्राम बीज पर्याप्त होता है. बीज को बोआई से पहले मेंकोजेब से या फिर केप्टान की 3 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम की दर से उपचारित कर लेना चाहिए.

पौधों में दूरी : खेत में पौधे लगाते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि 2 पंक्तियों के बीच की दूरी 60-80 सैंटीमीटर और पौधों के बीच की दूरी 20-25 सैंटीमीटर रहनी चाहिए. बीज 2-4 सैंटीमीटर से ज्यादा गहराई पर नहीं डालना चाहिए.

उर्वरक : अच्छी पैदावार लेने के लिए सूरजमुखी की फसल को 80 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है. पोटाश और फास्फोरस देने से पहले मिट्टी की जांच करवा कर आवश्यकतानुसार मात्रा देनी चाहिए.

सामान्यत: सूरजमुखी की फसल को 40 किलोग्राम फास्फोरस एवं 40 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई के समय ही खेत में बिखेर कर या हैरो के पीछे मिट्टी में मिला देना चाहिए. नाइट्रोजन की 50 किलोग्राम मात्रा बोआई के समय और शेष मात्रा को 40-45 दिनों के पश्चात जब पौधों के तनों के पास मिट्टी चढ़ाते समय देनी चाहिए.

सिंचाई : सूरजमुखी की फसल अन्य तिलहनी फसलों की अपेक्षा कम सिंचाई में ही अधिक उपज देती है. वसंत से ग्रीष्म ऋतु तक की बोआई के लिए बोने से पूर्व सिंचाई करना आवश्यक है. रबी की फसल के लिए भी सिंचाई आवश्यक है. इस से जमाव एक सा होता है और फसल एक सी होती है.

खरीफ की फसल में आवश्यकतानुसार ही सिंचाई करनी चाहिए. इस फसल में फूल आने की अवस्था और फली बनने के समय सिंचाई बहुत जरूरी होती है.

खरपतवार एवं निराईगुड़ाई : बोआई के पहले 6 सप्ताहों में फसल नाजुक होती है, इसलिए समयसमय पर खरपतवारों को निकालते रहना चाहिए. इस के बाद इन का प्रभाव फसल पर बहुत जल्दी हो जाता है. बड़े पौधे जमीन से उखड़ कर गिर जाते हैं, क्योंकि उन का सिर भारी होता है, इसलिए 10-15 सैंटीमीटर मिट्टी जड़ों पर चढ़ानी आवश्यक होती है.

फसल सुरक्षा

बीमारियां : वर्षा ऋतु में आल्टरनेरिया अंगमारी से भारी क्षति होती है. काले भूरे रंग एवं काले रंग के धब्बे किसी भी पौधे में देखे जा सकते हैं. उन के उपचार के लिए मेंकोजेब व जिनेब के 0.25 घोल का छिड़काव 1-2 सप्ताह के अंतर पर करते रहना चाहिए.

अन्य बीमारियों का फसल पर इतना प्रभाव नहीं पड़ता है. मार्च की बोआई में स्केलेरोटिनिया म्लानी जड़ों में व चारकोल विगलन का प्रकोप हो जाता है, इसलिए रोगग्रसित पौधों को उखाड़ कर जला देना चाहिए.

मुंडक सड़न रोग : कवकों के संक्रमण से मुंडक में सड़न पैदा हो जाती है. रोग ज्यादा फैलने पर मुंडक सड़ कर काले रंग में परिवर्तित हो जाता है और दाना बनना रुक जाता है. इसे मेंकोजेब 2.5 किलोग्राम या कार्बंडाजिम 2.0 किलोग्राम की मात्रा 800-1,000 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करना चाहिए.

दीमक/गुजिया कीट : दीमक सफेद मटमैले रंग का होता है. गुजिया भूरे मटमैले रंग का कीट होता है. यह नए पौधों की सतह के नीचे से नुकसान पहुंचाता है.

इसे क्लोरोपायरीफास 20 ईसी 3.75 लिटर प्रति हेक्टेयर की दर से 600 से 800 लिटर पानी में घोल बना कर छिड़काव कर के नियंत्रित किया जा सकता है.

कटाई : जब मुंडक का निचला भाग पीले भूरे रंग में बदल जाए, तब कटाई करनी चाहिए. सभी मुंडक एकसाथ तैयार नहीं होते, इसलिए इन की कटाई 2-3 चरणों में की जाती है. कटाई के बाद मुंडक को पूर्ण रूप से सुखा कर डंडे से पीट कर दानों को अलग कर लिया जाता हैं.

कीट : सामान्यत: इस फसल में विशेष कीटों का प्रभाव नहीं देखा जाता, परंतु कृंतक कृमि व जैसिड कभीकभी नुकसान करते हैं. इसलिए कृंतक कृमि के नियंत्रण के लिए 15 किलोग्राम हेप्टाक्लोर प्रति हेक्टेयर व जैसिड के लिए 1-2 स्प्रे 0.025 फीसदी औक्सीडिमेटान मिथाइल 25 ईसी का छिड़काव करना चाहिए.

चिडि़या द्वारा नुकसान : सूरजमुखी की फसल पकती है, उस समय कोई दूसरी फसल तैयार नहीं होती है, इसलिए चिडि़या द्वारा इसे काफी नुकसान होता है. चिडि़या को उड़ाने के लिए बच्चों या महिलाओं की सहायता लेनी चाहिए.

अवांछित पौधों को निकालना : रोगिंग (अवांछित पौधों को निकालना) 2 बार की जाती है :

* फूल आने से पहले.

* पकने के समय पर.

लंबे पौधे निकालना : जो पौधे अन्य पौधों से अधिक लंबे होते हैं, उन्हें निकाल देना चाहिए, क्योंकि ये बाध्य निषेचन या एक ही जाति के विभिन्न ऊंचाई के पौधों के निषेचन से पैदा होते हैं.

* शीघ्र व देर से पकने वाले पौधों को भी निकाल देना चाहिए, क्योंकि ये बीज की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव डालते हैं.

* रोगग्रस्त पौधों की भी छंटाई कर देनी चाहिए.

जंगली जाति के पौधे : इन पौधों को निकालना आवश्यक होता है, अन्यथा बीज की गुणवत्ता खत्म हो जाती है. साथ ही, रोगग्रस्त पौधों की भी छंटाई कर देनी चाहिए.

उपज : औसतन उपज 15 से 20 क्विंटल दाना प्रति हेक्टेयर मिलने की संभावना रहती है.

कटाई एवं मंड़ाई : जब सूरजमुखी का फूल पक जाता है, तो उस का छिलका भूरे रंग का हो जाता है. सिरों को तोड़ कर धूप में सुखा लेना चाहिए और छड़ी से पीट कर दाने निकाल देने चाहिए.

मटर की पैदावार और बीज का उत्पादन

मटर का स्थान शीतकालीन सब्जियों में प्रमुख है. इस का इस्तेमाल आमतौर पर हरी फली की सब्जी के तौर पर जाना जाता है, वहीं साबुत मटर और दाल के लिए भी किया जाता है. मटर की खेती सब्जी और दाल के लिए उगाई जाती है.

मटर दाल की जरूरत की भरपाई के लिए पीले मटर का उत्पादन करना बहुत जरूरी है. इस का प्रयोग दाल, बेसन व छोले के रूप में अधिक किया जाता है.

आजकल मटर की डब्बाबंदी भी काफी लोकप्रिय है. इस में प्रचुर मात्रा में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, फास्फोरस, रेशा, पोटैशियम व विटामिन पाया जाता है. देशभर में इस की खेती व्यावसायिक रूप से की जाती है.

जलवायु

मटर की फसल के लिए नम व ठंडी जलवायु की जरूरत होती है, इसलिए हमारे देश में ज्यादातर जगहों पर मटर की फसल रबी सीजन में उगाई जाती है. बीज अंकुरण के लिए औसत तापमान 22 डिगरी सैल्सियस और अच्छी बढ़वार व विकास के लिए 10-18 डिगरी सैल्सियस की जरूरत होती है.

अगर फलियों के बनने के समय गरम या शुष्क मौसम हो जाए तो मटर के गुणों व उत्पादन पर बुरा असर पड़ता है. उन सभी जगहों पर जहां सालाना बारिश60-80 सैंटीमीटर तक होती है, मटर की फसल कामयाबी से उगाई जा सकती है. मटर के बढ़ोतरी के दौरान ज्यादा बारिश का होना बहुत ही नुकसानदायक होता है.

भूमि

इस की सफल खेती के लिए उचित जल निकास वाली, जीवांश पदार्थ मिट्टी सही मानी जाती है, जिस का पीएच मान 6-7.5 हो, तो ज्यादा सही होती है.

मटियार दोमट और दोमट मिट्टी मटर की खेती के लिए अति उत्तम है. बलुई दोमट मिट्टी में भी सिंचाई की सुविधा उपलब्ध होने पर मटर की खेती अच्छी तरह से की जा सकती है, वहीं कछार की जमीन में पानी सूख जाने के बाद मटर की खेती करने योग्य नहीं होती है.

प्रजातियां

फील्ड मटर : इस वर्ग की किस्मों का इस्तेमाल साबुत मटर, दाल के अलावा दाना व चारा के लिए किया जाता है. इन किस्मों में प्रमुख रूप से रचना, स्वर्ण रेखा, अपर्णा, हंस, जेपी-885, विकास, शुभ्रा, पारस, अंबिका वगैरह हैं.

गार्डन मटर : इस वर्ग की किस्मों का इस्तेमाल सब्जियों के लिए किया जाता है.

अगेती यानी जल्दी तैयार होने वाली किस्में

आर्केल : यह यूरोपियन अगेती किस्म है. इस के दाने मीठे होते हैं. इस में बोआई के 55-65 दिन बाद फलियां तोड़ने योग्य हो जाती हैं. इस की फलियां 8-10 सैंटीमीटर लंबी एकसमान होती हैं. हरी फलियों की 70-100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज मिल जाती है.

बोनविले : यह जाति अमेरिका से लाई गई है. यह मध्यम समय में तैयार होने वाली प्रजाति है. इस की फलियां बोआई के 80-85 दिन बाद तोड़ने के लिए तैयार हो जाती हैं. इस की फलियों की औसत पैदावार 130-140 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हासिल होती है.

अर्लीबैजर : यह किस्म संयुक्तराज्य अमेरिका से लाई गई है. यह अगेती किस्म है. बोआई के 65-70 दिन बाद इस की फलियां तोड़ने के लिए तैयार हो जाती हैं. हरी फलियों की औसत उपज 80-100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है.

अर्लीदिसंबर : यह जाति टा.19 व अर्लीबैजर के संस्करण से तैयार की गई है. यह किस्म 55-60 दिन में तोड़ने के लिए तैयार हो जाती है. हरी फलियों की औसत उपज 80-100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

असौजी : यह एक अगेती बौनी किस्म है. इस की फलियां बोआई के 55-65 दिन बाद तोड़ी जा सकती हैं. इस की फलियां गहरे हरे रंग की 5-6 सैंटीमीटर लंबी व दोनों सिरे से नुकीली होती हैं. प्रत्येक फली में 5-6 दाने होते हैं. हरी फलियों की औसत उपज 90-100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है.

पंत उपहार : इस किस्म की बोआई 25 अक्तूबर से 15 नवंबर तक की जाती है और इस की फलियां बोआई से 65-75 दिन बाद तोड़ी जा सकती हैं.

जवाहर मटर : इस किस्म की फलियां बोआई से 65-75 दिन बाद तोड़ी जा सकती हैं. यह मध्यम किस्म है. फलियों की औसत लंबाई 7-8 सैंटीमीटर तक होती है और प्रत्येक फली में 5-8 बीज होते हैं. फलियों में दाने ठोस रूप में भरे होते हैं. हरी फलियों की औसत पैदावार 130-140 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है.

Peasमध्यम किस्में

टी-9 : इस किस्म की फलियां 65 दिन में तोड़ने लायक हो जाती हैं. यह मध्यम किस्म है.  फसल की अवधि 120 दिन है. पौधों का रंग गहरा हरा, फूल सफेद व बीज  झुर्रीदार व हलका हरापन लिए हुए सफेद होते हैं. फलियों की औसत पैदावार 80-100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है.

टी-56 : यह भी मध्यम अवधि की किस्म है. पौधे हलके हरे, सफेद बीज  झुर्रीदार होते हैं. हरी फलियां 75 दिन में तोड़ सकते हैं. औसत उपज प्रति हेक्टेयर 80-90 क्विंटल हरी फलियां मिल जाती हैं.

एनपी-29 : यह भी अगेती किस्म है. फलियों को 75-80 दिन बाद तोड़ सकते हैं. इस की फसल अवधि 100-110 दिन है. हरी फलियों की औसत पैदावार 100-120 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है.

पछेती यानी देरी से तैयार होने वाली किस्में

ये किस्में बोने के तकरीबन 100-110 दिन बाद पहली तुड़ाई करने योग्य हो जाती हैं. जैसे- आजाद मटर-2, जवाहर मटर-2 वगैरह.

बीजों का चुनाव : मटर के अच्छे उत्पादन के लिए आधार बीज व प्रामाणित बीज बोआई के लिए उपयोग में लाना चाहिए.

बीज दर : अगेती किस्मों के लिए 100 किलोग्राम व मध्यम व पछेती किस्मों के लिए 80 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर लगता है. बीज हमेशा प्रमाणित व उपचारित कर के बोना चाहिए. बीज को बोने से पहले नीम का तेल या गौमूत्र या मिट्टी के तेल से उपचारित कर लेना चाहिए.

बीज और अंतरण : अकसर मटर शुद्ध फसल या मिश्रित फसल के रूप में ली जाती है. इस की बोआई हल के पीछे कूंड़ों में या सीड ड्रिल द्वारा की जाती है. बोआई के समय 30-45 सैंटीमीटर पंक्ति से पंक्ति की दूरी रखें और 10-15 सैंटीमीटर पौध से पौध की दूरी रखें. साथ ही, 5-7 सैंटीमीटर की गहराई पर बोएं.

बोने का समय

उत्तर भारत में दाल वाली मटर की बोआई का उचित समय 15-30 अक्तूबर तक है, वहीं दूसरी ओर फलियों वाली सब्जी के लिए बोआई 20 अक्तूबर से ले कर 15 नवंबर तक करना लाभदायक है.

खाद एवं उर्वरक

मटर की फसल से अच्छी पैदावार लेने के लिए 1 एकड़ जमीन में 10-15 क्विंटल गोबर की सड़ी खाद और नीम की खली को खेत में समान रूप से बिखेर कर जुताई के समय मिला देना चाहिए. ट्राईकोडर्मा 25 किलोग्राम प्रति एकड़ के अनुपात से खेत में मिलाना चाहिए. लेकिन याद रहे कि खेत में जरूरी नमी हो.

बोआई के 15-20 दिन बाद वर्मिवाश का अच्छी तरह से छिड़काव करें, ताकि पौधा तरबतर हो जाए. निराई के बाद जीवामृत घोल का छिड़काव कर दें.

जब फसल फूल पर हो या समय हो रहा हो तो एमिनो एसिड व पोटैशियम होमोनेट की मात्रा स्प्रे द्वारा देनी चाहिए. 15 दिनबाद एमिनो एसिड पोटैशियम होमोनेट फोल्विक एसिड को मिला कर छिड़क देना चाहिए.

नमी बनी रहे, इस का ध्यान रखें. अगर कैमिकल खाद का इस्तेमाल करते हैं, तो गोबर या कंपोस्ट खाद (10-15 टन प्रति हेक्टेयर) खेत की तैयारी के समय दें.

चूंकि यह दलहनी फसल है, इसलिए इस की जड़ें नाइट्रोजन स्थिरीकरण का काम करती हैं. यही वजह है कि फसल में कम नाइट्रोजन देने की जरूरत पड़ती है.

कैमिकल खाद के रूप में 20-25 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40-50 किलोग्राम फास्फोरस और 40-50 किलोग्राम पोटाश प्रति हेक्टेयर बीज बोआई के समय ही कतारों में दिया जाना चाहिए.

यदि किसान उर्वरकों की इस मात्रा को यूरिया, सिंगल सुपर फास्फेट व म्यूरेट औफ पोटाश के माध्यम से देना चाहता है, तो एक बोरी यूरिया, 5 बोरी सिंगल सुपर फास्फेट व डेढ़ बोरी म्यूरेट औफ पोटाश प्रति हेक्टेयर सही रहता है.

सिंचाई

मटर की देशी व उन्नतशील जातियों में 2 सिंचाई की जरूरत पड़ती है. सर्दियों में बारिश हो जाने पर दूसरी सिंचाई की जरूरत नहीं पड़ती.

पहली सिंचाई फूल निकलते समय बोने के 45 दिन बाद और दूसरी सिंचाई जरूरत पड़ने पर फली बनते समय बीज बोने के 60 दिन बाद करें. साधारणतया मटर को कम पानी की जरूरत होती है. सिंचाई हमेशा हलकी करनी चाहिए.

खरपतवार

मटर की फसल के प्रमुख खरपतवार हैं- बथुआ, गजरी, चटरीमटरी, सैजी, अंकारी. इन सभी खरपतवारों को निराईगुड़ाई कर के फसल से बाहर निकाला जा सकता है.

फसल बोने के 35-40 दिन तक फसल को खरपतवारों से बचाना जरूरी है. बोने के 30-35 दिन बाद जरूरत के मुताबिक 1 या 2 निराई करनी चाहिए.

कीट नियंत्रण

तनाछेदक : यह काले रंग की मक्खी होती है. इस की गिडारें फसल की शुरुआती अवस्था में छेद कर अंदर से खाती हैं. इस से पौधे सूख जाते हैं.

रोकथाम : 10 लिटर गौमूत्र रखना चाहिए. इस में 2.5 किलोग्राम नीम की पत्ती को छोड़ कर इसे 15 दिनों तक गौमूत्र में सड़ने दें. 15 दिन बाद इस गौमूत्र को छान लें, फिर छिड़काव करें.

फलीछेदक : देर से बोई गई फसल में इस कीट का हमला ज्यादा होता है. इस कीट की सूंडि़यां फली में छेद कर अंदर तक घुस जाती हैं और दानों को खाती रहती हैं.

रोकथाम : मदार की 5 किलोग्राम पत्ती 15 लिटर गौमूत्र में उबालें. 7.5 लिटर मात्रा बाकी रहने पर छान लें, फिर फसल में तरबतर कर छिड़काव करें.

माहू : इस कीट का प्रकोप जनवरी माह के बाद अकसर होता है.

रोकथाम : 10 लिटर गौमूत्र रखना चाहिए. इस में ढाई किलोग्राम नीम की पत्ती को छोड़ कर इसे 15 दिनों तक गौमूत्र में सड़ने दें. 15 दिन बाद इस गौमूत्र को छान लें, फिर छिड़काव करें.

रोग नियंत्रण

उकठा : इस रोग की शुरुआती अवस्था में पौधों की पत्तियां नीचे से ऊपर की ओर पीली पड़ने लगती हैं और पूरा पौधा सूख जाता है. यह बीजजनित रोग है. इस रोग में फलियां बनती नहीं हैं.

रोकथाम : जिस खेत में एक बार मटर में इस बीमारी का प्रकोप हुआ हो, उस खेत में 3-4  साल तक यह फसल नहीं बोनी चाहिए. तंबाकू की 2.5 किलोग्राम पत्तियां, 2.5 किलोग्राम आक या आंकड़ा और 5 किलोग्राम धतूरे की पत्तियों  को 10 लिटर गौमूत्र में उबालें और 5 लिटर मात्रा बाकी रहने पर छान लें, फिर फसल में अच्छी तरह छिड़काव करें.

झुलसा (आल्टरनेरिया ब्लाइट ) : इस का प्रकोप भी पत्तियों पर होता है. सब से पहले नीचे की पत्तियों पर किनारे से भूरे रंग के धब्बे बनते हैं.

रोकथाम : मदार की 5 किलोग्राम पत्ती 15 लिटर गौमूत्र में उबालें. 7.5 लिटर मात्रा बाकी रहने पर छान लें, फिर फसल में तरबतर छिड़काव करें.

उपज

हरी फलियों की पैदावार 80-120 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक मिल जाती है. फलियां तोड़ने के बाद कुल 150 क्विंटल तक हरा चारा मिल जाता है.